मंगलवार, 19 जून 2012

अनपढ़ रसूल को लिखना पड़ा !


इस्लाम असल में अरबी साम्राज्यवादी नीतियों का नाम है . जिसे मुहम्मद साहब ने प्रारंभ किया था .वह किसी न किसी तरह से सम्पूर्ण विश्व पर हुकूमत करना चाहते थे .लेकिन दूसरे क्षेत्रों को जीतने के लिए सेना की जरुरत होती है . जो उनके पास नहीं थी . इसलिए मुहम्मद ने ढोंग और पाखंड का सहारा लिया ..जैसे पहले तो खुद को अल्लाह का रसूल साबित करने के लिए यह अफवाह फैला दी कि मैं तो अनपढ़ हूँ . और जो भी मैं कुरान के माध्यम से कहता हूँ वह अल्लाह के वचन हैं ..जैसे पहले तो खुद को अल्लाह का रसूल साबित करने के लिए यह अफवाह फैला दी कि मैं तो अनपढ़ हूँ . और जो भी मैं कुरान के माध्यम से कहता हूँ वह अल्लाह के वचन हैं 


1-अल्लाह ने अनपढ़ ही बनाया 
कुरान-"और उसी अल्लाह ने अनपढ़ लोगों के बीच में एक अनपढ़ रसूल को उठाया जो हमारी आयतें सुनाता है "सूरा - जुमुआ 62 :2 
"जो लोग उस अनपढ़ रसूल के पीछे चलते हैं , जो न लिख सकता है और न पढ़ सकता है , तो पायेंगे कि उसकी बातें तौरैत और इंजील से प्रमाणित होती हैं "सूरा -अल आराफ 7 :157 
"हे रसूल न तुम कोई किताब लिख सकते हो और न पढ़ सकते हो . यदि ऐसा होता तो लोग तुम पर शक करते "सूरा -अनकबूत 29 :49 
 के अनुसार मुहम्मद साहब जीवन भर अनपढ़ ही बने रहे ,जैसा कि इन आयतों में दिया गया है ,
लेकिन मुसलमान रसूल के अनपढ़ होने को उनमे कमी मानने की जगह उनका चमत्कार बताते हैं .नहीं तो उन पर यह आरोप लग जाता की कुरान उन्ही ने लिखी होगी 
2-रसूल मक्का से भागे 
उन दिनों अरब के लोग अपने ऊंट काफिले वालों को किराये देते थे .जिन से सामान ढोया जाता था .और मक्का यमन से सीरिया जाने वाले मुख्य व्यापारिक मार्ग में पड़ता था .लेकिन कुरान की जिहादी तालीम के कारण मुसलमान बीच में ही काफिले लूट लेते थे .इस से अरबों की कमाई बंद हो गयी थी .मुहम्मद साहब का कबीला कुरैश भी ऊंट किराये पर चलाता था .इस लिए वह लोग महम्मद के जानी दुश्मन हो गए .इस लिए अपनी जान बचाने के लिए सितम्बर सन 622 मुहम्मद साहब अपनी औरतों ,रखैलों और साथियों के साथ मक्का से मदीना भाग गए . और उसी दिन से हिजरी सन शुरू हो गया .में अरबी  इसे हिजरत यानी पलायन कहा जाता है .
3-हुदैबिया की संधि 
मदीना पहुंच कर भी मुहम्मद साहब कुरान की आयतें सुना कर मुसलमानों जिहाद के लिए प्रेरित करते रहे . और जिहादी वहां और आस पास शहरों में लूट मार करते रहे .और यह खबरें मक्का वालों को पता हो जाती थीं .मक्का के लोग मुहम्मद साहब का क्रूर स्वभाव जानते थे .और उनकी बात पर विश्वास नहीं करते थे .तभी छः साल तक मदीना में रहने के बाद इस्लामी महीने जिल्काद में मुहम्मद साहब ने "(उमरा"( काबा की यात्रा ) के बहाने मक्का जाने की तयारी कर ली .उनके साथ मदीना के लोग भी शामिल हो गए .यह खबर मिलते ही मक्का के लोग मुहम्मद साहब की हत्या योजना बनाने लगे .और घोषणा कर दी जो भी मुहम्मद की हत्या करेगा उसे भारी इमाम दिया जायेगा .और जब मुहम्मद साहब को यह सूचना मिली तो वह बीच रास्ते में ही हुदैबिया नाम की जगह रुक गए और बहाना कर दिया की मेरी ऊंटनी ने आगे जाने से मना कर दिया है .और वहीं से अली के द्वारा कुरैश के लोगों को सन्देश भेजा कि हम युद्ध नहीं समझौता करना चाहते है .इतिहास में इस समझौते को " हुदैबिया सुलहصلح الحديبية  "(The Treaty of Hudaybiyyah )कहा जाता है .यह संधि मार्च सन 628 ई० तदनुसार जुलकाद महिना हिजरी सन 6 को मक्का के कुरैश और मुसलमानों के बीच हुआ था .कुरैश की तरफ से " सुहैल बिन अम्र "और मुसलमानों की तरफ से मुहम्मद साहब थे .पहले दौनों पक्षों की शर्तें सुनाई गयी और जिन मुद्दों पर दोनो पक्ष राजी होगये थे . उनको लिखा गया था .लिखने का काम अली को दिया गया था .यह एतिहासिक संधि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस ने मुहम्मद को लिखने पर अपने सही करने पर मजबूर कर दिया था .और उनको अपने नाम के साथ रसूल अल्लाह शब्द हटाना पड़ा था 
Sahih al-Bukhari-Vol 3  Bk 50 Hadih 891


4-सुलह की शर्तें 
इस सुलह में कुरैश की तरफ से " सुहैल बिन अम्र " और मुसलमानों की तरफ से मुहम्मद के बीच यह शर्तें तय हुई थी .1 - मुसलमान अभी उमरा किये बिना ही वापस चले जाएँ .2 . और अगले साल उम्र के लिए आयें 3 . अपने साथ हथियार नही लायें .4 .जो मक्का के निवासी हैं वह अपने साथ बाहर के लोग साथ में नही लायें 5 .गैर मुसलमानों को मक्का से बहर नहीं जाने दिया जायेगा 6 .मक्का के लोगों को गैर मुस्लिमों से व्यापर की अनुमति होगी 7 . यह संधि दस साल के लिए वैध होगी .
( यह सभी शर्तें कुरान के हिंदी अनुवाद में सूरा न . 48 अल फतह के परिचय में पेज 936 में दिया है . जिसका अनुवाद फारुख खान ने किया है . और " मकतबा अल हसनात" राम पुर से प्रकाशित किया है )
इस सुलह का उल्लेख कुरान में इस तरह किया गया है ,
" और निश्चय ही अल्लाह ईमान वालों से राजी हुआ , जब रसूल एक पेड़ के नीचे खड़े होकर कुरैश के लोगों से हाथ में हाथ मिला कर सुलह की शर्तें तय कर रहे थे " सूरा -अल फतह 48 :18 


5-डर के मारे लिख दिया 
उस समय कुरैश के लोगों ने तय कर लिया था कि यदि मुहम्मद इस संधि पर सहमत नहीं होगा तो उसे और उसके साथियों को जीवित मदीना नहीं जाने दिया जायेगा .दी गयी हदीसों में यह बात इस तरह दी गयी है .,
"अनस ने बताया की जब कुरैश के लोगों के साथ सभी सातों शर्तें तय हो गयी . तो सुहैल ने अली से कहा कि लिखने से पहले सभी शर्तें लोगों के सामने जोर से सुना दी जाएँ .और जब अली सबसे पहले " बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम " लिखने लगे तो ,सुहैल ने टोक कर कहा "हम किसी रहमान और रहीम को नहीं जानते "हम तो सिर्फ अपने ही अल्लाह को जानते है , इसलिए लिखो " बिस्मिका अल्लाहुम्मा بسمك اللهمّ"यानि हमारे अल्लाह के नाम से और अली ने यही लिख दिया .और फिर जब अंतिम पंक्ति में अली लिखना चाह कि " मुहम्मद रसूलल्लाह " की तरफ से हम इन शर्तों को मानते हैं . तो यह सुनते ही कुरैश के लोग भड़क गए , और हम कैसे मानें कि मुहम्मद रसूल है .यह तो अब्दुल्ला का लड़का है .इसलिए या तो इस कागज को फाड़ो या युद्ध के लिए तैयार हो जाओ .तब रसूल ने अली से कागज लिया और खुद लिख दिया " मिन मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह من محمد بن عبد الله  " यानि अब्दुल्लाह के बेटे मुहम्मद की तरफ से यह शर्तें स्वीकार की जाती हैं "
Muslim-Book 019, Number 4404:


इसी घटना को प्रमाणिक हदीस बुखारी में भी दूसरी तरह से दिया गया है 
"अल बरा ने कहा जब रसूल उमरा के लिए मक्का जा रहे थे , रास्ते में उनको कुरैश के लोगों ने घेर लिया . और कहा पहले जब तक तुम हमारी नहीं मानोगे , तुम्हें मक्का में नहीं घुसने देंगे 'और जब रसूल सभी शर्तें मान कर आखिरी में " रसूल अल्लाह " लिखने लगे तो कुरैश ने घोर आपत्ति जताई .तब रसूल ने कागज हाथ में लिया और खुद लिख दिया "हाजा मा मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह कद वाकिफत अलैहि هذا ما محمد بن عبد الله قد وافقت عليه"यानी यही बातें हैं , जिन पर मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह सहमत है .(This is what Muhammad bin Abdullah has agreed upon )


Sahih Bukhari-Volume 3, Book 49, Number 863 

हुदैबिया की इस सुलह ( संधि ) के बारे में जानकारी के लिए देखिये - विडियो Treaty of Hudaibiya:

http://www.youtube.com/watch?v=2765YaW-vT0&feature=related

6-मुहम्मद साहब के पत्र
मुहम्मद साहब ने अपने जीवन भर में कुल 92 पत्र और संधियाँ लिखवाई थी . और अधिकांश में हस्ताक्षर की जगह अपने नाम की मुहर लगा देते थे जिसमे लिखा होता था " मुहम्मद रसूल्लाह " लेकिन कुछ ऐसे भी पत्र और संधियाँ भी हैं , जिन पर मुहम्मद साहब ने आखिर में कुछ शब्द लिख कर अपने सही भी कर दिए थे .इसके लिए देखिये , विडियो 
Original Letters of Prophet Muhammad

http://www.youtube.com/watch?v=JB5R1a4bSUM&feature=fvst

अब इस से बड़ा और कौन सा प्रमाण हो सकता है कि मुहम्मद साहब खुद को अल्लाह का रसूल और कुरान को अल्लाह कि किताब साबित करने के लिए अनपढ़ होने का ढोंग और पाखंड करते थे .लेकिन अब हरेक व्यक्ति को पता हो जाना चाहिए कि मुहमद साहब के ढोंग क भंडा फूट चुका है .अर्थात कुरान अल्लाह की किताब नहीं है .और न मुहमद साहब अल्लाह के रसूल थे .

http://www.sunniforum.com/forum/showthread.php?54597-When-did-Prophet-(saw)-learn-to-read-and-write

20 टिप्‍पणियां:

  1. bakwas ......koi bhi bat ka sabut nhi hai ....aur jitni bat hai.....jhuthi hai .........beshak ...Rasul Allah tmam aalam ke rahamatul Alaimen the..

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  2. sb kuch bkwas h...dm h to dalil do...peeth piche kutte bhonkte h ...dm h to hm shero se ldo...beshaq mere nabi hazir h..

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  3. ये सब गलत है तुम क्या जानो ईस्लाम के बारे मे बेशक मोहम्मद .स .अ .स . हमारे रसुल है

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  4. JISNE BHI YE PAGE BANAAYA HAI WO EK NUMBER KA KUTTA HAI, ABE JIS CHEEZ BE BAARE ME TU JAANTA NAHI HAI USKO KYUNPESH KARTA HAI, TUJHE PATA BHI HAI KUTTE SAALE JIN MURTIYON KI TUM POOJA KARTE HO UNKA NA KOI PAHLE ASTITV THA AUR NA HAI, UNN SAB KA KOI BHI NISHAANI NAHI HAI JINKI TUM SAB POOJA KARTE HO, JAAHIL HO HAMESHA JAAHIL HI RAHOGE

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  9. क्या आप जानते हैं भारत का सबसे पहला और प्रभावकारी डॉन कौन था ?
    भारत में रंगदारी और हफ्ता वसूली की शुरुआत किसने की ?
    जी हाँ आप सही समझे भारत का सबसे पहला डॉन शनि देव था |
    भारत में रंगदारी और हफ्ता वसूली जैसी प्रथाओ की शुरुआत भी शनि देव और इसके गुंडों ने ही की थी और आज भी उसके गुंडे प्रत्येक शनिवार को शनि के नाम की धमकी देकर घर घर और बाजार में जाकर तेल, तिल और कपडा पैसा उगाहते हैं |
    इनके बारे में बताया जाताहै ये सूर्य देव के पुत्र हैं लेकिन इनकी माता कौन है कोई नहीं बताता है |
    इनके पिता सूर्यदेव जो सात सात घोड़ो के रथ पर सवारी करते हैं बेचारे अपने पुत्र के लिए एक घोड़े का प्रबंध भी नहीं कर सके | चलो घोडा ना सही एक टट्टू या गधा ही दिलवा देते |
    अगर इनकी व्यवस्था भी संभव नहीं थी तो कम से कम बेचारे को एक साइकिल ही दिलवा देते |
    कम से कम बेचारे को कौवे की सवारी तो नहीं करनी पड़ती |
    अब बताइए जो कौवे जितने विशाल पक्षी पर सवारी करता हो वो स्वयं कद काठी में कितना विशाल होगा इससे इनके आकार के बारे मे इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है |
    बताया जाता है इनका रंग काला है | भाई रंग तो अपने आप ही काला होगा जिसका पिता सूर्य जैसा विशाल अग्नि का गोला हो वो तो अपने आप ही काला होगा |
    बेचारा सूर्य की अग्नि से झुलसकर काला हो गया होगा | इनका स्वभाव भी बहुत क्रोधी है और क्रोध आने पर ये अपने अचूक अस्त्र साढ़े साती का प्रयोग करते हैं जिसका वार कभी भी खाली नहीं जाता है|
    इसके साढ़े साती के बारे में सुना सबने है लेकिन देखा किसी ने नहीं है | इनकी गुंडागर्दीसिर्फ भारत तक ही सीमित है और इनके गुंडे भी भारत में ही दिखाई देते है भारत से बाहर जाते ही इनकी साढ़े साती फुस्स हो जाती है |
    इनका खौफ इतना है कि अच्छे से अच्छा शूरवीर भी इनके आगे नतमस्तक हो जाता है | कहा जाता है कि ये किसी को भी अर्श से फर्श पर ला सकते है |
    जिसकी तरफ इन्होने एक बार देख भी लिया उसका तो बेडा ही गर्क हो गया |
    बताओ इतने बुरी दृष्टि वाला भी कोई देवता हो सकता है जिसकी दृष्टि भी लोग अपने ऊपर नहीं पड़ने देना चाहते हैं | जबकि सभी लोग चाहते हैं कि उनके शुभचिंतको की कृपादृष्टि हमेशा उन पर बनी रहे लेकिन इनकी से सभी बचना चाहते हैं लेकिन फिर भी ये अपने चेलो के जरिये लोगो को धमका कर सबसे ज्यादा अपना असर छोड़ने में सफल सिद्ध हुए हैं |
    लेकिन ये एक सांप्रदायिक पुरुष हैं इनकी वसूली सिर्फ हिन्दू धर्म के अनुयायियो पर ही होता है और ये उन्ही लोगो को धमकाते भी है |
    ऐन्टीना धारी खास आदमी है ईनके
    इनके आलावा किसी मुस्लिम, सिख, इसाई, जैन, पारसी बौद्ध पर इनका कोई अस्त्र शस्त्र कार्य नहीं करता है

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  10. mitro is post ko jarur padheजव पांचो पाण्डव द्रोपदी के स्वयंवर मे राजा द्रोपद के महल मे अन्य लोगो के साथ शामील होत ेहै पांचो पाण्डव द्रोपदी को देख कर मुग्ध हो जाते है।। ,
    तभी राजा द्रोपद स्वयंवर मे शामील योद्धा ओ को बताते है कि उन्होने एक प्रण लिया है, महल कि छत के बिचो बिच एक यंत्र धुम रहा है उस यंत्र मे एक मछली लटक रही है, जो भी योध्दा उस मछली की आंख मे पांच तीर एक साथ मारेगा द्रोपदी उसी के गले मे वरमाला डालेगी, लेकीन तिर चलाने की एक शर्त है कि तिर सिधे देख कर नही बल्कि वही निचे एक पानी का कूड रखा हुआ है उस कुण्ड मे मछली के प्रतीबिम्ब को देखकर मछली की आंख मे तिर चलाना है ।।
    ये सुन कर मौजुद सभी लोग बहुत सोच मे पड गये की यह कैसा नियम है,
    और खुद द्रोपदी भी सोच मे पड़ गयी की वह सोचने लही कि यह काम तो कोइ नही कर पायेगा ।।
    फिर प्रतीयोगीता आरंभ होती है इस प्रतीयोगीता मे अच्छे अच्छे योद्धाओ की हसी उड जाती है ।।
    फिर अर्जुन आते है वो पाच तीर एक साथ लेते है फिर निशाना लगा कर तीर चला देते है पांचो तीरएक साथ जाकर मछली की आंख मे लगते है और इस प्रकार अर्जुन प्रतीयोगीता जित जाते है और द्रोपदी अर्जुन के गले मे वरमाला डालदेती है ।।
    अब अर्जुन बाकी पाण्डवो के साथ द्रोपदी को लेकर एक कूटीया मे जाते है जहा उन्की माता कून्ती विश्राम कर रही होती है,
    कूटीया का दरवाजा अंदर से लगा होता है, अर्जुन बाहर से दरवाज ठोकते हुए कहता है कि मा आज मै तुम्हारे लिये एक बहुत अच्छा उपहार (द्रोपदी) लाया हु,
    तभी माता कून्ती आंदर से बिना देखे हि अर्जुन से कह देती है कि तुम पांचो भाइ उसे आपस मे बांट लो और यह कहकर कुंती दरवाजा खोल देती है, कुन्ती की आपस मे बाटने वाली बात सुनती हीपाण्डवो के चहरे पर चमक आ जाती है, जब कुन्ती बाहर आकर देख्ती है कि उपहार द्रोपदी है तो वो अर्जुन से कहती है कि मैने गलती से कह दिया था कि आपस मे बांट लो ।।
    लेकीन पांचो पाण्डव द्रोपदी की बात पकड़ लेते है और कहते है कि माता आपकी आग्या हमारे लिये सर्वोपरी है आपने इसे आपस मे बांटने को कहा है तो हम आपकी बात कैसे टाल सकते है,
    द्रोपदी के बहुत समझाने पर भी पाण्डव अपनी जीद पर अडींग रहै और फिर पाचो पाण्ड्वो का विवाह द्रोपदी से कर दिया गया ।।
    वैसे तो यह कोरी बकवास है लेकीन फिर भी इसमे निम्न सवाल पैदा होते है ।।
    1) द्रोपदी का पिता अपनी पुत्री का विवाह कर रहा था या उसे इनाम स्वरुप भेट मे दे रहा था??
    2) घुमती हुइ मछली की आंख मे तीर मारना बहुत हि कठीन है चलो मान लिया की एक अच्छे निशाने बाज के लिये यह संभव है लेकीन एक मछ्ली की आंख मे पांच तीए मारना यह असंभव है क्योकी पहली बात एक साथ पांच तीर चला पाना भी संभव नही है और मछ्ली की आंख बहुत ही छोटी होती है ।।
    उसमे मुश्कील से एक हि तीर लग सकता है ।।
    अगर पाच तीर एक साथ धनुष से चलाये भी जाये तो पाचो समानंतर चलेंगे और उनका किसी एक छोटे सेबिन्दु पर एक साथ लगना संभव नही है, इस हिसाब से पाच तीर एक साथ मछली की आंख तो क्या सिर परभी नही समा सकते है ।।
    3) जब कुन्ती ने बिना देखे गलती से द्रोपदी को आपस मे बाटने को कह दिया तो पांचो ने अपनी हवस पुरी करने के लिये मा की आग्याकरी होने का ढोंग करने लगे, और उसकी बात पकड् ली लेकीन जब कुन्ती ने बाद मे समझाया कि उसने यह गलती से कह दिया तो वो लोग एसा न करे तो उस समय मा की आग्या का पलन नही किया, अपनी हवस के लिये गलती से निकली बात को आग्या कह दिया और जब मा ने समझा कर एसा ना करने की आग्या देनी चाही तो तो उस आग्या की अवहेलना कर दि।।।
    आप लोगो को येगलत नही लगता ??
    4) और स्वयंवर के अनुसार द्रोपदी का विवाह सिर्फ अर्जुन से होना था बाकी चारो का उससे कोइमतलब नही था तो फिर द्रोपदी ने इसका विरोध क्यो नही किया ???
    5) पांचो पाण्डव तो िवधवान पुरुष थे इन्हे एसा करते शर्म नही आयी उन्होने यह नही सोचा की कलको जब द्रोपदी मा बनेगी तो बच्चे के पिता को लेकर कितना कन्फ्युजन होगा ???

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  11. पैग़म्बरे इस्लाम ( सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम ) के व्यक्तित्व के बारे में विश्व स्तरीय बुद्धिजीवी क्या कहते हैं?



    इस्लाम अकेला ऐसा धर्म है जिस में यह विशेषता पाई जाती है कि वह विभिन्न परिवर्तनों को अपने मे समो सके और ख़ुद को ज़माने के साथ ढाल सके। मैं ने हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा के धर्म के बारे में ये भविष्यवाणी की है कि उनका धर्म भविष्य में यूरोप मे स्वीकार किया जाएगा। जैसा कि आज के दौर मे इसके स्वीकार करने की शुरूआत हो चुकी है।

    इस्लाम की पैदाइश पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम) के परिश्रम के नतीजे में मानवता के इतिहास में मील के पत्थर की हैसियत रखती है। जिस मे बेशुमार सर्व व्यापी उन्नति एवं प्रगति ने इन्सान को अपने साए में ले लिया है।

    इस आसमानी धर्म का कम से कम फ़ायदा ये हुआ कि लिखने पढ़ने और इस्लामी दुनिया में विद्या के सर्व व्यापी होने को बढ़ावा मिला और इस के साथ ही ये स्पेन, जर्मनी, इंग्लैड जैसे देशों और यूरोपी हुकूमतों की तरफ़ हस्तांतरित हुआ और उसके बाद पुरी दुनिया मे चमका। इस तरह से इस आसमानी मील के पत्थर के बाद रोम, मिस्र एवं ईरान जैसी संस्कृति एवं सभ्यता के पास भी उसका कोई जवाब न था। इस वास्तविकता के इतिहासिक तथ्यों से इन्कार नही किया जा सकता और ये बे शुमार हैं। उनमें से एक तर्क उन इस्लामी उलेमा एवं विद्यावान बल्कि ग़ैर मुस्लिम और पश्चिमी विद्यावानों का बार-बार स्वीकार करना है जिस के एक नमूने का हम संक्षेप में वर्णन करेगें:

    पश्चिमी समाज के एक प्रसिद्ध विद्यावान एवं स्कालर अनादर, अपमान एवं तिरस्कार के बावजूद पैग़म्बर इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम) को न सिर्फ़ यह कि प्रथम श्रेणी के धर्म गुरु के तौर पर स्वीकार करते हैं बल्कि पूरी सच्चाई और सत्यता के साथ इस्लाम को उसकी बेशुमार विशेषताओं के साथ एक विश्वव्यापी धर्म स्वीकार करते हैं और शायद यही वजह है कि इस सच्चाई ने अपमान और तिरस्कार करने वालों के दर्द को बढ़ा दिया है और इस सच्चाई के जवाब में उन्हे बे दीनी कट्टरपन और असभ्यता के आलावा कोई और रास्ता दिखाई नही देता।

    टाल्सटवाय:

    प्रसिद्ध रूसी लेखक मुरब्बी एवं फ़ल्सफ़ए अख़लाक़ के माहिर जिस की शिक्षा और आइडियालाँजी को बड़े-बड़े राजनीतिज्ञो ने आइडियल बनाया है, वह कहते हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम)का महान व्यक्तित्व और हस्ती सम्पूर्ण सम्मान एवं सत्कार के योग्य है और उन का धर्म बुद्धी एवं विवेक के अनुकूल होने की वजह से एक दिन विश्व व्यापी हो जाएगा।

    कार्ल मार्क्स :
    उन्नीसवी शताब्दी का यह जर्मन जाती फ़लसफ़ी (दर्शन शास्त्रीय), राजनितिज्ञ एवं क्रान्तिकारी नेता पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम) के व्यक्तित्व का गहराई से बोध करने के बाद अपने विचार इस तरह व्यक्त करता है:

    मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम) ऐसे इंसान थे जो बुत पूजने वालों के बीच दृढ़ संकल्प के साथ खड़े हुए और उन्हे एकेश्वर वाद एवं तौहीद की दावत दी और उनके दिलों में बाक़ी रहने वाली रूह और आत्मा का बीज बो दिया। इसलिए उन्हे (सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम) न सिर्फ़ ये कि उच्च श्रेणी के लोगों के दल में शामिल किया जाए बल्कि वह इस बात के पात्र हैं कि उनके ईश्वरीय दूत होने को स्वीकार किया जाए और दिल की गहराइयों से कहा जाए कि वह अल्लाह के दूत (रसूल) है।

    वेलटर फ़्रान्सवी:

    यक़ीनन हज़रत मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम) उच्च श्रेणी के इंसान थे, वह एक कुशल शासक, अक़्ममंद तथा कुशल विधायक, एक इन्साफ़ पसंद शासक और सदाचारी पैग़म्बर थे, उन्होंने (सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम) जनता के सामने अपने चरित्र तथा आचरण का जो प्रदर्शन किया वह इस से ज़्यादा संभव नही था।

    पीर सीमून लाप्लास्क:

    ये अठ्ठारवीं शताब्दी के सुप्रसिद्ध अभ्यस्त ज्योतिषी और गणितिज्ञ थे, उन के विचारों ने ज्योतिष विद्या एवं गणित मे क्रान्ति ला दी, वह उन पश्चिमी रिसर्च करताओं में से हैं जिन्होंने इस्लाम धर्म के बारे मे इस तरह से अपने विचार व्यक्त किये हैं:

    हज़रत मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम)का दीन और उनके उपदेश, इंसान के समाजिक जीवन के दो नमूने हैं। इसलिए मैं इस बात को स्वीकार करता हूँ कि इस दीन का प्रकट होना और इसके अक़्ल मंदी भरे उपदेश बड़े और महत्वपूर्ण हैं।

    प्रोफ़ेसर आरनिस्ट हैकल:

    उन्नीसवी शताब्दी के सब से बड़े और प्रसिद्ध जर्मन जाति के फ़लसफ़ी का कहना है:
    SUNNIKING TEAM
    NEXT PART 2

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  12. PART 2
    इस्लाम धर्म बहुत आधुनिक होने के साथ साथ बिना किसी मिलावट और उच्च श्रेणी की तौहीदी का रखने वाला है।

    ये अंग्रेज़ लेखक एवं रिसर्च करता अपनी किताब सरमायए सुख़न में इस तरह लिखता है:

    इस्लाम अकेला ऍसा धर्म है जिस पर दुनिया के सारे शरीफ़ लोग गर्व कर सकते हैं, वह अकेला ऐसा दीन है जिसे मैंने समझा है और मैं बार बार इस बात को कहता हूँ कि वह दीन जो सृष्टि एवं उत्पत्ति के रहस्यों एवं भेदों को जानता है और तमाम चरणों में सभ्यता एवं संस्क्रति के साथ है, वह इस्लाम है।

    गोएटे:

    ये जर्मनी का सुप्रसिद्ध दानिशमंद, शायर और लेखक है जिस ने जर्मन एवं विश्व साहित्य पर गहरा असर छोड़ा है, वह अपनी किताब दीवाने शरक़ी व ग़रबी में लिखता है:

    क़ुरआने करीम नामी किताब की प्रविष्टियां हमें आकर्षित करती हैं। और आश्चर्य में डालती हैं और इस बात पर मजबूर करती हैं कि हम उसका आदर व सत्कार करें।

    जार्ज बरनार्ड शाह (1856 से 1950)

    ये शैक्सपियर के बाद इंग्लैंड का सब से बड़ा लेखक है जिस के विचारों ने धर्म, ज्ञान, अर्थ जगत, परिवार और बनर एवं कला मे श्रोताओं पर गहरी छाप छोड़ी है। जिस के विचारों ने पश्चिमी जनता के अन्दर उज्जवल सोच की भावना पैदा कर दी। वह पैग़म्बरे इस्लाम के बारे में लिखता है:

    मैं सदैव मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम)के धर्म के बारे में, उसके जीवित रहने की विशेषता की वजह से आश्चर्य में पड़ जाता हूँ और उसका सम्मान करने पर ख़ुद को मजबूर पाता हूँ, मेरी निगाह मे इस्लाम ही अकेला ऍसा धर्म है जिस मे ऐसी विशेषता पाई जाती है कि वह किसी भी परिवर्तन एवं बदलाव को स्वीकार कर सकता है और ख़ुद को ज़माने की आवश्यकताओं में ढालने की क्षमता रखता है। मैं ने मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम ) के दीन के बारे में ये भविष्यवाणी की है कि भविश्व मे यूरोप वालों को स्वीकार्य होगा जैसा कि आज इस बात की शुरूआत हो चुकी है। मेरा मानना है कि अगर इस्लाम के पैग़म्बर जैसा कोई शासक सारे ब्रह्माण्ड शासन करे तो इस दुनिया की मुश्किलात एवं समस्याओं का निपटारा करने में कामयाब हो जाएगा कि इंसान संधि एवं सौभाग्य तक पहुंच जाएगा जिस की उसे गंभीर आवश्यकता है।
    PART 3 NEXT

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  13. PART 3

    एडवर्ड गेबिन:

    ये अठ्ठारहवी शताब्दी का इंग्लैंड (England) का सब से बड़ा लेखक है जिस ने रोम के साम्राज्य की बरबादी का प्रसिद्ध इतिहास लिखा है। वह क़ुरआन मजीद के बारे में लिखता हैं:

    अटलस महासागर से लेकर हिन्दुस्तान मे मौजूद गंगा नदी के तट तक क़ुरआन मजीद न सिर्फ़ फ़िक़्ही क़ानून के तौर पर स्वीकार किया जाता है बल्कि वह देशों के बुनियादी क़ानून (संविधान) जिस में फ़ैसले एवं अदालत, नागरिक्ता प्रणाली, सज़ा के क़ानून से लेकर वित्तीय मामलों तक सब कुछ पाया जाता है। और ये सब की सब चीज़ें एक स्थिर क़ानून के तहत अंजाम पाती हैं और ये सब ख़ुदाई हुकूमत की जलवा गरी है। दूसरे शब्दों में क़ुरआन मजीद मुसलमानो के लिए एक सामान्य नियम और संविधान की हैसियत रखता है जिस में धर्म, समाज, नागरिकता प्रणाली, सेना, अदालत, जुर्म, और सज़ा के तमाम क़ानून और इसी तरह से इंसान की दैनिक एकाकी एवं समाजी जीवन से लेकर धार्मिक कार्यों तक जिस में तज़किय ए नफ़्स (आत्मा को बुराईयो एवं गुनाहो से पाक करना) से लेकर स्वास्थ के सिद्धांत एकाकी अधिकारों से समाजिक अधिकारों तक और नैतिकता से लेकर अपराध तक, इस दुनिया के कष्ट एवं कर्म दंडो से लेकर उस दुनिया की यातनाएं एवं कर्म दंड सब को शामिल है

    प्रोफ़ेसर वेल ड्रान (1885 से 1981)

    ये अमरीका का प्रसिद्ध लेखक एवं साहित्यकार है जिस की किताबों का वर्तमान मे लाखों लोग अध्ययन करते हैं। वह पैग़म्बरे इस्लाम ( सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम ) के व्यक्तित्व के बारे में इस तरह से अपने विचार व्यक्त करता है:

    अगर इस सम्मानित व्यक्ति का आम जनता पर होने वाले असर की गणना करें तो यक़ीनन हम को कहना पड़ता है कि हज़रत मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम) मानव इतिहास के सबसे ज़्यादा सम्मानित व्यक्तियों में से हैं। वह चाहते थे कि इस क़ौम के शैक्षिक एवं नैतिक स्तर को, जो गर्मी की त्रीवता और रेगिस्तान के सूखे की वजह से ख़ौफ़ एवं डर के अंधेरे में डूबे हुए थे, उठाएं और उन्हें इस सिलसिले में जो तौफ़ीक़ मिली वह वह विश्व के गुज़िश्ता तमाम सुधारकों से ज़्यादा थी। मुश्किल से ही किसी को उन के दल में खड़ा किया जा सकता है जिस ने अपनी सारी इच्छाएं धर्म को समर्पित कर दीं, इसलिए कि वह इस धर्म को सच्चा मानते थे। मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम) ने बुतों की पूजा करने वालो और रेगिस्तान में तितर बितर क़बीलों को एक उम्मत में बदल दिया और दीने यहूद एवं दीने मसीह और अरब के प्राचीन धर्म से बड़ा और ऊँचा एक आसान दीन और उज्जवल एवं मज़बूत धर्म की नीव रखी, जिसकी मानवीयत का आधार राष्ट्रीय बहादुरी थी, जिस ने एक ही पीढ़ी के अंदर सौ से ज़्यादा जंगों मे जीत हासिल की और एक शताब्दी के अंदर एक महान एवं विभय हुकूमत स्थापित कर ली और वर्तमान मे उस के पास एक स्थायी ताक़त है जिस ने आधी दुनिया को वश मे किया हुआ है।
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  14. पैग़म्बर ए इस्लाम हज़रत मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम) के कुछ कथन: PART 1


    1. आदमी जैसे जैसे बूढ़ा होता जाता है उसकी हिरस व तमन्नाएं जवान होती जाती हैं।
    2. अगर मेरी उम्मत के आलिम व हाकिम फ़ासिद होंगे तो उम्मत फ़ासिद हो जायेगी और अगर यह नेक होंगें तो उम्मत नेक होगी।
    3. तुम सब, आपस में एक दूसरे की देख रेख के ज़िम्मेदार हो।
    4. माल के ज़रिये सबको राज़ी नही किया जा सकता, मगर अच्छे अख़लाक़ के ज़रिये सबको ख़ुश रखा जा सकता है।
    5. नादारी एक बला है, जिस्म की बीमारी उससे बड़ी बला है और दिल की बीमारी (कुफ़्र व शिर्क) सबसे बड़ी बला है।
    6. मोमिन हमेशा हिकमत की तलाश में रहता है।
    7. इल्म को बढ़ने से नही रोका जा सकता।
    8. इंसान का दिल, उस “ पर ” की तरह है जो बयाबान में किसी दरख़्त की शाख़ पर लटका हुआ हवा के झोंकों से ऊपर नीचे होता रहता है।
    9. मुसलमान, वह है, जिसके हाथ व ज़बान से मुसलमान महफ़ूज़ रहें।
    10. किसी की नेक काम के लिए राहनुमाई करना भी ऐसा ही है, जैसे उसने वह नेक काम ख़ुद किया हो।
    12. माँ के क़दमों के नीचे जन्नत है।
    13. औरतों के साथ बुरा बर्ताव करने में अल्लाह से डरों और जो नेकी उनके शायाने शान हो उससे न बचो।
    14. तमाम इंसानों का रब एक है और सबका बाप भी एक ही है, सब आदम की औलाद हैं और आदम मिट्टी से पैदा हुए है लिहाज़ तुम में अल्लाह के नज़दीक सबसे ज़्यादा अज़ीज़ वह है जो तक़वे में ज़्यादा है।
    15. ज़िद, से बचो क्योंकि इसकी बुनियाद जिहालत है और इसकी वजह से शर्मिंदगी उठानी पड़ती है।
    16. सबसे बुरा इंसान वह है, जो न दूसरों की ग़लतियों को माफ़ करता हो और न ही दूसरों की बुराई को नज़र अंदाज़ करता हो, और उससे भी बुरा इंसान वह है जिससे दूसरे इंसान न अमान में हो और न उससे नेकी की उम्मीद रखते हों।
    17 ग़ुस्सा न करो और अगर ग़ुस्सा आ जाये, तो अल्लाह की क़ुदरत के बारे में ग़ौर करो।
    18 जब तुम्हारी तारीफ़ की जाये, तो कहो, ऐ अल्लाह ! तू मुझे उससे अच्छा बना दे जो ये गुमान करते है और जो यह मेरे बारे में नही जानते उसको माफ़ कर दे और जो यह कहते हैं मुझे उसका मसऊल क़रार न दे।
    19 चापलूस लोगों के मूँह पर मिट्टी मल दो। (यानी उनको मुँह न लगाओ)
    20 अगर अल्लाह किसी बंदे के साथ नेकी करना चाहता है, तो उसके नफ़्स को उसके लिए रहबर व वाइज़ बना देता है।
    21 मोमिन हर सुबह व शाम अपनी ग़लतियों का गुमान करता है।
    22 आपका सबसे बड़ा दुश्मन नफ़्से अम्मारह है, जो ख़ुद आपके अन्दर छुपा रहता है।
    23 सबसे बहादुर इंसान वह हैं जो नफ़्स की हवा व हवस पर ग़ालिब रहते हैं।
    24 अपने नफ़्स की हवा व हवस से लड़ो, ताकि अपने वुजूद के मालिक बने रहो।
    25 ख़ुश क़िस्मत हैं, वह लोग, जो दूसरों की बुराई तलाश करने के बजाये अपनी बुराईयों की तरफ़ मुतवज्जेह रहते हैं।
    26 सच, से दिल को सकून मिलता है और झूट से शक व परेशानियाँ बढ़ती है।
    27 मोमिन दूसरों से मुहब्बत करता है और दूसरे उससे मुहब्बत करते हैं।
    28 मोमेनीन आपस में एक दूसरे इसी तरह वाबस्ता रहते हैं जिस तरह किसी इमारत के तमाम हिस्से आपस में एक दूसरे से वाबस्ता रहते हैं।
    29 मोमेनीन की आपसी दोस्ती व मुब्बत की मिसाल जिस्म जैसी है जब ज़िस्म के एक हिस्से में दर्द होता है तो पर बाक़ी हिस्से भी बे आरामी महसूस करते हैं।
    30 तमाम इंसान कंघें के दाँतों की तरह आपस में बराबर हैं।
    31 इल्म हासिल करना तमाम मुसलमानों पर वाजिब है।
    32 फ़कीरी, जिहालत से, दौलत, अक़्लमंदी से और इबादत, फ़िक्र से बढ़ कर नही है।
    33 झूले से कब्र तक इल्म हासिल करो।
    34 इल्म हासिल करो चाहे वह चीन में ही क्योँ न हो।
    35 मोमिन की शराफ़त रात की इबादत में और उसकी इज़्ज़त दूसरों के सामने हाथ न फैलाने में है।
    36 साहिबाने इल्म, इल्म के प्यासे होते है।
    37 लालच इंसान को अंधा व बहरा बना देता है।
    39 परहेज़गारी, इंसान के ज़िस्म व रूह को आराम पहुँचाती है।
    40 अगर कोई इंसान चालीस दिन तक सिर्फ़ अल्लाह के लिए ज़िन्दा रहे, तो उसकी ज़बान से हिकमत के चश्मे जारी होंगे।
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  15. PART 2
    41 मस्जिद के गोशे में तन्हाई में बैठने से ज़्यादा अल्लाह को यह पसंद है, कि इंसान अपने ख़ानदान के साथ रहे।
    42 आपका सबसे अच्छा दोस्त वह है, जो आपको आपकी बुराईयों की तरफ़ तवज्जोह दिलाये।
    43 इल्म को लिख कर महफ़ूज़ करो।
    44 जब तक दिल सही न होगा, ईमान सही नही हो सकता और जब तक ज़बान सही नही होगी दिल सही नही हो सकता।
    46 तन्हा अक़्ल के ज़रिये ही नेकी तक पहुँचा जा सकता है लिहाज़ा जिनके पास अक़्ल नही है उनके पास दीन भी नही हैं।
    47 नादान इंसान, दीन को, उसे तबाह करने वाले से ज़्यादा नुक़्सान पहुँचाते हैं।
    48 मेरी उम्मत के हर अक़्लमंद इंसान पर चार चीज़ें वाजिब हैं। इल्म हासिल करना, उस पर अमल करना, उसकी हिफ़ाज़त करना और उसे फैलाना।
    49 मोमिन एक सुराख़ से दो बार नही डसा जाता।
    50 मैं अपनी उम्मत की फ़क़ीरी से नही, बल्कि बेतदबीरी से डरता हूँ।
    51 अल्लाह ज़ेबा है और हर ज़ेबाई को पसंद करता है।
    52 अल्लाह, हर साहिबे फ़न मोमिन को पसंद करता।
    53 मोमिन, चापलूस नही होता।
    54 ताक़तवर वह नही,जिसके बाज़ू मज़बूत हों, बल्कि ताक़तवर वह है जो अपने ग़ुस्से पर ग़ालिब आ जाये।
    56 सबसे अच्छा घर वह है, जिसमें कोई यतीम इज़्ज़त के साथ रहता हो।
    57 कितना अच्छा हो, अगर हलाल दौलत, किसी नेक इंसान के हाथ में हो।
    58 मरने के बाद अमल का दरवाज़ा बंद हो जाता है,मगर तीन चीज़े ऐसी हैं जिनसे सवाब मिलता रहता है, सदक़-ए-जारिया, वह इल्म जो हमेशा फ़ायदा पहुँचाता रहे और नेक औलाद जो माँ बाप के लिए दुआ करती रहे।
    59 अल्लाह की इबादत करने वाले तीन गिरोह में तक़सीम हैं। पहला गिरोह वह है जो अल्लाह की इबादत डर से करता है और यह ग़ुलामों वाली इबादत है। दूसरा गिरोह वह जोअल्लाह की इबादत इनाम के लालच में करता है और यह ताजिरों वाली इबादत है। तीसरा गिरोह वह है जो अल्लाह की इबादत उसकी मुहब्बत में करता है और यह इबादत आज़ाद इंसानों की इबादत है।
    60 ईमान की तीन निशानियाँ हैं, तंगदस्त होते हुए दूसरों को सहारा देना, दूसरों को फ़ायदा पहुँचाने के लिए अपना हक़ छोड़ देना और साहिबाने इल्म से इल्म हासिल करना।
    61 अपने दोस्त से दोस्ती का इज़हार करो ताकि मुब्बत मज़बूत हो जाये।
    62 तीन गिरोह दीन के लिए ख़तरा हैं, बदकार आलिम, ज़ालिम इमाम और नादान मुक़द्दस।
    63 इंसानों को उनके दोस्तों के ज़रिये पहचानों, क्योँकि हर इंसान अपने हम मिज़ाज़ इंसान को दोस्त बनाता है।
    64 गुनहाने पिनहनी (छुप कर गुनाह करना) से सिर्फ़ गुनाह करने वाले को नुक़्सान पहुँचाता है लेकिन गुनाहाने ज़ाहिरी (खुले आम किये जाने वाले गुनाह) पूरे समाज को नुक़्सान पहुँचाते है।
    65 दुनिया के कामों में कामयाबी के लिए कोशिश करो मगर आख़ेरत के लिए इस तरह कोशिश करो कि जैसे हमें कल ही इस दुनिया से जाना है।
    66 रिज़्क़ को ज़मीन की तह में तलाश करो।
    67 अपनी बड़ाई आप बयान करने से इंसान की क़द्र कम हो जाती है और इनकेसारी से इंसान की इज़्ज़त बढ़ती है।
    68 ऐ अल्लाह ! मेरी ज़्यादा रोज़ी मुझे बुढ़ापे में अता फ़रमाना।
    69 बाप पर बेटे के जो हक़ हैं उनमें से यह भी हैं कि उसका अच्छा नाम रखे, उसे इल्म सिखाये और जब वह बालिग़ हो जाये तो उसकी शादी करे।
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  16. PART 3
    70 जिसके पास क़ुदरत होती है, वह उसे अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करता है।
    71 सबसे वज़नी चीज़ जो आमाल के तराज़ू में रखी जायेगी वह ख़ुश अखलाक़ी है।
    72 अक़्लमंद इंसान जिन तीन चीज़ों की तरफ़ तवज्जोह देते हैं, वह यह हैं ज़िंदगी का सुख, आखेरत का तोशा (सफ़र में काम आने वाले सामान) और हलाल ऐश।
    73 ख़ुश क़िसमत हैं, वह इंसान, जो ज़्यादा माल को दूसरों में तक़सीम कर देते हैं और ज़्यादा बातों को अपने पास महफ़ूज़ कर लेते हैं।
    74 मौत हमको हर ग़लत चीज़ से बे नियाज़ कर देती है।
    75 इंसान हुकूमत व मक़ाम के लिए कितनी हिर्स करता है और आक़िबत में कितने रंज व परेशानियाँ बर्दाश्त करता है।
    76 सबसे बुरा इंसान, बदकार आलिम होता है।
    77 जहाँ पर बदकार हाकिम होंगे और जाहिलों को इज़्ज़त दी जायेगी वहाँ पर बलायें नाज़िल होगी।
    78 लानत हो उन लोगों पर जो अपने कामों को दूसरों पर थोपते हैं।
    79 इंसान की ख़ूबसूरती उसकी गुफ़्तुगू में है।
    80 इबादत की सात क़िस्में हैं और इनमें सबसे अज़ीम इबादत रिज़्क़े हलाल हासिल करना है।
    81 समाज में आदिल हुकूमत का पाया जाना और क़ीमतों का कम होना, इंसानों से अल्लाह के ख़ुश होने की निशानी है।
    82 हर क़ौम उसी हुकूमत के काबिल है जो उनके दरमियान पायी जाती है।
    83 ग़लत बात कहने से कीनाह के अलावा कुछ हासिल नही होता।
    85 जो काम बग़ैर सोचे समझे किया जाता है उसमें नुक़्सान का एहतेमाल पाया जाता है।
    87 दूसरों से कोई चीज़ न माँगो, चाहे वह मिस्वाक करने वाली लकड़ी ही क्योँ न हो।
    88 अल्लाह को यह पसंद नही है कि कोई अपने दोस्तों के दरमियान कोई खास फ़र्क़ रखे।
    89 अगर किसी चीज़ को फाले बद समझो, तो अपने काम को पूरा करो, अगर कोई किसी बुरी चीज़ का ख़्याल आये तो उसे भूल जाओ और अगर हसद पैदा हो तो उससे बचो।
    90 एक दूसरे की तरफ़ मुहब्बत से हाथ बढ़ाओ क्योँकि इससे कीनह दूर होता है।
    91 जो सुबह उठ कर मुसलमानों के कामों की इस्लाह के बारे में न सोचे वह मुसलमान नही है।
    92 ख़ुश अख़लाकी दिल से कीनह को दूर करती है।
    93 हक़ीक़त कहने में, लोगों से नही डरना चाहिए।
    94 अक़लमंद इंसान वह है जो दूसरों के साथ मिल जुल कर रहे।
    95 एक सतह पर ज़िंदगी करो ताकि तुम्हारा दिल भी एक सतह पर रहे। एक दूसरे से मिलो जुलो ताकि आपस में मुहब्बत रहे।
    96 मौत के वक़्त, लोग पूछते हैं कि क्या माल छोड़ा और फ़रिश्ते पूछते हैं कि क्या नेक काम किये।
    97 वह हलाल काम जिससे अल्लाह को नफ़रत है, तलाक़ है।
    98 सबसे बड़ा नेक काम, लोगों के दरमियान सुलह कराना।
    99 ऐ अल्लाह तू मुझे इल्म के ज़रिये बड़ा बना, बुर्दुबारी के ज़रिये ज़ीनत दे, परहेज़गारी से मोहतरम बना और तंदरुस्ती के ज़रिये खूबसूरती अता कर।
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  17. हज़रत मुहम्मद साहब का संदेश

    हज़रत मुहम्मद द्वारा हिजरत के दसवें साल में अपने अंतिम हज के अवसर पर मुहम्मद साहब के इस ऐतिहासिक अभिभाषण में सारी मानवता के कल्याण की शिक्षाएँ निहित हैं।

    यह इस्लामी आचार-विचार का घोषणा पत्र है।

    हज़रत मुहम्मद साहब ने कहा:

    प्यारे भाइयो! मैं जो कुछ कहूँ, ध्यान से सुनो।
    ऐ इंसानो! तुम्हारा रब एक है।
    अल्लाह की किताब और उसके रसूल की सुन्नत को मजबूती से पकड़े रहना।
    लोगों की जान-माल और इज़्ज़त का ख़याल रखना ।
    कोई अमानत रखे तो उसमें ख़यानत न करना।
    ब्याज के क़रीब न भटकना।

    किसी अरबी को किसी अजमी (ग़ैर अरबी) पर कोई प्राथमिकता नहीं, न किसी अजमी को किसी अरबी पर, न गोरे को काले पर, न काले को गोरे पर, प्रमुखता अगर किसी को है तो सिर्फ तक़वा व परहेज़गारी से है अर्थात् रंग, जाति, नस्ल, देश, क्षेत्र किसी की श्रेष्ठता का आधार नहीं है। बड़ाई का आधार अगर कोई है तो ईमान और चरित्र है।

    तुम्हारे ग़ुलाम, जो कुछ ख़ुद खाओ, वही उनको खिलाओ और जो ख़ुद पहनो, वही उनको पहनाओ।
    अज्ञानता के तमाम विधान और नियम मेरे पाँव के नीचे हैं।

    इस्लाम आने से पहले के तमाम ख़ून खत्म कर दिए गए। (अब किसी को किसी से पुराने ख़ून का बदला लेने का हक़ नहीं) और सबसे पहले मैं अपने ख़ानदान का ख़ून–रबीआ इब्न हारिस का ख़ून– ख़त्म करता हूँ।

    अज्ञानकाल के सभी ब्याज ख़त्म किए जाते हैं और सबसे पहले मैं अपने ख़ानदान में से अब्बास इब्न मुत्तलिब का ब्याज ख़त्म करता हूँ।

    औरतों के मामले में अल्लाह से डरो। तुम्हारा औरतों पर और औरतों का तुम पर अधिकार है।

    औरतों के मामले में मैं तुम्हें वसीयत करता हूँ कि उनके साथ भलाई का रवैया अपनाओ।

    लोगो! याद रखो, मेरे बाद कोई नबी नहीं और तुम्हारे बाद कोई उम्मत (समुदाय) नहीं। अत: अपने रब की इबादत करना, प्रतिदिन पाँचों वक़्त की नमाज़ पढ़ना। रमज़ान के रोज़े रखना, खुशी-खुशी अपने माल की ज़कात देना, अपने पालनहार के घर का हज करना और अपने हाकिमों का आज्ञापालन करना। ऐसा करोगे तो अपने रब की जन्नत में दाख़िल होगे। ऐ लोगो! क्या मैंने अल्लाह का पैग़ाम तुम तक पहुँचा दिया!
    (लोगों की भारी भीड़ एक साथ बोल उठी–)
    हाँ, ऐ अल्लाह के रसूल!
    (तब मुहम्मद साहब ने तीन बार कहा–)
    ऐ अल्लाह, तू गवाह रह।
    (उसके बाद क़ुरआन की यह आखिरी आयत उतरी–)
    आज मैंने तुम्हारे लिए दीन को पूरा कर दिया और तुम पर अपनी नेमत पूरी कर दी और तुम्हारे लिए इस्लाम को दीन की हैसियत से पसन्द किया।

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