सोमवार, 2 दिसंबर 2013

कांग्रेसी धर्मनिरपेक्षता या मोदी का डर?

विभाजन कांग्रेस द्वारा भारत को लेकर देखे गए सपने पर एक गहरा धक्का था, फिर भी कांग्रेस के नेता विभाजन के लिए तैयार हो गए थे. उन्होंने मुहम्मद अली जिन्ना का विरोध नहीं किया. इस बात के काफी सबूत हैं कि कांगे्रसी नेता अप्रैल 1947 तक मुस्लिम लीग से छुटकारा पाने के लिए काफी अधीर हो उठे थे. . भारतीय नेता अक्सर "ईद मुबारक "यह मुबारकबाद क्यों दिखावटी तरी़के से देते हैं. आख़िर इसी तरी़के से वे दीपावली, दशहरा और क्रिसमस की बधाई क्यों नहीं देते हैं? क्यों वे इफ्तार पार्टियों में जाना पंसद करते हैं, लेकिन क्रिसमस पर होने वाले कार्यक्रमों में वे शरीक नहीं होते.क्या भारतीय मुसलमान नेताओं के इन तरीक़ों से मूर्ख बन जाते हैं या इन बनावटी तरीक़ों से अब वे आजिज़ आ चुके हैं.
 आगामी लोकसभा चुनाव कई मामलों में ऐतिहासिक होने जा रहा है, लेकिन सबसे ब़डा प्रश्‍न यह है कि भारत में मुसलमान होने के मायने क्या हैं? जब से भाजपा ने नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया है, कांग्रेस व अन्य धर्मनिरपेक्ष पार्टियों का यह अनुमान है कि वे गुजरात दंगों का डर दिखाकर मुस्लिम मतों का धु्रवीकरण अपनी तरफ़ कर लेंगी. कांग्रेस व अन्य धर्मनिपेरक्ष पार्टियों के लिए धर्मनिरपेक्षता का स़िर्फ एक मतलब है, मुस्लिम वोट को किसी भी तरह हथियाना. विभाजन की त्रासदी के बाद भारत में मुसलमानों के साथ दूसरे समुदायों से भिन्न व्यवहार किया जाता रहा है. यहां तक कि जो वास्तविक धर्मनिरपेक्ष नेता हैं, वे उन्हें मुसलमान कहने तक से बचते हैं. वे उन्हें अल्पसंख्यक कहते हैं, लेकिन क्या भारत में दूसरे अल्पसंख्यक समुदाय नहीं हैं? क्या मुस्लिम, भारत के सबसे ब़डे अल्पसंख्यक समुदाय हैं या वे भारत के दूसरे ब़डे बहुसंख्यक हैं (जैसा की हाल ही में जावेद जमील ने अपने लेख में लिखा है).
 क्या मुस्लिमों को अल्पसंख्यक का दर्जा उनकी नागरिकता को एक पद ऊपर उठाता है? क्या वे एकमात्र अल्पसंख्यक समुदाय हैं, जो इस दर्जे का आनंद (या कष्ट) उठाते हैं. विभाजन कांग्रेस द्वारा भारत को लेकर देखे गए सपने पर एक गहरा धक्का था, फिर भी कांग्रेस के नेता विभाजन के लिए तैयार हो गए थे. उन्होंने मुहम्मद अली जिन्ना का विरोध नहीं किया. इस बात के काफ़ी सबूत हैं कि कांग्रेसी नेता अप्रैल 1947 तक मुस्लिम लीग से छुटकारा पाने के लिए काफ़ी अधीर हो उठे थे. सही मायने में देखा जाए तो वे मुस्लिम लीग के साथ सत्ता का बंटवारा नहीं करना चाहते थे. ऐसा कहा जाता है कि बंटवारे में सिर्फ जिन्ना विश्‍वास करते थे, कांग्रेस नहीं. बंटवारे को कांग्रेस ने सीधे तौर पर तो स्वीकार नहीं किया. हालांकि उसे दगाबाज़ अंग्रेज़ों की वजह से स्वीकार करना प़डा था. बंटवारे का विरोध नहीं करने पर पार्टी में एक अपराधबोध पैदा हुआ, जिसका परिणम एक अहंकार भरे अनुमान के रूप में सामने आया कि भारत में कांग्रेस ही एक ऐसी पार्टी है, जो मुस्लिमों का कल्याण कर सकती है, जिसकी वजह से मुस्लिमों को हमेशा मूल नागरिकता मिलने में मुश्किलें होती रहीं. ऐसा माना गया कि उन्हें हमेशा एक विशेष व्यवहार की ज़रूरत है, लेकिन अब 66 सालों के विलंब के बाद समय आ गया है कि इस विषय पर खुली बहस की जाए कि आख़िर भारत में एक मुसलमान होने के मायने क्या हैं? अठारह करो़ड की आबादी वाले इस समुदाय को विशेष बर्ताव की कोई ज़रूरत नहीं है. इन्हें भारत के किसी भी अन्य समुदाय के नागरिक की तरह ही माना जाना चाहिए. पिछले दिनों मुस्लिम समुदाय के बीच में चर्चा ज़ोरों पर थी. वो यह कि समुदाय के ब़डे नेता महमूद मदनी ने कहा कि धर्मनिरपेक्ष पार्टियां हिंदुत्व का भय दिखाकर मुसलमानों को उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित कर रही हैं. ये पार्टियां मुस्लिम वोटरों से कहती हैं कि समुदाय के पास उन्हें वोट देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, लेकिन इन धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को वोट देने के बावजूद मुस्लिम समुदाय सामाजिक और आर्थिक सूचकांक में कहीं भी नहीं ठहरता. अगर हमारे पास धर्मनिरपेक्ष सिद्धांत की बजाय समान नागरिकता होती तो हमें मंडल कमीशन का सामना नहीं करना प़डता, जो पूरी तरह हिंदू आरक्षण एजेंडे पर आधारित था और अन्य सभी समुदायों को इससे वंचित रखता है. अगर कोई सकारात्मक क़दम उठाना है तो यह आर्थिक और सामाजिक आधार पर होना चाहिए. आख़िर मंडल कमीशन ने पिछ़डों और कमज़ोरों को आरक्षण देने के लिए हिंदू रुख़ क्यों अपनाया? और अगर उन्होंने ऐसा किया भी तो उनके बाद की सरकारों ने संविधान के मूलभूत अधिकारों का हनन करते हुए इसे जारी क्यों रखा?
एक बार अगर आपने धर्मनिरपेक्षता को बुरी तरह छोड़ दिया तो आपको दोबारा मुस्लिम दलितों और इसाई दलितों को परिभाषित करना होगा. मुस्लिमों पर एक नये तरह की बहस छे़डकर मंडल कमीशन के बकवास को बंद कर एक ऐसा तरीक़ा ईजाद करना होगा, जिससे सभी समुदायों के पिछ़डों को लाभ पहुंचाया जा सके. यही अंतिम समावेश होगा. और अंतिम में, यह कहना की भाजपा की सरकार में मुस्लिम परेशानी में प़ड जाएंगे, यह भारत के पिछले 66 वर्षों के लोकतांत्रिक इतिहास की तरफ़ भी इशारा करता है. यह एक कमज़ोर दलील है कि एक ही पार्टी हमेशा सत्ता में बने रहना चाहिए. क्या ऐसा नहीं है कि बीते वर्षों में एक ही पार्टी ने उन्हें कमज़ोर और पिछ़डा बनाए रखा है. .

 http://www.chauthiduniya.com/2013/11/

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