सोमवार, 6 जून 2016

मक्का में शैतान की मूर्ति !!

कुछ समय  पहले एक    मुस्लिम  युवा   ने सवाल   किया  था  ,कि आप  लोग धातु  , मिटटी  और पत्थरों  की  मूर्तियों   की  पूजा  क्यों  करते हो ? क्या  आपके  भगवान  इनके  भीतर  घुसे हुए हैं ? भला   यह  बेजान    मूर्तियां  भी कुछ  महसूस  कर  सकती   हैं  ?    जो  आपकी  दुआएं  सुन  लेंगी ?

हम इस  लेख   के  माध्यम   से  उन हजरत   से  पूछना  चाहते  हैं   कि  मुसलमान  हज  के  दौरान शैतान  को मारने  के  लिए "जमरात " नामक खम्भे  पर  पत्थर  क्यों  मारते हैं ? क्या  शैतान  उनमे  घुसा हुआ  है  , ?और  अगर शैतान  उनमे  हैं  ,तो  इतने  बरसों  तक  पत्थर  मारने  पर  भी  शैतान  अब तक  क्यों   नहीं  मरा ? जबकि पत्थर   मरने   वाले  हजारों  हाजी  मर  गए , क्या अल्लाह   की  तरह  शैतान   भी अमर है ?

1- शैतान  का  परिचय 

इस्लाम से  काफी  समय  पहले  से ही अरब  के  लोग शैतान   को  अल्लाह  का प्रतिद्वंदी  शक्तिशाली   मानते   थे  , इस्लामी   मान्यता  के  अनुसार  शैतान    भी  अल्लाह   की   तरह  अमर  है   , लेकिन शैतान   का  जन्म  लगभग   साठ  हजार   पहले   हुआ   था   , शैतान    को  कुरान   में "इबलीस -  ابليس "  भी   कहा  गया   है  , परन्तु   उसका  असली   नाम  "अजाजील -   عزازيل  "   है   , जो तौरेत यानि  बाइबिल के शब्द "अजाज एल - עֲזָאזֵל "से  लिया  गया   है . हिन्दी    में  इसका  अर्थ   ईश्वर  की  फटकार   है (Damnation of God )

वास्तव    में   इब्लीस  एक  जिन्न  है  ,जिसे अल्लाह   ने "मुअल्लिमुल मलकूत - معلم الملكوت "   यानी फ़रिश्तों का  सरदार  बना  दिया  था .इब्लीस  के  पिता  का नाम खबीस है ,जिसका  चेहरा सिंह  की  तरह   है  , और  वैसा   ही  स्वभाव   है .इब्लीस  की   माँ  का  नाम " निलबीस  " है  , जिसका  चेहरा शेरनी  की  तरह   है   , यह  उग्र     स्वभाव  की  है .  इब्लीस  की  पत्नी   का   नाम "तरतबा "  है,इब्लीस  के  पांच   लडके  हैं    ,  उनके   नाम  और  काम   इस  प्रकार   हैं  ,                  

1.ताबर-लोगों के मन में विकार, भ्रम, जटिलता और मन की व्याकुलता उत्पन्न  करता   है

2.आवर- दुष्कर्मों  की  प्रेरणा   देता   है

3.मसौत-झूठ    बोलने  और  धोखा  देने   की  प्रेरणा   देता   है

4.वासिम -परिवार  और  रिश्तेदारों  में झगडे  और  समाज   में  दंगे करवाता   है

5. जकनबार -बाजारों   में  विवाद और अफवाहें  फैला   कर लोगों  में लड़ाई   करवाता  है

2-शैतान  का सिंहासन  समुद्र  में  है 

जो   मुर्ख   लोग  शैतान   को  पत्थर   मारने के  लिए  मक्का   जाते  हैं   ,  उन्हें  पता  होना  चाहिए  कि शैतान समुद्र में  रहता  है   , जैसा  कि इस हदीस  में  कहा  गया   है  ,

"जबीर  बिन  अब्दुल्लाह  ने  कहा   कि रसूल   ने बताया   है कि "शैतान   का  सिंहासन समुद्र  में  है ( The throne of Iblis is upon the ocean  ). अरबी   में "इन्न अर्शुल इबलीस अला बहर- إِنَّ عَرْشَ إِبْلِيسَ عَلَى الْبَحْرِ  "


सही  मुस्लिम - किताब 39  हदीस 6754

3-शैतान  को पत्थर मारने का रिवाज 
नौवीं  शताब्दी   में पैदा हुए   इतिहासकार     "अल   अजरकी   -  الأزرقي "ने  अपनी  किताब    "अखबार मक्का -  اخبار مكة "   में  मक्का  का  इतिहास लिखा  है .   इसमे  मक्का में  इस्लाम  से  पहले  के रिवाज , दन्तकथाएं   और   मान्यताओं   का   विस्तृत विवरण  दिया गया  है ,    इसके  साथ  मुहम्मद  साहब   की  मृत्यु  तक  यानी  सन 603  ई ० तक  मक्का  में  होने वाली  घटनाओं   का  विवरण  भी दिया  है .  अजरकी  ने  मक्का में  हाजियों  द्वारा ईंट  पत्थर   से निर्मित स्तम्भ(Pillar)  को  पत्थर  मारने की  परम्परा  का  भी  उल्लेख   किया  है  , लोग उसे  शैतान  मानते  हैं , यह  रिवाज   हजारों  साल  पुराना  है  , पीढ़ी  दर पीढ़ी   लोग इसी रिवाज  को मानते आये  हैं , यद्यपि  कुरान   में  शैतान   को  पत्थर  मारने  का  आदेश  कहीं  नहीं     दिया  है  , कारण पूछने  पर  लोग  कहते  हैं  ,
"और जब  यह  कोई  अनैतिक   काम  करते  हैं   ,तो  कहते   हैं की हमने  यह अपने  पूर्वजों  को  ऐसा  करते  हुए पाया  है  , हमें तो  अल्लाह  ने  यही  हुक्म   दिया  है "
सूरा -अल  आराफ 7:28 

   शैतान   को  पत्थर मारने  की  परंपरा  के  पीछे   मक्का  के  लोगों  में  एक  कहानी   प्रचलित   है  ,जिसे अजरकी  ने  लिखा है   , इसके अनुसार
 जब  इब्राहिम  मीना  नामकी  जगह  छोड़  कर अकबा गए  तो  उनको गंदे  पत्थरों  के ढेर के पीछे  छुपा   हुआ  शैतान   दिखा  , तभी  जिब्राइल  ने  उन से कहा  इस शैतान  को  पत्थर   मार  कर  भगा  दो  .इस  से शैतान  भाग   गया  लेकिन  फिर  वहीँ  छुप   गया  , इब्राहिम   ने  फिर  पत्थर  मारे  , ऐसा दो   बार  हुआ  . तब  जिब्राईल   ने  इब्राहिम  से कहा  शैतान   को  सात  पत्थर   मारो  , तभी  यह  भागेगा  , इब्राहिम   ने ऐसा  ही  किया  , और शैतान   दूर  कहीं चला  गया . तभी   से  यह   रिवाज    शुरू   हो गया

4-शैतान   का  कद  बढ़  गया 
यदि   हम  कहें कि जैसे  जैसे  मुसलमानों   में  शैतानी प्रवृत्ति    बढ़ने  लगी   वैसे ही   शैतान  के   स्तम्भ    का  कद  भी   बढ़   गया   है ,तो  इस  बात  में कोई  झूठ   नहीं    है   , क्योंकि   सऊदी  सरकार  ने  सन 2004  में शैतान   के  छोटे  स्तम्भ    को  तोड़   कर  नया  और  बड़ा  स्तम्भ  बनवा  दिया  है .यह  26  मीटर  यानी  85  फुट   लंबा  है   ,  इसके  आगे  एक  पुल  भी    बनवा  दिया  गया  है  ,  ताकि   लोग  इस  पर  चढ़   कर  शैतान  के  स्तम्भ   पर  पत्थर   मार  सकें , इस  स्तम्भ  को  अरबी  में "अल   जमरात  الجمرات‎ - "  कहा  जाता   है 

1.पुराने  स्तम्भ   की  फोटो 

http://www.cuttingthroughthematrix.com/images/StoningofSatan.jpe

2.नये स्तम्भ   की  फोटो 

http://www.islamicinvitationturkey.com/wp-content/uploads/2012/10/esmaeeli20121026173802210.jpg

5-शैतान  को  पत्थर   मारने  की विधि 

शैतान  को  पत्थर   मारने   को  अरबी   में "रमी  अल  जमरात  -  رمي الجمرات‎   " कहा  जाता   है   , इसके  लिए  नियम इस  प्रकार   हैं ,1.जिल  हज  की  10 तारीख को  हाजी  मुजदलीफा    से  निकलें  और  मीना  के  रास्ते  से  पत्थर  जमा  करें  ,2 .पत्थर   न  तो  बहुत  बड़े  हों  और न छोटे  हों .3.सुन्नत  के अनुसार  सात (7 ) पत्थर   जमा   कर के  रख  लें .4.मीना  आने  पर सूर्योदय   से  पहले पत्थर  नहीं  मारें .5.हाजी जमरात   पर  सात  पत्थर  मारें  ,  लोग  शैतान  पर धिक्कार  करने के लिये अपने  जूते  , सैंडिल   और अन्य  गंदी  चीजें     भी    फेक   कर  मार  देते  हैं

6-शैतान  को  पत्थर कब  मारें ?

इसके बारे   में  यह  हदीस बताती   है   ,

वाबरा  ने  इब्न  उमर से पूछ  कि  हम शैतान  पर  पत्थर   कब  मार  सकते  हैं ? उमर  ने   कहा जब  तुम्हारे  दल  का   मुखिया (इमाम )  आदेश  करे यानी  पत्थर  मारे  तभी   शैतान  पर  पत्थर  मारना .

Narrated Wabrah,I asked Ibn 'Umar: When should I throw pebbles at the jamrah? He replied: When your imam (leader at Hajj) throws pebbles

"، عَنْ وَبَرَةَ، قَالَ سَأَلْتُ ابْنَ عُمَرَ مَتَى أَرْمِي الْجِمَارَ قَالَ إِذَا رَمَى إِمَامُكَ فَارْمِ ‏.‏ فَأَعَدْتُ عَلَيْهِ الْمَسْأَلَةَ فَقَالَ كُنَّا نَتَحَيَّنُ زَوَالَ الشَّمْسِ فَإِذَا زَالَتِ الشَّمْسُ رَمَيْنَا ‏.‏ "

Sunan Abi Dawud - Book 10, Hadith 1967

7-पत्थर  मारने वालों  की  मौत 
शैतान  के स्तम्भ   पर  पत्थर   मारने  के लिए   हाजियों   में  धक्कामुक्की   और   भगदड़    हो   जाती  है   ,  और शैतान   पर   पत्थर  मारने   वाले  खुद   मर   जाते   है  ,  जैसा   इसी  साल   में  हुआ  है   ,  मुहम्मद  साहब  के  सामने   भी  ऐसा  हुआ  था  ,  जिसका  विवरण   इस  हदीस   में   है  ,

अब्दुल्लाह   इब्न  बुरैदा   ने  अपने  पिता  से  सुना  कि  एक  औरत  शैतान   को पत्थर   मारते   समय  दूसरी   औरत  से गुथ  गयी   ,  जिस   से  उसके  पेट  का  गर्भ  गिर  गया.  तब रसूल   ने  उस  बच्चे   के लिए  दिय्या (   ) मुआवजे  के  रूप में  पचास  भेड़ें   उस  औरत   को  दीं ,और   लोगों  को  पत्थर  मारना   बंद  करने  को   कहा

a woman threw some pebbles and stuck another woman, and she miscarried. The Messenger of Allah stipulated (a Diyah of ) fifty sheep for her child. And on that day, he forbade throwing pebbles.

، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ بُرَيْدَةَ، عَنْ أَبِيهِ، أَنَّ امْرَأَةً، خَذَفَتِ امْرَأَةً فَأَسْقَطَتْ فَجَعَلَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي وَلَدِهَا خَمْسِينَ شَاةً وَنَهَى يَوْمَئِذٍ عَنِ الْخَذْفِ ‏.‏ أَرْسَلَهُ أَبُو نُعَيْمٍ ‏.‏ "
"

 Sunan an-Nasa'i - Vol. 5, Book 45, Hadith 4817

8-कोसने  से शैतान शक्तिशाली  हो जाता है 
 
इस्लाम  से  पहले  से भी अरब   लोगों  में रिवाज  था  कि जब  कोई  काम  बिगड़ जाता  था , या  किसी  तरह   की  अड़चन  पैदा हो   जाती  थी  , तो  वह शैतान  को  कोसने  लगते   थे  , और कह  देते  थे  कि शैतान    मर  जाये , या शैतान  पर   लानत   हो  . अरबों   की  यह  परंपरा  मुहम्मद साहब  के  समय  से भी  थी ,  और आज   भी  जारी   है   , लोग ज़रा सी  बात  पर  भी  शैतान  को  जिम्मेदार   बता   कर  उसकी  मौत की  बद दुआ  देने  लगते  थे  ,  जैसा  इस  हदीस  में  कहा  गया  है   ,

अबु  तमीमा  अल  हुज़ैमा  ने  कहा  की  एक   बार  मैं रसूल के पीछे उनके  गधे   पर  बैठ   कर जा रहा   था  , तभी   वह  गधा  रास्ते   में  अड़  गया  , यह देख  कर  मैं  बोल  पड़ा  कि "शैतान  का नाश  हो  ( Let Satan perish) ,अरबी  में "युहलिक अश्शैतान -  يهلك الشيطان"यह  सुन कर  रसूल   ने  कहा ऐसा  नहीं  कहो   इस  से शैतान  और बड़ा   हो   जायेगा  ,  बल्कि   कहो   बिस्मिल्लाह   इस  से  शैतान  एक   मच्छर  से भी  छोटा    हो  जायेगा

मुसनद  इमाम  अहमद ( مسند أحمد )  Vol. 5 p. 59 
 

यही   बात  इस  हदीस  में  इस प्रकार   कही   गयी   है  , तुम  यह  नहीं  कहो  कि शैतान  का नाश  हो,और   न  यह  कहो  लि इन्नल इबलीस लईन -  لأنَّ إبْليسَ اللّعِينَ " यानी   शैतान  के  लिए  लानत  हो  , ऐसा  कहने  से शैतान  की  शक्ति  बढ़  जाती  है .  इसलिए  तुम  कहो   अल्लाह  के  नाम  से  ‘( In the name of Allah ) .    इस  से   वह  अपमानित  महसूस करेगा  
 
सुन्नन   अबी  दाऊद  - किताब  अल  अदब  42  हदीस 4982

 इन हदीसों  से  सिद्ध   होता  है कि मुसलमान  शैतान लानत   भेज  भेज  कर  उसकी  शक्तियों  में वृद्धि कर रहे   है  ,यही  कारण  है  कि  इस्लामी देशों  में शैतान   का  राज  है  , कहीं  शान्ति  नहीं  है .इन  सभी  प्रमाणों  से  सिद्ध   होता   है कि इस्लाम  की   मान्यताएं   , रिवाज   और  परंपरा     तर्कहीन   और  अंधविश्वास   पर  आधारित    हैं   . जब   मुसलमान  एक  स्तम्भ   में  शैतान  का निवास  मानते   हैं   . जो  एक  प्रकार   की   मूर्ति  पूजा  ही  है   , तो  उनको  हिन्दुओं   की  मूर्ति  पूजा   पर कटाक्ष  करने    का  कोई  अधिकार  नहीं  . मुस्लमान   ऐसा  इसलिए करते हैं   , क्योंकि उनके  सभी   नबी  और  रसूल  शैतान   के प्रभाव   से  ग्रस्त   थे   ,जैसा  कि खुद   कुरान   में  लिखा  है ,

"हे  मुहम्मद  तुम से  पहले जो   भी   नबी  और  रसूल   हमने  भेजे शैतान    ने उनकी   कामना   में असत्य  मिला  दिया  था  , "सूरा  अल हज 22:52 


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रविवार, 5 जून 2016

मेराज का असली राज़ !

मेराज अरबी भाषा का शब्द है , वैसे तो इसका अर्थ "Ascension " या आरोहण होता है .लेकिन इस्लामी विद्वान् इसका तात्पर्य "स्वर्गारोहण "करते हैं .इनकी मान्यता है कि मुहम्मद एकही रात में मक्का से यरूशलेम तक की यात्रा कर आये थे और वहां स्थित अक्सा नाम की मस्जिद में नमाज नमाज भी पढ़ कर आये थे,जो एक महान,चमत्कार था .लेकिन सब जानते हैं कि केवल मान्यता के आधार पर ऐतिहासिक सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता है .मुहम्मद की इस तथाकथित "मेराज " का असली राज (रहस्य ) क्या है ,यह आपके सामने प्रस्तुत किया जा रहा है .
यह कहावत प्रसिद्ध है कि"झूठ के पैर नहीं होते "इसका तात्पर्य है कि यदि कोई व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए या दूसरों को प्रभावी करने के लिए झूठ बोलता है ,अथवा गप्प मरता है ,तो उसका ऐसा झूठ अधिक समय तक नहीं चलता है .और एक न एक दिन उसके झूठ का भंडा फूट ही जाता है .
मुहम्मद एक गरीब बद्दू परिवार में पैदा हुआ था ,और उसके समय के यहूदी और ईसाई काफी धनवान थे .और मुहम्मद उनकी संपत्ति हथियाना चाहता था .इसलिए सन 610 में मुहम्मद ने खुद को अल्लाह का रसूल घोषित कर दिया ,ताकि वह यहूदी और ईसाई नबियों के बराबरी करके लोगों को अपना अनुयायी बना सके .लेकिन जब लोगों को मुहम्मद की बे सर पैर की बातों पर विश्वास नहीं हुआ तो ,ने एक चल चली .तब तक मुहम्मद की नुबुवत को 12 साल हो चुके थे .मक्का के लोग मुहम्मद को पागल और जादूगर समझते थे ,इसलिए मुहम्मद ने लोगों का मुंह बंद करने के 27 तारीख रजब (इस्लाम का सातवाँ महीना ) सन 621 ई० को एक बात फैला दी ,कि उसने एक दिन में मक्का से यरूशलेम तक की यात्रा कर डाली है .जिसकी दूरी आज के हिसाब से लगभग 755 मील या 1251 कि.मी होती है .मुहम्मद की इस यात्रा को "मेराज معراج" कहा जाता है .मुहम्मद ने लोगों से कहा कि उसने यरूशलेम स्थित यहूदियों और ईसाइयों के पवित्र मंदिर में नमाज भी पढ़ी ,जिसका नाम यह है .

Temple in Jerusalem or Holy Temple (Hebrew:" בֵּית־הַמִּקְדָּשׁ, Beit HaMikdash ;बैत हमिकदश "
Al-Aqsa Mosque (Arabic:المسجد الاقصى al-Masjid al-Aqsa, मस्जिदुल अक्सा

फिर मुहम्मद ने लोगों का विश्वास जीतने के लिए यरूशलेम की तथाकथित मस्जिद और यात्रा का पूरा विवरण लोगों के सामने प्रस्तुत कर दिया .मुहम्मद के इस झूठ को बेनकाब करने के लिए पहले हम इस यात्रा के बारे में कुरान और हदीस से सबूत देखेंगे फिर इतिहास से प्रमाण लेकर सत्यता की परख करते हैं .और निर्णय पाठक स्वयं करेंगे .
1 -मुहम्मद की यरूशलेम यात्रा 

मुहम्मद की मक्का के काबा से यरूशलेम स्थित अक्सा की मस्जिद तक की यात्रा के बारे में कुरान यह कहता है ,
"महिमावान है वह अल्लाह जो अपने रसूल मुहम्मद को "मस्जिदे हराम (काबाكعبه )से(मस्जिदे अक्सा "(यरूशलेम )की मस्जिद तक ले गया .जिस को वहां के वातावरण को बरकत मिली .ताकि हम यहाँ के लोगों को वहां की निशानियाँ दिखाएँ " सूरा -बनी इस्रायेल 17 :1 
2 -मुहम्मद की सवारी क्या थी 

इतनी लम्बी यात्रा को एक दिन रात पूरा करने के लिए मुहम्मद ने जिस वहां का प्रयोग किया था ,उसका नाम "बुर्राकبُرّاق "था .इसके बारे में हदीस में इस प्रकार लिखा है .
"अनस बिन मलिक ने कहा कि रसूल ने कहा था मुझे बैतुल मुक़द्दस की यात्रा के बुर्राक नाम का जानवर दिया गया था ,जो खच्चर (Mule) से छोटी और गधी से कुछ बड़ी थी .और जब मैं बुर्राक पर बैठा तो वह मस्जिद की सीढियां चढ़ गया ,फिर मैंने "masjidمسجد " के अन्दर दो रकात नमाज पढ़ी .और जब मैं मस्जिद से बाहर जाने लगा तो जिब्राइल ने मेरे सामने दो कटोरे रख दिए ,एक में शराब थी और दुसरे में दूध था ,मैंने दूध ले लिया .फिर जिब्रील मुझे बुर्राक पर बिठाकर मक्का छोड़ गया ,फिर दौनों जन्नत लौट गए "सही मुस्लिम -किताब 1 हदीस 309 

3-लोगों की शंका और संदेह 

लोगों को मुहम्मद की इस असंभव बात पर विश्वास नहीं हुआ ,और वह मुहम्मद को घेर कर सवाल करने लगे ,तब मुहम्मद ने कहा ,
"जबीर बिन अब्दुल्लाह ने कहा ,कि रसूल ने कहा जब कुरैश के लोगों ने मेरी यरूशलेम कि यात्रा के बारे में संदेह जाहिर किया ,तो मैं काबा के पास एक पत्थर पर खड़ा हो गया .और वहां से कुरैश के लोगों को बैतुल मुक़द्दस का आँखों देखा विवरण सुनाने लगा ,जो मैंने वहां देखा था "
बुखारी -जिल्द 4 किताब 6 हदीस 233 
"इब्ने अब्बास ने कहा जब रसूल से कुरैश के लोगों ने सवाल किया तो रसूल उन सारी जगहों का वर्णन सुनाने लगे जो उन्होंने यरूशलेम स्थित बैतुल मुक़द्दस की यात्रा के समय रास्ते में देखी थीं .फिर रसूल ने सबूत के किये कुरान की सूरा इस्रायेल 17 :60 सुनादी .जिसमे अल्लाह ने उस जक्कूम के पेड़ पर लानत की थी ,जो रसूल को यरूशलेम के रास्ते में मिला था "
बुखारी -जिल्द 5 किताब 58 हदीस 228 

इस हदीस में कुरान की जिस आयत को सबूत के तौर पर पेश किया गया है ,वह यह है
"हे मुहम्मद जब लोगों ने तुम्हें घेर रखा हो ,तो तुम सबूके लिए उन दृश्यों को याद करो ,जो हमने तुम्हें बताये हैं ,और जिनको हमने लोगों की आजमाइश के लिए बना दिया था .तुम तो उस पेड़ को याद करो जिस पर कुरान में लानत की गयी है .हम इसी निशानी से लोगों को डराते है"
सूरा -बनी इस्रायेल 17 :60 
 (इस पेड़ को अरबी में "जक्कूम زقّوم" कहा जाता और हिदी मे"थूहर ,या थूबड़ Cactus कहते हैं अंगरेजी Botany  में इसका नाम "Euphrobia abyssinica " है .यह पेड़ अरब , इस्रायेल और अफरीका में सब जगह मिलता है .मुहम्मद ने कुरान में इसी पेड़ को सबूत के रूप में पेश किया है सूरा -17 :60 )
( नोट -इसी को कहते हैं कि"कुएं का गवाह मेंढक" )

4 -मुहम्मद का सामान्यज्ञान 
लगता है कि मुहम्मद में बुद्धि(GK) नाम की कोई चीज नहीं थी ,क्योंकि जब उस से बैतुल मुक़द्दस के बारे में जानकारी पूछी गयी तो वह बोला ,
"अबू जर ने कहा कि मैंने रसूल से पूछा कि पृथ्वी पर सबसे पहले अल्लाह की कौन सी मस्जिद बनी थी ,रसूल ने कहा "मस्जिदे हराम "यानि मक्का का "काबा "फिर हमने पूछा की दूसरी मस्जिद कौन सी है ,तो रसूल ने कहा "मस्जिदुल अक्सा "यानि यरूशलेम की मस्जिद ,फिर हमने पूछा की इन दौनों मस्जिदों के निर्माण के बीच में कितने सालों का अंतर है ,तो रसूल ने कहा इनके बीच में चालीस सालों का अंतर है "
बुखारी - जिल्द 4 किताब 55 हदीस 585 

अब तक मुहम्मद की यरूशलेम की यात्रा (मेराज Night Journey ) के बारे में कुरान और हदीसों से लिए गए सबूतों का हवाला दिया गया है .अब दुसरे भाग में इतिहास के प्रमाणों के आधार पर मुहम्मद और अल्लाह के दावों की कसौटी करते हैं ,कि इस दावे में कितनी सच्चाई और कितना झूठ
 है .जिसको भी शंका हो वह विकी पीडिया या दूसरी साईट से जाँच कर सकता है .पाठक कृपया इस लेख को गौर से पढ़ें फिर निष्पक्ष होकर फैसला करें
5 -बैतुल मुक़द्दस का संक्षिप्त इतिहास 

अबतक दी गयी कुरान की आयतों और हदीसों में मुहम्मद द्वारा यरूशलेम की यात्रा में जिस मस्जिद में नमाज पढ़ने का वर्णन किया गया है ,वह वास्तव में यहूदियों का मंदिर ( Temple ) था .जिसे हिब्रू भाषा में " मिकदिशמקדשׁ "कहा जाता है .इसका अर्थ "परम पवित्र स्थान यानी "Sancto Santorum" कहते हैं .इसका उल्लेख बाइबिल में मिलता है ( बाइबिल मत्ती -24 :1 -2 ) इस मंदिर को इस्लाम से पूर्व दो बार तोडा गया था ,और इस्लाम के बाद तीसरी बार बनाया गया था .इतिहास में इसे पहला ,दूसरा ,और तीसरा मंदिर के नाम से पुकारते हैं .इसका विवरण इस प्रकार है -
1 - पहले मंदिर का निर्माण और विध्वंस 

पहले मंदिर का निर्माण इस्रायेल के राजा दाऊद(David-דוד- ) के पुत्र राजा सुलेमान (Solomon-שלמן ) ने सन 975 ई ० पू में करवाया था .सुलेमान का जन्म सन 1011 ई पू और म्रत्यु सन 931 ई .पू में हुई थी सुलेमान ने अपने राज की चौथी साल में यह भव्य मंदिर बनवाया था ,और इसके निर्माण के लिए सोना ,चन्दन ,और हाथीदांत भारत से मंगवाए थे ( बाइबिल 1 राजा अध्याय 5 से 7 तक I-kings10:22 )
सुलेमान के इस मंदिर को सन 587 BCE में बेबीलोन के राजा "नबूकदनजर (Nebuchadnezzar ) ने ध्वस्त कर दिया था .और यहूदियों को गुलाम बना कर बेबीलोन ले गया था .जाते जाते नबूकदनजर मंदिर के स्थान पर अपने एक देवता की मूर्ति लगवा गया था .और सारा यरूशलेम बर्बाद कर गया था .
(बाइबिल -यिर्मयाह 2 :24 से 20 )
इसके बाद जब सन 538 ई .पू में जब ईरान के सम्राट खुसरू ( cyrus ) ने बेबीलोन को पराजित कर दिया तो उसने यहूदियों को आजाद कर दिया और अपने देश में जाने की अनुमति दे दी थी .लेकिन करीब 419 साल तक यरूशलेम में कोई मंदिर नहीं बन सका .
2 दूसरे मदिर का निर्माण और विध्वंस 
वर्षों के बाद जब सन 19 ई .पू में जब इस्रायेल में हेरोद (Herod ) नामका राजा हुआ तो उसने फिर से मंदिर का निर्माण करवाया ,जो हेरोद के मंदिर के नामसे विख्यात था ,यही मंदिर ईसा मसीह के ज़माने भी मौजूद था .लेकिन जब यहूदियों ने ईसा मसीह को सताया ,तो उन्होंने इस मंदिर के नष्ट होने की भविष्यवाणी कर दी थी ,जो बाइबिल में इस तरह मिलती है, -
."फिर जब यीशु मंदिर से निकलते हुए रास्ते में जा रहे थे तो उनके शिष्यों ने उनको मंदिर की ईमारत की भव्यता दिखाया ,तब यीशु ने कहा कि,मैं तुमसे सच कहता हूँ ,कि एक दिन इस मंदिर के पत्थर पर पत्थर नहीं बचेगा ,और सारा मंदिर ढहाया जायेगा "
बाइबिल नया नियम -मत्ती -24 :1 -2 ,मरकुस -13 :1 -2 ,और लूका -19 :41 से 45 ,और लूका -21 :20 -45 
ईसा मसीह के समय यरूशलेम पर रोमन लोगों का राज्य था ,और यहूदी उसे पसंद नहीं करते थे .इसलिए सन 66 ईसवी में यहूदियों ने विद्रोह कर दिया .और विद्रोह को कुचलने के लिए रोम के सम्राट " (Titus Flavius Caeser Vespasianus Augustus- तीतुस फ्लेविअस ,कैसर ,वेस्पनुअस अगस्तुस ) ने सन 70 में यरूशलेम पर हमला कर दिया .और लाखों लोग को क़त्ल कर दिया .फिर तीतुस ने हेरोद के मंदिर में आग लगवा कर मंदिर की जगह को समतल करावा दिया .और मंदिर कोई भी निशानी बाकि नहीं रहने दी .इस तरह ईसा मसीह की भविष्यवाणी सच हो गयी .


कुरान में भी इस घटना के बारे में उल्लेख मिलता है ,जो इस प्रकार है ,


"फिर हमने तुम्हारे विरुद्ध शत्रुओं को खड़ा कर दिया ,ताकि वह तुम्हारा चेहरा बिगाड़ दें ,और बैतुल मुक़द्दस के अन्दर घुस जाएँ ,जैसे वह पहली बार घुसे थे ,और उनको जोभी चीज हाथ में आई थी उस पर कब्ज़ा किया था .और मस्जिद को तबाह करके रख दिया था
सूरा -बनी इस्रायेल 17 :17 
इस प्रकार इतिहास ,बाइबिल और कुरान से साबित होता है कि सन 70 से मुसलमानों के राज्य तक यरूशलेम में कोई मंदिर या मस्जिद नहीं थे ,बल्कि उस जगह समतल मैदान था .मस्जिद का फिर से निर्माण खलीफाओं ने करवाया था ,जिसका विवरण इस तरह है ,
6 -मंदिर की जगह मस्जिद का निर्माण 

जब सन 638 उमर बिन खत्ताब खलीफा था ,तो उसने यरूशलेम की जियारत की थी .और वहां नमाज पढ़ने के लिए मदिर के मलबे को साफ करवाया था .और उसके सनिकों ने खलीफा के साथ मैदान में नमाज पढ़ी थी .बाद में जब उमैया खानदान में "अमीर अब्दुल मालिक बिन मरवानعبد الملك بن مروان"सन 646 ईस्वी में सुन्नियों का पांचवां खलीफा यरूशलेम आया तो उसने पुराने मंदिर की जगह एक मस्जिद बनवा दी ,जो एक ऊंची सी जगह पर है ,इसी को आज" मस्जिदुल अक्सा " Dom of Rock भी कहा जाता है .क्योंकि इसके ऊपर एक गुम्बद है .अब्दुल मालिक ने इस मस्जिद के निर्माण के किये "बैतुल माल" से पैसा लिया था ,और गुम्बद के ऊपर सोना लगवाने के लिए सोने के सिक्के गलवा दिए थे .आज भी यह मस्जिद इस्रायेल अरब के विवाद का कारण बनी हुई है .और दौनों इस पर अपना दावा कर रहे हैं
7 -खलीफा ने मस्जिद क्यों बनवाई 
अब्दुल मलिक का विचार था कि अगर वह यरूशलेम में उस जगह पर मस्जिद बनवा देगा ,तो वह यहूदियों और ईसाइयों हमेशा दबा कर रख सकेगा .क्योंकि दौनों ही इस जगह को पवित्र मानते है .लेकिन जब कुछ मुसलमानों ने इसे बेकार का खर्चा बता कर आपत्ति प्रकट की ,तो मलिक ने विरोधियों को शांत करने के लिए यह हदीस सुना दी ,
"अनस बिन मलिक ने कहा कि ,रसूल ने कहा ,यदि कोई घर में ही नमाज पढ़ेगा ,तो उसे एक नमाज का पुण्य मिलेगा ,और अगर वह अपने कबीले के लोगों के साथ नमाज पढ़ेगा तो ,उसे 20 नमाजों का पुण्य मिलेगा .और जुमे में जमात के साथ नमाज पढ़ने से 50 नमाजों का पुण्य मिलेगा .लेकिन यदि जोभी व्यक्ति यरूशलेम की "बैतुल मुक़द्दस " में नमाज पढ़ेगा तो उसे 50 हजार नमाजों का पुण्य मिलेगा "
इब्ने माजा-तिरमिजी -हदीस 247 ,और मलिक मुवत्ता-जिल्द 5 हदीस 17 
इस तरह से अब्दुल मलिक यरूशलेम में मुसलमानों की जनसंख्या बढ़वाना चाहता था ,की मुसलमान पुण्य प्राप्ति के लिए यरूशलेम में रहने लगें .
लेकिन सन 1862 मुसलमान यरूशलेम की मस्जिद में नमाज नहीं पढ़ सके थे .क्योंकि उसपर ईसाइयों का कब्ज़ा हो गया था .बाद में तुर्की के खलीफा "अब्दुल हमीदعبد الحميد "( 1878 -1909 )ने इंगलैंड के "प्रिंस ऑफ़ वेल्स Prince of Wels ) जो बाद में King Edward V II बना ,उस से अनुमति लेकर मस्जिद की मरम्मत करवाई और मुसलमानों को एक मेहराब के नीचे नमाज पढ़ने की आज्ञा प्राप्त कर ली थी .जो अभी तक चल रही है .
8-विचारणीय प्रश्न 
अब इन सभी तथ्यों और सबूतों को देखने का बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक हैं ,क़ि जब सन 70 से कर यानि हेरोद के मंदिर के ध्वस्त होने से .सन 691 तक यानी अब्दुल मालिक द्वारा मस्जिद बन जाने तक ,यरूशलेम में कोई मंदिर या मस्जिद का कोई नामोनिशान ही नहीं था ,केवल समतल मैदान था ,तो मुहम्मद ने सन 621 में यरूशलेम की अपनी तथाकथित यात्रा में किस मस्जिद में नमाज पढ़ी थी ?और लोगों को कौन सी मस्जिद का आँखों देखा वर्णन किया था ?क्या कुरान की वह आयतें 691 बाद लिखी गयी हैं ,जिन में मुहम्मद की यरूशलेम की मस्जिद में नमाज पढ़ने का जिक्र है .हम कैसे माने कि कुरान में हेराफेरी नहीं हुई ?क्या कोई अपनी मान्यता के आधार पर ऐतिहासिक सत्य को झुठला सकता है ?
आप लोग कृपया लेख दुबारा पढ़िए और फिर फैसला करिए .और बताइए कि ,यदि हम कुरान और हदीसों की पहले वाली बातों को सत्य मान लें ,तो हमें दूसरी हदीसों और इस्लामी इतिहास को झूठा साबित करना होगा .!
बताइये आप कौनसी बात पर विश्वास करेंगे ?


(200/3)


http://www.abrahamic-faith.com/night-journey.html

शनिवार, 28 मई 2016

अल्लाह ईश्वर नहीं मक्का का देवता है



कुछ   दिन  पहले एक  मुस्लिम  पाठक   ने  मुझ  से कहा  था  कि आप   लोग  तो   कई   देवताओं   की  पूजा   करते हो   ,  जिनका  जन्म भी  होता  है  और  बच्चे  भी  होते हैं   , लेकिन   हम  मुस्लिम  केवल  एक  ही  अल्लाह  की  इबादत   करते  हैं   , जो हमेशा  से मौजूद  है  , न  उसका जन्म  है  और  न  उसने किसी   को   जन्म  दिया   है   ,


लेकिन  उन  पाठक  महोदय   का  कथन  तथ्यों  और  प्रमाणों  के विपरीत   है , क्योंक   वास्तव  में  अल्लाह  मुहम्मद  के  कबीले   का देवता   ही  है   , इसके  सबूत  इस  प्रकार   हैं  

1 -तौरेत  में  अल्लाह  शब्द नहीं  है 
मुसलमानों   की  मान्यता  है  कि  मुहम्मद  अल्लाह  के अंतिम  रसूल और कुरान  अल्लाह  की  अंतिम  किताब   है   ,  इस से पहले अल्लाह  ने  कई  रसूल  भेजे  थे  और  कई  किताबें   नाजिल  की  थीं   ,  उनमे  पहली  किताब   तौरेत     है  ,  जिसे    बाइबिल   का  पुराना  नियम  (Old Testament) कहा  जाता   है   ,  जो  कुरान  से  करीब    तीन  हजार  साल  पहले  का  है  , और यदि   तौरेत    और   कुरान  का  अल्लाह  एक  ही  है  तो तौरेत  में अल्लाह  शब्द  क्यों  नहीं मिलता ?  और   जहां    6  जगह  अल्लाह  शब्द   मिलता   है  ,  उनका  अर्थ    ईश्वर  ( God)    नहीं   है     , जैसे  ,

1.Judges 17:2-"अलाह - אָלָה " अभिशाप  ( Curse 

 2. Hosea 10:4 --"अलाह - אָלָה " झूठा   (false )

3.1 Kings 8:31 

4.2 Chronicles 6:22 

इसी  तरह  तौरेत में  जहाँ  भी अल्लाह या उसी   जैसा  शब्द आया  है  ,वह ईश्वर के लिए नहीं  बल्कि  बुरे अर्थों को प्रकट करने वाला  है  ,

2-तौरेत  में  ईश्वर का असली   नाम 
विश्व   में  जितने  ही  धर्म   है  ,  सभी धर्मों  के लोग  अपनी अपनी  भाषा में ईश्वर को  पुकारते हैं  , लेकिन   तौरेत  एकमात्र ऐसा  ग्रन्थ   है   ,जिसमे ईश्वर   ने अपने  ही  मुंह  से अपना  असली  नाम बता  दिया  है  ,  जिसे अधिकांश  ईसाई और यहूदी  भी  नहीं  जानते  ,
बाइबिल  के अनुसार  जब  मूसा  ने ईश्वर  से उसका नाम  पूछा  तो   '

ईश्वर ने  मूसा से कहा  " मैं  जो  हूँ   सो हूँ "  निर्गमन 3:14 


, אֶהְיֶה אֲשֶׁר אֶהְיֶה

हिब्रू  में  - अहीह  ऐशेर अहीह
यही   बात उपनिषद  में  दी  गयी  है
'सो  अहस्मि "

3-अरब में बहुदेववाद 

मुहम्मद  साहब   की  जवानी  तक   अरब  के लोग  कई  देवताओं   की  पूजा करते   थे  ,  हर  जाती  का अपना अपना देवता   था  ,  हरेक कौम अपने देवता को बड़ा  बताता   था  ,  उस समय  मक्का में  कुछ   यहूदी  और  इसे  भी  थे  ,  अरब के  लोग अक्सर  इनसे  लड़ते रहते थे  , और  जब   मुहमद ने  खुद को  अल्लाह  का  रसूल घोषित  कर  दिया  तो  पूरे अरब  पर राज  करने के लिए  पहले तो वही  नीति  अपनाई  जो आज  के मुस्लिम  अपनाते हैं  , वह  कपट   निति  है

4-मुहम्मदी  सेकुलरिज्म 

जिस  तरह  आज  के मुस्लमान  दिखावे के लिए  सभी  धर्मों  की  समानता  की   बातें करते हैं   , और दिलों में दूसरे  धर्म के प्रति  नफरत  रखते   वाही   काम  मुहम्मद  ने  किया   था ,अरबी  में  देवता  (god) के लिए " इलाह -  إله    " शब्द है  ,कुरान  में " इलाह -   إله  " शब्द     269   बार     आया   है  , और  हर जगह   इसका  अर्थ   " देवता  -god "       ही   है ,मुहम्मद ने  पहले  तो मक्का   के मूर्ति पूजकों  से  कहा


"قَالُوا نَعْبُدُ إِلَـٰهَكَ وَإِلَـٰهَ آبَائِكَ  "2:133

कालू  नअबुदू इलाहक  व् इलाह आबाअक


"कह  दो कि  हम तुम्हारे  देवता  और अपने  बाप  दादाओं  के देवता  की पूजा  करते  हैं  "सूरा  - बकरा  2:133 

  फिर  मक्का  के  यहूदी  , ईसाइयों   से  कहा .

" कह दो हम ईमान  लाये  उस  चीज  पर जो  हम  पर उतारी  गयी  ,और  जो तुम  पर  भी  उतारी  गयी   और  हमारा  इलाह  ( देवता  ) और   तुम्हारा इलाह ( देवता ) एक  ही  है  ,और   हम  उसी  के आज्ञाकारी  हैं "

وَقُولُوا آمَنَّا بِالَّذِي أُنْزِلَ إِلَيْنَا وَأُنْزِلَ إِلَيْكُمْ وَإِلَٰهُنَا وَإِلَٰهُكُمْ وَاحِدٌ وَنَحْنُ لَهُ مُسْلِمُونَ

सूरा  अनकबूत 29:46 

नोट -इस  आयत   में  अरबी में कहा  है" इलाहुना  व् इलाहुक़ुम   वाहिद -  وَإِلَٰهُنَا وَإِلَٰهُكُمْ وَاحِدٌ    " अर्थात  मेरा देवता और तुम्हारा  देवता  एक   हैं  (.my  god andyour  god is one  )

मुहम्मद   ने ऐसी सेकुलर बातें  लोगों  को  अपने  जाल   में  फ़साने  के  लिए कही थी   ,  लेकिन जब लोग  मुहम्मद के  खतरनाक इरादे भांप   गए  तो अपने अपने   धर्म  पर और  मजबूती   से डट   गए ,

5-मुहम्मद  का  जिहादी स्वरूप 

इस  से  रुष्ट  होकर  मुहम्मद  ने  अपना  जिहादी  रूप  प्रकट कर  दिया  और  लोगों से  कहा

  "न  सूर्य  को  सिजदा  करो   और  न चन्द्रमा  को  , सिर्फ  अल्लाह  को  सिजदा  करो "सूरा  हा  मीम सजदा 41:37

Do not bow down (prostrate) to the sun nor to the moon, but only bow down (prostrate) to "Allah"Noble Quran 41:37]


इसके  बाद   से  मुहम्मद  और उनके  जिहादी  साथी  लोगों  को जबरन  मुसलमान बनाने   लगे  ,  और जो  भी व्यक्ति उनके  चंगुल  में   फस जाता   था  उस  से यह  कलमा  जरूर  पढ़वा लेते  थे ,और  यह  काम आज  भी  जारी  है

6-कलमा  का  सही  अर्थ 

कलमा  इस्लामी  आतंकवादियों  का मूल  मन्त्र और आदर्श  वाक्य   है  ,   जो   आई  एस  आई एस  के  काले झंडे  पर  लिखा  है   ,  कलमा  दो  वाक्यों  से मिल  कर  बनाया  गया  है   ,

" ला इलाह  इल्लल्लाह - मुहम्मदर्रसूलुल्लाह "
धूर्त   मुल्ले  इसका  अर्थ  करते हैं " अल्लाह  के सिवा  कोई  उपास्य   नहीं  है    और  मुहम्मद  अल्लाह  के  रसूल   है  

कलमा  के प्रथम   भाग   का  सही  अर्थ  ,  इसमें  अरबी  के कुल पांच   शब्द  हैं   . ला = नहीं  , इलाह = देवता ,  इल्ला = सिवाय  , अल्लाह = अल्लाह
अर्थात - अल्लाह  के अलावा  कोई  देवता  नहीं है   ,  इसका  तात्पर्य  है  की   सिर्फ  अल्लाह  ही  देवता  है  ,  या  इसे  इस  प्रकार  भी कह  सकते  हैं  क़ि  दवताओं  में  सिर्फ  अल्लाह  ही   देवता  है   ,   बाकी  देवता  बेकार  हैं    ,  कलमा  से यह कहीं  सिद्ध  नहीं  होता  कि  अल्लाह ईश्वर  है   ,
अल्लाह  पहले  तो  अरब  लुटेरों  का  देवता  बना  रहा , और  अब  जिहादी  आतंकियों का  देवता  बन  गया है  ,  इस  कल्पित  चरित्र   की  रचना मुहम्मद  ने  की  थी   ,  इस   कल्पित  चरित्र  के  कारन रोज़  हजारों  असली  निर्दोष  लोग  मारे   जा  रहे   हैं   ,
इस  से   सिद्ध   होता  है  की मुहम्मद  ने  अपने कबीले  के  देवता " इलाह " नाम  में  अल  जोड़  कर  बड़ी  मक्कारी  से अल्लाह   नामके कल्पित ईश्वर लोगों   को  डराया   और जबरन   मुस्लमान  बनाया  ,  अगर मुहम्मद का  अल्लाह सचमुच  में सबका  ईश्वर  ( God )  होता   , तो   कुरान  में लिखा   होता  
"अल्लाहुना   व् अल्लाहुकुम वाहिद    " हमारा  ईश्वर  और  तुम्हारा  ईश्वर   एक  ही  है  ( my God and your God is one ) 


वास्तव   में अल्लाह   जैसी  कोई शक्ति या  वास्तु   नहीं   है   और  न  कभी  थी  

 (328)

मंगलवार, 3 मई 2016

रसूल की मस्जिद में पेशाब !

इस लेख का शीर्षक देख कर सामान्य लोग अवश्य चौंक जायेगे . और जो लोग इस्लाम के बारें में थोड़ी भी जानकारी रखते होंगे वह इस बात पर विश्वास नहीं करेंगे . क्योंकि आज भी यदि कोई व्यक्ति किसी भी मस्जिद में पेशाब करेगा , तो मुसलमान हंगामा जरुर कर देंगे . फिर रसूल के सामने ही उनकी बनाई गयी मस्जिद में किसी के द्वारा पेशाब करने का सवाल ही नहीं उठता .लेकिन जो लोग ऐसा सवाल उठा रहे हैं उन लोगों को पता होना चाहिए कि जब आज भी मुसलमान इस्लाम को फैलाने के लिए आतंकवाद जैसे हथकंडे अपना सकते हैं ,तो रसूल इस्लाम फैलाने के लिए अपनी ही मस्जिद में किसी के द्वारा पेशाब करने पर चुप रहे ,तो इस्लाम के शरीयती कानून पर सवाल जरुर उठ सकता है .क्योंकि इस लेख में दिए गए सभी तथ्य प्रामाणिक और सत्य हैं .
लेकिन इस विषय को और स्पष्ट करने से पहले हमें इस्लामी शरियत के पाक ( पवित्र ) और नापाक ( अपवित्र ) सम्बन्धी बेतुके और परस्पर विरोधी नियमों को समझने की आवश्यकता है .फिर रसूल की मस्जिद और उसमे पेशाब करने की बात का कारण बताया जायेगा ,
1-काफ़िर और मुशरिक बड़े नापाक 
इस्लाम की बुनियाद नफ़रत और भेदभाव पर रखी गयी है .जो लोग कहते हैं कि इस्लाम मनुष्यों में समानता की शिक्षा देता है , वह इस आयत को ध्यान से पढ़ें ,
"हे ईमान वालो , मुशरिक तो नापाक हैं ,तो इस साल के बाद वह काबा के पास न फटकने पायें " सूरा -तौबा 9:28
(इस आयत की तफसीर में कहा है , सभी गैर मुस्लिम , मुशरिक , नास्तिक ,बहुदेववादी ,विचारों और शारीरिक रूप से नापाक होते हैं .अर्थात अशुद्ध होते हैं )
वैसे तो इस्लाम की नजर में सभी गैर मुस्लिम नापाक हैं
2-शरियत के मुताबिक पाक और नापाक 
अधिकांश मुस्लिम दशों में शरियत का कानून लागू है , जो कुरान और हदीसों पर आधारित है . शरियत में काफिरों और मुशरिकों के आलावा इन चीजों को अपवित्र ( नापाक ) बताया गया है .
इस्लामी शरियत के अनुसार पवित्र वस्तुओं को पाक अरबी " ताहिरा -: طهارة‎, " मेंकहा जाता है सभी वस्तुओं और प्राणियों में कुछ ऐसी चीजें भी हैं जिन्हें अपवित्र ,नापाक और अरबी में "नजस -نجس " कहा जाता है .शरियत ने नापाक चीजों के नाम इस प्रकार दिए हैं
1. urine;मूत्र - بول    ,2. stool;मल-   براز   -3. semen;वीर्य -  المني   -4. blood;खून-  دم   -5. corpses-मृतदेह - الجثث   -6. dogs;कुत्ते - الكلاب -7. pigs;सुअर -الخنازير   -8. kafir;काफिर -  الكفار  -
इस सूची के अनुसार अपवित्र वस्तुओं में मूत्र का नाम सबसे पहले है . अर्थात मूत्र यानि पेशाब सबसे नापाक चीज है .और नापाक चीजों में वीर्य का नंबर तीसरा है लेकिन शरियत के इस नियम में सब से बड़ा दुर्गुण यह है ,कि जहाँ एक जगह किसी चीज को नापाक बताया गया है वहीं दूसरी जगह पर उसी चीज को पवित्र मान लिया गया है .इसके प्रमाण देखिये ,
.3-वीर्य नापाक है 
इस हदीस में वीर्य (semen ) को नजिस यानी नापाक बताया गया है ,
"अल्कामा और अस्वद ने कहा कि सवेरे के समय एक व्यक्ति आयशा के घर के सामने से गुजर रहा था .उसने देखा कि आयशा रसूल के कपड़ों से वीर्य के धब्बे धो रही थी .जब उस व्यक्ति ने आयशा से कारण पूछा तो ,आयशा ने बताया कि वीर्य नापाक ( नजिस ) होता है . और यदि उसके धब्बे धोने के लिए पानी नहीं हो ,तो नाखूनों से खुरच कर दाग मिटा देना चाहिए " 
"وَحَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ يَحْيَى، أَخْبَرَنَا خَالِدُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، عَنْ خَالِدٍ، عَنْ أَبِي مَعْشَرٍ، عَنْ إِبْرَاهِيمَ، عَنْ عَلْقَمَةَ، وَالأَسْوَدِ، أَنَّ رَجُلاً، نَزَلَ بِعَائِشَةَ فَأَصْبَحَ يَغْسِلُ ثَوْبَهُ فَقَالَتْ عَائِشَةُ إِنَّمَا كَانَ يُجْزِئُكَ إِنْ رَأَيْتَهُ أَنْ تَغْسِلَ مَكَانَهُ فَإِنْ لَمْ تَرَ نَضَحْتَ حَوْلَهُ وَلَقَدْ رَأَيْتُنِي أَفْرُكُهُ مِنْ ثَوْبِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَرْكًا فَيُصَلِّي فِيهِ ‏
सही मुस्लिम किताब 2 हदीस 566
4-योनि का रस पवित्र है 
Vaginal Fluid is pure!
सुन्नी मुस्लिम और शाफ़ई विद्वान् "इमाम इब्ने हंजर अल हैतमी अल मक्की- ابن حجر الهيتمي المكي - " जिनका जन्म हिजरी 909 यानी सन 1503 ईसवी में हुआ था .इन्होने अपनी प्रसिद्ध किताब "तुहफ़तुल मुहताज बिशरहे मिन्हाज -تـحـفـة الـمـحـتـاج بـشـرح الـمـنـهـاج   " की जिल्द 1 में पेज 300 और 301 पर सम्भोग के बाद औरत की योनि से टपकने वाले स्राव (Vaginal Fluid ) के बारे में जो फतवा दिया है , वह इस प्रकार है .
सम्भोग के बाद औरत की योनि से रिसने , या टपकने वाले रस को अरबी में ".रतूबतुल फुर्ज  -رطوبة الفرج " कहा जाता है .
इमाम कहते हैं ,जब पुरुष के अंग औरत की योनि में पहुँच जाये और औरत की योनि से जो स्राव निकलता है , वह शुद्ध होता है .और योनि से  किसी और कारण से निकलने वाला रस शुद्ध होता है .

"it is pure. When it comes from where the male part reaches during intercourse"
"هو محض. عندما يتعلق الأمر من حيث يصل الجزء ذكر أثناء الجماع، هو محض. عندما يأتي من وراء حيث يصل الجزء ذكر أثناء الجماع، فإنه نجس.  "

"यदि महिला को योनि से निकलने वाले स्राव के बारे में शंका हो कि वह कहाँ से टपक रहा है , तो योनि से निकलने वाला स्राव शुद्ध माना जायेगा ."

 If she doubts regarding where it came from, then it is assumed to be pure.

"إذا كانت الشكوك حول من أين جاء، ثم يفترض أن تكون نقية."
Tuhfat al-Muhtaj v. 1, p. 300-01

5-पेशाब नापाक है 
"इब्न अल हाकम ने कहा कि पेशाब करते समय यदि रसूल के शरीर के किसी हिस्से पर पेशाब के छींटे पड़ जाते थे ,तो रसूल फ़ौरन उस अंग को पानी से धो देते थे .क्योंकि पेशाब नजिस यानी नापाक होती है .
حَدَّثَنَا نَصْرُ بْنُ الْمُهَاجِرِ، حَدَّثَنَا مُعَاوِيَةُ بْنُ عَمْرٍو، حَدَّثَنَا زَائِدَةُ، عَنْ مَنْصُورٍ، عَنْ مُجَاهِدٍ، عَنِ الْحَكَمِ، أَوِ ابْنِ الْحَكَمِ عَنْ أَبِيهِ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بَالَ ثُمَّ تَوَضَّأَ وَنَضَحَ فَرْجَهُ ‏.‏
सुन्नन अबी दाऊद - किताब 1 हदीस 168
6-रसूल की मस्जिद 
जब अरब  के बद्दू भी मुसलमान बनने लगे , और ऐसे नए मुसलमानों की संख्या बढ़ गयी , तो मुहम्मद साहब ने सन622 अपने इन्हीं साथियों के साथ मिल कर अपने घर के पास ही एक मस्जिद बनवा दी . जो चारों तरफ से खुली हुई थी . और उस पर खजूर के पत्तों की छत थी .यही दुनिया की पहली मस्जिद थी .आज उसी स्थान पर जो पक्की मस्जिद बनी हुई है , उसे " मस्जिदे नबवी - اَلْمَسْجِد اَلنَّبَوِي‎" कहा जाता है .इस्लाम में मक्का के काबा के बाद मदीना की इसी मस्जिद को आदर दिया जाता है . और पवित्र माना जाता है .लेख में इसी मस्जिद के बारे में चर्चा की जा रही है ,मुहमद साहब ने इस्लाम को फैलाने के इरादे से इसी मस्जिद में अपने लोगों को पेशाब करने दिया था . जो इन हदीसों में दिया गया है 
7-मस्जिद में पेशाब 
मुहम्मद साहब ने अपनी बनवाई गयी मस्जिद में लोगों को पेशाब करने दिया , और कोई विरोध नहीं किया , यह इन हदीसों में स्पष्ट लिखा है .
हदीस-1.
"अनस बिन मलिक ने कहा कि रसूल ने देखा कि उनके कुछ बद्दू साथी उनकी मस्जिद में खड़े होकर पेशाब कर रहे हैं ,तो रसूल ने लोगों से कहा तुम उनको नहीं रोको . जब तक वह अपना काम पूरा न कर लें . फिर रसूल ने उस जगह पर पानी के कुछ छींटें डाल दिए . और कहा अब यह जगह शुद्ध हो गयी "

حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، قَالَ حَدَّثَنَا هَمَّامٌ، أَخْبَرَنَا إِسْحَاقُ، عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم رَأَى أَعْرَابِيًّا يَبُولُ فِي الْمَسْجِدِ فَقَالَ ‏ "‏ دَعُوهُ ‏"‏‏.‏ حَتَّى إِذَا فَرَغَ دَعَا بِمَاءٍ فَصَبَّهُ عَلَيْهِ‏.‏ "
 सही बुखारी -जिल्द 1 किताब 4 हदीस 218 
हदीस-2
"अबू हुरैरा ने कहा कि जब कुछ बद्दुओं ने इस्लाम स्वीकार कर लिया , और रसूल ने अपनी मस्जिद भी बनवा ली . तो कुछ बद्दू आकर रसूल की मस्जिद में खड़े होकर पेशाब करने लगे. जब लोगों ने यह बात रसूल को बतायी तो उन्होंने लोगों से कहा , इनको ऐसा करने से नहीं रोको .और जब यह बद्दू पेशाब कर चुकें ,तो इनको जाने दो .हो सकता है कि यह बाद में और लोगों को अपने साथ बुलाएं , और इस से इस्लाम के प्रचार में आसानी हो जाए "

حَدَّثَنَا أَبُو الْيَمَانِ، قَالَ أَخْبَرَنَا شُعَيْبٌ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، قَالَ أَخْبَرَنِي عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُتْبَةَ بْنِ مَسْعُودٍ، أَنَّ أَبَا هُرَيْرَةَ، قَالَ قَامَ أَعْرَابِيٌّ فَبَالَ فِي الْمَسْجِدِ فَتَنَاوَلَهُ النَّاسُ، فَقَالَ لَهُمُ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ دَعُوهُ وَهَرِيقُوا عَلَى بَوْلِهِ سَجْلاً مِنْ مَاءٍ، أَوْ ذَنُوبًا مِنْ مَاءٍ، فَإِنَّمَا بُعِثْتُمْ مُيَسِّرِينَ، وَلَمْ تُبْعَثُوا مُعَسِّرِينَ ‏"‏‏.‏
 सही बुखारी -जिल्द 1 किताब 4 हदीस 219
आज मुसलमान इस्लाम को फ़ैलाने के लिए जितने भी अनैतिक काम कर रहे हैं , वह सभी मुहम्मद साहब से प्रेरित होकर और उनका अनुसरण कर के ही कर रहे हैं . लेकिन इस बात में किसी को भी शंका नहीं होना चाहिए कि शरियत के कानून दोगले होते हैं . और उनके मानने वालों पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए .
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शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

कश्मीर स्वर्ग से नर्क कैसे बना ?

कश्मीर को   भारत  का स्वर्ग   कहा जाता है . लेकिन इसको  नर्क  बनाने  में  नेहरू  की  मुस्लिम परस्ती   जिम्मेदार है . जो आज  तक चली  आ रही है . चूँकि देश  का विभाजन धर्म  के आधार  पर हुआ था .और जिन्ना जैसे  कट्टर नेताओं का तर्क था कि  मुस्लिम  बहुल  कश्मीर  के बिना  पाकिस्तान  अपूर्ण  है . इसलिए पाकिस्तान  प्रेरित उग्रवादी  और पाक सेना मिल   कर कश्मीर  में ऐसी  हालत  पैदा  करना चाहते हैं ,जिस से  कश्मीर के हिन्दू  भाग   कर किसी  अन्य  प्रान्त में  चले  जाएँ .कांगरेस  की अलगाववादी  नीति  के  कारण  हालत इतनी गंभीर हो गयी कि   हिन्दू श्रीनगर के  लाल चौक   में खुले आम  तिरंगा  भी नहीं  फहरा  सकते हैं .जबकि हिन्दू  हजारों  साल से कश्मीर में  रहते  आये हैं ,और  महाभारत  के समय  से ही कश्मीर पर हिन्दू  राजा राज्य  करते  आये हैं .  इसके लिए हमें  इतिहास के पन्नों  में   झांकना होगा  ,कि  कश्मीर  को विशेष  दर्जा  देने का  क्या औचित्य  है ,?
1-कश्मीर का प्राचीन  इतिहास 
कश्मीर  के प्राचीन इतिहास    का   प्रमाणिक  इतिहास   महाकवि  " कल्हण "  ने  सन  1148 -49  में  अपनी  प्रसिद्ध  पुस्तक " राजतरंगिणी "  में  लिखा  था . इस पुस्तक में   8 तरंग   यानि  अध्याय   और संस्कृत  में कुल    7826  श्लोक  हैं . इस   पुस्तक के  अनुसार  कश्मीर  का  नाम  " कश्यपमेरु  "   था  .  जो  ब्रह्मा  के  पुत्र  ऋषि  मरीचि  के पुत्र  थे .चूँकि  उस समय में  कश्मीर  में  दुर्गम  और ऊंचे पर्वत थे ,  इसलिए ऋषि कश्यप ने लोगों   को आने जाने के लिए   रास्ते  बनाये थे .  इसीलिए  भारत के इस   भाग  का नाम " कश्यपमेरू " रख  दिया गया  , जो बिगड़  कर  कश्मीर    हो गया  .राजतरंगिणी  के  प्रथम  तरंग में  बताया गया है  कि सबसे पहले  कश्मीर  विधिवत     पांडवों   के  सबसे  छोटे  भाई  सहदेव   ने राज्य    की  स्थापना  की थी , और  उस समय   कश्मीर में   केवल  वैदिक   धर्म   ही  प्रचलित  था .फिर  सन  273  ईसा  पूर्व   कश्मीर में  बौद्ध  धर्म   का  आगमन  हुआ  . फिर भी कश्मीर में  सहदेव  के वंशज  पीढ़ी  दर पीढ़ी   कश्मीर  पर 23  पीढ़ी  तक  राज्य  करते  रहे ,यद्यपि  पांचवीं सदी में " मिहिरकुल "   नामके  " हूण " ने  कश्मीर  पर  कब्ज़ा  कर लिया  था . लेकिन  उसने शैव  धर्म  अपना  लिया  था .
2-कश्मीर  में इस्लाम 
इस्लाम  के  नापाक  कदम  कश्मीर में सन 1015  में   उस समय  पड़े  जब  महमूद  गजनवी ने  कश्मीर  पर हमला  किया था  .लेकिन  उसका उद्देश्य  कश्मीर में इस्लाम   का प्रचार करना नहीं   लूटना था , और लूट मार कर वह वापिस गजनी  चला गया . उसके बाद ही कश्मीर पर दुलोचा  मंगोल  ने  भी हमला  किया . लेकिन  उसे तत्कालीन  कश्मीर के राजा  सहदेव   के मंत्री ने  पराजित करके  भगा  दिया . और सन  1320  में  कश्मीर में  "रनचिन " नामका  तिब्बती  शरणार्थी सेनिक  राज के पास   नौकरी के लिए  आया  . उसकी वीरता  को देख कर राजा ने  उसे सेनापति  बना  दिया . रनचिन  ने  राज से  अनुरोध  किया कि  मैं  हिन्दू  धर्म  अपनाना  चाहता  हूँ .लेकिन  पंडितों  ने  उसके अनुरोध का  विरोध  किया  और कहा कि दूसरी जाती का होने के कारण  तुम्हें  हिन्दू  नहीं  बनाया   जा सकता  .कुछ  समय के  बाद  राजा  सहदेव   का  देहांत  हो  गया  और उसकी पत्नी " कोटा  रानी  "  राज्य  चलाने लगी   और  उसने  " रामचन्द्र " को अपना  मंत्री  बना   दिया .   उस समय  कश्मीर में कुछ  मुसलमान   मुल्ले सूफी बन कर कश्मीर में   घुस  चुके  थे . ऐसा एक  सूफी  " बुलबुल  शाह  " था .उसने  रनचिन   से कहा  यदि  हिन्दू पंडित तुम्हें  हिन्दू नहीं   बनाते  तो  तुम  इस्लाम  कबुल   कर लो .इसा तरह  बुलबुल शाह ने  रनचिन  कलमाँ   पढ़ा कर  मुसलमान   बना दिया . जिस जगह  रनचिन  मुसलमान  बना था उसे  बुलबुल  शाह का  लंगर  कहा  जाता है  .जो  श्रीनगर के पांचवें  पुल के पास है . रन चिन   ने  अपना  नाम   " सदरुद्दीन  "   रखवा   लिया  था .बुलबुल शाह   की संगत  में  रनचिन  हिन्दुओं   का घोर शत्रु  बन गया . और 6 अक्टूबर  1320  को   रन चिन   ने धोखे से  मंत्री   रामचन्द्र   की  हत्या  कर दी .मंत्री   को  मरने के बाद   रनचिन   अपना  नाम " सुलतान  सदरुद्दीन  ' रख  लिया .फिर   अफगानिस्तान  से   मुसलमानों को   कश्मीर में  बुला कर बसाने लगा . और  करीब  सत्तर  हजार  मुसलमान की  सेना  बना ली  .  और कुछ  समय बाद  सन  1339 में  कोटा रानी   को  को कैद  कर लिया और  उस से  बलपूर्वक  शादी   कर  ली .सदरुद्दीन   के सैनिक  प्रति दिन  सैकड़ों  हिन्दुओं   का  क़त्ल  करते थे .इसलिए कुछ लोग  यातो  दर के कारण  मुसलमान  बन गए या भाग कर   जम्मू  चले   गए  . और  कश्मीर  घाटी  हिन्दुओं  से खाली  हो  गयी .

लेकिन   वर्त्तमान  कांगरेस   की  सरकार    जम्मू को भी  हिन्दू विहीन   बनाने में   लगी  हुई है .  काश  उस समय  महर्षि  दयानंद होते   जो  रनचिन  को  मुसलमान   नहीं    होने देते  .
 इसलिए    हिन्दुओं   को चाहिए कि सभी   हिन्दुओं   को अपना  भाई  समझे  , और जो भी  हिन्दू धर्म  स्वीकार करना चाहे उसे   हिन्दू बना कर अपने  समाज में शामिल  कर लें  .  और  हिन्दू विरोधी  कांगरेस का  हर प्रकार   से विरोध   करें  .

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मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

अल्लाह की गवाही - धरती भी माता होती है

हजारों  साल  से  भारत   के  हिन्दू  भारत भूमि  को  अपनी  माता  मान  कर  ,  उस पर सम्मान प्रकट  करने के  लिए " भारत माता  की जय "  का  नारा  लगाते  आए  हैं   ,  लेकिन  मुसलमानों  की  आदत है  ,कि वह  किसी  न  किसी  कुतर्क   का  सहारा  लेकर  हिन्दुओं  की  मान्यताओं  और  आस्थाओं   का  विरोध  जरूर   करते  है  ,  सब  जानते  हैं  कि  कुछ  ही  समय  पहले  जे एन  यू  के  मुस्लिम  लडके  के   इशारे से   हिन्दू लड़कों   ने भी   देश  विरोधी   नारे  लगाए  थे  ,  और  उनका  परोक्ष  समर्थन  राहुल  गन्दी  ने  कर  दिया  ,  इस  से पूरे  देश में  भारत  विरोधी  माहौल  पैदा  होने लगा  ,  इसलिए   सर  संघ  चालक  श्री  मोहन  भागवत  ने कहा  था कि  भारत  के सभी    लोगों  के  लिए  " भारत  माता  की  जय " बोलना  अनिवार्य  कर  दिया जाना  चाहिए  ,लेकिन  जिस  दिन  भागवत  जी  ने  यह  बात   कही  ,उसके  कुछ   समय बाद ही   , दिनांक  1  अप्रेल   2016  को   दारुल उलूम   देवबंद    के  मुल्लों   के    एक  फतवा   जारी  कर  दिया  जिसमे  मुसलामानों    को  निर्देश  दिया  गया  है   ,कि  वह  न तो " वन्दे  मातरम  "गायें  और  न  " भारत  माता  की जय ' बोलें  ,.और मुल्लों ने यह तर्क देकर फतवा जारी करते हुए दारुल उलूम ने कहा- 'इंसान ही इंसान को जन्म दे सकता है। धरती मां कैसे हो सकती है? 

दुर्भाग्य  से  भारत   में  आर्यसमाज   , विश्व  हिन्दू  परिषद   , हिन्दू  महा  सभा   जैसे   संगठन  मौजूद  हैं   , जिनमे हजारों     विद्वान्  हैं  ,  लेकिन  किसी   ने  भी   मुल्लों   के  इस कुतर्क  का  मुंह तोड़  जवाब   नहीं  दिया  ,   यहाँ  तक  महेंद्र  पाल आर्य   जैसे    पूर्व   इमाम   ने भी   मुल्लों    का खंडन  नहीं    कर  सके   , उलटे  कई  हिन्दू नेताओं   ने  यहाँ  तक कह दिया  कि हम  लोगों  पर  भारत  माता  की  जय  बोलने दवाब   नहीं   डालेंगे  ,  ऐसा कहने के पीछे  इन  धर्म  के ठेकेदारों  की घोर  अज्ञानता   है  ,  जैसे  मुल्लों  ने मुसलमानों  को  कट्टर  और लकीर  का  फ़क़ीर  बना दिया  ,  इन  हिन्दू  नेताओं  ने हिन्दुओं की  तर्क बुद्धि  पर  ताला   मार  दिया  , हिन्दुओं  के  दिमागों   में यह  बात  ठूंस ठूंस  कर  भर दी  गयी कि हिन्दू  धर्म  सर्वश्रेष्ठ सबसे  बड़ा   है  ,  इस गलत  फहमी   से  हिन्दू    न  तो  अन्य  धर्म की  जानकारी  प्राप्त  करते  है  और  न    उनका  तुलनात्मक   अध्यन   ही करते  हैं  , मुल्लों  को  जवाब देने की  बात  तो   दूर  है, और  जब  मुल्लों   के  फतवा   का जवाब देने के लिए  कोई आगे  नहीं  निकला  तो  , हमने  मुल्लों    को    जवाब देने  का  निश्चय   किया  ,  क्योंकि  कल  रात  को  9 बजे  अमेरिका के  सेंट  लुइस  निवासी  मेरी  बहिन रेणु  शर्मा  से मैंने वादा   कर दिया था .अतः  हम  अपना  वादा पूरा करने के लिए फ़तवा  के झूठ  का  भंडा  फोड़  रहे   हैं ,  
 1-मुल्लों   का  कुतर्क 

 मुल्लों    ने  फतवा में   यह  कुतर्क  दिया "इंसान ही इंसान को जन्म दे सकता है। धरती मां कैसे हो सकती है? 

देखिये उर्दू   फतवा की फोटो 
http://images.jansatta.com/2016/04/bharat-mata-ki-jai-620x400.jpg?w=850

इस फ़तवा को  पढ़  कर   हम  दावा  करते   हैं   कि  या  देवबद  में  मुल्लों   को  कुरान का  इल्म   नहीं   , या  वह   जानबूझ   कर  लोगों   को  गुमराह   कर   रहे   हैं   , और   कुरान   उस आयत  को  झूठा  साबित  करने की   हिमाकत  कर  रहे  हैं  जिसमे अल्लाह  ने  एक  शहर   ( जमीन )   को  शहरों  की   माता  कहा  है   ,    और  जब खुद अल्लाह  पूरी  जमीन   के  एक  हिस्से  एक   शहर   को शहरों  की   माता ( Mother of Cities )   कहता  है   , तो  हमें स्वीकार   करना  होगा  कि  निर्जीव  जमीन   के  बच्चे  भी  हो सकते है   , 

2-शहरों  की माता  मक्का  है 
मुसलमान   जिस मक्का  शहर को  परम  पवित्र   मानते  हैं   ,  उस  शहर  " मक्का -   مكة‎  "   नाम  पुरी  कुरान   में नहीं  मिलता  ,  बल्कि  इसकी  जगह  "बक्कह -   بكة‎    " शब्द  मिलता  है  , जो कुरान की  सूरा  -आले  इमरान   3 :96     में   है   ,  अरबी   व्याकरण  के  अनुसार  बक्कह - بكة‎ "  शब्द    स्त्रीलिंग ( feminine Gender )    अर्थात   बक्कह   वर्त्तमान  मक्का     एक   स्त्री   है   ,इसीलिये  स्त्री  होने के  कारण  अल्लाह ने बक़्का ( मक्का )  को शहरों  की  माता    कह   दिया  , "  Umm al-Qurā (أم القرى, "Mother of All Cities  " यह  अति  महत्त्व  पूर्ण  बात  अल्लाह  ने  सिर्फ  एक  बार  कुरान    की सूरा  -आले इमरान  6:92  में  दी   है   ,  पूरी  आयत   अरबी में  , हिंदी  लिपि   में  और  हिंदी  अंगरेजी   अर्थ   दिए  जा  रहे   हैं  

1. मूल  अरबी  आयत 

 وَهَـٰذَا كِتَابٌ أَنزَلْنَاهُ مُبَارَكٌ مُّصَدِّقُ الَّذِي بَيْنَ يَدَيْهِ وَلِتُنذِرَ أُمَّ الْقُرَىٰ وَمَنْ حَوْلَهَا ۚ وَالَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِالْآخِرَةِ يُؤْمِنُونَ بِهِ ۖ وَهُمْ عَلَىٰ صَلَاتِهِمْ يُحَافِظُونَ  

2 -हिंदी लिप्यांतरण 

"व् हाजा   किताबुं  अंजलनाहु ,मुबारकुन  मुसद्दिकु  अल्लजी  बैन यदीहि  व् लि तुंजिर  उम्मुल कुरा  व्  मन  हौलहा  वल्लजीना  यूमिनून बिल  अखिरती यूमिनूंन  बिही व् हुम् अला  सलातिहिम युहाफिजून  "

3-हिंदी  अनुवाद 

"यह किताब  जिसे हमने उतारा   है  ,बरकत वाली  है  , और उसकी  पुष्टि  करने  वाली  हैं  ,जो  इस से पहले उतारी  गयी   , ताकि  तुम  नगरों  की  माता  (मक्का ) और आसपास वालों को सचेत  करो  ,और जो लोग आखिरत  पर ईमान  लाते  हैं  वे  अपनी  नमाज  की  रक्षा  करते  हैं  "

4-Eng  Translation


"this  book We have revealed it,blessed,confirming which (came) before its hands,so that you may warn (the) mother(of) the cities
   and who(are) around it.And those who   believe  in the Hereafter,they believe  in it,and they, over  their prayers  (are) guarding.  "

,
नॉट  - इस आयत  में  अरबी  के कुल 22  शब्द  हैं  ,10  वां  शब्द  " उम्म -  أُمَّ "  है  , इसका अर्थ  माता(Mother)है  , और  11 वां शब्द  " कुरा -  الْقُرَىٰ   "  है जो  बहुवचन   (Plural )     इसका अर्थ  नगरों  ( Cities )   , और " उम्मुल  कुरा -أم القرى "का अर्थ नगरों  की  माता  है  ,  \

(سورة الأنعام, Al-An'aam, Chapter #6, Verse #92


दारूल उलूम देवबंद ने 'भारत माता की जय' के खिलाफ फतवा देते हुए कहा कि इंसान ही इंसान को जन्म दे सकता है, तो धरती मां कैसे हो सकती है।अब  देवबंद  के  मुल्ले बताएं   कि जब  तुम्हारा  अल्ल्लाह  बेजान  भूमि   यानि   मक्का  को  शेरोन  की  माता  कह  रहा  है  ,  यानि मक्का  को  ऐसी माता   मान  रहा  है  कई  शहर  रूपी   बच्चे  हों   ,  क्योंकि  बिना   बच्चे की   स्त्री  को  माता   नहीं   कहा   जा  सकता  ,  
  और  जब  एक शहर  मक्का  कई  शहरों  की  माता   हो  सकती    है  ,  तो  कई  प्रांतो   , सैकड़ों    शहरों  पैदा करने  वाली   भारत  माता   ,   सबकी  माता  क्यों    नहीं       मानी   जा  सकती   ? 

मेरी  सभी  मुल्ले मौलवियों   ,  मुफ्तियों    ,  और   मुसलमानों  को  खुली  चुनौती   है  ,कि  वह  कुरान की  इस  आयत   को  गलत  साबित  कर के  दिखाए   ,   फिर   कहें की जमीन   कभी  माता  नहीं     हो  सकती  ,

मेरा उन  सभी    हिन्दू   नेताओं    और हिन्दू  संगठनों   के प्रमुखों    से  अनुरोध  है  , जो  खुद को  भारत  माता  के भक्त होने  का  दावा   करते   हैं   , इस  लेख   को  अखबारों  और  टी  वालों   को  भेज   दें  ,    ताकि   देवबंदियों  का फतवा  फट  जाये  ,

भारत  माता  की   जय  , भारत  माता  की   जय  , भारत  माता  की   जय  , 

حيّا اُمٌُ الهِند

(317)

बुधवार, 2 मार्च 2016

बलात्कार :जिहाद का हथियार

जिहाद दुनिया का सबसे घृणित कार्य और सबसे निंदनीय विचार है .लेकिन इस्लाम में इसे परम पुण्य का काम बताया गया है .जिहाद इस्लाम का अनिवार्य अंग है .मुहम्मद जिहाद से दुनिया को इस्लाम के झंडे के नीचे लाना चाहता था .मुहलामानों ने जिहाद के नाम पर देश के देश बर्बाद कर दिए .हमेशा जिहादियों के निशाने पर औरतें ही रही हैं .क्योंकि औरतें अल्लाह नी नजर में भोग की वस्तु हैं .और बलात्कार जिहाद का प्रमुख हथियार है .मुसलमानों ने औरतों से बलात्कार करके ही अपनी संख्या बढाई थी .मुहम्मद भी बलात्कारी था .मुसलमान यही परम्परा आज भी निभा रहे है .यह रसूल की सुन्नत है ,कुरान के अनुसार मुसलमानों को वही काम करना चाहिए जो मुहम्मद ने किये थे .कुरान में लिख है-

"जो रसूल की रीति चली आ रही है और तुम उस रीति(सुन्नत )में कोई परवर्तन नहीं पाओगे "सूरा -अल फतह 48 :23 

"यह अल्लाह की रीति है यह तुम्हारे गुजर जाने के बाद भी चलती रहेगी .तुम इसमे कोई बदलाव नहीं पाओगे .सूरा -अहजाब 33 :62 
"तुम यह नहीं पाओगे कि कभी अल्लाह की रीति को बदल दिया हो ,या टाल दिया गया हो .सूरा -फातिर 33 :62 

यही कारण है कि मुसलमान अपनी दुष्टता नही छोड़ना चाहते .जिसे लोग पाप और अपराध मानते हैं ,मुसलमान उसे रसूल की सुन्नत औ अपना धर्म मानते है .और उनको हर तरह के कुकर्म करने पर शर्म की जगह गर्व होता है .बलात्कार भी एक ऐसा काम है .जो जिहादी करते है -

1 -बलात्कार जिहादी का अधिकार है 

"उकावा ने कहा की रसूल ने कहा कि जिहाद में पकड़ी गई औरतों से बलात्कार करना जिहादिओं का अधिकार है .

बुखारी -जिल्द 1 किताब 5 हदीस 282 

"रसूल ने कहा कि अगर मुसलमान किसी गैर मुस्लिम औरत के साथ बलात्कार करते हैं ,तो इसमे उनका कोई गुनाह नहीं है .यह तो अल्लाह ने उनको अधिकार दिया है ,औ बलात्कार के समय औरत को मार मी सकते हैं"

बुखारी -जिल्द 7 किताब 62 हदीस 132 

बुखारी -जिल्द 1 किताब 52 हदीस 220 


2 -जिहाद में बलात्कार जरूरी है 

सईदुल खुदरी ने कहा कि ,रसूल ने कहा कि सामूहिक बलात्कार करने से लोगों में इस्लाम की धाक बैठ जाती है .इसलिए जिहाद में बलात्कार करना बहुत जरूरी है .बुखारी जिल्द 6 किताब 60 हदीस 139 

3 -बलात्कार से इस्लाम मजबूत होता है 

"इब्ने औंन ने कहा कि,रसूल ने कहा कि किसी मुसलमान को परेशां करना गुनाह है ,और गैर मुस्लिमों को क़त्ल करना और उनकी औरतों के साथ बलात्कार करना इस्लाम को आगे बढ़ाना है.बुखारी -जिल्द 8 किताब 73 हदीस 70 

"रसूल ने कहा कि मैंने दहशत और बलात्कार से लोगों को डराया ,और इस्लाम को मजबूत किया .बुखारी -जिल्द 4 किताब 85 हदीस 220 

"रसूल ने कहा कि ,अगर काफ़िर इस्लाम कबूल नहीं करते ,तो उनको क़त्ल करो ,लूटो ,और उनकी औरतों से बलात्कार करो .और इस तरह इस्लाम को आगे बढ़ाओ और इस्लाम को मजबूत करो.बुखारी -जिल्द 4 किताब 54 हदीस 464 

4 -माल के बदले बलात्कार 

"रसूल ने कहा कि जो भी माले गनीमत मिले ,उस पर तुम्हारा अधिकार होगा .चाहे वह खाने का सामान हो या कुछ और .अगर कुछ नहीं मिले तो दुश्मनों कीऔरतों से बलात्कार करो ,औए दुश्मन को परास्त करो .बुखारी -जिल्द 7 किताब 65 हदीस 286 .

(नोट -इसी हदीस के अनुसार बंगलादेश के युद्ध में पाकिस्तानी सेना ने बलात्कार किया था ) 

5 -बलात्कार का आदेश ' 

"सैदुल खुदरी ने कहा कि रसूल ने अपने लोगों (जिहादियों )से कहा ,जाओ मुशरिकों पर हमला करो .और उनकी जितनी औरतें मिलें पकड़ लो ,और उनसे बलात्कार करो .इस से मुशरिकों के हौसले पस्त हो जायेंगे .बुखारी -जिल्द 3 किताब 34 हदीस 432 

6 -माँ बेटी से एक साथ बलात्कार 

"आयशा ने कहा कि .रसूल अपने लोगों के साथ मिलकर पकड़ी गई औरतों से सामूहिक बलात्कार करते थे .और उन औरतीं के साथ क्रूरता का व्यवहार करते थे .बुहारी -जिल्द 7 किताब 62 हदीस 67 

"सैदुल खुदरी ने कहा कि रसूल ने 61 औरतों से बलात्कार किया था .जिसमे सभी शामिल थे .औरतों में कई ऎसी थीं जो माँ और बेटी थीं हमने माँ के सामने बेटी से औए बेटी के सामने माँ से बलात्कार किया .मुस्लिम -किताब 8 हदीस 3371 और बुखारी -जिल्द 4 किताब 52 हदीस 288 

7 -बलात्कार में जल्दी नहीं करो 

"अ ने कहा कि रसूल ने कहा कि ,पकड़ी गयी औरतो से बलात्कार में जल्दी नहीं करो .और बलात्कार ने जितना लगे पूरा समय लगाओ "

बुखारी -जिल्द 2 किताब 23 हदीस 446 .

अब जो लोग मुसलमानों और मुहम्मद को चरित्रवान और सज्जन बताने का दवा करते हैं ,वे एक बार फिर से विचार करे, इस्लाम में अच्छाई खोजना मल-मूत्र में सुगंध खोजने कि तरह है .आप एक बार मुस्लिम ब्लोगरो द्वारा इस्लाम और मुहम्मद के बारे में लिखी हुई झूठी बातों को पढ़िए फिर दिए तथ्यों पर विचार करके फैसला कीजिये
अधिक जानकारी के लिए यह अंगेजी ब्लॉग देखें

http://nakedmuhammad.blogspot.com/

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