रविवार, 27 जनवरी 2013

अल्लाह का नाम लेना अपराध है ?


विश्व के जितने भी धर्मों के अनुयायी ईश्वर में आस्था रखते हैं ,वे किसी न किसी नाम से ईश्वर की उपासना करते हैं , और उसका स्मरण किया करते हैं .लोग यह भी मानते हैं कि मनुष्यों की तरह ईश्वर का कोई निजी या व्यक्तिगत नाम  (personal Name )नहीं हो सकता क्योंकि ईश्वर अजन्मा है , और ऐसा कोई नहीं होगा जिसने ईश्वर का नामकरण किया होगा .इसलिए लोग ईश्वर को अनेकों नामों से   पुकारते हैं ,जो ईश्वर के गुणों , शक्तियों ,और महानता को प्रकट करते हैं .जिनको ईश्वर की " विभूतियाँ " भी कहा जाता है .परन्तु इस्लाम एकमात्र ऐसी विचारधारा है ,जिसे धर्म समझना तर्कसम्मत नहीं माना जा सकता है .क्योंकि इसमे इस्लाम के अल्लाह के बारे में परस्पर विरोधी ,तर्कहीन और ऊंटपटांग बातों का समावेश है .जिनका उद्देश्य केवल गैर मुस्लिमों को किसी न किसी तरह से फ़साना और प्रताड़ित करना है .इस बात को और स्पष्ट करने के लिए हमें अल्लाह के बारे में इस्लामी किताबों और मुल्लों फतवों को देखना होगा .साथ में यह भी जानना होगा कि इस्लाम से पहले अल्लाह कहाँ था , और अल्लाह शब्द का जन्म कैसे हुआ था .
1.अल्लाह का जन्म 
भले ही इस्लामी विद्वान् अपने अल्लाह को अजन्मा बताते रहें ,लेकिन अल्लाह का जन्म उसी दिन हो गया था , जिस दिन कुरान की पहली पहली सूरा बनी थी .इतिहास के अनुसार कुरान की पहली सूरा " अलक " है . जो वर्त्तमान कुरान में 96 वें नंबर पर है .देखिये ,
बुखारी -जिल्द 1 किताब 1 हदीस 3 और बुखारी -जिल्द 4 किताब 55 हदीस 605
चूँकि कुरान की पहली सूरा माह रमजान सन 610 ईo बनी थी ,यही अल्लाह की पैदायश का समय माना जायेगा . क्योंकि इस से पहले अल्लाह का कोई अस्तित्व नहीं था .कुरान की पहली मक्का की एक पहाड़ी "जबल अन्नूर "या " गारे हिरा "में बनी थी , इसलिए यही अल्लाह का जन्मस्थान है .तब से अब तक इस कल्पित अल्लाह के नाम पर करोड़ों निर्दोष लोगों की हत्या की गयी , और यह सिलसिला अभी तक चालू है ,
2-अल्लाह शब्द की चोरी 
इस्लाम से पहले अरब और आसपास के भाग में यहूदी धर्म का प्रभाव था ,और यहूदी धर्म की पुस्तकों में ईश्वर के लिए हिब्रू भाषामे " एली " और "एलोह "शब्द इस्तेमाल किया जाता था ,जिसका अर्थ "देव " होता है .और इसका बहुवचन "एलोहीम " होता है .(Aramaic word for god is “alah.” In Hebrew the word for God or god is (אל) (el) and “Elah,” (or Eloh) and the plural form is (אלוהים) (elohím)
चूँकि ईसामसीह की मातृभाषा भी हिब्रू थी इसलिए क्रूस पर चढाने के बाद उन्हों अपने ईश्वर को इस प्रकार पुकारा था ,
" और करीब तीसरे पहर पर यीशु ने पुकारा " एली एली लमा शबकतनि "अर्थात हे प्रभु तूने मुझे क्यों त्याग दिया " बाइबिल - नया नियम .मत्ती 27:46

“And about the ninth hour Jesus cried with a loud voice, saying, Eli, Eli, lama sabachthani? that is to say, My God, my god, why hast thou forsaken me?”

 [Matthew 27: 46

मुहम्मद साहब काफी चतुर व्यक्ति थे , उनको पता था कि यहूदी ईश्वर को "इलोह " कहते हैं जो अरबी के शब्द " इलाह الإله" से मिलता है , जिसका अर्थ "देवता " होता है .और अरब के लोग अपने हरेक देवता को "इलाह الاه " कहते थे .इसलिए पहले तो मुहम्मद साहब ने एक चाल चली
3-इलाह से अल्लाह
सबसे पहले मुहम्मद साहब ने मक्का के लोगों को यह बात कह कर बहकाया कि ,
" और हे लोगो यह तो (देवताओं के ) सिर्फ नाम ही हैं ,जिनको तुम्हारे पूर्वजों ने रख लिया था .इनके बारे में कोई प्रमाण नहीं है . यह तो सिर्फ कल्पना है ,और लोग बस उसी पर चल रहे हैं " सूरा -अन नज्म 53:23

﴿ إِنْ هِيَ إِلَّا أَسْمَاءٌ سَمَّيْتُمُوهَا أَنْتُمْ وَآَبَاؤُكُمْ مَا أَنْزَلَ اللَّهُ بِهَا مِنْ سُلْطَانٍ إِنْ يَتَّبِعُونَ إِلَّا الظَّنَّ

وَمَا تَهْوَى الْأَنْفُسُ وَلَقَدْ جَاءَهُمْ مِنْ رَبِّهِمُ الْهُدَى ﴾
फिर अरबी में देवता के लिए प्रयुक्त शब्द " इलाह " के साथ "अल " शब्द लगाकर "अल्लाह " शब्द गढ़ लिया .(Thus the word “Allah” is “al-ilah” and literally “The god,” as in the Arabic phonetic construction (ال + إله = اللَّهُ). Of course).और अरब के जाहिल लोगों को बहकाया कि हमारा बनाया अल्लाह और तुम्हारा इलाह एक ही हैं .और कहा ,
वही तुम्हारे पूर्वजों का देवता है ," व् इलाह आबाइक  إِلَٰهَكَ وَإِلَٰهَ آبَائِكَ"और वही एकमात्र देवता है "इलाह वाहिदन إلها واحدا"सूरा -बकरा 2:133
और मूर्ख लोग मुहम्मद के झांसे में आकर इलाह और अल्लाह को एक ही मान बैठे .और मुहम्मद साहब के जोड़ तोड़ से बनाये अल्लाह को ही अपना इलाह समझने लगे .
4-विषम संख्या का शौकीन अल्लाह
कुरान और हदीसों के अनुसार अल्लाह को विषम संख्या बहुत पसंद है ,यहाँ तक वह उनकी कसमे भी खाता है . जैसे
"और कसम खाता हूँ सम और विषम की " सूरा -अल फज्र 89:3
 " وَالشَّفْعِ وَالْوَتْرِ "89:3

इसलिए जब मुहम्मद साहब ने देखा कि दुसरे धर्मों में ईश्वर के अनेकों नाम हैं , तो उन्होंने अपने अल्लाह के कई नाम गढ़ लिए ,
5-अल्लाह के नामों की रचना 
धीमे धीमे अल्लाह के नए नए बनते गए ,लेकिन उनकी संख्या विषम ही रखी गयी .इसका कारण हदीस से मिलता है ,
अबू हुरैरा ने कहा कि रसूल ने इब्न अब्दुल्लाह और सुफ़यान से कहा है , कि अल्लाह को "वित्र " यानि विषम संख्या (Odd ) बहुत पसंद हैक्योंकि अल्लाह खुद विषम है , इसलिए अल्लाह के सब प्रकार के नाम मिला कर नब्बे और नौ नाम अर्थात निन्यानवे नाम हैं ,और जो अल्लाह को इन नामों से पुकारेगा , या इन नामों को याद करेगा वह जन्नत में दाखिल होगा .
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، قَالَ حَفِظْنَاهُ مِنْ أَبِي الزِّنَادِ عَنِ الأَعْرَجِ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، رِوَايَةً قَالَ ‏ "‏ لِلَّهِ تِسْعَةٌ وَتِسْعُونَ اسْمًا، مِائَةٌ إِلاَّ وَاحِدًا، لاَ يَحْفَظُهَا أَحَدٌ إِلاَّ دَخَلَ الْجَنَّةَ، وَهْوَ وَتْرٌ يُحِبُّ الْوَتْرَ ‏"‏‏.‏"

( इस हदीस में अरबी के कहा है ' हुवल वित्र व् युहिब्बुल वित्र وَهْوَ وَتْرٌ يُحِبُّ الْوَتْرَ  "अर्थात अल्लाह विषम है , और विषम ही पसंद करता है Allah is Witr (one) and loves 'the Witr' (i.e., odd numbers)

.सही बुखारी -जिल्द 8 किताब 75 हदीस 419

"अबू हुरैरा ने कहा कि रसूल ने बताया है , अल्लाह के निन्नानवे नाम इसलिए हैं क्योंकि अल्लाह खुद 'वित्र ' यानी अयुग्म (Odd ) है . और अयुग्म चीजें ही पसंद करता है "

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ لِلَّهِ تِسْعَةٌ وَتِسْعُونَ اسْمًا مَنْ حَفِظَهَا دَخَلَ الْجَنَّةَ 

2677 صحيح مسلم كِتَاب الذِّكْرِ وَالدُّعَاءِ وَالتَّوْبَةِ وَالِاسْتِغْفَارِ لله تسعة وتسعون اسما من حفظها دخل الجنة وإن الله وتر يحب الوتر

 सही मुस्लिम -किताब 35 हदीस 6476
6-निन्नानवे का चक्कर 
मुस्लिम मुल्लों ने अल्लाह के नामों की 99 संख्या पूरी करने के लिए कई सूचियाँ बना डाली ,जिनके नामों में काफी अंतर है .जो एक दूसरे से अलग है .जो इन साइटों से साबित होता है
List .1.http://voyagebwp.wordpress.com/2010/06/17/99-names-of-allah-with-english-meanings/


list-2http://muttaqun.com/99names.html

यह दोनो साइटें मुसलमानों ने बनायी हैं . जो चाहे इनको खोल कर अल्लाह के 99 नामों में अंतर देख सकता है . बहुत से मुसलमान भी इस बात से अनजान हैं ,कि वास्तव में अल्लाह के असली 99 नाम कौन से हैं .
7-मुहम्मद साहब की योजना 
मुहम्मद साहब चाहते थे कि लोग उनके बनाये अल्लाह की तारीफ करें , इसलिए कुरान में अल्लाह के मुंह से कहलावाया कि ,
और अल्लाह को अच्छे गुण वाले नाम पसंद है ,तो तुम उन्हीं के द्वारा उसे पुकारा करो "सूरा -अल आराफ 7:180
"وَلِلَّهِ الْأَسْمَاءُ الْحُسْنَى فَادْعُوهُ بِهَا"7:180
"और उसी के लिए (अल्लाह के लिए) अच्छे नाम हैं " सूरा -अल हश्र 59:24
لَهُ الْأَسْمَاءُ الْحُسْنَى "Sura-al hashr59:24
फिर मुहम्मद साहब ने लोगों से यह भी कह दिया ,
"अल्लाह के सिवा कोई 'इलाह 'नहीं है ,और उसके लिए अच्छे नाम हैं "सूरा -ता हा 20:8

"اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ لَهُ الْأَسْمَاءُ الْحُسْنَى"Sura -Taha 20:8
8-अल्लाह के बुरे नाम 
यद्यपि अल्लाह चाहता था कि उसके अच्छे अच्छे नाम रखे जाएँ ताकि उसके दुर्गुणों पर पर्दा पड़ा रहे , और लोगों को ऐसा लगे कि जैसा अल्लाह शरीफ और शांत है वैसे ही मुसलमान भी होंगे . लेकिन मुहम्मद साहब ने अल्लाह के बुरे नाम भी उजागर कर दिए .जो इस प्रकार हैं .अल्लाह के इन बुरे नामों को अर्थ सहित प्रथम सूची से लिया गया है , जिसके क्रमांक भी दिए गए हैं
91.अज्जार"Ad-Darr (الضار) The Creator of The Harmful,which means "The Harmer अर्थात " हानिकर्ता "इस नाम का प्रयोग कुरान में सूरा -अल फतह 48:11,सूरा -अल हज 22:12,सूरा -यूनुस 10:18 और सूरा -अल फुरकान 25:55 में हुआ है .
72." मुअख्खिर " Al-Mu’akhkhir (المؤخر) The Delayer- means "The Delayer,"अल्लाह को इस बुरे नाम का प्रयोग कुरान में सूरा -इब्राहीम 14:10.सूरा -नहल 16:61,सूरा फातिर 35:45 और सूरा -नूह 71:4 में पुकारा गया है .
62."अल मुमीत "Al-Mumit (المميت) The Taker of Lifeअर्थात प्राणघाती या प्राणहर्ता अल्लाह को इस बुरे नाम से कुरान में सूरा -बकरा 2:258,सूरा -बकरा 2:28,और सूरा -आले इमरान 3:156 में संबोधित किया गया है .
 क्योंकि अल्लाह के यह नाम उसके गुणों और स्वभाव को प्रकट करते हैं , इसलिए ऐसे अल्लाह का वही व्यक्ति नाम लेगा जिसकी बुद्धि नष्ट हो चुकी हो
9-अल्लाह के नाम दादागिरी 
वैसे तो इस्लाम के सभी नियम , कानून मानवता विरोधी हैं , लेकिन इतिहास साक्षी है, जब भी इस्लाम और सत्ता का कुसंयोग होता है , अर्थात मुसलमानों की हुकूमत हो जाती है ,तो मुस्लिम शासक और मुल्ले मिल कर गैर मुस्लिमों को फ़साने के लिए ऐसे फतवे देते रहते हैं ,जिस से निर्दोष होने पर भी गैर मुस्लिमों को अपराधी सिद्ध करके उनपर कठोर सजाएँ दी जा सकें .जिस से बचने के लिए वह इस्लाम कबूल करने पर विवश हो जाएँ .ऐसा एक उदहारण हमें मलेसिया के सेलानगोर राज्य से मिलता है .जिसका पूरा विवरण इस प्रकार है ,
"अखबार " दि इंडियन एक्सप्रेस " के अनुसार मलेसिया की सन 2010 की जनगणना के मुताबिक वहां 61.4% मुस्लिम ,17.8% बौद्ध ,9.2% ईसाई ,और 6.3% हिन्दू रहते हैं ,यद्यपि वहां के संविधान की धारा 11 में सभी धर्मों के लोगों को बराबर का अधिकार दिया गया है . लेकिन यह केवल दिखावा ही है .क्योंकि मलेसिया के राज्य सेलानगोर के सुल्तान "शरफुद्दीन इदरीस शाह ' ने वहां के मुफ़्ती " मुहम्मद मिसरी " के फतवे दवाब में आकर एक आदेश जारी किया है .कि गैर मुस्लिमों के लिए अल्लाह शब्द का प्रयोग करने पर प्रतिबन्ध है .सुल्तान का यह बेतुका आदेश गजट में भी प्रकाशित किया गया है .जिसमे लिखा है ,जो भी गैर मुस्लिम अल्लाह शब्द का किसी भी तरह से प्रयोग करेगा उस पर जुरमाना या , और कठोर कारावास की सजा दी जाएगी .(The indian express  Mon, 14 Jan 2013 18:07 IST)

अब हमारा उद्देश्य उन लोगों सचेत करने का है ,जिन पर सेकुलरिज्म का भुत सवार है , और जोड़तोड़ से बनाये गए अल्लाह शब्द का अनावश्यक रूप से गीतों में ,कविता में और बातचीत में प्रयोग करते रहते हैं .ऐसे लोगों को चाहिए कि अल्लाह के साथ उसके समानार्थी शब्द जैसे मौला अदि का भूल से भी प्रयोग नहीं करें .
याद रखिये कि मुसलमानों का अल्लाह मौत देने वाला है .

http://www.indianexpress.com/news/nonmuslims-can-t-use--allah--says-sultan-of-malaysia-s-selangor/1056845/

36 टिप्‍पणियां:

  1. अगर कोई मुस्लिम कन्या मुझसे शादी करेगी तो....... उसे निम्नलिखित फायदे बिना मांगे ही मिल जायेंगे. 1. तलाक का डर नहीं.. ( क्योंकि हम हिन्दुओं में शादी ७ जन्मों का पवित्र बंधन माना जाता है) 2. सूअरों की तरह 20 -25 बच्चे पैदा करने से आजादी... 3. बुरके से आजादी ... 4. घर में पूर्ण सुरक्षा ( अपने भाई, चाचाओं और मौसाओं से ) 5. उनके बच्चे पंचर नहीं बनायेंगे. बल्कि 5 रुपया दे कर बनवायेंगे. 6. बच्चे भी हमेशा प्राकृतिक रहेंगे .कहीं से कोई काट छाँट नहीं होगी. 7. बच्चियों की भी घर में पूर्ण सुरक्षा ( मुहम्मद साहब और फातिमा का प्रकरण तो आप लोगों को याद ही होगा, जबकि दोनों सगे बाप-बेटी थे) 8. बच्चे आतंकवादी नहीं बनेंगे.. 9. और सबसे बड़ी बात कि.आप बैठे-बिठाये दुनिया के सबसे पवित्र और गौरवशाली हिन्दू सनातन धर्म का हिस्सा बन जाओगे...! तो, देखा मुस्लिम कन्याओं...शादी एक फायदे अनेक! जल्दी करें.ये सुनहरा मौका हाथ से जाने ना पाए...... ऑफर सीमित समय के लिए ही है.. अंत में बस इतना ही कहूँगा कि..... अपने भाई, चाचाओं और मौसाओं को देखा बार-बार ........ मुझको भी देखो एक बार.....!

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  2. tere saare swaloo ka jawaab mhabharat me he hamare yha aiasa nahi hota

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  3. 1teri bivi kisi aur ke shath soeygi aur tu use 7janam tak chudte hue dekhega namard saale 2kama ke khilate hue gand phat ti he biyaj khata he to bachhe kiya paida karega kaam chor 3apni bhan bivi ko jeens paint to kiya nangi gumadekhne waale dua degen bhadu 4tumhare yahan sharab ke nashe me baap apni bati ko nahi chod raha 10 saboot he 5hamare yaha kama ke khate he tumhare tharha sood ya firood kar ke nahi kam aqal khin ke 6 kaat chaat se pishaab badan ke kisi hisse se laga nahi rheta tujhe achha lagta he to pishaab pi le 7 tumhare yhaan ghar to kiya mandir me bhi ma bhane surakshit nhi 8 tamil aur naksali hum he ya tum 9 dharm ke tou nahi mager hum hindustaan ke atoot ang he paagel dimag ka ilaaj kara ager pasee nahi he to pata bata zaqaat me se bhej dugaa

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  4. me ak hindu,bhagavat ke sath sabhi dharm ke vare me padata hu.tum bi padhe aur fir bhat karo.kisi ke bare me kuch kahnese pahele use jane fir kare.mene abi tak jitana kuch bhi pada he us se keval ae hi bhat mili he.au vo he sabka malik ak

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  5. Part 1
    मकसदे हकीकी



    इंसान की पैदाइश का मकसद अल्लाह तआला ने अपनी इबादत बयान किया है। अल्लाह का इरशाद है: 'और हमने जिन्नात व इंसान को अपनी इबादत के लिए पैदा किया है' (अल कुरआन) यानी जो शख्स दुनियावी जिंदगी में अल्लाह की इबादत में मशगूल रहेगा वह अपनी जिंदगी के ऐन मकसद के मुताबिक जिंदगी गुजारने वाला होगा और उसकी कामयाबी यकीनी होगी। इसके बरअक्स जो शख्स दुनिया की इस चन्द रोजा जिंदगी में अल्लाह की इबादत में मशगूल न रहकर दूसरी चीजों में मसरूफ होगा वह यकीनन अपने मकसदे हकीकी से दूर जाने वाला होगा। गोया वह अपनी मंजिल से हट कर इधर-उधर भटकने वाला होगा। 'इबादत' क्योंकि इंसानों की जिंदगी का बुनियादी मकसद है। इसलिए अल्लाह तआला ने अपने रसूलों व नबियों के जरिये हर दौर में लोगों को उनकी जिंदगी के मकसदे हकीकी की याददहानी कराई। तमाम नबियों व रसूलों ने अल्लाह के एक होने और उसके माबूदे हकीकी होने की दावत दी। आखिर में हजरत मोहम्मद (सल्लल्लाहोअलैहेवसल्लम ) को भेजा गया। आप (सल०) ने भी वहदानियत की आवाज बुलंद की और लोगों को बुलाया। आखिरी पैगम्बर ( सल्लल्लाहोअलैहेवसल्लम ) पर नाजिल होने वाले कलामे इलाही 'कुरआने करीम' में इबादत की बाबत बहुत से मकामात पर तफसील के साथ बयान किया गया।
    इंसान की तखलीक का मकसद क्योंकि अल्लाह की इबादत है। इसलिए हर तरह की इबादत का इंसानों को पाबंद बनाया गया। चाहे वह बदनी इबादत हो या माली इबादत या रूहानी इबादत। नमाज के जरिये बदनी इबादत का मकसद हासिल होता है, रोजा से रूहानी इबादत का मकसद हासिल होता और और जकात से माली इबादत का मकसद हासिल होता है और हज से बदनी, माली और रूहानी हर किस्म की इबादत का मकसद हासिल होता है। गोया अगर कोई शख्स सिर्फ बदनी इबादत में मशगूल रहता है और रूहानी इबादत नही करता तो इबादत का मकसद पूरा नही होता। इसलिए नमाज के साथ मुतअय्यना दिनों में रोजा रखना भी जरूरी है। ऐसे में बदनी व रूहानी इबादत के साथ माली इबादत के बिना भी इबादत की तकमील नही होती। इसलिए जो इसकी इस्तताअत रखते हैं उनके लिए जरूरी है कि वह जकात की अदायगी भी करें। ऐसे ही मामला हजे बैतुल्लाह का है कि अगर किसी के पास सफरे हज की इस्तताअत और खाने-पीने के अखराजात हों उस पर हजे बैतुल्लाह लाजिम हो जाता है यानी ऐसी इबादत करना जो बदन, माल और रूहानियत सबको समेटे हो।
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    1. मुझे एक बात समझ में नहीं आती है कि आप नेचुरल पैदा होते हो
      तो आपके जन्म के बाद लिंग क्यों काटा जाता है इसे काटकर ही तो मुस्लमान बनते हो। आये हिन्दू बनादिये मुस्लिम ये क्या?
      अगर आपका अल्हा सच्चा है तो आपको पहले से ही मुस्लिम बनाके भेजता।

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    2. Hindu ya muslim ka ling katne koi matlab nahi hota.. Ye baat tere bheje me bina islam ko jane nahi aane waali...
      Agar bina ling kate hindu hote he to fir kuch log apne ko isaai, sikh, budhist etc kiu bulate h..

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  6. PART 2

    नमाज, रोजा और हज की तरह 'जकात' भी मुसलमानों पर फर्ज है मगर साहबे निसाब होना शर्त है। जकात के फर्ज होने के बावजूद भी अगर जकात न दी गई तो पूरा निजाम दरहम बरहम हो जाएगा। वह लोग जो गरीबी की हालत में जिंदगी गुजार रहे हैं जिनके पास रोजी रोटी के हुसूल के जराये नही है जो अपाहिज व माजूर है जो अपने घर से दूर बहुत दूर है, जहां न उनका कोई दोस्त है न ही रिश्तेदार। जो अल्लाह के रास्ते में लड़ रहे हैं उनका क्या होगा? गरीबों और जरूरतमंदों का जो खासी तादाद दुनिया भर में है उन्हें सहारा देने के लिए लिए सिर्फ 'जकात' का ही मुस्तहकम निजाम है। जकात की अदायगी अमीर लोगों का तआवुन करती है। उनके मालों व सामानों को पाक कर देती है तरह-तरह की परेशानियों से उन्हें निजात दिला देती है और उनकी रकम व दौलत को महफूज कर देती है। इसलिए अल्लाह तआला ने जकात के निजाम को फलाहयाबी का जरिया बताया है। अल्लाह तआला फरमाता है: बिला शुब्हा फलाहयाब हो गए ईमान वाले जो अपनी नमाजों में खुलूस अख्तियार करते हैं फुजूल की बातों से मुंह मोड़ते है और जकात के तरीके पर आमिल होते हैं। (कुरआन) जकात की एक अहम खासियत यह है कि यह माल व दौलत में बरकत का सबब है यानी जकात के अदा करने से माल घटता नही है। दूसरा इस पर जिस अज्र व सवाब का वादा किया गया है वह इंसान के तसव्वुर से ज्यादा है इसलिए जकात को कुरआन ने एक महफूज और घाटे से पाक तिजारत कहा है। अल्लाह का इरशाद है: जो लोग अल्लाह की किताब की तिलावत करते है, नमाज कायम करते हैं, और जो कुछ हम ने उनको दिया उसमें से खुले छिपे खर्च करते है, वह इस तिजारत के उम्मीदवार है जिसमें घाटे का कोई अंदेशा नही। इसलिए कि अल्लाह उनको पूरा बदला देगा और अपने फजल से ज्यादा ही देगा यकीनन वह बड़ा ही दरगुजर करने वाला और बड़ा ही कद्रदान है। (सूरा फातिहा)
    जकात हर उस मुसलमान पर फर्ज है जो साहबे निसाब हो और उस पर एक साल गुजर चुका हो। निसाब की मिकदार जरूरत के सामान के अलावा सात तोला सोना या साढ़े बावन तोला चांदी या इसके बराबर रूपये पैसे होना है। जकात की मिकदार कुल माल में से चालीसवां हिस्सा यानी ढाई फीसद हो।समाज में बहुत से ऐसे लोग भी है जो जकात पूरी पाबंदी के साथ निकालते है और पूरी निकालते हैं। अल्लाह तआला उनको अज्र अजीम अता फरमाएगा। अल्लाह का इरशाद है: 'जो लोग अपने माल अल्लाह की राह में खर्च करते हैं उनके खर्च की मिसाल ऐसी है कि जैसे कि एक दाना बोया जाए और उससे सात बालियां निकलें और हर बाली में सौ दाने हों। इस तरह अल्लाह जिसके अमल को चाहता है, बढ़ा देता है वह फराखदसत और अलीम है।' (बकरा) मगर इस हकीकत से भी इंकार नही किया जा सकता है कि कुछ लोग जकात की अदायगी से जान चुराते हैं कुछ लोग जकात देते हैं मगर कम देते हैं जबकि कुछ लोग आजकल करके टालमटोल करते हैं ताकि उनको जकात ही न देनी पडे या फिर अदा करते है मगर नागवारी और तंगदिली के साथ, यह सारी बातें इंतिहाई खतरनाक हैं। जकात अदा न करने वाले के लिए दर्दनाक अजाब है। नागवारी या बुरा भला कहकर जकात देने से भले ही उसके जिम्मे से फर्जियत साकित हो जाती है लेकिन उससे कारोबार की सारी बरकत जाती रहती है। जकात क्योंकि अहम तरीन इबादत है। इसलिए इसको पूरे अदब व एहतियात के साथ अदा किया जाए। ऐसा न हो कि इसको गैर इस्लामी तरीके से दिया जाए कि इस पर खातिरख्वाह सवाब ही न मिल सके। जकात देते वक्त नियत को खालिस कर लिया जाए। इसमें किसी तरह की मिलावट बाकी न करे। जकात देने वाले के दिल में यह ख्याल होना चाहिए कि वह यह सब कुछ अल्लाह की रजा के लिए कर रहा है न कि किसी तरह के दिखावे के लिए। इसलिए जकात का मकसद अल्लाह की खुशनूदी हासिल करना ही तो है। जैसा कि कुरआन में बयान किया गया है 'और जो कुछ तुम खर्च करते हो। इसीलिए तो करते है कि खुदा की खुशनूदी हासिल हो। (बकरा) जकात देते वक्त इस बात का भी ध्यान रखा जाए कि जकात अपनी हलाल कमाई से दी जाए, यह नही कि हराम तरीके से कमाए हुए रूपयों को जकात के तौर पर अदा किया जाए। इस्लामी तालीमात ऐसा करने से मना करती है। नबी करीम (सल्लल्लाहोअलैहेवसल्लम ) ने फरमाया: 'अल्लाह पाक है और वह सिर्फ वही सदका कुबूल फरमाता है जो पाक माल से दिया गया हो।' (मुस्लिम) जकात की अदायगी के वक्त इस बात का भी ध्यान रखना जरूरी है कि जो माल जकात के तौर पर अदा किया जाए वह साफ सुथरा हो। यह न किया जाए कि छांट कर गला सड़ा माल दे दिया जाए। ऐसा करना बाइसें गुनाह है। अल्लाह का इरशाद है: ऐसा न हो कि (खुदा की राह में) चीजें छांटने लगो।' (बकरा)
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  7. PART 3

    हिदायत है उन परहेजगारों (वे लोग जो अल्लाह से डरते हुए पापों से दूर रहते है) के लिए जो गैब पर ईमान लाते हैं, नमाज कायम करते हैं, और जो कुछ हमने इन्हें दिया है उसमें से (अल्लाह की राह में) खर्च करते हैं।
    बकर 2: 2-3


    बेशक कामयाब हो गए ईमान वाले जो अपनी नमाजों में खुशु (मन लगाकर) इख्तियार करते हैं, लगू (बेहूदा) बातों से दूर रहते हैं, जकात के तरीके पर आमिल रहते हैं।

    मोमिनून 23: 1-4


    जो ब्याज तुम देते हो कि लोगों के माल में शामिल होकर वह बढ़ जाएगा, अल्लाह के नजदीक वह नहीं बढ़ता और जो जकात तुम अल्लाह की खुशनूदी (खुशी) हासिल करने के इरादे से देते हो, उसी के देने वाले वास्तव मे अपना माल बढाते हैं।
    रूम 30: 39

    जो लोग ईमान लाएं और नेक अमल करें और नमाज कायम करें और जकात दें उनका बदला बिना किसी शक के उनके रब के पास है और उनके लिए न कोई डर है न किसी दुख का मौका है।
    बकर 2: 277

    और मोमिनीन के मालों में मांगने वालों और नादारों का हक होता है।
    मआरिज 70: 24-25

    वह अपना माल बावजूद महबूब (माल से प्रेम) होने के रिश्तेदारों और यतीमों पर, मिस्कीनों और मुसाफिरों पर, मदद के लिए हाथ फैलाने वालों पर खर्च करता है और गुलामों की आजादी पर खर्च करता है।

    तौबा 9: 34-35

    ऐ ईमान वालो जो पाक माल तुमने कमाया है और जो पैदावार हमने तुम्हारे लिए जमीन से निकाली है उसमें से (सदका और दान ) दिया करो ।
    बकर 2: 267

    और जकात का माल तो सिर्फ फकीरों (मोहताज जिनके पास आमदनी का साधन न हो) के लिए और मिस्कीनों के लिए है और उन लोगों के लिए जो जकात के काम पर नियुक्त हैं, और जिनका दिल मोहने के लिए और (यह माल) गुलामों को आजाद कराने के लिए, और कर्जदारों की मदद करने में और अल्लाह की राह में (तमाम नेकी के काम जिनसे अल्लाह खुश हो, उलमा की बड़ी तादाद के अनुसार इसका मतलब अल्लाह के लिए जिहाद फी सबिलिल्लाह है), और मुसाफिर नवाजी में काम लेने के लिए है, एक फरीजा ( कर्तव्य ) है अल्लाह की तरफ से और अल्लाह सब कुछ जानने वाला और दाना (अक्लमंद) व बीना (देखने वाला) है।
    तौबा 9: 60

    वह अल्लाह ही है जिसने तरह-तरह के बाग और बेलों के बाग (अंगूर आदि) और खजूर के बाग और खेतियाँ उगाई जिनसे अलग-अलग प्रकार की पैदावार लेते हैं, अनार और जैतून जो एक दूसरे से मिलते -जुलते भी हैं और नहीं भी मिलते। जब वे फल दें तो उनके फल खाओ और अल्लाह का हक अदा करो जो उस फसल की कटाई के दिन वाजिब होता है।
    अनआम 6: 141

    SUNNIKING TEAM

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  8. the God Is only One . That is ALLAH . Allah is great .

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  9. I m Poonam Rawat I Accepted Islam . Allah tum logo ko hidayat de . or dimag bhi .

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  10. OGICAL CONCEPT OF GOD

    My first question to the atheist will be: "What is the definition of God?" For a person to say there is no God, he should know what is the meaning of God. If I hold a book and say that ‘this is a pen’, for the opposite person to say, ‘it is not a pen’, he should know what is the definition of a pen, even if he does not know nor is able to recognise or identify the object I am holding in my hand. For him to say this is not a pen, he should at least know what a pen means. Similarly for an atheist to say ‘there is no God’, he should at least know the concept of God. His concept of God would be derived from the surroundings in which he lives. The god that a large number of people worship has got human qualities - therefore he does not believe in such a god. Similarly a Muslim too does not and should not believe in such false gods.

    If a non-Muslim believes that Islam is a merciless religion with something to do with terrorism; a religion which does not give rights to women; a religion which contradicts science; in his limited sense that non-Muslim is correct to reject such Islam. The problem is he has a wrong picture of Islam. Even I reject such a false picture of Islam, but at the same time, it becomes my duty as a Muslim to present the correct picture of Islam to that non-Muslim i.e. Islam is a merciful religion, it gives equal rights to the women, it is not incompatible with logic, reason and science; if I present the correct facts about Islam, that non-Muslim may Inshallah accept Islam.

    Similarly the atheist rejects the false gods and the duty of every Muslim is to present the correct concept of God which he shall Insha Allah not refuse.

    (You may refer to my article, ‘Concept of God in Islam’, for more details)

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  11. QUR’AN AND MODERN SCIENCE

    The methods of proving the existence of God with usage of the material provided in the ‘Concept of God in Islam’ to an atheist may satisfy some but not all.

    Many atheists demand a scientific proof for the existence of God. I agree that today is the age of science and technology. Let us use scientific knowledge to kill two birds with one stone, i.e. to prove the existence of God and simultaneously prove that the Qur’an is a revelation of God.

    If a new object or a machine, which no one in the world has ever seen or heard of before, is shown to an atheist or any person and then a question is asked, " Who is the first person who will be able to provide details of the mechanism of this unknown object? After little bit of thinking, he will reply, ‘the creator of that object.’ Some may say ‘the producer’ while others may say ‘the manufacturer.’ What ever answer the person gives, keep it in your mind, the answer will always be either the creator, the producer, the manufacturer or some what of the same meaning, i.e. the person who has made it or created it. Don’t grapple with words, whatever answer he gives, the meaning will be same, therefore accept it.

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  12. THEORY OF PROBABILITY

    In mathematics there is a theory known as ‘Theory of Probability’. If you have two options, out of which one is right, and one is wrong, the chances that you will chose the right one is half, i.e. one out of the two will be correct. You have 50% chances of being correct. Similarly if you toss a coin the chances that your guess will be correct is 50% (1 out of 2) i.e. 1/2. If you toss a coin the second time, the chances that you will be correct in the second toss is again 50% i.e. half. But the chances that you will be correct in both the tosses is half multiplied by half (1/2 x 1/2) which is equal to 1/4 i.e. 50% of 50% which is equal to 25%. If you toss a coin the third time, chances that you will be correct all three times is (1/2 x 1/2 x 1/2) that is 1/8 or 50% of 50% of 50% that is 12½%.

    A dice has got six sides. If you throw a dice and guess any number between 1 to 6, the chances that your guess will be correct is 1/6. If you throw the dice the second time, the chances that your guess will be correct in both the throws is (1/6 x 1/6) which is equal to 1/36. If you throw the dice the third time, the chances that all your three guesses are correct is (1/6 x 1/6 x 1/6) is equal to 1/216 that is less than 0.5 %.

    Let us apply this theory of probability to the Qur’an, and assume that a person has guessed all the information that is mentioned in the Qur’an which was unknown at that time. Let us discuss the probability of all the guesses being simultaneously correct.

    At the time when the Qur’an was revealed, people thought the world was flat, there are several other options for the shape of the earth. It could be triangular, it could be quadrangular, pentagonal, hexagonal, heptagonal, octagonal, spherical, etc. Lets assume there are about 30 different options for the shape of the earth. The Qur’an rightly says it is spherical, if it was a guess the chances of the guess being correct is 1/30.

    The light of the moon can be its own light or a reflected light. The Qur’an rightly says it is a reflected light. If it is a guess, the chances that it will be correct is 1/2 and the probability that both the guesses i.e the earth is spherical and the light of the moon is reflected light is 1/30 x 1/2 = 1/60.

    Further, the Qur’an also mentions every living thing is made of water. Every living thing can be made up of either wood, stone, copper, aluminum, steel, silver, gold, oxygen, nitrogen, hydrogen, oil, water, cement, concrete, etc. The options are say about 10,000. The Qur’an rightly says that everything is made up of water. If it is a guess, the chances that it will be correct is 1/10,000 and the probability of all the three guesses i.e. the earth is spherical, light of moon is reflected light and everything is created from water being correct is 1/30 x 1/2 x 1/10,000 = 1/60,000 which is equal to about .0017%.



    The Qur’an speaks about hundreds of things that were not known to men at the time of its revelation. Only in three options the result is .0017%. I leave it upto you, to work out the probability if all the hundreds of the unknown facts were guesses, the chances of all of them being correct guesses simultaneously and there being not a single wrong guess. It is beyond human capacity to make all correct guesses without a single mistake, which itself is sufficient to prove to a logical person that the origin of the Qur’an is Divine.

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  13. CREATOR IS THE AUTHOR OF THE QUR’AN

    The only logical answer to the question as to who could have mentioned all these scientific facts 1400 years ago before they were discovered, is exactly the same answer initially given by the atheist or any person, to the question who will be the first person who will be able to tell the mechanism of the unknown object. It is the ‘CREATOR’, the producer, the Manufacturer of the whole universe and its contents. In the English language He is ‘God’, or more appropriate in the Arabic language, ‘ALLAH’.

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  14. QUR’AN IS A BOOK OF SIGNS AND NOT SCIENCE

    Let me remind you that the Qur’an is not a book of Science, ‘S-C-I-E-N-C-E’ but a book of Signs ‘S-I-G-N-S’ i.e. a book of ayaats. The Qur’an contains more than 6,000 ayaats, i.e. ‘signs’, out of which more than a thousand speak about Science. I am not trying to prove that the Qur’an is the word of God using scientific knowledge as a yard stick because any yardstick is supposed to be more superior than what is being checked or verified. For us Muslims the Qur’an is the Furqan i.e. criteria to judge right from wrong and the ultimate yardstick which is more superior to scientific knowledge.

    But for an educated man who is an atheist, scientific knowledge is the ultimate test which he believes in. We do know that science many a times takes ‘U’ turns, therefore I have restricted the examples only to scientific facts which have sufficient proof and evidence and not scientific theories based on assumptions. Using the ultimate yardstick of the atheist, I am trying to prove to him that the Qur’an is the word of God and it contains the scientific knowledge which is his yardstick which was discovered recently, while the Qur’an was revealed 1400 year ago. At the end of the discussion, we both come to the same conclusion that God though superior to science, is not incompatible with it.

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  15. SCIENCE IS ELIMINATING MODELS OF GOD BUT NOT GOD

    Francis Bacon, the famous philosopher, has rightly said that a little knowledge of science makes man an atheist, but an in-depth study of science makes him a believer in God. Scientists today are eliminating models of God, but they are not eliminating God. If you translate this into Arabic, it is La illaha illal la, There is no god, (god with a small ‘g’ that is fake god) but God (with a capital ‘G’).

    Surah Fussilat:

    "Soon We will show them our signs in the (farthest) regions (of the earth), and in their own souls, until it becomes manifest to them that this is the Truth. Is it not enough that thy Lord doth witness all things?"

    [Al-Quran 41:53]

    Reference: http://www.irf.net/irf/comparativereligion/index.htm

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  16. .



    IDOL USED FOR CONCENTRATION

    Question:

    The Hindu Pundits and Scholars agree that the Vedas and other Hindu religious scriptures prohibit idol worship, but initially because the mind may not be matured, an idol is required for concentration while worshipping. After the mind reaches higher consciousness, the idol is not required for concentration.

    Answer :




    Muslims have reached the higher level of consciousness
    Muslims have reached the higher level of consciousness. If an idol is required for concentration only in the initial stages and not later on when the mind reaches higher consciousness then I would like to say the Muslims have already reached the state of higher consciousness because when we worship Allah (swt) we do not require any idol or statue.

    Child asks why does it thunder?
    When I was discussing with a Swami in IRF. He said that when our child asks us, "Why does the sky thunder?", we reply that "aaee ma chakki pees rahi hai", the grandmother is grinding flour in the heaven; because he is too young to understand. Similarly in the initial stages people require an idol for concentration.

    In Islam we don’t believe in telling a lie, even if it’s a white lie. I will never give such a wrong answer to my child because later on when he goes to school and learns that the thundering sound after lightning is due to the expansion of rapidly heated air, he will either think that the teacher is lying or later on when he understands the fact he will conclude that the father is a liar. If you feel that the child may not understand certain difficult things you should simplify the answer rather than give a wrong fictitious reply. If you, yourself do not know the answer, you should have the guts to be truthful and say ‘I don’t know’. But many children nowadays will not be satisfied with this answer. If this answer was given to my son, he would say "Abba (father), why don’t you know?’ This will compel you to do your homework and thus educate yourself as well as your child.

    Those in standard one require idol for concentration – (2 + 2 = 4 will remain same in standard one and ten)
    Some pundits while trying to convince me regarding idol worship said that in standard one the student is initially taught to worship God by concentrating with the help of an idol but later on when he graduates he no longer requires the idol to concentrate while worshipping the God.

    A very important fact to be noted is that only if the fundamentals of any particular subject is strong, then only will he be able to excel in future for e.g. A teacher of mathematics in standard one teaches the students that 2 + 2 = 4 irrespective whether the student passes school or does graduation or does a Ph. D. in mathematics, the basics of 2 + 2 = 4 will yet remain the same, it will not change to 5 or 6. In higher standards the student, besides addition may learn about Algebra, Trigonometry, Logarithm, etc. but the fundamental of addition will yet remain the same. If the teacher in standard one itself teaches the fundamentals wrong, how can you expect the student to excel in future?

    It is the fundamental principal of the Vedas regarding the concept of God that He has got no image, so how can the Scholars even after knowing this fact keep silent at the wrong practice being done by people.

    Will you tell your son who is in standard one that 2 plus 2 is not equal to 4 but 5 or 6 and only confirm the truth after he passes school? Never. In fact if he makes a mistake you will correct him and say it is 4 and not wait till he graduates; and if you don’t correct him initially you will ruin his future.

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  17. 2.



    WATER IS CALLED BY DIFFERENT NAMES IN DIFFERENT LANGUAGES – GOD IS CALLED BY DIFFERENT NAMES AS ALLAH, RAM OR JESUS

    Question:

    Water is called by different names in different languages: in English as water, in Hindi as paani, in Tamil as tanni. Similarly if God is called either Allah, Ram or Jesus, is it not one and the same?

    Answer:




    To Allah belongs the Most Beautiful Names
    The Glorious Qur’an says in Surah Isra chapter 17 verse 110
    "Say: ‘Call upon Allah, or call upon Rahman: by whatever name ye call upon Him, (it is well): for to Him belong the Most Beautiful Names.‘"
    [Al-Qur’an 17:110]

    You can call Allah by any name, but it should be a beautiful name,should not conjure up a mental picture, and should have qualities that only Allah possesses.

    Water can be called by differnt names in different languages but something else besides water cannot be called water in another language.
    You can call water by various names in different languages, like water in English, paani in Hindi, tanni in Tamil, mai in Arabic, apah in Sanskrit, jal in Shudh Hindi, jal or paani in Gujrati, pandi in Marathi, neer in Kannad, neeru in Telugu, vellam in Malayalam, etc. If a person tells me that his friend has advised that everyday early in the morning he should have one glass of paani, but he is unable to drink it because when he drinks it, he feels like vomiting. On enquiry he says that the paani stinks and it is yellowish in colour. Later I realise that what he is referring to as paani is not water but urine. Thus you can call water by different names having the same meaning but you cannot call other things as water or paani.
    People may think that the example is not realistic and I agree with them because even an ignorant person knows the difference between water and urine. He will have to be a fool to call urine ‘water’. Similarly when any person who knows the correct concept of God, sees people worshipping false gods, he naturally wonders how a person cannot differentiate between a true God and false gods.

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    उत्तर
    1. Allah kon h??

      Hindu use bhagwaan kehte h..

      Bhagwaan kon?

      Jo sarva akarsak ho means has all attraction

      All pleasure wealth asthetics power intellectuals and tyaag..

      That is only posses by Lord Krishna himself.

      Allah is effluence of Krishna.

      Just a extension of krishna..

      Sayad ye aapko kbi samajh na aaye becus one cn only knw krishna by his grace..

      Continue with ur Islaam but yaad rakho niskaam bhakti kro..
      Dont demand anything from Allah
      -Hare Krishna

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    2. Allah kon h??

      Hindu use bhagwaan kehte h..

      Bhagwaan kon?

      Jo sarva akarsak ho means has all attraction

      All pleasure wealth asthetics power intellectuals and tyaag..

      That is only posses by Lord Krishna himself.

      Allah is effluence of Krishna.

      Just a extension of krishna..

      Sayad ye aapko kbi samajh na aaye becus one cn only knw krishna by his grace..

      Continue with ur Islaam but yaad rakho niskaam bhakti kro..
      Dont demand anything from Allah
      -Hare Krishna

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  18. Purity of Gold is not verified by calling it by different names in different languages but rubbing it against a Touchstone.
    In the same way, gold can be called sona in Hindi, gold in English, dhahaba in Arabic. Inspite of knowing all these different names for gold, if a person wants to sell you his gold jewellery and says this is 24 carat pure sona, you will not blindly believe, without verifying it with a goldsmith. The goldsmith confirms whether it is gold or not with the help of a touchstone. The yellow glittering jewellery may not be gold, because all that glitters is not gold.

    Surah Ikhlas is the Touchstone of Theology.
    Similarly, any person or candidate who is called God cannot be accepted as the true God without verifying him with the touchstone. The touchstone of theology, that is study of God, is Surah Ikhlas chapter 112 of the Holy Qur’an which says:

    "Say, ‘He is Allah, The One and Only; Allah, The Eternal, Absolute; He begetteth not Nor is He begotten; and there is none like unto Him.’’’
    [Al-Qur’an 112:1-4]

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  19. Any candidate who passes the Acid test can be called God.
    Any candidate who claims to be God and fits in this four line definition, passes the Acid test, is entitled to be called God and worshipped as God.

    Suppose a lunatic says that Muhammad (pbuh) is God, (God forbid). Let’s put him to the test of Surah Ikhlas.

    "Kul hu allah hu ahad" – Say He is Allah, The One and Only;

    Is Muhammad (pbuh) one and only? No! he was not the only messenger. There were many other messengers.

    "Allah hus Samad" – Allah, The Eternal, Absolute;

    We know that Muhammad (pbuh) had to undergo many hardships. Though he was the mightiest messenger of God, he died at the age of 63 and was buried in Madeenah.

    "Lam ya lid wa lam yulad" – He begetteth not Nor is He begotten;

    We know that he was born in Makkah and his parents were Abdullah and Aaminah. He even had several children e.g. Fatimah, Ibrahim (may Allah be pleased with them), etc.

    "Wa lam ya kullahu kufuwan ahad" – And there is none like unto Him.

    Though all the Muslims love and revere the Prophet (pbuh) and are supposed to follow each and every of his commandments, yet you will not find a single Muslim in the whole world, who in his senses will ever say that Muhammad (pbuh) is God. The Islamic Creed is, "La illaha illallah Muhammadur Rasoolullah", which means that there is no god but Allah, and Muhammad (pbuh) is the messenger of Allah. This is repeated five times a day during the call for prayer, so that the Muslims are reminded daily that although they respect and obey him, he is only a Messenger and servant of God, and not God Himself.

    Verify the Gods you worship.
    Now that we have explained to you how to use the touchstone of theology it is the duty of everyone to verify with this touchstone, whether the gods that they worship are true or false.

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    उत्तर
    1. Sister for ur kind information I wud like to tell u jis Islam ki aap bat kr rhi ho vedic books me wo pehle hi dia gaya h
      Sanatan Dharm is called deen e elahi in muslim custom..
      U might hv nt read our scriptures throughly otherwise u ll nt criticise vedic religion.

      Quran reveals only teaching part which we accept but u knw Bhagwatam is d only book which reveals how does allah look and where is his adobe..
      Abb aap bologi allah can nt b seen fir me puchunga..
      Merraj ka vakia yaad kre jb Hazrat Mohammad ne unko dekha unse baat ki..
      Isi tarah saint moses ko allah ne apni peeth dikhai..
      Ese bahut se vakiye h..
      0r abhi aapko batana jaruri h

      What is our aim to come on earth?

      Itna hi ki ibadat karo aur jannat pao?

      Nhi niskaam bhakti hi wo tareeka h ki khuda aapko mil jaye..
      Jannat to bahut chhoti kwahish h..

      Achchhi bat h aapne islam dharm apnaya

      But u must meet a pure Vaishnav saint before doing so
      To sayad aap hindu rehte rehte hi allah ki ibadat kr paati..

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    2. Sister for ur kind information I wud like to tell u jis Islam ki aap bat kr rhi ho vedic books me wo pehle hi dia gaya h
      Sanatan Dharm is called deen e elahi in muslim custom..
      U might hv nt read our scriptures throughly otherwise u ll nt criticise vedic religion.

      Quran reveals only teaching part which we accept but u knw Bhagwatam is d only book which reveals how does allah look and where is his adobe..
      Abb aap bologi allah can nt b seen fir me puchunga..
      Merraj ka vakia yaad kre jb Hazrat Mohammad ne unko dekha unse baat ki..
      Isi tarah saint moses ko allah ne apni peeth dikhai..
      Ese bahut se vakiye h..
      0r abhi aapko batana jaruri h

      What is our aim to come on earth?

      Itna hi ki ibadat karo aur jannat pao?

      Nhi niskaam bhakti hi wo tareeka h ki khuda aapko mil jaye..
      Jannat to bahut chhoti kwahish h..

      Achchhi bat h aapne islam dharm apnaya

      But u must meet a pure Vaishnav saint before doing so
      To sayad aap hindu rehte rehte hi allah ki ibadat kr paati..

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  20. namaste and adab..jis tarah sanatan dharma aur islam ke yeh Lafj(words) ka matlab ek hai ussi trah yeh dono dharma bhi ek hn....
    poonam tum muzse chhoti ho ya badhi mai yh toh nahi Jaanti..lekin itna zaroor khna chahti hoon ki mene ek musalman hone k bavozood Hindu Dhrama matlab Sanatan Dharma kaboola hai aur muze isse koi shikva nahi hai..yahan tak ki mene shadi bhi 7 fere lekar ki hai kyuki sanatan Dharma mai patni ko pati ka adha Hissa khte hn..mtlb pati-patni agar jiye toh saath aur markr khuda k pass jaen tb bhi sath..na ki islaam mai jis tarah aurto ko sirf bachche peda krne ki machine smza jaata hai..Hindu Dharma mai hamre Divya roop matlb mata ki bhi pooja ki jaati hai aur mardo k Divya roop mtlb Bhagwaan ki bhi pooja ki jaati hai..kyuki Hindu dhrma yh maanta hai ki Ham log Paramaatma se hi bane hn aur unhi mai jakr hame milna hai..mtlab hamri aatmao ko Parmaatma mai Jakrr mill jaana hai..Jisse Mouksh bhi khte Hn..Islaam mai khte hn ki Jannat k 7 Aasmaan hain aur mai tumko yh btana chahti hoon k mene Jo 7 fere liye hn voh unhi 7 asmano pr apne pati k saath jane k liye.. liye hain..Taki Jab ham khuda mai zakr mille toh ek sath jakrr mile..aur kya tum bhool gyi ho ki Bhagwat Geeta aurr Qurane paak ki Bhout si baten..agar kahoon ki saari baten milti hain toh voh bhi galt nahi hoga..Quraan mai ram ke bare mai bhi likha hua hai aur Kahna mtlb krishna k bare mai bhi likha hai ki vo pegambar the Jisse Ishvar ne Bheja thaya yuh kaho ki voh Ishvar k hi avtaar the..Jinn kuchh baton ki gehrai ko Quran nhi bta paati hai Voh sab bhi Geeta mai likha hua hai....Yeh likha hai Ki kis baat se phle kya hua hai aurr kis baat k baad kya hoga aurr ab kya ho rha hai aurr hamare Achchhe aur Bure karmo se kya hoga....Iske sath mai yh bhi khna chahti hoon k..Ishvar aur Allah ek hai..aurr usne jo achchhe bure dayre bnaen hain voh bhi ek hai..Hame Nekk banne ki koshish krni chahiye aurr burraiyo se door rhna chahiye..Agar kisi dhrma se hame kuchh achh sikhne ko milta hai toh uss achchhi baat ko maanna chahiye aur agar kisi Dharma mai kuchh krna galt hai toh usko galt hi maanna chahiye..Kisi Dharma mai bhi Buraii ko achchha nhi mana jata hai..yh baat hamesha yaad rakho..Bure log hote hn Dharma kbhi bura nhi hota kyuki Harr Dharma mai sirf ek chiz pr hi zorr diya gya hai Aurr voh hai insaniyat..sirf naamaz ya pooja krne se ishvar apni inayat nhi krta hai..voh innayat krta hai hamari insaniyat ko dekhkarr..Khuda kudd khta hai ki mai apne nekk bndo ko teri madad krne k liye bhejta hoon....Magar khuda kbhi yh nhi btata ki voh unn Nekk bndo ko kis dharma mai bhejega..aur kis avatar mai bhejega..Pehchan hame khudh krni hoti hai..Ho sakta hai tum jiss Dharma ko galt smazte ho khuda ussi dharma ka ek bnda bnkr tumhare saamne ajae aur tumse puchhe ki muzme galt kya hai aur tum uss parvardigaar ko anjane mai bura khdo..aurr voh tumhari unn baton se khafa ho jaey...isliye har dharma ki izzat kro..aurr nekk raah pr chalo..Bhagwaan sb pr kripa krre..aur Khuda hamara issaniyat ki raah pr chalna manzoor kr..

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  21. Sahi keh rahi hn aap vishnoi ji..
    Hame Dharma k naam pr aatank nhi fehlaana chahiye..mai aapki baat se sehmati krta hunn..Harr Dhrma ki apni ek Khasiyat hai..aur Sare Dharmo ke raste Bhale hi alag ho magar Mazil ek hai Us Ishvar or allah k pas jana....

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    उत्तर
    1. Sahi hae Islam SB ko nek bnne ka sndes deta hae

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    2. Sahi hae Islam SB ko nek bnne ka sndes deta hae

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    3. Ha Bhai Vaidek dharm b yahi kehta h bs log isko samjhe bina iski aad me mis use karte h..

      हटाएं
  22. Insan ko apne aap ko sahi hona chhiye bad me insanyat ko Allah hidayt de

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