गुरुवार, 18 जुलाई 2019

भगवान बुद्ध भी अल्लाह के रसूल थे !!

मुसलमान मानते  हैं   कि अल्लाह   हरेक     समुदाय  और   क्षेत्र  में  अपने  रसूल     और नबी  भेजता  रहता   है   ,जो  लोगों  को उन्हीं   की भाषा में धर्म  का ज्ञान   देता  था .
  जिसे  कि कुरान में   कहा  गया   है 
"हमने  हर उम्मत में   कोई न   कोई रसूल भेजा "
وَلَقَدْ بَعَثْنَا فِي كُلِّ أُمَّةٍ رَسُولًا  "
 indeed, within every community have We raised up an apostle
 सूरा -नहल  16:36 
कुरान में केवल  25 नबियों    के नाम  दिए  गए  हैं  ,

1-रसूलों या नबियों  की  संख्या  
मुसलमान  आदम  को पहला और मुहम्मद को  अल्लाह  का अंतिम    रसूल  या नबी मानते  हैं   ,इस काल खंड में अनेकों   नबी पैदा  हुए  जिन में से  लगभग   025 नबियों   के नाम  कुरान  में मिलते   हैं   ,  लेकिन कुल नबियों  की सही  संख्या  इमाम  अहमद  में अपनी  किताब "मुसनद  अहमद   "  में   इस हदीस  में    दी   है   ,  हदीस  इस प्रकार   है  ,
अबू   जार    ने रसूल  से पूछा   " या  रसूल कितने  रसूल   हो  चुके   हैं  " रसूल ने बताया  ऐक सौ चौबीस   हजार   (124000   )   और  उनमे   15 रसूलों   के   झुण्ड   थे  "

 Abu Dharr (ra) had with the Prophet (saws).
I said "O Messenger of Allah, how many Prophets were there?" He replied "One hundred twenty four thousand, from which three hundred fifteen were jamma ghafeera."


"قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ كَمْ وَفَّى عِدَّةُ الْأَنْبِيَاءِ قَالَ مِائَةُ أَلْفٍ وَأَرْبَعَةٌ وَعِشْرُونَ أَلْفًا الرُّسُلُ مِنْ ذَلِكَ ثَلَاثُ مِائَةٍ وَخَمْسَةَ عَشَرَ جَمًّا غَفِيرًا‏.‏   "
 21257No: مسند أحمد 

इस से साफ  पता  चलता है कि मुसलमान  सभी  नबियों  के बारे  में न  तो  जानते  और न   जान   सकते हैं   लेकिन कुछ   नबियों  के  नाम    कुरान   में    स्पष्ट     हैं  और कुछके  बारे में केवल    संकेत   के रूप में उल्लेख      है  , 
यदि   हम  कहें   की  भगवान  बुद्ध   भी  अल्लाह  के   नबी यानि   रसूल  थे  तो  मुसलमान      तुरंत विरोध   करने   लगेंगे   ,   और  कहेंगे   बुध    का  नाम    कुरान   और  हदीस  में नहीं    है  ,  लेकिन   सच  बात  तो  यह  है कि कुरान  में  दो  जगह    बुध  का  नाम  संकेतों   में  दिया  गया  है   ,  इसका  मुख्य   कारन     अरबी  भाषा  की   अक्षमता    है  ,   भगवन    बुद्ध   का  जन्म     लगभग    486 ईसा   पूर्व   कपिलवास्तु  नामक नगर  में  हुआ   था  ,  बचपन  में  उनका  नाम  सिद्धार्थ    था  ,  और  ज्ञान   प्राप्त   करने  के  बाद   उनको    बुद्ध      कहा   जाने  लगा   ,  उनको   बोधिसत्व   भी   कहा   जाता    है ,धीमे धीमे    बुद्ध   की ख्याति     तिब्बत  से होकर   अफगानिस्तान  ,   और रेशम  मार्ग   ( the Silk Road     )  पर  आने  वाले   सभी   देशों  में  फ़ैल   गयी     यहाँ  तक   अरब   के व्यापारी   भी     भगवान  बुद्ध  के   बारे   जानने   लगे  थे  ,   चूँकि  अरबी  में  बोधिसत्व       या  कपिल  वास्तु    कहना  उनके लिए  मुश्लिल     था   इसलिए  वह  बुद्ध  को   "जुल कफिल -  ذُو ٱلْكِفْل"कहने  लगे   इसका  अर्थ   है   " कपिल    वस्तु    वाला   "   किसी   दूसरी  भाषा   के कठिन  शब्दों  को  अपनी   भाषा  में आसान  बना  लेना  भाषा  विज्ञानं   का  नियम    है   ,  जैसे   अंगरेजों  ने "मुख्योपाध्याय    का   मुखर्जी  , वंदो पाध्याय  का  बनर्जी  और  चट्टो पध्याय का  चटर्जी इत्यादि ,यही  नहीं    यहूदियों   और  अरबों   में  लोगों   को उनके  शहरों  के  नाम  से भी    जाना   जाता   था    जैसे  " येशु   नासरी   " यानि  नाजरथ   का  वासी   या   ख्वाजा  अजमेरी  ,   हफीज   जालंधरी     इत्यादि 
  2 -कुरान   में  बुध   का उल्लेख 
पूरी  कुरान   में सिर्फ  दो  बार  भगवान   बुध   को   " जुल कफिल -ذُو ٱلْكِفْل "  नाम    से   उल्लेखित   किया गया   है   " चूँकि अरबी में    "  प   "   के लिए   कोई    अक्षर     नहीं  इसलिए   " कपिल " के  लिए  " कफिल लिखा   और बोला    जाता    है , इसके  लिए कुरान   से  दो साबुत   दिए जा  रहे  हैं 

1-पहला  सबूत 


"और इस्माइल और इदरीस और   जुलकफिल   पर  भी  हमारी कृपा  रही , यह सब   सब्र करने वाले  थे , और इन्हें हमने  अपनी दयालुता में दाखिल किया  बेशक यह  लोग भले  लोगों  में  थे  " सूरा  अम्बिया   21:85 


"وَإِسْمَاعِيلَ وَإِدْرِيسَ وَذَا الْكِفْلِ كُلٌّ مِنَ الصَّابِرِينَ  "


And (remember) Isma'il, Idris, and Zul-kifl, all (men) of constancy and patience.
We admitted them to Our mercy: for they were of the righteous ones.

sura  alAmbiya 21:85-


2-दूसरा  सबूत 


"और इस्माइल और  अलीसा और ज़ुलकफिल    को  याद करो  यह सब नेक लोगों  में  हैं  " सूरा  साद 38:48


"وَاذْكُرْ إِسْمَاعِيلَ وَالْيَسَعَ وَذَا الْكِفْلِ وَكُلٌّ مِنَ الْأَخْيَارِ  "

And commemorate Isma'il, Elisha and Zul-Kifl: Each of them was of the Company of the Good.

 Qur'an, sura sad  38 :48

3-कुरान  में बुद्ध   की  शिक्षा  का  प्रभाव  
चूँकि  भगवान   बुद्ध   ने वेदों  का  अध्यन  किया  था  ,इसलिए  उनकी  शिक्षा  के मूल   सिद्धांत   सार्वभौमिक  . और     सर्वग्राही थे  , जिसका परिणाम  यह हुआ कि  बुद्ध   के  निर्वाण के बाद    उनकी  शिक्षा  अफगानिस्तान  से होकर  इराक और    तुर्की तक पहुंच गयी  ,  और जब इस्लाम   पैदा  हुआ तो  कुरान  में भी बुद्ध  की   शिक्षा  का  स्पष्ट   प्रमाण  मिलता   है 

भगवान  बुद्ध    की   शिक्षा  में  " पञ्च शील    "   सबसे  महत्त्व पूर्ण   है      , यह पांच  प्रतिज्ञाएं   है    जिनका   पालन  हरेक   बौद्ध  के लिए  अनिवार्य    है    ,  और  इन्ही    को कुरान में   शामिल   कर   लिया   गया   है  ,इसके  लिए   पहले मूल पाली , हिंदी  अर्थ  और    कुरान की अरबी आयात के  हिंदी  अंगरेजी  अनुवाद    दे  रहे हैं 

 पञ्च शील    

1-पाणाति पाता वेरमणि सिक्खा पदम् समादियामि 

अर्थ  - मैं  किसी भी प्राणी  को नहीं  मरने की प्रतिज्ञा  करता हूँ 
किसी  भी  प्राणी  की  जान  मत  लो  ,अल्लाह ने  जान   को पवित्र  बनाया  है "

" وَلَا تَقْتُلُوا النَّفْسَ الَّتِي حَرَّمَ اللَّهُ إِلَّا بِالْحَقِّ ذَٰلِكُمْ وَصَّاكُمْ بِهِ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ  "

सूरा -अनआम 6:151 

and do not take any  being's life , which God has declared to be sacred  "
 
नोट- कुरान  की इस आयत  में हरेक जीवधारी  के  लिए अरबी  में " अल नफ्स - النَّفْسَ " शब्द  का प्रयोग  किया  है , जिसका अर्थ " प्राण (life)"   होता  है .

2--आदिन्न  दाना  वेरमणि सिक्खापदम्  समादियामी    

अर्थ  -  मैं  किसी के दिए बिना उसकी वास्तु  नहीं लेने की प्रतिज्ञा  करता  हूँ 
"وَلَا تَأْكُلُوا أَمْوَالَكُمْ بَيْنَكُمْ بِالْبَاطِلِ "
अवैध  रूप से किसी  का  मॉल नहीं   हड़पो
and  DEVOUR NOT one another's possessions wrongfully, सूरा   बकरा 2:188

3-कामेसु मिक्खाचारा वेरमणि सिक्खा पदम् समादियामि 

मैं  मिथ्याचार  ( व्यभिचार  ) से दूर रहने की प्रतिज्ञा   करता  हूँ 

"وَلَا تَقْرَبُوا الزِّنَا إِنَّهُ كَانَ فَاحِشَةً وَسَاءَ سَبِيلًا  "
And do not commit adultery – for, behold, it is an abomination and an evil way. (17:32
व्यभिचार   और अश्लील कर्मों   से  दूर  रहो "  सूरा -बनी इस्राइल 17:32

4-मुसावादा  वेरमणि सिक्खापदम्  समादियामी 

अर्थ  - मैं  झूठ नहीं  बोलने की प्रतिज्ञा  करता हूँ
"और  झूठी  बातों  से बचो   "सूरा -हज्ज -22:30 

"وَاجْتَنِبُوا قَوْلَ الزُّورِ  "
nd shun every word that is untrue,

5-सूरा मज्झा मेर्या पमादट्ठानं वेरमणि सिक्खापदम समादियामि 

अर्थ  - मैं शराब  और  प्रमादिक  खेल जुआ  से   दूर रहने की प्रतिज्ञा करता हूँ

"وَالْأَزْلَامُ رِجْسٌ مِنْ عَمَلِ الشَّيْطَانِ فَاجْتَنِبُوهُ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ"
 have attained to faith! Intoxicants, and games of chance" सूरा -मायदा 5:90

इन  प्रमाणों   से सिद्ध होता है कि भगवान्   बुध  भी   एक रसूल   यानी धर्म  का सही  ज्ञान  देने वाले    थे  ,  और उनकी  शिक्षा   को कुरान में    शामिल  कर  लिया  गया  , इसलिए मुसलमानों  को चाहिए कि वह  कुरान में दी  गयी  भगवन  बुद्ध की शिक्षा   का  पालन  करें 

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सोमवार, 15 जुलाई 2019

पुनर्जन्म की इस्लामी व्याख्या !

विश्व के सभी धर्मों के मानने वाले इस निर्विवाद सत्य को स्वीकार करते हैं , कि कोई भी व्यक्ति अमर नहीं हो सकता .और उसे एक न एक दिन मौत जरुर आयेगी .लेकिन उसकी आत्मा, रूह , Soul कभी नहीं मरती है .और मनुष्य अपने जीवनकाल में जो भी भले बुरे कर्म करता है .उसका फल अगर उस व्यक्ति को इसी जन्म में नहीं मिलता है , तो मौत के बाद उसकी आत्मा को अगले जन्म में भुगतना पड़ता है .भारतीय धर्मों में इस नियम को "पुनर्जन्म " का सिद्धांत कहा जाता है .यद्यपि कुरान , हदीस और मसनवी में पुनर्जन्म के बारे में उल्लेख मिलता है .लेकिन मुस्लिम विद्वान् इसे घुमा फिरा कर ,और कुतर्क पूर्ण व्याख्याएं करके स्वीकार करते हैं . क्योंकि सभी जानते हैं ,कि मुसलमानों की नीति हिन्दुओं से उलटे चलने की होती है . यदि हिन्दू दिन कहेगा तो ,मुसलमान रात कहेंगे .
यद्यपि आत्मा की अमरता ,और उसके दोबारा जन्म होने को एक वैज्ञानिक सत्य मान लिया गया है .फिर भी मुसलमान पुनर्जन्म को क्यों नहीं मानते ,इसका कारण ,या किस रूप में मानते हैं ,इसलिए आत्मा के दोबारा शरीर धारण करने ( पुनर्जन्म ) के बारे में इस्लामी मान्यताओं का परमानों के सहित विवेचन किया जा रहा है .ताकि लोगों को पता चले की मुसलमानों की मान्यताओं ,और कुरान ,हदीस और मसनवी की बातों में कितना अंतर है .
1-मुसलमानों का ज्ञान अधूरा है 
इतिहास गवाह है कि मुसलमान (अरबी )जन्मजात लुटेरे , अत्याचारी , और स्वभाव से अपराधी रहे हैं ,उन्हें जिहाद छोड़ कर आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए समय ही नहीं मिलता है .इसीलिए अल्लाह ने उनको आत्मा के बारे में थोडा ही ज्ञान ( एक वाक्य ) दिया है
"कह दो कि रूह तो अल्लाह का हुक्म है ,और बस तुम्हें इसका थोडा सा ज्ञान ही दिया गया है "
सूरा -बनी इस्राएल 17 :85 
2-मृत्यु और कर्मफल अटल हैं
कुरान की इस बात से सभी सहमत होंगे कि हरेक व्यक्ति को एक दिन मरना ही पड़ेगा , लेकिन दूसरी गौर करने वाली बात यह है कि मनुष्य द्वारा किये गए ,छोटे छोटे भले बुरे सभी कर्मों की परीक्षा कि जाएगी .और उसका बदला दिया जायेगा .अर्थात अधिक होने पर , भले कर्मों से बुरे , या बुरे कर्मों से भले कर्म न तो घटाए जायेंगे ,और न कम किये जायेंगे .
"तुम जहाँ भी रहोगे मृत्यु तुम्हें आकर ही रहेगी , चाहे तुम किसी मजबूत बुर्ज के भीतर रहो
"सूरा -निसा 4 :78 
"हरेक जीव को म्रत्यु का स्वाद चखना ,होगा .और उसके कामों का पूरा बदला दिया जायेगा "
सूरा-आले इमरान 3 :185
"हरेक जीव को मौत का स्वाद चखना है ,और हम अच्छी बुरी सभी हालत में सबकी परीक्षा करते हैं "
सूरा-अल अम्बिया 21 :35 
"और जो कोई जर्रे के बराबर भी भलाई करेगा ,वह उसे देख लेगा .और जो जरे बराबर भी बुराई करेगा वह उसे भी देख लेगा "
सूरा -जिल्जाल 99 :7 और 8 
3-पुनर्जन्म के विविध नाम 
इस बात को सभी धर्म के लोग स्वीकार करते हैं कि मनुष्य द्वारा किसे गए सभी भले बुरे कर्मों का फल उसे जरुर दिया जायेगा .और अधिक होने पर भले कर्मों से बुरे , या बुरे कर्मों से भले कर्म न तो घटाए जायेंगे और न कम किये जायेंगे .लेकिन यदि इसी जन्म में कर्मों का फल नहीं दिया जा सका तो , मृत्यु के बाद उस व्यक्ति की आत्मा को उसका बदला दिया जायेगा .चूंकि आत्मा का कोई शरीर नहीं होता है , इसलिए उसे कर्मों का बदला देने के लिए दोबारा शरीर दिया जायेगा .भारत में इसी को पुनर्जन्म कहा जाता है .अरबी भाषा में पुनर्जन्म के लिए कोई एक उपयुक्त शब्द नहीं है .इसलिए कुरान में जगह जगह , विभिन्न शब्द ,प्रयुक्त किये गए हैं .लेकिन सभी शब्दों का वही अर्थ और आशय पुनर्जन्म ही है .इनमे से कुछ शब्द यहाँ दिए जा रहे हैं .
 1-इहया -إحياءइसका अर्थ पुनर्जन्म ही होता है .अरबी शब्दकोश में इसका अर्थ "विलादातुल जदीद-ولادة جديدة "यानि फिर से जन्म लेना या फिर से पैदा होना होता है .कुरान में यह शब्द पांच बार आया है .(2:154, 7:169, 16:21, 35:22 ,77:26 )अंगरेजी में इसका अर्थ Reborn या Rebirth होता है .
2-युईदहु -يُعيدُهُ  यह शब्द कुरान में 1573बार आया है , इसका अर्थ लौटाना( return ) करना या वापिस करना है .कुरान में जिसी भी प्रसंग में आत्मा को शरीर में लौटाने जमीन पर वापिस भेजने की बात कही गयी है .इसी शब्द का प्रयोग किया गया है .हिन्दी में इसे पुनर्जीवन कह सकते हैं ..यह शब्द अरबी के " ऊदाह -عودة " शब्द से बना है
3-युब्दियु -يُبدئُ "यह शब्द कुरान में 388 बार आया है .इसका अर्थ पुनः प्रारम्भ (Reoriginate ) है कुरान के जिस प्रसंग में आत्मा को किसी शरीर में दोबारा भेजने की बात कही गयी है ,इस शब्द का इस्तेमाल हुआ है
4-बईद-يعيد. "यह शब्द कुरान में 233 बार आया है .इसका भी अर्थ वापिस लौटाना (Back ) करना है जब भी आत्मा के किसी शरीर में वापिस लौटाने का प्रसंग आया है ,यही शब्द प्रयोग किया गया है .
इसके अलावा जहाँ भी कुरान में अल्लाह के द्वारा सृष्टि बनाकर मनुष्यों के शरीरों में आत्मा डालने की बात कही हैं , इन्हीं में से किसी शब्द का प्रयोग हुआ है .चाहे मृतक शरीर में आत्मा डालना हो , या नया शरीर बना कर उसे सजीव करने की बात हो ,इसी को पुनरुत्थान , पुनर्जीवन , या पुनर्जन्म कह सकते हैं
4-कुरान में पुनर्जन्म के प्रमाण 
कुरान में आत्मा के फिर से जन्म लेने और प्रथ्वी पर लौट आने के लिए कई शब्द प्रयोग किये गए हैं ,जैसे कि-
A-पुनरागमन ( नुईद )
"इसी धरती पर हमने तुम्हें पैदा किया है ,और इसी पर हम तुम्हें लौटायेंगे .और इसी पर दोबारा निकालेंगे "
सूरा -ताहा 20 :55 
(इस आयत में अरबी शब्द" नुईदنُعي-د "प्रयुक्त किया गया है जिसका मतलब Bring forth है )
"अल्लाह ने तुम्हें इस धरती पर विशेष रूप से विकसित किया है ,और तुम्हें इसी भूमि पर लौटा देगा ,और विशेष रूप से निकलेगा "
सूरा -नूह 71 :17 और 18
(नोट -इस आयत में अरबी शब्द 'नुईद نُعيد" मौजूद है ,लेकिन हिंदी अनुवाद में पुनरागमन की जगह "निकलेगा "शब्द दिया है )
B-दोबारा पैदा होना 
"और वे बोले हे हमारे रब , तू हमें दोबार मौत दे चूका है ,और तूने मुझे दोबार पैदा कर कर दिया है .हमने अपने गुनाह कबूल कर लिए हैं .अब इस ( जन्म मृत्यु )से निकालने का कोई रास्ता है "सूरा अल मोमिन 40 :11
" قَالُوا رَبَّنَا أَمَتَّنَا اثْنَتَيْنِ وَأَحْيَيْتَنَا اثْنَتَيْنِ "40:11
लोगों के इस सवाल का जवाब कुरान की इस आयत में यह मिलता है "
"ऐसी चीज के लिए तो कर्म करने वालों को कर्म करते रहना चाहिए "सूरा -अस साफ्फात 37 :61
C-पुनर्जीवित होना 
"क्या तुमने नहीं देखा कि जो लोग मौत के डर से घरों से निकल गए थे , अल्लाह ने उनसे कहा ,जाओ मर जाओ .फिर बाद में अल्लाह ने उन्हें फिर से जीवित कर दिया "सूरा -बकरा 2 :243
( नोट -इस आयत में अरबी में "अहया हुम ثُم احياهُم" शब्द आया है .इसका अर्थ "brought them back to life " या "पुनर्जीवित "करना है )
D-पुनरागमन 
"इन मे से जब किसी कि मौत आजायेगी तो वह कहेगा ,,रब मुझे संसार में लौटा दो "ताकि मैं जिस संसार को छोड़ आया हूँ उसमे अच्छे काम करूँ .यह तो एक सचाई है कि उनके पीछे बरजख ( पर्दा ) है .उनके फिर से जीवित करके उठाये जाने वाले दिन तक .
सूरा अल मोमिनून 23 :99 -100 
(नोट -इन आयत में अरबी में लौटने के लिए "अर्जिऊन ارجعون" send back और "युब्सिऊन يُبثعون" raised या उठाना शब्द है . इसका तात्पर्य पुनर्जन्म नहीं है .परन्तु बताया है कि निर्धारित समय यानि बरजख का पर्दा हट जाने के बाद पुनर्जीवन मिल सकता है .)भारतीय मान्यता के अनुसार जब किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है , तो एक निश्चित समय के बाद आत्मा का पुनर्जन्म हो जाता है .इस समय को "संचित काल " कहते हैं .और कुरान में इसी को "बरजख " कहा गया है .एक चर्चा के दौरान जकारिया नायक ने यह बात मानी है .देखें .विडियो
Staying in Heaven or Hell Forever : Dr Zakir Naik
http://www.youtube.com/watch?v=L5HNJKrZbZs
E-जीवन की पुनरावृत्ति 
"जब तुम निर्जीव थे तो उसने तुम्हें जीवित किया . फिर वाही तुम्हें मारता है.फिर वही तुम्हें फिर से जीवित करता है और फिर उसी की तरफ लौटाए जाओगे "
सूरा -बकरा 2 :28
"अल्लाह का वादा सच्चा है ,वही पहली बार पैदा करता और वही दोबारा पैदा करेगा "
सूरा-यूनुस 10 :4 
(नोट -इस आयत में भी " सुम्म उयीदहू ثُمّ يُعيدهُ"शब्द है .जिसका अर्थ दुबारा जन्म देना है give  rebirth )
"क्या इन लोगों ने नहीं देखा कि अल्लाह पहली बार जन्म कैसे देता है ,और फिर उसकी पुनरावृत्ति कैसे करता है .निश्चय ही ऐसी पुनरावृत्ति अल्लाह के लिए आसान है "सूरा -अनकबूत 29 :19 
(नोट -इस आयत में भी " सुम्म उयीदहूثُمّ يُعيدهُ "शब्द है .जिसका अर्थ दुबारा जन्म देना है )
"निश्चय ही वह अल्लाह उसकी जान लौटने की शक्ति रखता है "सूरा -अत तारिक 86 :8 
(lo He verily is able to  return  hin  into  life again )
"जिस तरह उसने पहली बार पैदा किया था ,उसी तरह तुम फिर से पैदा होगे "
सूरा -अल आराफ 7 :29 
(नोट -यहाँ अरबी शब्द "तूऊ दूनتعودون  " आया है जिसका अर्थ भी Reborn या पुनर्जन्म होता है )
5-मानवेतर योनियों में जन्म 
भारतीय धर्मों में माना जाता है कि बुरे और पाप कर्मों के फल भोगने के लिए आत्मा को मनुष्य के आलावा दूसरी ऎसी योनियों में भी जन्म मिल सकता है .जिसका रूप और आकार सबसे अलग और अजीब हो .या शरीर में कोई खोट हो .जैसा कि इन आयतों में कहा है ,
"हमने तुम्हारे बीच में मृत्यु का नियम बना दिया है ,और  हमारे  लिए यह असंभव नहीं ,कि हम तुम्हारे शरीर आकार बदल दें .और ऐसे रूप में उठाकर खड़ा कर दें ,जिसे तुम जानते भी नहीं हो "
सूरा -अल वाकिया :56 :60 और 61 
"हमीं ने इनको पैदा किया ,और इनके जोड़ बंद ( अवयव )मजबूत किये .और हम जब चाहें यह जैसे हैं ,उसे बिलकुल बदल दें
"सूरा - अद दहर 76 :28 
6-जन्म मृत्यु का चक्र 
आत्मा को सभी धर्मों ने अमर माना गया है ,और आत्मा को अपने कर्मों का फल भोगने के लिए बार बार जन्म लेना पड़ता है ,यही कुरान का आशय भी है .जैसा इस आयात से स्पष्ट होता है ,
"जिस तरह उसने पहली बार पैदा किया था ,उसी तरह तुम फिर से पैदा होगे "
सूरा -अल आराफ 7 :29 
(नोट -यहाँ अरबी शब्द "तूऊ दूनتعودون  " आया है जिसका अर्थ भी Reborn या पुनर्जन्म होता है )
7-रसूल पुनर्जन्म मानते थे 
जिस तरह भगवान कृष्ण ने अर्जुन को आत्मा की अमरता ,और युद्ध में शहीद हो जाने पर नया जन्म मिल जाने का विश्वास दिलाया था ,उसी तरह रसूल ने भी कहा था कि यदि में शहीद हो गया तो अल्लाह मुझे भी फिर से जन्म देगा ,और जीतनी बार भी मैं मरूँगा ,हर बार पैदा हो जाऊंगा .यही बात इस हदीस से सिद्ध होती है ,
"अनस बिन मालिक ने कहा कि रसूल ने कहा ,कि कोई व्यक्ति मरने बाद इस दुनियां में तब तक वापिस नहीं आ सकता है ,जब तक वह अल्लाह की राह में मरने वाले शहीदों में वरिष्ठता प्राप्त नहीं करता " बुखारी -जिल्द 4 किताब 52 हदीस 53 
" रसूल ने कहा कि इमांन वालों का मेरा साथ छोड़ना ठीक नहीं होगा ,क्योंकि मैं अपनी सेना के साथ अल्लाह कि राह में शहीद होना चाहता हूँ .और अगर में शहीद हो गया तो अल्लाह मुझे दोबारा जीवन दे देगा . और अगर फिर शहीद हो गया तो अल्लाह मुझे फिर जीवन प्रदान कर देगा ."बुखारी -जिल्द 4 किताब 52 हदीस 54
8-ईसाइयों का भूतवाद
मुहम्मद साहिब के समय लोगो पर ईसाई धर्म का प्रभाव था ,ईसाई भूत प्रेतों कर विश्वास करते थे.और मानते थे एक व्यक्ति में हजारों दुष्ट आत्माएं घुस कर रह सकती है , जैसा की बाइबिल में लिखा है
"जब कोई अशुद्ध आत्मा किसी के शरीर से निकलती है ,तो वह चक्कर लगाती रहती है .और अपने साथ सात दुष्ट आत्माओं को लेकर किसी के शरीर में निवास करने लगतीहै
" बाइबिल नया नियम -मत्ती 12 :42 से 45 
"जब यीशु गरेसिया प्रान्त गए तो ,वहां एक ऐसा व्यक्ति मिला जो दुष्ट आत्माओं के वश में था .यीशु के पूछने पर उसने अपना नाम सेना (Legion ) बताया(रोमन सेना में 6000 सैनिकों की एक लीजन legion होती थी ).उसने यीशु से कहा पहाड़ी पर सूअर चर रहे हैं ,आप हमें इनमे भेज दो .ताकि हम इनके शरीर में घुस जाएँ .उसमे करीब दो हजार आत्माएं उस व्यक्ति के शरीर में थीं " बाईबिल नया नियम -मरकुस 5 : 1 से 14 
वास्तव में इस्लाम ने इन्हीं विचारों का विरोध किया है,किसी जीवित व्यक्ति की आत्मा द्वारा उस व्यक्ति के शरीर से बाहर निकल कर पवास करना या किसी दुसरे जीवित व्यक्ति के शरीर में निवास करने को "आत्मा स्थानान्तरण Transmigration of souls  " कहा जाता है . और ऐसा मानना इस्लाम में कुफ्र है .क्योंकि यह एक प्रकार का अवतारवाद है , जिसका खुद वेदों में खंडन किया गया है .
"इब्न हज्म (Arabic: أبو محمد علي بن احمد بن سعيد بن حزم‎)ने अपनी किताब "अल मोहल्ला में कहा कि जो भी व्यक्ति दावा करता है कि आत्मा एक शरीर से दुसरे में स्थान परिवर्तन करती ,तो वह इमान वाला नहीं है "
 "وقال اياد: "من كان يؤمن القاضي في التهجير من النفوس هو كافر"

Qadi 'Iyad said: 'Whoever believes in the transmigration of the souls is a disbeliever"

al-Muhalla al-Dirdeer al-Maliki

9-पुनर्जन्म के समर्थक मौलाना रूम 
मौलाना जलालुद्दीन रूमी ( सन 1207 -1273 ) बल्ख नाम के शहर में पैदा हुए थे .और एक महान सूफी संत और इस्लामी विद्वान् थे , इन्होने जो किताब लिखी है ,उसका नाम " मसनवी मौलाना रूम ' कहा जाता .मसनवी को फारसी का कुरान भी कहा जाता है , इसके बारे में लोग कहते हैं "ईं कुराने पाक हस्त दर जुबाने फारसी "रूमी भारतीय अध्यात्म से काफी प्रभावित थे .और आत्मा की अनित्यता और उसके बार बार जन्म होने पर विश्वास रखते थे .यह मसनवी के इन शरों से सिद्ध होता है ,

"تو از آں روز کہ در ہست آمدی 
   तू अजां रोजे कि दर हस्त आमदी 
آتش  آب  و خاک و  بادِ بدی
आतिश आब ओ ख़ाक ओ बादे बदी
ایں  بقاہا  از فناہا  دیدءی
ईं बकाहा अज फनाहा दीदई 
بر فناءِجسم چون چستیدءی
बर फनाये जिस्म चुन चस्पीदई 
ہم چون سبزه بارہا روءیدان
हम चूँ सब्जहा बारहा    रोईदअम 
ہفت صد ہفتاد قالب دیدام
हफ्त सद हफ्ताद कालिब दीदअम 
"आज जो तेरा अस्तित्व है ,वह अग्नि , जल, पृथ्वी और वायु से निर्मित है .तुझे यह शरीर किसी शरीर के मिटने के बाद ही मिला है . इसलिए इस शरीर के नष्ट होने से क्यों डरता है .मैं तो एक पोधे की तरह इतनी बार पैदा हुआ हूँ कि मैंने सात सौ सत्तर जन्म ले लिए हैं ."
मसनवी रूम -भाग 4 पेज 214 
 10-इस्लाम से सावधान 
इतना समझने के बाद आसानी से यही निष्कर्ष निकालता है , कि इस्लाम धर्म नहीं बल्कि परस्पर विरोधी विचारों का भण्डार है , क्योंकि एकतरफ अल्लाह ,कुरआन , रसूल ,और रूमी जैसे सूफी ,पुनर्जन्म को .सही मानते हैं .तो दूसरी तरफ विदेशों के हाथो बिके हुए मुस्लिम ब्लोगर ,लोगों से यह कह रहे हैं कि अगर तुम सिर्फ खतना करो , कलाम पढो तो अनंत कल तक जन्नत में हूरों के साथ अय्याशी करने को मिलेगा .कोई इन मक्कार मुस्लिम ब्लोगरों से पूछे कि ,जन्नत तो क़यामत के बाद ही मिलेगी .और इसमे अभी करोड़ों साल हैं , तब तक इनका अल्लाह क्या कर रहा है .जन्नत की जवान हूरें बिना मर्दों के अपनी वासना कैसे मिटा रही हैं ? और जब असंख्य मुसलमान उन हूरों से साथ सहवास करेगे तो उनका क्या हाल होगा ?( अभी पता चला है कि अरब की सरकार ने हूरों के लिए Vibrator भिजवाये हैं ) ताकि जब तक मुसलमान जन्नत नहीं आते तुम इसी से काम चलाओ
यह जन्नत , हूरें , सब केवल कल्पित हैं , सभी मुस्लिम ब्लोगर जो कह रहे हैं ,इस्लाम स्वीकार करने वालों को जानत मिलेगी , सब झूठे ,मक्कार और विदेशी शक्तियों के दलाल हैं .इनके साथ जो मुस्लिम लड़कियाँ हैं ,वह भी हिन्दुओं पर डोरे डाल रहीं हैं .
बस एक ही बात अटल सत्य है कि भले कर्मों का हमेशा अच्छा ही फल मिलता है .
 अतः अल्ला का पल्ला छोडो !

(200/28)

शनिवार, 13 जुलाई 2019

नास्तिक कैसे होते हैं ?

सामान्यतः जो व्यक्ति ईश्वर , परलोक ,और कर्म फल के नियम पर विश्वास नहीं करता उसे नास्तिक कहा जाता .चूँकि बौद्ध और जैन ईश्वर को नहीं मानते इसलिए अज्ञानवश हिन्दू उनको नास्तिक कह देते हैं .यद्यपि बौद्ध और जैन कर्म के सिद्धांत को मानते हैं .और पाप पुण्य पर विश्वास करते हैं .लेकिन जो लोग निरंकुश होकर सिर्फ भौतिकतावाद और अपना सुख और स्वार्थ साधने में लगे रहते हैं , वास्तव में वही नास्तिक होते हैं .ऐसे लोगों मान्यता एक प्रसिद्द कहावत से समझी जा सकती है ,
" लूटो खाओ मस्ती में , आग लगे बस्ती में "
ऐसे लोग सभी मर्यादाएं , परंपरा ,नियम और लोक लज्जा की परवाह नहीं करते .भले देश और समाज बर्बाद हो जाये .भगवान बुद्ध और महावीर के समय ऐसे ही विचार रखने वाला एक व्यक्ति चार्वाक था , जिसके लाखों अनुयायी हो गए थे , उसके विचारों को ही चार्वाक दर्शन कहा जाता है .
1-चार्वाक दर्शन
चार्वाक दर्शन एक भौतिकवादी नास्तिक दर्शन है। यह मात्र प्रत्यक्ष प्रमाण को मानता है तथा पारलौकिक सत्ताओं को यह सिद्धांत स्वीकार नहीं करता है। यह दर्शन वेदबाह्य भी कहा जाता है।
वेदवाह्य दर्शन छ: हैं- 

 चार्वाक, माध्यमिक, योगाचार, सौत्रान्तिक, वैभाषिक, और आर्हत। इन सभी में वेद से असम्मत सिद्धान्तों का प्रतिपादन है।
चार्वाक प्राचीन भारत के एक अनीश्वरवादी और नास्तिक तार्किक थे। ये नास्तिक मत के प्रवर्तक वृहस्पति के शिष्य माने जाते हैं। बृहस्पति और चार्वाक कब हुए इसका कुछ भी पता नहीं है। बृहस्पति को चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र ग्रन्थ में अर्थशास्त्र में भी उल्लेख किया है ."सर्वदर्शनसंग्रह "में चार्वाक का मत दिया हुआ मिलता है  पद्मपुराण में लिखा है कि असुरों को बहकाने के लिये बृहस्पति ने वेदविरुद्ध मत प्रकट किया था
2-भोगवाद ही नास्तिकता है 
भोगवाद ,चरम स्वार्थपरायण मानसिकता और अय्याशी ही नास्तिक होने की निशानी है , चाहे ऐसे व्यक्ति किसी भी धर्म से सम्बंधित हों .चार्वाक की उस समय कही गयी बातें आजकल के लोगों पर सटीक बैठती हैं ,चार्वाक ने कहा था ,
न स्वर्गो नापवर्गो वा नैवात्मा पार्लौकिकः 
नैव वर्नाश्रमादीनाम क्रियश्चफल्देयिका .
अर्थ -न कोई स्वर्ग है ,न उस् जैसा लोक है .और न आत्मा ही पारलौकिक वस्तु है .और अपने किये गए सभी भले बुरे कर्मों का भी कोई फल नहीं मिलता अर्थात सभी बेकार हो जाते हैं .
यावत् जीवेत सुखं जीवेत ऋणं कृत्वा घृतं पीबेत 
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः .
अर्थात-जब तक जियो मौज से जियो और कर्ज लेकर घी पियो मतलब मौज मस्ती करो
कैसी चिंता, शरीर के भस्म हो जाने के बाद फिर वह वापस थोड़े ही आती है।
"पीत्वा पीत्वा पुनः पीत्वा यावतपतति भूतले , पुनरुथ्याय वै पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते .
अर्थ -पियो ,पियो खूब शराब पियो ,यहाँ तक कि लुढ़क कर जमीन पर गिर जाओ . और होश में आकर फिर से पियों .क्योंकि फिरसे जन्म नही होने वाला .
वेद शाश्त्र पुराणानि सामान्य गाणिका इव, मातृयोनि परित्यज विहरेत सर्व योनिषु .
अर्थ -वेद , और सभी शास्त्र और पुराण तो वेश्या की तरह हैं .तुम सिर्फ अपनी माँ को छोड़कर सभी के साथ सहवास कर सकते हो .
3-यूनानी नास्तिक 
भारत की तरह यूनान (Greece ) भी एक प्राचीन देश है ,और वहां की संस्कृति भी काफी समृद्ध थी .वहां भी नास्तिक लोगों का एक बहुत बड़ा समुदाय था .जिसे एपिक्युरियनिस्म (Epicureanism)कहा जाता है .जिसे ईसा पूर्व 307 में एपिक्युरस (Epicurus)नामके एक व्यक्ति ने स्थापित किया था .ग्रीक भाषा में ऐसे विचार को "एटारेक्सिया (Ataraxia Aταραξία )भी कहा जाता है .इसका अर्थ उन्माद , मस्ती ,मुक्त होता है .इस दर्शन (Philosophy ) का उद्देश्य मनुष्य को हर प्रकार के नियमों , मर्यादाओं .और सामाजिक . कानूनी बंधनों से मुक्त कराना था .ऐसे लोग उन सभी रिश्ते की महिलाओं से सहवास करते थे . जिनसे शारीरिक सम्बन्ध बनाना पाप और अपराध समझा जाता था .
ऐसे लोग जीवन को क्षणभंगुर मानते थे .और मानते थे कि जब तक दम में दम है हर प्रकार का सुख भोगते रहो .क्योंकि फिर मौका नहीं मिलेगा .जब इन लोगों को स्वादिष्ट भोजन मिल जाता था तो यह लोग इतना खा लेते थे कि इनके पेट में साँस लेने की जगह भी नहीं रहती थी . तब यह लोग उलटी करके पेट खाली कर लेते थे .स्वाद लेने के लिए फिर से खाने लगते थे .
4-असली नास्तिक सेकुलर
सेकुलर प्राणियों की एक ऐसी प्रजाति है ,अनेकों प्राणियों गुण पाए जाते हैं .गिरगिट की तरह रंग बदलना , लोमड़ी की तरह मक्कारी ,कुत्तों की तरह अपने ही लोगों पर भोंकना ,अजगर की तरह दूसरों का माल हड़प कर लेना .और सांप की तरह धोके से डस लेना .इसलिए ऐसे प्राणी को मनुष्य समझना बड़ी भारी भूल होगी . ऐसे लोग पाखंड और ढोंग के साक्षात अवतार होते हैं .दिखावे के लिए ऐसे लोग सभी धर्मों को मानने का नाटक करते हैं, लेकिन वास्तव में इनको धर्म या ईश्वर से कोई मतलब नहीं होता . अपने स्वार्थ के लिए यह लोग ईश्वर को भी बेच सकते हैं .ना यह किसी को अपना सगा मानते है .और न कोई बुद्धिमान इनको अपना सगा मानने की भूल करे .
वास्तव में आजकल के सेकुलर ही नास्तिक हैं .बौद्ध और जैन नहीं .मुलायम सिंह , लालू प्रसाद ,दिग्विजय सिंह ,और अधिकांश कांगरेसी सेकुलर- नास्तिक है .

(200/77)

शुक्रवार, 12 जुलाई 2019

सात्विक आहार अपनाओ मांसाहार त्यागो !!

बड़े ही  दुःख  की  बात है  कि धार्मिक   ज्ञान   के  अभाव  , और पाश्चात्य संस्कृति  के  प्रभाव   में  आकर  आजकल  के   हिन्दू    युवा वर्ग  में माँसाहारी  भोजन  करने    का  फैशन   हो  गया   है   ,  कुछ  लोग  तो  अण्डों   को  वेजिटेरियन  मानने  लगे   हैं  ,  कुछ  लोग  तो  केवल शौक   के लिए  चिकन , मछली  और  मीट  खाने   लगे   हैं   ,  इसका  दुष्परिणाम  यह  हुआ   कि ऐसे लोग   किसी न किसी   रोग  से ग्रस्त   पाये गए   हैं  ,  आज  ऐसे लोगों  को उचित  मार्गदर्शन   की  जरुरत    है ,

हिन्दू धर्मशास्त्रों मे एकमत से सभी जीवों को ईश्वर का अंश माना है व अहिंसा, दया, प्रेम, क्षमा आदि गुणों को अत्यंत महत्व दिया , मांसाहार को बिल्कुल त्याज्य, दोषपूर्ण, आयु क्षीण करने वाला व पाप योनियों में ले जाने वाला कहा है । महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म पितामह ने मांस खाने वाले, मांस का व्यापार करने वाले व मांस के लिये जीव हत्या करने वाले तीनों को दोषी बताया है । उन्होने कहा हैं कि जो दूसरे के मांस से अपना मांस बढ़ाना चाहता है वह जहा कहीं भी जन्म लेता है चैन से नहीं रह पाता । जो अन्य प्राणियों का मांस खाते है वे दूसरे जन्म में उन्हीं प्राणियों द्वारा भक्षण किये जाते है । जिस प्राणी का वध किया जाता है वह यही कहता है
"मांस भक्षयते यस्माद भक्षयिष्ये तमप्यहमू "अर्थात् आज वह मुझे खाता है तो कभी मैं उसे खाऊँगा ।

श्रीमद् भगवत गीता में भोजन की तीन श्रेणियाँ बताई गई है
 (1) सात्त्विक भोजन -जैसे फल, सब्जी, अनाज, दालें, मेवे, दूध, मक्सन इत्यादि जो अग्यु, बुद्धि बल बढ़ाते है व सुख, शांति, दयाभाव, अहिंसा भाव व एकरसता प्रदान करते है व हर प्रकार की अशुद्धियों से शरीर, दिल व मस्तिष्क को बचाते हैं
(2) राजसिक भोजन - अति गर्म, तीखे, कड़वे, खट्टे, मिर्च मसाले आदि जलन उत्पन्न करने वाले, रूखे पदार्थ शामिल है । इस प्रकार का भोजन उत्तेजक होता है व दु :ख, रोग व चिन्ता देने वाला है ।
(3) तामसिक भोजन -जैसे बासी, रसहीन, अर्ध पके,दुर्गन्ध  वाले, सड़े अपवित्र नशीले पदार्थ मांस इत्यादि जो इन्सान को कुसंस्कारों की ओर ले जाने वाले बुद्धि भ्रष्ट करने वाले, रोगों व आलस्य इत्यादि दुर्गुण देने वाले होते हैं ।


वैदिक मत प्रारम्भ से ही अहिंसक और शाकाहारी रहा है, यह देखिए-

य आमं मांसमदन्ति पौरूषेयं च ये क्रवि: !
गर्भान खादन्ति केशवास्तानितो नाशयामसि !! (अथर्ववेद- 8:6:23)

-जो कच्चा माँस खाते हैं, जो मनुष्यों द्वारा पकाया हुआ माँस खाते हैं, जो गर्भ रूप अंडों का सेवन करते हैं, उन के इस दुष्ट व्यसन का नाश करो !

अघ्न्या यजमानस्य पशून्पाहि (यजुर्वेद-1:1)

-हे मनुष्यों ! पशु अघ्न्य हैं – कभी न मारने योग्य, पशुओं की रक्षा करो |

अहिंसा परमो धर्मः सर्वप्राणभृतां वरः। (आदिपर्व- 11:13)

-किसी भी प्राणी को न मारना ही परमधर्म है ।

सुरां मत्स्यान्मधु मांसमासवकृसरौदनम् ।
धूर्तैः प्रवर्तितं ह्येतन्नैतद् वेदेषु कल्पितम् ॥ (शान्तिपर्व- 265:9)

-सुरा, मछली, मद्य, मांस, आसव, कृसरा आदि भोजन, धूर्त प्रवर्तित है जिन्होनें ऐसे अखाद्य को वेदों में कल्पित कर दिया है।

अनुमंता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी ।
संस्कर्त्ता चोपहर्त्ता च खादकश्चेति घातका: ॥ (मनुस्मृति- 5:51)

प्राणी के   मांस    के  लिए वध की  अनुमति  देने  वाला , सहमति  देनेवाला  , मारने  वाला   ,  मांस  का  क्रय  विक्रय  करने  वाला ,पकाने   वाला ,परोसने  वाला   और  खाने  वाला   सभी  घातकी     अर्थात  हत्यारे  हैं 

2-सिख  धर्म  में  मांसाहार  का निषेध 

"कबीर  भांग  मछली  सूरा पान  जो जो  प्राणी   खाहिं
तीरथ  नेम  ब्रत  सब जे  कीते  सभी  रसातल   जाहिं "-–

 श्री  गुरुग्रन्थ  साहब Ang  137


"जीव    वधहु को  धरम  कर थापहु अधरम कहहु  कत  भाई
आपन  को मुनिवर  कह थापहु  काको  कहहु  कसाई "-

श्री  गुरुग्रन्थ  साहब  Ang 1103)


वेद  कतेब  कहो   मत झूठे   ,झूठा  जो  न  विचारे - जो   सब  में एक   खुदा   कहु  तो  क्यों  मुरगी  मारे " -श्री  गुरुग्रन्थ  साहब Ang 1350)


शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने गहरी खोज के बाद जो गुरु साहब के निशान तथा हुकम नामें पुस्तक के रूप में छपवाये है उनमें से एक हुक्मनामा यह है ।

पृष्ठ 103-हुक्म नामा  न. 113
हुक्मनामा बाबा बन्दा बहादुर जी,मोहर फारसी

देगो तेगो फतहि नुसरत बेदरिंग
याफत अज नाम गुरु गोविन्द सिंह
 १ ओंकार    फते दरसनु

सिरी सचे साहिब जी दा हुक्म है सरबत खालसा जउनपुर का गुरु रखेगा.. .खालसे दी रहत रहणा भंग तमाकू हफीम पोस्त दारु कोई नाहि खाणा मांस मछली पिआज ना ही खाणा चोरी जारी ना रही करणी ।

अर्थात्( मांस, मछली, पिआज, नशीले पदार्थ, शराब इत्यादि क़ीमनाही की गई है । सभी सिख गुरुद्वारों में लंगर में अनिवार्यत : शाकाहार ही बनता है ।


3-ईसाई धर्म  में  मांस  मदिरा  का  निषेध 
ईसाई धर्म    के  धर्मग्रन्थ   बाइबिल   के नए  नियम ( New testament)  में साफ़  शब्दों   में   मांस   खाने  और   शराब  पीने  की  मनाई    की गयी है , क्योंकि  इनके  सेवन करने  वाला  खुद  तो ठोकर  खाता   है    .  और  दूसरों   को भी   सही  धर्म  से  भटका  देता है 
It is better not to eat meat or drink wine or to do anything else that will cause your brother or sister to fall.
Romans14:21

भला तो यह है, कि तू न मांस खाए, और न दाख रस पीए, न और कुछ ऐसा करे, जिस से तेरा भाई ठोकर खाए

4-बौद्धधर्म में जीवहत्या का निषेध 

किसी   भी  प्राणी   को  मारे  बिना मांस   की  प्राप्ति  नहीं   हो  सकती   , इसलिए   भगवान  बुद्ध    ने हर प्रकार के  जीवों  की  हत्या करने को   पाप  बताया    है    ,  और  कहा   है  ऐसा   करने वाले   कभी     सुख  शांति  प्राप्त   नहीं   करेंगे ,

धम्मपद धम्मपद की गाथा दण्ड्वग्गो’ मे भगवान बुद्ध कहते है :

सब्बे तसन्ति दण्डस्स, सब्बेसं जीवितं पियं।
अत्तानं उपमं कत्वा, न हनेय्य न घातये॥-130
सभी दंड से डरते हैं । सभी को मृत्यु से डर लगता है । अत: सभी को अपने जैसा समझ कर न तो किसी की हत्या करे या हत्या करने के लिये प्रेरित करे ।

सुखकामानि भूतानि, यो दण्डेन विहिंसति।
अत्तनो सुखमेसानो, पेच्‍च सो न लभते सुखं॥-131
जो सुख चाहने वाले प्राणियों को अपने सुख की चाह से , दंड से विहिंसित करता है ( कष्ट पहुँचाता है ) वह मर कर सुख नही पाता है ।

बौद्ध   धर्म   के  " पंचशील ( यानी   पांच  प्रतिज्ञा  )    में   पहली  प्रतिज्ञा   है    ,

" पाणाति  पाता वेरमणी सिक्खा  पदम  समादियामि  "

अर्थात    मैं   किसी  भी  प्राणी  को  नहीं  मारने  की  प्रतिज्ञा   करता  हूँ 

5-जैन धर्म   में   प्राणी   हत्या   का   निषेध 

जैन   धर्म    में तो    छोटे   बड़े   सभी  प्रकार के   जीवों   को   मारने  की  घोर  वर्जना  की गई    है   
भगवान  महावीर   ने   कहा   है    ,

"सव्वे  जीवा  इच्छन्ति  जीवियुं न मररिस्सयुं -तम्हा   पाणि बहम   घोरं  निग्गन्ठा पब्बजन्ति  च "
समण  सुत्त   गाथा   -3

 अर्थात  -सभी  जीव  जीना  चाहते   है   ,  मारना   कोई     नहीं   चाहता   ,  इसलिए  निर्ग्रन्थ ( जैन )  प्राणी  वध   की   घोर  वर्जना  करते   हैं 

6-सूफी  मत   में  अहिंसा  का  आदेश 

यद्यपि अधिकांश   मुस्लिम  मांसाहारी   होते   हैं   , परन्तु इस्लाम  के  सूफी  संत  मौलाना  रूमी   ने  अपनी   मसनवी   में मुसलमानों को  अहिंसा  का  उपदेश   दिया   है  ,    वह  कहते हैं  ,
"मी  आजार मूरी  कि  दाना  कुशस्त  ,  कि  जां  दारद   औ  जां  शीरीं  खुशस्त "
अर्थात  - तुम  चींटी   को  भी  नहीं   मारो ,जो दाना   खाती   है   , क्योंकि  उसमे  भी  जान   है  ,  और  हरेक को  अपनी  जान  प्यारी   होती   है .

इन  सभी   धर्मों  के  ग्रंथों  के वचनों   से  निर्विवाद  रूप   से  यही    बात  सिद्ध   होती   है कि  सदा  स्वस्थ   , निरोगी  और  दीर्घायु   बने   रहने के लिए  हमें    सात्विक   भोजन  अपनाने  की   और  मांसाहार  को  त्यागने  की जरुरत   है   ,  क्योंकि    मांसाहार  के लिए  मूक   निर्दोष  जीवों    की  हत्या  होती   है  ,जो   महापाप   है   ,  दूसरे   मांसाहार   से अनेकों   प्रकार के   रोग   हो   जाते   हैं   , जैसा कि  आजकल   हो रहे   हैं ,

(270)  -15/07/2017

मंगलवार, 9 जुलाई 2019

रसूल ऐसा ही होता है ?

इस्लामी मान्यता है कि अल्लाह सब कुछ कर सकता है .और बिना किसी योग्यता के और बिना कोई परीक्षा लिए ही किसी को भी अपना नबी और रसूल नियुक्त कर सकता है .और इसी शक्ति का प्रयोग करके अल्लाह ने आदम से लेकर मुहम्मद तक इस एक लाख चौबीस हजार लोगों को अपना नबी और रसूल नियुक्त करके इस दुनियां में भेजा था .चूँकि मुहम्मद साहब अल्लाह के सबसे प्यारे रसूल थे .इसलिए आचार , विचार , व्यवहार सभी नबियों से अलग और अनोखे थे .वैसे तो उनके वचनों और जीवनी के बारे में अधिकांश जानकारी प्रमाणिक हदीसों में उपलब्ध हैं .जिनको मुसलमान धार्मिक ग्रन्थ भी मानते हैं .और उन पर ईमान रखते हैं .
ऐसी ही एक हदीस की किताब है , जिसका नाम " समाइल मुहम्मदिया الشمائل المحمدية " है जिसमे इमाम " अबू ईसा अत तिरमिजी " ने मुहम्मद साहब के निजी जीवन के बारे में लिखा है .इमाम तिरमिजी हि ० 210 से 279 तक जीवित रहे .इन्होने अपनी हदीस की किताब में कुल 417 हदीसें जमा की थीं , जो 56 बाब ( अध्याय ) में विभक्त हैं .लेकिन इस हदीस की किताब में मुहम्मद साहब के बारे में ऐसी ऐसी चौंकाने वाली बातें दी गयी है कि जिनको पढ़कर मुहम्मद साहब को रसूल तो क्या इन्सान कहने से पहले सौ बार सोचना पड़ेगा .चूँकि कुछ हदीसें काफी लम्बी हैं , इसलिए सारांश में केवल मुख्य जरूरी बातें हि दी जा रही है .मुहम्मद साहब का असली रूप देखिये और पढ़कर समझिये कि रसूल कैसा होता है .
1-रसूल के पाशविक दांत
अबू हुरैरा ने कहा कि एक व्यक्ति ने रसूल को खाने के लिए एक बकरी भेजी ,लेकिन उस समय रसूल के पास जिबह करने के लिए चाकू नहीं था ." इसलिए रसूल ने अपने दांतों से ही उसे फाड़ डाला ,और खा गए .यानि उन्होंने चाकू का प्रयोग नहीं किया "
" صلى الله عليه وسلم بِلَحْمٍ، فَرُفِعَ إِلَيْهِ الذِّرَاعُ، وَكَانَتْ تُعْجِبُهُ، فَنَهَسَ مِنْهَا‏.‏  "

English reference: Book 25, Hadith 158
Arabic reference: Book 26, Hadith 167

2-पशुओं का पिछला भाग उत्तम है 
"अब्दुल्लाह बिन जाफर ने कहा कि रसूल ने उस बकरी को खाते हुए कहा कि " पिछले हिस्से का मांस उत्तम होता है "
"وسلم، يَقُولُ‏:‏ إِنَّ أَطْيَبَ اللَّحْمِ لَحْمُ الظَّهْرِ‏.‏ "
English reference: Book 25, Hadith 162

Arabic reference: Book 26, Hadith 171

3-रसूल उंगलियाँ चाटते थे 
"कअब बिन मालिक ने कहा कि रसूल खाने के बाद अपने हाथ नहीं धोते थे , बल्कि चाट चाट कर अपनी उंगलियाँ साफ कर देते थे "
" عليه وسلم كَانَ يَلْعَقُ أَصَابِعَهُ ثَلاثًا‏  "
English reference: Book 23, Hadith 130

Arabic reference: Book 24, Hadith 137
4-रसूल के तेल से चीकट बाल
" अनस ने कहा कि रसूल सिर पर खूब तेल लगाकर मलते थे , और कभी कंघी नहीं करते थे सिर पर एक कपड़ा डाल लेते थे . लेकिन दाढ़ी में कंघी करते थे .जिस से उनका पूरा सिर तेल का कपड़ा लगता था "
"يُكْثِرُ دَهْنَ رَأْسِهِ وَتَسْرِيحَ لِحْيَتِهِ، وَيُكْثِرُ الْقِنَاعَ حَتَّى كَأَنَّ ثَوْبَهُ، ثَوْبُ زَيَّاتٍ‏.   "
English reference: Book 4, Hadith 32

Arabic reference: Book 4, Hadith 33

5-रसूल के सिर में जुओं की फ़ौज 
"अनस बिन मलिक ने कहा कि रसूल "उम्मे हारान बिन्त मिलहान" के घर गए , जो "उदबा बिन सामित " कि पत्नी थी .उसने जब रसूल को खाना खिलाया तो देखा कि उनके सिर में जुएँ भरे हुए है . फिर वह जुएँ निकालने लगी . जिस से रसूल को नींद आ गयी .
"انها قدمت له الطعام وبدأوا في البحث عن القمل في رأسه. ثم نام رسول الله   "

Sahih Bukhari-Volume 4, Book 52, Number 47: 

6-रसूल के घर में लिंग पूजा 
" आयशा ने कहा कि मैं रसूल को एक बर्तन में बिठा लेती थी ,और उनके गुप्तांग ( private Part ) पानी डालकर इस तरह से साफ करती थी , जैसे नमाज के लिए वजू किया जाता है .
اعتاد كلما النبي تهدف الى النوم في حين أنه كان جنبا، ليغسل فرجه ويتوضأ من هذا القبيل للصلاة.  "

नोट - इस हदीस में गुपतांग ( private Part ) के लिए अरबी में " फुर्ज  فرجه " शब्द प्रयोग गया है . जो अश्लील शब्द है यही शब्द कुरान की सूरा-अहजाब 33 :35 में "फुरूजहुम-  فُرُوجَهُمْ रूप में आया है हिंदी कुरान में इस का अर्थ " गुप्त इन्द्रियां , या शर्मगाह बताया है .इसी तरह बुखारी कि जिल्द 1 किताब 5 के अध्याय "ग़ुस्ल" में 7 बार " फुर्ज " शब्द आया है .इस से पता होता है कि रसूल अपनी पत्नियों के के साथ मिलकर इस शब्द का प्रयोग करते थे

Sahih al Bukhari Volume 1, Book 5, Number 286

7-रसूल का लिंग वजू करता था 
"मैमूना ने बताया कि रसूल को वजू करवाते समय उनकी औरतें रसूल के पैर नहीं धोती थीं , और पैरों बजाय उनका वीर्य से सना हुआ गुप्तांग धोया करती थी .और उसी का वजू कर देती थी .

"رواه ميمونة:
(زوجة النبي) يؤديها رسول الله الوضوء من هذا القبيل للصلاة لكنها لم يغسل قدميه. انه يغسل قبالة إفرازات من أجزاء حياته الخاصة ومن ثم سكب الماء على جسده.  "
Sahih al Bukhari Volume 1, Book 5, Number 249:

8-बुढियां जन्नत नहीं जा सकतीं 
" हसन बसरी ने कहा कि एक बार रसूल के पास एक बूढ़ी औरत आई और बोली कि अप अल्लाह से मेरे लिए दुआ करिए कि वह मुझे जन्नत में प्रवेश करने दे ." रसूल ने उस से कहा कि बूढ़ी औरत जन्नत में नहीं जा सकती , यह सुन कर वह औरत रोते हुए वापिस चली गयी "
" فَقَالَتْ‏:‏ يَا رَسُولَ للهِ، ادْعُ اللَّهَ أَنْ يُدْخِلَنِي الْجَنَّةَ، فَقَالَ‏:‏ يَا أُمَّ فُلانٍ، إِنَّ الْجَنَّةَ لا تَدْخُلُهَا عَجُوزٌ  "

English reference: Book 35, Hadith 230

Arabic reference: Book 36, Hadith 240

9-लाश दफ़न करने की विधि 
"अनस ने कहा कि जब रसूल की लडकी उम्मे कुलसुम की मौत हुयी रसूल की आँखों से आंसू निकल गए .औए दफ़न की तय्यारी हो रही थी . तभी रसूल बोले केवल वही व्यक्ति कबर के अन्दर उतारे जिसने पिछली रात सम्भोग नहीं किया हो .अबू तल्हा बोले मैंने नहीं किया . तब रसूल ने कहा तुम अन्दर उतरो "
"، فَقَالَ‏:‏ أَفِيكُمْ رَجُلٌ لَمْ يُقَارِفِ اللَّيْلَةَ‏؟‏، قَالَ أَبُو طَلْحَةَ‏:‏ أَنَا، قَالَ‏:‏ انْزِلْ فَنَزَلَ فِي قَبْرِهَا‏.

English reference: Book 44, Hadith 310

Arabic reference: Book 45, Hadith 327

दी गयी इन सभी हदीसों का गंभीर रूप से अध्ययन करते से यह निष्कर्ष निकलते हैं .1 . यदि कोई सचमुच का समझदार अल्लाह होता तो , वह अपने दांतों से जानवरों को फाड़ कर खाने वाले ,गंदे मैले , जुओं से भरे सिर वाले ,व्यक्ति को अपना रसूल कभी नहीं बनाता. 2 . और अगर मुहम्मद वाकई नबी और रसूल होता तो ,लिंग का वजू नहीं कराता .या अपनी औरतों से अपने लिंग पर जल नहीं डलवाता.वास्तव में मुहम्मद एक सनकी और मानसिक रूप से विक्षिप्त व्यक्ति था , वर्ना वह अपनी पुत्री को दफ़न से पहले ऐसी शर्त क्यों रखता ,और ऐसा क्यों कहता कि बूढ़ी औरतें जन्नत में नहीं जा सकती .इस से यह भी पता होता है कि मुहम्मद जवान औरतों का शौक़ीन था .बताइए क्या रसूल ऐसा ही होता है ?

(200/54)

बुधवार, 3 जुलाई 2019

गधा और लकड़बग्घा खाने वाले रसूल !!

जानवर चाहे शाकाहारी हों   या  मांसाहारी   सबका  स्वभाव  और आदतें    अलग    होती   हैं    जो  अनोखी  होती  हैं  ,अगर  किसी  व्यक्ति  में  ऐसे जानवर  के  गुण   या  वैसा   स्वभाव   पाया  जाता   है   तो  लोग  उसकी  तुलना उसी   जानवर   से  करने   लगते   हैं , जैसे गधा  एक निरापद  , अहिंसक  और भोला   जानवर    होता   है  . इसलिए   हरेक   भाषा  में   मुर्ख  को  गधा   कहा    जाता    है  , गधे  बारे    में   कई   कहावतें   और  मुहावरे  प्रचलित  है  . जैसे  "अपने  मतलब   के  लिए   गधे   को  बाप बना  लेना  , " लकिन  मुहम्मद  साहब  अपने   स्वार्थ  के   लिए   गधे   को   खा   लेते   थे   . 
ऐसा    ही एक  जानवर  लकड़बग्घा   है   .  मुहम्मद   साहब  और  उनके  साथी  उसे   भी  हड़प  कर  लेते   थे  .  यही  नहीं   मुहम्मद  साहब  गिरगिट   की  तरह  रंग   भी  बदलते   रहते  थे   , पहले  तो  वह जिस    जानवर  को खाना   हराम  बताते     रहते थे     फिर   कुछ  समय    बाद  उसी   को  खाने  के  बाद    हलाल  घोषित   कर देते    थे  . इस  लेख   में  इसी  बात   का सप्रमाण खुलासा   किया  जा  रहा   है  ,
लेख   का  पहला   भाग गधे (donkey )  जिसे अरबी  में " हिमार - حمار " कहते   हैं , उसका  गोश्त  खाने   के   बारे में है ,इस भाग की सभी  हदीसें  खैबर की   लड़ाई  से  सम्बंधित   है  ,

1-खैबर  की  लड़ाई
खैबर  की  लड़ाई को  अरबी  में " गजवये खैबर - غزوة خيبر " यानी Battle of Khaybar     कहा  जाता   है ,  यह  लड़ाई  सन 629  में  मुसलमानों और   यहूदियों   के  बीच  मदीना  से 150  कि  .  मी  .  दूर   खैबर  नामके एक नखलिस्तान  ( Oasis )   में  हुई थी  . इसीदौरान  मुहम्मद   साहब  ने  गधे   का  गोश्त  खाया  था  ,  और  उसे सदा  के लिए  जायज   ठहरा  दिया  था , यह  सभी   हदीसें   उसी  प्रष्ठभूमि  में    कही  गयी हैं  ,

लेख  का दूसरा भाग लकड़बग्घा के   बारे में   है जिसका  विवरण  इस  प्रकार  है ,

2-लकड़बग्घा-यह  एक लोमड़ी ,  भेड़िया , और  कुत्ते  की  प्रजाति   का   जानवर    है  , जोसर्वभक्षी    है  . यहाँ  तक  मरे  हुए   जानवरो   की   हड्डिया    भी   हजम  कर  जाता   है  . इसलिए  इसके  शरीर  से अजीब  सी  दुर्गन्ध    निकलती  रहती   है  .  अरबी  में  " जबअ --ضبع- "  कहते   हैं  , जिसका  बहुवचन "अल जबयात - الضبعيات "  है  . अंगेरजी   में इसे Hyena  और  फ़ारसी  में " कफ्तार - کفتار "
  कहते   है  . बदबू   के  कारण  लोग  इसे   नही  खाते  ,  लकिन मुहम्मद  साहब  और  उनके  साथी   इसका शिकार   करके शौक  से  खाया  करते  थे  ,  यही  नहीं मुहम्मद   साहब  की पत्नी इसके   खाने   को   जायज  मान  कर  खुद   खाती   थी  ,  जो  इन  हदीसों   और इस्लाम   की   किताबों   से  सिद्ध    होता   है ,


1-गधा नही घोड़ा  खाओ 
"जबीर  बिन  अब्दुल्लाह  ने  कहा  कि  खैबर  की लड़ाई   के समय रसूल  ने कहा    था  किई गधे   का  गोश्त खाना  हराम  है  , तुम घोड़े   का  गोश्त    खा सकते हो  "
The Prophet  prohibited the eating of donkey's meat on the day of the battle of Khaibar, and allowed the eating of horse flesh.

، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، قَالَ نَهَى النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم يَوْمَ خَيْبَرَ عَنْ لُحُومِ الْحُمُرِ، وَرَخَّصَ فِي لُحُومِ الْخَيْلِ‏.‏

सही बुखारी - जिल्द 7 किताब 67 हदीस 433

2-गधा नही घोड़ा  खाओ 
"जबीर  बिन  अब्दुल्लाह  ने  कहा  कि  खैबर  की लड़ाई   के समय रसूल  ने कहा    था  किई गधे   का  गोश्त खाना  गैर कानूनी   है इसलिए  तुम घोड़े का  गोश्त  खाया  करो "
"Allah's Messenger  made donkey's meat unlawful and allowed the eating of horse flesh "

 ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ ـ رضى الله عنهم ـ قَالَ نَهَى النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم يَوْمَ خَيْبَرَ عَنْ لُحُومِ الْحُمُرِ، وَرَخَّصَ فِي لُحُومِ الْخَيْلِ‏.‏

सही बुखारी - जिल्द 7 किताब 67 हदीस 429

3-गधा मार कर खाया 
"अब्दुल्लाह  बिन अबू   कतदा ने  कहा  कि खैबर    के  समय  हम  लोग  इहराम   की  हालत  में ,  और  दुश्मन  छुपे  हुए थे   तभी हमारी   नजर एक   गधे  पर  पड़ी  हमने उसे  भाले  से   मार   दिया  और काट कर  उसका गोश्त  पका  कर रसूल  के साथ  मिल  कर   खा  लिया "
" we saw a  ass. and  attacked It with a spear and we ate its meat."

 حَدَّثَنِي عَبْدُ اللَّهِ بْنُ أَبِي قَتَادَةَ، قَالَ انْطَلَقَ أَبِي مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَامَ الْحُدَيْبِيَةِ فَأَحْرَمَ أَصْحَابُهُ وَلَمْ يُحْرِمْ وَحُدِّثَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَنَّ عَدُوًّا بِغَيْقَةَ فَانْطَلَقَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم - قَالَ - فَبَيْنَمَا أَنَا مَعَ أَصْحَابِهِ يَضْحَكُ بَعْضُهُمْ إِلَى بَعْضٍ إِذْ نَظَرْتُ فَإِذَا أَنَا بِحِمَارِ وَحْشٍ فَحَمَلْتُ عَلَيْهِ فَطَعَنْتُهُ فَأَثْبَتُّهُ فَاسْتَعَنْتُهُمْ فَأَبَوْ

सही मुस्लिम - किताब 7 हदीस 2710

4-गधे  के साथ  घोड़ा  भी   खाया 
"अबू  जुबैर   और  जबीर  बिन अब्दुल्लाह  ने   बताया  कि  खैबर  में  हमने  गधे  के  साथ  घोड़े  का  गोश्त  भी   खाया   था  "

“At the time of Khaibar we ate horses and  donkeys.”

، حَدَّثَنَا ابْنُ جُرَيْجٍ، أَخْبَرَنِي أَبُو الزُّبَيْرِ، أَنَّهُ سَمِعَ جَابِرَ بْنَ عَبْدِ اللَّهِ، يَقُولُ أَكَلْنَا زَمَنَ خَيْبَرَ الْخَيْلَ وَحُمُرَ الْوَحْشِ ‏.‏

 सुन्नन  इब्ने  माजा - किताब 27   हदीस 3312

5-गधे  के  गोश्त  पर अस्थायी  पाबंदी 
"इब्ने अब्बास   ने  कहा कि रसूल  ने अस्थायी ( temporarily)  रूप  से गधे   का  गोश्त  खाने   से   मना   किया था  . क्योंकि  उस  समय  लोग गधों  पर सामान  ले   जाने   का   काम  लेते    थे "
" Prophet forbade the eating of donkey-meat temporarily  because they were means of transportation "

، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ ـ رضى الله عنهما ـ قَالَ لاَ أَدْرِي أَنَهَى عَنْهُ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مِنْ أَجْلِ أَنَّهُ كَانَ حَمُولَةَ النَّاسِ، فَكَرِهَ أَنْ تَذْهَبَ حَمُولَتُهُمْ، أَوْ حَرَّمَهُ فِي يَوْمِ خَيْبَرَ، لَحْمَ الْحُمُرِ الأَهْلِيَّةِ‏.‏

सुन्नन  इब्ने  माजा -जिल्द  5 किताब  59  हदीस 536

6-रसूल  ने  सबको गधा  खिलाया 
और जब  पाबंदी    हट  गयी   तो  रसूल   खुद गधा खाने लगे  और  साथियों    को भी  खिलाने   लगे   ,  यह  इस हदीस   से  पता  चलता  है  ,
"तल्हा बिन अब्दुल्लाह   ने बताया कि रसूल  ने  गधे  का  गोश्त  पकाया  , और  हम  लोगों में  वितरित   करके  सब  के  साथ  खाया "
"Prophet  gave  us some  donkey meat, and told him to distribute it among his Companions "

، عَنْ عِيسَى بْنِ طَلْحَةَ، عَنْ طَلْحَةَ بْنِ عُبَيْدِ اللَّهِ، أَنَّ النَّبِيَّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ أَعْطَاهُ حِمَارَ وَحْشٍ وَأَمَرَهُ أَنْ يُفَرِّقَهُ فِي الرِّفَاقِ وَهُمْ مُحْرِمُونَ ‏.‏

सुन्नन  इब्ने  माजा - किताब  25  हदीस 3211

7-घी और पनीर  के  साथ  गधा 
"सलमान  फ़ारसी  ने  बताया  कि रसूल  ने  घी  और पनीर के  साथ   गधा   खाया  , और  कहा  इसका  खाना  हलाल   है ,क्योंकि केवल   वही  जानवर हराम  हैं  ,  जिनके  नाम  अल्लाह  की  किताब   में   दिए  गए   हैं  ,  और  गधे  के  बारे में अल्लाह की   किताब में  कुछ   नहीं      कहा   है , इसलिए इसका   खाना   माफ़   है "
"Messenger of Allah   was asked about ghee, cheese and  donkeys. He said: ‘What is lawful is that which Allah has permitted, in His Book and what is unlawful is that which Allah has forbidden in His Book. What He remained silent about is what is pardoned.’”

، عَنْ سَلْمَانَ الْفَارِسِيِّ، قَالَ سُئِلَ رَسُولُ اللَّهِ ـ صلى الله عليه وسلم ـ عَنِ السَّمْنِ وَالْجُبْنِ وَالْفِرَاءِ قَالَ ‏ "‏ الْحَلاَلُ مَا أَحَلَّ اللَّهُ فِي كِتَابِهِ وَالْحَرَامُ مَا حَرَّمَ اللَّهُ فِي كِتَابِهِ وَمَا سَكَتَ عَنْهُ فَهُوَ مِمَّا عَفَا عَنْهُ ‏"‏ ‏.‏

सुन्नन  इब्ने  माजा - किताब  29  हदीस  3492

जब  गधा   खाने के  बाद भी   रसूल  और  उनके  साथियों का  दिल  भर  गया  तो  , वह  लकड़बग्घा   भी    खाने   लगे  , और रसूल  ने  जिस  कुतर्क   के  सहारे   गधा   खाने  को  हलाल    बता  दिया  था  ,उसी   कुतर्क    के  सहारे लकड़बग्घा  खाने  को   जायज सिद्ध   कर  दिया  ,  इसके बारे में  दो  हदीसें   मौजूद   है  ,

8-लकड़बग्घा भी खाया 
"इब्ने अबी अम्मार  ने  कहा  कि जब  जाबिर  बिन अब्दुल्लाह  ने  मुझ  से  लकड़बग्घा   खाने को  कहा  ,तो मैंने उस से  पूछ कि क्या  यह  हलाल  है ? उसने  कहा हाँ ,फिर  मैंने पूछा  कि  क्या तुमने यह  बात रसूल   से सुनी  है  ?  तो  वह  बोला  हाँ  . 

"I asked Jabir bin Abdulla about hyenas, and he told me to eat them. I said: "Is it lawfull ? He said: 'Yes' I said: 'Did you hear that from the Messenger of Allah?' He said: 'Yes.'" (Sahih)

، عَنِ ابْنِ أَبِي عَمَّارٍ، قَالَ سَأَلْتُ جَابِرَ بْنَ عَبْدِ اللَّهِ عَنِ الضَّبُعِ، فَأَمَرَنِي بِأَكْلِهَا ‏.‏ قُلْتُ أَصَيْدٌ هِيَ قَالَ نَعَمْ ‏.‏ قُلْتُ أَسَمِعْتَهُ مِنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ نَعَمْ ‏.‏

सुन्नन  अन नसाई - जिल्द 3 किताब 24  हदीस2839 

9-लकड़ बग्घा  का  शिकार 
"इब्ने अबी अम्मार  ने  कहा  कि जब  जाबिर  बिन अब्दुल्लाह  ने  मुझ  से  लकड़बग्घा   खाने को  कहा  ,तो मैंने उस से  पूछ कि क्या   यह  शिकार करने    योग्य   जानवर   है ? उसने  कहा हाँ ,फिर  मैंने पूछा  कि  क्या तुमने यह  बात रसूल   से सुनी  है  ?  तो  वह  बोला  हाँ  .  "I asked Jabir bin 'Abdullah about hyenas and he told me to eat them. I said: 'Are they game that can be hunted)? He said: 'Yes,' I said: 'Did you hear that form the Messenger of Allah He said: 'Yes," (Sahih)

، عَنِ ابْنِ أَبِي عَمَّارٍ، قَالَ سَأَلْتُ جَابِرَ بْنَ عَبْدِ اللَّهِ عَنِ الضَّبُعِ، فَأَمَرَنِي بِأَكْلِهَا فَقُلْتُ أَصَيْدٌ هِيَ قَالَ نَعَمْ ‏.‏ قُلْتُ أَسَمِعْتَهُ مِنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ نَعَمْ ‏.‏

सुन्नन  अन नसाई - जिल्द 5 किताब  42 हदीस 4328

10-आयशा ने लकड़बग्घा खाया 
अभी  तक  तो  हदीसों   से   साबित   हो गया  कि रसूल  और  उनके  साथी  लकड़बग्घा    खाया   करते  थे  ,  लेकिन मलिकी  फिरके  के  सुन्नी  इमाम  "अबू अल वलीद मुहम्मद  बिन अहमद बिन रशद -  أبو الوليد محمد بن احمد بن رشد‎" ने  अपनी  इतिहासिक किताब( textbook of Maliki doctrine in a comparative framework)  "बिदायतुल मुजतहिद वल निहायतुल  मुक्तहिद - بداية المجتهد و نهاية المقتصد"   में  इस  रहस्य   का भंडा  फोड़   दिया   कि  ,  मुहम्मद  साहब  की पत्नी  आयशा   न  केवल  लकड़बग्घा    खाने   को हलाल  बताती  थी  , बल्कि  खुद   भी   खाया   करती  थी   ,इमाम   बताते   हैं    कि ,भले   आजकल  के अधिकाँश  विद्वान   गधे  और  लकड़बग्घे    को  खाना  हराम     कहते   हैं   ,सिवाय इब्ने  अब्बास और  आयशा   के   ,   क्योंकि  यह दौनों   इन्हें      खाने    को   हराम   नही   मानते   थे  ,
"The majority of scholars deem the meat of  donkey  and  hyena to be Haram ,except ibn Abbas and Ayesha as it has narrated that both of them deemed it Halal "

فإن جمهور العلماء على تحريم لحوم الحمر الإنسية الا ما روي عن ابن عباس وعائشة انهما كانا يبيحانهما وعن مالك انه كان يكرهها

""इब्ने  अब्बास  और   आयशा  ने  कहा   वह (  गधा और लकड़बग्घा )   हराम  बिलकुल   नही   हैं  "

Ibn Abbas and aisha said that it’s not Haram "

"  قال ابن عباس وعائشة أنه ليس من الحرم.   "
 

 Bidayat al-Mujtahid by Ibn Rushd, Volume 1 page 387:  

सब    जानत हैं  कि  जैसे    गधा   अपनी  मूर्खता  और  अड़ियल   स्वभाव  के लिए  बदनाम   है  , उसी  तरह  लकड़ बग्घा  अपनी मक्कारी  और  धोखे  से  हमला   करने  के  लिए  कुख्यात   है  ,  तो  बताइए  जो  रसूल , उसके   सहाबा    और  पत्नी  इन   जानवरों   को   खाया  करते  हों  उनका  स्वभाव  कैसा   रहा   होगा ?और  जो  लोग इनको  अपना  आदर्श     मानते   हों    उनको  क्या    कहना  चाहिए  ?


(200/161)

मंगलवार, 2 जुलाई 2019

रसूल के वंशज की वेदों पर आस्था !!

यह  लेख हमारे पूर्व  प्रकाशित "वैदिक धर्म मानने  वाले  रसूल   के वंशज  "(200/128-लेख  का दूसरा  भाग  है   ,इसमें  हम  मुहम्मद साहब  के वंशज   , शियाओं  के इमाम  जाफ़र सादिक   की 21  पीढ़ी  में  पैदा नजारी  इस्माइली मुसलमानों  के पीर सतपंथ  फिरके  के स्थापक पीर  सदरुद्दीन  शमशी का संक्षिप  इतिहास देकर वह तथ्य  भी  दे रहे  हैं ,जिनके कारण पीर सदरुद्दीन  की  वेदों पर इतनी  आस्था हो  गयी  कि वह  गायत्री  मन्त्र के जाप  को धार्मिक  कर्तव्य  मानने  लगे  , 
1 -पीर सदरुद्दीन  की  भारत  यात्रा 
यह उस समय की बात   है  जब  अरब में फातिमी  हुकूमत  समाप्त    होगयी  थी  ,  शियाओं की  दुश्मन  नहीं  थी  , और  जब बाद में  अब्बासियों   की हुकूमत  हुई  तो  उन्हौने शियाओं पर अत्याचार  करना शुरू कर  दिए  , इसलिए इमाम  जाफ़र सादिक  के वंशज   ईरान  में  जाकर  बस  गए  , पीर सदरुद्दीन   का  जन्म  ईरान  में हुआ था  ,  और  जब वह हुए तो उनके पिता शमशुद्दीन   ने  उनको  भारत में धर्म प्रचार  के  भेज  दिया  ,  यह  हिजरी सन 734  की बात   है  , सदरुद्दीन   भारत  के मुलतान  ( मूलस्थान )   शहर में रहने लगे ,वहां उन्होंने  सिंधी  , और  पंजाबी  भाषा  सीखी   और   हिन्दू  पंडितों   से  संस्कृत सीखी   ,  और वैदिक  धर्म  के बारे में जानकारी  प्राप्त  की  ,  तभी  फिरोज खान  तुगलक  ने  सिंध  पर  हमला कर  दिया   और हजारों  निर्दोषों   को  क़त्ल  करा  दिया  ,  यह  हत्याकांड देख  कर   पीर  को  इस्लाम के  प्रति अरुचि  होने  लगी  ,  वह जानते थे कि इस्लाम के नाम  पर  मुसलमानों  ने ही  इमाम  हुसैन  को  परिवार  सहित  बेदर्दी   से  मार्  दिया  था  , इसलिए मुल्तान को  छोड़ कर  पीर  गुजरात के  कच्छ  में आगये  ,  उनके साथ  उनके अनुयायी   भी वहीँ  बस गए  ,  गुजरात में रह  कर  पीर को  जब  वैदिक धर्म और  वेदों  की  महानता  का पता चला  तो  उन्होंने  अपने ग्रथों  में  भी  उसका  उल्लेख    कर   दिया  ,  जिसके उनके  पूरे  विश्व  में फैले   करीब  15  करोड़ इस्माइली  मुस्लिम  मानते  हैं   ,  और  अपने उपासना गृह "जमात खाना -  جماعت‌خانه‎‎,  " में पढ़ते  हैं  , इस्माइली किसी मस्जिद में जाकर  नमाज      नहीं  पढ़ते  ,बल्कि एक बड़े  हॉल स्त्री  पुरुष  मिल  कर   पीर सदरुद्दीन  के     वचनों   का  पाठ  करते  हैं   ,जिन्हें  ज्ञान  कहा   जाता  है  ,  यह  सिंधी  , गुजराती  , कच्छी  और कुछ  फारसी  भाषा  में भी  हैं 
2-इस्माइली  ज्ञान का आधार  वेद  हैं 

इस्माइली सतपंथ  में  ज्ञान  को  "सांखी "  कहा  जाता  है  ,जिसका अर्थ साक्षी ( witness )   है  , इसका तात्पर्य वेद  में दिए गए सत्य  की  गवाही "witness in support of the truth contained therein — the Vedas "पीर सदरुद्दीन   ने  ज्ञान  संख्या 552  में  कहा  है कि मैं  साक्षी  देता हूँ  कि मेरा  ज्ञान  ऋग्वेद  , यजुर्वेद  , सामवेद  और अथर्ववेद   पर  आधारित है . उन्होंने   अपने  ज्ञान (पुस्तक "   में  यह  भी  कहा  है ,

"आश  जी  वेद वानी  ते  तो स्वामी  पोते मुंह माहेथी  बोल्या ,अने भाई तेने वेद जा  कीधा आधार ,रे
रुग वेद जुजर वेद  सामवेद  अथर्व वेद कर्या ,अने  भाई किताब जा  कीधा  चार  रे "ज्ञान संख्या (232)
अर्थात -मेरा ज्ञान वेद आधारित है  ,  जो  स्वयं ईश्वर का  वचन  है  ,   और जिसे  चार किताबों  में बाँट दिया  गया ,जिनके  नाम ऋग्वेद ,यजुर्वेद ,सामवेद  और अथर्व वेद  हैं "

3-इस्माइली ज्ञान 

इस्माइली निजारी  मुस्लिमों  के गुरु   और महम्मद  साहब की  49  पीढ़ी में  जन्मे  पीर सदरुद्दीन   ने  कई पुस्तकों की  रचना  की है  , ऐसी एक  किताब  का  नाम  ज्ञान  है .जिनमे वेदों  को  प्रमाण   माना  है .Ginans (Urdu: گنان, Gujarati: ગિનાન) (Derived from Sanskrit: Gnana/(ज्ञान)) are devotional hymns or poems recited by Shia Ismaili Muslims
सदगुरु  ने कहा

"जेने  धर्म जोया  सत्त  ना अने जोया  वेद  विचार  ,ते  ईमान  राखशे  सत  नुं अने  गुरु  ऊपर  राखे प्यार "-9

अर्थ -जिसने सत्य को  जान  लिया  और  वेद  का अध्यन  किया  , वह  गुरु की  यह बात मानकर   सत्य  पर  इमान रखता  है 

सदगुरु  ने कहा

" जने वेद  जोईने  विचार्या  नहीं  ,अने तेनु  वेद  शुं  नहीं  काम ,ते ठाला  आया भूला गया तेने वेद मां  नहीं  साम "-10

अर्थ -  जिसने   सिर्फ  वेद  को  देखा है लेकिन उसका अध्यन  नहीं  किया  ,  वह  दुनियां  में  बेकार  आया  है  ,  ऐसे  लोगों को  वेद  से  कोई मतलब नहीं   जिनको वेद  समझने की  सामर्थ्य    नहीं

  Guide says: Those who having seen or heard the holy scriptures, do not reflect upon them, have nothing to do with them. They have come empty and have gotten lost, and they do not have any link in the reading or hearing of them.

सदगुरु  ने कहा
"सार  शुं  थाशे  लोक  नी ,जेने  नथी  वेद  विचार  ,ते अल्ल  बोले सत धर्म ने भाई जेने नाम विचारिये  गमार "-15

अर्थ -" जो  लोगों   को सार की  बात नहीं बताता और   और  जिसे  वेद ज्ञान नहीं   , और जो  सच्चे  धर्म (वैदिक )  की बुराई  करता है  ,  तो  भाईयो उसे गंवार  समझना  चाहिए "

ones who direct false accusation towards the True Religion. Brother, they never reflect upon the Divine knowledge.

4-गायत्री  मन्त्र पर श्रद्धा 
मुहम्मद  साहब  के वंशज  वेदों  पर आस्था रखते थे   , यह   बात प्रमाणित  हो चुकी लेकिन इस बात को  जानकर  हिन्दू आशर्यचकित   हो  जायेंगे कि मुहम्मद   के वंशज   गायत्री  मन्त्र भी  पढ़ते थे  , और आज भी इस्माइली  सतपंथि  प्रार्थना में  गायत्री  मन्त्र  पढ़ते  है  , यह वही  गायत्री  मन्त्र  है जो हिन्दू  वैदिक धर्म  के  लोग  पढ़ते  हैं 

    भूर्भुवः॒ स्वः ।
    तत्स॑वि॒तुर्वरेण्यं॒
    भर्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि ।
    धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒दया॑त् ॥

ऋग्वेद - मंडल  3 सूक्त 62   मन्त्र 10

इस  मन्त्र  का अर्थ  गुजराती में पीर सदरुद्दीन और और पीर गुरु हसन  कबीरुद्दीन  ने क्या  है ,जिसका  अंगरेजी अनुवाद  दिया  जा रहा  है  ,

Which means, ! 0 God, thou art the giver of life, the
remover of pains and sorrows, the bestower of happiness.
0 creator of the universe, may we receive "thy sin-destroying
light. May Thou guide our intellect in the right direction  "

5-गायत्री  मन्त्र  की  व्याख्या 
पीराणा  निवासी इस्माइली विद्वान् "सय्यद इमाम शाह   " ने गायत्री मन्त्र की  गुजराती  भाषा में " मूल  गायत्री "  नाम से  जो व्याख्या  की  है  , उसका  हिंदी  अर्थ  दिया  जा रहा  है   "स्वामी आप आदि नूर परमेश्वर  हो  ,आप ही  निरंजन हो  ,आप  जैसा कोई  नहीं  ,आपकी कोई देह नहीं  ,जब कोई शब्द नहीं था  ,जल  नहीं ,थल  नहीं ,धरती नहीं  आकाश  नहीं ,और न  सूर्य और चन्द्रमा नहीं , थे और न  पानी पहाड़  और तारा मंडल   नहीं  थे  , तब  आप ही आप  थे  ,  हम  आपका  ही  ध्यान  करते  हैं  ,और आप ही  हमें   मार्ग  दिखाने वाले और  सृष्टि  की उत्पत्ति   का कारण हो  , हसन शाह   कहते हैं  आप  ही  हमारे गुरु  हो ,.

इन शब्दों  में ईश्वर की स्तुति  करके  इमाम शाह ने  गायत्री  मन्त्र  की तीन महाव्याहृतियाँ  "भू:’, ‘भुव:’ और ‘स्वः "के अर्थ  बताये  कि ये तीनों शब्द क्रमश: पृथिवी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग अथवा द्युलोक के वाचक हैं।और गुजराती  में इन  तीनों   की   वैज्ञानिक व्याख्या देने से पूर्व  गुजराती में कहा  था
"ॐ परम कृपाळू परमात्मा नि आग्या थी आदरु छू ,तमारी आशिसे आ करी रह्यो छू !

इसके बाद  इमाम शाह ने वेद के आधार  पर  विज्ञानं सम्मत  सृष्टि  की उत्पत्ति  के बारे में  जो विशद  जानकारी  दी  है  , काफी  लंबी  और क्लिष्ट  है  ,इसलिए  इसे  अगले  भाग  में  दिया जायेगा  , ( This is a subject of modern cosmology-and-astrophysics)
     चित्र -सद गुरु  इमाम शाह 
https://lh3.googleusercontent.com/-uxcxm9l5ocE/T3dnDoDCBGI/AAAAAAAAAfA/WrlWJ8SC1y8/w506-h503/Image.jpg

अगर   मुल्ले मौलवियों  में  हिम्मत  हो तो   रसूल के इस  असली वंशज को काफिर  घोषित   करने का फ़तवा  जारी कर के दिखाएँ 
नोट -इस लेख को  सब  तक पंहुंचायें 


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