बुधवार, 24 अप्रैल 2013

इस्लामी सेकुलर आतंकवाद !


जैसे जैसे लोकसभा के चुनाव का समय आता जा रहा है तो , मुसलमानों के वोटबैंक पर नजर रखने वाले धूर्त और सत्तालोभी नेता खुद को धर्मनिरपेक्ष और राष्ट्रभक्त नेताओं को सम्प्रदायवादी साबित करने में लग गए हैं . और इनका मुख्य निशाना नरेन्द्र मोदी हैं . यदि कांगरेस या जे डी यू और कम्युनिस्ट ऐसा कहते हैं तो कोई ताज्जुब की बात नहीं है लेकिन जब मुसलमान नेता भी धर्मनिरपेक्षता की वकालत करते है , तो हमें उनकी नीयत पर शंका होती है .क्योंकि कुरान या हदीस में न तो धर्मनिरपेक्ष शब्द मिलता है . और न इस शब्द का आशय प्रकट करने के लिए कोई परिभाषा ही मिलती है .अरबी में " धर्मनिरपेक्ष " के लिए "ला मजहबियत " शब्द है . जिसका सही अर्थ है किसी धर्म को नहीं मानना .चूँकि धर्म का अर्थ ईमान भी होता है .और नेताओं का कोई ईमान नहीं होता यह सब जानते हैं . इसी लिए यह लोग खुद को धर्मनिरपेक्ष कहते हैं .जब से सविधान में "धर्मनिरपेक्ष " शब्द जोड़ा गया है तब से ही मुस्लिम नेताओं ने हिन्दू विरोध को ही " धर्मनिरपेक्षता ''मान लिया है .वह कांगरेस का सहारा लेकर हिन्दुओं को प्रताड़ित करने ,उनमे फुट डालने ,हिन्दू युवा लडके लड़कियों को गुमराह करने का हर प्रकार का प्रयत्न करते रहते हैं .जो मुसलमानों के इतिहास से सिद्ध होता है .मुस्लमान न तो कभी धर्मनिरपेक्ष थे , और न आज है और न कभी होंगे . वास्तव में मुस्लिम नेता "धर्मनिरपेक्षता " की आड़ में " इस्लामी सेकुलर आतंकवाद " फैला रहे हैं 

1-मुसलमान और धर्मनिरपेक्षता 
जो मुसलमान और धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देते रहते हैं ,क्या वह इन तथ्यों से इनकार कर सकते हैं कि इसलाम प्रेम से नहीं अत्याचार से फैला है .किसी भी मुस्लिम शासक ने हिन्दुओं के साथ समानता का व्यवहार नहीं किया .
यह संसार का अद्‌भुत आद्गचर्य ही है कि इस्लाम के जिस आतंक से पूरा मध्य पूर्व और मध्य एशिया  कुछ दशाब्दियों में ही मुसलमान हो गया वह 1000 वर्ष तक पूरा बल लगाकर भारत की आबादी के केवल 1/5 भाग ही धर्म परिवर्तन कर सका।
 इन बलात्‌ धर्म परिवर्तित लोगों में कुछ ऐसे भी थे जो अपनी संतानों के नाम एक लिखित अथवा अलिखित पैगाम छोड़ गये-'हमने स्वेच्छा से
अपने धर्म का त्याग नहीं किया है" यदि कभी ऐसा समय आवे जब तुम फिर अपने धर्म में वापिस जा सको तो देर मत लगाना। हमारे ऊपर किये गये अत्याचारों को भी भुलाना मत।' 
बताया जाता है कि जम्मू में तो एक ऐसा परिवार है जिसके पास ताम्र पत्र पर खुदा यह पैगाम आज भी सुरक्षित है। किन्तु हिन्दू समाज उन लाखों उत्पीड़ित लोगों की आत्माओं की आकांक्षाओं को पूरा करने में असमर्थ रहा है। काद्गमीर के ब्रहाम्णों जैसे अनेक दृष्टांत  है जहाँ हिन्दूओं ने उन पूर्वकाल के बलात्‌ धर्मान्तरित बंधुओं के वंशजों को लेने के प्रश्न पर आत्म हत्या करने की भी धमकी दे डाली और उनकी वापसी असंभव बना दी और हमारे इस धर्मनिरपेक्ष शासन को तो देखो जो मुस्लिम शासकों के इन कुकृत्यों को छिपाना और झुठलाना एक राष्ट्रीय कर्तव्य समझता है.
  2-विश्नोई संप्रदाय का उदाहरण 
राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में विश्नोई  संप्रदाय के अनेक परिवार रहते हैं। इस सम्प्रदाय के लोगों की धार्मिक प्रतिबद्धता है कि हरे वृक्ष न काटे जाये और किसी भी जीवधारी का वध न किया जाये। राजस्थान में इस प्रकार की अनेक घटनाएँ हैं, जब एक-एक वृक्ष को काटने से बचाने के लिये पूरा परिवार बलिदान हो गया।सऊदी अरब के कुछ  आगुन्तकों को ग्रेट बस्टर्ड नामक पक्षी का राजस्थान में शिकार करने की जब भारत सरकार द्वारा अनुमति दी गई तो इन विद्गनोइयों के तीव्र विरोध के कारण यह प्रोग्राम रद्‌द हो गया था। वह विद्गनोई सम्प्रदाय के प्रवर्तक संत जाम्भी जी की समाधि पर बनी छतरी पर मुस्लिम काल में लोधी मुस्लिम सुल्तानों द्वारा अधिकार कर लिया गया था। अकबर जैसे उदार बादशाह से जब फरियाद की गई तो उसने भी इन पाँच शर्तों पर यह छतरी विश्नोई सम्प्रदाय को वापिस की थी .
 1. मुर्दा गाड़ो, 
2. चोटी न रखो, 
3. जनेऊ धारण न करो, 
4. दाढ़ी रखो, 
5. विष्णु  के नाम लेते समय विस्मिल्लाह बोलो
विश्नोइयोँ ने मजबूरी की दशा में यह सब स्वीकार कर लिया। धीरे-धीरे जैसा कि अकबर को अभिष्ट था, विश्नोई  दो तीन सौ वर्ष में मुसलमान अधिक, हिन्दू कम दिखाई देने लगे। हिन्दुओं के लिये वह अछूत हो गये। परन्तु उन्होंने अपनी मजबूरी को भुलाया नहीं। आर्य समाज के जन्म के तुरंत बाद ही उन्होंने उसे अपना लिया। बिजनौर जनपद के मौहम्मदपुर देवमल ग्राम के द्गोख परिवार और नगीना के विश्नोई सराय के विश्नोई  इसके उदाहरणहैं।
प्रो. मौहम्मद हबीब के अनुसार 1330 ई. में मंगोलों ने आक्रमण किया। पूरी काद्गमीर घाटी में उन्होंने आग लगाने बलात्कार और कत्ल करने जैसे कार्य किये। राजा और ब्राहम्ण  तो भाग गये। परन्तु साधारण नागरिक, जो रह गये, दूसरा कोई विकल्प न देखकर धीरे-धीरे मुसलमान हो गये.
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इस प्रकार युद्ध से कैदी प्राप्त होते थे। कैदी गुलाम और फिर मुसलमान बना लिये जाते थे। नये मुसलमान दूसरे हिन्दुओं की लूट, बलात्कार और बलात्‌ धर्मान्तरण में उत्साहपूर्वक लग जाते थे क्योंकि वह अपने समाज द्वारा घृणित समझे जाने लगते थे।
मुस्लिम इतिहासकारों द्वारा दी गई उपरोक्त घटनाओं के विवरण को पढ़कर जिनके अनेक बार वे प्रत्यक्ष दर्शी  थे, किसी भी मनुष्य का मन अपने अभागे हिन्दू पूर्वजों के प्रति द्रवित होकर करुणा से भर जाना स्वाभाविक है.
3-अत्याचारी औरंगजेब 
इस बात से कोई भी व्यक्ति इंकार नहीं कर सकता कि इस्लाम की शिक्षा के कारण ही मुसलमान क्रूर , अत्याचारी और हिंसक हो जाते हैं , और उनके दिमाग में गैर मुस्लिमों के प्रति नफ़रत कूट कूट कर भरी होती है .इसीलिए जब भी भारत में कहीं भी कोई मुस्लिम शासक हुआ है .उसने हिन्दुओं पर अत्याचार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी .ऐसे शासकों के बारे में कई किताबें लिखी जा सकती हैं . लेकिन औरंगजेब को मुसलमान " गाजी " यानि धर्मयोद्धा " मानते हैं ,इसलिए उसके अत्याचार के कुछ उदाहरण दिए जा रहे हैं .
औरंगजेब जन्म गुजरात के दोहद नामकी जगह में 4 नवम्बर 1 6 1 8 में हुआ था .इसका पूरा नाम "अबुल मुजफ्फर मुहीउद्दीन औरंगजेब आलमगीर: ابو المظفر محي الدين محمد اورنگزیب عالمگیر" था .गद्दी पर बैठने के बाद इसने अपने नाम में यह उपाधि लगा ली "सुल्तानुल आजम अल खाकान अल मुकर्रम हजरत अबुल मुजफ्फर मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब बहादुर आलमगीर पादशाह गाजी: السلطان الاعظم والخقان المكرم حضرت ابو المظفر محي الدين محمد اورنگزیب بہادر عالمگیر پادشاہ غازی"गाजी का अर्थ धर्मयोद्धा होता है . यानि ऐसा व्यक्ति जिसने गैर मुस्लिमों को हरा दिया हो .औरंगजेब खुद को हिन्दुओं और मुगलों का शहंशाह मानता था . इसलिए उसने यह उपाधि भी जोड़ ली "शहंशाहे सल्तनते अल हिंदिया वल मुगलिया: شاہنشاہ سلطنت الہنديہ والمغليہ"औरंगजेब के गद्‌दी पर आते ही लोभ और बल प्रयोग द्वारा धर्मान्तरण ने भीषण रूप धारण किया। अप्रैल 1667 में चार हिन्दू कानूनगो बरखास्त किये गये। मुसलमान हो जाने पर वापिस ले लिये गये। औरंगजेब की घोषित नीति थी 'कानूनगो बशर्ते इस्लाम' अर्थात्‌ मुसलमान बनने पर कानूनगोई.

पंजाब से बंगाल तक, अनेक मुस्लिम परिवारों में ऐसे नियुक्ति पत्र अब भी विद्यमान हैं जिनसे यह नीति स्पष्ट सिद्ध होती है। नियुक्तियों और पदोन्नतियों दोनों के द्वारा इस्लाम स्वीकार करने का प्रलोभन दिया जाता था।.

अनेक लोग, जो मुसलमान बनने को तैयार नहीं हुए, नौकरी से निकाल दिये गये। नामदेव को इस्लाम ग्रहण करने पर 400 का कमाण्डर बना दिया गया और अमरोहे के राजा किशनदास के पोते द्गिावसिंह को इस्लाम स्वीकार करने पर इम्तियाज गढ़ का मुशरिफ बना दिया गया। 'समाचार पत्रों में नेकराम के धर्मान्तरण का जो राजा बना दिया गया और दिलावर का, जो 10000 का कमाण्डर बना दिया गया का वर्णन है।(17) के.एस. लालK.S.Lal "अपनी पुस्तक 'इंडियन मुस्लिम व्हू आर दे': Indian Mislims who are they "में अनेकों उदाहरण देकर सिद्ध करते हैं कि इस प्रकार के लोभ के कारण और जिजिया कर से बचने के लिये बड़ी संखया में हिन्दुओं का धर्मान्तरण हुआ। 
मराठों के जंजीरा के दुर्ग को जीतने के बाद सिद्‌दी याकूब ने उसके अंदर की सेना को सुरक्षा का वचन दिया था। 700 व्यक्ति जब बाहर आ गये तो उसने सब पुरुषों को कत्ल कर दिया। परन्तु स्त्रियों और बच्चों को गुलाम बनाकर उनके मुसलमान बनने पर मजबूर किया.

4-हिन्दू लड़कियों का अपहरण 
अय्याशी के बिना इस्लाम अधुरा होता है .और इसके लिए लड़कियों की जरुरत होती है .आज भी जताने भी बलात्कार और अपहरण हो रहे है . अधिकांश में मुसलमान दोषी पाए गए हैं .यह परम्परा आज भी चल रही है . क्योंकि कुरान में जिहादियों को जन्नत में औरतें देने का वायदा किया गया है . यही काम औरंगजेब ने किया था .
हिन्दू गृहस्थों और रजवाड़ों की लड़कियाँ, किस प्रकार बलात्‌ उठाकर गुलाम रखैल बना ली जाती थी, उसका एक उदाहरण मनुक्की की आँखों देखा अनुभव है। वह नाचने वाली लड़कियों की एक लम्बी सूची देता है जैसे - हीरा बाई, सुन्दर बाई, नैन ज्योति बाई, चंचल बाई, अफसरा बाई, खुशहाल बाई, केसा बाई, गुलाल, चम्पा, चमेली, एलौनी, मधुमति, कोयल, मेंहदी, मोती, किशमिश, पिस्ता, इत्यादि। वह कहता है कि ये सभी नाम हिन्दू हैं और साधारणतया वे हिन्दू हैं जिनको बचपन में विद्रोही हिन्दू राजाओं के घरानों में से बलात उठा लिया गया था। नाम हिन्दू जरूर है, अब पर वे सब मुसलमान हैं।(97 )
5-मठ मंदिर तुडवाये 
औरंगजेब ने खुद को असली गाजी साबित करने के लिए जिन मंदिरों , पाठशालाओं . और धर्म स्थलों का ध्वंस किया उनकी सूची काफी बड़ी है . जिन में से कुछ प्रसिद्द मंदिरों के नाम इस प्रकार हैं .
1.सन्‌ 1648 ई. में मीर जुमला को कूच बिहार भेजा गया। उसने वहाँ के तमाम मंदिरों को तोड़कर उनके स्थान पर मस्जिदें बना दी।(102)
2.सन्‌ 1666 ई. में कृष्ण जन्मभूमि मंदिर मथुरा में दारा द्वारा लगाई गई पत्थर की जाली हटाने का आदेश दिया-'इस्लाम में मंदिर को देखना भी पाप है और इस दारा ने मंदिर में जाली लगवाई?'(103)
3.सन्‌ 1669 ई. में ठट्‌टा, मुल्तान और बनारस में पाठशालाएँ और मंदिर तोड़ने के आदेश दिये। काशी में विद्गवनाथ का मंदिर तोड़ा गया और उसके स्थान पर मस्जिद का निर्माण किया गया।(104)
4  .सन्‌ 1670 ई. में कृष्णजन्मभूमि मंदिर, मथुरा, तोड़ा गया। उस पर मस्जिद बनाई गई। मूर्तियाँ जहाँनारा मस्जिद, आगरा, की सीढ़ियों पर बिछा दी गई।(105
5.सोरों में रामचंद्र जी का मंदिर, गोंडा में देवी पाटन का मंदिर, उज्जैन के समस्त मंदिर, मेदनीपुर बंगाल के समस्त मंदिर, तोड़े गये।(106)
6. सन्‌ 1672 ई. में हजारों सतनामी कत्ल कर दिये गये। गुरु तेग बहादुर का काद्गमीर के ब्राहम्णों के बलात्‌ धर्म परिवर्तन का विरोध करने के कारण वध करवाया गया।(107)
7.सन्‌ 1679 ई. में हिन्दुओं पर जिजिया कर फिर लगा दिया गया जो अकबर ने माफ़ कर दिया था। दिल्ली में जिजिया के विरोध में प्रार्थना करने वालों को हाथी से कुचलवाया गया। खंडेला में मंदिर तुड़वाये गये।(108)
8.जोधपुर से मंदिरों की टूटी मूर्तियों से भरी कई गाड़ियाँ दिल्ली लाई गईं और उनको मस्जिदों की सीढ़ियों पर बिछाने के आदेश दिये गये।(109)
9.सन्‌ 1680 ई. में 'उदयपुर के मंदिरों को नष्ट किया गया। 172 मंदिरों को तोड़ने की सूचना दरबार में आई। 62 मंदिर चित्तौड़ में तोड़े गये। 66 मंदिर अम्बेर में तोड़े गये। सोमेद्गवर का मंदिर मेवाड़ में तोड़ा गया। सतारा में खांडेराव का मंदिर तुड़वाया गया।'(110)
10.सन्‌ 1690 ई. में एलौरा, त्रयम्वकेद्गवर, नरसिंहपुर एवं पंढारपुर के मंदिर तुड़वाये गये।(111)
11.सन्‌ 1698 ई. में बीजापुर के मंदिर ध्वस्त किये गये। उन पर मस्जिदें बनाई गई।(112)

6-इस्लाम की दोगली  धर्मनिरपेक्षता 
जब मुस्लिम बादशाह बलपूर्वक भारत के सभी हिन्दुओं को मुसलमान नहीं बना सके तो उन्होंने हिन्दुओं को इस्लाम के प्रति आकर्षित करने के लिए एक नयी तरकीब निकाली . सब जानते हैं कि इस्लाम में शायरी , हराम है , क्योंकि जब मुहम्मद साहब ने खुद को अल्लाह का रसूल घोषित कर दिया था तो अरब के लोग कुरान को मुहम्मद की शायरी कहते थे . और अरब के शायर कुरान का मजाक उड़ाते थे . इसी तरह इस्लाम में संगीत , गाना बजाना,वाद्ययंत्रों का प्रयोग करना भी हराम है ,क्योंकि यह हिदू धर्म में भजन कीर्तन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है . इसलिए चालाक मुसलमानों ने सोचा कि यदि संगीत के माध्यम से हिन्दुओं में इस्लाम के प्रति रूचि पैदा की जाये तो उनका धर्म परिवर्तन करना सरल होगा .इसका परिणाम यह हुआ कि कुछ हिन्दुओं ने तो मुसलमानों के आचार विचार , खानपान अपना लिए , लेकिन मुसलमान हिन्दुओं से हमेशा दूरी बनाये रखे. फिर मुसलमानों ने एक ऐसी कृत्रिम वर्णसंकर "धर्मनिरपेक्षता " तहजीब बना डाली , जिसका नाम गंगाजमुनी तहजीब रख दिया . इसे हिन्दू मुस्लिम एकता ,प्रतीक बता दिया ,बाद में मुसलमानों और दोगले हिन्दुओं ने इसका नाम "धर्मनिरपेक्षता " का नाम दे दिया .मुस्लिम शासकों ने तो हिन्दुओं की खतना करा कर मुस्लमान बना दिया था . लेकिन इस "धर्मनिरपेक्षता " ने हिन्दुओं की खस्सी कर दी . जिस से उनमे अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध लड़ने की शक्ति समाप्त हो गयी .इसमे संगीत का भी बड़ा योगदान है ,जिसे" सूफी संगीत "कहा जाता है .मूर्ख हिन्दू अरबी फारसी जाने बिना ही इस संगीत को एकता का मानते हैं . भारत में इसे कव्वाली भी कहा जाता है .जिसका अविष्कार अमीर खुसरो ने किया था जो कट्टर हिन्दू विरोधी था .

7-अमीर खुसरो की धर्मनिरपेक्षता ?
इसका पूरा नाम "अबुल हसन यमीनुद्दीन ख़ुसरौ : ابوالحسن یمین‌الدین خسرو‎" था .इसका जन्म सन 1253 में उत्तर प्रदेश के शहर बदायूँ में हुआ था .इसके पिता का नाम अमीर सैफुद्दीन था . जो ईरान के बलख शहर से भारत में सैनिक बनने के लिए आया था .अमीर खसरो को संगीत शायरी का शौक था ,लोग उसे "अमीर ख़ुसरौ दहलवी :امیر خسرو دہلوی "भी कहते थे .बड़े दुःख की बात है कि जो लोग खसरो की बनायीं गजलों को सुन कर झुमने लगते हैं . और उसी को हिन्दू मुस्लिम एकता का साधन बताते हैं , वह नहीं जानते कि खुसरो संगीत से एकता नहीं नफ़रत फैलाता था . और एक क्षद्म जिहादी था , हमारे धर्मनिरपेक्ष शासकों द्वारा बहुधा प्रशंसित  धर्मनिरपेक्ष अमीर खुसरो अपनी मसनवी" Qiranus-Sa'dain " में लिखता है- 

 जहां रा कि दीदम ईँ रस्म पेश ,
 कि हिन्दू बुवद सैदे तुर्कां हमेश .1
अज बेहतरे निस्बते तुर्को हिन्दू ,
कि तुर्क अस्त चूँ शेर हिन्दू चूं आहू .2
जि रस्मे कि रफ्त अस्त चर्खे र वाँ रा ,
वुजूद अज पये तुर्क शुद हिंदुआं रा .3
कि तुर्क अस्त ग़ालिब बर ईशां चूँ कोशद ,
कि हम गीरद हम खरद औ हम फ़रोशद .4
अर्थात्‌ 'संसार का यह नियम अनादिकाल से चला आ रहा है कि हिन्दू सदा तुर्कों का अधीन  रहा है. 1
   तुर्क और हिन्दू का संबंध इससे बेहतर नहीं कहा जा सकता है कि तुर्क सिंह के समान है और हिन्दू हिरन के समान.2
आकाश की गर्दिश से यह परम्परा बनी हुई है कि हिन्दुओं का अस्तित्व तुर्कों के लिये ही है. 3

क्योंकि तुर्क हमेशा गालिब होता है और यदि वह जरा भी प्रयत्न करें तो हिन्दू को जब चाहे पकड़े, खरीदे या बेचे।' 4

अब हिन्दू समाज को खास तौर पर युवकों को गंभीरता से सोचना चाहिए कि वह सेकुलर बनकर इस्लाम के सेकुलर आतंकवाद के जाल में तो नहीं फसते जा रहे हैं . या सेकुलर बन कर गांधी , और अन्ना जैसे कायर बनना पसंद करेंगे जो भूख से मर जाने को ही हर समस्या का हल बताता है . या आप गुरु गोविन्द सिंह , शिवाजी , बोस , आजाद और ऊधम सिंह जैसे धार्मिक बनना पसंद करंगे और हाथ फ़ैलाने की जगह अपने अधिकार छीन लेंगे .और ईंट का जवाब पत्थर से देंगे .
याद रखिये धर्मनिरपेक्षता जिहाद का ही एक रूप है .

http://www.hinduwritersforum.org/hamare-prakasan/bharatiya-musalmanom-ke-hindu-puravaja/4-muslima-akramakom-aura-dgaasakom-dvara-hindu-om-ka-balat-dharma-parivartana/aurangajeba


5 टिप्‍पणियां:

  1. जिहाद

    जिहाद एक अरबी भाषा का शब्द है जो 'जहादा' 'Jahada' शब्द से बना है जिसका मायने होता है 'मेहनत करना' 'जद्दोजहद करना' 'संघर्ष करना' अंग्रेजी में इस कहेंगे (to strive or to struggle) मिसाल के तौर पर 'अगर एक छात्र उत्तीर्ण होने के लिए मेहनत करता है, तो वह जिहाद कर रहा है.' अरबी भाषा के शब्द जिहाद का एक अर्थ 'अपनी नफ़्स से संघर्ष करना' भी है. अपने समाज को बेहतर बनाने के लिए मेहनत करने को भी जिहाद कहते हैं और यह अपने अंतर एक अर्थ और समेटे है जिसका अर्थ होता है कि 'आत्म रक्षा के लिए संघर्ष' या चढाई हो जाने या अत्याचार होने पर रण-भूमि में चढाई करने वाले या अत्याचार के विरुद्ध लड़ना.

    जैसा कि हम देख चुके है कि जिहाद एक अरबी शब्द है उसके मायने क्या है.
    सुरह-तौबा की आयत संख्या पांच (5) से पहले की कुछ आयतों में शांति और समाधान की चर्चा है और शांति संधि का पालन न करने पर अल्लाह ने बहुदेववादियों को चार महीने की चेतावनी देता है और फिर उसके बाद का यह आदेश उस युद्धरत सेना के लिए है कि उन्हें अर्थात मक्का के मुश्रिकीन को क़त्ल करो उन्हें मारो. कुर'आन की इस आयत का आगाज़ इसलिए हुआ क्यूंकि युद्ध में मुस्लिम अपने दुश्मन को जहाँ पाए वहां मारे और यह स्वाभाविक ही है कि कोई भी आर्मी जनरल अपनी सेना का हौसला बढ़ाता है और कहता है कि "डरना नहीं, बिलकुल भी, और अपने दुश्मन के छक्के छुड़ा दो. उन्हें युद्ध में जहाँ पाओ मारो और उसका वध कर दो.

    अर्थात "और यदि मुश्रीकों में से कोई तुमसे शरण मांगे तो तुम उसे शरण दे दो. यहाँ तक कि वे अल्लाह की वाणी सुन लें. फिर उन्हें उनके सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दो क्यूंकि वे ऐसे लोग लोग है जिन्हें ज्ञान नहीं."
    आज दुनियाँ का कौन सा आर्मी जनरल होगा जो अपने सैनिकों से कहेगा कि अपने दुश्मन को जाने दो. लेकिन अल्लाह सुबहान व त-आला अपनी किताब अल-कुर'आन में फरमाता है कि अगर तुम्हारा दुश्मन शान्ति चाहता है तो न सिर्फ शान्ति करो बल्कि उन्हें उनके सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दो. आज कौन सा ऐसा आर्मी जनरल होगा जिसने इस तरह का दयालुता से परिपूर्ण आदेश दिया होगा!
    SUNNIKING TEAM

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  2. निःसंदेह इतिहास से यह प्रमाण्ति होता हैं कि औरंगजेब ने बनारस के विश्वनाथ मन्दिर और गोलकुण्डा की जामा-मस्जिद को ढा देने का आदेश दिया था, परन्तु इसका कारण कुछ और ही था। विश्वनाथ मन्दिर के सिलसिले में घटनाक्रम यह बयान किया जाता है कि जब औरंगज़ेब बंगाल जाते हुए बनारस के पास से गुज़र रहा था, तो उसके काफिले में शामिल हिन्दू राजाओं ने बादशाह से निवेदन किया कि वहा। क़ाफ़िला एक दिन ठहर जाए तो उनकी रानियां बनारस जा कर गंगा दनी में स्नान कर लेंगी और विश्वनाथ जी के मन्दिर में श्रद्धा सुमन भी अर्पित कर आएँगी। औरंगज़ेब ने तुरंत ही यह निवेदन स्वीकार कर लिया और क़ाफिले के पडाव से बनारस तक पांच मील के रास्ते पर फ़ौजी पहरा बैठा दिया। रानियां पालकियों में सवार होकर गईं और स्नान एवं पूजा के बाद वापस आ गईं, परन्तु एक रानी (कच्छ की महारानी) वापस नहीं आई, तो उनकी बडी तलाश हुई, लेकिन पता नहीं चल सका। जब औरंगजै़ब को मालूम हुआ तो उसे बहुत गुस्सा आया और उसने अपने फ़ौज के बड़े-बड़े अफ़सरों को तलाश के लिए भेजा। आखिर में उन अफ़सरों ने देखा कि गणेश की मूर्ति जो दीवार में जड़ी हुई है, हिलती है। उन्होंने मूर्ति हटवा कर देख तो तहखाने की सीढी मिली और गुमशुदा रानी उसी में पड़ी रो रही थी। उसकी इज़्ज़त भी लूटी गई थी और उसके आभूषण भी छीन लिए गए थे। यह तहखाना विश्वनाथ जी की मूर्ति के ठीक नीचे था। राजाओं ने इस हरकत पर अपनी नाराज़गी जताई और विरोघ प्रकट किया। चूंकि यह बहुत घिनौना अपराध था, इसलिए उन्होंने कड़ी से कड़ी कार्रवाई कने की मांग की। उनकी मांग पर औरंगज़ेब ने आदेश दिया कि चूंकि पवित्र-स्थल को अपवित्र किया जा चुका है। अतः विश्नाथ जी की मूर्ति को कहीं और लेजा कर स्थापित कर दिया जाए और मन्दिर को गिरा कर ज़मीन को बराबर कर दिया जाए और महंत को गिरफ्तार कर लिया जाए। डाक्टर पट्ठाभि सीता रमैया ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द फ़ेदर्स एण्ड द स्टोन्स’ मे इस घटना को दस्तावेजों के आधार पर प्रमाणित किया है। पटना म्यूज़ियम के पूर्व क्यूरेटर डा. पी. एल. गुप्ता ने भी इस घटना की पुस्टि की है।

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  3. पुस्‍तक: ‘‘इतिहास के साथ यह अन्याय‘‘
    लेखक: प्रो. बी. एन पाण्डेय, भूतपूर्व राज्यपाल उडीसा, राज्यसभा के सदस्य, इलाहाबाद नगरपालिका के चेयरमैन एवं इतिहासकार

    तुम्हें ले-दे के सारी दास्तां में याद है इतना।
    कि औरंगज़ेब हिन्दू-कुश था, ज़ालिम था, सितमगर था।।

    औरंगज़ेब पर हिन्दू-दुश्मनी के आरोप के सम्बन्ध में जिस फरमान को बहुत उछाला गया है, वह ‘फ़रमाने-बनारस’ के नाम से प्रसिद्ध है। यह फ़रमान बनारस के मुहल्ला गौरी के एक ब्राहमण परिवार से संबंधित है। 1905 ई. में इसे गोपी उपाघ्याय के नवासे मंगल पाण्डेय ने सिटि मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया था। एसे पहली बार ‘एसियाटिक- सोसाइटी’ बंगाल के जर्नल (पत्रिका) ने 1911 ई. में प्रकाशित किया था। फलस्वरूप रिसर्च करनेवालों का ध्यान इधर गया। तब से इतिहासकार प्रायः इसका हवाला देते आ रहे हैं और वे इसके आधार पर औरंगज़ेब पर आरोप लगाते हैं कि उसने हिन्दू मन्दिरों के निर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया था, जबकि इस फ़रमान का वास्तविक महत्व उनकी निगाहों से आझल रह जाता है। यह लिखित फ़रमान औरंगज़ेब ने 15 जुमादुल-अव्वल 1065 हि. (10 मार्च 1659 ई.) को बनारस के स्थानिय अधिकारी के नाम भेजा था जो एक ब्राहम्ण की शिकायत के सिलसिले में जारी किया गया था। वह ब्राहमण एक मन्दिर का महंत था और कुछ लोग उसे परेशान कर रहे थे। फ़रमान में कहा गया हैः ‘‘अबुल हसन को हमारी शाही उदारता का क़ायल रहते हुए यह जानना चाहिए कि हमारी स्वाभाविक दयालुता और प्राकृतिक न्याय के अनुसार हमारा सारा अनथक संघर्ष और न्यायप्रिय इरादों का उद्देश्य जन-कल्याण को बढ़ावा देना है और प्रत्येक उच्च एवं निम्न वर्गों के हालात को बेहतर बनाना है। अपने पवित्र कानून के अनुसार हमने फैसला किया है कि प्राचीन मन्दिरों को तबाह और बर्बाद नहीं किया जाएँ, अलबत्ता नए मन्दिर न बनए जाएँ। हमारे इस न्याय पर आधारित काल में हमारे प्रतिष्ठित एवं पवित्र दरबार में यह सूचना पहुंची है कि कुछ लोग बनारस शहर और उसके आस-पास के हिन्दू नागरिकों और मन्दिरों के ब्राहम्णों-पुरोहितों को परेशान कर रहे हैं तथा उनके मामलों में दख़ल दे रहे हैं, जबकि ये प्राचीन मन्दिर उन्हीं की देख-रेख में हैं। इसके अतिरिक्त वे चाहते हैं कि इन ब्राहम्णों को इनके पुराने पदों से हटा दें। यह दखलंदाज़ी इस समुदाय के लिए परेशानी का कारण है। इसलिए यह हमारा फ़रमान है कि हमारा शाही हुक्म पहुंचते ही तुम हिदायत जारी कर दो कि कोई भी व्यक्ति ग़ैर-कानूनी रूप से दखलंदाजी न करे और न उन स्थानों के ब्राहम्णों एवं अन्य हिन्दु नागरिकों को परेशान करे। ताकि पहले की तरह उनका क़ब्ज़ा बरक़रार रहे और पूरे मनोयोग से वे हमारी ईश-प्रदत्त सल्तनत के लिए प्रार्थना करते रहें। इस हुक्म को तुरन्त लागू किया जाये।’’

    इस फरमान से बिल्कुल स्पष्ट हैं कि औरंगज़ेब ने नए मन्दिरों के निर्माण के विरूद्ध कोई नया हुक्म जारी नहीं किया, बल्कि उसने केवल पहले से चली आ रही परम्परा का हवाला दिया और उस परम्परा की पाबन्दी पर ज़ोर दिया। पहले से मौजूद मन्दिरों को ध्वस्त करने का उसने कठोरता से विरोध किया। इस फ़रमान से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि वह हिन्दू प्रजा को सुख-शान्ति से जीवन व्यतीत करने का अवसर देने का इच्छुक था। यह अपने जैसा केवल एक ही फरमान नहीं है। बनारस में ही एक और फरमान मिलता है, जिससे स्पष्ट होता है कि औरंगज़ेब वास्तव में चाहता था कि हिन्दू सुख-शान्ति के साथ जीवन व्यतीत कर सकें। यह फरमान इस प्रकार हैः ‘‘रामनगर (बनारस) के महाराजाधिराज राजा रामसिंह ने हमारे दरबार में अर्ज़ी पेश की हैं कि उनके पिता ने गंगा नदी के किनारे अपने धार्मिक गुरू भगवत गोसाईं के निवास के लिए एक मकान बनवाया था। अब कुछ लोग गोसाईं को परेशान कर रहे हैं। अतः यह शाही फ़रमान जारी किया जाता है कि इस फरमान के पहुंचते ही सभी वर्तमान एवं आने वाले अधिकारी इस बात का पूरा ध्यान रखें कि कोई भी व्यक्ति गोसाईं को परेशान एवं डरा-धमका न सके, और न उनके मामलें में हस्तक्षेप करे, ताकि वे पूरे मनोयोग के साथ हमारी ईश-प्रदत्त सल्तनत के स्थायित्व के लिए प्रार्थना करते रहें। इस फरमान पर तुरं अमल गिया जाए।’’ (तीरीख-17 बबी उस्सानी 1091 हिजरी)

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  5. और औरंगज़ेब ने केवल मंदिर ही नहीं तोड़े। बल्कि मस्जिदे भी तुड़वाई है लेकिन उसे कोई पेश नहीं करता क्यों की उन्हें तो केवल हिन्दू भाइयो के मन में सभी मुस्लिमो को बुरा साबित करना चाहते है। चाहे इतिहास को उन्हें तोडना मरोड़ना पड़े। पर सच अपने आप को साबित कर देता है। झूट की हज़ारो नदिया भी सच का दीपक नहीं बुझा सकती

    गोलकुण्डा की जामा-मस्जिद की घटना यह है कि वहां के राजा जो तानाशाह के नाम से प्रसिद्ध थे, रियासत की मालगुज़ारी वसूल करने के बाद दिल्ली का हिस्सा नहीं भेजते थे। कुछ ही वर्षों में यह रक़म करोड़ों की हो गई। तानाशाह न यह ख़ज़ाना एक जगह ज़मीन में गाड़ कर उस पर मस्जिद बनवा दी। जब औरंज़ेब को इसका पता चला तो उसने आदेश दे दिया कि यह मस्जिद गिरा दी जाए। अतः गड़ा हुआ खज़ाना निकाल कर उसे जन-कल्याण के कामों मकें ख़र्च किया गया। ये दोनों मिसालें यह साबित करने के लिए काफ़ी हैं कि औरंगज़ेब न्याय के मामले में मन्दिर और मस्जिद में कोई फ़र्क़ नहीं समझता था। ‘‘दर्भाग्य से मध्यकाल और आधुनिक काल के भारतीय इतिहास की घटनाओं एवं चरित्रों को इस प्रकार तोड़-मरोड़ कर मनगढंत अंदाज़ में पेश किया जाता रहा है कि झूठ ही ईश्वरीय आदेश की सच्चाई की तरह स्वीकार किया जाने लगा, और उन लोगों को दोषी ठहराया जाने लगा जो तथ्य और मनगढंत बातों में अन्तर करते हैं। आज भी साम्प्रदायिक एवं स्वार्थी तत्व इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने और उसे ग़लत रंग देने में लगे हुए हैं।

    साभार पुस्तक ‘‘इतिहास के साथ यह अन्याय‘‘ प्रो. बी. एन पाण्डेय, मधुर संदेश संगम, अबुल फज़्ल इन्कलेव, दिल्ली-2

    और वेबसाइट http://sohrabali1979.blogspot.in/

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