शनिवार, 6 अक्तूबर 2012

अल्लाह और रसूल की उलटवाणियाँ !!


कुरान अल्लाह की किताब है ,यानि उसमे लिखे हरेक शब्द अल्लाह के वचन है .और प्रमाणिक हैं . उसी तरह हदीसें भी प्रमाणिक है क्योंकि उनमे अल्लाह के रसूल के वचन मौजूद हैं. ऐसा मुसलमानों का दावा है . और उनका यही आग्रह रहता है कि दुनियां के सभी लोग उनकी तरह ही अपनी बुद्धि बेच डालें और कुरान और हदीसों की परस्पर विरोधी तर्कहीन " उलटवाणियों" पर इमान ले आयें .और ऐसी बेतुकी बातों पर विश्वास कर लें .यद्यपि कुरान और हदीसों में ऐसी अनेकों बातें मिल सकती हैं , लेकिन यहाँ पर नमूने के लिए केवल दो ही उदहारण दिए जा रहे हैं . और उनके माध्यम से इस्लाम के विद्वानों और प्रबुद्ध पाठकों से निवेदन है कि वह दिए गए हवालों के आधार पर इन प्रश्नों पर उचित निर्णय करें .प्रश्न हैं 1 .क्या मुसलमान मुसलमानों का मांस नहीं खाते हैं ? 2 . क्या शैतान अल्लाह का सहभागी नहीं है ?
इन प्रश्नों का उत्तर इसी लेख में छुपा है .इसलिए लेख को ध्यान से पढ़िए -
पहला प्रश्न -क्या मुसलमान मुसलमानों का मांस नहीं खाते हैं ? 
1-भाई का मांस खाना गुनाह है 
कुरान में किसी की पीठ पीछे बुराई करना , अपने ही भाई का मांस खाने के समान बताकर गुनाह माना गया है , कुरान में कहा है ,
"किसी की पीठ पीछे उसकी बुराई करना , अपने ही भाई का मांस खाने के बराबर है "सूरा -अल हुजुरात 49 :12 
लेकिन मुसलमान खुले आम ईमान वालों का मांस खाते हैं , क्योंकि कुरान के अनुसार पक्षी और जानवर भी नमाज पढ़ते और तसबीह करते हैं
2-पशु पक्षी भी मुसलमान हैं 
इस्लामी परिभाषा के अनुसार जो भी अल्लाह की तस्बीह करता है और , नमाज पढ़ता है उसी को मोमिन कहा जाता है .कुरान में कहा है
क्या तुम नहीं देखते कि धरती पर चलने वाले जानवर और आकाश में पंख फैला कर उड़ने वाले पक्षी भी अल्लाह की तसबीह करते रहते हैं ,और अपनी नमाज अदा करते रहते हैं .और अल्लाह इस बात को जनता है " सूरा -नूर 24 :41 
आकाश में उड़ने वाले और धरती पर रहने वाले सभी प्राणी उसी अल्लाह की तसबीह (प्रार्थना ) करते हैं . और कोई ऐसा प्राणी नहीं है , जो अल्लाह की इबादत नहीं करता हो .लेकिन तुम उनकी नमाज को नहीं जानते " सूरा -बनी इस्राएल 17 :44 
इन आयतों अनुसार नमाज पढ़ने वाले सभी प्राणी ईमानवाले , और भाई माने गए हैं .और कहा गया है ,
सभी ईमान वाले आपस में भाई भाई हैं "सूरा-अल हुजुरात 49 :10 
3-अपने भाई का मांस खाओ 
क्या कोई मुसलमान जवाब देगा कि क्या कारण है , एक तरफ तो अल्लाह नमाज पढ़ने और तसबीह करने वालों को ईमान वाला और आपस में भाई बता रहा है , और दूसरी तरफ उन्ही को खाने की अनुमति दे रहा है . और कहता है ,
और अल्लाह ने ही पशु भी बनाये हैं ,जिनसे गर्मी पैदा करने का सामान ( ऊन ) मिलता है ,और तुम जिनको खाते भी हो " सूरा -नहल 16 :5 
तुम पर सिर्फ मुरदार को ,सूअर को ,खून को और जिन जानवरों पर अल्लाह के आलावा किसी का नाम लिया गया हो उस जानवर को हराम किया गया है . इनको छोड़ कर तुम सभी जानवरों को खा सकते हो " सूरा -बकरा 2 :173 
इस प्रकार यदि हम कुरान की इन सभी आयतों का भावार्थ और तात्पर्य समझें तो यही स्पष्ट होगा कि आजकल मुसलमान अपने भाई ( पशु , पक्षिओं ) का मांस खाते हैं , क्योंकि वे सब नमाज पढ़ते है , और अल्लाह की तसबीह करते हैं .यनि सभी मुसलमान अपने भाइयों के हत्यारे हैं
इसी तरह मुसलमानों का दावा है कि सारे जीव अकेले अल्लाह ने ही बनाये है , और उसका कोई सहभागी नहीं है , लेकिन खुद अल्लाह का रसूल इस से उलटी बात बता रहे हैं , इसका नमूना देखिये
दूसरा प्रश्न -क्या शैतान अल्लाह का सहभागी नहीं है ? 
1-सभी प्राणी अल्लाह ने बनाये 
कुरान का दावा है कि दुनियां की सभी चीजें और प्राणी अल्लाह ने ही बनाये है .जैसा इन आयतों में कहा है
-केवल अल्लाह ही हरेक को पैदा करने वाला है "सूरा -अज जुमुर 39 :62 
अल्लाह ने ही चौपाये बनाये हैं ,जिन पर तुम सवारी करते हो "सूरा -अज जुखुरुफ़ 43 :12 
क्या लोग ऊंटों को नहीं देखते कि अल्लाह ने इनको कैसा बनाया है "सूरा -अल गाशिया 88 :17 
2-अल्लाह का कोई सहभागी नहीं 
मुसलमान समझते हैं कि अल्लाह इतना शक्तिशाली है कि कोई उसके बराबर नहीं है .और अल्लाह अकेला ही सारे काम कर सकता है . उसे किसी सहयोगी कि जरुरत नहीं है . और अल्लाह का कोई सहभागी मानना अक्षम्य अपराध है . कुरान के कहा है ,
ऐसा कोई नहीं है , जो अल्लाह की बराबरीकर  सके " सूरा -इखलास 112 :4 
अल्लाह का कोई सहभागी ( Partner ) नहीं है " सूरा -अनआम 6 :163 
अल्लाह ने न तो किसी को अपना बेटा बनाया और न ही उसकी सत्ता में कोई उसका सहभागी है "सूरा -बनी इस्राइल 17 :111 
अल्लाह इस बात को कभी क्षमा नहीं करेगा कि कोई किसी को अल्लाह का सहभागी ठहराए "
 सूरा -निसा 4 : 48 
3-ऊंट शैतान ने बनाये हैं 
लेकिन अल्लाह के रसूल हदीसों में दावा कर रहे हैं कि ऊंट शैतान ने बनाये हैं . यानि अल्लाह और शैतान में बराबर शक्ति है , हदीसें देखिये
अल बरा इब्न अजीब ने कहा कि रसूल ने कहा है तुम ऊँटों के रहने कि जगह नमाज नहीं पढो , क्योंकि ऊंट शैतान ने बनाये हैं (Camels were created from devils)

" فإنها خلقت من الشياطين "
सुन्नन अबू दाऊद- किताब 1 हदीस 184 
अब्दुल्लाह बिन मुगफ्फल अल मुजानिन ने कहा कि रसूल ने तुम भेड़ों आराम करने कि जगह नमाज पढ़ा करो ,लेकिन ऊंटों के रहने कि जगह नमाज कभी नहीं पढना , क्योंकि ऊंट शैतान ने बनाये है "इब्न माजा 

حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا هُشَيْمٌ، عَنْ يُونُسَ، عَنِ الْحَسَنِ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مُغَفَّلٍ الْمُزَنِيِّ، قَالَ قَالَ النَّبِيُّ ـ صلى الله عليه وسلم ـ ‏"‏ صَلُّوا فِي مَرَابِضِ الْغَنَمِ وَلاَ تُصَلُّوا فِي أَعْطَانِ الإِبِلِ فَإِنَّهَا خُلِقَتْ مِنَ الشَّيَاطِينِ ‏"‏ ‏.‏

Sunan Ibn Majah : The Book On The Mosques And The Congregations 

English reference : Vol. 1, Book 6, Hadith 769
Arabic reference : Book 5, Hadith 818

यही हदीस इमाम हम्बल में मुसनद में भी दर्ज कि है . ऊंट शैतान ने बनाये हैं musnad ahmad

وفي المسند أيضا, من حديث عبد الله بن المغفل قال: قال رسول الله صلى الله تعالى عليه وآله وسلم "صلوا في مرابض الغنم ولا تصلوا في أعطان الإبل, فإنها خلقت من الشياطين".

4-ऊंट के बारे में फतवा 
ऊंट शैतान ने बनाये हैं ,और ऊंट का मांस खाने से मुसलमानों में शैतानी ऊर्जा बढ़ती है . इस बात को साबित करने के लिए जो फतवा दिया गया है उसका मुख्य अंश इस प्रकार है ,
"ऊंटों में शैतान की शक्ति होती है . इसलिए जो भी ऊंटों का मांस खता है ,उसमे शैतान प्रकृति का विकास हो जाता है .फलस्वरूप उसमे शैतान का स्वभाव बढ़ जाता है .
The camel has a devilish nature, so whoever eats its meat will develop some devilish energy as a result; so it is prescribed  to take away that energy.

http://islamqa.info/en/ref/130871

इतना जानने के बाद भी लोगों से वही उलटी बातें बता कर गुमराह करते रहते है , जो उस समय मुहम्मद साहब अपने जाहिल जिहादियों से कहते थे कि
हे नबी तुम लोगों से कह दो ,कि यदि तुम मुझ से प्रेम करते हो तो ,मेरा अनुसरण करो .और अल्लाह के साथ रसूल की बात पर भी विश्वास करो "
सूरा -आले इमरान 3 : 31 -32 
5-निष्कर्ष 
लेख में दिए गए कुरान और हदीसों के प्रमाणों का अध्यन करने से यही साबित होता है कि ऊंटों का मांस खा खा कर अरब के मुसलमानों में शैतानी शक्तियां बढ़ गयी हैं .चूँकि अरब इस्लाम का जन्म स्थान है .इसलिए शैतानी शक्तियां अरब से निकल कर भारत तक फ़ैल रही हैं .और यही कारन है कि मुसलमान हर जगह आतंक फैलाते रहते हैं .यदि ऐसा नहीं तो मुसलमान स्वीकार करें कि यह कुरान कि आयतें और रसूल की बातें झूठ है . और रसूल झूठे थे .
http://www.islamweb.net/

16 टिप्‍पणियां:

  1. sharma ji aap to bahut bade mahapurush hai jo kuran ke danawata purn ayato ko ujagar kar rahe hai, hindu to murkh hai wah samjhta hai ki jaise mai hu waise hi duniya hai par aisa nahi hai musalmaan to kewal musalman hi hai aur kuchh
    bhi nahi

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  2. sexy blogssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssss




    http://terainterzar.blogspot.in/

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  3. हमारे दोस्त सिद्दीकी जी ने तर्क दिया है कि रसूल जानते थे कि ऊंट के मांस में शैतानी गुण होते हैं , इसलिए वह ऊंट का मांस खाने से पहले वुजू कर लेते थे . इस से ऊंट के मांस का शैतानी असर नहीं होता था .अगर वजू करने से ऊंट का मांस खा लेने पर पेट में गयी गयी उसके मांस की शैतानी शक्तियां बेअसर हो जाती हैं तो शराब पीने से पहले वजू कर लेने से शराब का नशा नहीं चढ़ना चाहिए . शायद इसीलिए ग़ालिब वजू करके शराब पीते थे ,
    " पीता नहीं शराब कभी मैं वजू बगैर ,
    कालिब मेरे रूह किसी पारसा की है "
    यानि मैं वजू किये बिना कभी शराब नहीं पीता हूँ .इसलिए मेरे शरीर में शुद्ध और पवित्र आत्मा रहती है .

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  4. asatyawadi yaar khaan paan to enviromental condition par available hota hai.registan me maansahar ke siway behtar wikalp mujhe nahi lagta kuchh aur hai.
    aur jis hadis ki baat tumne ki hai wo ye hai,
    ''Narrated Al-Bara' ibn Azib: The Messenger of Allah (peace_be_upon_him) was asked about performing ablution after eating the flesh of the camel. He replied: Perform ablution, after eating it. He was asked about performing ablution after eating meat. He replied: Do not perform ablution after eating it. He was asked about saying prayer in places where the camels lie down. He replied: Do not offer prayer in places where the camels lie down. These are the places of Satan. He was asked about saying prayer in the sheepfolds. He replied: You may offer prayer in such places; these are the places of blessing.
    Abu dawood book 1 hadith 184.
    isme camel ke baithne ki jagah ke baare me kaha hai.ye nahi kaha ke camel devil ki creation hai.

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  5. aur bhai सूबेदार जी पटना aap mujhe ye bata dijiye ki shri raam ji hiran ke pichhe tir kaman lekar kyon pade the.kya running practice kar rahe the.kya jiw hatya nahi kar rahe the.

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    1. to mythbuster, भईया तुम भूल गये कि सीता जी ने स्वर्ण मृग की माँग की थी। और राम क्षत्रिय थे। उन्हे क्षत्रिय होने के नाते हत्या का जन्मजात लाईसेन्स मिला हुआ था। और राम, उनके अवतार का कारण, सीता को अग्निदेव के हवाले करना और रावण वध । ये सब विधि के विधान को पूरा करने के लिए हुआ। पहले किसी ज्ञानी से रामायण को पढ़ो फिर आना बहस करने।

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  6. इस्लाम-धर्म में शिष्टाचार PART 1
    सदाचरः

    पैग़म्बरे अकरम (सा) की वाणी अनतं जीवन के लिए जीवित व ज़िन्दा है।
    (انما بعثت لاتمم مکارم الاخلاق)

    यक़ीनन मैं मबऊस हूआ हुँ ताकि नेक व शिष्टाचार-चरित्र को सम्पूर्ण करुँ, रसूल (सा) अपना उद्देश्य को इस मबऊस के द्बारा घोषणा क्या है। लेकिन कुरअन मजीद जिस समय हज़रत मुहम्मद (सा) को प्रसंसा करना चाहता है, उस समय आप को मुख़ातिब व ख़िताब करके फरमाते हैः
    وانک لعلى خلق عظيم

    (यक़ीनन आप नेक आख़लाक़े अज़ीम पर फाएज़ है)
    इस कथा से परिष्कार होता है कि इस्लाम में शिष्टाचार की कितनी गुरुत्व है. इस्लाम मेंहवारे शिष्टाचार को दिनदारी, तक़्वा, परहेज़गारी जानता है. और इसके मौलिक पाए चार है.
    1. एक अन्य के साथ ख़ुश नीयत व पाक दिली से रहना।
    2. समाज में अन्य के साथ ख़ुश रफ़्तार व गुफ़्तारी करना।
    3. सब व्याक्तियों के साथ चाहे दुश्मन हो या दोस्त मिठी भाषा द्बारा अच्छी अच्छी कथा कहना।
    4. समस्त व्याक्तियों के साथ अच्छे व ख़ुश उत्तम व्यबहार करना।

    शिष्टाचार दो प्रकार में भाग होता है

    1- एक व्यक्तित्व शिष्टाचार, जो इंसान से सम्पर्क रख़ता है. उधारण (दे कर अपनी कथा को और परिष्कार करुँ) पानी पिना, कपढ़ा पहन्ना, सोना व जगना, भ्रमण करना, सही व सालिम हीवन बसर करना या रहना, मरीज़ व व्याधी होना.... यह सब इस्लाम में एक व्यक्ति से सम्पर्क रख़ता है। आगर इंसान यह सब क़बूल करके अपनी जीवन को सठीक रास्ते पर परिचालना करे, तो वेह समस्त प्रकार मसीबत से दुर रहेगा वरना मसीबत में गिरफ़्तार हो जाए गा।
    2- समाज के शिष्टाचार, यानी समाजिक अधिकार, उधारण के तौर पर समाज में माता-पिता, और बच्चों तथा निकटतम संबधिंयों, अध्यपक, छात्र, दोस्त व प्रतिवासी तथा समस्त प्रकार व्याक्तियों के साथ जो समाजिक सम्पर्क रखता हो ऊन व्याक्तियों के साथ नेक शिष्टाचार करना समाज की रक्षसा व बिजयता का चिह्न है।
    इस्लाम-धर्म के शिष्टाचार व निर्दशन उत्तम शिष्टाचार में से है. जो इस्लाम का एक कुल्ली विधान है और उसका मौलिक एक शिष्टाचार गुणावली पर इस्तेवार है. सार के तौर पर कहना काफी है कि इस्लाम-धर्म ने जिस चीज़ को निर्देश दिया है उस का पालन करना, और जिस चीज़ का निषेध क्या है उस से दूर रहना प्रत्येक मुसल्मानों का दायित्व व कर्तव्य है।

    हराम (निषेध)

    जिस कार्य को अंजाम देना इस्लाम ने निषेध घोषित क्या है उस को (हराम) कहा जाता हैः हराम काम तरतीब के साथ बयान हो रहा है।
    1- अत्याचार व ज़ुल्म, 2- ईस्राफ़, 3- मज़ाक़ उड़ाना, 4- कष्ट देना, 5- रहस्य का उल्लेख करना, 6- झूट व अपवाध, 7- पिता-माता का दूराचर, 8- अपनी क़ौम का माल हन्न करना, 9- बलात कार करना, 10- मर्दों का अपसी योन संबन्ध, 11- मर्द का ना-महराम नारीयों पर और नारी का ना-महराम मर्दों पर दृष्टि करना, 12- शराब पिना, 13- जुआ खेलना 14- रिशवत लेना, 15- मृत और सुवार का माँस और जो (इस्लाम की दृष्ट में हराम है) ख़ाना हराम है, 16- अनुमति के बग़ैर अन्य का माल व्यबहार करना, 17- व्यापर में धोका देना, 18- मर्दों के लिए सोना पहन्ना, 19- सुद ख़ाना, 20- कार्य व तिजारत में अन्य व्याक्तियों को धोका देना, 21- ईस्तेमना ( अपने हात से मनी (धात) निकालना) 22- अन्य व्याक्तियों के राज़ बातों में जासूसी करना, 23- ग़ीबत करना, 24-गाने के धुन से कुछ पाठ करना या सुनना (गाना और मुसिक़), 24- किसी व्यक्तित्व व शख्छियात को हत्या करना, 25- चूरी करना, 26- बद अमल अंजाम देना, 27- ख्यानत करना, 28- कूरआन मजीद के बिपरित निर्देश प्रकाश करना, 29- अन्य के अधिकार को पैमाल करना, 30- अत्याचारि व दूष्ट व्याक्तियों की सहायता करना, 31-अन्य को बदनाम करना,....।

    फज़ाएल और शिष्टाचार
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  7. PART 2

    शिष्टाचार व फज़ाएल मुसल्मानों के लिए ज़िनत बख़्श है।
    1- इंसाफ़, 2- शिष्टाचार कार्यों में सहायता करना, 3- सब्र व इस्तेक़ामत, 4- अन्य व्याक्तियों के दर्मियान शान्ति क़ायम करना, 5- अमल में इख़लाछ पैदा करना, 6- अल्लह पर विश्वास-यक़ीन करना, 7- हिल्म व बु्र्दबारी, 8- माता-पिता के साथ शिष्टाचार करना, 9- अन्य को ख़ाना ख़िलाना, 10- पाक दामन रहना 11- बुलन्द सुरों में सलाम करना, 12- पाकीज़गी, 13- ज्ञान अर्जन करना, 14- अपर व्याक्तियों के साथ अच्छे बर्ताऔ करना, 15- सख़ावत, 16- शूज़ाअत, 17-सिलाह् रहम, 18-काम-कार्य में इंसाफ़ इख़तियार करना, 19- अच्छे शिष्टाचार से पेश अना, 20- ग़रीबों को सहायता करना, 21- ख़ुजू व ख़ुशू से पेश अना, 22- हजात मन्दों को तियाज़ को पूरी करना, 23- सछ बोलना, 24- अन्य व्याक्तियों को सम्मान प्रदर्शन करना, 25- सब समय के लिए मुस्कुराना, 26- ख़राब कर्मों से दुर रहना, 27- विबाह करना, 28- अल्लह की निअमतों को शुक्र अदा करना, 29- अपर के भुलों को क्षमा करना।

    नीच और मकरुहात

    नीच व मकरुहात मानव को पस्त व पधित की तरफ ले जाते हैं जो तरतीब के साथ बयान किया जा रहा है।
    1- इंन्तेक़ाम जुई 2- गर्व व फक़्र, 3- माल-सर्वत जमा करना, 4- तकब्बूर करना, 5-बिहुदा काज करना, 6- बेहुदा कथाएं कहना, 7- कामों में सुस्ती पैदा करना, 8- भय पाना, 9- बितावी व परेशानी, 10- कूर्सी तलबि, 11- वादा करके ख़िलाफ वर्ज़ी करना, 12-लालच, 13- हिम्मत में पराजय स्वीकार करना, 14- अपरों के साथ दूश्मनी करना, 15- शक व अबकाश, 16- काम में जल्दि करना, 17- अल्लह से ग़ाफिल रहना, 18- बद आचरण, 19- स्ख़त दिल, 20- बड़ाई.....।
    उपर जो कुछ फाज़ाएल व शिष्टाचार के समपर्कित बयान क्या गया है सब मुस्तहब में से नहीं है. बल्कि उन में से कुछ इस्लाम के दृष्ट में वाजिब भी है।
    हालाकिं नीच व मकरुहात के लिए जो बयान क्या गया है, सब हराम नहीं है बल्किं ऊन में से कुछ इस्लामी विचार धारा के अनुसार हराम भी है।
    इस मौलिक भित्ती पर प्रत्येक मुसल्मान पर वाजिब है, कि अपने कामों में चेष्टा करें ताकि इस्लाम के जो संविधान है उस से अपने को आरस्ता करें चाहे यह विधान उसूलेदीन के संमधं में हो या शिष्टाचार के संमधं में, उस पर अमल अंजाम दे।
    प्रत्येक मुसल्मान को मुस्लमान कहना उपयुक्त नहीं है, क्योंकि वेह व्याक्ति उस तरह है जिस तरह एक व्याधि व्याक्ति यह कहे कि मै सही व सालिम हुँ. लिहज़ा एक व्याधि व्याक्ति के कहने पर कोई लाभ नहीं है उसी तरह एक मुसल्मान को मुसल्मान कहना फ़ैदा नहीं है, जब तक वेह व्याक्ति इस्लाम के विधान के उपर अमल न करें. लिहज़ा हम सब को चेष्टा करना चाहिए ताकि अपनी गुफ़्तार को शिष्टाचार के साथ, और कथाएं को अमल के साथ मिलाया करें ताकि पृथ्वी में अच्छे और स्वर्ग में विजय अर्जन करे सकें।

    अमीन या रब्बल अलामीन
    سبحان ربک رب العزة عما يصفون و سلام على المرسلين
    والحمد لله رب العلمين، و صلى الله على محمد و آله الطاهرين
    SUNNIKING TEAM INDIA

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  8. क़ुरआन पढ़ते ही पता चल गया कि यह ईश्वरीय ग्रंथ है।

    आस्ट्रेलिया की नागरिक ज़ैनब टेलर इस्लाम धर्म के वैभव के समक्ष नतमस्तक हो गयीं और धर्म की उच्च शिक्षाओं से लाभान्वित हो रही है। उन्होंने जून वर्ष 2005 में हज़रत फ़ातेमा के चरित्र के आयामों पर होने वाली अंतर्राष्ट्रीय कांफ़्रेस में भाग लेने के लिए ईरान की यात्रा की थी। वह इस्लाम धर्म स्वीकार करने के बारे में कहती हैं कि मैं आस्ट्रेलिया जैसे देश से ईरान आयी। वहां पर अंगुलियों पर मुसलमानों को गिना जा सकता है। मैं इससे पहले ईसाई धर्म की अनुयायी थी। यहां तक कि मेरे एक मित्र ने ईश्वरीय उपहार के रूप में मुझे इस्लामी पुस्तकों से परिचित करवाया। वह पुस्तकें मेरे लिए बहुत ही रोचक थीं। अलबत्ता इन रोचक पुस्तकों में जो सबसे महत्त्वपूर्ण पुस्तक थी वह पवित्र क़ुरआन था। मैं अभी मुसलमान नहीं हुई थी कि मैंने पवित्र क़ुरआन का अध्ययन आरंभ कर दिया। इस पुस्तक को पढ़ने से मेरे भीतर एक आभास पैदा हुआ और इस आभास ने मुझपर यह स्पष्ट कर दिया कि यह पुस्तक ज़मीनी नहीं बल्कि आसमानी है। एकेश्वरवाद और आदर्श व्यवहार के लिए पवित्र क़ुरआन एक बेहतरीन मार्ग दर्शक है और उसके नियम हमारे आज के संसार के नियमों व सिद्धांतों से पूर्ण रूप से समन्वित हैं और सदैव अनुसरण योग्य हैं। मेरा मानना है कि मनुष्य को अपने रचयिता और इस सृष्टि के रचनाकार से सीधे संपर्क की सदैव आवश्यकता होती है। मैंने भी अपने भीतर इस आवश्यकता का आभास किया। यद्यपि यह संपर्क दुआओं और ईश्वरीय गुणगान के माध्यम से हमें प्राप्त हो जाता है किन्तु स्वयं ईश्वर के शब्दों अर्थात क़ुरआन तक पहुंच हमारे लिए बहुत आनन्ददायक थी। सबसे पहले मैंने अंग्रेज़ी में क़ुरआन पढ़ना सीखा और बाद में अरबी में। उसके बाद मैंने अंतिम ईश्वरीय दूत हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम की जीवनी का अध्ययन किया। मैंने धीरे धीरे इस्लाम को पहचाना। मुझे पूरी तरह ईश्वर पर भरोसा है और मुझे इस बात पर पूरा ईमान है कि यदि संसार में मार्गदर्शन का कोई दीप है तो वह इस्लाम है।

    सुश्री ज़ैनब टेलर अपनी समस्त समस्याओं के बावजूद आशा से ओतप्रोत हृदय की स्वामी हैं और वह इन शब्दों द्वारा अपनी भीतरी और गहरी प्रसन्नता को व्यक्त करते हुए कहती हैं कि उन समस्त बातों के साथ जो मैंने आपको बतायी हैं, मैं बहुत प्रसन्न और सौभाग्यशाली हूं क्योंकि मैं अपने पति और बच्चों के साथ इस्लाम के अथाह समुद्र में जीवन व्यतीत रही हूं।
    SUNNIKING TEAM INDIA

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  9. quran men sirf registan me rahene wale janwaron ke bare me hi likha hai .kyonki paigamber bhi registan men rahete the. unhone ne hiran, magarmachch, genda, aur aise hajaro janwar honge, jo allah ne (shayad) banaye, inka jikra bhi nahin kiya, kyo? kyonki muhammad paigamber ek dhongi tha, apni zooti baton se apna matlab pura karta tha,isiliya macca ke logon se uski ladayee hui,aur bad men uske chelon ne islaam jaisa zoota dharm failaya,. agar quran sacchi kitab hoti to sari duniya ke baren me usme likha hota,magar muhammad jaise dhongi ki baton me aakar log fas gaye ,aur ye silsila 1400 salon se chala aa raha hain.

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