बुधवार, 29 मई 2013

अल्लाह की कौनसी बात मानें ?

अपने द्वारा  कही गयी  बात  से मुकर जाना , किसी विषय पर एक जगह एक बात कहना  और दूसरी जगह उसी विषय  पर दूसरी या पहली बात के विपरीत  बात कहना एक प्रकार का दुर्गुण  माना जाता  है .और ऐसी  बातें कहने  वालों  को लोग दोगला  कहते  हैं , और ऐसे व्यक्तियों  की किसी भी बात पर न  तो  विश्वास  करते है ,और न उसकी बात को मानते  है .मुसलमानों  का दावा  है कि   कुरान  अल्लाह   की वाणी है , और उसमे दिए गए आदेश और निर्देश  अल्लाह  के द्वारा ही  कहे  गए हैं और उनमे किसी प्रकार  का विरोधाभास   नहीं  है लेकिन वास्तविकता  यह  है कि  कुरान  में अल्लाह  ने अनेकों  बार  परस्पर विरोधी बयान  दिए  हैं फिर भी अल्लाह ने .दावा   किया है , कि  उसकी  बातों में किसी प्रकार  का अंतरविरोध  नहीं है ,इस लेख  को पढ़ने वाले प्रबुद्ध  पाठक  निष्पक्ष  हो कर  खुद निर्णय  करें  कि  अल्लाह के दावों  में  कितनी सच्चाई  है ,और ऐसे अल्लाह  की बातों पर विश्वास  करने वालों  का अंजाम  होगा ?    

1-अल्लाह   का कानून   अटल  है 
"यही रीति  है  हमारे रसूलों की ,जिन्हें हमने तुम से पहले भेजा  था .और तुम हमारी रीति और नियमों  में कोई परिवर्तन नहीं पाओगे "
सूरा -बनी इस्रायेल17:77
2-अल्लाह  का  कानून बदल नहीं सकता 
"और अल्लाह की बातों  को  कोई  बदलने  वाला नहीं  है  "सूरा -अल अनआम 6:34

"तुम अपने  रब  की किताब ( कुरान )जो तुम्हें वही  की गयी है ,सबको सुना दो और कह दो  कोई उसकी बातों  को बदलने  वाला   नहीं   है "सूरा -अल कहफ़ 18:27
" यह सांसारिक  जीवन और आखिरत  के लिए भी   सूचना  है कि अल्लाह की बातें बदल नहीं सकती "
सूरा -युनुस 10:64

3-अल्लाह  का  कानून स्पष्ट  है 
"और अल्लाह  ने यह ऐसी  किताब उतार दी है ,जिसमे सारी  बातें खोल खोल कर समाझा  दी गयी हैं "सूरा -अल अनआम 6:115
4-अल्लाह  ने सब  कुछ  बता दिया  है
"हमने किताब में कोई चीज नहीं छोड़ी है " सूरा -अल अनआम 6:38
"कोई  भी गीली और सूखी चीज ऐसी नहीं  है ,जिसके बारे में   स्पष्ट रूप में किताब में नहीं लिखा गया  हो "सूरा -अल अनआम 6:59
"कण भर  भी कोई चीज या उस से छोटी या उस से भी छोटी   या बड़ी ,या धरती आकाशों में कोई चीज नहीं  है ,जो तेरे रब से छुपी     हुई हो , सब  के बारे में साफ साफ इस किताब  में   मौजूद  है "सूरा -यूनुस 10:61

अभी  तक   आपने  अल्लाह के द्वारा कुरान  में किये गए दावे    देखे , और अब इन आयातों  में कुछ  विषयों  पर अल्लाह के परस्पर  विरोधी  बयान दखिये ,
1-गुमराह कौन करता है ?
"शैतान  ने कहा ,मैं लोगों  को बहकाऊंगा  ,और उनको कामनाओंके  मायाजाल में फंसाऊँगा "सूरा -अन निसा 4:119
"शैतान  लोगों  से  जो वादे   करता है ,वह धोखे  के सिवा  कुछ  नहीं  है "सूरा -अन निसा 4:120
इस आयत  में अल्लाह  लोगों को गुमराह करने  का अपराध  शैतान  पर लगा रहा  है , फिर दूसरी जगह यह कहता  है ,

"अल्लाह  जिसको चाहे गुमराही  में  डाल  देता  है , और जिसे चाहता है  सीधा  मार्ग  दिखा  देता  है "सूरा -अन नह्ल16:93
" कह  दो  सब  कुछ  अल्लाह  की ओर   से  होता  है ,तो इन लोगों  को क्या  हो गया कि इस समझबूझ  के निकट भी   नहीं होते "
सूरा -अन निसा 4:78.

2-माता पिता  की बात मानें ?
"यदि  वह तुझ  पर दवाब  डालें   कि  तू किसी ऐसी चीज को  मेरा  (अल्लाह )   सहभागी  बना  ,जिसका तुझे ज्ञान  नहीं हो तो , तू  उनका   कहना  नहीं  मानना  "सूरा -लुकमान 31:15
इस बात  के बारे  में भी अल्लाह उलटी बात कहता  है ,
"हे ईमान वालो तुम अपने  बापों और भाइयों  को अपना मित्र नहीं बनाओ ,यदि वह  इस्लाम  की जगह कुफ्र  को पसंद   करें  .और जो कोई इन से मित्रता  का नाता  जोड़ेगा  तो ऐसे ही लोग जालिम  होंगे "
सूरा -अत तौबा 9:23
3-क्या  शिर्क  माफ़  होगा ?
" निस्संदेह  अल्लाह इस बात को क्षमा  नहीं करेगा कि उसका सहभागी  ठहराया   जाये .और इसके आलावा अल्लाह  जिसके चाहे  क्षमा   कर देगा "सूरा -अन निसा 4:48
लेकिन कुरान  के अनुसार अल्लाह  ने लोगों  का शिर्क माफ़ कर दिया था . यानि अपना   कानून  बदल  दिया था  देखिये ,
"और फिर उन्होंने एक बछड़े  को अपना  देवता बना  लिया , जबकि उनके पास खुली  निशानियाँ  भी  आ चुकी थीं . फिर भी हमने उनके इस  अपराध  को माफ़  कर दिया "सूरा -4:153
4--ईसाई स्त्री   से शादी  करें  या नहीं  ?
"तुम  मुशरिक  स्त्रिओं से तब तक विवाह  नहीं करो  जब तक वह ईमान  नहीं  लातीं , मुशरिक औरत से ईमान  वाली  लौंडी  अच्छी  होती  है "सूरा -बकरा 2:221
फिर  भी अल्लाह  मुशरिक  स्त्रियों  से शादी  को  वैध   ठहराता   है .
"तुम्हारे  लिए ईमान  वाली  स्त्रियां और वह स्त्रियां  भी वैध  हैं ,जिन्हें तुम  से पहले  किताब  दी  गयी थी "सूरा -अल माइदा 5:5
5-ईसाई  स्वर्ग  में जायेंगे या नर्क  में ?
निस्संदेह  जो ईमान  लाये ,और यहूदी हुए ,और नसारा  ,और साबई  हों ,जो भी अल्लाह पर ईमान  लाये और उसके मुताबिक  काम  किये ,तो ऐसे लोगों  के लिए अल्लाह के पास अच्छा  प्रतिदान  है .और उनके लिए कोई भय  नहीं होगा  ,और वह कभी दुखी नहीं  होंगे "सूरा -अल बकरा2:62
और यही बात कुरान  की सूरा  माइदा  5:69 में भी कही गयी है
अल्लाह  की दोगली बातों  का एक और नमूना  देखिये ,
"निश्चय  ही उन लोगों ने कुफ्र किया ,जिन्होंने कहा कि मरियम पुत्र  ईसा ही  अल्लाह  है ,और जो कोई अल्लाह  के साथ किसी को शरीक करेगा  तो उस पर अल्लाह जन्नत हराम  कर देगा .और उसका ठिकाना  आग  ( जहन्नम  ) है "सूरा -अल माइदा 5:72
"और जो कोई इस्लाम  के सिवा  कोई दूसरा  धर्म   पसंद  करेगा तो ,वह  आखिरत के दिन घाटा  होने वालों  में से होगा " सूरा -आले इमरान
6-इस्लाम  कैसे फैलाएं ?
"तुम  किताब  वालों  और उम्मियों ( जिनके पास किताब  नहीं है )   के पास जाओ और  उन से कहो कि क्या तुम भी इस्लाम स्वीकार  करने को राजी हो , और यदि वह ख़ुशी से इस्लाम स्वीकार कर लें तो  उन्होंने सही मार्ग  पा  लिया . और यदि वह इस से मुंह मोड़ें  तो ,तुम पर सिर्फ यह सन्देश  देने की जिम्मेदारी है "सूरा -आले  इमरान 3:20
"धर्म  के  बारे में कोई जबरदस्ती  नहीं  है " सूरा -बकरा 2:256
 बताइये  इन दौनों  बातों  में  कौन सी बात सही है ?

"यदि  वह इस्लाम  स्वीकार नहीं करें  तो उन से इतना लड़ो  कि सिर्फ पूरे  का पूरा   अल्लाह  का धर्म   इस्लाम  ही  बाकी  रह  जाये "
सूरा -अल अनफाल 8:39
7-अल्लाह  की धमकी 
"ईमान लाने वालो अल्लाह का आदेश मानो ,और साथ में रसूल का  आदेश  भी मानो "सूरा -अन निसा 4:59
"ईमान लाने वालो अल्लाह का आदेश मानो ,और साथ में रसूल का  आदेश  भी मानो ,और उनके कोप से बचते  रहो " सूरा -अल माइदा 9:92
"जो लोग उसके अनुसार फैसला  नहीं करें ,जो अल्लाह की किताब में   है ,तो वही  काफ़िर हैं " सूरा -अल माइदा 5:44
कुरान  से लिए गये  इन कुछ प्रमाणों  से हमें स्वीकार  करना पड़ेगा कि  जब खुद अल्लाह  ही  इतनी दोगली बातें  कहता  है , तो  उसके ऊपर  ईमान  रखने वाले मुसलमान कितने  झूठे होंगे , और अपनी  कही बातों   पर कायम  कैसे रह सकते हैं , यही बात इतिहास   से भी सिद्ध  हो चूका  है , कि  जिसने भी मुसलमानों पर विश्वास किया है उसे सदा  पछताना    पड़ा  है .


http://www.answering-islam.org/Quran/Contra/ashraf.html

37 टिप्‍पणियां:

  1. प्रशान्त29 मई 2013 को 2:56 am

    जो भी मानें, सोच समझकर मानें, वैश्विक हित की चीज को मानें।

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  2. THANKS FOR PUBLICITY OF QUR'AAN THANK U! AP LOGO KI IS QADAR KOSHIHO K BAWAJOOD BHI DUNIYA ME ISLAM DIN DOGUNI RAT CHOGUNI SPEED SE FAIL RAHA HAI IS TRAH K POST AUR WICHAR PADH KAR HAR AADMI CHAHTA HAI K WO QUR'AAN PADHE........... AUR US K NATEEJA KYA HOTA HAI AP JANTE HAIN...

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    1. bhai ji aagar aap bachhe paida karne ki maching chalate rahenge to aap ka dharma din douuni rat choguni speed se tarikki karega hi beshaq aap logo ke bachhe sadko me bhig mange hath pair salamaat hain par bhik mangna jaruri hain,, ek maa ke 15.20 bachhe khane pine ki jaruraate chije nahi hain phri bhi pachhe production me koi kami nahi aur upar se kehte ho ki ye to allaha ki den hain,, maje khud lo kaam khud karo aur bichare allaha ko badnaam karo,, kuch to sharam karo faisal abbasi,,,

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    2. इस्लाम-धर्म में शिष्टाचार
      सदाचरः PART 1

      पैग़म्बरे अकरम (सा) की वाणी अनतं जीवन के लिए जीवित व ज़िन्दा है।
      (انما بعثت لاتمم مکارم الاخلاق)

      यक़ीनन मैं मबऊस हूआ हुँ ताकि नेक व शिष्टाचार-चरित्र को सम्पूर्ण करुँ, रसूल (सा) अपना उद्देश्य को इस मबऊस के द्बारा घोषणा क्या है। लेकिन कुरअन मजीद जिस समय हज़रत मुहम्मद (सा) को प्रसंसा करना चाहता है, उस समय आप को मुख़ातिब व ख़िताब करके फरमाते हैः
      وانک لعلى خلق عظيم

      (यक़ीनन आप नेक आख़लाक़े अज़ीम पर फाएज़ है)
      इस कथा से परिष्कार होता है कि इस्लाम में शिष्टाचार की कितनी गुरुत्व है. इस्लाम मेंहवारे शिष्टाचार को दिनदारी, तक़्वा, परहेज़गारी जानता है. और इसके मौलिक पाए चार है.
      1. एक अन्य के साथ ख़ुश नीयत व पाक दिली से रहना।
      2. समाज में अन्य के साथ ख़ुश रफ़्तार व गुफ़्तारी करना।
      3. सब व्याक्तियों के साथ चाहे दुश्मन हो या दोस्त मिठी भाषा द्बारा अच्छी अच्छी कथा कहना।
      4. समस्त व्याक्तियों के साथ अच्छे व ख़ुश उत्तम व्यबहार करना।

      शिष्टाचार दो प्रकार में भाग होता है

      1- एक व्यक्तित्व शिष्टाचार, जो इंसान से सम्पर्क रख़ता है. उधारण (दे कर अपनी कथा को और परिष्कार करुँ) पानी पिना, कपढ़ा पहन्ना, सोना व जगना, भ्रमण करना, सही व सालिम हीवन बसर करना या रहना, मरीज़ व व्याधी होना.... यह सब इस्लाम में एक व्यक्ति से सम्पर्क रख़ता है। आगर इंसान यह सब क़बूल करके अपनी जीवन को सठीक रास्ते पर परिचालना करे, तो वेह समस्त प्रकार मसीबत से दुर रहेगा वरना मसीबत में गिरफ़्तार हो जाए गा।
      2- समाज के शिष्टाचार, यानी समाजिक अधिकार, उधारण के तौर पर समाज में माता-पिता, और बच्चों तथा निकटतम संबधिंयों, अध्यपक, छात्र, दोस्त व प्रतिवासी तथा समस्त प्रकार व्याक्तियों के साथ जो समाजिक सम्पर्क रखता हो ऊन व्याक्तियों के साथ नेक शिष्टाचार करना समाज की रक्षसा व बिजयता का चिह्न है।
      इस्लाम-धर्म के शिष्टाचार व निर्दशन उत्तम शिष्टाचार में से है. जो इस्लाम का एक कुल्ली विधान है और उसका मौलिक एक शिष्टाचार गुणावली पर इस्तेवार है. सार के तौर पर कहना काफी है कि इस्लाम-धर्म ने जिस चीज़ को निर्देश दिया है उस का पालन करना, और जिस चीज़ का निषेध क्या है उस से दूर रहना प्रत्येक मुसल्मानों का दायित्व व कर्तव्य है।

      हराम (निषेध)

      जिस कार्य को अंजाम देना इस्लाम ने निषेध घोषित क्या है उस को (हराम) कहा जाता हैः हराम काम तरतीब के साथ बयान हो रहा है।
      1- अत्याचार व ज़ुल्म, 2- ईस्राफ़, 3- मज़ाक़ उड़ाना, 4- कष्ट देना, 5- रहस्य का उल्लेख करना, 6- झूट व अपवाध, 7- पिता-माता का दूराचर, 8- अपनी क़ौम का माल हन्न करना, 9- बलात कार करना, 10- मर्दों का अपसी योन संबन्ध, 11- मर्द का ना-महराम नारीयों पर और नारी का ना-महराम मर्दों पर दृष्टि करना, 12- शराब पिना, 13- जुआ खेलना 14- रिशवत लेना, 15- मृत और सुवार का माँस और जो (इस्लाम की दृष्ट में हराम है) ख़ाना हराम है, 16- अनुमति के बग़ैर अन्य का माल व्यबहार करना, 17- व्यापर में धोका देना, 18- मर्दों के लिए सोना पहन्ना, 19- सुद ख़ाना, 20- कार्य व तिजारत में अन्य व्याक्तियों को धोका देना, 21- ईस्तेमना ( अपने हात से मनी (धात) निकालना) 22- अन्य व्याक्तियों के राज़ बातों में जासूसी करना, 23- ग़ीबत करना, 24-गाने के धुन से कुछ पाठ करना या सुनना (गाना और मुसिक़), 24- किसी व्यक्तित्व व शख्छियात को हत्या करना, 25- चूरी करना, 26- बद अमल अंजाम देना, 27- ख्यानत करना, 28- कूरआन मजीद के बिपरित निर्देश प्रकाश करना, 29- अन्य के अधिकार को पैमाल करना, 30- अत्याचारि व दूष्ट व्याक्तियों की सहायता करना, 31-अन्य को बदनाम करना,....।

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    3. PART 2

      फज़ाएल और शिष्टाचार

      शिष्टाचार व फज़ाएल मुसल्मानों के लिए ज़िनत बख़्श है।
      1- इंसाफ़, 2- शिष्टाचार कार्यों में सहायता करना, 3- सब्र व इस्तेक़ामत, 4- अन्य व्याक्तियों के दर्मियान शान्ति क़ायम करना, 5- अमल में इख़लाछ पैदा करना, 6- अल्लह पर विश्वास-यक़ीन करना, 7- हिल्म व बु्र्दबारी, 8- माता-पिता के साथ शिष्टाचार करना, 9- अन्य को ख़ाना ख़िलाना, 10- पाक दामन रहना 11- बुलन्द सुरों में सलाम करना, 12- पाकीज़गी, 13- ज्ञान अर्जन करना, 14- अपर व्याक्तियों के साथ अच्छे बर्ताऔ करना, 15- सख़ावत, 16- शूज़ाअत, 17-सिलाह् रहम, 18-काम-कार्य में इंसाफ़ इख़तियार करना, 19- अच्छे शिष्टाचार से पेश अना, 20- ग़रीबों को सहायता करना, 21- ख़ुजू व ख़ुशू से पेश अना, 22- हजात मन्दों को तियाज़ को पूरी करना, 23- सछ बोलना, 24- अन्य व्याक्तियों को सम्मान प्रदर्शन करना, 25- सब समय के लिए मुस्कुराना, 26- ख़राब कर्मों से दुर रहना, 27- विबाह करना, 28- अल्लह की निअमतों को शुक्र अदा करना, 29- अपर के भुलों को क्षमा करना।

      नीच और मकरुहात

      नीच व मकरुहात मानव को पस्त व पधित की तरफ ले जाते हैं जो तरतीब के साथ बयान किया जा रहा है।
      1- इंन्तेक़ाम जुई 2- गर्व व फक़्र, 3- माल-सर्वत जमा करना, 4- तकब्बूर करना, 5-बिहुदा काज करना, 6- बेहुदा कथाएं कहना, 7- कामों में सुस्ती पैदा करना, 8- भय पाना, 9- बितावी व परेशानी, 10- कूर्सी तलबि, 11- वादा करके ख़िलाफ वर्ज़ी करना, 12-लालच, 13- हिम्मत में पराजय स्वीकार करना, 14- अपरों के साथ दूश्मनी करना, 15- शक व अबकाश, 16- काम में जल्दि करना, 17- अल्लह से ग़ाफिल रहना, 18- बद आचरण, 19- स्ख़त दिल, 20- बड़ाई.....।
      उपर जो कुछ फाज़ाएल व शिष्टाचार के समपर्कित बयान क्या गया है सब मुस्तहब में से नहीं है. बल्कि उन में से कुछ इस्लाम के दृष्ट में वाजिब भी है।
      हालाकिं नीच व मकरुहात के लिए जो बयान क्या गया है, सब हराम नहीं है बल्किं ऊन में से कुछ इस्लामी विचार धारा के अनुसार हराम भी है।
      इस मौलिक भित्ती पर प्रत्येक मुसल्मान पर वाजिब है, कि अपने कामों में चेष्टा करें ताकि इस्लाम के जो संविधान है उस से अपने को आरस्ता करें चाहे यह विधान उसूलेदीन के संमधं में हो या शिष्टाचार के संमधं में, उस पर अमल अंजाम दे।
      प्रत्येक मुसल्मान को मुस्लमान कहना उपयुक्त नहीं है, क्योंकि वेह व्याक्ति उस तरह है जिस तरह एक व्याधि व्याक्ति यह कहे कि मै सही व सालिम हुँ. लिहज़ा एक व्याधि व्याक्ति के कहने पर कोई लाभ नहीं है उसी तरह एक मुसल्मान को मुसल्मान कहना फ़ैदा नहीं है, जब तक वेह व्याक्ति इस्लाम के विधान के उपर अमल न करें. लिहज़ा हम सब को चेष्टा करना चाहिए ताकि अपनी गुफ़्तार को शिष्टाचार के साथ, और कथाएं को अमल के साथ मिलाया करें ताकि पृथ्वी में अच्छे और स्वर्ग में विजय अर्जन करे सकें।

      अमीन या रब्बल अलामीन
      سبحان ربک رب العزة عما يصفون و سلام على المرسلين
      والحمد لله رب العلمين، و صلى الله على محمد و آله الطاهرين

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    4. Gadhe refrence de pramanik hadith se .... chutiya salA

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    5. Gadhe refrence de pramanik hadith se .... chutiya salA

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  3. thanks satyawadi acchi baat hai mai pehle islam ke baare me kuchh nahi janta tha.lekin jab se tumahare blog par aa raha hun.aur jo tum kehte ho wo sach hai ya jhut check karne ke liye kai mulle maulwiyon se baat ki aur kitabe padhi.
    aur is natije par pohancha hun ke islam hi ek matr dharm hai. jo anusaran karne ke yogya hai.kai baar to dil me aise khayal aaye ki apna dharm chhod kar islam dharm apna lun.par pariwar aur samaj se darr raha hun.
    tum jo sawal karte ho wo sahi hai ya galat ye janne ke liye maine islami kitabe padhi aur mujhe sahi rasta dikha.

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    1. प्यारे नबी सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम

      हमारे नबी का नाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम है, जो पीर के दिन,सुवह सादिक़ के वक्त (12) बारह रबीउल अव्वल, बमुताबिक़ बीस(20) अप्रैल 571 ईसवी, मुल्क अरब के शहर मक्का शरीफ़ में पैदा हुए। आपके वालिद का नाम हज़रत अब्दुल्लाह और वालिदा का नाम हज़रत आमेना है और दादा का नाम अब्दुलमुत्तलिब है और नाना का नाम वहब है। अल्लाह तआला ने हमारे नबी को हर चीज़ से पहले अपने नूर से पैदा फ़रमाया। अम्बिया, फ़रिश्ते, ज़मीन-आसमान, अर्श व कुर्सी, लोह व क़लम और पूरी दुनिया को आपके नूर की झलक से पैदा फ़रमाया। तमाम जहाँ में कोई किसी भी ख़ूबी में हुज़ूर के बराबर नहीं हो सकता। हमारे नबी तमाम नबियों के नबी हैं। हर शख्स पर आपकी इताअत लाज़िम है।अल्लाह तआला ने अपने तमाम खज़ानों की कुंजी हमारे प्यारे नबी को अता फरमाई है। दीन व दुनिया की सब नेमतों का देने वाला अल्लाह तआला है और तक़सीम करने वाले हमारे प्यारे नबी हैं (मिशकत शरीफ़ जि. 1, स. 32)। अल्लाह तआला ने अहकामे शरीअत भी हमारे नबी को बख्श दिए, जिस पर जो चाहें हलाल फ़रमा दें और जिसके लिए जो हराम कर दें। फर्ज़ भी चाहें तो मआफ़ फ़रमा दें (बहारे शरीअत जि. 1, स. 15)। अगर किसी इबादत से हुज़ूर नाराज हैं तो वो इबादत गुनाह है और किसी ख़ता से हुज़ूर राज़ी हैं तो वो ख़ता ऐन इबादत है। हज़रत सिद्दीक़े अकबर का ग़ारे सौर में साँप से अपने को कटवाना खुदकुशी नहीं, ऐन इबादत है। खैबर की वापसी पर मकाम सहबा पर हज़रत अली का असर की नमाज़ कज़ा कर देना गुनाह नहीं, बल्कि इबादत था। इसलिए कि इन चीज़ों से हुज़ूर राज़ी थे। अरफ़ात में आज भी नमाज़ मग़रीब को कज़ा करना इबादत है के इससे हुज़ूर राज़ी हैं (शाने हबीबुर्रेहमान 11)। अल्लाह तआला ने आपको मेराज अता फ़रमाई यानी अर्श पर बुलवाया, जन्नत, दोज़ख़ अर्श व कुर्सी वग़ैरह की सैर करवाई, अपना दीदार आँखों से दिखाया, अपना कलाम सुनाया, ये सब कुछ रात के थोड़े से वक्त में हुआ। कब्र में हर एक से आपके बारे में सवाल किया जाता है। क़यामत के दिन हश्र के मैदान में सबसे पहले आप ही शफ़ाअत करेंगे।सारी मखलूक़ खुदा की रज़ा चाहती है और ख़ुदा हमारे प्यारे नबी की रज़ा चाहता है और आप पर दुरुदों सलाम भेजता है। अल्लाह तआला ने अपने नाम के साथ आपका नाम रखा, कलमा, अज़ान, नमाज़, क़ुरान में, बल्कि हर जगह अल्लाह तआला के नाम के साथ प्यारे नबी सल्लल्लाहो अलैह वसल्लम का नाम है। अल्लाह तआला ने हुज़ूर की बेत को अपनी बेत, आपकी इज्जत को अपनी इज्जत, हुज़ूर की ख़ुशी को अपनी ख़ुशी, आपकी मोहब्बत को अपनी मोहब्बत, आपकी नाराजगी को अपनी नाराजगी क़रार दिया। हमारे प्यारे नबी तमाम नबियों से अफ़ज़ल हैं, बल्कि बाद खुदा आपका ही मरतबा है। इसी पर उम्मत का इजमा है। आपकी मोहब्बत के बग़ैर कोई मुसलमान नहीं हो सकता, क्योंकि आपकी मोहब्बत ईमान की शर्त है। आपके क़ौल व फ़ेल, अमल व हालत को हेक़ारत की नज़र से देखना या किसी सुन्नत को हल्का या हक़ीर जानना कुफ्र है। आपकी ज़ाहिरी जिंदगी (63) तिरसठ बरस की हुई, जब आपकी उमर 6 साल की हुई तो वालेदा का इन्तेक़ाल हो गया। जब आपकी उमर 8 साल की हुई तो दादा अब्दुल मुत्तलिब का इन्तेक़ाल हो गया। जब आपकी उमर 12 साल की हुई तो आपने मुल्के शाम का तिजारती सफर किया और पच्चीस साल की उमर में मक्का की एक इज्ज़तदार ख़ातून हज़रत ख़दीजा रदिअल्लाहो तआला अन्हा (जो चालीस की बेवा ख़ातून थीं) के साथ निकाह फ़रमाया और चालीस साल की उमर में ऐलाने नबुवत फ़ारान की चोटी से फ़रमाया और (53) साल की उमर में हिजरत की (63) साल की उम्र में बारह रबीउल अव्वल 11 हिजरी बमुताबिक़ 12 जून 632 ई. पीर के दिन वफ़ात फ़रमाई। आपका मज़ार मुबारक मदीने शरीफ़ में है, जो मक्का शरीफ़ से उत्तर में तक़रीबन 320 किलोमीटर दूर है। मसअला- हुज़ूर के कब्र अनवर का अंदरूनी हिस्सा, जो जिस्स अतहर से लगा हुआ है व काबे मोअज्ज़मा व अर्शे आज़म से भी अज़जल है (मिरातुलमनाज़िह जि. 1, स. 431)। हज़रत आजबिर बिन सुमरा फरमाते हैं कि मैंने चाँद के चौदहवीं रात की रोशनी में प्यारे नबी सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम को देखा। आप एक सुर्ख़ यमनी जोड़ा पहने हुए थे। मैं कभी आप की तरफ देखता और कभी चाँद की तरफ। यकीनन मेरे नजदीक आप चौदहवीं रात के चाँद से ज्यादा हसीन नजर आते थे। हसीन तो क्या आफताब रिसालात के सामने चौदहवीं रात का चाँद फीका था। हज़रते बरार बिन आजीब से पूछा गया क्या रसूल्लल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम का चेहरा तलवार के मानिन्द था। उन्होंने कहा, नहीं, बल्कि चाँद के मानिन्द था (शमायले तीरमीजी शरीफ सफा 2)।
      SUNNIKING TEAM

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    2. मोहम्मद आरिफ31 जुलाई 2015 को 10:56 am

      भाई आपकी तरह ही मैं ने भी इनके लेख पढ़े, तब से मैंने इस्लाम छोड़ने का फैसला कर लिया है, इतने दिनों से मैं अँधेरे में था, इस ब्लॉग ने मेरी आँखे खोल दी है, मैं अपने बहोत से रिश्तेदारों को भी ये बाते पढ़वा रहा हु ताकि वो भी हिन्दू बन जाये, मैं बहोत जल्द हिन्दू बन जाऊंगा और फक्र से मैं अपने हिन्दू नाम से यहाँ पोस्ट करूँगा, आप सभी मेरे मुस्लिम भाइयो से मेरी गुजारिश है की आप भी इस हकीक़त को समझे और हजार सालो से हम जिस अँधेरे में रह रहे है उस से बहार निकल कर हिन्दू धर्म में आये.
      ॐ नमः शिवाय

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  4. Sandeep sharma urf khatna king Apne jese chodu samja hai kya be lalle... islam ko to mene padha hai re chutiya ur ye paya ki Islam ek mansik rup se viklang vyakti ki ijad ki hui hai jiske nam pe aj jihad hotahai khoon kharabe hotehai
    ur 57 desh me failne ke bad bhi sirf ek unnatti kiya hai saudi arab. Usme bhi uski koi aukat nh hoti agar un mullo pas Petrol ki khadan nh hoti... agar aj petrol lena bnd kr de to mulle garibi me bhukhmarri me mar jaenge

    ye sabhi jante hai

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    1. भाई अज्ञानवश कोई ऐसी बात न कहो कि जब ईश्वर के सामने उपस्थिति हो तो पछताना पड़े।
      वास्तव में इस्लाम वह आदि धर्म है जो पहले मनुश्य से चला और सभी ईश-दूत इसी धर्म को बार बार लाते रहे। यह तो वास्तव में मानवता का धर्म है। इस ब्लोग पर जो बातें लिखी गई हैं वे दुर्भावना वश लिखी गई हैं परन्तु हमें विष्वास है कि इसका भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

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    2. मोहम्मद आरिफ31 जुलाई 2015 को 10:59 am

      इकबाल भाई लेकिन हिन्दू धरम तो तब से चला आ रहा है जब ये दुनिया भी नहीं थी, हमारा इस्लाम तो 1500-1600 सालो से ही आया है, और इंसान दुनिया में 50-60 लाख साल पहले आया था, आप डॉक्टर है आप तो जानते ही होंगे, फिर इस्लाम अकेला इकलोता धर्म कैसे हुआ ? कैसे आप कह सकते है की बस अल्लाह ही सब कुछ है, अगर मैं हिन्दू बन गया और जल गया तो मेरा नया जनम हो जायेगा, लेकिन मुस्लिम रहा था तो क़यामत तक कोन रहेगा कबर में,

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  5. bhaiyon ek baat to saaf hai ki ye website kisi politition ki chalai hui hai taki dharm ko jala kar uski aag pe apni roti seke...
    is website pe sare tathyon ko tod marod kar pesh kiya jaata hai. aur kiska dharm kaisa hai ye sabse pahle us dharm ko maanane waalo ki jubaan se pata chalta hai, jaisa ki SURYA BHAI ji aur in jaise logon k reply ko main aksar dekhta hoon...
    aap khud hi pahchane ki sahi dharm kaun hai...-GURU

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  6. surya ji mai ek hindustani hun.aur sirf padhne se gyan milta to har koi gyani hota.mai mera anubhav bata raha hun aur ye jaroori nahi ke har koi mere baat se sahmat ho.

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  7. wastav me mai bhee aap ke iss lekh ko padhkar islaam ke baare me jaananaa chahaa to pata lga ye dharm nahee balki vish shanti ke liye khatara maatra hai......

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  8. logo ke beech nafrat failaane wala dharm ek maatra yahee hai mushlim dharm......
    Aur iska wajood bhee kewal sex aur maanvata ke khilaf hai........

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  9. abhee tak to mere man me iss dharm ke logo ke prati kuchh samman tha lekin ab in dusto ke oopar kewal thookane ka man karta hai .........kiatane ghinaune hai ye........aur inka dharm......thoo thoo

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  11. Breaking News-1-अल्लाह का दावा गलत हो गया-कुरान की जगह अल-फुरकान मार्केट मे आ गयी है--------------इस समय विश्व का शायद ही कोई देश होगा जो इस्लामी आतंक से त्रस्त नहीं हो, अथवा जहां मुसलमान देश विरोधी गतिविधियाँ नहीं चला रहे हों. इससे कई देशों की अर्थव्यवस्था चौपट हो रही है. और रोज हजारों निर्दोष लोग मारे जा रहे हैं. काफी विचार करने के बाद लोग इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि आतंक की जड़ केवल वर्त्तमान कुरआन है. क्योंकि मुहम्मद तो मर चुका है. लेकिन आज भी कुरआन की शिक्षा के कारण रोज रोज नए आतंकवादी, अपराधी, और देशद्रोही बन रहे हैं.
    जब मुस्लिम विद्वानों से कहा गया कि वे कुरआन की वे आयतें बच्चों को न पढाये जिस से बच्चे आतंकवादी बनते हैं , या कुरआन में संशोधन कर दें. ताकि दुनिया के लोग शांति से जी सकें. लेकिन मुल्ले मौलवी नहीं माने. और बोले कि ऐसा नहीं हो सकता.
    फिर लोगों ने विवश होकर कुरान को जलाने की योजना बनाई. ताकि दुनिया भर के लोगों को बताया जाए कि कुरआन की हकीकत क्या है. जब कुरआन को जलाने की बात चली तो हमने उसका विरोध किया था. क्योंकि इससे वातावरण प्रदूषित होता. हमने सुझाव दिया था कि कुरआन का खंडन करने के लिए वैचारिक युद्ध किया जाये. और उसमे सारे देश शामिल हों.
    चूंकि मुसलमानों का दावा है, कि कोई भी व्यक्ति कुरआन जैसी किताब नहीं बना सकता. जैसा खुद कुरआन में लिखा है.

    “यदि जिन्न और इंसान इकट्ठे हो जाएँ तो, कुरआन जैसी किताब नहीं बना सकते. सूरा -बनी इस्राइल 17 : 88.

    “कहदो, तुम इस कुरान जैसी सिर्फ दस सूरतें बनाकर लाओ, और किसी को बुला लो. यदि तुम सच्चे हो. सूरा -हुद-11 : 13.

    “यदि किसी को शक हो, कुरान जैसी एक सूरा बना कर दिखाओ, सूरा -अल बकरा -2 :23.

    लेकिन आप सबको यह जानकर हर्ष होगा कि इन सारे दावों को झुठलाते हुए एक नयी कुरआन नाजिल हो चुकी है जो दुबई में पढाई जा रही है इसका नाम الفرقان الحق “अल फुराकानुल हक़” यानी सच्ची कुरआन. अंगरेजी में “The True Furqan” है.

    इस फुरकान में कुरआन की वे सारी आयतें निकाल दी गयीं है जो, आतंक, हिंसा, नफ़रत, अत्याचार सिखाती थीं . इसलिए फुरकान में केवल वही आयतें हैं जो मानवता कि बात सिखाती हैं. फुरकान में “बिस्मिल्ल्लाह” की आयत भी नहीं हैं इसी लिए फुरकान को इस सदी की कुरआन भी कहा जा रहा है. “The 21 st Century furakan”.

    इस फुरकान का विश्व भर में स्वागत हो रहा है, यहां तक दुबई कि इस्लामी सरकार फुरकान को प्राथमिक कक्षा के बच्चों को पढ़ा रही है, ताकि वे आतंकवादी न बनें. देखिये -

    A new Quran is being distributed in Kuwait, titled “The True Furqan”. It is being described as the ayats of the

    Shaytan and Al-Furqan weekly magazine has found out that the two American printing companies; ‘Omega 2001′ and ‘Wine Press’ are involved in the publishing of ‘The True Furqan’, a book which has also been titled ‘The 21st Century Quran’!

    It is over 366 pages and is inboth the Arabic and English languages…it is being distributed to our children in Kuwait in the private English schools! The book contains 77 Surats, which include Al-Fatiha, Al-Jana and Al-Injil. Instead of Bismillah, each Surat begins with a longer vesion of

    this incorporating the Christian belief of the three spirits.

    Quran opposes many Islamic beliefs. in one of its ayats it describes having more than one wife as fornication, divorce being non-permissable and it uses a new system for the sharing out of the will, opposing the current one. It And this so! called states that Jihad is HARAAM.

    इस फुरकान में सिर्फ 77 सूरा हैं. और इसकी भाषा भी वही अरबी है जो मुहम्मद की बनाई कुरआन की है. विशेष बात यह है कि फुरकान में जिहाद को हराम बताया गया है. अल्लाह की जगह “सुबहानाहू तआला” लिखा है इस फुरकान के अध्याय यानी सूरा के नाम भी अच्छे है. जैसे कि फातिहा, नूर, सलाम, हब्ब यानी प्रेम अदि,

    फुरकान नेट पर भी उपलब्ध है. और Amezon के द्वारा भी भेजी जा रही है. इसका मूल्य भी काफी कम है सिर्फ 3 $.

    फुरकान के नाजिल होने से मुसलमानों के इस दावे की पोल खुल गयी, कि कुरआन जैसी एक लाइन भी नहीं बन सकती

    फुरकान को प्राप्त करने के लिए – Omega 2001 PObox 29627 ,Sacramento CA 95829 .USA

    अगर आप फुरकान को सुनना चाहें तो -Al-Furqan Al-Haqq vs. Quran/Koran यू ट्यूब पर सर्च करें
    ----satyavadi-bn sharma--

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    1. benami bhai assalamwalaikum koi nayi quran nazil nahi hui hai nayi baat wo hoti hai jo pehle kise malum na ho jo cheez pehle se maujud hai usi me kaat chaat kar jo insani nafs ko pasand hai ya jo manmani karne se nahi rokta usko banana koi badi baat nahi ye insani fitrat hai..
      qurqn al mazid jaisi koi kitaab aa hi nahi sakti.

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    2. जीवन का उद्देश्य PART 1


      एक ज्ञान वह है जो मनुष्य की आवश्यकताओं से सम्बंधित होता है, जिसे दुनिया का ज्ञान कहते हैं. इसके लिए ईश्वर ने कोई संदेशवाहक नहीं भेजा, बल्कि वह ज्ञान ईश्वर ने मस्तिष्क में पहले से सुरक्षित कर दिया है. जब किसी चीज़ की आवश्यकता होती है तो मनुष्य मेहनत करता है, उस पर रास्ते खुलते चले जाते हैं.

      एक ज्ञान यह है जो जीवन के उद्देश्य से सम्बंधित है कि "मनुष्य दुनिया में आया क्यों है?" अब यह स्वयं दुनिया में आया होता तो इसे मालूम होता कि वह क्यों आया है. अगर मनुष्य ने अपने आप को स्वयं बनाया होता तो इसे मालूम होता कि इसके बनने का मकसद क्या है? हम जब कहीं भी जाते हैं, तो हमारा वहां जाने का मकसद होता है, और हमें पता होता है कि हम वहां क्यों जा रहे हैं. ना तो मनुष्य स्वयं आया है और ना इसने अपने आप को स्वयं बनाया है. ना यह अपनी मर्ज़ी से अपना समय लेकर आया है और ना अपनी मर्ज़ी से अपनी शक्ल-सूरत लेकर आया है. पुरुष, पुरुष बना किसी और के चाहने से, महिला, महिला बनी किसी और के चाहने से. रंग-रूप, खानदान, परिवार, यानि जो भी मिला है इस सबका फैसला तो कहीं और से हुआ है. जीवन का समय तो किसी और ने तय किया हुआ है, वह कौन है यह सबसे पहला ज्ञान था.

      खाना कैसे बनाना है, यह धीरे-धीरे अपने आप ही पता चल गया मनुष्य को. फसलें कैसे उगानी है, उद्योग कैसे चलने हैं, इसके लिए कोई संदेशवाहक नहीं भेजा ईश्वर ने. मनुष्य सोचता रहा, ईश्वर रहनुमाई करता रहा. यह ज्ञान भी ईश्वर ही देता है. बेशुमार, बल्कि अक्सर जो भी खोजें हुई वह अपने आप ही हो गई . इंसान कुछ और खोज रहा था, और कुछ और मिल गया. इस तरह वह ज्ञान भी ईश्वर ने ही दिया है.

      लेकिन मेरे मित्रों, इंसान सारी ज़िन्दगी भी कोशिश करता रहे तो यह पता नहीं लगा सकता है कि मैं कहा से आया हूँ? मुझे किसने भेजा है? मुझे किसने पैदा किया है? यह मुझे मारता कौन है? मैं तो स्वास्थ्य से सम्बंधित हर बात पर अमल कर रहा था, फिर यह दिल का दौरा कैसे पड़ गया? और मैंने तो सुरक्षा के सारे बंदोबस्त कर रखे थे, फिर यह साँस किसने खींच ली? जीती जागती देह का अंत कैसे हो गया? यह वो प्रश्न है जिसका उत्तर इंसान के पास नहीं है, ना ही इसके मस्तिष्क में है. किसी इंसानी किताब में भी इसका उत्तर नहीं मिल सकता. यह वह प्रश्न है जिसका उत्तर बाहर से मिलता है. गाडी कैसे बनानी है इसका ज्ञान इंसान के अन्दर था, जो धीरे-धीरे बाहर आ गया. एक मशहूर कहावत है कि "आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है". जब कार का आविष्कार हुआ तो उसकी शक्ल आज के घोड़े-तांगे जैसी थी, बनते-बनते आज इसकी शक्ल कैसी बन गई! यह ऐसा ज्ञान है जो दिमाग में पहले से ही मौजूद है, इंसान मेहनत करता रहता है, उसको राहें मिलती रहती हैं.

      लेकिन कुछ प्रश्न है, जिनका उत्तर मनुष्य के पास नहीं है. जैसे कि, मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ? कहाँ जाऊंगा? किसने भेजा है? मरते क्यों हैं? मृत्यु के बाद क्या है? मृत्यु स्वयं क्या चीज़ है?

      यह सबसे पहला ज्ञान यह है, कि मुझे भेजने वाला कौन है? मुझे क्यों भेजा गया है? अगर कोई इस प्रश्न में मात खा गया तो वह बहुत बड़े नुक्सान का शिकार हो जाएगा. ईश्वर ने इस प्रश्न का उत्तर बताने के लिए सवा लाख संदेशवाहकों को भेजा. उन्होंने आकर बताया कि हमारा पैदा करने वाला ईश्वर है, और उसने हमें एक मकसद देकर भेजा है, जीवन ईश्वर देता है और मौत ईश्वर लाता है, इंसान गंदे पानी से बना है और इससे पहले मिटटी से बना है. ईश्वर ने अपने संदेशवाहकों के ज़रिये बताया कि दुनिया परीक्षा की जगह हैं. यहाँ हर एक को अपने हिसाब से जीवन को यापन करने का हक है क्योंकि इसी जीवन के हिसाब से परलोक में स्वर्ग और नरक का फैसला होना है. हाँ यह बात अवश्य है, कि समाज सुचारू रूप से चलता रहे और किसी को किसी की वजह से परेशानी ना हो, इसलिए दुनिया का कानून भी बनाया.

      ईश्वर ने मनुष्यों को दुनिया में भेजने से पहले स्वर्ग और नरक बनाये, तब सभी आत्माओं से आलम-ए-अरवा (आत्माओं के लोक) में मालूम किया क्या वह ईश्वर को ईश्वर मानते हैं, तो सभी ने एक सुर में कहा हाँ.

      Imam Junayd, radiya'llahu anhu, said that Allah, subhanahu wa ta'ala, gathered before the creation of the world all of the spirits, all the arwah, and said, Qur'an 7:172:
      Alastu bi-Rabbikum? (Am I not your Lord?)
      They said, "We testify that indeed You are!"


      [7:172] Recall that your Lord summoned all the descendants of Adam, and had them bear witness for themselves: "Am I not your Lord?" They all said, "Yes. We bear witness." Thus, you cannot say on the Day of Resurrection, "We were not aware of this."

      NEXT PART 2

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    3. PART 2


      तब ईश्वर ने कहा ऐसे नहीं, अपितु वह दुनिया में भेज कर परीक्षा लेगा कि कौन उसके बताये हुए रास्ते पर चलता है और कौन नहीं. ताकि कोई भी ईश्वर पर यह दोष न लगा सके की उसके साथ अन्याय हुआ. परीक्षा में सबको पता चल जायेगा की कौन फेल होगा और कौन पास, इसमें कुछ आंशिक रूप से भी फेल हो सकते हैं और कुछ पूर्ण रूप से भी फेल हो सकते हैं.

      इसमें यह बात भी ध्यान रखने योग्य है कि ईश्वर किसी नियम के तहत बाध्यकारी नहीं हैं, चाहे वह नियम स्वयं उसने ही बनाये हों. लेकिन उसने कहा है कि न्याय के दिन वह सबके साथ न्याय करेगा, किसी के साथ अन्याय नहीं होगा. इसलिए जिसने भी उसको ईश्वर माना था (जबकि वह आत्मा के रूप में था, और आत्माओं के लोक का निवासी था), तो ईश्वर की वाणी के अनुरूप वह अगर उसको इस पृथ्वी में भी ईश्वर मानता है, अच्छे कर्म करता है और उसके बताए हुए रास्ते पर चलता है, तो स्वर्ग का वासी होगा, अन्यथा नरक का वासी होगा.

      ईश्वर ने सेहत एवं बीमारी, अमीर एवं गरीब तो सिर्फ परीक्षा लेने के लिए बनाये हैं ताकि पता चल सके कि अमीर और गरीब के लिए जो नियम बनाये हैं उन पर खरा उतरता है या नहीं. उदहारण: अमीर व्यक्ति ने पैसे सही कार्यों को करके कमाए हैं या गलत कार्यों द्वारा? उनको सही कार्यों में खर्च करता है या बुराई के कार्यो में? ईश्वर का धन्यवाद करता है या कहता है कि "यह पैसा तो मैंने अपनी चतुराई से कमाया, इसमें ईश्वर से क्या लेना-देना?" वहीँ अगर कोई गरीब है तब भी ईश्वर देखता है कि यह इस हाल के लिए भी ईश्वर का धन्यवाद करता है या नहीं? मेहनत और इमानदारी से पैसा कमाने कि कोशिश करता है या फिर बुरे कार्यो के द्वारा अपनी आजीविका चलने की कोशिश करता है, इत्यादि

      ईश्वर बीमारियाँ देता है कि व्यक्ति उसको (यानि ईश्वर को) पहचान सके कि सेहत और बीमारी दोनों ईश्वर के हाथ में हैं. वह जब चाहता है सेहत देता है जब चाहता है बीमारी. वही, वह बिमारियों के बदले में पापो को क्षमा कर देता है. यहाँ परीक्षा होती है कि बीमार व्यक्ति यह कहता है कि "हे ईश्वर, इस हाल में भी तेरा शुक्र है!", या फिर यह कहता है "हाय! हाय! कैसा निर्दयी ईश्वर है जिसने मुझे इस परेशानी में डाल दिया?". अगर कोई यह समझता हैं कि अमीर के लिए दुनिया में ही स्वर्ग है, तो यह उसकी ग़लतफ़हमी है. पैसे मिलने या गरीब होने भर से कभी सुख नहीं मिल सकता, अपितु सुख और शांति तो ईश्वर के ही हाथ में हैं.

      हालाँकि ईश्वर तो स्वयं जानता है की कौन कैसा है, उसे परीक्षा लेने की ज़रूरत नहीं है. परीक्षा तो वह इसलिए लेता है कि कोई उसपर यह आरोप या आक्षेप न लगा सके कि उसे तो मौका ही नहीं मिला, वर्ना वह तो ज़रूर उसके बताये हुए रस्ते पर चलता. क्योंकि ईश्वर को साक्षात् अपने सामने पा कर तो कोई भी उससे इनकार नहीं करेगा.परीक्षा तो यही है कि उसकी निशानियों (जैसे की उसकी प्रकृति, ताकत एवं सूचनाओं) पर ध्यान लगा कर उसको अपना ईश मानता है या फिर अपने आप को बड़ा समझता है, या फिर शैतान की बातो में आकर शैतान को ही अपना पालने वाला मानने लगता है.

      इसीलिए ही ईश्वर समय-समय पर एवं पृथ्वी के हर कोने में महापुरुषों को अपना संदेशवाहक बना कर भेजता है, जैसे कि इब्राहीम , नुह , इत्यादि.

      ईश्वर ने आखिर में प्यारे महापुरुष मुहम्मद (उन पर शांति हो) को भेजा और उनके साथ अपनी वाणी कुरआन को भेजा. कुरआन में ईश्वर ने कहा कि उसने इस पृथ्वी (के हर कोने और हर देश में) पर एक लाख और 25 हज़ार के आस-पास संदेशवाहकों को भेजा है, जिसमे से कई को अपनी पुस्तक (अर्थात ज्ञान और नियम) के साथ भेजा है. लेकिन कुछ स्वार्थी लोगो ने केवल कुछ पैसे या फिर अपनी प्रसिद्धि के लोभवश उन पुस्तकों में से काफी श्लोकों को बदल दिया. तब ईश्वर ने कुरआन के रूप में अपनी वाणी को आखिरी संदेशवाहक मुहम्मद (उन पर शांति हो) के पास भेजा और क्योंकि वह आखिरी दूत थे और कुरआन को ईश्वर ने अंतिम दिन तक के लिए बनाया था इसलिए यह ज़िम्मेदारी ईश्वर ने स्वयं अपने ऊपर ली कि इस पुस्तक में धरती के अंतिम दिन तक कोई बदलाव नहीं कर पायेगा. -

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    4. क़ुरआन का दावा अपने स्थान पर आज भी मौजूद है और हमें विश्वास है कि कौई मनुश्य क़ुरआन जैसी पुस्तक नहीं ला सकता क्यों कि इसका लेखक कोई मनुष्य नहीं स्वं ईश्वर है। जिस अल फुरक़ान की आप बात कर रहे हैं वह केवल लोगों को धोखा देने का प्रयास मात्र है। इससे क़ुरआन या इस्लाम को तनिक भी हानि नहीं पहुँचेगी।

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  12. आँखों के अंधे ऐ मेरे दोस्त, तू पहले इस site को खोलकर अच्छी तरह से पढ़, इसे लिखने वाला कोई हिन्दू,ईसाई या यहूदी नहीं,बल्कि ईरान जैसे कट्टर मुस्लिम देश का एक बुद्धिमान Ex मुसलमान है, जिसने आँखें मूंदकर इस्लाम की बेहद बेहूदी, बेतुकी, और हिंसक बातों को मानने से इनकार कर दिया और इस्लाम को थूक कर त्याग दिया , और अपने जीवन का मकसद ही बना लिया , बुद्धिमान मुस्लिमों को इस्लाम से बाहर निकालने का, उसके अत्यंत प्रभावशाली इस site को पढ़कर हजारों की तादाद में विवेकशील बुद्धिमान मुस्लिम इस्लाम त्याग रहे हैं : http://www.faithfreedom.org/ इसे तू ध्यान से पढ़, हो सकता है तेरी भी आँखें खुल जाए और तू मुहम्मद नाम के दुनिया के सबसे बड़े मुर्ख, हत्यारे,बलात्कारी, लुटेरे द्वारा धकेले गए गहरे कुएं से बाहर निकल आये, तू गहरे कुए के मेढक से इंसान में तब्दील हो जाये !

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  13. भाइयो , इन मुसलमानों को ये भ्रम है की इश्वर उनके साथ है इस पर मै कुछ कहना चाहता हू इन
    मुसलमानों से ............... ........................
    मुसलमानों तुम्हे ऐसा क्यों लगता है की इश्वर तुम्हारे साथ है ?? क्या इश्वर ने तुमसे आकर बताया था की इस्लाम उसका धर्म है या इस्लाम ही सत्य है और कुरान
    उसकी किताब .............................या
    तुमने इश्वर को कुरान लिखते हुए देखा था या ये देखा की आसमान से कुरान उतर कर मुहम्मद की हाथ में आई थी और ये आकाशवाणी हुई थी की कुरान ईश्वरीय किताब है और मुहम्मद उसका पैगम्बर है ..................
    बोलो मुसलमानों ऐसा क्या मिलता है तुम्हे इस्लाम में की तुम इतने दावे से इस्लाम को ही एकमात्र ईश्वरीय धर्म कहते हो बाकि सबको गलत ............... ...............
    तुम मुसलमानों के वर्तमान और इतिहास को देख के तो ऐसा नहीं लगता की इश्वर तुम्हारे साथ है नहीं तो 800 साल स्पेन पे राज करने के बाद वहा से लात मारके न
    भगाए गए होते ................................
    न सिर्फ इसाई तुमसे स्पेन छिनने में कामयाब हुए बल्कि नई दुनिया के रूप में अमरीका की खोज करने में भी कामयाब हो गए...
    और तुम मुसलमानों के हाथ से दुनिया का एक बड़ा भाग ऐसे ही चला गया इससे सिध्ध होता है की इश्वर तुम्हारे साथ तो नहीं ही है बाकि चाहे जिसके साथ हो ...............................
    एक उधाहरण और देता हु हमारे भारत में भी तुम मुसलमानों ने 800 साल तक मारकाट और जुल्मो सितम का तांड़व किया ...उसके बाद भी न तो इसे तुम इस्लामिक राष्ट्र बना पाए न ही यहाँ अपनी सत्ता बनाये रख सके .............................................
    आज जहा सच्चा मुसलमान या सच्चा इस्लाम जैसा कुछ है
    वहा सिर्फ अंधेरा और जंगलराज है !
    अरे ये जाहिल अरबी तो शुरू मे पैट्रोल को बेकार कीचड़ मानते थे जब तक कि पश्चिमी जगत ने उन्हे बताया था कि वो कीचड नही पैट्रोल है !!.......
    आज उसी तेल को अमेरिका और यूरोपियन देशो की गिद्ध
    दृष्टि से बचाने के लिये इस्लामी देशो की हालत खराब हुई
    पडी है ......................
    और जहा तेल के कुए जहा नहीं वह देश खस्ताहाल है और तेल खत्म होने तक मुसलमान रहा तो भुखमरी से मर जायेगा !!.........
    मतलब जैसे तेल खत्म ,तो खेल ही खत्म !!!.........

    तुम मुसलमान डेढ अरब हो और उधर तुम्हारे बाप
    यहूदियों की संख्या एक करोड़ चालीस लाख हैं .............
    यानी एक यहूदी सौ मुसलमानों के बराबर है, दूसरे शब्दों में एक यहूदी सौ मुसलमानों पर भारी है !!
    यहा 22 अरब देश भी मिलकर इसराइल की एक ईंट
    नहीं उखाड़ सके। न विज्ञान में, न रिसर्च में ,न मेडिकल में ,न स्पेस मे और न ही सिपाही के रूप में.........

    अरे नामर्दो तुम बस धोखा और लुकाछिपी का खेल खेलकर अपना रंग दिखाते हो ....तुम्हारा तो वजूद ही ह्यूमन राइट्स की वजह से बचा हुआ है ...................
    वरना अगर संयुक्तराष्ट्र या मानवाधिकार वगैरह का झंझट न हो तो इजराइल जैसा देश ही 22 अरब देशो को बस 2 घंटे मे साफ करने को तैयार बैठा है .........तो वही बाकी देशो तुम लोगों को रात दिन ठोका जा रहा है और तुम्हारी औकात तबीयत से बतायी जाती है ...............
    अरे खुद तुम्हारो घरो मे घुसकर तुम्हारे लोगो को कुत्ते की मौत मारा जाता है और तुम बस छाती पीटते रह जाते हो ...........
    यहा हिन्दुओ के हाथ अपने घर परिवार की वजह से बंधे हुए है ,लेकिन अब गांधी नेहरू के जमाने गये ..
    जिस दिन हयूमन राइट्स वगैरह का लफड़ा हट गया ...कसम महाकाल की ऐसा नजारा दिखायेंगे तुम्हे ,कि दुनिया हिटलर को भूल जायेगी !! ..................
    अब समय हर बीतने वाले पल के साथ रेत की भांति तुम्हारी मुठ्ठी से सरकता जा रहा है और हर बीतने वाले
    पल के साथ दुनिया में इस्लाम और मुसलमानों के लिए नफरत बढती जा रही है ..................
    इससे पहले की ये दुनिया की महाभयानक नफरत तुम्हे इतिहास बना दे सुधर जाओ ,वरना तुम्हारा अंत तो निश्चित है ही बस बिगुल बजने की देर है !!!......

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    1. good very good kya ans diya hain inn suar aur attankbaadi kain baccho ko

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  14. Satyavadi Jee , kya baat hai, aapne blog ko stop kyo kar diya?

    उत्तर देंहटाएं
  15. अल्लाह के अजाब


    1. गुनाहे शगीरा (छोटे-छोटे गुनाह) 2. गुनाहे कबीरा (बड़े-बड़े गुनाह) गुनाह शगीरा अच्छे आमाल, और इबादतों की बरक़त से माफ हो जाते हैं, लेकिन गुनाहे क़बीरा उस वक्त तक माफ नही होते जब तक सच्चे दिल से तौबा करके अल्लाह से उनके हुक़ूक को माफ नहीं कराले।

    गुनाह कबीरा हर उस गुनाह को कहते है जिसमें खुदा की तरफ से अजाब मुकरर्र किए गए हैं। जैसे शिर्क करना, जादू करना, बिना वज़ह किसी का ख़ून करना, सूद खाना, किसी यतीम का माल खाना, चोरी, शराब, झूठी गवाही देना, झूठ बोलना, माँ-बाप को तकलीफ देना, किसी पर जुल्म करना, जुआ खेलना, अल्लाह की रहमत से मायुस होना, अल्लाह के अजाब से बेखौफ हो जाना, नाच देखना, औरतों को बेपर्दा घुमना, नाप तौल में कमी करना, चुगली खाना, किसी की बुराई करना, मुसलमानों को आपस में लड़ाना, किसी की अमानत में ख़यानत करना, नमाज़, रोज़ा, हज व ज़कात आदि छोड़ देना, व्यभिचार करना ऐसे सैंकड़ों गुनाहे कबीरा में आते हैं जिनसे बचना हर मुसलमान औरत और मर्द पर फर्ज है।
    गुनाहों की वज़ह से दुनिया में भी नुकसान गुनाहों की वज़ह से आखिरत में अजाब तो मिलते ही है पर दुनिया में भी नुकसान पहुंचते रहते हैं। रोज़ी कम हो जाना, उम्र घट जाना, शारीरिक कमजोरी आना, सेहत खराब रहना, इबादतों से महरुम हो जाना, लोगो की नजर में ज़लील होना, नेमतों का छिन जाना, लाइलाज बीमारियाँ होना, चेहरे से ईमान का नूर निकल जाने से चेहरा बेरौनक हो जाना। हर तरफ जिल्लत, रुसवाईयों का मिलना, मरते वक्त मुंह से कलमा न निकलना। ऐसे गुनाहो से बड़े - बड़े नुकसान हुआ करते है।
    इबादतों से दुनियावी फायदे: इबादतों से आखिरत के फायदे तो हर शख्स जानता है। इसके साथ ही इबादतों की बरक़त से बहुत से दुनियावी फायदे भी हासिल होते है, जैसे रोज़ी बढना, माल, सामान, औलाद हर चीज़ में बरक़त होना, दुनियावी तक़लिफों और परेशानियों का दूर होना, बलाओं का टल जाना, दूसरों के दिलों में मोहब्बत पैदा होना, नूर ए ईमान से चेहरे का बारौनक हो जाना, बारिश होना, हर जगह इज्जत मिलना, फाक़ा से बचा रहना, तरक्की करना, बीमारियों से शिफा पाना, खुशियों और मसर्रतों के साथ जिन्दगी बसर करना।

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    1. मोहम्मद आरिफ31 जुलाई 2015 को 11:17 am

      भाईजान दुनिया के 10% मुस्लिम भी अगर अल्लाह की बताई बात को मान ले तो दुनिया में 100% मुस्लिम हो जायेंगे. लेकिन वो तो अल्लाह की बात ही नहीं मानते, इस वजह से ही तो मेरा ईमान जा रहा है, तभी तो लग रहा है की सब कुछ झूठ की बुनियाद है. मैं इंसान बनके मरना पसंद करूँगा, मुसलमान बनकर नहीं.

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  16. कुरआने पाक का बयान

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    अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है- जब कुरआन पढ़ा जाए तो उसे कान लगाकर सुनो और ख़ामोश रहो कि तुम पर रहम हो, (कनज़ुलइमान तरजुमा कुरआन पारा- 9, रुकु- 14, सफ़ा- 284)। रसुलल्लाहो अलैहे व सल्लम ने फ़रमाया जो कुरआन पाक पढ़ेगा और उसके मुताबिक़ अमल करेगा, क़यामत के दिन अल्लाह तआला उसके माँ-बाप को एक ताज पहनाएगा, जिसकी रोशनी सूरज की रोशनी से बेहतर होगी (जब माँ-बाप को इतनी इज्ज़त मिलेगी तो पढ़ने वाले को कितनी इज्ज़त अल्लाह तआला अता फ़रमाएगा)। अल्लाह तआला उस शख्स को जहन्नम का अज़ाब न देगा, जिसने कुरआन हिफ्ज़ किया और कुरआन के हाफ़िज अल्लाह तआला के दोस्त हैं। कुरान हिफ्ज़ से (बग़ैर देखे) पढ़ना एक हज़ार दर्जा (सवाब) रखता है। कुरआन बग़ैर हिफ्ज़ से (यानी देखकर) पढ़ना दो हजार दर्जा (सवाब) रखता है और लोगों में सबसे बड़ा इबादत गुज़ार वो है, जो सबसे ज्यादा कुरआन की तिलावत करता है, बेशक ज़िस शख्स के सीने में कुरआन का कोई हिस्सा नहीं, यानी कोई सूरत या आयत याद नहीं, वो वीरान घर की तरह है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम ने फ़रमाया क़ुरान पढ़ो इसलिए कि वो क़यामत के दिन अपने पढ़ने वाले की सिफ़ारिश बनकर आएगा और उसकी शिफ़ादत कुबूल होगी और इमामे बुख़ारी ने रिवायत की है प्यारे नबी सल्ललाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि बेशक तुम में सबसे ज्यादा फ़जीलत वाला वो है, जिसने कुरआन सीखा या सिखाया (बुख़ारी शरीफ़ जिल्द 2, सफ़ा 752)। मसअला- कुरआन पाक ज़रूरत के मुताबिक 23 साल में थोड़ा-थोड़ा नाजिल हुआ और यक बारगी माह रमज़ान के शबे क़दर में नाज़िल हुआ। मसअला- तिलावत शुरू करते वक्त आऊज़ो बिल्लाह पढ़ना मुस्तहब है और बिस्मिल्लाह पढ़ना सुन्नत। तिलावत के दरमियान कोई दुनियावी काम या बात करें तो आऊज़ो और बिस्मिल्लाह फिर से पढ़ लें।मसअला- जब ख़त्म हो तो तीन बार क़ुलहव्ललाहो अहद यानी सूरे इख्लास पढ़ना बेहतर है।मसअला- कुरआन देखकर पढ़ना ज्यादा सवाब रखता है, बग़ैर देखकर पढ़ने से, क्योंकि कुरआन का देखना उसका छूना, उसको पास रखना भी सवाब है।मसअला- मजमे में सब बुलंद आवाज़ में पढ़ें ये हराम है। अकसर तीजों या कुरआन ख्वानी की मजलिसों में बुलंद आवाज़ से सबके सब पढ़ते हैं, यह हराम है। अगर चंद शख्स पढ़ने वाले हों तो सब आहिस्ते पढ़ें। अगर मस्जिद में दूसरे शख्स नमाज़ में या दूसरे दीनी बातों में मसरूफ हैं या दुरुद शरीफ़ पढ़ने में मशगूल हैं तो कलामे पाक आहिस्ता पढ़ें। यानी ख़ुद पढ़ें और ख़ुद ही सुनें, वरना पढ़ने वाला ही गुनाहगार होगा। मसअला- जब बुलंद आवाज़ से कुरआने पाक पढ़ा जाए तो तमाम हाज़रीन पर सुनना फ़र्ज़ है, जबकि वो मजमा सुनने के लिए ही हो, वरना एक का सुनना काफी है अगरचे और लोग काम में हों। बुलंद आवाज़ से पढ़ना अफ़जल है, जबकि किसी मरीज़ या सोते को तकलीफ़ न पहुँचे। मसअला- कुरआन की कसम भी कसम है, अगर उसके ख़िलाफ होगा कफ्फ़ारा लाज़िम आएगा।

    मसअला- कुरआन की किसी आयत को ऐब लगाना या उसकी तौहीन करना या उसके साथ मज़ाक या दिल्लगी करना या आयते क़ुरान को बेमौके महल पढ़ देना के लोग सुनकर हँसें ये क्रुफ है। मसअला- कुरआने पाक पुराना या बोसिदा हो गया, इस क़ाबिल न रहा कि उसमें तिलावत की जाए और यह अंदेशा है कि इसके पन्ने बिखर जाएँगे, तो किसी पाक कपड़े में लपेटकर ऐहतियात की जगह या क़ब्रस्तान में दफना दिया जाए और दफ़न के लिए कब्र बनाई जाए और उस पर तख्ता लगाकर छत बनाकर मिट्टी डालें, ताकि कुरआन के पन्नों पर मिट्टी न गिरे। अगर कुरआन गिर जाए तो कुछ सदक़ा कर दें और अल्लाह तआला से तौबा इस्तगफार करें, ताकि अल्लाह तआला माफ़ फरमाए। मसअला- सूराह इक़रा (अलक़) की कुरआन की सबसे पहली सूरत नाज़िल हुई, जो मक्की है और इसमें 19 आयते हैं (तफसीर जलालैन- सफा 503)।मसअला- क़ुरआन में 30 पारे हैं, जो 32,3760 हरुफ़ हैं। 114 सूरते हैं। 540 रुकु हैं। 14 सजदे हैं। 666

    6 आयते हैं। 5320 ज़बर हैं। 39582 ज़ेरा हैं। 8804 पेश हैं। 105684 नुक़ते हैं (दीन मुस्तफ़ा स. 46)।मसअला- जब नमाज़ में इमाम वलदद्वालीन कहें तो आहिस्ता आमीन कहें, बेशक फरिश्ते भी आमीन कहते हैं और जिसकी आमीन फरिश्तों के मुवाफ़िक होगी अल्लाह तआला उसके अगले और पिछले गुनाह बख्श देगा (बेज़ावी शरीफ़ जिल्दे अव्वल स. 11)।

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  17. PART 1
    अल्लाह


    अल्लाह तआला एक है कोई उसका शरीक नहीं, न जात में, न सिफ़ात में, न अफ़आल में, न अहकाम में, न अस्मा में। तमाम जहानों का बनाने वाला वही है!

    ज़मीन आसमाँ, अर्श व कुर्सी, लोह व क़लम, चाँद व सूरज, आदमी-जानवर, दरिया, पहाड़, वगैरह दुनिया में जितनी भी चीज़ें हैं, सबका पैदा करने वाला वही है, वही रोज़ी देता है, वही सबको पालता है। अमीरी-गरीबी, इज्ज़त-ज़िल्लत, मारना-जिलाना सब उसके इख्तयार में है। वह जिसे चाहता है, इज्ज़त देता है और जिसे चाहता है ज़िल्लत देता है। हम सब उसके मोहताज हैं, वो किसी का मोहताज नहीं, वो हमेशा से है और हमेशा रहेगा। वह हर ऐब से पाक है, उसके लिए किसी ऐब का मानना कुफ्र है। वह हर ज़ाहिर छिपी चीज़ को जानता है। हम सब उसके बंदे हैं। वो हमारा मालिक है, वह एक और अकेला है। वही इबादत का हक़दार है। दूसरा कोई इबादत के लायक़ नहीं, हम सब उसकी मख़लूक़ हैं, वो हमारा ख़ालिक है, वो अपने बंदों पर रहमान व रहीम है। वह मुसलमानों को जन्नत और का़फिरों को दोज़ख़ में सज़ा देगा।अल्लाह तआला एक और अकेला है न कोई उसका लड़का है न वो किसी से पैदा हुआ है, न कोई उसके बराबर है। किसी को ख़ुदा का बेटा भाई या रिश्तेदार मानना कुफ्र है। मसअला- अल्लाह तआला को अल्लाह मियाँ या ऊपर वाला जैसा चाहेगा, वैसा होगा। ऐसे अल्फ़ाज़ अल्लाह तआला के लिए बोलना मना है। मसअला हक़ीक़तन रोज़ी पहुँचाने वाला वही है फ़रिश्ते वग़ैरह वसीला और वास्ता हैं। मसअला- जो शख्स अल्लाह तआला की ज़ात व सिफात के अलावा किसी और चीज़ को क़दीम माने या दुनिया के ख़त्म होने में शक करे, वो का़फिर है। अक़ीदह- दुनिया की ज़िंदगी में अल्लाह ताला का दीदार सिर्फ हमारे प्यारे नबी सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम के लिए ख़ास है और आख़ेरत में हर मुसलमान को अल्लाह तआला का दीदार होगा। ख़्वाब में दीदार इलाही दिगर अम्बिया ऐ कराम बल्कि औलिया अल्लाह को भी हुआ है। हमारे इमाम आज़म को ख्वाब में सौ बार ज़ियारत हुई।

    हर प्रकार की प्रशंसा और स्तुति अल्लाह के लिए योग्य है।
    ऐ मुस्लिम भाई ! आप ने अल्लाह की ओर आमन्त्रण और अल्लाह सुब्हानहु व तआला के अस्तित्व की वास्तविकता को स्पष्ट करने का जो काम किया है, वह वास्तव में एक सुखद काम है। अल्लाह तआला की जानकारी शुद्ध प्रकृति और शुद्ध बुद्धि से मेल खाती है, और कितने ऐसे लोग हैं कि जब उनके सामने हक़ीकत (सत्यता) स्पष्ट हो गई, तो शीघ्र ही उस ने इस्लाम स्वीकार कर लिया। अगर हम में से प्रत्येक व्यक्ति अपने दीन के प्रति अपने दायित्व को पूरा करे तो अधिक भलाई हासिल हो, अत: ऐ मुस्लिम भाई आप को बधाई हो कि आप ईश्दूतों और पैग़ंबरों का कार्य कर रहे हैं, तथा आप के लिए बहुत बड़े अज्र व सवाब की शुभसूचना है जिस का आप से आप के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ज़ुबानी वादा किया गया है, आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है :"अल्लाह तुम्हारे कारण एक आदमी को भी मार्गदर्शन प्रदान कर दे।
    जहाँ तक अल्लाह तआला के अस्तित्व के प्रमाणों का प्रश्न है तो ये सोच विचार करने वाले के लिए स्पष्ट हैं, बहुत अधिक खोज और लंबे सोच विचार की आवश्यकता नहीं है, विचार करने से पता चलता है कि वे तीन प्रकार के हैं : प्राकृतिक प्रमाण, हिस्सी (इन्द्रिय-ज्ञान और चेतना संबंधी) प्रमाण और शरई प्रमाण।
    प्राकृतिक प्रमाण :
    शैख उसैमीन रहिमहुल्लाह फरमाते हैं :
    अल्लाह के अस्तित्व पर प्रकृति (फित्रत) का तर्क उस आदमी के लिए सब से मज़ूबत प्रमाण है, इसी लिए अल्लाह तआला ने अपने कथन : (आप एकांत हो कर अपना मुँह दीन की ओर कर लें।) के बाद फरमाया है : "अल्लाह तआला की वह फित्रत (प्रकृति) जिस पर उस ने लोगों को पैदा किया है।" (सूरतुर्रूम : 30)
    अत: फित्रते सलीमा (शुद्ध प्रकृति) अल्लाह के वजूद की गवाही देती (साक्षी) है, और इस प्रकृति से वही आदमी मुँह मोड़ सकता है जिसे शैतानों ने भटका दिया हो, और जिसे शैतानों ने भटका दिया है वह इस प्रमाण और तर्क को नकार सकता है। (शर्ह अस्सफ्फारीनिया से समाप्त हुआ)
    SUNNIKING TEAM

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