रविवार, 27 अप्रैल 2014

मुसलमानों के अधिकारों का औचित्य ?

मुसलमान  भारत के किसी भी   भाग में  रहते हों  , किसी  भी  राजनीतिक दल  के  सदस्य  हों  , इस्लाम  के  किसी  भी  धार्मिक  संगठन  या किसी  भी  फिरके  की अनुयायी  हों  ,  हर चुनाव के  समय  यही मुद्दा  उठाते  हैं  कि  आजतक  जितनी  पार्टियों   ने  राज  किया  है   सभी  ने  मुसलमानों  के साथ   बेइंसाफी  की  है  .   और  मुसलमानों    को उनके  अधिकारों  से  वंचित   रखा  है  . इसलिए  जब तक  मुसलमानों  को उनके  अधिकार  नहीं    दिए जायेंगे  देश  में  सही   मायने में   सेकुलरिज्म   , एकता  और  भाईचारा   नहीं  हो  सकता  .
चूँकि  यह  एक  सार्वभौमिक   नियम  है  कि  अधिकारों   के  लिए   पहले कर्तव्य    करना अनिवार्य  होता  है  , इसलिए  मुस्लिम  नेताओं  ने  यह  कहना भी  शुरू कर दिया कि  देश  की  आजादी  के   हजारों  मुसलमानों   ने   अपनी जानें  क़ुरबानी   की  हैं  . और  हरेक मुसलमान   स्वभाव  से  सेकुलर   , और हिन्दू   फिरका परस्त   होते  हैं   .  जिनके  कारण  ही  मुसलमान  पिछड़े , गरीब  , अशिक्षित  और  बेरोजगार  हैं  . हो  सकता है कि  नयी  पीढ़ी  के  हिन्दू  मुसलमानों  के  इन  दावों  को   सच  और  न्यायसंगत  मान लें , लेकिन  ऐतिहासिक  प्रमाणों  और  तथ्यों   से सिद्ध  होता  है  ,कि  मुसलमानों   के यह  सभी  दावे  झूठे  , निराधार     और  कल्पित  हैं  ,  वास्तव  में  मुसलमानों  की  बर्बादी   का  कारण  हिन्दू  नहीं  ,  बल्कि  हिन्दुओं   की   बर्बादी     मुसलमान   कर  रहे  हैं  , क्योंकि  जैसे  किसी  के अधिकारों   को  छीनना   अपराध  है  , उसी  तरह  किसी  के अधिकार  छीन  कर  किसी  दूसरे को देना   भी     उस से भी बड़ा  अपराध  है  ,  इस  लेख  में  इसी    बात  को स्पष्ट    करते  हुए मुसलमानों   की  भावी  योजना    का  भंडा फोड़   किया  जा  रहा  है  .
1-इस्लाम प्रजातंत्र  का  विरोधी   है  .

यदि हम  विश्व  के सभी  मुस्लिम  देशों   की  शासन  प्रणाली  देखें  तो  पता  चलता  है  कि अधिकांश  मुस्लिम  देशों  में  तानाशाही  या शरीयत  का कानून   प्रचलित  है  ,  जिसमे   मानव अधिकारों    के लिए  कोई  जगह  नहीं  है  , वास्तव  में मुसलमान सम्पूर्ण विश्व  में  इस्लामी   हुकूमत (Pan-Islamism)चाहते   हैं .इसे  अरबी  में  " अल  वहदतुल  इस्लामिया -  الوحدة الإسلامية‎  "    कहा  जाता  है  . इसके  अनुसार   सभी  देशों  को इस्लाम  के झंडे के नीचे लाना  है  . वास्तव  में  यह   अरबी  साम्राज्य  का  एक दूसरा   नाम  है , जिसे  अरबी  में  " अल वहदतुल  अरबिया -   وحدة عربية  "   कहा  जाये तो  गलत  नहीं  होगा  . हर मुसलमान छल  ,बल  और  पाखंड  का  सहारा लेकर  इसी उद्देश्य  की  पूर्ति  में  लगा  रहता  है  ,चाहे  उसे  सेकुलर  होने का   ढोंग  क्यों  न  करना  पड़े  . इसलिए मुसलमान  जिस  देश  में  अपने पैर  फैलाना  चाहते  हैं  उसी  देश  के लोगों   की  मदद   से ऐसी  हालत  पैदा  कर  देते  हैं  की  वहां  के  गैर मुस्लिम   भागने  पर  विवश  हो  जाएँ  .  जैसा   मुसलमान  कश्मीर   में  कर रहे  हैं  . और ईरान  में  किया  था  . मुसलमान  जहाँ  भी   अधिक  हो जाते हैं  तो वहां  के  गैर  मुस्लिमों  के  सामने  दो  ही  विकल्प  रखते  हैं  ,  या  तो इस्लाम  कबूल  करो  , या फिर  या  यह  स्थान  ( देश )  छोड़   दो
2-. मुस्लिम  सेकुलरिज्म  एक  चाल  है 


  मुसलमान  भले  ही सेकुलरिज्म  और  आपसी  भाईचारे   का  कितना ही  ढोंग  करें  उनके  दिलों  में  हिन्दुओं  के  प्रति नफ़रत  भरी  रहती  है  , इनके  पाखंड का बुरका  दूसरी  बार 22 अप्रेल  2014  को उस  समय उत्तर  गया  जब आप  आम पार्टी की प्रत्याशी  " शाजिया  इल्मी "  ने खुले  आम  मुसलमानों   को कट्टर सम्रदायवादी  बनने  और  सेकुलरिज्म  छोड़ने  की नसीहत दे  डाली  .  देखिये  वीडियो It's time to be communal, 
says Shazia Ilmi
Published on 22 Apr 2014
Aam Aadmi Party's core member Shazia Ilmi wants Muslims to become communal and Arvind Kejriwal gives long speeches on secularism. Double standard of AAP

http://www.youtube.com/watch?v=RVVpkp0I7xE

3-मुस्लिम राष्ट्रवादी  और  शहीदों  की  संख्या 

हमेशा  देखा  गया  कि  जब  भी  मुस्लिम  नेता    मुसलमानों  के अधिकारों  की  माग  करते हैं  ,  तो  लोगों हिन्दुओं  पर  मुसलमानों का  अहसान  जताने के लिए   कहते हैं  कि  भारत   की आजादी  के  आंदोलन  में अनेकों  मुसलमानों  ने  भाग  लिया  , और सैकड़ों  मुसलमानों  ने   अपने   प्राण   कुर्बान     कर दिए  थे  ,  लेकिन  मुस्लिम  नेताओं  के  इन दावों   की  पोल  इस  किताब " हू इज  हू ऑफ़ इंडियन मार्टिर ( WHO IS WHO OF INDIAN MARTYRS  ) से  खुल  जाती  है  , जिस के  लेखक  डाक्टर पी एन  चौपड़ा  (Dr P.N. Chopra  )  है  ,  यह  किताब  सन  1972 में   भारत सरकार  ने " Ministry of Education and Social Welfare, Government of India   "    ने  प्रकाशित  की  थी  . इस  किताब  के  अनुसार  भारत की  आजादी  के आंदोलन  में केवल  गिनेचुने   मुसलमानों  ने  सक्रीय  भाग  लिया  था  , इनकी संख्या इतनी नगण्य है कि  उँगलियों  पर  गिनी  जा  सकती  है  ,  ऐसे  लोगों  के  नाम  इस प्रकार  हैं  ,

1 .  अली  बन्धु ( जौहर अली  और शौकत अली ) 2 . खान अब्दुल  गफ्फार  खान  3 . मौलाना  अबुल  कलाम आजाद  4 . डाक्टर  जाकिर हुसैन  5 . अब्बास  तय्यब जी  6 . रफ़ी  अहमद  किदवई  7 . मौलाना  हुसैन  अहमद  मदनी  8 . और  मौलाना  हिफ्जुर्रहमान  .
लेकिन  इन में  कुछ  लोग  खिलाफत   मूवमेंट   से  भी  जुड़े  हुए थे और कुछ को  कांग्रेस ने  विभिन्न  पदों  पर  नियुक्त   कर रखा  था  .

 पुस्तक  में यह  भी  एक  चौंकाने  वाला    प्रमाण  दिया  गया  है   कि  आजादी  के इतने  बड़े आंदोलन  में  केवल  तीन  मुसलमान   मरे  थे  ,  जिनको  किसी  तरह  से  शहीद   माना  जा  सकता  है  , उनके  नाम और संक्षिप्त  परिचय  इस प्रकार  हैं  ,

1 -अहमद उल्लाह   -  पुत्र इलाही बख्श ,इसका  जन्म  पटना  में सन  1808 में  हुआ  था  . यह पटना में  डेपुटी  टेक्स  कलेक्टर  था  . लेकिन      सरकार विरोधी   वहाबी  आंदोलन    का  सक्रीय   कार्यकर्ता  था  . इसलिए  अंगरेज  सरकार   ने  इसे  सरकार   विरोधी  षडयंत्र   रचाने  का   अपराधी   घोषित  करके  सन 1857  में तीन  के लिए  जेल  भेज  दिया  .  रिहा  होने  पर इसने   वही वही  काम  किया  . इस पर  सरकार  ने  इसे 27  फरवरी 1865  को  मौत  की  सजा  सुनाई   , जो  बाद में   आजन्म   कैद  में  बदल  दी  गयी  . और इसको  अंडमान  जेल  भेज  दिया  गया ,  वहीँ    21 नवम्बर  सन 1881  में  इसकी  मौत  हो गयी  .
इसी  नाम  का    और    व्यक्ति  था  ,

2-अहमद उल्लाह -इसके  पिता  का  नाम  करीम  बक्श  था  .  इसका  जन्म   अमृतसर  में सन  1864  में  हुआ  था  . जिस  दिन  13 अप्रेल 1919  को  जलियां  वाला   बाग़ में    अंग्रेजो  भारत  छोडो ( Quit India ) आंदोलन   चल  रहा  था  , यह  यह  लोगों  को अंगरेजों  के  विरुद्ध  भड़का  रहा  था  . यह  देख  कर  एक अंग्रेज  पुलिस  वाले  ने  इस  पर  गोली  चला  दी  .  जिस  से यह  गंभीर  रूप  से  घायल  हो  गया  था  . और   जख्मो  के  कारण 25  मई 1919  में  इसकी  मौत   हो  गयी  .
3-अला उद्दीन शेख -इसका  जन्म  सन 1912 में  बंगाल  के मिदना पर  कसबे  में  हुआ  था  .  और   जब सन  1942  में नंदीग्राम थाने  के  पास  से  क्विट इंडिया  आंदोलन  का  जुलुस   गुजर  रहा  था , जिसका  नेतृत्व  यह  कर  रहा  था  , तभी  एक पुलिस  वाले  ने  इस  पर  गोली  चला  दी  . जिस  से  थाने  के  सामने ही  इसकी   तत्काल  मौत  हो  गयी   .
इस  प्रकार  से  भारत  की  आजादी  के   मुस्लिम स्वतंत्रता   सेनानियों  की  कुल  संख्या    सिर्फ ग्यारह  (11 ) ही    होती  है  ,जिनमे  केवल  तीन (3 )   लोगों ने  अपनी जानें   कुर्बान  की  हैं  .     याद रखिये  कि  यह  किताब  कांग्रेस  सरकार  ने  प्रकाशित  की  है  ,  जो  गलत  नहीं  हो  सकती  .  फिर  मुसलमान किस  आधार  पर  खुद  देशभक्त  साबित  करके   अपने  लिए  अधिकारों  की  मांग  करते  रहते  हैं  , जबकि  उसी  दौरान  मुसलमानों  ने  लाखों  हिन्दुओं  का  क़त्ल   किया  था  . आज  मुसलमान  सिर्फ अपने    फायदे के  लिए  देशभक्ति   का   ढोंग   कर  रहे  हैं   . 

4-दो-क़ौमी नज़रिया

आजकल के  जिन  हिन्दुओं  को  सेकुलर  कहलाने  का  शौक  है ,  वह  इस्लाम  के  बारे में  सही  जानकारी  के  बिना  मुस्लिम  नेताओं    की इस  बात पर  विश्वास    कर  लेते    हैं कि  इस्लाम  सभी   धर्मों   का  आदर करने और  सभी  धर्मों   को बराबर   मानने की शिक्षा   देता  है  .  और  बिना किसी   धार्मिक  भेदभाव  के  आपसी  भाई चारे   की  तालीम  देता  है  ,  आज  ऐसे  सेकुलरों  को  पता  होना चाहिए  कि  कुरआन  की  सूरा  काफिरूंन  के  अनुसार  इस्लाम  इसके  बिलकुल   विपरीत  तालीम  देता है  ,  यही  नहीं  इस्लाम की  नजर में  सभी  हिन्दू  काफिर  हैं  . फिर  भी  मुस्लिम  नेता  सेकुलरिज्म  और  भाईचारे  की  आड़ में  इस  सच्चाई   पर बुर्का  डाले  रखते  हैं  , और उचित  मौका  पाकर  अपना  बुरका उतार  देते  हैं  ,
उदहारण  के  लिए  मुसलमानों  ने  सबसे  पहले   यह  बुरका  उस  समय  उतारा  था   जब सन  1942  में सारे  देश  में अंग्रेजो  भारत  छोडो  (Quit India )  आंदोलन    जोर  पकड़  रहा  था , जिसमे  कुछ  मुस्लिम  भी  शामिल  हो  गए  थे   . ऐसे  मुस्लिम  नेता   सोच  रहे थे  कि  जैसे  ही अंगरेज  भारत  छोड़  देंगे  तो अपनी  सारी  सत्ता  और अधिकार भारत के  अंतिम  मुग़ल  बादशाह  बहादुर  शाह    को  सौंप  देंगे  ,  और फिर  से  इस्लामी  हुकूमत  कायम   हो  जाएगी  .     लेकिन   जब  इन मुस्लिम  नेताओं   का इरादा  पूरा नहीं  हुआ   तो  इन्होने  भाईचारे  का  बुरका   फेक  दिया  , और  अपने लिए अलग देश  की  मांग  करने  लगे  ,  इतिहास  में इस मांग  को " द्विराष्ट्रवाद  ( Two nation theory)  और  उर्दू  में " दो-क़ौमी नज़रिया -  دو-قومی نظریہ‎ "  कहा   जाता  है  . मुहम्मद  अली  जिन्नाह  ने  22  मार्च 1940  को  लाहौर  में आल इंडिया  मुस्लीम  लीग के  अधिवेशन  में अपनी  अध्यक्ष  के  रूप  में   इस  सिद्धांत  का  इस तरह  से खुलासा  किया  था  ,  जो आज  भी  यहाँ   के मुस्लिम  मानते  है  , जिन्नाह  ने  कहा  था  ,

"मुझे  इस बात  को समझने  में बड़ी कठिनाई  हो रही है कि हिन्दू  इस सत्य को स्वीकार  क्यों  नहीं  करते  कि  इस्लाम और हिन्दूइज्म  केवल नाम के आधार  पर  अलग  नहीं  हैं  , बल्कि यह ऎसी  दो  कौमें   हैं  जो हमेशा   आपस में  टकराती  आयी  हैं , क्योंकि इनकी  तहजीब एक दूसरे के विपरीत  है  . इनमे आपस में शादी  नहीं  होती  , और न यह एक साथ एक ही टेबल पर  खाना नहीं  खाते  , इनके  धर्म ,फिलोसोफी , रीतिरिवाज , भाषा इतिहास एक दूसरे के विपरीत  हैं  , जैसे  जिस व्यक्ति  को मुसलमान अपना हीरो-Hero ( आदर्श )   बताते  हैं  ,हिन्दू उसे अत्याचारी  और  अपना शत्रु मानते  है  . यहाँ तक  मुसलमानों  और हिन्दुओं  का  खुदा (God  )  भी   अलग   है  . इसलिए हिन्दू  और  मुसलमान  कभी  एक   साथ एक  ही देश में  नहीं   रह  सकते  . और  यदि  ऐसा  प्रयत्न  किया  जायेगा  तो वह अल्प  संख्यक  मुसलमानों  पर बहु संख्यक  हिन्दुओं   की तानाशाही   मानी  जाएगी  . जिस  से  आगे चल  कर हिंदुस्तान  के  कई  टुकड़े  हो  जायेंगे  . बेहतर  तो यह  होगा  कि  मुसलमानों   के  लिए  अलग     देश  दे  दिया  जाये  "

5-पाकिस्तान  समर्थक  मोतीलाल नेहरू 
भारत  के  जिन  भागों  में अलग  देश  की  माग  अधिक  जोर  से उठायी  जा  रही  थी  ,उनमे संयुक्त प्रान्त(  )   बिहार  , केरल और  बंगाल  मुख्य  थे  .  और कुछ  मुस्लिम  रियासतें जैसे  निजाम , भोपाल  , जूनागढ़ भी  थे  .  जो  आज  भी  भारत  में  है  .  लेकिन सिंध  ,
और  पख्तूनिस्तान  के  लोग अलग  देश  का  विरोध   कर  रहे  थे  , इसी  दौरान   मोतीलाल   नेहरू  ने  सन  1929  में  एक सर्व दलीय  सम्मलेन (all-party conference  ) में   जिन्नाह  के  अलग  देश  की  मांग  को  जायज  ठहरा    दिया

इस  से उत्साहित  होकर मुस्लिम  लीग  के नेता "चौधरी  रहमत  अली "  ने घोषणा  की , अभी  नहीं  तो  कभी  नहीं  (  Now or Never  ) अर्थात मुसलमानों  को  अलग  देश  अभी  चाहिए , चूँकि  उस समय  पाकिस्तान का नाम  नहीं रखा गया था   . जो सन 1930  में उस  समय बनाया  गया  जब इलाहाबाद  में मुस्लिम  लीग  का  सम्मेलन हुआ  था  .  जिसमे  अध्यक्ष  के  रूप  में  मुहम्मद इकबाल  ने  कहा  था  " हम  हिंदुस्तान  की  इस   नापाक  जमीन पर   नमाज   पढ़ना पसंद  नहीं  करेंगे  . इसी  " नापाक "शब्द शब्द  से  पाकिस्तान शब्द  का निर्माण हुआ  था  . बाद में  लन्दन में रहने  वाले  एक  मुस्लिम विद्यार्थी  ने 1933 में   पाकिस्तान  शब्द  के अक्षरों   का  टेली ग्राम  से यह अर्थ भेजा था ,letters taken from the names of our homelands: that is Punjab, Afghani, [N.W.F.P.], Kashmir, Sindh, Tukharistan, Afghanistan, and Bloachistan. 

It means the land of the Paks, the spiritually pure and clean."

6-गांधी  द्वारा  खिलाफत  का  समर्थन 

गांधी  न तो  वास्तव  में  कोई  संत था  और  न  ही उसे  राजनीति  का  ज्ञान  था  . वह  तो अपने चेले  नेहरू   को  प्रधान  मंत्री   बनाना  चाहता  था  ,  चूँकि  उस  समय  सभी  मुसलमान  अंगरेजों  के  खिलाफ  हो गए  थे  , इसलिए  गांधी  ने सोचा   कि  यदि  खिलाफत   के  लोगों  का  साथ  लिया  जाये तो  देश  जल्दी  आजाद  हो जायेगा  .  यद्यपि सावरकर  ने  कहा था  कि यह  खिलाफत  मूवमेंट  नहीं  खुराफात  मूवमेंट  है  . लेकिन  नेहरू प्रेम  में अंधे होकर  गांधी ने खिलाफत  वालों   को अपना  समर्थन   दे  दिया  .

खिलाफत आन्दोलन (1919-1924) भारत में मुख्यत: मुसलमानों द्वारा चलाया गया राजनीतिक-धार्मिक आन्दोलन था। इस आन्दोलन का उद्देश्य तुर्की में खलीफा के पद की पुन:स्थापना कराने के लिये अंग्रेजों पर दबाव बनाना था।खिलाफत आन्दोलन दूर देश तुर्की के खलीफा को गद्दी से हटाने के विरोध में भारतीय मुसलमानों द्वारा चलाया गया आन्दोलन था। भारत में मोहम्मद अली जोहर व शौकत अली जोहर दो भाई खिलाफत का नेतृत्व कर रहे थे। गाँधी ने खिलाफत के सहयोग के लिए सहयोग करने की घोषणा कर दी। ऐसी मान्यता है कि इसका राष्ट्रीय आंदोलन के साथ कोई प्राथमिक सरोकार नहीं था। फिर भी इसने साम्राज्यवाद के विरुद्ध राष्ट्रीय विद्रोह के ध्रुवीकरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। हालांकि अतातुर्क द्वारा स्वयं ख़लीफा पद समाप्त कर देने से इस आंदोलन का मूल चरित्र ही अप्रासंगिक हो गया. तुर्क सम्राट अब्दुल हामिद द्वितीय (1876-1909) पश्चिमी हमले और बहिष्कार से ओटोमन साम्राज्य की रक्षा करने के लिए, और करने के लिए घर पर  पश्चिमीकरण ( Westernizing) लोकतांत्रिक विपक्ष को कुचलने के लिए एक बोली में अपने पैन इस्लामी कार्यक्रम का शुभारंभ किया.

खलीफा होने के नाते, तुर्क सम्राट नाममात्र दुनिया भर में सभी मुसलमानों की सर्वोच्च धार्मिक और राजनीतिक नेता थे.
मुस्लिम धार्मिक नेताओं की एक बड़ी संख्या के लिए जागरूकता फैलाने और खलीफा की ओर से मुस्लिम भागीदारी विकसित करने के लिए काम करना शुरू कर दिया. मुस्लिम धार्मिक नेता मौलाना महमूद  हसन तुर्क साम्राज्य से समर्थन के साथ अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता की एक राष्ट्रीय युद्ध को व्यवस्थित करने का प्रयास किया.सावरकर  ने  गांधी  को  सचेत  किया  था  यदि  आप  मुसलमानों  की  मदद  से  आजादी   प्राप्त   भी  कर लोगे तो  मुसलमान तुम से  इसके  बदले  कुछ न कुछ  जरूर  मांगेंगे   .  और  बाद  में ऐसा  ही  हुआ  .  मुसलमानों   ने  पाकिस्तान  मांग  लिया  .
7-गांधी  हिन्दुओं  का  शत्रु 

जिस  समय अखंड  भारत पर  अंगरेजों   का  राज  था  , उसी  समय  तुर्की  में  इस्लामी   हुकूमत  थी  ज़िसे ( Ottoman Empire )    और  अरबी  में " वहदतुल   उस्मानिया  - الدولة العثمانية  "  भी  कहा  जाता   है  . और उस  समय  उस्मानी  खिलाफत के  34  वें   खलीफा  "  अब्दुल  हमीद    द्वितीय  - عبد المجید الثانی  "   का राज  था  ,   इसकी  खिलाफत  करीब 600 साल  से  चल    रही  थी  .

चूँकि  तुर्की   को  यूरोप   का  द्वार  और ( Sick man of Europe )   भी  कहा  जाता  है  ,  और  तुर्की  साम्राज्य    हंगरी  ,सर्बिया , रोमानिया  ,ग्रीस  ,यूक्रेन  , सीरिया  ,मिस्र  के  आलावा  अफरीका  के  कुछ  भागों  तक  फैला  हुआ  था  .  जिस  से अंगरेजों  को  व्यापर  करने में  दिक्कत  हो रही  थी  . इसलिए  अंगरेज और  जर्मन  सेना  ने  मिल  कर  खलीफा  अब्दुल  हामिद  को  गद्दी  से  उतार  दिया  . जिसे  दुनिया  के  सभी  मुस्लिम  अपना  धार्मिक  नेता   मानते थे  . जैसे  ईसाई  पॉप  को  अपना  धार्मिक  नेता  मानते   हैं  . लेकिन जैसे ही अंगरेजों  ने  खलीफा  को  हटाया   सन 1921 में  केरल  के  मालाबार  में   मोपला  मुसलमानों  ने  हिन्दुओं  का  कत्ले  आम  शूरू कर  दिया  . यही नहीं  हजारों  हिन्दू  औरतों  से बलात्कार  करके  उनको  जबरन  मुसलमान  बना    दिया  . और  जब  मालाबार के  जिला  कांग्रेस  कमिटी   के अध्यक्ष के   वी   गोपाल  मेनन   (K.V. Gopal Menon   )  ने  यह खबर  गांधी    के पास भेजी    तो  गांधी  ने   यह  जवाब    भेजा "THE MOPLAH MUSLIMS ARE GOD-FEARING AND THEY ARE FIGHTING FOR WHAT THEY CONSIDER AS RELIGION AND IN A MANNER THEY CONSIDER AS RELIGIOUS” . 

अर्थात ,  मोपला लोग  अल्लाह  से  डरने वाले सच्चे  मुसलमान  हैं  , और  वह  जो कुछ  कर रहे हैं  वह सब उनकी  दृष्टि में एक  धार्मिक  कार्य  है  . और  वह जिस  काम को धर्म  समझते  हैं   वही   काम  करते   हैं  .
इस  तरह   से  गांधी ने  मुसलमानों  द्वारा हिन्दुओं  पर किये  गए  सभी अत्याचारों  और  अपराधों   को  धार्मिक  कार्य  साबित कर दिया  . जबकि    उस  घटना  के  कुछ  दिनों  बाद  एनी  बेसन्ट(Annie Besant)   घटना  वाली  जगहों  पर गयी  ,तो  पता  चला  कि  मोपला  मुसलमानों  ने   हजारों   नम्बूदिरी  हिन्दुओं को जबरन   मुस्लिम  बनाया  और   हजारों  हिन्दू  औरतों  के  साथ  बलात्कार किया  था  .  इस  दंगे में 100000  ( एक  लाख)    हिन्दू  मार डाले  गए  थे  . फिर  भी   मूर्ख  हिन्दू  गांधी   को  राष्ट्र  पिता  मानते  हैं  . जबकि वह  वास्तव   में  हिन्दूशत्रु था  . 

8-पाकिस्तान  के  भरण  पोषण  का खर्च 
आज तक अधिकांश लोग यही   मानते  आये  हैं  कि  1947  में  बटवारे  के  बाद गांधी  ने   नेहरू  से पाकिस्तान  को अपना भरण पोषण (  Alimony ) के लिए 50  करोड़   रुपये दिलवाए थे  . लेकिन  यह बात  अर्ध सत्य   है  . प्रसिद्ध   किताब  " फ्रीडम एट मिड  नाइट (  Freedom at midnight   ) लेखक "लेरी  कोलिन्स डोमिनिक   ला  पियरे (Larry Collins and Dominique LaPierre  ) के  अनुसार देश   की  चल अचल  संपत्ति  का  बटवारा 20 - 80  के  अनुपात   से  किया  गया  था   .जिसमे रेलवे  के इंजन   ,डिब्बे  , सरकारी  गाड़ियां,टेबल  कुर्सियां ,स्टेशनरी,  फर्नीचर  यहाँ  तक  झाड़ू  भी  शामिल  थे   . साथ में  50  करोड़  नकद  राशि भी थी  .लेकिन  जब  इतना  लेने के  बाद भी  पाक  सेना ने  कश्मीर  पर  हमला  कर  दिया  तो पाकिस्तान  को  खुश  करने के लिए   नेहरू  ने  पाकिस्तान को  25  करोड़ रुपये  और  दे  दिए  . जिसके  कारन  बटवारे    का  अनुपात  बदल  गया  था  .   अर्थात  17.5%  पाकिस्तान  को   और  82.5 %  भारत  को  .  इसका  यही  मतलब  निकलता है कि  गांधी  और  नेहरू  ने 1947  में  पाकिस्तान  को  मजबूत और  पुष्ट  करने के लिए   50  करोड़  रुपये नहीं  बल्कि  75  करोड़ रूपये  दिए  थे  . ताकि वह  भारत पर  हमले   करता  रहे  .

9-लियाकत  - नेहरू  पेक्ट 

 इस  बात  में  कोई  शंका  नहीं  की  भारत  का  बटवारा  धर्म  के आधार  पर  हुआ   था  , क्योंकि  मुसलमान  हिन्दुओं  से  नफ़रत  करते  थे  और उनकेसाथ नहीं  रहना  चाहते  थे  .  बटवारे  के अनुसार  सभी  मुसलमानों  को  पाकिस्तान  और  हिन्दुओं  को   भारत  चले  जाना  चाहिए  था  . लेकिन  जब  ऐसा  हो रहा  था  तभी पाकिस्तानी  मुसलमानों  ने  हिन्दुओं  और सिखों  पर  हमले शुरू  कर  दिए  , यही नहीं  उनकी  औरतों  पर  बलात्कार भी  करने  लगे  . जब  ऐसी  ख़बरें  नेहरू  को मिलीं   तो उसे अपनी  कुर्सी खतरे में   दिखाई  देने  लगी  , क्योंकि  लोग नेहरू को इसका जिम्मेदार   मानं  रहे  थे  . तब  नेहरू ने  लोगों  का  ध्यान  हटाने  के लिए एक  चाल  चली  , और  2 अप्रेल 1950  को पाकिस्तान  के प्रधानमंत्री  लियाकत  खान  को दिल्ली  बुलाकर उपाय  पूछा   यह  बातचीत  8 अप्रेल 1950 तक  यानि  6  दिनों  तक  चली  . 
लियाकत  खान  ने नेहरू  को समझाया  कि  भविष्य  में  जब  भी  भारत  में दंगे  हो  , भारत पाकिस्तान को जिम्मेदार  बताएगा  . और  यदि  पाकिस्तान  में दंगे  हों  तो  वह उसमे  भारत का हाथ  बताएगा  . इस तरह  से  मामला  ठंडा  पड़ जायेगा  . और  लोग  भूल  जायेंगे  .

 इतिहास  में इस  गुप्त  समझौते  को " Liaquat-Nehru Pact.  "     कहा  जाता  है  .  और  आज भी  कांग्रेस  इसी नीति  का  पालन  कर  रही  . और  इसी  समझौते  के कारण हमेशा मुस्लिम  आतंक वादियों  पर  नरमी  का व्यवहार  करती  है  . 

10-हिन्दू  सेकुलर विचार  करें  

  हमारा  इस लेख के सभी  पाठकों , ख़ास कर  उन  लोगों  से  अनुरोध   है जो  हिन्दू  होने  की  जगह  खुद को  सेकुलर कहलाने पर गर्व  महसूस  करते हैं  , वह  लेख  में दिए  गए  प्रमाणों  और  तथ्यों  पर  विचार  करके  इन बातों   को  जरूर   समझ  लें  , कि
1.मुसलमान  प्रजातंत्र  नहीं  इस्लामी  हुकूमत   चाहते  हैं  .2. इनका  सेकुलरिज्म  और  भाई चारा   केवल  पाखण्ड  है  ,  इनके दिलों  में  हिन्दुओं  के प्रति  नफ़रत  भरी  हुई  है ,जो अक्सर  प्रकट  होती  रहती  है  .3. देश की  आजादी  में  मुसलमानों  का योगदान  नगण्य  है  , देश के लिए  केवल  तीन  मुसलमान  शहीद  हुए थे  . जबकि  मुसलमानों  ने  लाखों  हिन्दुओं  को  क़त्ल  किया  था   . इसलिए  मुसलमानों  के लिए  अधिकारों   का  कोई  औचित्य  नहीं   है  . 4. देश के  बटवारे  का जिम्मेदार  जिन्नाह  से अधिक  नेहरू  और  उसका  बाप  मोतीलाल  था  5.भारत में  होने  वाले  दंगे और  आतंकवाद के पीछे  नेहरू - लियाकत  पेक्ट  है  , कांग्रेस  आज भी  उसी  का  पालन   कर  रही   है 6.गांधी को  महात्मा  कहना  गलत  है  , वह  हिन्दुओं  का  कट्टर  शत्रु  था  , जैसे  सभी कंग्रेसी  और  नेहरू - गांधी  परिवार  के लोग  हैं  . 7.मुसलमानों  ने  पाकिस्तान  के  रूप   में  सन 1947  में ही   अपना  अधिकार  ले  लिया  था  .  अब  केवल  अल्प संख्या  होने के आधार पर कोई  अधिकार देने का   कोई    औचित्य    नही    है  . याद रखिये  मुसलमान   अल्पसंख्या   के  आधार   पर  तब तक  अधिकार    मांगते  रहेंगे   जब तक  उनकी  संख्या   हिन्दुओं  से आधी  बनी  रहेगी  , और   जिस दिन  मुसलमानों  की  संख्या   हिन्दुओं  की संख्या से  आधी  से अधिक  हो  जाएगी   यह  भारत को इस्लामी  देश  बना  देंगे   . और  हिन्दुओं से अधिकार  मांगने की  जगह   हिन्दुओं  के अधिकार छीन  लेंगे  . 

http://en.wikipedia.org/wiki/Category:Pakistan_Movement

3 टिप्‍पणियां:

  1. chutiya ho sale jab puri jankari naho aisi bat likhne se pahle achi tarha se jankari leleni chahiye
    likha to bada trike se hai lekin bat bahu badi jahilon wali khai hai gandu nahi to

    उत्तर देंहटाएं
  2. मौलाना अबुल कलाम आजाद,मौलाना उबैदुल्लाह सिन्धी, हकीम अजमल खान, हसरत मोहनी डा। सैयद महमूद, हुसैन अहमद मदनी, प्रोफेसर मौलवी बरकतुल्लाह, डॉ॰ जाकिर हुसैन, सैफुद्दीन किचलू, वक्कोम अब्दुल खदिर, डॉ॰ मंजूर अब्दुल वहाब, बहादुर शाह जफर, हकीम नुसरत हुसैन, खान अब्दुल गफ्फार खान, अब्दुल समद खान अचकजई, शाहनवाज कर्नल डॉ॰ एम॰ ए॰ अन्सरी, रफी अहमद किदवई, फखरुद्दीन अली अहमद, अंसार हर्वानी, तक शेरवानी, नवाब विक़रुल मुल्क, नवाब मोह्सिनुल मुल्क, मुस्त्सफा हुसैन, वीएम उबैदुल्लाह, एसआर रहीम, बदरुद्दीन तैयबजी , हसन इमाम और मौलवी अब्दुल हमीद

    उत्तर देंहटाएं