मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

धर्म और मजहब में क्या अंतर है?

 प्राय:अपने आपको प्रगतिशील ,सेकुलर , कहने वाले लोग धर्म और मज़हब को एक ही समझते हैं. आज संसार में जितनी भी अशांति, हत्या,अत्याचार, आतंकवाद, अन्धविश्वास, दरिद्रता, अत्याचार आदि जो भी कुछ हो रहा हैं उसका मूल कारण धर्म के नाम पर सम्प्रदाय, मज़हब या मत-मतान्तर को पोषित करना हैं .इसलिए  हम  सभी  को  धर्म  और  मजहब   का अंतर   ठीक  से  समझने   की  जरुरत   है
मज़हब अथवा मत-मतान्तर अथवा पंथ के अनेक अर्थ हैं जैसे वह रास्ता जी स्वर्ग और ईश्वर प्राप्ति का हैं और जोकि मज़हब के प्रवर्तक ने बताया हैं। अनेक जगहों पर ईमान अर्थात विश्वास के अर्थों में भी आता हैं।

1. धर्म और मज़हब समान अर्थ नहीं हैं और न ही धर्म ईमान या विश्वास का प्राय: हैं।

2. धर्म क्रियात्मक वस्तु हैं ,अर्थात  धर्म सत्कर्मों  पर  जोर  देता  है
मज़हब विश्वासात्मक वस्तु हैं .अर्थात मजहब   सिर्फ  ईमान  लाने पर  ही  जोर  देता  है

3. धर्म मनुष्य के स्वाभाव के अनुकूल अथवा मानवी प्रकृति का होने के कारण स्वाभाविक हैं और उसका आधार ईश्वरीय अथवा सृष्टि नियम हैं।
 मज़हब मनुष्य कृत होने से अप्राकृतिक अथवा अस्वाभाविक हैं। मज़हबों का अनेक व भिन्न भिन्न होना तथा परस्पर विरोधी होना उनके मनुष्य कृत अथवा बनावती होने का प्रमाण हैं।

4. धर्म के जो लक्षण मनु महाराज ने बतलाये हैं वह सभी मानव जाति के लिए एक समान है और कोई भी सभ्य मनुष्य उसका विरोधी नहीं हो सकता।
मज़हब अनेक हैं और केवल उसी मज़हब को मानने वालों द्वारा ही स्वीकार होते हैं। इसलिए वह सार्वजानिक और सार्वभौमिक नहीं हैं। कुछ बातें सभी मजहबों में धर्म के अंश के रूप में हैं इसलिए उन मजहबों का कुछ मान बना हुआ हैं।

5. धर्म सदाचार रूप हैं अत: धर्मात्मा होने के लिये सदाचारी होना अनिवार्य हैं। परन्तु मज़हबी अथवा पंथी होने के लिए सदाचारी होना अनिवार्य नहीं हैं। अर्थात जिस तरह तरह धर्म के साथ सदाचार का नित्य सम्बन्ध हैं
मजहब के साथ सदाचार का कोई सम्बन्ध नहीं हैं। क्यूंकि किसी भी मज़हब का अनुनायी न होने पर भी कोई भी व्यक्ति धर्मात्मा (सदाचारी) बन सकता हैं .जैसे आचार सम्पन्न होने पर भी कोई भी मनुष्य उस वक्त तक मज़हबी अथवा पन्थाई नहीं बन सकता जब तक उस मज़हब के मंतव्यों पर ईमान अथवा विश्वास नहीं लाता। जैसे की कोई कितना ही सच्चा ईश्वर उपासक और उच्च कोटि का सदाचारी क्यूँ न हो वह जब तक हज़रात ईसा और बाइबिल अथवा हजरत मोहम्मद और कुरान शरीफ पर ईमान नहीं लाता तब तक ईसाई अथवा मुस्लमान नहीं बन सकता।

6. धर्म ही मनुष्य को मनुष्य बनाता हैं अथवा धर्म अर्थात धार्मिक गुणों और कर्मों के धारण करने से ही मनुष्य मनुष्यत्व को प्राप्त करके मनुष्य कहलाने का अधिकारी बनता हैं। दूसरे शब्दों में धर्म और मनुष्यत्व पर्याय हैं। क्यूंकि धर्म को धारण करना ही मनुष्यत्व हैं। कहा भी गया है- खाना,पीना,सोना,संतान उत्पन्न करना जैसे कर्म मनुष्यों और पशुयों के एक समान हैं। केवल धर्म ही मनुष्यों में विशेष हैं जोकि मनुष्य को मनुष्य बनाता हैं। धर्म से हीन मनुष्य पशु के समान हैं.

मज़हब मनुष्य को केवल पन्थाई या मज़हबी और अन्धविश्वासी बनाता हैं। दूसरे शब्दों में मज़हब अथवा पंथ पर ईमान लेन से मनुष्य उस मज़हब का अनुनायी अथवा ईसाई अथवा मुस्लमान बनता हैं नाकि  सदाचारी या धर्मात्मा बनता हैं।

7. धर्म मनुष्य को ईश्वर से सीधा सम्बन्ध जोड़ता हैं और मोक्ष प्राप्ति निमित धर्मात्मा अथवा सदाचारी बनना अनिवार्य बतलाता हैं .

मज़हब मुक्ति के लिए व्यक्ति को पन्थाई अथवा मज़हबी बनना अनिवार्य बतलाता हैं। और मुक्ति के लिए सदाचार से ज्यादा आवश्यक उस मज़हब की मान्यताओं का पालन बतलाता हैं.जैसे अल्लाह और मुहम्मद साहिब को उनके अंतिम पैगम्बर मानने वाले जन्नत जायेगे चाहे वे कितने भी व्यभिचारी अथवा पापी हो जबकि गैर मुसलमान चाहे कितना भी धर्मात्मा अथवा सदाचारी क्यूँ न हो वह दोज़ख अर्थात नर्क की आग में अवश्य जलेगा क्यूंकि वह कुरान के ईश्वर अल्लाह और रसूल पर अपना विश्वासनहीं लाया हैं।

8. धर्म में बाहर के चिन्हों का कोई स्थान नहीं हैं क्यूंकि धर्म लिंगात्मक नहीं हैं -न लिंगम धर्मकारणं अर्थात लिंग (बाहरी चिन्ह) धर्म का कारण नहीं हैं.
मज़हब के लिए बाहरी चिन्हों का रखना अनिवार्य हैं जैसे एक मुस्लमान के लिए जालीदार टोपी और दाड़ी रखना , लिंग की  खतना अनिवार्य हैं .

9. धर्म मनुष्य को पुरुषार्थी बनाता हैं क्यूंकि वह ज्ञानपूर्वक सत्य आचरण से ही अभ्युदय और मोक्ष प्राप्ति की शिक्षा देता हैं परन्तु मज़हब मनुष्य को आलस्य का पाठ सिखाता हैं क्यूंकि मज़हब के मंतव्यों मात्र को मानने भर से ही मुक्ति का होना उसमें सिखाया जाता हैं।

10. धर्म मनुष्य को ईश्वर से सीधा सम्बन्ध जोड़कर मनुष्य को स्वतंत्र और आत्म स्वालंबी बनाता हैं क्यूंकि वह ईश्वर और मनुष्य के बीच में किसभी मध्यस्थ या एजेंट की आवश्यकता नहीं बताता .

मज़हब मनुष्य को परतंत्र और दूसरों पर आश्रित बनाता हैं क्यूंकि वह मज़हब के प्रवर्तक की सिफारिश के बिना मुक्ति का मिलना नहीं मानता.जैसे  ईसा   और मुहम्मद  पर ईमान  लाये  बिना  कोई  सच्चा  ईसाई  और  मुसलमान     नहीं   माना जाएगा .

11. धर्म दूसरों के हितों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति तक देना सिखाता हैं जबकि

मज़हब अपने हित के लिए अन्य मनुष्यों और पशुयों की प्राण हरने के लिए हिंसा रुपी क़ुरबानी का सन्देश देता हैं .और  जिहाद के  बहाने निर्दोषों  की  हत्या  को धार्मिक  कर्तव्य    मानता  है   .

12. धर्म मनुष्य को सभी प्राणी मात्र से प्रेम करना सिखाता हैं .और   सात्विक  निरामिष   भोजन  करने   की  शिक्षा  देता   है

 मज़हब मनुष्य को प्राणियों का माँसाहार और दूसरे मज़हब वालों से द्वेष सिखाता हैं.

13. धर्म मनुष्य जाति को मनुष्यत्व के नाते से एक प्रकार के सार्वजानिक आचारों और विचारों द्वारा एक केंद्र पर केन्द्रित करके भेदभाव और विरोध को मिटाता हैं तथा एकता का पाठ पढ़ाता हैं .

मज़हब अपने भिन्न भिन्न मंतव्यों और कर्तव्यों के कारण अपने पृथक पृथक जत्थे बनाकर भेदभाव और विरोध को बढ़ाते और एकता को मिटाते हैं.और   लोगों  को  बलपूर्वक   अपने  विचार  थोपने  पर  विश्वास  रखता  है   , और  नहीं  मानने  वालों  की  हत्या   करना  उचित  मानता  है .

14. धर्म एक मात्र ईश्वर की पूजा बतलाता हैं .

 मज़हब ईश्वर से भिन्न मत प्रवर्तक/गुरु/मनुष्य.रसूल , फरिश्ते ,आदि की पूजा बतलाकर अन्धविश्वास फैलाते हैं .

  धर्म और मज़हब के अंतर को ठीक प्रकार से समझ लेने पर मनुष्य अपने चिंतन मनन से आसानी से यह स्वीकार करके के श्रेष्ठ कल्याणकारी कार्यों को करने में पुरुषार्थ करना धर्म कहलाता हैं इसलिए उसके पालन में सभी का कल्याण हैं .हमें    विश्वास है  कि     धर्म  और  मजहब  का  अंतर  समझ   कर  लोग  ईसाइयत  और  इस्लाम    को  धर्म  समझने  की  भूल  नहीं  करेंगे   , और  ढोंगी  पाखंडी   बाबाओं   गुरुओं   के  चलाये  पन्थो    , सम्प्रदायों   को   धर्म  नहीं   मानेंगे

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

मुसलमानों को हिन्दू बनाना इस्लामी कार्य है

सारी  दुनिया   जान   चुकी   है   कि मुसलमान  गैर मुस्लिमों   का  धर्म  परिवर्तन  करा कर  सारी   दुनिया  पर   इस्लामी हुकूमत  कायम  करना   चाहते हैं  . और अपने   इस नापाक   मंसूबे   को  कामयाब   करने के लिए मुसलमान   पहले तो  इस्लाम  की  तारीफें   करते है  , और  दूसरों  के  धर्म  में कमियां    निकालते  रहते   है  , लेकिन  जब  उनके  झांसे   ने  नहीं  फसते  और इस्लाम  कबूल  नहीं  करते तो  मुसलमान् अपना  असली  खूंखार   और अत्याचारी    स्वभाव   दिखाने   लगते हैं  , और   गैर मुस्लिमों   का  धर्म  परिवर्तन  कराने के लिए  हत्या  ,  बलात्कार  ,   आतंक जैसे  जघन्य  कुकर्म  करने  लगते  हैं   , और  जब  इन इस्लाम   के दलालों  से   पूछ जाता   है  क़ि  तुन  लोगों  का जबरन  धर्म  परिवर्तन   करा   कर  मुसलमान   क्यों   बनाते  हो ?तो   यह  धूर्त  कहते हैं  कि " दुनिया  में पैदा  होने वाला  हरेक  बच्चा  मुसलमान   ही  होता  है  .  लेकिन   आप  लोग  ही  उसे  हिन्दू   ,  बौद्ध  ,जैन   या  सिख   बना   देते    हो  . जो  अल्लाह   की   मर्जी  के  खिलाफ  है   . हम तो  लोगों  को उनके  पैदायशी  धर्म  यानि  इस्लाम  में शामिल  करके अल्लाह  के  हुक्म   का  पालन  कर  रहे   हैं  . ,यही   बात जाकिर  नायक   जैसे इस्लामी  प्रचारक  ने  कही  है ,
देखिये विडिओ -Dr Zakir Naik - Every Child is born as a Muslim

https://www.youtube.com/watch?v=zLLsqYdRlk0

1-हदीस  के  अर्थ  में  चालाकी

इस्लाम   के  एजेंट   धूर्त मुल्ले हमेशा   दावा  करते  रहते हैं  कि  दुनिया   में  जो  भी  बच्चा  पैदा  होता   है  , अल्लाह   उसे  मुसलमान बना कर   ही  पीड़ा करता है  , ताकि   वह   बालक  सिर्फ  अल्लाह  की इबादत    किया  करे  , परन्तु माता   पिता   बच्चे  को यहूदी   ,ईसाई  या  अग्नि  पूजक     बना   देते   हैं  . मुल्ले  इस  बात   को  साबित   करने के लिए  इस   हदीस   का  हवाला   देते  हैं .और   बड़ी   चालाकी  से  इस  हदीस   का  यह  अर्थ     बताते   हैं  ,
"अबु हुरैरा  ने  कहा  कि  रसूल  ने  कहा   , हरेक  बच्चा सच्चे  धर्म   के साथ  पैदा   होता  है  , )अर्थात  केवल  अल्लाह की  ही इबादत  करना )लेकिन  अभिभावक  उसका  धर्म  परिवर्तन   करके यहूदी  , ईसाई   या  अग्नि  पूजक   बना  देते   हैं

Abu Huraira, narrated that the Prophet . said, "Every child is born with a true faith (i.e. to worship none but Allah Alone) but his parents convert him to Judaism or to Christianity or to Magainism,

"‏"‏ مَا مِنْ مَوْلُودٍ إِلاَّ يُولَدُ عَلَى الْفِطْرَةِ، فَأَبَوَاهُ يُهَوِّدَانِهِ أَوْ يُنَصِّرَانِهِ أَوْ يُمَجِّسَانِهِ،

सही   बुखारी  -जिल्द2 किताब 23  हदीस 467

2-पूरी हदीस और  असली  अर्थ
यहाँ  पर  अरबी  में पूरी  हदीस  दी  जा  रही   है  , इसमे  इस्लाम  या सच्चा  धर्म (a true religion  )  शब्द  नहीं  है  . बल्कि    फितरत  शब्द  दिया  गया   है  . मुसलमान  लोगों  को  धोखा  देने के लिए  इसका  अर्थ  इस्लाम  बता   देते  हैं  .

Here is the text of the Hadeeth, see if you can find the  word Islam in it anywhere. Its not in the Hadeeth '



حَدَّثَنَا عَبْدَانُ، أَخْبَرَنَا عَبْدُ اللَّهِ، أَخْبَرَنَا يُونُسُ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، أَخْبَرَنِي أَبُو سَلَمَةَ بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، أَنَّ أَبَا هُرَيْرَةَ ـ رضى الله عنه ـ قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ مَا مِنْ مَوْلُودٍ إِلاَّ يُولَدُ عَلَى الْفِطْرَةِ، فَأَبَوَاهُ يُهَوِّدَانِهِ أَوْ يُنَصِّرَانِهِ أَوْ يُمَجِّسَانِهِ، كَمَا تُنْتَجُ الْبَهِيمَةُ بَهِيمَةً جَمْعَاءَ، هَلْ تُحِسُّونَ فِيهَا مِنْ جَدْعَاءَ ‏"‏‏.‏ ثُمَّ يَقُولُ أَبُو هُرَيْرَةَ ـ رضى الله عنه ‏{‏فِطْرَةَ اللَّهِ الَّتِي فَطَرَ النَّاسَ عَلَيْهَا لاَ تَبْدِيلَ لِخَلْقِ اللَّهِ ذَلِكَ الدِّينُ الْقَيِّمُ‏}

पहले  दी  गयी   हदीस  का  मूल  अरबी  पाठ     इस प्रकार   है  ,इसमे  सच्चे  धर्म  (  इस्लाम  )  का    कहीं  भी  उल्लेख   नहीं  है  , बल्कि " अल  फितरत -  الْفِطْرَةِ"  शब्द    दिया  गया   है  . मुल्लों   ने  बड़ी  मक्कारी  से  इस शब्द   का  अर्थ "  सच्चा  धर्म (  )   का  मतलब इस्लाम      बना  दिया   है .इस   हदीस  में  अरबी    का  शब्द " फितरत  -  الْفِطْرَةِ   "   आया   है   ,  जिसका   अर्थ ( सच्चा  धर्म  ( a true faith   )      होता   है  .  लेकिन  मक्कार मुल्ले  लोगों  कीआँखों   में धूल   डाल  कर  इसका     तात्पर्य   इस्लाम बता देते   है  . और    कहते हैं  की  अल्लाह  हर   बच्चे   को  मुसलमान   के रूप में  पैदा  करता   है , इसलिए किसी  गैर   मुस्लिम  को जबरन , प्रलोभन  देकर  ,  या   छल   कर  मुस्लमान   बनाने में   कोई अपराध   नहीं  है   .


3-फितरत   क्या  है ?
 हदीस  में प्रयुक्त  अरबी  शब्द " फितरत - فطرة"   का  अर्थ   लोगों  को  धोखा  देने के लिए  जाकिर  नायक  जैसे  चालाक मुल्ले   इस्लाम  बता देते हैं।  लेकिन  वास्तव  में   अरबी   शब्दकोश  में फितरत  के कई   अर्थ  मिल  जाते  हैं  . उन में से कुछ  के  अंगरेजी  और  हिंदी  अर्थ  इस  प्रकार  हैं  ,
1-सलाह -صلاح "-righteousness-नीतिपरायणता

2-बिदानियाः -   بدائية "-Eternal-सनातन

3-अल तबीयतुल    बशरियाः  अन्नफियाह --الطبيعة البشرية النقية "-pure human nature-शुद्ध मानव प्रकृति

4-इजलाल -إجلال"-solemnity-संस्कारयुक्तता

यहां  पर  फितरत  शब्द  के  जितने  भी  अर्थ  दिए गएँ  है  ,  उन्हें  ध्यान   से  पढने से    स्पष्ट  होता  है  , फितरत के  जितने भी  अर्थ  है  वह सनातन  प्राचीन  वैदिक धर्म   में   मौजूद   हैं  .  इस्लाम   में  नहीं  . इसका  मतलब  है  कि पैदा होने  वाला  हरेक  बच्चा  हिन्दू  होता  है।   मुसलमान   नहीं !

4-फितरत का  परिवर्तन नहीं  हो   सकता

यह   बात  सिद्ध  हो  चुकी  है  कि हरेक  बच्चा  जन्म  से  हिन्दू  होता   है  और   कुरान  में  कहा  गया  है  ,

" अल्लाह  ने जो भी  बनाया  बढ़िया    बनाया  " सूरा -अस  सजदा32:7

"who made all things good "32:7.और  अल्लाह  की  रचना    में   परिवर्तन  नहीं   हो  सकता


"अबू  हुरैरा  ने  कहा  कि रसूल   ने  कहा  है  ,कि कोई   भी  बच्चा    फितरत  के बिना  पैदा  नहीं होता  "फिर  रसूल  बताने लगे कि अल्लाह  ने जिस फितरत    के  अनुसार  मनुष्य  को  बनाया   है  , उसमे   परिवर्तन    नहीं   हो   सकता  . यही   सच्चा  धर्म  है "

Abu Huraira reported Allah's Messenger  ,saying:
No child is born but upon Fitra. He then said. Recite: The nature made by Allah in which He created man, there is no altering of Allah's nature; that is the right religion.

"‏"‏ مَا مِنْ مَوْلُودٍ إِلاَّ يُولَدُ عَلَى الْفِطْرَةِ ‏"‏ ‏.‏ ثُمَّ يَقُولُ اقْرَءُوا

सही  मुस्लिम - किताब 33  हदीस 6425

कुरान   में   साफ   कहा  है  कि  अल्लाह मनुष्य  की   रचना   हर  प्रकार  से बढ़िया   बनायीं   है  , उसमे बदलाव करना मनुष्य की "  फितरत -  " प्राकृतिक  रचना  के   विरुद्ध   है  . अर्थात   अल्लाह   ने  मनुष्य   की  जैसी  फितरत   बनायीं   है  ,उसे  वैसा   ही  रहने  देना  चाहिए  . (e.g-verses in the Qur'an . 32:6-7, 31:20), stating that Allah created humans perfectly)

इसलिए  बच्चों  की  खतना  करना  और  हिन्दुओं  को     मुसलमान  बनाना  अल्लाह  की  बनायीं  फितरत   में परिवर्तन  करना  माना जाएगा।  और   जो भी  मुस्लमान  ऐसा  करेगा  या  करने  का  प्रयास  करेगा   वह  अल्लाह का  विरोधी  और   काफ़िर   है  . लेकिन    मुसलमान  को  हिन्दू  बना  लेने पर अल्लाह खुश  होगा   , क्योंकि  इस  से  अल्लाह  की  बनायी  फितरत में  परिवर्तन  नहीं  होता  .

radical changes to one's body.condemned as unlawful changes to fitra.


इसका मतलब  है  ,जितने अधिक मुसलमानों  को हिन्दू  बनाया  जाएगा।  अल्लाह  उतना  ही खुश  होगा