शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

इस्लाम भूमि को माता मानता है !!


अपने देश की रक्षा करना और उसका सम्मान करना हरेक देशवासी का कर्तव्य है .क्योंकि ऐसा करना देश की एकता और अखंडता बनाये रखने के लिए अति आवश्यक है .भारत के हिन्दू देश को माता की तरह सम्मान करते हैं .लेकिन कुछ ऐसे भी मुस्लिम नेता हैं , जो भारत को माता की तरह सम्मान करने को शिर्क यानी अल्लाह के साथ किसी को शामिल करना बता कर गुनाह बताते हैं . और मुसलमानों को भड़काते रहते हैं .ऐसे लोगों ने जैसे यही नीति अपना रखी है ,कि हिन्दू जो भी कहेंगे या करेंगे हम उसके विपरीत काम करेंगे .फिर भी कुछ ऐसे मुद्दे भी हैं , जिन में हिन्दू और इस्लामी विचारों में आश्चर्यजनक रूप से समानता पायी जाती है .जिसका सम्बन्ध देश को माता कहने से है .केवल एक दो शब्दों में अंतर है .परन्तु आशय एक ही है .
जैसे हिन्दू और मुसलमान इस बात को स्वीकार करते हैं , सिर्फ रक्त सम्बन्ध से जन्म देने वाली को ही माता नही माना जा सकता है . पालन पोषण करने वाली महिला को भी माता के रूप में आदर और सम्मान दिया जाता है . उदहारण के लिए यशोदा भगवान कृष्ण की शारीरिक माता नहीं थी . बल्कि उन्होंने भगवान का पालन किया था , और भगवान कृष्ण उनको जीवन भर अपनी माता मानते रहे .
इसी तरह इस्लाम में भी पालन करने वाली को , और सम्मानित महिला को भी माता के रूप में सम्मान दिया जाता है .विषय को स्पष्ट करने के लिए यह उदहारण दिए जा रहे हैं ,
1-रसूल की पालकमाता हलीमा 
मुहम्मद साहब के पिता का नाम "अब्दुल्लाह " था . और माता का नाम " आमना बिन्त वहब -امنة بنت وهب "था .मुहम्मद साहब जब अपनी माता के गर्भ में ही थे ,तो उनके पिता का स्वर्गवास हो गया था .यह सन 577 ईसवी की बात है .और जब मुहम्मद साहब की आयु केवल 6 साल ही थी . तो उनकी माता का भी देहांत हो गया . लेकिन अपनी म्रत्यु से पहले आमना ने अपने छोटे से बेटे को " हलीमा सादिया -حليمة السعدية"नामकी एक बद्दू महिला दाई के हवाले कर दिया था . ताकि वह अपना दूध पिला कर मुहम्मद साहब का पालनपोषण करती रहे . और उसने ऐसा ही किया था .हलीमा दाई जब तक जीवित रही ,मुहम्मद साहब उसको माता की तरह आदर और सम्मान देकर माँ पुकार कर संबोधित करते रहे . और आखिर जब हिजरी 8 में हलीमा का देहांत हो गया , तो मुहम्मद साहब ने उसे अपने निजी कबरिस्तान "जन्नतुल बाकी " में दफना दिया था .हलीमा की कब्र आज भी मदीना में मौजूद है .इस घटना से सिद्ध होता है कि पालन करने वाली स्त्री को भी माता माना जा सकता है . और माता के सामान आदर भी दिया जा सकता है .दूसरा उदहारण इस प्रकार है
2-रसूल की पत्नियां माता समान हैं 
वैसे तो भारतीय परम्परा के अनुसार हरेक स्त्री को पूज्यनीय माना गया है . फिर भी लोग हरेक बुजुर्ग महिला को आदर से माता जी पुकारते है , चाहे उन से कोई रिश्ता हो या नहीं . इसी तरह अक्सर लोग किसी भी साध्वी , सन्यासिनी महिला को सम्मान देने के लिए " माता जी "कहते हैं , चाहे उनकी आयु कितनी भी कम हो .
इसी तरह कुरान में भी मुसलमानों से मुहम्मद साहब की पत्नियों को अपनी माता समझने का आदेश दिया गया है ,कुरान में कहा है -
"और रसूल की पत्नियां ईमान वालों की माताएं है " सूरा -अहजाब 33:6  (and his wives are mothers of believers)

" وَأَزْوَاجُهُ أُمَّهَاتُهُمْ "33:6
इस से स्पष्ट होता है कि यदि हम किसी को माता की तरह आदर देते हैं , तो यह समझना बिलकुल गलत होगा कि हम उस महिला की उपासना करते है . या उसकी तुलना अल्लाह से कर रहे हैं .और जो लोग ऐसा करने वालों पर "शिर्क " करने का आरोप लगाते है ,वह लोगों को गुमराह करते है .
3-अथर्ववेद में भूमि को माता कहा है .
हिन्दू और मुसलमान दौनों इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि हम पृथ्वी पर जिस भूमि पर रहते आये है , उसी भूमि ने हमें और हमारे पूर्वजों का माता की तरह पालनपोषण किया है . हमारे शरीर में जो मांस रक्त वह इसी भूमि से पैदा हुए अनाज से बना हुआ है . जैसे एक माता अपने पुत्र की परवरिश करती है , वैसे ही यह भूमि हमारा पालन करती है .इसी लिए विश्व के सबसे प्राचीन ग्रन्थ वेद में भूमि को माता बताया गया है ,अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में भूमि और प्रथ्वी की महिमा बताते हुए यह एक मन्त्र दिया गया है ,

"माता भूमिः पुत्रोऽहम पृथिव्याः  "
प्रथ्वी मेरी माता है , और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ .
(Earth is my mother,I am son of Earth )
अथर्ववेद -काण्ड 12 पृथ्वी सूक्त -63
विश्व का प्राचीन इतिहास पढ़ने से पता चलता है कि इस्लाम के आगमन से काफी समय पहले से ही अरब और भारत के व्यापारिक सम्बन्ध थे .और कालांतर में वेद की यह मान्यता इस्लाम में भी स्वीकृत हो गयी ,कि भूमि हमारी माता है .इसकी पुष्टि इन हदीसों से होती है
4-हदीस में भूमि को माता कहा है 
हदीसों का साहित्य काफी बड़ा और गंभीर है , वैसे सुन्नी मुस्लिम मुख्य 6 हदीस की किताबों के बारेमे जानते हैं . लेकिन इनके अलावा हदीसोंकी ऐसी प्रमाणिक किताबें मौजूद है , जिनके बारे में बहुत कम मुस्लिम जानते है .क्योंकि इन हदीसों का संकलन और प्रमाणीकरण देर से हो सका था .परन्तु अधिकांश मुस्लिम विद्वान् इन किताबों में दर्ज हदीसों को सत्य मानते हैं .हम इस विषय से संबधित हदीस देने से पहले , इस हदीस के संकलनकर्ता और पस्तक के बारे में जानकारी देना उचित समझते है .
1.इमाम तबरानी
इनका पूरा नाम "अबुल कासिम सुलेमान इब्ने अहमद इब्ने तबरानी - ابو القاسم سليمان ابن احمد ابن التبراني  " था .इनका जन्म 260 हिजरी यानि सन 870 ईसवी में हुआ था .और मृत्यु हिजरी360 यानी सन ईसवी 970 में हुयी थी .तबरानी ने हदीसों का जो संकलन किया था उसका नाम "अल मुअजम अल कबीर -المعجم الكبير    " है .इस किताब में 5 भाग हैं . और इस हदीस की किताब को प्रमाणिक माना जाता है .दूसरे हदीस संकलनकर्ता का नाम है
2.इमाम ज़हबी 
इनका पूरा नाम "मुहम्मद इब्ने अहमद बिन उस्मान कय्यूम अबू अब्दुल्लाह शमशुद्दीन अल ज़हबी -محمد بن احمد بن عثمان بن قيوم ، أبو عبد الله شمس الدين الذهبي‎ " है . इनका जन्म सन1274 ईस्वी में और देहांत सन1348  ईसवी में हुआ था .इन्होने अपने जीवन में कई हदीसें जमा की है .
और इमाम तबरानी ने जो हदीसें जमा की हैं उनको सत्यापित किया है .तबरानी ने एक ऐसी हदीस दी है जो वेद में दिए गए मन्त्र से मिलती जुलती है . वह महत्त्वपूर्ण हदीस यह है ,

"وتحفظوا على الأرض فإنها أمكم   "

"तुहफिजु अलल अर्ज इन्नहा उम्मेकुम "
"भूमि की रक्षा करो , निश्चय ही वह तुम्हारी माता है ."
“And take care of the earth for verily she is your mother.”

al-Mu’jam al-Kabir 5/65, Tabarani

इस हदीस के रावी यानी रसूल के द्वारा कही गयी बात को लोगों तक पंहुचाने वाले ( narrator ) का नाम "अब्दुल्लाह इब्ने लहियह -ابن لهيعة)” " है .

कुरान और हदीस में दिए गये इन पुख्ता सबूतों के आधार पर हम उन लोगों से यही प्रश्न करना चाहते , भारत की रक्षा करने और उसके प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए भारत को अपनी माता मानकर " वन्दे मातरम "का घोष करते हैं .तो उनको मुशरिक कैसे कहा जा सकता है .?बताइये जब मुहम्मद साहब की पत्नियों को माता मानना उनकी रसूल से समानता करना नहीं माना जा सकता है . तो देश को माता समझ कर सम्मान करने को देशकी अल्लाह के साथ समानता करना कैसे मानी जा सकती है .और ऐसा करने को शिर्क कैसे माना जा सकता है ?और जो खुराफाती दिमाग वाले मुल्ले मुस्लिम युवकों गुमराह करने के लिए यह कहते हैं ,कि भारत माता की जय , या वन्दे मातरम बोलने से इस्लाम खतरे में पड़ जायेगा ,हम उनसे पूछना चाहते हैं .कि बलात्कार , आतंकवाद जैसे अपराधों से इस्लाम को खतरा क्यों नहीं होता ? क्या सिर्फ वन्देमातरम कहने से ही इस्लाम मिट जायेगा ?वास्तव में इस्लाम को असली खतरा स्वार्थी कट्टर मुल्लों और मुसलमानों के घोर अज्ञान से है .देश को माता कहने से कोई क़यामत नहीं आने वाली है .जैसे हरेक व्यक्ति अपनी माता की रक्षा और सम्मान करता है , वैसे ही हमारा कर्तव्य है कि अपनी देश रूपी माता की रक्षा और सम्मान करें .

http://www.shafiifiqh.com/tabaranis-hadith-that-the-earth-is-your-mother/

7 टिप्‍पणियां:

  1. मुझे तो इतना लगता है कि तार्किकता और सम्पूर्ण समाज की भलाई के लिये ही धर्म होना चाहिये न कि धर्म के नाम पर उपद्रव और उन्माद हेतु.

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  2. अपने देश की रक्षा करना और उसका सम्मान करना हरेक देशवासी का कर्तव्य है .क्योंकि ऐसा करना देश की एकता और अखंडता बनाये रखने के लिए अति आवश्यक है .
    mai tumhari baaton se sahmat hun.

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  3. hindustan hamara desh hai aur hume garv se iski raksha karni hogi.

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  4. bahut hi achha laga aapka ye aalekh padkar... Wastav me aapko bahut jaankari hai.....

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  5. इस्लाम में औरतों के मौज़ू पर ग़ौर करने से पहले इस नुक्ता को पेशे नज़र रखना

    ज़रूरी है कि इस्लाम ने इन अफ़कार का मुज़ाहिरा उस वक़्त किया है जब बाप अपनी बेटी को ज़िन्दा दफ़्न कर देता था। और उस जल्लादीयत को अपने लिये बाईसे इज़्ज़त व शराफ़त तसव्वुर करता था। औरत दुनिया के हर समाज में इन्तेहाई बेक़ीमत मख़लूक़ थी। औलाद माँ को बाप के तरके में हासिल किया करती थी। लोग निहायत आज़ादी से औरत का लेन देन किया करते थे।और उसकी राय की कोई क़ीमत नही थी। हद यह है कि यूनान के फ़लासिफ़ा इस नुक्ता पर बहस कर रहे थे कि उसे इंसानों की एक क़िस्म क़रार दिया जाये या यह एक ऐसी इंसान नुमा मख़लूक़ है जिसे इस शक्ल व सूरत में इंसान के उन्स व उल्फ़त के लिये पैदा किया गया है ताकि उससे हर क़िस्म का इस्तेफ़ादा कर सके वर्ना उसका इंसानीयत से कोई लअल्लुक़ नही है।

    दौरे हाज़िर में आज़ादी ए निसवाँ और तसावी ए हुक़ुक़ का नारा लगाने वाले और इस्लाम पर तरह तरह के इल्ज़ामात आएद करने वाले इस हक़ीक़त को फ़ूल जाते हैं कि औरतों के बारे में इल तरह की बाईज़्ज़त फ़िक्र और उसके सिलसिले में हुक़ुक़ का तसव्वुर भी इस्लाम का दिया हुआ है वर्ना उसने ज़िल्लत की इन्तेहाई गहराई से निकाल कर ईज़्ज़त के औज पर न पहुचा दिया होता तो आज भी कोई उसको बारे में इस अंदाज़ से सोचने वाला न होता। यहूदीयत और ईसाईयत तो इस्लाम इस्लाम से पहले भी थी, फ़लासिफ़ा व मुफ़क्केरीन तो इस्लामी क़वानीन के आने से पहले भी इन मौज़ूआत पर बहस किया करते थे। उन्हे उस वक़्त इस आज़ादी का ख़्याल क्यों नही आया। और उन्होने उस दौर में मसावी ए हुक़ुक़ का नारा क्यों नही लगाया। यह आज औरत का अज़मत का ख़्याल कहाँ से आ गया। और उसकी हमदर्दी का इस क़दर जज़्बा कहाँ से पैदा हो गया?

    दर हक़ीक़त यह इस्लाम के बारे में अहसान फ़रामोशी के अलावा कुछ नही है कि जिसने तीर अंदाज़ी सिखाई उसी को निशाना बना दिया, और जिसने आज़ादी और हुक़ुक़ का नारा दिया उसी पर इल्ज़ाम आएद कर दिये। बात सिर्फ़ यह है जब दुनिया को आज़ादी का ख़्याल पैदा हुआ तो उसने यह ग़ौर करना शुरु किया कि आज़ादी का यह मफ़हूफ़ तो हमारे देरीना मक़ासिद के ख़िलाफ़ है। आज़ादी का यह तसव्वुर तो इस बात की दावत देता है कि हर मसले में उसकी मर्ज़ी का ख़्याल रखा जाये और उस पर किसी तरह का दबाव न डाला जाये और उसके हुक़ुक़ का तक़ाज़ा यह है कि उसे मीरास में हिस्सा दिया जाये। उसे जागीरदारी और सरमायादारी का शरीक तसव्वुर किया जाये। और यह हमारे तमाम रकीक, ज़लील और फ़रसूदा मक़ासिद के मनाफ़ी है। लिहाज़ा उन्होने इसी आज़ादी और हक़ के लफ़्ज़ को बाक़ी रखते हुए मतलब बरारी की नई राह निकाली और यह ऐलान करना शुरू कर दिया कि औरत की आज़ादी का मतलब यह है कि वह जिसके साथ चाहे चली जाये, और उसके मसावी ए हुक़ुक़ का मचलब यह है कि वह जितने अफ़राद से चाहे राब्ता रखे। इससे ज़्यादा दौरे हाज़िर के मर्दों को औरतों से कोई दिलचस्पी नही है। यह औरत को कुर्सी ए एक़्तेदार पर बैठाते हैं तो उसका कोई न कोई मक़सद होता है। और उसके बरसरे इक़्तेदार लाने में किसी न किसी साहिबे क़ुव्वत व जज़्बात का हाथ होता है, और यही वजह है कि वह क़ौमों की सरबराह होने के बाद भी किसी न किसी सरबराह का हाँ में हाँ मिलाती रहती हैं। और अंदर से किसी न किसी अहसासे कमतरी में मुब्तला रहती है। इस्लाम उसे साहिबे ऐख़्तियार देखना चाहता है लेकिन मगर मर्दो को आल ए कार बन कर नही। वह उसे हक़ ऐख़्तियार व इन्तेख़ाब देना चाहता है लेकिन अपनी शख़्सियत, हैसियत, ईज़्ज़त और करामत का ख़ात्मा करने के बाद नही। उसकी निगाह में इस तरह का ऐख़्तियार मर्दों को हासिल नही है तो औरतों को कहाँ से हासिल हो जायेगा जबकि उसकी ईस्मत व ईफ़्फ़त की क़दर व क़ीमत मर्द से ज़्यादा है, और उसकी इफ़्फ़त जाने के बाद दोबारा वापस नही आती है जबकि मर्द के साथ ऐसी कोई परेशानी नही है।
    NEXT PART VISIT ON
    http://sunnikingteam.blogspot.in/2012/06/blog-post_8344.html
    SUNNIKING TEAM

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    1. bas bas... Bahut Lamba lamba urdu mat likalo.... Agar kuch achi cheezen hai islam main jo ki sare Mazhab sare Duniya ke logo ko nuksan na pahuchaye, to achi baat hai...

      Par 90% baaten to Chutia pa hai... Chalo achi bato keliye dhanyabad...

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  6. भाई जो भी हो आपने मुसलमानो पर गहन अनुसंधान किया है।
    धो डाला।

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