शुक्रवार, 15 मार्च 2013

इस्लाम को धर्म कैसे मानें ?


कुछ दिन पहले हमारे ब्लॉग के एक पाठक महोदय शाहबाज खान ने टिप्पणी देते हुए एक अजीब सा तर्क दिया है ,कि किसी प्राचीन ग्रन्थ में " हिन्दूधर्म " शब्द का कोई उल्लेख नहीं मिलता है , इसलिए हिन्दूधर्म नामका कोई धर्म नहीं है .जबकि इस्लाम के साथ दीन यानी धर्म शब्द लगा है ,इसलिए इस्लाम एक धर्म है .और उन महाशय से हमारा यही जवाब है कि यदि इस्लाम को धर्म मान भी लिया जाये तो इसमे कथनी और करनी में जमीन आसमान का अंतर है .यही ऐसा धर्म है कि जिसमे रसूल के साथियों , खलीफाओं और मुहम्मद की पत्नियों को मुसलमानों का एक बहुत बड़ा समुदाय खुले आम लानत भेजता रहता है .यही धर्म है जिसमे रसूल द्वारा परदे का हुक्म होने के बावजूद खुद उनकी पत्नी बेनकाब होकर जंग करती है .और जिसके कारण आजतक मुस्लमान आपस में लड़ते रहते हैं .यही नही जहाँ भारत की स्त्री अपने पति के साथ कई जन्मों तक साथ निबाहने का इरादा रखती है .इस्लाम ही एक धर्म है ,जिसमे रसूल की प्यारी पत्नी मरने के बाद रसूल के साथ कब्र के दफ़न होने की जगह पत्थर या जंगल का पेड़ बनने की इच्छा रखती है .
इस लेख से हमारा उद्देश्य किसी की भावना को आहत करना नहीं बल्कि प्रमाण देकर लोगों का इस्लाम के बारे में भ्रम दूर करना है , जिसे संक्षिप्त में बिन्दुवार दिया जा रहा है ,
1-आयशा का परिचय 
मुहम्मद साहब की कुल 12 पत्नियाँ थीं , जिनमे आयशा तीसरे नंबर पर आती है ,अयश के पिता का नाम अबूबकर था जो मक्का में आकर बस गए थे ,अयशा (Arabic: عائشة ) का जन्म सन 612 ईo में हुआ था .आयु में सबसे छोटी होने पर भी मुहम्मद साहब ने सभी औरतों के साथ आयशा को भी " उम्मुल मोमिनीन "(Arabic: أمّ المؤمنين   ) यानी ईमान वालों की माता का पद दे दिया था .जो कुरान की सूरा - अहजाब 33:6 में वर्णित है ,
2-आयशा की हदीसें
मुहम्मद के सहाबी अबू हुरैरा की कुल 5374 हदीसें किताबों में मौजूद हैं , उनमे रसूल के घर के लोगों द्वारा कही गयी हदीसों की संख्या इस प्रकार है ,आयशा 2210,उमर खत्ताब 527,अली इब्न अबी तालिब 536 और आयशा के पिता अबू बकर 142.इस प्रकार मुहम्मद के घर में ही कुल 3425 हदीसों का जन्म हुआ है .अर्थात आधी से अधिक हदीसें तो केवल आयशा द्वारा बयान की गयी हैं .
3-आयशा की पिटायी 
"आयशा ने कहा कि जब भी मैं रसूल को बताये बिना किसी काम के लिए बाहर जाती थी तो रसूल गुस्सा होकर मेरी छातियों पर इतनी जोर से घूंसे मारते थे , कि जिसके कारण कई दिनों तक छातियों में दर्द होता रहता था "
सही मुस्लिम -किताब 4 हदीस 2127
4-आयशा के झूठ 
"" अस्वादबिन यजीद ने कहा कि आयशा ने बताया है , कि रसूल ने अली को पहला खलीफा बनाने की वसीयत करने की इच्छा प्रकट की थी , जिसका मैंने भी समर्थन किया था .लेकिन उस समय उनके सीने में तेज दर्द उठने लगा . इस लिए मैंने उनको सहारा देकर अपनी गोद में लिटा लिया .ताकि वह आराम कर सकें , लेकिन मुझे इस बात का ज्ञान नहीं था कि वह रसूल की अंतिम साँस थी "

Sahin Muslim. Kitaab al Wasiyya-Book 013, Number 4013

"रसूल की म्रत्यु के बाद जब लोगों ने आयशा से रसूल की वसीयत के बारे में पूछा तो .तो आयशा ने इंकार कर दिया .और कहा कि रसूल ने अपने पीछे न कोई दीनार ,दिरहम छोड़ा है .और न उनके पास कोई बकरी , भेड़ या कोई ऊंट ही था . यही नहीं उनके पास कोई निजी सामान भी नहीं था . इसलिए उनकी वसीयत का सवाल ही नहीं उठता "
Sahin Muslim. Kitaab al Wasiyya-Book 013, Number 4011:

5--जंगे जमल 
इस्लामी इतिहास में 'जंगे जमल " को ऊंटों की लड़ाई (Battle of Camel ) कहा जाता है , यह घटना 3 दिसंबर सन 656 ईसवी में बसरा के पास खुरैबा गाँव के "वादी उस्सबा "मैदान में हुई थी . इस लड़ाई में एक तरफ आयशा के समर्थकों और दूसरी तरह अली के समर्थकों में लड़ाई हुई थी , जिसमे आयशा की फ़ौज ह़ार गयी थी .इस लड़ाई में आयशा के 16796 सैनिक और अली के 1070 सैनिक मारे गए थे .

6-लड़ाई का कारण 
शिया इतिहासकारों के अनुसार अयशा अली से उसी समय से नफ़रत करने लगी थी , जब वह एक व्यक्ति के साथ चुपचाप चली गयी थी , और लोगों ने उस पर व्यभिचार का आरोप लगा दिया था .लेकिन अली ने उसका बचाव नहीं किया था .और जब आयशा से पूछा गया कि वह रात भर कहाँ रही तो उसने बहाना कर दिया कि वह अपने गले का हार (Neckless ) खोज रही थी ..जबकि वह एक व्यक्ति के साथ अकेली पकड़ी गयी थी , और हसन ने यह बात अपने पिता अली को बता दी थी . यह सारी घटना इस हदीस में मौजूद है .
Sahih Bukhari Volume 5 ,Book 59,hadith number 462:

7-लड़ाई का कारण -2
आयशा का अली से नफ़रत करने का दूसरा मुख्य कारण यह था , कि जब खलीफा उस्मान की हत्या हुई तो आयशा मदीना में नहीं थी , वह अपने रिश्तेदार जुबैर को खलीफा बनवाना चाहती थी ,लेकिन उसे पता था कि मुहम्मद साहब ने सबसे पहले अली को ही खलीफा बनाने की इच्छा प्रकट कर दी थी .इस लिए अली आयशा के रास्ते की रूकावट बन रहे थे .जब उस्मान का क़त्ल हुआ तो अली बसरा में थे . आयशा जब मदीना आई तो उसने लोगों को बहकाया कि उस्मान की हत्या में अली का हाथ है .आयशा ने कुरैश के सरदारों से कहा कि हमें बसरा जाकर उस्मान की हत्या का बदला लेना चाहिए .और आयशा के साथ जुबैर और ताल्हा भी शामिल हो गए ,आयशा ने फ़ौरन एक फ़ौज बना कर बसरा की तरफ कूच कर दिया , फ़ौज का खर्च यमन के उसी गवर्नर ने दिए जिसे अली ने नियुक्त किया था .अपने इस भारी फ़ौज की कमान संभालने के लिए आयशा ने अपना बुरका फेक दिया और बेपर्दा होकर " अल अक्सर " नाम के ऊंट पर सवार हो गयी .इस तरह वह इस्लाम की पहली ऐसी औरत थी , जिसने मुहम्मद की पत्नी होने के बावजूद कुरान में दिए गए परदे के हुक्म का उल्लघन किया था 

8-लड़ाई का नतीजा 
चूंकि आयशा ने बेपर्दा होकर ऊंट पर सवार होकर लड़ाई का नेतृत्व किया था . इसलिए लोग आयशा के समर्थकों को " ऊंट वाले "(the companions of the camel)الاصحاب الجمل ")  कहने लगे .जो आजकल " सुन्नी " मुसलमान कहलाते हैं .लेकिन अली आयशा के समर्थकों को " नकिसून الناّكثون " यानी वचन तोड़ने वाले कहते nakisun (those who broke oath), थे .इस शब्द का उल्लेख कुरान की सूरा 48 आयत 10 में है .और जो लोग अली के साथ थे उनको " शीअते अली شيعة العلي" यानी अली के अनुयायी कहा जाता है .अर्थात (the followers of Ali).यद्यपि इस ऊंट के युद्ध में आयशा के समर्थक बुरी तरह से पराजित हुए थे .लेकिन शिया लोगों के अनुसार इसी धूर्त , बेशर्म . और चरित्रहीन औरत आयशा के कारण मुसलमानों के दो गिरोह बन गए . जिनकी आपसी लड़ाई में अब तक करोड़ों लोग मारे गए हैं
.यही कारण है कि मुसलमानों का दूसरा बड़ा समुदाय " शिया " सार्वजनिक रूप से मुहम्मद के साथियों ,और उनकी पत्नियों , खासकर आयशा को गालियाँ देते हैं , और उन पर लानत भेजते रहते हैं .जो इस विडिओ में दिया है -Video

Aisha & The Shia | عائشة والشيعة

http://www.youtube.com/watch?v=nw6I_LEQmvI

9-आयशा लानती है ?
आयशा धिक्कार योग्य है , यह प्रमाणों से सिद्ध हो चूका है , मुसलमानों को पता होना चाहिए कि रसूल की पत्नी या रिश्तेदार होने पर भी कोई सच्चा मुसलमान नहीं माना जा सकता है , जब तक उसके कर्म अच्छे नहीं हों . जिसकी मिसाल खुद कुरान की इस आयत में दी गयी है .फिर मुल्ले मौलवियों की क्या हैसियत है .
"अल्लाह ने कुफ्र करने वालों के बारे में नूह की पत्नी और लूत की पत्नी की मिसाल पेश कर दी है , और उनके लिए कहा कहा कि जाओ आग में जहन्नम की आग में दाखिल होने वालों के साथ "सूरा -तहरीम 66:10
10--आयशा की अंतिम इच्छा 
शिया विद्वान् अल्लामा हाफिज कारी वदूद हयी ने अपनी किताब " हयाते आयशा " में लिखा है कि जब रसूल की मौत के बाद लोग अयशा को तसल्ली देने के लिए आये ,तो उसने लोगगों से कहा कि यदि मैं मर जाऊं तो मुझे रसूल के साथ उनके हुजरे में दफ़न नहीं करना ,बल्कि मुझे अल बाकी कबरिस्तान में दफ़न करना ,जहाँ रसूल की दूसरी औरतें दफ़न है , मैं तो चाहती हूँ कि मैं मरने के बाद पत्थर या जंगल का कोई पेड़ बन जाऊं "
"when people came to her for meeting, and gave her hope; she said ,she made this will that she should not be buried in this hujra/place where prophet asws was buried,
so bury me along with other wives in baqi'i"she said 
"i wish i was a stone or a plant in a jungle"

"كنت أتمنى لو كان حجر أو زرع في غابة"
hayat-e-ayesha, qari waduud, page 109]
11-शहबाज खान को जवाब 
अब हम  शहबाज खान से इतना ही कहना चाहते हैं कि किसी चीज का नाम नहीं होने , या नाम बदल देने से लोग गुणों के आधार पर हिन्दूधर्म को धर्म स्वीकार कर लेंगे .लेकिन जिस इस्लाम में खुद मुसलमानों के एक समूह खुले आम मुहम्मद के साथियों को गाली देता हो .जिस इस्लाम में रसूल की औरत व्यभिचार में पकड़ी जाये और उसे बचाने के लिए कुरान की आयत बना दी जाये ,और जो रसूल दूसरों की औरतों के लिए परदे का आदेश देता हो उसी की पत्नी सबके सामने बेनकाब हो कर लड़ाई में हिस्सा लेती हो .और जिस रसूल की प्यारी पत्नी मरने के बाद रसूल के साथ दफ़न होने की बजाये पत्थर या पेड़ बनने की इच्छा रखती हो .हम ऐसे इस्लाम को धर्म कैसे मान सकते हैं .इस से तो बिना नाम का हिन्दू धर्म ही बेहतर है , हिन्दुओं का कोई भी समुदाय न तो किसी दूसरे समुदाय को गाली देता है , और न उनकी हत्याएं करता है .बताइए जो ऊंट वाली के समर्थक भारत को "भारतमाता "कहने पर आपत्ति उठा देते है , वही एक चरित्रहीन औरत को "उम्मुल मोमिनीन "किस मुंह से कहते हैं ?
.हम ऐसी दोगली निति वाले इस्लाम को धर्म नहीं मान सकते .

http://www.ismaili.net/histoire/history03/history339.html


24 टिप्‍पणियां:

  1. हिन्दू तो पूरी संस्कृति है.

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  2. मित्रों , खरगोश जंगल में जब किसी शिकारी जानवर को अपनी ओर आता देखता है तो वह अपनी आँखें बंद करके बैठ जाता है,समझता है जैसे वह खुद कुछ देख नहीं पा रहा, वैसे ही वो शिकारी जानवर उसे देख नहीं पा रहा होगा । ठीक उसी प्रकार शुतुरमुर्ग भी किसी शत्रु जानवर को देख कर बालू में अपने मुंह को छुपा लेता है और समझता है वह सुरछित है, पर इन नादान बेचारों को शिकारी जानवर बड़े आराम से नोच - नोच कर खा जाते हैं ।1000 वर्षों की गुलामी झेलने के बाद भी हम हिन्दुओं में वही खरगोशी और शुतुरमुर्गी सोच बरकरार है ! कैसी अद्भुत विडंबना है,कि सारी दुनिया आज इस्लाम की वास्तविकता को भली - भांति समझने के बावजूद हम आत्मघाती हिन्दू अब तक यही मानसिकता पाले हुए हैं कि सभी धर्म समान हैं, कोई भी धर्म हिंसा नहीं सिखाता !!! कैसी अद्भुत दृष्टिकोण हमारी कि एक धर्म निरपेछ देश में 'अल्पसंख्यक' और 'बहुसंख्यक' जैसे खतरनाक साम्प्रदायिक शब्दों को अपने वोट बैंक के लिए थोपने वाले, धारा 370 बनाके अपने ही देश के अभिन्न अंग कश्मीर से हिन्दुओं का संहार करवाने वाले, एक धर्म निरपेछ देश में समान नागरिक संहिता न बनाकर , कट्टर मुसलामानों को विशेष अधिकार दिलवाकर,तीन करोड़ से अधिक बांग्लादेशी घुसपैठियों को अवैध भारतीय नागरिकता अपने वोट बैंक के तौर पर दिलवाकर , धर्म को लेकर सबसे भयंकर साम्प्रदायिक राजनीति करने वाले कांग्रेस को हम 'सेक्युलर' मानते हैं,और इन महापापों का विरोध करने वालों को साम्प्रदायिक ?!

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  3. गुजरात में मुसलामानों के ही द्वारा किये गए एक उन्माद के प्रतिक्रिया स्वरुप मारे गए दो हजार मुसलामानों के लिए तो ये तथाकथित 'सेकुलर' मिडिया वाले अपने आंसुओं से कलम भिगो-भिगोकर बड़ी तत्परता से दिन रात वर्षों तक लिखते नहीं थकते ,परन्तु विगत 65 वर्षों से कश्मीर ,फिर केरल और अब असम में क़त्ल किये गए लाखों निर्दोष हिन्दू माँ,बहन, बेटियों ,बच्चों ,पुरुषों ,वृद्धों के बारे में लिखने के लिए उनके दिमाग और हाथों को क्या लकवा मार जाता है???!!!इससे बड़ी आत्म प्रवंचना और क्या हो सकती है ? ये सबको पता है क्यों उनके दिमाग और हाथों को लकवा मार जाता है, वह है : इस्लाम रूपी हिंसक जानवर का भय । ये तथाकथित 'मानवतावादी' मीडिया वाले भली भांति जानते हैं की अगर इस्लामी 'जिहाद' के बारे में लिखा या दिखाया तो उनके 'हिट लिस्ट' में उनका नाम लिख लिया जायेगा, हिन्दुओं के विरुद्ध चाहे जितना लिखो, कुछ होने वाला नहीं क्योंकि हिन्दू कभी इस्लामी जानवर जैसा हिंसक बन नहीं सकता । इन छद्म मानवता वादियों का ह्रदय केवल मुसलामानों के लिए ही रोता है,क़त्ल किये गए और अब भी क़त्ल किये जा रहे असंख्य हिन्दुओं के लिए नहीं । सोये हुए को तो जगाया जा सकता है, मगर जो जागकर सोने का नाटक कर रहा हो उसे क्या जगाना ?

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  4. इस्लाम को बिना जाने, बिना समझे ( हो सकता है भली-भांति जान कर भी ) हम अनर्गल ये रटते रहेंगे कि सभी धर्म समान हैं, उग्रवादिओं का कोई धर्म नहीं होता , कोई भी धर्म हिंसा नहीं सिखाता, और इस्लाम धीरे- धीरे हमारी अस्तित्व को ही ख़त्म कर देगा , इस्लाम का केवल और केवल एक ही मिशन है : भारत को एक इस्लामिक देश बनाना, और आज कश्मीर , केरल और असम इसके ज्वलंत प्रमाण हैं कि किस तेजी से इस्लाम अपने मिशन को अंजाम दे रहा है । क्या आपको पता है 'कुरान' का आधार ही हिंसा की बुनियाद पर बना है ? कुरान इस्लाम के साथ किसी भी दुसरे पंथ के सहअस्तित्व को नहीं स्वीकारता ? पुरे कुरान का 57% अंश केवल गैर मुस्लिमों के विरुद्ध भयंकर हिंसा, क्रूर हत्या ,लुट और उनकी नारिओं के साथ बलात्कार के लिए आदेश और निर्देश देता है ?क्या आपने कुरान का हिंदी अनुवाद पढ़ा है ? इस्लाम कोई 'धर्म' नहीं बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा 'अधर्म' है ,एक खुनी ,हैवानी, लुटेरा विचारधारा है । क्या आपको पता है ,मदरसों में मुस्लिम बच्चों को क्या पढ़ाकर उनकी बुनियाद बनायी जाती है, उनके दिमाग को कैसे कुंद बनाया जाता है ? मस्जिदों में जो 'जमात' का आयोजन हर महीने होता है उसमे कोई चारित्रिक और नैतिक उन्नति के लिए आध्यात्मिक ज्ञान नहीं दिया जाता जैसे हिन्दू मंदिरों और धार्मिक अनुष्ठानों में दिया जाता है, बल्कि भारत को जल्द से जल्द एक इस्लामिक देश बनाने के साजिश को पुख्ता बनाने का काम किया जाता है ? क्या आपको पता है आज कश्मीर, केरल, असम के साथ - साथ पुरे देश में में जो भयानक खुनी मंजर चल रहा है वो सब 'कुरान' के आदेश के अनुरूप ही हो रहा है ?

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  5. इस्लाम का भातृत्व केवल मुसलामानों तक ही सीमित होता है,धर्म तो वह होता है जो विश्व बंधुत्व का सन्देश फैलाये , वसुधैव कुटुम्बकम, सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे भवन्तु निरामया: की भावना के साथ सारे संसार की मंगल कामना करे। जो ग्रन्थ अन्य मतावलंबियो का नाम लेकर स्पष्ट रूप से निर्देश देता है ' तुम यहुदिओं , ईसाईयों और किसी भी गैर मुस्लिम को अपना मित्र न बनाओ, उन्हें घात लगाकर यातना देकर क़त्ल करो ' कोई धर्म ग्रन्थ कैसे हो सकता है ? हर मुस्लिम को एक क्रूर, निष्ठुर हत्यारा बनाने के उद्देश्य से जानवरों को 'जबह' जैसे दर्दनाक मौत देकर मुसलमानों को मांस खाने के लिए स्पष्ट निर्देश देने वाले क्रूर विचारधारा को एक धार्मिक विचारधारा कैसे माना जा सकता है ? मुसलमानों में जितने भी अच्छे इंसान बने या अब भी हैं , वे केवल सतही तौर पर खुद को मुसलमान मानने को मजबूर थे या हैं, ( जिनकी संख्या नगण्य के बराबर है) ब्यावहारिक और मानसिक तौर पर वे उसी विचारधारा और सिद्धांत को मानते और जीते हैं जो शाश्वत है, सनातन है,प्रकृति और इश्वर के नियमों के अनुरूप है , इस्लाम के बेहूदी,बेतुकी, अत्यंत मूर्खतापूर्ण, क्रूरतम, खुनी ,लुटेरे विचारधारा को वे अपने जीवन में प्रवेश करने नहीं देते, जिसके फलस्वरूप ही वे अच्छे इंसान बने । काजी नजरुल इस्लाम,उस्ताद बिस्मिल्ला खां ,बड़े गुलाम अली खां ,अश्फाख उल्ला खां ,खान अब्दुल गफ्फार खान ,जैसे और भी अनेक महान मुस्लिम महापुरुष इसके जीते -जागते उदाहरण थे, और आज भी अनेकों महान मुस्लिम जीते - जागते उदहारण हैं ।

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  6. काजी नजरुल इस्लाम ने हिन्दू देवी देवताओं के अनेकों भजन और भक्ति गीत लिखे,उस्ताद बिस्मिल्ला खां जीवन भर सरस्वती की पूजा किया करते थे, मुसलामानों ने इन्ही कारणों से इन महापुरुषों को ' काफिर ' घोषित कर दिया था ,परन्तु सारा हिन्दू समाज इनको सर आँखों पर बिठाया,अत्यधिक आदर और सम्मान दिया और अब भी देते हैं । इस्लाम और सनातन धर्म में यही तो सबसे बड़ा फर्क है कि जो मुसलमान इस्लाम के मूल सिद्धान्तों को कभी गंभीरता से नहीं माना ,वह मुसलमान एक अच्छा इंसान,एक अच्छा नागरिक,और एक राष्ट्र भक्त बन गया, और जो मुसलमान इस्लाम के मूल सिद्धांतों को गहराई से मानने लग गया तो वो कट्टर खुनी जिहादी बन गया ,(दुर्भाग्य और कांग्रेस की सहायता से भारत के कट्टर मुल्ले - मौलवी यही काम दिन रात कर रहे हैं ) इसके विपरीत जो हिन्दू सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों से दूर हट गया ,उसने खुद अपनी जिंदगी भी बर्बाद कर ली और समाज के लिए भी जहर बन गया । भारत और नापाकिस्तान के मुसलामानों में जितने भी बड़े विज्ञानी,कलाकार,साहित्यकार ,संगीतकार आदि बने ,वे सब इस्लाम के कारण नहीं ,बल्कि जेनेटिक्स के कारण बने । ये निर्विवाद सत्य है कि भारत और पाकिस्तान के सभी मुस्लिम हिन्दुओं के ही वंशज हैं, प्रतिभा जेनेटिक्स में विद्दमान होती है, ये भी विज्ञान का निर्विवादित प्रमाणित तथ्य है । यही कारण है कि लुटेरों, हत्यारों, बलात्कारिओं ,क्रूर कबीलाई डकैतों के जेनेटिक्स वाले अरब वासिओं में न कोई विज्ञानी बनता है, न कोई समाज सुधारक,न कोई बड़ा साहित्यकार, न कलाकार।

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  7. ये तो 'गैर- मुस्लिमों' की ही देन है कि उनके द्वारा ही इजाद किये गए डीजल, पेट्रोल,और प्राकृतिक गैसों के कारण, और इनके खपत के लिए इजाद किये गए तमाम तरह के साधनों के कारण ही ये अरब वासी आज अकूत संपदा के मालिक बन बैठे हैं ,वरना ये आज तक लुट- मार वाले अपने पारम्परिक कबीलाई जीवन ही जी रहे होते , क्योंकि इनके पास न तो खेती - बारी करने लायक सुजला सफला सश्य श्यामला धरती माँ होती न वैज्ञानिक आविष्कार करने लायक प्रतिभा । आज तक मेरे सामने स्वयं कई मुसलमानों ने बड़े दुःख और गंभीरता से ये स्वीकारा कि हमारे परिवार में पुरखों से इस सच्चाई को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखा गया है कि हम दुनिया के एकमात्र अहिंसक , शाश्वत ,सनातन ईश्वरीय पवित्र धर्म हिन्दू धर्म के वंशज हैं , हमारे पूर्वजों ने अपनी माँ बहन बेटियों की इज्जत आबरू और सारे परिवार की जिंदगी बचाने के लिए निरुपाय होकर अत्यंत दुःख और पीड़ा के साथ इस्लाम जैसे क्रूर, हत्यारे,लुटेरे ,ब्यभिचारी ,अवैज्ञानिक, अप्राकृतिक ,अमानवीय विचारधारा को अपनाया था । हम ऊपर से तो मुसलमान दीखते हैं,परन्तु ह्रदय और मन से अपने आप को आज भी हिन्दू ही मानते हैं। हम अपने पवित्र धर्म में वापस आने के लिए ब्याकुल हैं ,पर कट्टरपंथी खतरनाक मुल्ले मौलविओं के भय से इस्लाम रूपी इस घृणित चोले को उतार कर फेक नहीं पा रहे हैं,क्योंकि इस्लाम में प्रवेश के द्वार तो खुले हुए हैं , मगर बाहर निकलने की सजा केवल मौत है ।

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  8. परन्तु हम निराश नहीं हैं, हमें आशा ही नहीं, बल्कि पूर्ण विश्वाश है कि एक न एक दिन इश्वर की दया से हम पुन: अपने पवित्रतम धर्म में वापस जरुर आयेंगे । मित्र, सच्चाई से मुह मोड़ लेने से सच्चाई बदल नहीं जाती । खरगोश और शुतुरमुर्ग की तरह आँखे मूंद लेना समस्या का हल नहीं हैं ,समस्या का सामना करना ही एकमात्र समाधान है ,इसका मतलब मेरे कहने का ये तात्पर्य नहीं है कि हम हाथ में तलवार लेकर मुसलामानों से लड़ने निकल पड़ें । बल्कि जिस तरह एक हिंसक जानवर को अगर कोई पालना चाहे तो चाहे वो उसकी लाख सेवा करे, लाख खुशामदी करे,लाख प्यार करे , अवसर मिलते ही वो किसी भी समय जानलेवा हमला कर सकता है, उसे अगर पलना ही है तो उसे एक निश्चित पिंजरे में रखना होगा,एक निश्चित दुरी बनाये रखनी होगी ,हमेशा अत्यंत सावधानी बरतनी होगी , उसी प्रकार इस्लाम रूपी खतरनाक जानवर को वश में रखने के लिए सबसे पहले हमें समान नागरिक संहिता अवश्य बनानी होगी , 'अल्पसंख्यक' और 'बहुसंख्यक' नामक दो भयंकर साम्प्रदायिक शब्दों को ख़त्म करना होगा,समान वैवाहिक और परिवार नियोजन नीति अपनानी होगी, धारा 370 को अविलम्ब ख़त्म करना होगा , मुसलामानों को विशेष अधिकार देना बंद करना होगा ,तीन करोड़ अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेजना होगा, मदरसे रूपी ' जिहादी फैक्ट्रियों ' को शख्ती से बंद करना होगा , गो हत्या पूर्णत: बंद करनी होगी । हर देश वासी का परिचय केवल एक भारतीय के रूप में स्थापित करना होगा , हिन्दू या मुसलमान के रूप में नहीं,तब ही मुसलमान वश में रहेंगे और देश की मुख्य धारा में शामिल होंगे ।

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  9. तब जाकर ही वास्तविक सांप्रदायिक सदभाव कायम होगा , छद्म धर्म निरपेछता और तुष्टिकरण के द्वारा नहीं । और यही धर्म निरपेछता का वास्तविक स्वरुप होगा , जो आज तक कांग्रेस और उनके बाम पंथी आदि मौसेरे भाइयों ने मुसलामानों को केवल स्थायी वोट बैंक बनाए रखने के लिए कभी नहीं किया । जिस प्रकार हिंसक पालतू जानवर को अगर ज्यादा सर चढ़ाया जाये तो एक दिन वो जान का दुश्मन बन बैठता है,उसी प्रकार कांग्रेस और तमाम छद्म सेकुलरों ने इस्लाम रूपी हिंसक जानवर को विगत 65 वर्षों से इतना सर चढ़ाया की आज नौबत यहाँ तक आ गई की 25 करोड़ मुसलमान 100 करोड़ हिन्दुओं की हत्या करने की धमकी दे रहा है,तब इन 'सेकुलर' मिडिया वालों के कलम की स्याही ख़त्म हो जाती है, बिकाऊ TV वालों के कैमरे काम करना बंद कर देते हैं ! इसीलिए मेरे भाई , मेरे बंधु , आज जो भी राष्ट्र वादी ब्यक्ति,संस्था या राजनितिक दल ये कदम उठाने के लिए संकल्पित और प्रयासरत हैं , हमें उनका पूरा समर्थन करना होगा,विरोध नहीं। समर्थन नहीं कर सको तो कम से कम विरोध करके इस देश के प्रति, हिन्दुओं के प्रति आजादी से पूर्व से हो रहे महापाप में स्वयं को भागीदार न बनाएँ, अन्यथा आपकी अपनी ही आनेवाली पीढ़ी सुरछित नहीं रहेगी मेरे भाई । मेरे मित्र ,दुनिया के सबसे हिंसक विचारधारा 'इस्लाम' के खतरनाक सच्चाइयों को उजागर करता इन सभी Links को कृपया गहराई से पढ़ें : http://www.hindusthangaurav.com

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  10. कौन कहता है कि हिन्दू शब्द विदेशियोँ की देन है और किसी भी हिन्दूग्रन्थ मेँ नहीँ आता?
    हिमालयात्‌ समारम्भः यावत्‌ इन्दु सरोवरम्‌ तं देवनिर्मितं देशं “हिन्दूस्थानं” प्रचक्षते।
    :-वृहस्पति आगम
    जब संसार मेँ अरबी व ईरानी सभ्यता का अस्तित्व ही नहीँ था तो उससे भी बहुत पहले उपरोक्त आगम ग्रन्थ लिखा जा चुका था। प्राचीन काल मेँ हिन्द महासागर को इन्दु सरोवर भी कहा जाता था।
    उपरोक्त श्लोकानुसार हिमालय का (हि) तथा इन्दु का (न्दु) शब्द मिलकर (हिन्दू) बनाते हैँ। जैसा कि “हिन्दूस्थान” नाम भी इसी को सूचित करता है।
    ॐ!
    Sabhar Anyatra by S.K.Jha

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  11. Islam zindabad....hinduism jab itna hi saccha dhram tha to islam hinduo ne accept kaise kiya....talwar se ya pyaar se....log to fakiro se islam accept kiya...hindu dharam mein jaat paat ka masla ....harijans ko mandiron mein pravesh nahi karne dena.....unhe gaali samajhna...kya woinsaan nahi hai...kaise hindu dharam mahan ho sakta hai...panditon ne to vidhwaoo ki ...jawan bina shadi wali khubsoorat nari ko daasi banate the aur maze loot te the...kya ye hi hai hindu dhram....hazaron kamzoriya hai hindu dhram mein...islam ne .en garib achoot mane jane walo insaano ko gale lagaya....unhe izzat di aur kaha duniya mein har insaan ek saman hai .koi allah ke samne chota ya bara nahi...ye islam hai...is liye islam hindustan mein faila..
    ....islam ke jaisa koi dharam nahi....kuch musalmano ki wajah se islam galat nahi ho sakta .....

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  12. प्रेम और पवित्रता
    हजरत मोहम्मद जब भी नमाज पढ़ने मस्जिद जाते तो उन्हें नित्य ही एक यहूदी वृद्धा के घर के सामने से निकलना पड़ता था। वह वृद्धा अशिष्ट, कर्कश और क्रोधी स्वभाव की थी। जब भी मोहम्मद साहब उधर से निकलते, वह उन पर कूड़ा-करकट फेंक दिया करती थी। मोहम्मद साहब बगैर कुछ कहे अपने कपड़ों से कूड़ा झाड़कर आगे बढ़ जाते। प्रतिदिन की तरह जब वे एक दिन उधर से गुजरे तो उन पर कूड़ा आकर नहीं गिरा। उन्हें कुछ हैरानी हुई, किंतु वे आगे बढ़ गए।
    अगले दिन फिर ऐसा ही हुआ तो मोहम्मद साहब से रहा नहीं गया। उन्होंने दरवाजे पर दस्तक दी। वृद्धा ने दरवाजा खोला। दो ही दिन में बीमारी के कारण वह अत्यंत दुर्बल हो गई थी। मोहम्मद साहब उसकी बीमारी की बात सुनकर हकीम को बुलाकर लाए और उसकी दवा आदि की व्यवस्था की। उनकी सेवा और देखभाल से वृद्धा शीघ्र ही स्वस्थ हो गई।
    अंतिम दिन जब वह अपने बिस्तर से उठ बैठी तो मोहम्मद साहब ने कहा- अपनी दवाएं लेती रहना और मेरी जरूरत हो तो मुझे बुला लेना। वृद्धा रोने लगी। मोहम्मद साहब ने उससे रोने का कारण पूछा तो वह बोली, मेरे र्दुव्‍यवहार के लिए मुझे माफ कर दोगे? वे हंसते हुए कहने लगे- भूल जाओ सब कुछ और अपनी तबीयत सुधारो। वृद्धा बोली- मैं क्या सुधारूंगी तबीयत? तुमने तबीयत के साथ-साथ मुझे भी सुधार दिया है।
    इसके बाद उस यहूदी वृद्धा ने ख़ुशी से इस्लाम कबूल कर लिया.
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  13. यह दोहरा मापदंड क्यूँ?

    इस्लामी क़ानून में बलात्कार की सज़ा मौत हैं!
    बहुत से लोग इसे निर्दयता कह कर इस दंड पर आश्चर्य प्रकट करते हैं!
    लोगों से सीधा और सरल सवाल किया गया : कोई आपकी माँ या बहन के साथ बलात्कार करता है और आपको न्यायधीश बना दिया जाये और बलात्कारी को सामने लाया जाये तो उस दोषी को आप कौन सी सज़ा सुनाएँगे ?

    जवाब - उसे मृत्यु दंड दिया जाये कुछ ने कहा कि उसे कष्ट दे दे कर मारना चाहिए!

    अगला प्रश्न - अगर कोई व्यक्ति आपकी माँ, पत्नी अथवा बहन के साथ बलात्कार करता है तो आप उसे मृत्यु दंड देना चाहते हैं लेकिन यही घटना किसी और कि माँ, पत्नी या बहन के साथ होती है तो आप कहते हैं मृत्युदंड देना निर्दयता है इस स्तिथि में यह दोहरा मापदंड क्यूँ?

    पश्चिमी समाज औरतों को ऊपर उठाने का झूठा दावा करता है!

    औरतों की आज़ादी का पश्चिमी दावा एक ढोंग है, जिनके सहारे वो उनके शरीर का शोषण करते हैं, उनकी आत्मा को गंदा करते हैं और उनके मान सम्मान को उनसे वंचित रखते हैं पश्चिमी समाज दावा करता है की उसने औरतों को ऊपर उठाया इसके विपरीत उन्होंने उनको रखैल और समाज की तितलियों का स्थान दिया है, जो केवल जिस्मफरोशियों और काम इच्छुओं के हांथों का एक खिलौना है जो कला और संस्कृति के रंग बिरंगे परदे के पीछे छिपे हुए है.
    मृत्यु-दण्ड के सन्दर्भ में सूरा 17 की आयत ३३ भी विचारणीय है. उक्त आयत में प्रयुक्त शब्द 'हक़' से तात्पर्य यह है कि विशिष्ट कुछ दशाओं में ही कुरआन मजीद राज्य द्वारा किसी मनुष्य को मृत्यु-दण्ड वैध क़रार देता है जैसे-

    १. जान बूझकर किसी मनुष्य की ह्त्या करने वाले को!
    २. सत्य-धर्म के मार्ग में रुकावट डालने वाले को!
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  14. महिला जगत

    आइए आज के लिए जिएं मनुष्य का जीवन एक बहती हुई नदी की भॉंति है। जो भी उसमें क़दम रखता है उसका जीवन हर पल आगे बढ़ता रहा है। जीवन एक स्थाई परिवर्तन है और जो चीज़ निश्चित और स्थाई है वो हमारा "आज" है। हमें "आज" के लिए जीना चाहिए। जी हॉ! जो लोग भविष्य की दूर_दराज़ आकांक्षाओं तथा ख़ुशियों के लिए अपना "आज" बर्बाद कर लेते हैं, वे अपने आज के व्यवहार से , कि जो उनके लिए प्रसन्नता दायक हो सकता है अनमिज्ञ रहते हैं।

    हर मनुष्य यहॉ तक कि सबसे ग़रीब व्यक्ति भी अपनी वर्तमान क्षमताओं एवं संभावनाओं तथा अपने ईमान से ऊर्जा लेकर प्रतिदिन और अत्यन्त कठिन परिस्थितियों में भी प्रसन्न और ख़ुश रह सकता है। बहुत से लोग इसलिए ख़ुश नहीं होते क्योंकि वे वर्तमान में जीवन नहीं बिताते। उन्हें निरन्तर अतीत का दुख होता है और भविष्य की चिन्ता लगी रहती है। परन्तु हमें आज की प्रसन्नता एवं जीवन की सुन्दरता को कल की कठिनाइयों एक समस्याओं के बारे में सोच कर हाथ से गंवाना नहीं चाहिए। कल के बारे में तो हमें कोई ज्ञान नहीं है। फिर ऐसे कल के लिए जिसके बारे में हम कुछ जानते ही नहीं परेशान होने से क्या लाभ?अर्थात_ सादी कल बीत चुका और आने वाला कल मौजूद नहीं है। इन दोनों के बीच के अवसर से पूरा लाभ_ उठाओ। इस संदर्भ में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का कथन है जो दिन अभी नहीं आया है उसकी चिन्ता से अपने आज की चिन्ता में वृद्धि न करो।हज़रत अली अलैहिस्सलाम फ़र्माते हैं_ अपने ह्रदय को अतित के दुखों से मत भरो क्योंकि यह तुम्हें भविष्य की तैयारी करने से रोक देता है।और पूरे वर्ष की चिन्ता से अपने आज की चिन्ता में वृद्धि करो क्योंकि आज के लिए तुम्हारे सामने काफ़ी परेशानियॉ हैं। यहॉं पर एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है भविष्य के बारे में विचार और कार्यक्रम बनाने की जो बातें की जाती हैं, फिर उनका क्या होगा? क्योंकि इसके लिए अतीत और भविष्य के बारे में सोच _ विचार करना आवश्यक है।इस प्रश्न के उत्तर में हम कहना चाहेंगे कि अपने अतीत से पाठ लेना और भविष्य के लिए कार्यक्रम बनाना, दुखों, चिन्ताओं और परेशानी में समय बिताने से भिन्न है। भविष्य के लिए एक उद्देश्य को लेकर आगे बढ़ना और प्रयास करना बिल्कुल सही है परन्तु शर्त यह है कि उसकी चिन्ता में फसे न रह जाएं। हमें इस वास्तविकता को समझना चाहिए कि उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उठाए गए हर क़दम का मूल्य स्वंय उस उद्देश्य के बराबर है। यहॉ पर एक बात जो हमें याद रखनी चाहिए वो यह है कि यदि आप केवल उद्देश्य के बारे में सोचें और उसी मार्ग पर आगे बढ़ेंगे तो समझ लीजिए कि आप विभिन्न प्रकार की लालसा का शिकार हो जाएंगे। ऐसी स्थिति में जब आप अपने उद्देश्य तक पहुंच जाएं गे तो आप यह नहीं समझ पाएंगे कि अब क्या करें क्योंकि आप को भविष्य के बारे में बहुत अधिक सोचने की आदत पड़ गई है और निरन्तर किसी बेहतर भविष्य की लालसा में रहते हैं और यह बात इतनी आगे बढ़ जाती है कि आप का पूरा जीवन इसी उधेड़_बुन में बीत जाता है। ठिक उस व्यक्ति की भॉति जो भोजन करते समय इस चिन्ता में रहता है कि बाद में कुछ मीठा भी खाने को मिलेगा या नहीं? इसी चिन्ता में वो भोजन का स्वाद नहीं उठा पाता है। ऐसे लोगों को सदैव यह चिन्ता लगी रहती है कि आने वाला पल उनके लिए कैसा होगा? जब उन्हें उनका उद्देश्य प्राप्त हो जाता है तो भी वे समझते हैं कि अभी कुछ कमी रह गई है, इसी कारण वे सन्तुष्ट नहीं हो पाते जिसके कारण ख़ुशी का आभास भी नहीं कर पाते हैं।मनुष्य और अन्य प्राणियों के बीच सबसे महत्वपूर्ण अन्तर उसकी विचार एवं रचनात्मक शक्ति है। विचारों की रचनात्मकता, नई नई वस्तुओं की खोज तथा उत्पादन और नए विचार सभी एक प्रकार की रचनात्मक शक्ति हैं। कम या अधिक सभी लोगों का मस्तिष्क रचनात्मक होता है परन्तु महत्व इसका है कि इस शक्ति को प्रयोग में लाया जाए। जिन लोगों ने अपनी इस शक्ति को निखारा है वे हर समस्या का समाधान खोज लेते हैं और जब उनके लिए कोई अप्रिय घटना घटती है तो अपनी रचनात्मक शैली द्वारा अपनी नकारात्मक भावनाओं को भली और समारात्मक भावनाओं में परिवर्तित कर लेते है।

    सकारात्मक विचार रखने वाले लोग निरन्तर इस प्रयास में लगे रहते हैं कि जो भी अवसर हाथ लगे उससे लाभ उठाकर जीवन में ख़ुशियॉ भर लें। न उन्हें बीते हुए कल का दुख होता है न ही आने वाले कल की चिन्ता। वे अपना आज सवारने में लगे रहते है। और जिसका आज सवर जाए उसका जीवन ख़ुशियों से भरा होता है। वो ईश्वर पर भरोसा करके आगे बढ़ता है और जो कुछ उसे प्राप्त होता है उसमें ख़ुश रहता है। अन्त में हम यही कहेंगे कि अपने कल से पाठ अवश्य लीजिए पर उसका रोना न रोइए और अपने भविष्य के लिए प्रयास कीजिए पर उसके लिए इतनी न कीजिए कि आप का आज परेशानी में बीत जाए।
    SUNNIKING TEAM

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  15. महिला जगत 1

    आज विवाह के संबंध में बात-चीत करेंगे। यह ऐसा विषय है जो युवावस्था में प्राय: एक समस्या के रूप में सामने आता है। आरम्भ में हम इस्लामी देशों में विवाह के विषय पर चर्चा करेंगे।

    पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने अपने एक विख्यात कथन में विवाह को अपनी परम्परा का एक भाग बताया है।

    पवित्र क़ुरआन में विवाह का उद्देश्य दम्पतियों को एक दूसरे के पास शान्ति प्राप्त करना बताया गया है। इसे प्रेम व अनुकम्पा का सार कहा गया है। इसी लिए इस ईश्वरीय ग्रन्थ में परिवार के गठन और एक स्वस्थ पीढ़ी को जन्म देने पर अत्याधिक बल दिया गया है। परन्तु हम देखते हैं कि इतने ही अधिक बल दिए जाने पर भी, इस्लामी देशों में विवाह के ऑकड़ों में कमी आई है।और इसके परिणाम भी अनुचित निकले हैं। इस्लामी जगत में इस सामाजिक कुरीति के दो कारण हैं। इनमें से एक इस्लामी देशों पर पश्चिम के आधुनिक विचारों का प्रभाव है।

    पश्चिम ने अपने विशेष ऐतिहासिक सांस्कृतिक उद्देश्यों के अनतर्गत धार्मिक धारणाओं, मूल्यों यहॉं तक कि परिवार व विवाह जैसे सामाजिक मूल्यों से मुंह मोड़ लिया है कोई भी सच्चा बुद्धिजीवी या विचारक प्रगतिवाद या अश्लीलता के ख़तरनाक परिणामों को नहीं नकारता और उस स्थान के सुधारकों ने भी प्रति- दिन होते पतन व मूल्यों के संकट पर बारम्बार चेतावनी दी है। पश्चिम में अवैध तथा बिना अभिभावक के बच्चों की संख्या में वृद्धि के चिन्ताजनक आंकड़ों के समाचार मिलते रहते हैं। अवैध होने के कारण इन बच्चों के मन में घृणा तथा ईष्या भरी होती है। यह बड़े होकर हत्या, हिंसा, अतिक्रमण तथा समाज में भ्रष्टाचार फैला कर अपने मन में छिपे द्वेष को व्यक्त करते हैं। इसी आधार और हद से अधिक स्वतन्त्रता के कारण, इन देशों में युवा सबसे अधिक भ्रष्ट लोगों में गिने जाते है।

    खेद से कहना पड़ता है कि इस्लामी देशों में कुछ प्रगतिवादी इस बड़े सांस्कृतिक व ऐतिहासिक अन्तर पर बिना ध्यान दिए हुए ही पश्चिमी संस्कृति के दिखावे के जाल में फॅंस जाते हैं और इसी कारण यह लोग विवाह से दूरी और कठिनाइयों से भाग कर, महिला व पुरूष के संबंधों में स्वतन्त्रता, स्नेह संबंधी भावनाओं और शिष्टाचार की क़ैद से रिहाई को ही प्रगतिवाद, विकास और उन्नति की सॅंज्ञा देने लगते हैं।

    विवाह की दर में कमी आने का दूसरा कारण स्वंय इस्लामी समाजों के भीतर ढूंढना चाहिए। इस्लामी देशों में कुछ लोगों ने विवाह की वास्तविक आवश्यकता तथा उससे संबंधित उचित रीति-रिवाजों को भुलाकर, विवाह को एक अत्यन्त कठिन बन्धन, दिखावा, प्रतिस्पर्धा तथा घमण्ड करने का एक साधन बना दिया है। इन लोगों ने विवाह के लिए ग़ैर इस्लामी शर्तें लगा कर और दम्पत्ति धार्मिक भावनाओं के मापदण्ड की उपेक्षा करके मनुष्य के सबसे उत्कृष्ट संबंध को एक बहुत बड़ी समस्या का रूप दे दिया है।ख्याति प्राप्त करने को महत्व दिया जाना, समाज में वर्ग की समस्या, पोस्ट या रोज़गार की स्थिति यह सभी वो रूकावटें हैं जिन्होंने स्वस्थ व स्थाई विवाह के मार्गों को बन्द कर रखा है। उदाहरण स्वरूप भारत जैसे देश में यदि बहू अच्छा दहेज लेकर नहीं आती तो उसे पति और उसके घर वालों के क्रोध व हिंसा का सामना करना पड़ता है। और कभी कभी दहेज न होने के कारण कुछ बहुएं स्वंय को जला लेती हैं या उन्हें पति या उसके घर वालों द्वारा जला कर मार डाला जाता है। पाकिस्तान में भी दहेज देने में इतनी प्रतिस्पर्धा है कि प्राय: अपनी बेटी के विवाह के लिए पिता दीवालिया हो जाता है।

    इस्लामी संस्कृति में विवाह का प्रचलन, समाज के कल्याण की ज़मानत है इसलिए इस संबंध में की जाने वाली उपेक्षा इस्लामी समाजों के किसी भी मुसल्मान की ओर से स्वीकार्य नहीं है। विशेषकर कि जब इस संबंध में युवा पीढ़ी को सबसे अधिक आधा लगता है।

    इस संबंध में जिस चीज़ की सबसे अधिक आव्शयकता है वो इस्लाम में विवाह की भावना व नियमों का ज्ञान और इस्लामी नियमों से कुछ कुरीतियों को अलग किया जाना है।
    SUNNIKING TEAM

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  16. महिला जगत 2

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम फ़र्माते हैं- मैं पैग़म्बर के पास गया और चुप-चाप उनके सम्मुख बैठ गया।पैग़म्बर ने पूछा – अबूतालिब के पुत्र क्यों आए हो?पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने तीन बार अपना प्रश्न दोहराया। फिर फ़र्माया- लगता है फ़ातेमा का हाथ मांगने आए हो।

    मैंने कहा- जी हॉ।पैग़म्बर ने फ़र्माया- तुमसे पहले भी कुछ लोग फ़ातेमा का हाथ मांगने आए थे, लेकिन फ़ातेमा ने स्वीकार नहीं किया, ठहरो- पहले मैं उनसे पूछ लूं।फिर वे घर के अन्दर गए और हज़रत अली अलैहिस्सलाम की इच्छा को हज़रत फ़ातेमा के सम्मुख रखा। हर बार के विपरीत कि फ़ातेमा अपना मुंह फेर लेती थीं, इस बार शान्तिपूर्वक और चुप बैठी रहीं। पैग़म्बर ने फ़ातेमा के चेहरे पर जब प्रसन्नता के चिन्ह देखे, तो तक्बीर कहते हुए हज़रत अली के पास वापस लौटे और प्रसन्नता से फ़र्माया – उनका मौन उनके हॉं (इच्छा) का चिन्ह है।विवाह एक मज़बूत हार्दिक बन्धन है जो एक सन्तुलित समाज के आधार को बनाता है। इसलिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि यह बन्धन , दोनों पक्षों की चेतना, एक दूसरे की पहचान तथा इच्छा के बाद ही बॉंधा जाए। इस पवित्र बन्धन के लिए उक्त बातों को इस्लाम ने बहुत महत्व दिया है। इसी लिए रसूले ख़ुदा ने अपनी सुपुत्री के विवाह के अवसर पर उनकी इच्छा जानना चाहि थी। क्योंकि बेटी के विवाह के समय पिता की अनुमति इस्लाम में अनिवार्य है।

    हमने तेहरान स्थित शहीद बेहिश्ती विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर डा.मोहक़िक़ दामाद के सम्मुख जब यह प्रश्न रखा तो उन्होंने उत्तर दिया- सबसे पहले मैं यह कहना चाहूंगा जिस लड़की का विवाह एक बार हो चुका हो, और पति की मृत्यु या तलाक़ के कारण वो फिर से विवाह करना चाहे तो पिता की अनुमति ज़रूरी नहीं है। और इस्लामी क़ानून में पुत्री के विवाह पर पिता की अनुमति किसी भी प्रकार उसकी स्वतन्त्रता में बाधा नहीं बनती। कभी कभी क़ानून बनाने वाले और उनसे भी ऊपर धर्म, सार्वजनिक व्यवस्था, अधिकारों के उचित सन्तुल और व्यक्तियों के बीच संबंधों के लिए कुछ सीमाएं निर्धारित करते हैं जिनमें से एक यही हमारी चर्चा का विषय है।

    परन्तु यह समाज में संकल्प की स्वतन्त्रता में बाधा के रूप में नहीं है। इसी लिए इस क्षेत्र में विश्व की लगभग सभी क़ानूनी पद्धतियों में यह सीमाएं विदित हैं जैसे फ़्रांस और दूसरी क़ानूनी व्यवस्थाओं में।इस्लाम में बेटी के विवाह के लिए पिता की अनुमति स्वंय एक क़ानून है, और यह बेटी पर पिता के वर्चस्व के अर्थ में नहीं है तथा उसकी स्वतन्त्रता को कमज़ोर नहीं करता । बड़े बड़े धार्मिक गुरूओं ने भी इस पर विभिन्न दृष्टिकोंण प्रस्तुत किए हैं। एक लड़की की मानसिक और शारिरिक व्यवस्था को देखते हुए इमाम ख़ुमैनी ने बेटी के विवाह में पिता की अनुमति को अनिवार्य माना है और नागरिक क़ानूनों ने भी इसे स्वीकार किया है। इस विषय को भली भॉंति समझने के लिए अच्छा है कि हम समकाली विद्वान शहीद मुतह्हरी के विचारों को देखें – वे कहते हैं-

    पिता की अनुमति की शर्त का यह अर्थ नहीं है कि लड़का बौद्धिक, वैचारिक और सामाजिक विकास में एक पुरूष से कम है, क्योंकि इस विषयका संबंध नर तथा नारी के मनोविज्ञान से है। किसी भी बात पर शिघ्र ही विश्वास करने की अपनी प्रवृत्रि के कारण महिलाएं पुरूषों के प्रेम पूर्ण शब्दों पर भरोसा कर लेती हैं। और कभी कभी लोभी पुरूष, नारी की इसी भावना का अनुचित लाभ उठाते हैं। बहुत सी अनुभव हीन युवतियॉं पुरूषों के जाल में फँस जाती हैं। यही पर इस बात की आवश्यकता कि पिता, जो कि स्वंय पुरूषों की भावनाओं से भली भांति परिचित हैं, अपनी अनुभवहीन बेटी के जीवन साथी के चयन पर नियन्त्रण रखें। इस प्रकार क़ानून ने न केवल यह कि नारी का अनादर नहीं किया हैं बल्कि एक वास्तविक दृष्टिकोंण से उसका समर्थन भी किया है।
    SUNNIKING TEAM

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  17. Allaho baaqi minqulle
    faani






    Bt tere jese logon ko gyan dene se koi fayda nahi hone wala tu jahil he aur jahil hi rahega apni sankirn budhdhi ka parichay tune de diya he

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  18. Allaho baaqi minqulle
    faani






    Bt tere jese logon ko gyan dene se koi fayda nahi hone wala tu jahil he aur jahil hi rahega apni sankirn budhdhi ka parichay tune de diya he

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  19. humara dharm sanatan dharm hai....aur hum log aryan hain.....hindu naam toh persian ka ka.nikala gaya hai

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  20. Kaafi research karni padi aapko...phir bhi afsos...sirf kahaniya bana kr reh gye...islam baht bura dharm h...isiliye dunia ka dusra sbse bada dharm h...

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  21. Itne hi bhanda fodu ho to zara apne krishn bhagwan k bhi bhande phodo....kitni raniya thi unki...kitno ko bhoga....btao....itna mt bolo k samne wale ka patience tut jay...apna dhyan rakho...hm kya hain aur kisko mante hain..ye hmari prblm h..gnda bolne pr mjboor mt kro..

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