शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

वैदिक धर्म मानने वाले रसूल के वंशज !

इस बात  से कोई  भी व्यक्ति इंकार नहीं   कर सकता कि सत्य को   सदा के लिए दबाना ,या मिटाना  असम्भव   है .और एक न एक दिन  सत्य   खुद  लोगों के सामने  प्रकट  हो जाता है , जिसे  लोगोंको स्वीकार  पड़ना  है .यह  बात  इस्लाम  के ऊपर  भी  लागु  होती  है . मुसलमान मुहम्मद  साहब को अल्लाह का रसूल  और  इस्लाम  का प्रवर्तक  मानते हैं .क्योंकि  23  साल  की    आयु में  सन 592 ईस्वी   में   मुहम्मद  पर  कुरान  की पहली आयत  नाजिल  हुई थी , उसी  दिन  से इस्लाम    का जन्म हुआ  , और  इसी  इस्लाम को  मनवाने के लिए मुहम्मद साहब  और उनके बाद   उनके  अनुयायी  जिहादियों  ने करोड़ों  निर्दोष  लोगों  को  मौत के घाट   उतार दिया . और  कई  देश   वीरान  कर  दिए .
यद्यपि  मुहम्मद साहब को अल्लाह का  सबसे  प्यारा  रसूल  कहा  जाता है ,लेकिन   कई  कई पत्नियां  होने पर भी  मुहम्मद साहब   के कोई  पुत्र    नहीं  हुआ . एक लड़का एक  दासी  मरिया  से हुआ था वह  भी अल्पायु  में  मर गया था .वास्तव  में  मुहम्मद साहब  वंश  उनकी  पुत्री फातिमा  से  चला    है ,जिसकी शादी  हजरत  अली  से हुई थी . इस  तरह  अली  और फातिमा   से मुहम्मद  साहब की वंशावली   वर्त्तमान  काल तक  चल  रही  है , 
अब  यदि  कोई   कहे कि उन्हीं  रसूल  के वंशज  बिना किसी  दवाब के   वेदों  पर आस्था  रखते हैं ,गायत्री  मन्त्र  पढ़ते हैं  .और  वैदिक  धर्म   ग्रन्थ   छह  दर्शनों  पर विश्वास  रखते हैं  , यही नहीं  भगवान  बुद्ध  को  भी अवतार  मानते हैं  . तो  क्या  आप  विश्वास   करेंगे ?  लेकिन  यह  शतप्रतिशत   सत्य  है , इसलिए  इस  लेख  को ध्यान  से पढ़िए ,

1- निजारी इस्माइली
यह तो  सभी  जानते हैं कि   मुसलमान  सुन्नी  और शिया दो  मुख्य  फिरकों  में  बटे  हुए  हैं , और शिया  अली  को अपना प्रथम  इमाम  मानते है .अली और फातिमा के छोटे  पुत्र  इमाम  हुसैन  को  परिवार  सहित  करबला  में  शहीद   करा  दिया गया था . केवन उनका एक बीमार पुत्र   बचा   रहा  , जिसका नाम  " जाफर  सादिक " था , जिसे  शिया  अपना  चौथा  इमाम  मानते हैं .कालान्तर में  उन्हीं  अनुयाइयों  ने   अलग   संप्रदाय  बना  लिया   जिसका  नाम  "अन  निजारियून -  النزاريون‎  "  है .जिनको  " इस्माइलिया - اسماعیلیه‎  "  भी  कहा  जाता  है .जो  "शाह करीम  अल  हुसैनी चौथे   - "  को अपना  इमाम  और धार्मिक  गुरु  मानते है ,   शाह  करीम   का जन्म  अली  और फातिमा    की  49  वीं   पीढी  में  हुआ   है .इनकी यह  वंशावली  तब से  आज  तक   अटूट  रूप से चली  आ  रही  है .इस्माइलिया   दुनिया के  25 में फैले हुए  हैं , और  इनकी संख्या करीब  डेढ़  करोड़  ( 15 million  )  है .इनकी मान्यता है कि   अल्लाह  बिना  इमाम  को दुनियां  को नहीं   रखता ,यानि हर  काल  में  एक इमाम  मौजूद  रहता है , जो लोगों का मार्गदर्शन   करता  रहता  है .इन  लोगों  की मान्यताएं  सुन्नी  और  शियायों  से बिलकुल   अलग  हैं .

2--किसी  भी दिशा में  नमाज 
निजारी इस्माइली  इबादत  के लिए   मस्जिद  की जगह  जमातखाने  में  में  जाते हैं ,इनके वर्त्तमान   इमाम  आगाखान करीम  शाह  अल  हुसैनी  और उनके भाई अयमान  मुहम्मद   ने अरबों  रुपये खर्च करके  विश्व  के कई  शहरों  में भव्य और सर्वसुविधा युक्त आधुनिक   जमातखाने  बनवा  दिए  है .जिनमे लोग इबादत  करते  हैं . लेकिन  निजारी   दूसरे  मुसलमानों  की तरह  मक्का के  काबा की  तरफ  मुंह  करके इबादत  नहीं  करते  , बल्कि   दीवार के सहारे  खड़े होकर  किसी तरफ  मुंह  करके   प्रार्थना  करते हैं .इनका  कहना है कि  अल्लाह   तो  सर्वव्यापी   है , जैसा  खुद  कुरान में  कहा   गया है ,
" पूरब  और पश्चिम  अल्लाह के ही हैं ,तो तुम जिस  तरफ ही रुख  करोगे ,उसी  तरफ   ही अल्लाह का रुख  होगा . निश्चय ही अल्लाह   बड़े  विस्तार  वाला  और  सब  कुछ  जानने  वाला  है 
" सूरा - बकरा  2 :115
इसलिए  पश्चिम   में स्थित  मक्का  के काबा की तरफ मुंह  करके  नमाज  पढ़ने की कोई जरुरत नहीं  है .

3-अली  अल्लाह  का अवतार 
निजारी  इस्माइली मानते   हैं  कि  अल्लाह  इमाम  के रूप में अवतार (incaarnation )     लेता  है . और अली अल्लाह के अवतार थे . निजारी  यह  भी आरोप  लगाते हैं ,कि   कुरान  में  इस बात का  उल्लेख   था ,लेकिन सुन्नियों ने उन आयतों  गायब कर दिया था ,जिनमे  अली  को अल्लाह का अवतार  बताया गया था .  आज  भी निजारी अली  को अल्लाह का अवतार  मानते  है  और उसकी प्रार्थना  करते हैं , ऐसी  एक  सिन्धी - गुजराती  मिश्रित  भाषा   की प्रार्थना  का नमूना   देखिये .
" हक़ तू ,पाक तू बादशाह मेहरबान   भी ,या अली तू  ही  तू .1 
रब तू ,रहमान  तू ,या  अली अव्वल आखिर  काजी , या अली तू  ही तू .2 
ते उपाया  निपाया  सिरजनहार  या अली तू  ही तू .3 
जल  मूल  मंडलाधार  ना  या अली  हुकुम  तेरा या अली तू  ही तू .4 
तेरी दोस्ती  में बोलिया  पीर शम्श  बंदा  तेरा या अली तू  ही तू .5 
(पीर शम्श  कलंदर  दरवेश )
4-इस्माइली  कलमा 

निजारी  इस्माइली  सपष्ट  रूप से मुहम्मद  साहब  के चचेरे  भाई अली  को ही अल्लाह  का अवतार  मानते हैं  .  और इनका  कलमा   इस प्रकार  है ,
"अली अमीरुल  मोमनीन , अलीयुल्लाह "
"عليٌّ امير المومنين عليُ الله  "
अर्थात - ईमान वालों  के  नायक  अली   अल्लाह  .और  हर दुआ  के बाद  यह  कहते  हैं
"अलीयुल्लाह -  عليُ الله   "   यानि अली   अल्लाह  है .(The Ali, the God)
http://www.mostmerciful.com/dua-one.htm

5-इस्माइली  दुआ 

"ला फतह इल्ला  अली व् ल सैफ अल जुल्फिकार "
"لا فتح الّا علي و  سيف الذوالفقار  "
"तवस्सिलू  इन्दल  मसाईब बिल  मौला अल  करीम हैदिरिल  मौजूद शाह  करीम  अल हुसैनी "
" توصّلو عند المصايب بالمولا كم حيدر الموجود شاه كريم الحسينِ     "
अर्थ -अली  जैसा कोई  नायक नहीं  , और जुल्फिकार जैसी  कोई तलवार नहीं , इसलिए  मुसीबत के समय  मौजूदा  इमाम  शाह  करीम  अल हुसैनी   से मदद  मांगो .इसके अलावा  एक दुसरे का  अभिवादन  करते समय  कहते हैं ,
"شاه جو ديدار "(शाह  जो दीदार )अर्थात  शाह के दर्शन , तात्पर्य आपको इमाम  के दर्शन   हों 

6-रसूल  के वंशज पीर  सय्यद  सदरुद्दीन 
इसी  तरह   इमाम जाफर  सादिक  की 21  पीढ़ी  में यानि रसूल  के वंश  में   सय्यद  सदरुद्दीन   का  जन्म  हुआ  जो ईरान से  हिजरत   करके  भारत  के गुजरात  प्रान्त  में आकर बस गए  ,उस समय   इमाम कासिम  शाह (  bet. 1310 C.E. and 1370 C.E.)   )  की इमामत  थी . बाद में इमाम  इस्लाम  शाह ( 30th Imam  ) ने   सदरुद्दीन   को   " पीर  " की पदवी  देकर सम्मान  प्रदान  किया .सदरुद्दीन    वैदिक  धर्म  से  इतने प्रभावित  हुए कि उन्होंने  जितने भी ग्रंथ  लिखे  हैं  , सभी  वैदिक  धर्म  पर आस्था प्रकट  की है .इनमे से कुछ के नाम  इस प्रकार  हैं .

7-इस्माइली  ज्ञान 
इस्माइली धार्मिक  पुस्तकों  को " ज्ञान "   ( उर्दू - گنان  )  गुजराती में " गिनान-ગિનાન  " कहा  जाता  है .ज्ञान  का अर्थ Knoledge है  .इनकी संख्या 250  से अधिक  बतायी  जाती  है .इन में अल्लाह और हजरत  अली  की स्तुति ,चरित्र शिक्षा ,रीति  रिवाज  सम्बन्धी  किताबें  , और  नबियों  की कथाएं वर्णित हैं .आश्चर्य  की  बात है कि  इस्माइली  अथर्ववेद   को भी अपनी ज्ञान  की किताबों  में शामिल  करते हैं .
8-रचनाएँ ग्रन्थ 

इमाम जाफर सादिक  की 20 वीं  पीढ़ी  में पैदा हुए " पीर शिहाबुद्दीन   "  ने ज्ञान  की  इन  किताबों   का उल्लेख  किया  है ,
1.बोध निरंजन -इसमे अल्लाह  के  वास्तविक  स्वरूप  और उसे   प्राप्त  करने की  विधि बतायी  गयी है.
2.  आराध -इसमे अल्लाह और अली की स्तुति  दी गयी है .
3. विनोद -इसमे अली  की महानता  और सृष्टि   की रचना  के बारे में  बताया  है
4. गायंत्री -यह   हिन्दुओं   का गायत्री  मन्त्र  ही  है ,
5. अथरवेद -अर्थात  अथर्ववेद   जो चौथा  वेद   है .  इस्माइली  इसे  भी अल्लाह की  किताब मानते  हैं  
  6.  सुरत  समाचार -इसमे   उदाहरण  देकर  बाले और  बुरे     लोगों  की तुलना  करके  बताया है कि  भले लोग बहुत कम  होते हैं  ,  लेकिन   हमें उनका ही साथ देना चाहिए .    
   6.गिरभावली -इसमे   शंकर पार्वती   की  वार्तालाप   के रूप में  संसार की रचना के  बारे में  बताया गया है.
7.बुद्ध  अवतार-इसमे विष्णु  के  नौवें  अवतार  भगवान  बुद्ध   का  वर्णन  है .
8. दस अवतार -इसमे विष्णु  के   दस  अवतारों  के  बाद  हजरत  अली  के अवतार  होने  का  प्रमाण
9.बावन घटी -इसमे  52  दोहों  में  फरिश्तों  और अल्लाह   के   बीच  सवाल  जवाब  के रूप में  मनुष्यों    में अंतर के बारे में  बताया है .
10. खट  निर्णय -सृष्टि  और  सतपंथ   के   6  महा पुरुषों     की जानकारी .
11.खट दरसन -वैदिक  धर्म  के छह  दर्शन  ग्रन्थ ,  जिन्हें  सभी  हिन्दू  मानते हैं  .
12. बावन बोध -इसमे  52  चेतावनियाँ   और  100  प्रकार  की रस्मों  के बारे में बताया है .
13. स्लोको ( श्लोक )- नीति  और  सदाचार के  बारे में छोटी  छोटी   कवितायेँ
14.दुआ- कुरान की  आयतों   के साथ  अल्लाह और  इमामों  की स्तुति ,के  छंद और  सभी इमामों  और पीरों  का  स्मरण

10-सत  पंथ 
फारसी  किताब " तवारीख  ए पीर "  के अनुसार  इस्लाम  क उदय के सात सौ साल  बाद  मुहम्मद  साहब  के वंशज  और इमाम  जाफर  सादिक   की  20  वीं  पीढ़ी  में जन्मे "सय्यद शिहाबुद्दीन  -"  ( سيّد شهاب الدين  ) भारत में  आये  थे . और गुजरात में  बस गए  थे .यह  पीर "सदरुद्दीन  हुसैनी " के  पिता  थे .इन्होने  भारत में  रह  कर  वैदिक हिन्दू धर्म  का गहन  अध्यन  किया . और  जब  उन्हें   वेदी धर्म   की सत्यता   का  प्रमाण  मिल  गया  तो  , उन्होंने  इस्माइली  फिरके में " सतपंथ "  नामका  अलग  संप्रदाय   बना दिया .इन्हीं   के  पुत्र  " पीर  सदरुद्दीन ( 1290-1367 )  " थे . जो इमाम जाफर  सादिक   की 21  वीं   पीढ़ी में पैदा  हुए . इन्होने पूरे पंजाब  , सिंध   और गुजरात  में सतपंथ   का  प्रसार किया .जिसका  अर्थ  Path  of Truth  होता  है .सतपन्थियों   के  अनुयाइयों  को  " मुरीद " यानि शिष्य  कहा  जाता  है . सत्पंथी    मानते हैं कि  इमाम    एक  बर्तन  की  तरह  होता  है ,जिसमे अल्लाह का नूर  भरा  होता है .और  इमाम को उसके शब्द  यानि फरमान   से पहचाना  जा  सकता  है .इमाम  के   दो  स्वरूप  होते  हैं  , बातिनी  यानी  परोक्ष (esoteric )   और   जाहिरी    यानी  अपरोक्ष (exoteric  ).सतपंथी इमाम  के प्रत्यक्ष  दर्शन   को " नूरानी  दीदार-vision of light  "  कहते  हैं .

11-सत्यप्रकाश 
निजारी  इस्माइली   पीर   ने " सत्यप्रकाश  (The True Light) )" नामकी  एक  पुस्तक  गुजराती  भाषा में   लिखी  थी , जिसका दूसरा  संसकरण  भी  प्रकाशित  हो गया  है . इसमे   निजारी  पंथ  के बारे में  पूरी  जानकारी  दी गयी  है . आप  इस लिंक से किताब  डाउन  लोड  कर सकते  हैं ,
ખુબ સંતોષની અનુભૂતિ સાથે મને કહેતાં અત્યંત ખુશી થાય છે કે અત્યંત લોકપ્રિય ગણાતી સત્ય પ્રકાશ નામની પુસ્તકની બીજી આવૃત્તિ બહાર પાડવામાં આવેલ છે. 
गुजराती  में इसके विज्ञापन का अर्थ ,खूब संतोष  की अनुभूति  के साथ ,अत्यंत  ख़ुशी की  बात है कि अत्यंत  लोकप्रिय  गिनी   जाने वाली "सत्यप्रकाश  "  नामक  पुस्तक  की  दूसरी  आवृति   प्रकाशित  हो गयी  है ,
http://www.realpatidar.com/a/series40

इस  लेख  में दिए  अकाट्य  प्रमाणों  के आधार पर  ,हम  उन जिहादी   मानसिकता   वाले  मुसलमानों   से  पूछना  चाहते हैं  ,जो वैदिक  हिन्दू  धर्म  मानने  वालों  को  काफ़िर और  मुशरिक   कहते  हैं . ऐसे लोग  बताएं कि  जब  मुहम्मद  साहब के वंशज   वेद  को प्रमाण  मानते हैं , और गायत्री  मन्त्र  को पवित्र  मान कर  जप  करते हैं  , और  अल्लाह  का अवतार   भी  मानते हैं  , तो  क्या मुसलमान    उनको  काफ़िर  और  मुशरिक  कहने की हिम्मत  करेंगे ? और   फिर भी   कोई  मुसलमान  ऐसा  करेगा  तो उसकी   सभी  नमाजें   बेकार  हो जाएँगी . क्योंकि  मुसलमान  नमाज  में   दरुदे  इब्राहीम  भी पढ़ते  हैं , जिसमे   मुहम्मद  साहब  के  वंशजों यानि " आले मुहम्मद "  के लिए बरकत की दुआ और अल्लाह  की दोस्ती प्राप्त  करने की दुआ  की जाती है .अर्थात जो भी  रसूल  की " आल " यानि  वंशजों  की  बुराई  करेगा  जहन्नम  में  जायेगा .इसलिए सभी मुसलमान  सावधान  रहे .
हम तो  मुहम्मद  साहब के ऐसे  महान  वंशजों   को   सादर    प्रणाम   करते  हैं 
   जो  पाठक  वैदिक  हिन्दू  धर्म  के  किसी भी  संगठन  के सदस्य  हों  या    कोई  वेबसाईट  चलाते  हों  वह इस  लेख को  हर जगह  पहुंचा  दें .ताकि  .  कट्टर  मुल्लों   का  हमेशा के लिए  मुंह  बंद   हो  जाये .

http://ismaili.net/heritage/node/30522

9 टिप्‍पणियां:

  1. हिन्दू धार्मिक ग्रन्थों में मुहम्मद तथा अहमद का उल्लेख
    क्या यह अपने आप में अत्यंत सोचनीय नहीं है कि जो लोग हिन्दू शब्द को धर्म से जोड़ देते है. मैं आप सबको इधर बैठ कर चैलेन्ज करता हूँ कि हिन्दू शब्द, हिन्दू धर्म ग्रन्थ की किसी भी पुस्तक में नहीं है फिर चाहे वह वेद हों, पुराण हों, उपनिषद हों, रामायण हो, महाभारत हो या फिर लेटेस्ट तुलसीदास कृत रामचरित मानस ही क्यूँ न हो. किसी भी हिन्दू धर्म ग्रन्थ की किसी भी पुस्तक में ये शब्द ढूंढने से भी नहीं मिलेगा. एक और चैलेन्ज भी है कि उपरोक्त सभी पुस्तकों में इस्लाम धर्म और मुहम्मद सल्लल्लाहोअलैहेवसल्लम का ज़िक्र एक नहीं कई मर्तबा है, यहाँ तक कि तुलसीदास कृत राम चरित मानस में भी. आपको अगर यकीन नहीं है तो आप स्वयं पढ़ लीजिये:

    "कल्कि अवतार" अथवा "नराशंस" जिनके सम्बन्ध में हिन्दू धार्मिक ग्रन्थों ने भविष्यवाणी की है वह मुहम्मद सल्लल्लाहोअलैहेवसल्लम ही हैं। क्योंकि कुछ स्थानों पर स्पष्ट रूप में "मुहम्मद" और "अहमद" का वर्णन भी आया है।
    देखिए भविष्य पुराण ( 323:5:8)

    " एक दूसरे देश में एक आचार्य अपने मित्रों के साथ आएगा उनका नाम महामद होगा। वे रेगिस्तानी क्षेत्र में आएगा।"
    श्रीमदभग्वत पुराण : उसी प्रकार श्रीमदभग्वत पुराण (72-2) में शब्द "मुहम्मद" इस प्रकार आया है:


    अज्ञान हेतु कृतमोहमदान्धकार नाशं विधायं हित हो दयते विवेक
    "मुहम्मद के द्वारा अंधकार दूर होगा और ज्ञान तथा आध्यात्मिकता का प्रचनल होगा।"
    यजुर्वेद (18-31) में है:

    वेदाहमेत पुरुष महान्तमादित्तयवर्ण तमसः प्रस्तावयनाय
    " वेद अहमद महान व्यक्ति हैं, यूर्य के समान अंधेरे को समाप्त करने वाले, उन्हीं को जान कर प्रलोक में सफल हुआ जा सकता है। उसके अतिरिक्त सफलता तक पहंचने का कोई दूसरा मार्ग नहीं।"
    SUNNIKING TEAM

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    1. अरे भाई, बकवास न करो l "हिन्दू" शब्द है ग्रंथो में l यह लो: विष्णु पुराण में कहा है: श्लोक है की : ---- " हिमालयम समारभ्य यावद इंदुसरोवरम l तंं देवनिर्मितम देशम हिन्दुस्थानम प्रचक्षते ll ---- Dusri kagah likha hai ki: "hindu" ka arth anmyaay se ladne vala hota hai l Aur महामद शब्द का भंडाफोड़ तोह महेन्द्रपाल आर्य और अन्य लोगो ने कर ही दिया है: सुदर्शन चेनल पे l देख लो ... जाकिर नायक का भंडाफोड़... सुदर्शन टी.वी. पे... यूट्यूब पे l

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  2. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम Moses (PBUH) PART 1

    मूसा (Moses) सभी इब्राहिमी धर्मों में एक प्रमुख नबी (ईश्वरीय सन्देशवाहक) हैं । ख़ास तौर पर वो यहूदी धर्म के संस्थापक माने जाते हैं । बाइबल में हज़रत मूसा की कहानी दी गयी है, जिसके मुताबिक मिस्र के फ़राओ के ज़माने में जन्मे मूसा यहूदी माता-पिता के की औलाद थे पर मौत के डर से उनको उनकी माँ ने नील नदी में बहा दिया। उनको फिर फ़राओ की पत्नी ने पाला और मूसा एक मिस्री राजकुमार बने । बाद में मूसा को मालूम हुआ कि वो यहूदी हैं और उनका यहूदी राष्ट्र (जिसको फरओ ने ग़ुलाम बना लिया था) अत्याचार सह रहा है । मूसा का एक पहाड़ पर परमेश्वर से साक्षात्कार हुआ।

    जब मूसा ईश्वरीय-आदेश पाने के लिए माउंट सेनाई (सेनाई पर्वत) पर चले. इस्राएल को यह डर सताने लगा कि वे लौट कर नहीं आएंगे और उन्होंने हारून से उनके लिए इस्राएल के ईश्वर की मूर्ति बनाने के लिए कहा हालांकि, हारून ने इस्राएल के परमेश्वर का प्रतिनिधि बनने से इनकार कर दिया. इस्राएलियों ने हारून को अभिभूत करने के लिए काफी शिकायत की थी, इसलिए उसने उनका अनुपालन किया और इस्राएलियों के कानों की सोने की बालियां इकट्ठी की. उसने उसे पिघलाया और सोने की एक जवान बैल की मूर्ती बनाई गई. बैल की पूजा कई संस्कृतियों में आम बात थी. मिस्र में, निष्क्रमण के विवरण के अनुसार जब इब्रानी (यहूदी) लोगों को आये अधिक समय नहीं हुआ था तब ही, एपिस बुल एवं बैल के सिर वाला खनुम पूज्य पात्र थे, जैसा कि कुछ लोगों का मानना है, निर्वासन के समय इब्रानी पुनर्जीवन प्राप्त कर रहे थे; वैकल्पिक रूप से, कुछ लोगों का विश्वास है कि इस्राएल के ईश्वर का संबंध चित्रित बछड़े/बैल देवता के रूप में धार्मिक रूप से आत्मसात और समन्वयता करने की प्रक्रिया के माध्यम से अंगीकृत कर लिया जाना था. मिस्रवासियों एवं इब्रानियों के मध्य प्राचीन पड़ोसियों में निकटरूप पूर्व में तथा ईजियन में, ऑरोक्स, वन्य बैल, की व्यापक रूप से पूजा की जाती थी, अक्सर चन्द्र बैल एवं ईएल के प्राणी के रूप में. इसकी मिनियोन अविभार्व के कारण यूनानी मिथक में क्रेटन बैल के रूप में उत्तरजीवी रहा. भारत में अनेक हिन्दुओं के लिए यह पूज्य है. यूनानियों (मिस्रवासियों) के बीच हाथोर को गाय के रूप में प्रतिनिधित्व प्राप्त है, एवं साथ ही साथ इसे आकाश गंगा के रूप में पेश किया जाता है, और अक्सर इसकी पहचान अपने पड़ोसी की देवी ईएल आशेरा के समकक्ष ही की गई. इब्रियों जनजातियों का विकास इन लोगों और पैन्थिओन के बीच होता गया.


    अतः बछड़े की मूर्ति बनाई. हारून ने बछड़े के सामने एक वेदी भी बनाई और यह घोषणा भी कर दी कि इस्राएल के लोगों, ये तुम्हारे ईश्वर हैं, जो तुमलोगों का मिस्र की जमीन से बाहर ले आया है". और दूसरे ही दिन, इस्राएलियों ने सोने के बछड़े को भेंट अर्पित की और(अश्लील) नाच किया गया, उत्सव मनाया. मूसा ने जब उन्हें यह सबकुछ करते देखा तो वे उनसे क्रोधित हो गए, उन्होंने उन शिला लेखों को जिस पर ईश्वर ने इस्राएलियों के लिए अपने कानून लिखे थे, ज़मीन पर फेंक दिया.

    सोने का बछड़ा बनाने और उसकी पूजा करने से दोषमुक्ति को क़ुरान की सूरा ताहा के [90-94] आयतों में देखा जा सकता है:
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  3. PART 2

    "इससे पहले ही हारून ने उनसे कहा था: "ऐ मेरे लोगों [इस्राएल के बच्चे] तुम्हारा इम्तिहान इसी में है: वास्तव में तुम्हारे मालिक (अल्लाह) हैं सबसे ज्यादा दयालु (रहमदिल); इसलिए मेरे अनुगामी बनो और मेरे आदेशों का अनुपालन करो" (90) उन्होंने कहा: "हम इस पंथ का त्याग नहीं करेंगे, लेकिन हम तब तक खुद को इसके लिए समर्पित कर देंगे जब तक कि मूसा वापस नहीं आते." (91) (मूसा) ने कहा: "हे हारून! किस बात ने तुम्हें पीछे कर दिया? (92) जबकि तुमने देखा कि वे गलत राह पर जा रहे थे. क्या तुमने तब मेरे आदेश की अवज्ञा की ?" (93) (हारून) ने जाब दिया: "ऐ मेरी मां के बेटे! (मुझे) मेरी दाढ़ी से न पकड़ो और न ही, मेरे सिर के (केशों) से! सचमुच मुझे इस बात का डर था कि आप कहीं यह न कहें कि "तू ने इस्राएल के बच्चों के बीच एक विभाजन खड़ा कर दिया है, और तू मेरे वचन का सम्मान नहीं करता है." (94)"

    बाद में, अल्लाह ने मूसा से कहा कि उसके लोगों ने अपने आप को पाप में लिप्त कर लिया है, एवं उन्होंने उन्हें नष्ट कर देने की योजना बनाई है इस्राएलियों पर प्लेग की महामारी का आक्रमण हो गया. ईश्वर के अनुसार, एक दिन वे अवश्य इस्राएलियों के पाप लिए उनके पास आएंगे.

    अल्लाह की मदद से उन्होंने फ़राओ को हराकर यहूदियों को आज़ाद कराया और मिस्र से एक नयी भूमि इस्राइल पहुँचाया । इसके बाद मूसा ने इस्राइल को अल्लाह द्वारा मिले "दस आदेश" दिये जो आज भी यहूदी धर्म का प्रमुख स्तम्भ है ।
    1. माता-पिता का आदर करो

    2. हत्या न करो

    3.व्यभिचार न करो

    4. चोरी न करो

    5. झूठी गवाही न दो

    ६. एक ही ईश्वर है

    ७. छह दिन काम एक दिन आराम करो.

    ८.परस्त्री के पास न जाओ

    9.दास, दासी और पशुओं की रक्षा करो

    10. लालच मत करो

    यहूदी धर्म के प्रमुख उपदेश:

    यहूदी धर्म में धर्मानुयायियों के लिए कुछ उपदेश दिए गए हैं जो कि इस प्रकार हैं :

    1. किसी पर अन्याय मत करो।

    2. किसी का शोषण मत करो।

    3. किसी से ब्याज मत लो, कम नफा लो।

    4. किसी को भी मत सताओ।

    5. गुलामों को गुलामी से मुक्त करो।

    6. सदाचार का पालन करो।

    7. लालच मत करो, झूठ मत बोलो।

    8. ईश्वर सबसे बड़ा है, ईश्वर से प्रेम करो।

    9. अपने भाई एवं सबका हित करो, मन वचन से कर्म करो।

    10. अल्लाह ही ईश्वर है, उनका आदेश मानो।

    11. प्रेम, करुणा, सत्य, ब्रह्मचर्य, श्रमनिष्ठ, दु:खी की सेवा सदाचार अपनाओ ये यहोबा ने कहा है।

    यहूदी धर्म द्वारा बताई सात बुराइयां

    1. घमंड से चढ़ी आंखें।

    2. झूठ बोलने वाली जीभ।

    3. निर्दोष का खून बहाने वाले हाथ।

    4. अनर्थ कल्पना करने वाला मन।

    5. बुराई की ओर बढऩे वाले पैर।

    6. भाईयों के बीच फूट डालने वाले मानव।

    7. झूठ बोलने वाला गवाह।

    मूसा के उपदेशों में दो बातें मुख्य हैं : एक-अन्य देवी देवताओं की पूजा को छोड़कर एक निराकार ईश्वर की उपासना और दूसरी सदाचार के दस नियमों का पालन।

    तौरात के अध्याय व्यवस्था विवरण 18 :18-19 में आया है कि "हे मूसा! मैं बनी इस्राईल के लिए उनके भाईयों ही में से तेरे समान एक नबी बनाऊँगा और अपने वचन (आदेश) को उसके मुँह में रख दूँगा। और वह उन से वही बात कहेगा जिसका मैं उसे आदेश दूँगा। जो आदमी उस नबी की बात नहीं मानेगा जो मेरे नाम पर बोलेगा तो मैं उस से और उसके क़बीले से इंतिक़ाम लूँगा।" ये शब्द आज तक उन की किताबों में मौजूद हैं, और उनके कथन "उनके भाईयों में से" यदि इस से अभिप्राय यह होता कि उन्हीं में से अर्थात् बनी इस्राईल में से होता तो वह इस प्रकार कहते कि: मैं उन्हीं में से उन के लिए एक नबी खड़ा करूँगा, जबकि उनके भाईयों में से कहा हैं जिसका मतलब है कि इसमाईल के बेटों में से।
    यह कथन पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के अलावा किसी और पर लागू नहीं होता है।
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  4. पैग़म्बर इब्राहीम Ibrahim (PBUH)

    पैग़म्बर इब्राहीम (अ.) की जीवनी:

    पैग़म्बर इब्राहीम के पिता आज़र अपने ज़माने के श्रेष्ठतम मूर्तिकार व मूर्तिपूजक थे. उनकी बनाई हुई मूर्तियों की पूजा हर जगह की जाती थी. आज़र कुछ मूर्तियों को इब्राहीम (अ.) को भी खेलने के लिए खिलौने बतौर दे दिया करते थे. एक बार उन्होंने अपने पिता द्वारा निर्मित मूर्तियों को एक मंदिर में देखा और अपने पिता से पूछा 'आप इन खिलौनों को मंदिर में क्यूँ लाये हो?' 'यह मूर्तियाँ ईश्वर का प्रतिनिधित्व करती हैं, हम इन्ही से मांगते है और इन्ही की इबादत करते हैं.', पिता आज़र ने बच्चे इब्राहीम (अ.) को समझाया. लेकिन आज़र की बातों को बालक इब्राहीम (अ.) के मानस पटल ने नकार दिया.

    जीवनी लम्बी है पाठकों की सुविधानुसार इसे संक्षेप में कुछ यूँ समझ लीजिये कि इब्राहीम अलैहिसलाम ने सूरज चाँद या मुर्तिओं में किसी को भी अपना माबूद (पूज्य) मानने से इनकार कर दिया. एक बार वो मुर्तिओं को देखने रात में मंदिर गए और वहां एक बहुत बड़ी मूर्ति देखी बाक़ी छोटी-छोटी मूर्ति भी देखी. उन्होंने एक कुल्हाड़ी से छोटी सभी मूर्तियों को तोड़ दिया और फिर बड़ी मूर्ती के हाथ मैं कुल्हाड़ी रख दी और चले आये अगले दिन लोगों ने पूछा कि 'इन छोटी मूर्तियों को किसने तोडा' तो इब्राहीम (अ.) ने कहा - 'लगता है रात में इस बड़े बुत से इन छोटे बुतों का झगड़ा हो गया होगा जिसके चलते बड़े बुत ने गुस्से में आकर इनको तोड़ डाला होगा, ऐसा क्यूँ न किया जाये कि बड़े बुत से ही पूछा जाये कि उसने ऐया क्यूँ किया.' लोगों ने कहा - ये बुत नहीं बोलते हैं'

    इस तरह से उन्होंने अपने पिता और लोगों को भी इस्लाम का पैग़ाम सुनाया और मुसलमान बन जाने की सलाह दी लेकिन ऐसा हो न सका. लेकिन मूर्तियों के तोड़े जाने और अन्य हक़ीक़तों के जान जाने के उपरान्त उन्होंने इब्राहीम (अ.) को ख़ूब खरी-खोटी सुनायी और डांटा और वहां से चले जाने को कहा. लेकिन इब्राहीम ने कहा- मैं अल्लाह से आपके लिए क्षमा करने कि दुआ मांगूंगा.

    पैग़म्बर इब्राहीम (अ.) को अल्लाह ने आग से बचाया:

    इस तरह से इब्राहीम एक अल्लाह की इबादत की शिक्षा लोगों को देने लगे. जिसके चलते हुकूमत की नज़र में आ गए और नमरूद जो कि हुकूमत का सदर था. उन्हें जान से मरने का हुक्म दे दिया. उन्हें आग के ज़रिये ख़त्म करने का हुक्म जारी हुआ. यह खबर जंगल में आग की तरह फ़ैली और जिस जगह पर ऐसा कृत्य करने का फरमाना हुआ था, भीड़ लग गयी और लोग दूर-दूर से नज़ारा देखने आ पहुंचे. ढोल नगाड़ा और नृत्य का बंदोबस्त किया गया और वहां एक बहुत बड़ा गड्ढा खोदा गया जिसमें ख़ूब सारी लकड़ियाँ इकठ्ठा की गयीं. फिर ऐसी आग जलाई गयी जैसी पहले कभी नहीं जली थी. उसके लपटे ऐसी कि बादलों को छू रही थी और आस पास के पक्षी भी जल कर निचे गिरे जा रहे थे. इब्राहीम (अ.) के हाथ और पैर को ज़ंजीर से जकड़ दिया गया था और एक बहुत बड़ी गुलेल के ज़रिये से बहुत दूर से उस आग में फेंका जाना था.

    ठीक उसी समय जिब्राईल फ़रिश्ता (जो कि केवल नबियों पर ही आता था) आया और बोला: 'ऐ इब्राहीम, आप क्या चाहते हैं?' इब्राहीम चाहते तो कह सकते थे कि उन्हें आग से तुरंत बचा लिया जाए. मगर उन्होंने कहा, 'मैं अल्लाह की रज़ा (मर्ज़ी) चाहता हूँ जिसमें वह मुझसे खुश रहे.' ठीक तभी गुलेल जारी कर दी गयी और इब्राहीम (अ.) को आग की गोद में फेंक दिया गे. लेकिन अल्लाह नहीं चाहता था कि उनका प्यारा नबी आग से जल कर मर जाये इसलिए तुरंत हुक्म हुआ, 'ऐ आग ! तू ठंडी हो जा और इब्राहीम के लिए राहत का सामान बन !

    और इस तरह से अल्लाह का चमत्कार साबित हुआ. आग ने अल्लाह का हुक्म माना और इब्राहीम (अ.) को तनिक भी नहीं छुई. वह आज़ाद हो गए. इब्राहीम (अ.) बाहर आ गए और उनके चेहरे पर उतना ही सुकून और इत्मीनान था जैसे वो बाग़ की सैर करके आये हों या ठंडी हवा से तरो-ताज़ा होकर आयें हो और उनके कपड़े में रत्ती भर भी धुआँ नहीं बल्कि वे वैसे ही थे जैसे कि पहले थे.

    लोगों ने इब्राहीम को आग से बच जाने की हकीकत देखी और आश्चर्यचकित हो गए और कहने लगे 'आश्चर्य है ! इब्राहीम (अ.) के अल्लाह ने उन्हें आग से बचा लिया
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  5. अमन और सुकून का केन्द्र केवल इस्लाम PART 1


    मुहम्मद मार्माडियूक पिकथॉल,इंग्लैण्ड:
    मार्माडियूक पिकथॉल 17 अप्रैल 1875 ई० को इंग्लैण्ड के एक गांव में पैदा हुए। उनके पिता चाल्र्स पिकथॉल स्थानीय गिरजाघर में पादरी थे। चाल्र्स के पहली पत्नी से दस बच्चे थे। पत्नी की मृत्यु के बाद चाल्र्स ने दूसरी शादी की, जिससे मार्माडियूक पिकथॉल पैदा हुए। मार्माडियूक ने हिब्रो के प्रसिद्ध पब्लिक स्कूल में शिक्षा प्राप्त की। उनके सहपाठियों में, जिन लोगों ने आगे चलकर ब्रिटेन के राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया, उनमें सर विंस्टन चर्चिल भी शामिल थे। चर्चिल से उनकी मित्रता अंतिम समय तक क़ायम रही। स्कूल की शिक्षा प्राप्त करने के बाद उनके सामने दो रास्ते थे। एक यह कि उच्च शिक्षा के लिए ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में दाख़िला ले लें या फिर अपने एक मित्र मिस्टर डोलिंग के साथ फि़लिस्तीन की सैर को जाए। फि़लिस्तीन पर उस जमाने में तुर्कों की हुकूमत थी। डोलिंग की वहां अंग्रेजी दूतावास में नौकरी लग गयी थी। मार्माडियूक ने दूसरा मार्ग चुना और ऑक्सफोर्ड में दाख़िला लेने के विचार को त्यागते हुए फि़लिस्तीन की ओर चल पड़े। यहीं से उनके जीवन में वह इन्कलाबी मोड़ आया, जिसने हमेशा के लिए उनके भविष्य का फै़सला कर दिया। पिकथॉल साहब असाधारण प्रतिभा के मालिक थे। विभिन्न भाषाओं को सीखने का उन्हें बहुत शौक था। इसी के चलते उन्होंने मातृभाषा अंग्रेज़ी के अलावा फ्रांसीसी, जर्मन, इतावली और हस्पानवी भाषा में निपुणता प्राप्त कर ली। मध्य पूर्व में वे कई वर्षों तक रहे। सीरिया, मिस्त्र और इराक की सैर करते रहे। बैतूल मुकद्दस में उन्होंने अरबी सीखी और उसमें महारत हासिल की। उसी जमाने में वे इस्लाम से इस हद तक प्रभावित हो चुके थे कि मस्जिदे अक्सा में शैखुल जामिया से अरबी पढ़ते-पढ़ते उन्होंने धर्म परिवर्तन की इच्छा जतायी। शैख् एक समझदार एवं दुनिया देखे हुए व्यक्ति थे। उन्होंने यह सोचकर कि कहीं यह इस नौजवान का भावुक फै़सला न हो, उन्हें अपने माता-पिता से सलाह लेने का सुझाव दिया। इस संबंध में पिकथॉल स्वयं लिखते है: इस सुझाव ने मेरे दिल मे अजीब तरह का प्रभाव डाला। इसलिए कि मैं यह समझ बैठा था कि मुसलमान दूसरों को अपने धर्म में लाने के लिए बेताब रहते हैं, मगर इस बातचीत ने मेरे विचार बदल कर रख दिये। मैं यह समझने पर मजबूर हो गया कि मुसलमानों को अनावश्यक रूप से पक्षपाती कहा जाता है। इस्लाम के बारे में पिकथॉल का अध्ययन जारी रहा और इसका प्रभाव उन पर पड़ता रहा। मिस्त्र और सीरिया के मुस्लिम समाज का भी उन्होंने गहरा अध्ययन किया और उन्हें करीब से देखा। इन सारी चीज़ों ने मिलकर उनके मन-मस्तिष्क पर इतना प्रभाव डाला कि उन्होंने अरबी पोशाक पहननी शुरू कर दी। इस्लाम की वास्तविकता उनकी रूह के अन्दर उतरती चली गयी। 1913 में पिकथॉल तुर्की गये, जहां उन्होंने तुर्कों के राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन का अध्ययन किया। तुर्कों के सामाजिक एवं स्वाभाविक गुणों ने उन्हें बहुत प्रभावित किया। अतएव वे गाज़ी तलत बक सहित कई तुर्क नौजवानों का उल्लेख करते हुए कहते हैं: एक दिन मैंने तलत बक से कहा कि आप यूं ही बिना किसी हथियार के टहलते फिरते हैं। आपको अपने साथ हथियारबन्द रक्षक रखने चाहिए। जवाब में उन्होंने कहा कि खुदा से बढ़कर मेरा कोई रक्षक नहीं। मुझे उसी पर भरोसा है। इस्लामी शिक्षा के अनुसार समय से पहले मौत कभी भी नहीं आ सकती। पिकथॉल साहब गाज़ी अनवर पाशा, शौकत पाशा, गाज़ी रऊफ़ बक, और दूसरे तुर्क रहनुमाओं का उल्लेख बड़े ही अपनेपन से करते थे। उन्हें हमेशा खुदा से डरने वाला मुसलमान पाया। तुर्की में ही उन्होंने इस्लाम क़बूल करने का पक्का इरादा कर लिया। उन्होंने गाज़ी तलत बक से कहा: मैं मुसलमान होना चाहता हूं। जिसका जवाब उन्होंने यह दिया कि कुसतुन्तुनिया में आप अपने इस्लाम कबूल करने की घोषणा मत कीजिए। अन्यथा हम लोग अन्तरराष्ट्रीय कठिनाइयों में फंस जाएंगे। अच्छा है कि इसकी घोषणा लन्दन से हो। यूरोप में दावत के दृष्टिकोण से इसके ज़बरदस्त नतीजे निकलेंगे। इसी सुझाव का नतीजा था कि पिकथॉल साहब ने लन्दन जाकर दिसम्बर 1914 मे इस्लाम कबूल करने की घोषणा की। इस घोषणा से लन्दन की इल्मी व राजनीतिक दुनिया में हलचल सी मच गयी।
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    1. mere gumsuda bhai vedo me Mohammad to kya unke baap ka bhi naam nhi h.bhai vedo me kisi bhi vyakti vishesh ka naam nhi h jakir naik ki juban mt bol.jakr achhe se vedo ka adhyayan Kr.fir bol

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  6. PART 2
    ईसाई कहने लगे कि जिस धर्म को पिकथॉल जैसा व्यक्ति स्वीकार कर सकता है उसमें निश्चित रूप से दिल मोह लेने वाली अच्छाइयां होंगी। इस्लाम कबूल करने पर पिकथॉल साहब के विचार ये थे-मैं अपने अध्ययन के बाद मुसलमान हुआ हूं। मेरे दिल में उसकी बहुत कद्र है। मुसलमानों को इस्लाम विरासत में बाप-दादा की तरफ से मिला है। इसलिए वे उसकी कद्र नहीं पहचानते। सच्चाई यह है कि मेरी जि़न्दगी में जितनी मुसीबतें और परेशानियां आयीं, उनमें अमन व सुकून की जगह केवल इस्लाम में ही मिली। इस नेमत पर अल्लाह का जितना भी शुक्र अदा करूं, कम है। विश्व युद्ध के दौरान मुहम्मद मार्माडियूक पिकथॉल लन्दन में इस्लाम के प्रचार-प्रसार का काम करते रहे। वे जुमा का खुतबा देते, इमामत, करते, ईदैन की नमाज़ पढ़ाते और रमजाऩुल मुबारक में तरावीह के इमाम होते। इस्लामिक रिव्यू नामक पत्रिका के संकलन एवं सम्पादन की जि़म्मेदारी भी इन्हीं के सुपुर्द थी। इस दौरान वे इदारा मालूमाते इस्लामी से भी जुड़े रहे। पिकथॉल साहब 1920 में उमर सुब्हानी की दावत पर मुम्बई आये, जहां उन्होंने बम्बई क्रॉनिकल के सम्पादन का काम शुरू किया और 1924 तक उसके सम्पादक रहे। इस दौरान उन्होंने तुर्कों और भारतीय मुसलमानों की समस्याओं का खुलकर समर्थन किया और राष्ट्रीय आन्दोलनों में सक्रिय रहे। 1924 में मुहम्मद मार्माडियूक पिकथॉल को निजा़मे दकन ने हैदराबाद बुला लिया। वहां उन्हें चादर घाट स्कूल का प्रिंसिपल और रियासत के सिविल सर्विस का प्रशिक्षक नियुक्त किया। हैदराबाद ही से उन्होने इस्लामिक कल्चर के नाम से एक त्रैमासिक पत्रिका निकालनी शुरू की, जिसका उद्देश्य गैऱ-इस्लामी दुनिया को इस्लामी संस्कृति, ज्ञान व कला से अवगत कराना था। लगभग दस वर्षो तक वे इस संस्था से जुड़े रहे और बड़े ही खुलूस, लगन एवं एकाग्रता के साथ इल्मी व दावती काम करते रहे। निज़ाम हैदराबाद की सरपरस्ती में ही पिकथॉल साहब ने कुरआन मजीद के अंगे्रजी अनुवाद का काम शुरू किया। निज़ाम ने उन्हें दो वर्ष के लिए मिस्त्र भेज दिया, जहां जाकर अज़हर विश्वविद्यालय के आलिमों से विचार-विमर्श करके उन्होंने कुरआन मज़ीद के अंग्रेज़ी अनुवाद का काम पूरा किया। यह पहला अंगे्रज़ी अनुवाद है जिसे किसी ने इस्लाम कबूल करने के बाद दुनिया के सामने पेश किया। इस अनुवाद में माधुर्य पाया जाता है। इस अनुवाद में भाषा की सुघड़ता है, प्रांजल और प्रवाहता है। भाषा शैली की दृष्टि से उत्कृष्ट एवं लोकप्रिय है। इससे पहले पामर, रॉडवेल और सैल आदि के अनुवाद प्रचलित थे। परन्तु पिकथॉल मरहूम ने कुरआन के अनुवाद की भूमिका में स्पष्ट शब्दों में लिख दिया कि एक ऐसा व्यक्ति जो किसी ईश्वरीय ग्रन्थ के अल्लाह की ओर से होने का क़ायल न हो, वह कभी उसके साथ न्याय नहीं कर सकता। यही कारण है कि ईसाई दुनिया इस टिप्पणी पर बहुत तिलमिलायी। बहरहाल यह बात सच है कि पिकथॉल का अनुवाद न केवल बेहतर एवं सटीक है, बल्कि पूरी दुनिया में लोकप्रिय भी है। पिछले कुछ वर्षों में केवल अमेरिका में उसकी कम से कम पांच लाख प्रतियां बिक चुकी हैं। जनवरी 1935 में मुहम्मद मार्माडियूक पिकथॉल हैदराबाद एजूकेशन सर्विस से त्याग-पत्र देकर लन्दन चले गये। निज़ाम ने उनको जीवन भर के लिए पेंशन मुकर्रर कर दी। इंग्लैण्ड में वे इस्लाम के प्रचार-प्रसार में लगे रहे। इस्लामिक कल्चर भी लन्दन से प्रकाशित होने लगा। इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होने एक संस्था की स्थापना भी की। 19 मई 1936 को उनका इन्तिकाल हो गया। वे लन्दन में दफ्ऩ हुए, हालांकि उनकी हार्दिक इच्छा थी कि उनकी मृत्यु हस्पानिया,स्पेन में हो, जहां के इस्लामी दौर से उन्हें बहुत मुहब्बत थी। पिकथॉल इस्लामी अख्लाक से मालामाल थे। पांचों वक्त नमाज़ पाबन्दी के साथ अदा करते। रमज़ान का रोज़ा कभी भी नागा़ नहीं किया। सच्चे मुसलमानों की भांति वे खुदा पर भरोसा करते और हर काम को उसकी रजा पर छोड़ देते। कदम-कदम पर अल्लाह और अल्लाह के रसूल सल्ल० का ज़िक्र करते। वे अत्यधिक शरीफ़ थे। उनसे मिलकर ईमान में ताज़गी पैदा होती थी। उन्होंने इस्लाम के प्रचार-प्रसार में प्रशंसनीय सेवाएं की हैं। कुरआन मजीद के अनुवाद के अलावा उन्होंने कई अनेक उल्लेखनीय किताबों की रचना की। कल्चरल साइड ऑफ इस्लाम उनकी एक महत्वपूर्ण कृति है। यह उन धार्मिक अभिभाषणों का संकलन है जो उन्होंने 1927 में मद्रास में वार्षिक इस्लामी खुत्बों के सिलसिले में दिये थे। उन्होंने दस-बारह उपन्यास भी लिखे, जो साहित्य की दृष्टि से उत्कृष्ट हैं।
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  7. श्रीमदभग्वत पुराण (72-2) ,suno benami bhai ,esha koi kitab nahi h ,yadi h to use mere address par bheje ,mai iman le aaunga .address -s/o-shivnath nonia ,telotand dumra,po-nawagarh ,ps-baghmara,dist-dhanbad(jharkhand)pin-828306.mo-9534140994

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