रविवार, 15 फ़रवरी 2015

अल्लाह की पत्नी अशेरा है !

इस लेख  का  शीर्षक  पढ़ कर  पाठक  जरूर  चौंक  जायेगे   , और कुछ लोग  इसे  झूठ  , और कोरी गप्प    भी  मान लेंगे , लेकिन  यह बात  बिलकुल  सत्य  और  प्रामाणिक  है   , लेकिन   इस  सत्य   को समझने के लिए  हमें   पता  होना  चाहिए कि  कुरान   से पहले भी अल्लाह  की  तीन  और किताबें   थीं  ,  जिनके नाम  तौरेत  ,  जबूर  और  इंजील   हैं   , इस्लामी   मान्यता  के अनुसार  अल्लाह  ने  जैसे मुहम्मद  साहब  पर  कुरान   नाजिल  की थी  ,उसी तरह  मूसा को  तौरेत  , दाऊद  को  जबूर  और  ईसा को  इंजील नाजिल  की थी  . यहूदी  सिर्फ  तौरेत  और  जबूर  को  और ईसाई  इन तीनों  पर  ईमान  रखते हैं  ,क्योंकि   खुद  कुरान     ने  कहा है  ,

1-कुरान और तौरेत  का  अल्लाह  एक  है 

"कहो  हम  ईमान  लाये  उस  चीज  पर  जो ,जो हम पर भी  उतारी   गयी  है  , और तुम पर भी उतारी  गयी  है  , और हमारा  इलाह और तुम्हारा इलाह   एक ही है  . हम  उसी  के  मुस्लिम  हैं  " सूरा  -अल  अनकबूत 29:46 


""We believe in that which has been revealed to us and revealed to you. And our God and your God is one; and we are Muslims [in submission] to Him."Sura -al ankabut  29;46



    "وَإِلَـٰهُنَا وَإِلَـٰهُكُمْ وَاحِدٌ وَنَحْنُ لَهُ مُسْلِمُونَ  "

इलाहुना  व् इलाहकुम   वाहिद  , व्  नहनु  लहु  मुस्लिमून "

यही  नहीं  कुरान  के अलावा  अल्लाह  की  किताबों   में  तौरेत इसलिए  महत्वपूर्ण  है क्योंकि   कुरान  में तौरेत  शब्द  18  बार  और उसके  रसूल  मूसा का नाम  136  बार  आया   है   , यही नहीं  मुहम्मद  साहब  भी    तौरेत  और उसके  लाने वाले  मूसा  पर ईमान  रखते  थे  ,  जैसा की  इस हदीस में   कहा है  ,

"अब्दुल्लाह  इब्न  उमर  ने कहा   कि  एक बार  यहूदियों   ने  रसूल   को  अपने  मदरसे में   बुलाया  और ,अबुल  कासिम   नामक  व्यक्ति  का फैसला  करने को कहा  ,  जिसने  एक  औरत   के साथ  व्यभिचार   किया  था  . लोगों   ने  रसूल  को  बैठने के लिए  एक गद्दी  दी  , लेकिन  रसूल  ने उस  पर तौरेत  रख   दी  . और  कहा  मैं तुझ  पर और  उस पर  ईमान रखता हूँ   और  जिस पर तू  नाजिल   की गयी  है  , फिर रसूल ने कहा तुम लोग वाही करो  जो  तौरेत में लिखाहै  . यानी   व्यभिचारि  को  पत्थर  मार   कर मौत  की  सजा ,

(महम्मद  साहब   ने अरबी  में  कहा "आमन्तु बिक  व् मन अंजलक -  ‏ آمَنْتُ بِكِ وَبِمَنْ أَنْزَلَكِ ‏"‏ ‏.‏     " I believed in thee and in Him Who revealed thee.

सुन्नन  अबी  दाऊद -किताब  39  हदीस  4434 

इन  कुरान  और  हदीस  के हवालों  से  सिद्ध  होता है  कि  यहूदियों  और मुसलमानों  का अल्लाह एक  ही  है और  तौरेत  भी कुरान की तरह  प्रामाणिक    है  .
चूँकि  लेख  अल्लाह  और  उसकी  पत्नी  के बारे में है इसलिए हमें यहूदी  धर्म से  काफी पहले के धर्म  और  उनकी  संस्कृति  के बारे में  जानना    भी जरूरी  है  .

2-मीडियन  धर्म  क्या   था  ?
इतिहास के अनुसार  ईसा  पूर्व 2200 -1700  के  बीच पूर्वोत्तर  अरब  प्रायद्वीप  में  मीडियन धर्म  प्रचलित था  ,जिसे  अरबी में " मदयन -مدين‎    "   और  ग्रीक भाषा में  मीडियन - Μαδιάμ)"  कहा  जाता  था .इस  धर्म   का   प्रसार  अकाबा की  खाड़ी  से लाल  सागरकी   सीमा   तक  था  . मीडियन  लोग " बाअल  , और  बोएर   देवता  के  साथ  स्वर्ग  की  देवी अश्तरोथ ( Ashteroth  )  देवी  की  पूजा  करते  थे  , यह भी कहा जाता है कि  मदयं के जंगल में ही  मूसा   को एक  जलती  हुई  झड़ी  के पीछे  यहोवा  ने  दर्शन   दिए  थे  , इस के बाद  मदयन  के  लोग  भी  यहोवा  की  पूजा  करने  लगे  , और  यहोवा यहूदियों  के ईश्वर की तरह  यरूशलेम  में   पूजने  लगा  ,
 
3-अल्लाह को  कैसे  बनाया  गया  ?
जिस अल्लाह के  नाम पर  मुसलमान  सारी  दुनिया में    जिहादी  आतंक  फैला कर  रोज  हजारों  निर्दोष  लोगों  की हत्या  करते  रहते हैं  , उसी  अल्लाह के बारे में  एक   उर्दू  के  शायर में   यह  लिखा   है  ,

"शुक्र  कर खुदाया  , मैंने  तुझे  बनाया  , तुझे  कौन  पूछता  था  मेरी  बंदगी  से  पहले "

शायर की  यह   बात शतप्रतिशत  सत्य  है  क़्योकि इस्लाम  से पहले  अरब  में  कोई अल्लाह  का नाम  भी नहीं   जनता था    . यहांतक जिन  तौरेत  ,जबूर  और इंजील   को मुसलमान  अल्लाह  की   कुरान से पहले  की किताबें  कहते हैं  , उन में भी  अल्लाह  शब्द    नहीं   मिलता   है  ,
तौरेत  यानि   बाइबिल   के  पुराने  नियम   में ईश्वर  (God ) के  लिए हिब्रू  में " य  ह वे ह -  Hebrew: יהוה‎ "शब्द  आया   है    ,जो  एक उपाधि ( epithet  )  है  . तौरेत में  इस  शब्द का  प्रयोग तब से होने लगा जब  यहूदियों   ने  यहोवा  को इस्राएल और  जूडिया    का राष्ट्रीय  ईश्वर बना  दिया  था  , इस से पहले  इस भूभाग में फोनेशियन  और कनानी संस्कृति  थी   ,जिनके  सबसे बड़े  देवता का   नाम  हिब्रू में  "एल -  אל‎ " था  . जिसे  अरबी   में "इल -إل‎  "या  इलाह  إله-"  भी   कहा जाता था   , और अक्कादियन लोग  उसे "इलु - Ilu   "कहते थे . इन सभी  शब्दों   का  अर्थ  "देवता  -god "   होता   है  . इस  "एल " देवता को मानव  जाति  ,और सृष्टि  को पैदा  करने वाला   और "अशेरा -" देवी का पति माना जाता था .  (El or Il was a god also known as the Father of humanity and all creatures, and the husband of the goddess Asherah (בעלה של אלת האשרה) .सीरिया   के  वर्त्तमान" रास अस शमरा -رأس شمرا‎,  "  नामकी   जगह   करीब 2200  साल  ईसा पूर्व  एक मिटटी  की तख्ती  मिली  थी , जिसने  इलाह  देवता और उसकी पत्नी  अशेरा    के बारे में  लिखा     था  ,

पूरी  कुरान   में  269  बार  इलाह -  إله-"    " शब्द   का  प्रयोग   किया  गया   है   ,  और  इस्लाम  के बाद  उसी  इलाह  शब्द  के  पहले अरबी  का डेफ़िनिट आर्टिकल "अल -  ال"  लगा  कर अल्लाह ( ال+اله  ) शब्द  गढ़  लिया  गया   है  , जो आज मुसलमानों  का अल्लाह   बना हुआ है .  इसी  इलाह   यानी  अल्लाह की  पत्नी  का नाम  अशेरा  है   .

4-अशेरा   का  परिचय 

  अक्कादिअन   लेखों  में  अशेरा    को अशेरथ  (Athirath )  भी   कहा   गया  है   ,  इसे मातृृत्व और  उत्पादक    की  देवी   भी  माना जाता  था   , यह सबसे बड़े देवता "एल "  की  पत्नी  थी   .  इब्राहिम   से  पहले  यह  देवी मदयन  से  इजराइल  में   आगयी  थी।  इस्राइली इसे    भूमि केदेवी   भी   मानते थे।  इजराइल  के लोगों  ने  इसका  हिब्रू  नाम "अशेरह - אֲשֵׁרָה‎),  " कर  दिया  . और यरूशलेम  स्थित  यहोवा  के मंदिर में इसकी  मूर्ति  भी  स्थापित कर  दी  गयी थी  .अरब  के  लोग  इसे " अशरह -عشيره   "  कहते   थे  , और हजारों  साल  तक यहोवा   के  साथ   इसकी  पूजा  होती    रही   थी   .

5-अशेरा अल्लाह  की  पत्नी 

अशेरा   यहोवा  उर्फ़   इलाह  यानी  अल्लाह   की  पत्नी   है  यह बात  तौरेत  की  इन  आयतों  से साबित होती   है   ,  जो इस प्रकार है
   

"HWH came from sinai ,and shone forth from his own seir ,He showed himself from mount Paran ,yes he came among the  myriads of Qudhsu  at his right  hand , his own  Ashera indeed , he who loves clan and all his  holy ones  on his left "

"यहोवा  सिनाई  से  आया  , और सेईर से  पारान  पर्वत  से  हजारों  के बीच में खुद  को  प्रकाशित किया  , दायीं  तरफ कुदशु (Qudshu:( Naked Goddess of Heaven and Earth') और उसकी  "अशेरा ", और  जिनको वह  प्रेम  करता  है  वह   लोग   बायीं  तरफ   थे "

 
तौरेत  - व्यवस्था   विवरण 33 :2 -3 (Deuteronomy 33.2-3,)

नोट - ध्यान  करने  योग्य  की   बात है कि  तौरेत  में  हिब्रू (Hebrew )  भाषा  में  साफ़ लिखा  है  "यहोवा  व् अशेरती -  יהוה ואשרתו " यानी  यहोवा  और उसकी  " अशेरा " अंगरेजी में  "  Yahweh and his Asherah "यहाँ  पर    मुहावरे की  भाषा  का  प्रयोग  किया  गया  है  , यहोवा  और  उसकी  अशेरा का   तात्पर्य  यहोवा  और उसकी पत्नी  अशेरा   है    , जैसे  राम  और उसकी  सीता  का  तात्पर्य  राम और उसकी  पत्नी  सीता  होता   है .
6-तौरेत में अशेरा   का उल्लेख 

अशेरा का  उल्लेख  तौरेत  (Bible)की  इन  आयतों   में  मिलता   है
"उसने बाल  देवता  की  वेदी  के साथ  अशेरा  को भी  तोड़  दिया  " Judges 6:25).

" और  उसने अशेरा  की  जो  मूर्ति  खुदवाई उसे यहोवा के भवन में  स्थापित किया "(2 Kings 21:7

" और  जितने  पात्र अशेरा  के लिए बने हैं  उन्हें यहोवा के मंदिर से निकालकर लाओ "2 Kings 23:4)


"स्त्रियां  अशेरा  के लिए  परदे बना करती  थीं  "2 Kings 23:7).

"सामरिया  में  आहब ने अशेरा  की  मूर्ति   लगायी  "1 Kings 16:33).

मदयन  में  खुदाई में  इलाह  देवता   यानि  वर्तमान  अल्लाह   की  पत्नी  की  जो  मूर्ति  मिली   है   ,उसमे  अशेरा  के सिर पर  कलगीदार पगड़ी ,कन्धों  पर पंख  , हाथों  में आयुध  है  , और वह  दो  सिंहों  पर  खड़ी  है   , दौनों तरफ   उल्लू   है  ,और अशेरा   पूरी तरह  नग्न  है , अशेरा  की  फोटो  देखिये -Photo  of Ashera


 
http://www.bible-archaeology.info/Ishtar_BM.jpg


http://classicalwisdom.com/asherah-lost-goddess/

सोमवार, 2 फ़रवरी 2015

संभल जाओ ऐ मुसलमानो!!

हरेक धर्म  के अपने अपने सिद्धांत  और  मान्यताएं  है  , जिन्हें  संक्षिप्त  रूप  में किसी  आदर्श  वाक्य  या  मन्त्र  के रूप में याद किया  जाता  है  , और जब कोई व्यक्ति दूसरे धर्म को स्वीकार  करता है  ,तो  उसे नए  धर्म  की दीक्षा  देते  समय  ही नए धर्म  की मूलभूत  जानकारी देने के साथ अर्थ सहित   मूल मन्त्र   भी सिखा  दिया   जाता  है  . लेकिन  मुसलमान  बच्चे  का  जन्म  होते  ही उसके  कानों  में  कलमा  फूँक देते हैं  , मुस्लमान  समझते हैं की  ऐसा  करने से बच्चा   बड़ा  होकर   सच्चा  मुस्लमान  बनेगा . लेकिन  ऐसा  करने  से मुसलमानों  के  बच्चे बड़े  होकर जालिम  . बेरहम , जिहादी और  खुद मुसलमानों  के  हत्यारे  बन   जाते  हैं  . इसका  सबूत  इस्लामी  देश  पाकिस्तान   के पेशावर  की  दिनाक  16  दिसंबर 2014 की  जिहादी जन  संहार  की  घटना  से  मिलता  है  , जिसमे जिहादी  मुसलमानों   ने कलमा  पढ़वा कर 141 निर्दोष  लोगों  की मिर्मम  हत्या  कर  दी  थी   ,जिनमे 132 बच्चे ऐसे  भी   थे  , जिनको   यह भी  पता नहीं  था कि  कलमा  पढने   के   पर  मौत  मिलेगी  . और  अल्लाह भी उनको बचाने आएगा . पूरी   खबर  इस  प्रकार  है ,

पाकिस्तान के पेशावर के आर्मी स्कूल में आतंकियों की दरिंदगी की यह एक और कहानी है। यह बयां की है इस नरसंहार में किसी तरह जिंदा बचे इंजिनियरिंग के सेकेंड इयर के स्टूडेंट आमिर अली ने। इस हमले में अपने 10 दोस्तों में अकेले जिंदा बचे आमिर ने बताया कि आतंकियों ने गोली मारने से पहले उन्हें कलमा पढ़ने को कहा था .आमिर ने आगे बताया, 'हम आतंकियों से छिपने के लिए तुरंत क्लास की ओर भागे, लेकिन वे हमारा पीछा करते हुए क्लास तक आ गए। उन्होंने हमें ढूंढ लिया। वे सलवार कमीज पहने हुए थे। उन्होंने हमसे बस एक बात कही- कलमा पढ़ो।'
यही  खबर  अंगरेजी  में  देखिये  .

http://tribune.com.pk/story/807619/they-asked-us-to-read-the-kalma/


“I was sitting in the corridor with 10 of my classmates when we heard firing. We immediately ran towards the classroom to hide there but the militants chased us down and found us. They were dressed in shalwar kameez and the only thing they told us is: ‘read the kalma’,” said Ali, remorsefully adding that he was the only one of his 10 friends that survived the attack.

The ExpressTribune-By Umer Farooq / AFP Published: December 16, 2014

पाकिस्तान के पेशावर शहर में तालिबानियों ने बच्चों को मारने से पहले बच्चों से कालिमा पढने को बोला. ये कालिमा वो होता है जो मुसलमान को मुसलमान बनाता है. वह कालिमा जो आतंकियों ने बच्चों के सिर में गोली मारने से पहले पढ़वाया उस कालिमे का अनुवाद है,
"नहीं है कोई परमेश्वर सिवाए अल्लाह के, और मुहम्मद उसके पैगम्बर हैं" 
यही कालिमा इस्लाम की शुरुवात है. यही कालिमा आइसिस(ISIS) के काले झंडे पर लिखा हुआ है. यही कालिमा जानवर को काटने से पहले कसाई भी पढता है तभी उस जानवर का मांस मुसलमानों के लिए हलाल होता है. आइसिस भी किसी का गला काटने से पहले ये कालिमा पढता है, और आतंकवादियों ने भी बच्चों पर गोलियां दागने से पहले यही कलिमा पढ़वाया. तो फिर भला वे जो आतंकवादी पेशावर में बच्चों का कत्ल करके चले गये क्या वे मुसलमान नहीं थे? बोलते रहो कि तालिबान और आइसिस मुस्लमान नहीं है?

इस घटना  से  मुसलमानों  को अच्छी  तरह  से समझ लेना चाहिए कि चाहे वह  जन्म  से लेकर जिंदगी भर तोते की तरह  कलमा रटते रहें  , संकट के समय  न तो रसूल   उनकी  मदद  को  आएगा  , और   न  ही  अल्लाह  ही न कुछ   कर  पायेगा  . तो  ऐसे  रसूल और अल्लाह  का कलमा  रटने से   क्या  फायदा  . क्योंकि   जब  तक  इस्लाम  रहेगा  , जिहादी  आतंक  चलता   रहेगा   , बेकसूर  लोग  इसी तरह  मारे  जात्ते  रहेंगे   . मानवता   के  शत्रु  जिहादी  नहीं  इस्लामी  शिक्षा  है  

, कौन सुनेगा ये दलील?

http://navbharattimes.indiatimes.com/world/pakistan/they-asked-us-to-recite-the-kalma/articleshow/45550959.cms

शनिवार, 10 जनवरी 2015

झूठे असदुद्दीन ओवैसी का मुंह काला !!

आज   सारी दुनिया  के लोग मान रहे हैं  कि इस्लाम  और  आतंकवाद  पर्यायवाची  शब्द  बन  गए  हैं  , जिस से पूरी  मानव  जाती को   खतरा  पैदा    हो गया  है  , भारत के लिए   यह  खतरा  अधिक  है   , क्योंकि  भारत में  जितने  मुसलमान   है  , उनके पूर्वज  कभी हिंदू थे  , जिनका जबरन   या  धोखे से धर्म  परिवर्तन   किया  गया  था  , धर्म  परिवर्तित   लोग  ही आतंकवादी    बन   कर अधिक खतरनाक   बन  जाते हैं  .क्योंकि इनको इस्लाम  की  असलियत   पता  नहीं  होती  , और   चालाक  मुल्ले  इनको  कुरान  और  हदीसों  के उलटे  सीधे  अर्थ  समझा  कर जिहादी  बना देते हैं  , यह बात  देश  की  अखंडता  और  सुरक्षा  के  लिए संकट  पैदा   करती   रहती  , और  जब  इस  समस्या  का  हल  करने  के उद्देश्य  से अज्ञानवश या  मजबूरी  से  बने  मुसलमानों  को फिर  से हिन्दू  धर्म  में  वापिस  लेने के  लिए "घर  वापसी " अभियान प्रारम्भ  कर दिया गया   ,तो इस्लाम के दलालों ,  एजेंटो   और  मुल्ले  मौलवियों  को  इस्लाम  खतरे  में   दिखाई  देने लगा   ,  और बौखला  कर सभी  हिन्दू  संगठनो पर  साम्प्रदायिकता फ़ैलाने का  आरोप  लगाने  लगे  . और  इस्लाम  के आतंकी रूप पर बुरका   डालने  के लिए  खुद  को  सेकुलर  होने  का ढोंग  रचाने  लगे  .
ऐसे ही  एक  इस्लाम के ठेकेदार और  नेता  का  नाम  " असदुद्दीन ओवैसी--اسد الدین اویسی " है  .  जो  अपने  अनर्गल और  भड़काऊ  बयानों  के लिए  कुख्यात  है  . यह व्यक्ति राजनीति  में सक्रीय  होने के साथ "कुल  हिन्द मजलिसे  इत्तिहादुल मुस्लिमीन -کل ہند مجلس اتحاد المسلمين " नामकी संस्था  का  अध्यक्ष  भी  है

इसने अपना  जिहादी  रूप  दिखा कर 5  जनवरी  2015 सार्वजनिक रूप से सभी  हिन्दू संगठनों   को चुनौती देते हुए  कहा कि " दुनिया  में  जो भी  बच्चा  पैदा  होता  है  , मुसलमान   ही  होता  है (Everyone is born Muslim) .ओवैसी  का यह  भड़काऊ  (और झूठ )बयान   सभी  प्रमुख  अखबारों  में  छापा गया  और ओवैसी  की  निजी  साईट ( http://www.aimim.in/). में भी  डाला गया   है  ,यही नहीं
जी   न्यूज(zeenews )  में इस  विषय  पर एक   चर्चा   आयोजित  की   थी  . लेकिन दुर्भाग्य  से  कोई ऐसा  हिन्दू  नेता   नहीं था  जो  ओवैसी  के  झूठ की  पोल   खोल  देता  . सभी  हिन्दू नेता अपना  बचाव  करने में  लगे  रहे , इसके बाद  जब   इंडिया  टी वी  की  तरफ  से रजत  शर्मा  ने  ओवैसी  से  सवाल  किया  तो  ओवैसी  ने  यही  जवाब  दिया  , रजत  जी ओवैसी को झूठा साबित नहीं  कर  पाये  ,क्योंकि उनको न तो  कुरान  और  हदीस का ज्ञान  है  , और न अरबी  जानते   हैं

. तब आखिर में हमने ओवैसी की   चालाकी और झूठ  का भंडा फोड़ने  का निश्चय किया  . ओवैसी का पूरा  भाषण इस विडिओ  में   दिया  गया  है  ,Asaduddin Owaisi says all are born Muslims - Full Speech

https://www.youtube.com/watch?v=qINqPOttPR4


नोट- यह  विडिओ करीब   10  मिनट  का  है  , अतः निवेदन  है  कि दर्शक   इसे  ध्यान  से देखें  , इसमे  ओवैसी   ने कुल   चार  दावे किये हैं  ,इन   चारों   का सटीक  जवाब  दावे  के  साथ दिया जा रहा है,

1 -आदम   भारत    आया  था  , मुसलमान उसी  की संतान   है  ,इसलिये  भारत  मुसलमानों  के  बाप की  जायदाद  है

जवाब1 -आदम  भारत कभी नहीं आया 

कुरान और  हदीस में आदम  के  हिन्दुस्तान  में  आने  का   कहीं  भी  उल्लेख  नहीं  है  , कुरान   की  इस आयत  के अनुसार अल्लाह ने आदम  और उसकी  औरत को   अलग  अलग  करके  जन्नत  से  निकाल  कर  जमीन  पर  फेक दिया   था  , कुरान में कहा है  "

" उतर  जाओ ,तुम  एक दूसरे  के   दुश्मन  हो  , तुम्हारे  के लिए  एक  नियत  समय  के लिए धरती में ठिकाना और निर्वाह   की   सामग्री  है  . और वहीँ  तुम्हें  जीना  और  वहीँ  मरना है  " सूरा -अल  आराफ़ 7:24 -25


" قَالَ اهْبِطُوا بَعْضُكُمْ لِبَعْضٍ عَدُوٌّ وَلَكُمْ فِي الْأَرْضِ مُسْتَقَرٌّ وَمَتَاعٌ إِلَىٰ حِينٍ   "7:24

नोट -इस आयत   में  साफ़  लिखा है " इहबीतू -  اهْبِطُوا  "(  get  down)   ,"फिल अर्ज -  فِي الْأَرْضِ  "  ( in the Earth ) . अर्थात धरती में  रहो .आदम को  भारत  आने और  रहने  की  बात  सरासर झूठ  और  ओवैसी   के खुराफाती   दिमाग की  चालाकी  है
आदम  और  हव्वा  कहाँ रहे थे  ?
कुरान  के अनुसार  अल्लाह  ने आदम और  हव्वा  को  अलग  अलग   करके  धरति  पर   भेज  दिया  था  , फिर वह  दोनो  कहाँ   गए  इसका विवरण  कुरान  और  हदीस  में  नहीं  मिलता   . लेकिन  बाद में एक  मुस्लिम लेखक   ने इनके बारे में यह लिखा है   "
"जब  अल्लाह  ने  आदम  और  हव्वा को  जन्नत  से  निकाल  दिया  तो  आदम  "सरानीब -سرانديب   " नामकी   जगह में  एक   टापू  के  पर्वत पर  गिर  गया , इस जगह   का नाम   श्री  लंका है  , और आदम  की  पत्नी  हव्वा ईराक  के  शहर बसरा  के  पास  एक जगह " अल उबुल्ला اُبُللا-  "    में  गिरी  थी  . आदम   अकेला ही  लंका  में  130 साल  रहा  ,और  वहीँ  मर  गया
 .

"Adam descended from Paradise into , in a land called Sarandib (Syri Lanka, now-a-days). Hawwa’ (Eve) descended in a location different from Adam. Iblis, descended into an area in present-day Iraq, now a town named al-Ubullah (next to al-Basrah. where he had lived for 130 years"

फिर ओवैसी  हिंदुस्तान  को  अपने  बाप  की  जायदाद  किस  आधार पर  कह  सकता है  ? ,जबकि  आदम  और हव्वा का  भारत  से कोई सम्बन्ध    नहीं  है


आदम   शिखर  ( 7,357 feet high )आज  भी  लंका  में  मौजूद   है  , यह  उसकी  तस्वीर  है .लंका   में आदम  शिखर

http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/a/a2/Sri_Pada.JPG

अधिक  जानकारी के  लिए   यह  साईट  देखिये

http://mapwalk2012.clevelandhistory.org/mountain-of-sarandib-adams-peak/

आदम  और हव्वा  के लंका में  रहने  की  जानकारी   इस  इस्लामी  साईट  में   से ली गयी है

http://islambrowser.blogspot.in/2012/10/nur-muhammad.html

2 -मुहम्मद  ने  कहा था  कि  मुझे   हिंदुस्तान  की ठंडी  हवाएँ आती  है  , यानि  मुहम्मद भारत को   चाहते  थे

जवाब 2-भारत  से ठंडी हवाएँ  आती है ?

मुहम्मद  ने जिंदगी  में ऐसा  कभी  नहीं   कहा    कि  मुझे  हिन्दुस्तान  की ठंडी  हवाएँ  आ रही है  , और न किसी  हदीस   में यह उल्लेख   है , यह बात   तो अली ने कही थी  , क्योंकि अरब  के लोग   मानते थे की भारत  ठंडा देश  है  , और जब  भी पूरब  से ठंडी  हवा  चलती थी तो  लोग कहते थे यह  हिंदुस्तान  की  हवा है  , यही   बात  अली   ने  कही  थी    अल  हाकिम  ने  अपनी  किताब  में लिख  दी है

"अब्बास ने  कहा  कि , अली  इब्न अबी  तालिब  ने  कहा  है " मैं  हिदुस्तान    से आने  वाली  ठंडी  हवायें महसूस कर रहा  हूँ  "


عن ابن عباس رضي الله عنهما ، قال : قال علي بن أبي طالب : أطيب ريح في الأرض الهند 

Ibn Abbas (RA) said, Ali (RA) said: "I feel cool breeze from Hind."

Mustadrak Al-Haakim Hadith 3954.

नोट - यह बात   मुहम्मद  के चचेरे  भाई  और  दामाद   अली  ने  कही  थी  , इसका उल्लेख  किसी  भी  हदीस  की  किताब  में नहीं   है  ,  इसे  मुहमद  साहब  के  करीब  300  साल  बाद  ईरान  के  इतिहासकार "अबू  अब्दुल्लाह  मुहम्मद बिन  अब्दुल्लाह  अल  हाकिम - أبو عبدالله محمد بن عبدالله الحاكم   "  ने  अपनी  किताब  " मुस्तदरक अल हाकिम - مستدرك الحاكم"में  दर्ज   किया  है। अल  हाकिम  का  काल (933 - 1012)  ईसवी है .  मुहम्मद साहब  ने  ऐसा कभी  नहीं  कहा  कि  मुझे  हिंदुस्तान  की  ठंडी  हवाएँ  महसूस  हो  रही  हैं  ,  इसके विपरीत  वह    भारत  पर  हमला  करके  उसकी   दौलत  लूटने  की  योजना बना   रहे  थे  , लेकिन  मर जाने से  उनकी  इच्छा पूरी  नहीं   हो पायी  , इसका  सबूत  इस हदीस  से मिलता   है
हिंदुस्तान  पर  हमला -

" अबू  हुरैरा  ने  कहा  कि  रसूल  ने  हम  लोगों  से  वादा  किया  कि हम   हिंदुस्तान  पर  हमला   करेंगे  ,और उसकी दौलत के लिए खुद को  शहीद  होते हुए    तक देखना चाहूंगा  ,और  यदि  मैं  जिन्दा रहा  तो मेरे  साथ  दौलत होगी  , और  अगर  में मर  गया  तो मैं  सबसे  बड़ा  शहीद  माना  जाऊंगा  "

"The Messenger of Allah  promised that we would invade India. If I live to see that I will sacrifice myself and my wealth. If I am killed, I will be one of the best of the martyrs, and if I come back, I will be Abu Hurairah Al-Muharrar."

"عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ وَعَدَنَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم غَزْوَةَ الْهِنْدِ فَإِنْ أَدْرَكْتُهَا أُنْفِقْ فِيهَا نَفْسِي وَمَالِي وَإِنْ قُتِلْتُ كُنْتُ أَفْضَلَ الشُّهَدَاءِ وَإِنْ رَجَعْتُ فَأَنَا أَبُو هُرَيْرَةَ الْمُحَرَّرُ   "

 Sunan an-Nasa'i - Vol. 1, Book 25, Hadith 3176

इसलिए  हर  मुसलमान  मुहम्मद   की यह  अधूरी इच्छा  पूरी  करने के  लिए  भारत के बहार और भीतर  आतंकी वारदातें  करते  रहते  हैं  , ताकि  भारत की  दौलत   मुसलमानों  के  हाथों  आजाये

3 -हर  बच्चा  जन्म  से  मुस्लमान होता है ? , इसलिए उसका धर्म   बदलना   गलत है

जवाब 3-कुरान   में  एक  भी ऐसी  आयत  नहीं  है ,जिसमे  कहा  गया हो  कि पैदा  होने वाला  हरेक  बच्चा  मुस्लमान  होता   है  , लेकिन  एक  हदीस है जिसका  गलत  अर्थ  करके मुसलमान   चालाकी  से यही  साबित करते  हैं  ,   मूल  हदीस इस  प्रकार  है

"रसूल   ने कहा  कि  हरेक   बच्चा  अपनी  फितरत   के  साथ  पैदा  होता  है  , अभिभावक  उसे  यहूदी  .  ईसाई   , मुशरिक    बना  देते  हैं "
सही मुस्लिम -किताब 33  हदीस 6426 


The Prophet Muhammad said, "No babe is born but upon Fitra . It is his parents who make him a Jew or a Christian or a Polytheist."

"‏"‏ مَا مِنْ مَوْلُودٍ إِلاَّ يُلِدَ عَلَى الْفِطْرَةِ فَأَبَوَاهُ يُهَوِّدَانِهِ وَيُنَصِّرَانِهِ وَيُشَرِّكَانِهِ

(Sahih Muslim, Book 033, Number 6426)
इस  हदीस  का अंगरेजी  में   सही  अर्थ यह  है  (EVERYONE IS BORN ACCORDING TO HIS TRUE NATURE).इस पूरी  हदीस   में  मुसलमान  शब्द  तक  नहीं  है  , फिर  ओवैसी  जैसे  धूर्त  किस  मुंह  से  कहते हैं  कि  हर   पैदा होने  वाला  बच्चा  मुसलमान   ही  होता  है ? यह  झूठ   नहीं   तो क्या  है  ?हर  बच्चा  जन्म   से  हिन्दू  होता  है  , लिंग   कटाने से  मुस्लमान   बनाया  जाता है  ,यदि  ओवैसी  की बात सही है तो  उसकाअल्लाह  हर बच्चे का लिंग कटा  हुआ   पैदा  क्यों  नहीं  करता ?

4 -इस्लाम   में  जबरदस्ती  नहीं  है  ,लोग ख़ुशी  से  मुस्लमान बन रहे हैं

वाब 4- धर्म  में  जबरदस्ती   नहीं   है ?
धर्म  में  जबरदस्ती   नहीं  है  , कुरान  का  यह आदेश   सबके  लिए  , और    हमेशा  के लिए नहीं   है  , मुहम्मद ने  यह बात  बनु  नजीर  के  यहूदियों  को  कहा  था  , यह  बात  इस  हदीस   में  मौजूद  है ,
" इस्लाम  से पहले  जब  किसी  महिला के बच्चे  अकाल  मृत्यु   मर  जाते  थे  ,तो  वह बच्चे  की  दीर्घायु  के  लिए यहूदी  मंदिर में जाकर कसम  खाती  थी कि यदि मेरा  अगला  बच्चा  दीर्घायु  होगा तो  मैं  उसे  यहूदी  बना   कर  मंदिर  को  सौंप  दूँगी  . उस  समय  अंसारों  के   ऐसे कई  बच्चे यहूदियों  के  पास थे ,तब  मुहमद  ने बनु  नजीर  कबीले  के यहूदी  रब्बी  को  सुना  कर   कुरान   की  यह  आयत  कही  थी ,
" धर्म  के  विषय   में  जबरदस्ती   नहीं    है  "सूरा  - बकरा  2:256 

"لَا إِكْرَاهَ فِي الدِّينِ   "2:256

"there is no compulsion in religion"2:256


When the children of a woman (in pre-Islamic days) did not survive, she took a vow on herself that if her child survives, she would convert it a Jew. When Banu an-Nadir were expelled (from Arabia), there were some children of the Ansar (Helpers) among them. They said: We shall not leave our children. So Allah the Exalted revealed; "Let there be no compulsion in religion."


"فَأَنْزَلَ اللَّهُ عَزَّ وَجَلَّ ‏{‏ لاَ إِكْرَاهَ فِي الدِّينِ قَدْ تَبَيَّنَ الرُّشْدُ مِنَ الْغَىِّ ‏}‏ "

Sunan Abu Dawood, Book 14, Hadith 2676 (Arabic: سنن أبي داود‎, )

इतिहास गवाह  है  कि इस्लाम  के जन्म से लेकर  आज  तक  मुसलमान   गैर मुस्लिमों  को जबरन   इस्लाम  काबुल करने पर  विवश  कर रहे हैं  , जो  ओवैसी  के इस झूठ  को मानेगा  उसको  अपने  दिमाग  का इलाज  करवाना  चाहिए  !देखते  है  कौन  इस्लाम  का  एजेंट  इस  लेख  के प्रमाणों  को  गलत  साबित  करता है  ?
हमने  तो  पुख्ता  सबूत देकर  असादुद्दीन   ओवैसी  के   झूठ  का भंडा  फोड़   कर  उसका  मुंह  काला  कर  दिया  ,

गुरुवार, 1 जनवरी 2015

सूफीवाद धर्मान्तरण की बुनियाद

किसी भी दैनिक अख़बार को उठा कर देखिये आपको पढ़ने को मिलेगा की आज हिंदी फिल्मों का कोई प्रसिद्द अभिनेता या अभिनेत्री अजमेर में गरीब नवाज़ अथवा निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर चादर चढ़ा कर अपनी फिल्म के हिट होने की मन्नत मांगने के लिए गया। भारतीय समाज में भी एक विशेष आदत हैं, वह हैं अँधा अनुसरण करने की। क्रिकेट स्टार, फिल्म अभिनेता, बड़े उद्योगपति जो कुछ भी करे भी उसका अँधा अनुसरण करना चाहिए चाहे बुद्धि उसकी अनुमति दे चाहे न दे.अज्ञानवश  लोग दरगाहों  पर  जाने को  हिन्दू  मुस्लिम  एकता   और  आपसी  भाईचारे का  प्रतिक  मान   लेते हैं  , लेकिन  उनको पता नहीं   कि  सूफीवाद भी  कट्टर  सुन्नी  इस्लाम  एक  ऐसा  संप्रदाय   है  ,जो  बिना  युद्ध  और  जिहाद के  हिन्दुओं  को  मुसलमान  बनाने में  लगा   रहता है  , भारत -पाक   में  सूफियों   के  चार  फिरके   हैं   , पूरे भारत में इनकी दरगाहें  फैली  हुई हैं ,जहां  अपनी  मन्नत  पूरी  कराने के  लालच  में हिन्दू  भी  जाते हैं
1-चिश्तिया ( چشتی‎  )
2-कादिरिया ( القادريه,)
3-सुहरावर्दिया  سهروردية‎)
4-नक्शबंदी ( نقشبندية‎ )
इन  सभी  का उद्देश्य   हिन्दुओं   का  धर्म  परिवर्तन  कराना  और  दुनिया में  " निज़ामे  मुस्तफा -نظام مصطفى‎  "  स्थापित  करना  है  . जिस  समय   भारत की आजादी  का आंदोलन   चल  रहा  था सूफी  " तबलीगी  जमात - تبلیغی جماعت"    बनाकर    गुप्त  रूप से हिन्दुओं  का  धर्म परवर्तन  कराकर    मुस्लिम  जनसंख्या  बढ़ने का  षडयंत्र   चला  रहे   थे  .
दिल्ली के एक कोने में निजामुद्दीन औलिया की दरगाह हैं।  1947से पहले इस दरगाह के हाकिम का नाम था ख्वाजा हसन निजामी था।(1878-1955)


 आज के मुस्लिम लेखक निज़ामी की प्रशंसा उनके उर्दू साहित्य को देन अथवा बहादुर शाह ज़फर द्वारा  1857के संघर्ष पर लिखी गई पुस्तक को पुन: प्रकाशित करने के लिए करते हैं। परन्तु निज़ामी के जीवन का एक और पहलु था। वह गुप्त जिहादी  था
धार्मिक मतान्धता के विष से ग्रसित निज़ामी ने हिन्दुओं को मुसलमान बनाने के लिए  1920 के दशक में एक पुस्तक लिखी थी जिसका नाम था दाइये इस्लाम-دايءاسلام " इस पुस्तक को इतने गुप्त तरीके से छापा गया था की इसका प्रथम संस्करण का प्रकाशित हुआ और कब समाप्त हुआ इसका मालूम ही नहीं चला। इसके द्वितीय संस्करण की प्रतियाँ अफ्रीका तक पहुँच गई थी। इस पुस्तक में उस समय के 21  करोड़ हिन्दुओं में से  1 करोड़ हिन्दुओं को इस्लाम में दीक्षित करने का लक्ष्य रखा गया था .

एक आर्य सज्जन को उसकी यह प्रति अफ्रीका में प्राप्त हुई जिसे उन्होंने स्वामी श्रद्धानंद जी को भेज दिया। स्वामी ने इस पुस्तक को पढ़ कर उसके प्रतिउत्तर में पुस्तक लिखी जिसका नाम था "खतरे का घंटा"।
इस पुस्तक के कुछ सन्दर्भों के दर्शन करने मात्र से ही लेखक की मानसिकता का बोध हमें आसानी से मिल जायेगा की किस हद तक जाकर हिन्दुओं को मुस्लमान बनाने के लिए मुस्लिम समाज के हर सदस्य को प्रोत्साहित किया गया था जिससे न केवल धार्मिक द्वेष के फैलने की आशंका थी अपितु दंगे तक भड़कने के पूरे असार थे। आइये इस पुस्तक के कुछ अंशों का अवलोकन करते हैं।

1- फकीरों के कर्तव्य - जीवित पीरों की दुआ से बे औलादों के औलाद होना या बच्चों का जीवित रहना या बिमारियों का दूर होना या दौलत की वृद्धि या मन की मुरादों का पूरा होना, बददुआओं का भय आदि से हिन्दू लोग फकीरों के पास जाते हैं बड़ी श्रद्धा रखते हैं। मुस्लमान फकीरों को ऐसे छोटे छोटे वाक्य याद कराये जावे,जिन्हें वे हिन्दुओं के यहाँ भीख मांगते समय बोले और जिनके सुनने से हिन्दुओं पर इस्लाम की अच्छाई और हिन्दुओं की बुराई प्रगट हो .

2- गाँव और कस्बों में ऐसा जुलुस निकालना जिनसे हिन्दू लोगों में उनका प्रभाव पड़े और फिर उस प्रभाव द्वारा मुसलमान बनाने का कार्य किया जावे।

3-गाने बजाने वालों को ऐसे ऐसे गाने याद कराना और ऐसे ऐसे नये नये गाने तैयार करना जिनसे मुसलमानों में बराबरी के बर्ताव के बातें और मुसलमानों की करामाते प्रगट हो .

4- गिरोह के साथ नमाज ऐसी जगह पढ़ना जहाँ उनको दूसरे धर्म के लोग अच्छी तरह देख सके . और  उनकी  शक्ति  देख  कर इस्लाम से  आकर्षित  हो  जाएँ  .

5-. ईसाईयों और आर्यों के केन्द्रों या उनके लीडरों के यहाँ से उनके खानसामों, बहरों, कहारों चिट्ठीरसारो, कम्पाउन्डरों,भीख मांगने वाले फकीरों, झाड़ू देने वाले स्त्री या पुरुषों, धोबियों, नाइयों, मजदूरों, सिलावतों और खिदमतगारों आदि के द्वारा ख़बरें और भेद मुसलमानों को प्राप्त करनी चाहिए।.

6- सज्जादा नशीन अर्थात दरगाह में काम करने वाले लोगों को मुस्लमान बनाने का कार्य करे .

7- ताबीज और गंडे देने वाले जो हिन्दू उनके पास आते हैं उनको इस्लाम की खूबियाँ बतावे और मुस्लमान बनने की दावत दे .
8-. देहाती  स्कूलों के  मुस्लिम   अध्यापक अपने से पढने वालों को और उनके माता पिता को इस्लाम की खूबियाँ बतावे और मुस्लमान बनने की दावत दे .

9- नवाब रामपुर, टोंक, हैदराबाद , भोपाल, बहावलपुर और जूनागढ आदि को , उनके ओहदेदारों ,जमींदारों ,नम्बरदार, जैलदार आदि को अपने यहाँ पर काम करने वालो को और उनके बच्चों को इस्लाम की खूबियाँ बतावे और मुस्लमान बनने की दावत दे .

10. माली, किसान,बागबान आदि को आलिम लोग इस्लाम के मसले सिखाएँ क्यूंकि साधारण और गरीब लोगों में दीन की सेवा करने का जोश अधिक रहता हैं .

11- दस्तगार जैसे सोने,चांदी,लकड़ी, मिटटी, कपड़े आदि का काम करने वालों को अलीम इस्लाम के मसलों से आगाह करे जिससे वे औरों को इस्लाम ग्रहण करने के लिए प्रोत्साहित करे .

12- फेरी करने वाले घरों में जाकर इस्लाम के खूबियों बताये , दूकानदार दुकान पर बैठे बैठे सामान खरीदने वाले ग्राहक को इस्लाम की खूबियाँ बताये।

13- पटवारी, पोस्ट मास्टर, देहात में पुलिस ऑफिसर, डॉक्टर , मिल कारखानों में बड़े औहदों पर काम करने वाले मुस्लमान इस्लाम का बड़ा काम अपने नीचे काम करने वाले लोगों में इस्लाम का प्रचार कर कर हैं सकते हैं .

14 राजनैतिक लीडर, संपादक , कवि , लेखक आदि को इस्लाम की रक्षा एह वृद्धि का काम अपने हाथ में लेना चाहिये .

15-. स्वांग करने वाले, मुजरा करने वाले, रण्डियों को , गाने वाले कव्वालों को, भीख मांगने वालो को सभी भी इस्लाम की खूबियों को गाना चाहिये।

यहाँ पर सारांश में निज़ामी की पुस्तक के कुछ अंशों को लिखा गया हैं। पाठकों को भली प्रकार से निज़ामी के विचारों के दर्शन हो गये होंगे .

1947 के पहले यह सब कार्य जोरो पर था , हिन्दू समाज के विरोध करने पर दंगे भड़क जाते थे, अपनी राजनितिक एकता , कांग्रेस की नीतियों और अंग्रेजों द्वारा प्रोत्साहन देने से दिनों दिन हिन्दुओं की जनसँख्या कम होती गई जिसका अंत पाकिस्तान के रूप में निकला।

अब पाठक यह सोचे की आज भी यही सब गतिविधियाँ सुचारू रूप से चालू हैं केवल मात्र स्वरुप बदल गया हैं। हिंदी फिल्मों के अभिनेता,क्रिकेटर आदि ने कव्वालों , गायकों आदि का स्थान ले लिया हैं और वे जब भी निजामुद्दीन की दरगाह पर माथा टेकते हैं तो मीडिया में यह खबर ब्रेकिंग न्यूज़ बन जाती हैं। उनको देखकर हिन्दू समाज भी भेड़चाल चलते हुए उनके पीछे पीछे उनका अनुसरण करने लगता हैं।

देश भर में हिन्दू समाज द्वारा साईं संध्या को आयोजित किया जाता हैं जिसमे अपने आपको सूफी गायक कहने वाला कव्वाल हमसर हयात निज़ामी बड़ी शान से बुलाया जाता हैं। बहुत कम लोग यह जानते हैं की कव्वाल हमसर हयात निज़ामी के दादा ख्वाजा हसन निज़ामी के कव्वाल थे और अपने हाकिम के लिए ठीक वैसा ही प्रचार इस्लाम का करते थे जैसा निज़ामी की किताब में लिखा हैं। कहते हैं की समझदार को ईशारा ही काफी होता हैं यहाँ तो सप्रमाण निजामुद्दीन की दरगाह के हाकिम ख्वाजा हसन निजामी और उनकी पुस्तक दाइये इस्लाम पर प्रकाश डाला गया हैं  .ताकि  हिन्दू  भविष्य में  किसी  औलिया  पीर   या  साईँ  की  कब्रों  पर जाकर लाशों  की  पूजा  करने  की   वैसी  भूल  नहीं   करें   ,जिस से देश का विभाजन  हुआ  था  , जिसका  फल हिन्दू  आज  भी  भोग  रहे   है
,बताइए   अभी नहीं  तो हिन्दू समाज कब इतिहास और अपनी गलतियों से सीखेगा?

मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

धर्म और मजहब में क्या अंतर है?

 प्राय:अपने आपको प्रगतिशील ,सेकुलर , कहने वाले लोग धर्म और मज़हब को एक ही समझते हैं. आज संसार में जितनी भी अशांति, हत्या,अत्याचार, आतंकवाद, अन्धविश्वास, दरिद्रता, अत्याचार आदि जो भी कुछ हो रहा हैं उसका मूल कारण धर्म के नाम पर सम्प्रदाय, मज़हब या मत-मतान्तर को पोषित करना हैं .इसलिए  हम  सभी  को  धर्म  और  मजहब   का अंतर   ठीक  से  समझने   की  जरुरत   है
मज़हब अथवा मत-मतान्तर अथवा पंथ के अनेक अर्थ हैं जैसे वह रास्ता जी स्वर्ग और ईश्वर प्राप्ति का हैं और जोकि मज़हब के प्रवर्तक ने बताया हैं। अनेक जगहों पर ईमान अर्थात विश्वास के अर्थों में भी आता हैं।

1. धर्म और मज़हब समान अर्थ नहीं हैं और न ही धर्म ईमान या विश्वास का प्राय: हैं।

2. धर्म क्रियात्मक वस्तु हैं ,अर्थात  धर्म सत्कर्मों  पर  जोर  देता  है
मज़हब विश्वासात्मक वस्तु हैं .अर्थात मजहब   सिर्फ  ईमान  लाने पर  ही  जोर  देता  है

3. धर्म मनुष्य के स्वाभाव के अनुकूल अथवा मानवी प्रकृति का होने के कारण स्वाभाविक हैं और उसका आधार ईश्वरीय अथवा सृष्टि नियम हैं।
 मज़हब मनुष्य कृत होने से अप्राकृतिक अथवा अस्वाभाविक हैं। मज़हबों का अनेक व भिन्न भिन्न होना तथा परस्पर विरोधी होना उनके मनुष्य कृत अथवा बनावती होने का प्रमाण हैं।

4. धर्म के जो लक्षण मनु महाराज ने बतलाये हैं वह सभी मानव जाति के लिए एक समान है और कोई भी सभ्य मनुष्य उसका विरोधी नहीं हो सकता।
मज़हब अनेक हैं और केवल उसी मज़हब को मानने वालों द्वारा ही स्वीकार होते हैं। इसलिए वह सार्वजानिक और सार्वभौमिक नहीं हैं। कुछ बातें सभी मजहबों में धर्म के अंश के रूप में हैं इसलिए उन मजहबों का कुछ मान बना हुआ हैं।

5. धर्म सदाचार रूप हैं अत: धर्मात्मा होने के लिये सदाचारी होना अनिवार्य हैं। परन्तु मज़हबी अथवा पंथी होने के लिए सदाचारी होना अनिवार्य नहीं हैं। अर्थात जिस तरह तरह धर्म के साथ सदाचार का नित्य सम्बन्ध हैं
मजहब के साथ सदाचार का कोई सम्बन्ध नहीं हैं। क्यूंकि किसी भी मज़हब का अनुनायी न होने पर भी कोई भी व्यक्ति धर्मात्मा (सदाचारी) बन सकता हैं .जैसे आचार सम्पन्न होने पर भी कोई भी मनुष्य उस वक्त तक मज़हबी अथवा पन्थाई नहीं बन सकता जब तक उस मज़हब के मंतव्यों पर ईमान अथवा विश्वास नहीं लाता। जैसे की कोई कितना ही सच्चा ईश्वर उपासक और उच्च कोटि का सदाचारी क्यूँ न हो वह जब तक हज़रात ईसा और बाइबिल अथवा हजरत मोहम्मद और कुरान शरीफ पर ईमान नहीं लाता तब तक ईसाई अथवा मुस्लमान नहीं बन सकता।

6. धर्म ही मनुष्य को मनुष्य बनाता हैं अथवा धर्म अर्थात धार्मिक गुणों और कर्मों के धारण करने से ही मनुष्य मनुष्यत्व को प्राप्त करके मनुष्य कहलाने का अधिकारी बनता हैं। दूसरे शब्दों में धर्म और मनुष्यत्व पर्याय हैं। क्यूंकि धर्म को धारण करना ही मनुष्यत्व हैं। कहा भी गया है- खाना,पीना,सोना,संतान उत्पन्न करना जैसे कर्म मनुष्यों और पशुयों के एक समान हैं। केवल धर्म ही मनुष्यों में विशेष हैं जोकि मनुष्य को मनुष्य बनाता हैं। धर्म से हीन मनुष्य पशु के समान हैं.

मज़हब मनुष्य को केवल पन्थाई या मज़हबी और अन्धविश्वासी बनाता हैं। दूसरे शब्दों में मज़हब अथवा पंथ पर ईमान लेन से मनुष्य उस मज़हब का अनुनायी अथवा ईसाई अथवा मुस्लमान बनता हैं नाकि  सदाचारी या धर्मात्मा बनता हैं।

7. धर्म मनुष्य को ईश्वर से सीधा सम्बन्ध जोड़ता हैं और मोक्ष प्राप्ति निमित धर्मात्मा अथवा सदाचारी बनना अनिवार्य बतलाता हैं .

मज़हब मुक्ति के लिए व्यक्ति को पन्थाई अथवा मज़हबी बनना अनिवार्य बतलाता हैं। और मुक्ति के लिए सदाचार से ज्यादा आवश्यक उस मज़हब की मान्यताओं का पालन बतलाता हैं.जैसे अल्लाह और मुहम्मद साहिब को उनके अंतिम पैगम्बर मानने वाले जन्नत जायेगे चाहे वे कितने भी व्यभिचारी अथवा पापी हो जबकि गैर मुसलमान चाहे कितना भी धर्मात्मा अथवा सदाचारी क्यूँ न हो वह दोज़ख अर्थात नर्क की आग में अवश्य जलेगा क्यूंकि वह कुरान के ईश्वर अल्लाह और रसूल पर अपना विश्वासनहीं लाया हैं।

8. धर्म में बाहर के चिन्हों का कोई स्थान नहीं हैं क्यूंकि धर्म लिंगात्मक नहीं हैं -न लिंगम धर्मकारणं अर्थात लिंग (बाहरी चिन्ह) धर्म का कारण नहीं हैं.
मज़हब के लिए बाहरी चिन्हों का रखना अनिवार्य हैं जैसे एक मुस्लमान के लिए जालीदार टोपी और दाड़ी रखना , लिंग की  खतना अनिवार्य हैं .

9. धर्म मनुष्य को पुरुषार्थी बनाता हैं क्यूंकि वह ज्ञानपूर्वक सत्य आचरण से ही अभ्युदय और मोक्ष प्राप्ति की शिक्षा देता हैं परन्तु मज़हब मनुष्य को आलस्य का पाठ सिखाता हैं क्यूंकि मज़हब के मंतव्यों मात्र को मानने भर से ही मुक्ति का होना उसमें सिखाया जाता हैं।

10. धर्म मनुष्य को ईश्वर से सीधा सम्बन्ध जोड़कर मनुष्य को स्वतंत्र और आत्म स्वालंबी बनाता हैं क्यूंकि वह ईश्वर और मनुष्य के बीच में किसभी मध्यस्थ या एजेंट की आवश्यकता नहीं बताता .

मज़हब मनुष्य को परतंत्र और दूसरों पर आश्रित बनाता हैं क्यूंकि वह मज़हब के प्रवर्तक की सिफारिश के बिना मुक्ति का मिलना नहीं मानता.जैसे  ईसा   और मुहम्मद  पर ईमान  लाये  बिना  कोई  सच्चा  ईसाई  और  मुसलमान     नहीं   माना जाएगा .

11. धर्म दूसरों के हितों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति तक देना सिखाता हैं जबकि

मज़हब अपने हित के लिए अन्य मनुष्यों और पशुयों की प्राण हरने के लिए हिंसा रुपी क़ुरबानी का सन्देश देता हैं .और  जिहाद के  बहाने निर्दोषों  की  हत्या  को धार्मिक  कर्तव्य    मानता  है   .

12. धर्म मनुष्य को सभी प्राणी मात्र से प्रेम करना सिखाता हैं .और   सात्विक  निरामिष   भोजन  करने   की  शिक्षा  देता   है

 मज़हब मनुष्य को प्राणियों का माँसाहार और दूसरे मज़हब वालों से द्वेष सिखाता हैं.

13. धर्म मनुष्य जाति को मनुष्यत्व के नाते से एक प्रकार के सार्वजानिक आचारों और विचारों द्वारा एक केंद्र पर केन्द्रित करके भेदभाव और विरोध को मिटाता हैं तथा एकता का पाठ पढ़ाता हैं .

मज़हब अपने भिन्न भिन्न मंतव्यों और कर्तव्यों के कारण अपने पृथक पृथक जत्थे बनाकर भेदभाव और विरोध को बढ़ाते और एकता को मिटाते हैं.और   लोगों  को  बलपूर्वक   अपने  विचार  थोपने  पर  विश्वास  रखता  है   , और  नहीं  मानने  वालों  की  हत्या   करना  उचित  मानता  है .

14. धर्म एक मात्र ईश्वर की पूजा बतलाता हैं .

 मज़हब ईश्वर से भिन्न मत प्रवर्तक/गुरु/मनुष्य.रसूल , फरिश्ते ,आदि की पूजा बतलाकर अन्धविश्वास फैलाते हैं .

  धर्म और मज़हब के अंतर को ठीक प्रकार से समझ लेने पर मनुष्य अपने चिंतन मनन से आसानी से यह स्वीकार करके के श्रेष्ठ कल्याणकारी कार्यों को करने में पुरुषार्थ करना धर्म कहलाता हैं इसलिए उसके पालन में सभी का कल्याण हैं .हमें    विश्वास है  कि     धर्म  और  मजहब  का  अंतर  समझ   कर  लोग  ईसाइयत  और  इस्लाम    को  धर्म  समझने  की  भूल  नहीं  करेंगे   , और  ढोंगी  पाखंडी   बाबाओं   गुरुओं   के  चलाये  पन्थो    , सम्प्रदायों   को   धर्म  नहीं   मानेंगे

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

मुसलमानों को हिन्दू बनाना इस्लामी कार्य है

सारी  दुनिया   जान   चुकी   है   कि मुसलमान  गैर मुस्लिमों   का  धर्म  परिवर्तन  करा कर  सारी   दुनिया  पर   इस्लामी हुकूमत  कायम  करना   चाहते हैं  . और अपने   इस नापाक   मंसूबे   को  कामयाब   करने के लिए मुसलमान   पहले तो  इस्लाम  की  तारीफें   करते है  , और  दूसरों  के  धर्म  में कमियां    निकालते  रहते   है  , लेकिन  जब  उनके  झांसे   ने  नहीं  फसते  और इस्लाम  कबूल  नहीं  करते तो  मुसलमान् अपना  असली  खूंखार   और अत्याचारी    स्वभाव   दिखाने   लगते हैं  , और   गैर मुस्लिमों   का  धर्म  परिवर्तन  कराने के लिए  हत्या  ,  बलात्कार  ,   आतंक जैसे  जघन्य  कुकर्म  करने  लगते  हैं   , और  जब  इन इस्लाम   के दलालों  से   पूछ जाता   है  क़ि  तुन  लोगों  का जबरन  धर्म  परिवर्तन   करा   कर  मुसलमान   क्यों   बनाते  हो ?तो   यह  धूर्त  कहते हैं  कि " दुनिया  में पैदा  होने वाला  हरेक  बच्चा  मुसलमान   ही  होता  है  .  लेकिन   आप  लोग  ही  उसे  हिन्दू   ,  बौद्ध  ,जैन   या  सिख   बना   देते    हो  . जो  अल्लाह   की   मर्जी  के  खिलाफ  है   . हम तो  लोगों  को उनके  पैदायशी  धर्म  यानि  इस्लाम  में शामिल  करके अल्लाह  के  हुक्म   का  पालन  कर  रहे   हैं  . ,यही   बात जाकिर  नायक   जैसे इस्लामी  प्रचारक  ने  कही  है ,
देखिये विडिओ -Dr Zakir Naik - Every Child is born as a Muslim

https://www.youtube.com/watch?v=zLLsqYdRlk0

1-हदीस  के  अर्थ  में  चालाकी

इस्लाम   के  एजेंट   धूर्त मुल्ले हमेशा   दावा  करते  रहते हैं  कि  दुनिया   में  जो  भी  बच्चा  पैदा  होता   है  , अल्लाह   उसे  मुसलमान बना कर   ही  पीड़ा करता है  , ताकि   वह   बालक  सिर्फ  अल्लाह  की इबादत    किया  करे  , परन्तु माता   पिता   बच्चे  को यहूदी   ,ईसाई  या  अग्नि  पूजक     बना   देते   हैं  . मुल्ले  इस  बात   को  साबित   करने के लिए  इस   हदीस   का  हवाला   देते  हैं .और   बड़ी   चालाकी  से  इस  हदीस   का  यह  अर्थ     बताते   हैं  ,
"अबु हुरैरा  ने  कहा  कि  रसूल  ने  कहा   , हरेक  बच्चा सच्चे  धर्म   के साथ  पैदा   होता  है  , )अर्थात  केवल  अल्लाह की  ही इबादत  करना )लेकिन  अभिभावक  उसका  धर्म  परिवर्तन   करके यहूदी  , ईसाई   या  अग्नि  पूजक   बना  देते   हैं

Abu Huraira, narrated that the Prophet . said, "Every child is born with a true faith (i.e. to worship none but Allah Alone) but his parents convert him to Judaism or to Christianity or to Magainism,

"‏"‏ مَا مِنْ مَوْلُودٍ إِلاَّ يُولَدُ عَلَى الْفِطْرَةِ، فَأَبَوَاهُ يُهَوِّدَانِهِ أَوْ يُنَصِّرَانِهِ أَوْ يُمَجِّسَانِهِ،

सही   बुखारी  -जिल्द2 किताब 23  हदीस 467

2-पूरी हदीस और  असली  अर्थ
यहाँ  पर  अरबी  में पूरी  हदीस  दी  जा  रही   है  , इसमे  इस्लाम  या सच्चा  धर्म (a true religion  )  शब्द  नहीं  है  . बल्कि    फितरत  शब्द  दिया  गया   है  . मुसलमान  लोगों  को  धोखा  देने के लिए  इसका  अर्थ  इस्लाम  बता   देते  हैं  .

Here is the text of the Hadeeth, see if you can find the  word Islam in it anywhere. Its not in the Hadeeth '



حَدَّثَنَا عَبْدَانُ، أَخْبَرَنَا عَبْدُ اللَّهِ، أَخْبَرَنَا يُونُسُ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، أَخْبَرَنِي أَبُو سَلَمَةَ بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، أَنَّ أَبَا هُرَيْرَةَ ـ رضى الله عنه ـ قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ مَا مِنْ مَوْلُودٍ إِلاَّ يُولَدُ عَلَى الْفِطْرَةِ، فَأَبَوَاهُ يُهَوِّدَانِهِ أَوْ يُنَصِّرَانِهِ أَوْ يُمَجِّسَانِهِ، كَمَا تُنْتَجُ الْبَهِيمَةُ بَهِيمَةً جَمْعَاءَ، هَلْ تُحِسُّونَ فِيهَا مِنْ جَدْعَاءَ ‏"‏‏.‏ ثُمَّ يَقُولُ أَبُو هُرَيْرَةَ ـ رضى الله عنه ‏{‏فِطْرَةَ اللَّهِ الَّتِي فَطَرَ النَّاسَ عَلَيْهَا لاَ تَبْدِيلَ لِخَلْقِ اللَّهِ ذَلِكَ الدِّينُ الْقَيِّمُ‏}

पहले  दी  गयी   हदीस  का  मूल  अरबी  पाठ     इस प्रकार   है  ,इसमे  सच्चे  धर्म  (  इस्लाम  )  का    कहीं  भी  उल्लेख   नहीं  है  , बल्कि " अल  फितरत -  الْفِطْرَةِ"  शब्द    दिया  गया   है  . मुल्लों   ने  बड़ी  मक्कारी  से  इस शब्द   का  अर्थ "  सच्चा  धर्म (  )   का  मतलब इस्लाम      बना  दिया   है .इस   हदीस  में  अरबी    का  शब्द " फितरत  -  الْفِطْرَةِ   "   आया   है   ,  जिसका   अर्थ ( सच्चा  धर्म  ( a true faith   )      होता   है  .  लेकिन  मक्कार मुल्ले  लोगों  कीआँखों   में धूल   डाल  कर  इसका     तात्पर्य   इस्लाम बता देते   है  . और    कहते हैं  की  अल्लाह  हर   बच्चे   को  मुसलमान   के रूप में  पैदा  करता   है , इसलिए किसी  गैर   मुस्लिम  को जबरन , प्रलोभन  देकर  ,  या   छल   कर  मुस्लमान   बनाने में   कोई अपराध   नहीं  है   .


3-फितरत   क्या  है ?
 हदीस  में प्रयुक्त  अरबी  शब्द " फितरत - فطرة"   का  अर्थ   लोगों  को  धोखा  देने के लिए  जाकिर  नायक  जैसे  चालाक मुल्ले   इस्लाम  बता देते हैं।  लेकिन  वास्तव  में   अरबी   शब्दकोश  में फितरत  के कई   अर्थ  मिल  जाते  हैं  . उन में से कुछ  के  अंगरेजी  और  हिंदी  अर्थ  इस  प्रकार  हैं  ,
1-सलाह -صلاح "-righteousness-नीतिपरायणता

2-बिदानियाः -   بدائية "-Eternal-सनातन

3-अल तबीयतुल    बशरियाः  अन्नफियाह --الطبيعة البشرية النقية "-pure human nature-शुद्ध मानव प्रकृति

4-इजलाल -إجلال"-solemnity-संस्कारयुक्तता

यहां  पर  फितरत  शब्द  के  जितने  भी  अर्थ  दिए गएँ  है  ,  उन्हें  ध्यान   से  पढने से    स्पष्ट  होता  है  , फितरत के  जितने भी  अर्थ  है  वह सनातन  प्राचीन  वैदिक धर्म   में   मौजूद   हैं  .  इस्लाम   में  नहीं  . इसका  मतलब  है  कि पैदा होने  वाला  हरेक  बच्चा  हिन्दू  होता  है।   मुसलमान   नहीं !

4-फितरत का  परिवर्तन नहीं  हो   सकता

यह   बात  सिद्ध  हो  चुकी  है  कि हरेक  बच्चा  जन्म  से  हिन्दू  होता   है  और   कुरान  में  कहा  गया  है  ,

" अल्लाह  ने जो भी  बनाया  बढ़िया    बनाया  " सूरा -अस  सजदा32:7

"who made all things good "32:7.और  अल्लाह  की  रचना    में   परिवर्तन  नहीं   हो  सकता


"अबू  हुरैरा  ने  कहा  कि रसूल   ने  कहा  है  ,कि कोई   भी  बच्चा    फितरत  के बिना  पैदा  नहीं होता  "फिर  रसूल  बताने लगे कि अल्लाह  ने जिस फितरत    के  अनुसार  मनुष्य  को  बनाया   है  , उसमे   परिवर्तन    नहीं   हो   सकता  . यही   सच्चा  धर्म  है "

Abu Huraira reported Allah's Messenger  ,saying:
No child is born but upon Fitra. He then said. Recite: The nature made by Allah in which He created man, there is no altering of Allah's nature; that is the right religion.

"‏"‏ مَا مِنْ مَوْلُودٍ إِلاَّ يُولَدُ عَلَى الْفِطْرَةِ ‏"‏ ‏.‏ ثُمَّ يَقُولُ اقْرَءُوا

सही  मुस्लिम - किताब 33  हदीस 6425

कुरान   में   साफ   कहा  है  कि  अल्लाह मनुष्य  की   रचना   हर  प्रकार  से बढ़िया   बनायीं   है  , उसमे बदलाव करना मनुष्य की "  फितरत -  " प्राकृतिक  रचना  के   विरुद्ध   है  . अर्थात   अल्लाह   ने  मनुष्य   की  जैसी  फितरत   बनायीं   है  ,उसे  वैसा   ही  रहने  देना  चाहिए  . (e.g-verses in the Qur'an . 32:6-7, 31:20), stating that Allah created humans perfectly)

इसलिए  बच्चों  की  खतना  करना  और  हिन्दुओं  को     मुसलमान  बनाना  अल्लाह  की  बनायीं  फितरत   में परिवर्तन  करना  माना जाएगा।  और   जो भी  मुस्लमान  ऐसा  करेगा  या  करने  का  प्रयास  करेगा   वह  अल्लाह का  विरोधी  और   काफ़िर   है  . लेकिन    मुसलमान  को  हिन्दू  बना  लेने पर अल्लाह खुश  होगा   , क्योंकि  इस  से  अल्लाह  की  बनायी  फितरत में  परिवर्तन  नहीं  होता  .

radical changes to one's body.condemned as unlawful changes to fitra.


इसका मतलब  है  ,जितने अधिक मुसलमानों  को हिन्दू  बनाया  जाएगा।  अल्लाह  उतना  ही खुश  होगा


मंगलवार, 25 नवंबर 2014

कुरान ने सूरा फातिहा की पोल खोली !

मुसलमानों का  दावा है कि कुरान अल्लाह की  किताब   है  ,  और उसका एक एक  शब्द  अल्लाह का  वचन   है  . मौजूदा   कुरान  में   छोटे बड़े कुल 114 अध्याय (Chapters)  हैं  ,जिनको  अरबी   में  सूरा   कहा   जाता   है  , और  हरेक  सूरा में जो  वाक्य   होते   हैं  ,उनको  आयत (Verses )  कहा   जाता है   . कुरान  की   पहली  सूरा    का  नाम सूरा "अल फातिहा "   है  . इसमे कुल  7  आयतें   है   . जिनमे  अल्लाह के गुणों , शक्तियों और  महानता  का  वर्णन   करते  हुए अल्लाह की   तारीफ़  की   गयी   है  . और  उस  से दुआ  की  गयी   है  . सूरा  फातिहा  को   हर  नमाज   में पढ़ना  अनिवार्य   है   . इसकी   पहली   5  आयतें  इस प्रकार  हैं ,जो अरबी  से उर्दू  में अनुवादित  की  हैं ,

2.सब तारीफें  अल्लाह  के लिए  जो जहानों (Worlds)   का  मालिक   है
3.बड़ा  मेहरबान  और निहायत  रहमदिल .
4.जजा  के  दिन ( न्याय दिवस ) का  मालिक .
5.हम तेरी  ही  इबादत  करते  हैं  , और तुझी  से  मदद  माँगते  हैं .
6.हमें  सीधा  रास्ता  दिखा .
7.उन  लोगों   का  रास्ता  जिन  पर तूने इनाम   किया ,न  कि जिन पर तेरा  गजब  नाजिल  हुआ और न  वह जो  गुमराह  हुए .

सूरा  फातिहा  की  इन  पहली 5   आयतों  को पढ़  कर यही  सवाल  पैदा  होता  है ,कि अगर  यह  आयतें   सचमुच  अल्लाह  के वचन  हैं , और किसी  और की  रचना   नहीं  तो , अल्लाह  को अपने मुंह  से अपनी  तारीफ़ करने  की  क्या  जरूरत पड़   गयी?
इसका  असली  कारण  यह  है कि  सूरा  फातिहा  कुरान  की  पहली  सूरा   नहीं  है , इसे बाद  में उस   समय  पहला  कर दिया  गया   जब  कुरान   की  ऐसी  आयतें   बन  चुकी   थीं   जिनमे अल्लाह के बारे में सूरा  फातिहा  के  विपरीत  बातें दी  गयी थीं  . उदाहरण के लिए पहले सूरा  फातिहा की  एक एक  आयत  लेते हैं  ,  और  कुरान  से  उसके  विपरीत  आयत  की  तुलना  देखते   हैं   .
1-जगत का  मालिक नहीं है 
सूरा  फातिहा  की आयत 2 में   कहा है   "जो जहानों (Worlds)   का  मालिक   है  "यह बात  भी  सरासर  झूठ  है  क्योंकि  अल्लाह  ने मुसलमानों   के  प्राण  खरीद   लिए  है   ,जैसा कि  की इस आयत में  कहा  है   ,

" बेशक  अल्लाह   ने  मुसलमानों   के प्राण  और  माल  इसलिए  खरीद  लिए  हैं  ,कि  वह जन्नत के लिए  अल्लाह के  रास्ते पर लड़ते हैं  ,  और मारे  जाते हैं  और  मारते  हैं   " सूरा -तौबा  9:111

और  सामान्य  नियम   के अनुसार किसी वस्तु  को  खरीदने  वाला   ही  उसका  मालिक  मना  जाता   है ,इसलिए  अल्लाह सिर्फ   मुसलमानों   का  मालिक  है ,अल्लाह  हिन्दुओं  और  अन्य  धर्म   के लोगों   का  मालिक   नहीं  हो सकता , क्योंकि  अल्लाह   न तो इनको  खरीद सकता है  . और न यह बिकाऊ  हैं .और  सामान्य  नियम   के अनुसार किसी वस्तु  को  खरीदने  वाला   ही  उसका  मालिक  मना  जाता   है ,इसलिए  अल्लाह सिर्फ   मुसलमानों   का  मालिक  है ,अल्लाह  हिन्दुओं  और  अन्य  धर्म   के लोगों   का  मालिक   नहीं  हो सकता , क्योंकि  अल्लाह   न तो इनको  खरीद सकता है  .  और न यह बिकाऊ  हैं (Allah  is  Lord of  muslims only)

2- अल्लाह  दयालु और कृपालु  नहीं है 

सूरा  फातिहा  की  आयत  3  में   कहा   है  "बड़ा  मेहरबान  और निहायत  रहमदिल "लेकिन   जो अल्लाह सभी  गैर  मुस्लिमों  को  दुश्मन  मानता  हो  . उनसे नफ़रत करता   हो  , और  उन  पर धिक्कार   करता  हो , और  उनकी जिंदगी दुखदायी  बनाने  का  इरादा रखता  हो  ,  वह  कभी  भी दयालु  नहीं  हो  सकता  है जैसा कि  कुरान की यह  आयतें  बताती   हैं  ,
"अल्लाह  काफिरों   का   दुश्मन  है  " सूरा - बकरा 2:98

(Allah is an enemy to the disbelievers. 2:98)

"अल्लाह  काफिरों   को धिक्कार करता   है "सूरा  -बकरा 2:89

(The curse of Allah is on disbelievers. 2:89)

"अल्लाह गैर मुस्लिमों   की जिंदगी दुखदायी ( miserable )  बना   देगा " सूरा -बकरा 2:114

(Allah will make disbelievers' lives miserable in this world . 2:114

और  अगर  सचमुच   अल्लाह  दयालु  और  रहमदिल होता  तो  , उसके अनुयायी  जिहादी   इतने क्रूर  और  बेरहम  नहीं  होते  ,  जो बच्चो  और महिलाओंको  क़त्ल करने को  अल्लाह  का हुक्म  मानते   हैं  

3-न्याय  दिवस का स्वामी नहीं है 
सूरा  फातिहा  की  आयत  4  में  कहा है  "जजा  के  दिन ( न्याय दिवस ) का  मालिक ".लेकिन कुरान  की इन  आयतों  और  हदीस  के अनुसार अल्लाह  न्याय  दिवस   का  स्वामी   नहीं   है  , उसकी  जगह  मुहम्मद  न्याय करेंगे

" हे मुहम्मद  ,करीब   है   कि तुम्हारा रब  तुम्हें उच्च पद  पर  नियुक्त   कर दे  " सूरा - बनी इस्राइल 17:79

"your Lord will raise you to a praiseworthy station.” [Isra’a 17: 79]


कुरान  की  इस आयत  की  व्याख्या  में मुस्लिम  विद्वान "अबुल  सना शिहाबुद्दिन सय्यद   महमूद इब्न अल  हुसैनी अल अलूसी अल  बगदादी  -أبو الثناء شهاب الدين سيد محمود بن عبد الله بن محمود الحسيني الآلوسي البغدادي‎‎ "अपनी किताब "रूहुल  मायनी  -روح المعاني " में  कहते हैं ,कि न्याय   के  दिन  अल्लाह अपना पूरा  अधिकार  अपने  हबीब   मुहम्मद  को  सौंप  देंगे  , और वही  अपनी इच्छा  के अनुसार  लोगों   के कर्मों   का  फैसला  करेंगे  .
और  लगभग   यही  बात  इस आयत में भी  कही  गयी   है

" उस  दिन   किसी   का  हस्तक्षेप स्वीकार  नहीं  होगा ,सिवाय  उसके  जिसे  अल्लाह  ने  अनुज्ञा   दी   हो ,और उसकी सिफारिश मानी  जायेगी "सूरा -ता  हां 20:109

On that Day shall no intercession avail except for those for whom permission has been granted by (Allah)20:109

अल्लाह  न्याय   दिवस   का स्वामी  नहीं  है  , बल्कि  मुहम्मद भी अल्लाह का सहभागी   है  , यह बात इस  हदीस   से सिद्ध    हो जाती  है  ,
"अब्दुल्लाह  बिन उमर  ने कहा  , जब अल्लाह क़यामत   के  दिन   लोगों के  कर्मों  का  फैसला  करेगा  तो  , मुहम्मद  मध्यस्थता  करेंगे  . अल्लाह उनको  मध्यस्थता करने  की सुविधा  प्रदान   कर  देगा   "

Narrated 'Abdullah bin 'Umar:"Muhammad will intercede with Allah to judge amongst the people, and then Allah will exalt him to Maqam Mahmud (the privilege of intercession,

सही बुखारी - जिल्द 2  किताब 24  हदीस 553

इन  तथ्यों   से  यही सिद्ध  होता  है  कि यातो  अल्लाह में  खुद  सही  न्याय करने की क्षमता  नहीं  है  , या मुहम्मद ही  अल्लाह बन कर लोगों  को को भ्रमित   करते रहते थे  
4-रास्ता  भटकाने  वाला 

सूरा फातिहा   की  आयत  6  में दुआ मांगी  गयी   है  कि "हमें  सीधा  रास्ता  दिखा "लेकिन  अल्लाह  लोगों  को सीधा  रास्ता दिखने की  जगह  रास्ते से  भटका   देता  है  ,जैसा की कुरान की इस  आयत में  कहा है   ,

"फिर अल्लाह   जिसको  चाहे  भटका   देता  है  " सूरा -इबराहीम  14:4

(Then Allah misleads WHOM HE WILLS )


और  यदि  अल्लाह   सचमुच मुसलमानों   को  सीधा  रास्ता  दिखाने  वाला होता  तो  , तो   अधिकांश  मुसलमान  आतंकवादी नहीं  बन  गए होते  . जबकि अन्य  धर्म   के  लोग अल्लाह  की मेहरबानी   के बिना   ही  सीधे   रास्ते  पर   चल रहे   हैं


इस  प्रकार  सूरा  फातिहा  में  अल्लाह  की  तारीफ़  में  जो  7  आयतें   दी   गयी   हैं  , उसके विरुद्ध  खुद  अल्लाह की  किताब   ने  ऎसी  चार  आयतें  पेश   कर दी   हैं जो  अल्लाह   की  महानता   का  भंडा  फोड़ने के   लिए  पर्याप्त   हैं   . इसी   लिए सूरा  फातिहा  को पहले  कर दिया  गया था. ताकि    भोले भले लोग  अल्लाह   की  ऐसी  तारीफ़  से पहले तो  प्रभावित  होकर  इस्लाम के चंगुल   में  फंस   जाएँ  .  फिर उनको   बाकि  कुरआन  पढ़ा कर  आसानी से जिहादी  बनाया   जा  सके   ,