सोमवार, 20 जुलाई 2015

सात्विक आहार अपनाओ मांसाहार त्यागो !!

बड़े ही  दुःख  की  बात है  कि धार्मिक   ज्ञान   के  अभाव  , और पाश्चात्य संस्कृति  के  प्रभाव   में  आकर  आजकल  के   हिन्दू    युवा वर्ग  में माँसाहारी  भोजन  करने    का  फैशन   हो  गया   है   ,  कुछ  लोग  तो  अण्डों   को  वेजिटेरियन  मानने  लगे   हैं  ,  कुछ  लोग  तो  केवल शौक   के लिए  चिकन , मछली  और  मीट  खाने   लगे   हैं   ,  इसका  दुष्परिणाम  यह  हुआ   कि ऐसे लोग   किसी न किसी   रोग  से ग्रस्त   पाये गए   हैं  ,  आज  ऐसे लोगों  को उचित  मार्गदर्शन   की  जरुरत    है ,

हिन्दू धर्मशास्त्रों मे एकमत से सभी जीवों को ईश्वर का अंश माना है व अहिंसा, दया, प्रेम, क्षमा आदि गुणों को अत्यंत महत्व दिया , मांसाहार को बिल्कुल त्याज्य, दोषपूर्ण, आयु क्षीण करने वाला व पाप योनियों में ले जाने वाला कहा है । महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म पितामह ने मांस खाने वाले, मांस का व्यापार करने वाले व मांस के लिये जीव हत्या करने वाले तीनों को दोषी बताया है । उन्होने कहा हैं कि जो दूसरे के मांस से अपना मांस बढ़ाना चाहता है वह जहा कहीं भी जन्म लेता है चैन से नहीं रह पाता । जो अन्य प्राणियों का मांस खाते है वे दूसरे जन्म में उन्हीं प्राणियों द्वारा भक्षण किये जाते है । जिस प्राणी का वध किया जाता है वह यही कहता है
"मांस भक्षयते यस्माद भक्षयिष्ये तमप्यहमू "अर्थात् आज वह मुझे खाता है तो कभी मैं उसे खाऊँगा ।

श्रीमद् भगवत गीता में भोजन की तीन श्रेणियाँ बताई गई है ।
 (1) सात्त्विक भोजन -जैसे फल, सब्जी, अनाज, दालें, मेवे, दूध, मक्सन इत्यादि जो अग्यु, बुद्धि बल बढ़ाते है व सुख, शांति, दयाभाव, अहिंसा भाव व एकरसता प्रदान करते है व हर प्रकार की अशुद्धियों से शरीर, दिल व मस्तिष्क को बचाते हैं
(2) राजसिक भोजन - अति गर्म, तीखे, कड़वे, खट्टे, मिर्च मसाले आदि जलन उत्पन्न करने वाले, रूखे पदार्थ शामिल है । इस प्रकार का भोजन उत्तेजक होता है व दु :ख, रोग व चिन्ता देने वाला है ।
(3) तामसिक भोजन -जैसे बासी, रसहीन, अर्ध पके,दुर्गन्ध  वाले, सड़े अपवित्र नशीले पदार्थ मांस इत्यादि जो इन्सान को कुसंस्कारों की ओर ले जाने वाले बुद्धि भ्रष्ट करने वाले, रोगों व आलस्य इत्यादि दुर्गुण देने वाले होते हैं ।


वैदिक मत प्रारम्भ से ही अहिंसक और शाकाहारी रहा है, यह देखिए-

य आमं मांसमदन्ति पौरूषेयं च ये क्रवि: !
गर्भान खादन्ति केशवास्तानितो नाशयामसि !! (अथर्ववेद- 8:6:23)

-जो कच्चा माँस खाते हैं, जो मनुष्यों द्वारा पकाया हुआ माँस खाते हैं, जो गर्भ रूप अंडों का सेवन करते हैं, उन के इस दुष्ट व्यसन का नाश करो !

अघ्न्या यजमानस्य पशून्पाहि (यजुर्वेद-1:1)

-हे मनुष्यों ! पशु अघ्न्य हैं – कभी न मारने योग्य, पशुओं की रक्षा करो |

अहिंसा परमो धर्मः सर्वप्राणभृतां वरः। (आदिपर्व- 11:13)

-किसी भी प्राणी को न मारना ही परमधर्म है ।

सुरां मत्स्यान्मधु मांसमासवकृसरौदनम् ।
धूर्तैः प्रवर्तितं ह्येतन्नैतद् वेदेषु कल्पितम् ॥ (शान्तिपर्व- 265:9)

-सुरा, मछली, मद्य, मांस, आसव, कृसरा आदि भोजन, धूर्त प्रवर्तित है जिन्होनें ऐसे अखाद्य को वेदों में कल्पित कर दिया है।

अनुमंता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी ।
संस्कर्त्ता चोपहर्त्ता च खादकश्चेति घातका: ॥ (मनुस्मृति- 5:51)

प्राणी के   मांस    के  लिए वध की  अनुमति  देने  वाला , सहमति  देनेवाला  , मारने  वाला   ,  मांस  का  क्रय  विक्रय  करने  वाला ,पकाने   वाला ,परोसने  वाला   और  खाने  वाला   सभी  घातकी     अर्थात  हत्यारे  हैं

2-सिख  धर्म  में  मांसाहार  का निषेध 

"कबीर  भांग  मछली  सूरा पान  जो जो  प्राणी   खाहिं 

तीरथ  नेम  ब्रत  सब जे  कीते  सभी  रसातल   जाहिं "-– श्री  गुरुग्रन्थ  साहब Ang  137


"जीव    वधहु को  धरम  कर थापहु अधरम कहहु  कत  भाई 
आपन  को मुनिवर  कह थापहु  काको  कहहु  कसाई "-  श्री  गुरुग्रन्थ  साहब  Ang 1103)


वेद  कतेब  कहो   मत झूठे   ,झूठा  जो  न  विचारे - जो   सब  में एक   खुदा   कहु  तो  क्यों  मुरगी  मारे " -श्री  गुरुग्रन्थ  साहब Ang 1350)


शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने गहरी खोज के बाद जो गुरु साहब के निशान तथा हुकम नामें पुस्तक के रूप में छपवाये है उनमें से एक हुक्मनामा यह है ।

पृष्ठ 103-हुक्म नामा  न. 113
हुक्मनामा बाबा बन्दा बहादुर जी,मोहर फारसी

देगो तेगो फतहि नुसरत बेदरिंग
याफत अज नाम गुरु गोविन्द सिंह
 १ ओंकार    फते दरसनु

सिरी सचे साहिब जी दा हुक्म है सरबत खालसा जउनपुर का गुरु रखेगा.. .खालसे दी रहत रहणा भंग तमाकू हफीम पोस्त दारु कोई नाहि खाणा मांस मछली पिआज ना ही खाणा चोरी जारी नारही करणी ।

अर्थात्( मांस, मछली, पिआज, नशीले पदार्थ, शराब इत्यादि क़ीमनाही की गई है । सभी सिख गुरुद्वारों में लंगर में अनिवार्यत : शाकाहार ही बनता है ।


3-ईसाई धर्म  में  मांस  मदिरा  का  निषेध 
ईसाई धर्म    के  धर्मग्रन्थ   बाइबिल   के नए  नियम ( New testament)  में साफ़  शब्दों   में   मांस   खाने  और   शराब  पीने  की  मनाई    की गयी है , क्योंकि  इनके  सेवन करने  वाला  खुद  तो ठोकर  खाता   है    .  और  दूसरों   को भी   सही  धर्म  से  भटका  देता है
It is better not to eat meat or drink wine or to do anything else that will cause your brother or sister to fall.Romans14:21

भला तो यह है, कि तू न मांस खाए, और न दाख रस पीए, न और कुछ ऐसा करे, जिस से तेरा भाई ठोकर खाए

4-बौद्धधर्म में जीवहत्या का निषेध 

किसी   भी  प्राणी   को  मारे  बिना मांस   की  प्राप्ति  नहीं   हो  सकती   , इसलिए   भगवान  बुद्ध    ने हर प्रकार के  जीवों  की  हत्या करने को   पाप  बताया    है    ,  और  कहा   है  ऐसा   करने वाले   कभी     सुख  शांति  प्राप्त   नहीं   करेंगे ,

धम्मपद धम्मपद की गाथा दण्ड्वग्गो’ मे भगवान बुद्ध कहते है :

सब्बे तसन्ति दण्डस्स, सब्बेसं जीवितं पियं।
अत्तानं उपमं कत्वा, न हनेय्य न घातये॥-130
सभी दंड से डरते हैं । सभी को मृत्यु से डर लगता है । अत: सभी को अपने जैसा समझ कर न तो किसी की हत्या करे या हत्या करने के लिये प्रेरित करे ।

सुखकामानि भूतानि, यो दण्डेन विहिंसति।
अत्तनो सुखमेसानो, पेच्‍च सो न लभते सुखं॥-131
जो सुख चाहने वाले प्राणियों को अपने सुख की चाह से , दंड से विहिंसित करता है ( कष्ट पहुँचाता है ) वह मर कर सुख नही पाता है ।

बौद्ध   धर्म   के  " पंचशील ( यानी   पांच  प्रतिज्ञा  )    में   पहली  प्रतिज्ञा   है    ,

" पाणाति  पाता वेरमणी सिक्खा  पदम  समादियामि  "

अर्थात    मैं   किसी  भी  प्राणी  को  नहीं  मारने  की  प्रतिज्ञा   करता  हूँ

5-जैन धर्म   में   प्राणी   हत्या   का   निषेध

जैन   धर्म    में तो    छोटे   बड़े   सभी  प्रकार के   जीवों   को   मारने  की  घोर  वर्जना  की गई    है  
भगवान  महावीर   ने   कहा   है    ,

"सव्वे  जीवा  इच्छन्ति  जीवियुं न मररिस्सयुं -तम्हा   पाणि बहम   घोरं  निग्गन्ठा पब्बजन्ति  च "समण  सुत्त   गाथा   -3 

 अर्थात  -सभी  जीव  जीना  चाहते   है   ,  मारना   कोई     नहीं   चाहता   ,  इसलिए  निर्ग्रन्थ ( जैन )  प्राणी  वध   की   घोर  वर्जना  करते   हैं

6-सूफी  मत   में  अहिंसा  का  आदेश 

यद्यपि अधिकांश   मुस्लिम  मांसाहारी   होते   हैं   , परन्तु इस्लाम  के  सूफी  संत  मौलाना  रूमी   ने  अपनी   मसनवी   में मुसलमानों को  अहिंसा  का  उपदेश   दिया   है  ,    वह  कहते हैं  ,
"मी  आजार मूरी  कि  दाना  कुशस्त  ,  कि  जां  दारद   औ  जां  शीरीं  खुशस्त "
अर्थात  - तुम  चींटी   को  भी  नहीं   मारो ,जो दाना   खाती   है   , क्योंकि  उसमे  भी  जान   है  ,  और  हरेक को  अपनी  जान  प्यारी   होती   है .

इन  सभी   धर्मों  के  ग्रंथों  के वचनों   से  निर्विवाद  रूप   से  यही    बात  सिद्ध   होती   है कि  सदा  स्वस्थ   , निरोगी  और  दीर्घायु   बने   रहने के लिए  हमें    सात्विक   भोजन  अपनाने  की   और  मांसाहार  को  त्यागने  की जरुरत   है   ,  क्योंकि    मांसाहार  के लिए  मूक   निर्दोष  जीवों    की  हत्या  होती   है  ,जो   महापाप   है   ,  दूसरे   मांसाहार   से अनेकों   प्रकार के   रोग   हो   जाते   हैं   , जैसा कि  आजकल   हो रहे   हैं ,

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http://shrut-sugya.blogspot.in/p/jivdaya-vegetarianism.html


Why is there a controversy in the Panth over eating meat?


http://www.sikhanswers.com/rehat-maryada-code-of-conduct/meat-controversy-in-the-panth/



बुधवार, 15 जुलाई 2015

धर्मपरिवर्तन नहीं धर्मपरावर्तन !

इस  ऐतिहासिक  सत्य   से  कोई  भी  इंकार   नहीं   कर  सकता   कि  आज   भारत  खंड में  जितने भी   मुसलमान   हैं ,  उनके  पूर्वज   हिन्दू ही थे।  जिनको   मुस्लिम  बादशाहों   ने जबरन , डरा  धमका  कर   मुसलमान  बना लिया  था  , मुस्लिम  शासकों   ने हिन्दुओं  के सामने सिर्फ दो ही  विलाल्प रक्खे  थे  , मौत   या  इस्लाम  .  इसलिए  अपनी  और  अपने  परिवार  के प्राण  बचाने के लोग  मुसलमान   बन  गए  थे  , वार्ना    जिस  व्यक्ति में  थोड़ी   सी   भी विवेक  बुद्धि     और समझ  होगी   वह  कदापि इस्लाम  कबूल नहीं  करेगा ,क्योंकि   इस्लाम   कुरान  पर  आधारित  है   , जिसकी सभी बाते  परस्पर विरोधी  ,  अवैज्ञानिक  , अमानवीय ,और  मानव मात्र के लिए घातक   हैं  , जिस  तरह   किसी   का  ऑपरेशन  करने के लिए उसे  क्लोरोफार्म  सुंघा कर    बेहोश  कर  दिया   जाता  है  , और  उस  व्यक्ति   की बुद्धि काम  करना  बंद कर देती   है   , इसीतरह केवल वाही लोग  इस्लाम  क़बूल  करते हैं  जिनकी बुद्धि   सुन्न  या   नष्ट    हो  जाती   है  , स्वेच्छा  से  मुसलमान बनने   वाले केवल 1 -5 प्रतिशत  है  . यही   कारण है कि  मुल्ले   मुस्लिम   बच्चों   को   प्राइवेट स्कूलों   की  जगह  मदरसों  में  पढाने  पर  जोर  देते   हैं  . जहाँ  सिर्फ  कुरान  और  हदीसें  ही  पढाई  जाती  हैं   , मुसलमानों  को   डर  लगा रहता  है  कि अगर  उनके  लडके  सरकारी  या  निजी  स्कूलों  में  पढ़ेंगे तो समझदार  हो  जायेंगे   , और तुरंत ही इस्लाम   छोड़ देंगे  , मुहम्मद को भी  यही  डर  लगा  रहता था  कि कहीं   उनकी  कुरान  ,  अल्लाह  और  रसूलियत   की  पोल  न  खुल   जाये  ,  और  लोग   इस्लाम    छोड़ कर  ईसाई   या  यहूदी  न  बन  जाएँ  . इसलिए  मुहम्मद  साहब  ने  एक   तरकीब  निकाली  ,
1-लिंग  का खतना करवाना 
मुहम्मद  साहब    बहुत  ही  चालाक   व्यक्ति   थे  , उन्होंने  मुसलमानों  को  हुक्म   दिया कि  वह  अपने  लड़कों   का  बचपन   में ही  खतना करा   दिया  करें ,.  जब   वह  बिलकुल  नादान   और  अबोध    हों  . खतना    एक  शल्य  क्रिया   होती   है  ,जिसमे   शिश्न (  के ऊपर  की चमड़ी  ( prepuce )  पूरी   तरह     से  काट कर  अलग   कर   दी   जाती   है  . यद्यपि  कुरान   में  खतना    का   कोई आदेश   नहीं  है  , फिर   भी  मुहम्मद    ने  अपनी  मर्जी  से  इसे  अनिवार्य    बना  दिया   . इसके   पीछे   दो  कारण  हैं पहिला,  जब  बच्चे  की   खतना     की    जाती  है वह  उसका   विरोध   नहीं  कर  पाता , मुहम्मद  को  डर  था  कि  यदि   वयस्क   की  खतना   कराएंगगे तो  वह अपना   लिंग   कभी    नहीं  कटायेगा  .  दूसरा   कारण  है कि मुहम्मद  ने  पता  किया था  कि  लिंग की  चमड़ी  काट देने से उसे   प्लास्टिक  सर्जरी ( Plastic surgery)     से  फिर   से   नहीं  जोड़ा    जा   सकता   है   ,(  चित्र  देखिये  )

http://ehealthwall.com/wp-content/uploads/2012/03/Balanoposthitis-images.jpg

 जैसे   नाक  , कान   जैसे  अंग  प्लास्टिक  सर्जरी  से  जोड़े   जा  सकते   हैं   . मुहम्मद  यही   चाहते थे कि जो भी  इस्लाम  के  अंधे  कुएं   में  गिर   जाये   वह  बाहर  नहीं   निकल   पाये   ,  मुहम्मद  की   इस  चालाकी    के फलस्वरूप   कटा  हुआ  लिंग ही  मुसलमान  होने   की    पहचान     हो   गयी  , इसीलिए   लोग   मुसलमानों   को " कटुए "  कहते   हैं   , और  बाला साहब ठाकरे " लांड़िए  "     कहते थे  . मुसलमानों   के  अनुसार    लिंग  कटाने  से  अल्लाह  खुश  होता   है   , यह   मूर्खता  की   बात   है  , श्री  गुरु  गोविन्द   जी ने   लिखा  है   ,

" साँच  कहूँ  सुन   ले  चित   दै , ईश   न   भीजत   लांड  कटाये   "

इसलिए   यदि जिन   को  डरा   धमका  कर   या  उनकी  अबोधता   का    फायदा  उठा   कर  मुसलमान  बना  दिया गया हो  .  उनको  इस्लाम   के  अंधकार   से  निकाल  कर  वापस    हिन्दू  धर्म  के  प्रकाश   में  लाना  " धर्मपरिवर्तन  " नहीं   बल्कि " धर्मपरावर्तन  "  कहना   चाहिए।  . और जो  लोग   आरोप  लगा  रहे   हैं   कि ऐसे   मुसलमानों   को  प्रलोभन   देकर  हिन्दू  बनाया    गया    है  , तो  उन  लोगों   को  पता  होना  चाहिए कि पथभ्रष्ट  लोगों  को प्रलोभन  देकर  समाज   की  मुख्य  धारा  में  शामिल   करा   लेना  कोई   अपराध    नाहीं   है  . उदाहरण    के लिए खुद  सरकार ने नक्सलीओं  और  डाकुओं  को  प्रलोभन   दे कर  ही  समाज  की  मुख्य धारा में   शामिल   करा   लिया   था   .  जैसे ,
2-नक्सलियों   को   प्रलोभन  
भारत  सरकार  की प्रेस  सूचना  ब्यूरो   के  अनुसार सन 2009   से  2010 तक जिन  244  नक्सली  आतंकियों  ने आतंकवाद  छोड़ कर  सामान्य   व्यक्ति  की तरह  समाज   की   मुख्य  धारा   में   शामिल  होने  की  इच्छा  प्रकट   की  थी  , सरकार   ने ऐसे  प्रत्येक   नक्सली  को   1. 5 लाख    रूपया  देने   और हर  महीने  तीन साल  तक  2000   रुपैया  देने  का   प्रलोभन   दिया   था  . इसके  बाद ही  नक्सलियों  ने  अपने  हथियार   डाले थे। इसमे   सरकार ने  कुल 233. 12  करोड़   रुपये   खर्च   किये  थे  

2-डाकुओं   को  प्रलोभन 
इसी   तरह  सरकार   ने दुर्दांत डाकुओं   के  पुनर्वास  के  लिए उनको  प्रलोभन   दिया  था  . टाइम्स ऑफ़  इंडिया  दिनांक  3  दिसंबर 2001  के  अनुसार जब   दक्षिण   के  24 परगना   भांगर  नामकी    जगह   के  करीब  20  डाकुओं    ने  सरकार   के  समक्ष  समर्पण  करना  चाहा    तो  सरकार  ने उनको   पांच  लाख   रूपया  देने   का   लालच   दिया   था  . इनमे   मुख्य  डकैतों   के   नाम   ' शौकत अली  मुल्ला  ,जाकिर  हुसैन  ,और   नजरुल   इस्लाम  हैं  , जो  आदतन   हत्यारे   और  डाकू  थे   .


जैसे  माता  पिता बच्चों   को  प्रलोभन देकर   ध्यान   से  पढने    को  कहते हैं   , और  सरकार  भी  प्रलोभन  देकर  नक्सलियों  और डाकुओं   को  बुरे काम  और  गलत  रास्ता    छूटा   कर   सही  रास्ता  पर  लेजाती  है  . उसी  तरह  जो  लोग  किसी  कारण  से इस्लाम   के गलत  रस्ते  पर  चले  गए  थे ,उन्हें  यदि  प्रलोभन   दे कर भी मुसलमान  से  इंसान  बना  लेने में  कौन  सी  बुराई   है  . क्योंकि  यदि  वह  हिन्दू  नहीं  बनते  तो  जिहादी बन  जाते  .

No.228

http://timesofindia.indiatimes.com/city/kolkata/Shadow-of-doubt-over-dacoit-rehabilitation/articleshow/75576894

मंगलवार, 7 जुलाई 2015

मुस्लिम पर्सनल बोर्ड जवाब दे ?

दुर्भाग्य की   बात  है  कि  सैकड़ों   साल  तक  मुसलमानों    की  गुलामी   में  रह  कर  ,,  आजादी के  बाद  कांग्रेसी   अन्न  खाकर और  सेकुलर  शिक्षा  के कारण  हिन्दू  और   हिन्दू  संगठन   इस  बात   को  स्वीकार   करने    से   डरते  हैं  ,कि   हर  मुसलमान    में   हिन्दू  धर्म   ,   संस्कृति   , और  हिन्दुओं  की  आस्था   के प्रति   नफ़रत   कूट  कूट   कर  भरी   है  .,यद्यपि  मुसलमान    हिन्दुओं   को  धोखा  देने के लिए   सेकुलररिज्म  की वकालत  करते   रहते  हैं .  लेकिन   जब   भी  उनको  मौका   मिलता   है   किसी   न  किसी   बहाने हिन्दू  आस्था  और    धर्म  के खिलाफ  खड़े   हो   जाते   है   . सामान्य  नागरिक  संहिता  ,  वन्दे  मातरम  .   गौहत्या प्रतिबन्ध     जैसे  विषय   इसके  उदहारण    है   ,  ताजा  उदहारण  "   योग  " है   .  ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने राजग सरकार पर धर्मनिरपेक्ष भारत के संविधान का उल्लंघन करने और योग तथा सूर्य नमस्कार जैसी चीजें शुरू करके आरएसएस के एजेंडा को लागू करने का आरोप कि योग और सूर्य नमस्कार हिंदू धर्म की धार्मिक गतिविधियां हैं और यह ‘‘मुसलमानों की विचारधारा के खिलाफ लगाते हुए करारा हमला किया और मुस्लिम समुदाय के सदस्यों से ‘चौकन्ना’ रहने को कहा।बोर्ड के कार्यकारी महासचिव मौलाना वली रहमानी ने लिखा है। रहमानी ने कहा कि इसके खिलाफ आंदोलन चलाने की जरूरत है और इस मसले पर तमाम मस्जिदों में जुमे की नमाज से पहले चर्चा होनी चाहिए।बोर्ड   ने  एक  प्रेस  नोट   जारी  किया   जिसमे  कहा  है  ,कि मुसलमानों को चौकन्ना रहना चाहिए क्योंकि ऐसे संगठन हैं जो इस्लामी मान्यताओं पर हमला कर रहे हैं। उन्होंने मौलवियों से कहा कि वह शुक्रवार की नमाज के वक्त इन मुद्दों पर बात करें और मुस्लिम समुदाय को आंदोलन के लिए तैयार करें।यह  पत्र  उर्दू   में   है   ,  जिसका शीर्षक   है
,बिरहमानि  धर्म वैदिक कल्चर से  अकीदेये तौहीद का   बराह  रास्त टकराव   है

यह  पत्र  दिनांक  16/06/2015 को  जारी  हुआ  था .पत्र में कहा गया है,मुसलमानों को यह याद रखना चाहिए कि देश में ऐसे लोग हैं जो उनके हुकूक छीन लेना चाहते हैं।

http://aimplboard.in/press-release.php

मुस्लिम  पर्सनल  लॉ बोर्ड  ( AIMPLB )    के इस  पत्र  से   साफ  पता  चलता  है  कि  मुसलमान  योग    के  बहाने   हिन्दुओं   से  टकराने   की  योजना  बना  रहे  हैं  , क्योंकि   योग  वैदिक  संस्कृति   की  देन  है , किसका विरोध  करना मुसलमान अपना  फर्ज   मानते हैं। हम  उन  सभी   मुसलमानों  और  खासतौर  से  मुस्लिम  बोर्ड  के  उन लोगों से  पूछना  चाहते   हैं   ,जो  वैदिक   संस्कृति   से   सम्बंधित  हरेक  बात का विरोध   करते   हैं   ,  बताएं  क्या  उनमे इन 6  विषयों  का  विरोध   करने  की  हिम्मत   है  ?याद रखिये  कि पहली  पांच  चीजों   का  अविष्कार  भारतके  विद्वानों   ने  किया  जिनका  उपयोग   सभी    कर  रहे  हैं   , योग की  तरह इनका  धर्म  से कोई सम्बन्ध   नहीं   है   ,


1-स्थानीय  मानप्रणाली और शून्य 


आर्यभट (476-550) प्राचीन भारत के एक महान ज्योतिषविद् और गणितज्ञ थे। इन्होंने आर्यभटीय ग्रंथ की रचना की जिसमें ज्योतिषशास्त्र के अनेक सिद्धांतों का प्रतिपादन है,इसमे इसमे स्थानीय  मानप्रणाली और शून्य (Place value system and zero)का   वर्णन    है   ,  इसे  अरबी  में "निजामुल  कीमत अल   मकानियः वल सिफर  - نظام القيمة المكانية وصفر   " कहते   हैं ,सन 786  में  खलीफा "अबू  जफ़र  अब्दुल्लाह  मामुन -   ابوجعفر عبدالله مامون‎ "के समय ईरानी गणतिज्ञ ख्वारज़मी  ने संस्कृत   ग्रंथों  का अरबी  अनुवाद  किया  ,  और  अरब    के लोगों  को   शून्य  और  गिनती  का  सही तरीका  सिखाया ,  यह  भी  वैदिक     संस्कृति  की   देन  है  , आज  भी  मुसलमान  कुरान  की  सूरा  और  आयतों का  नंबर  इसी  प्रणाली   से    देते  हैं


2-यूनानी   चिकत्सा  विधि   

 भारत  ,पाकिस्तान  और   अन्य   मुस्लिम   देशों   में इलाज  करने   के लिए   यूनानी    विधि   प्रचलित   है   ,जिसे "तिब्बे  यूनानी - طب یونانی "  कहा जाता  है   , इस  विधि की  खोज सन 980  में  अबी  सीना   नामके  अरब चिकित्सक  ने  की  थी   . इसका  पूरा   नाम "अबू  अली  हुसैन इब्न अब्दुल्लाह  इब्न  सीना - أبو علي الحسين ابن عبد الله ابن سينا"  है  , इसने     महर्षि  सुश्रुत  और चरक   की   लिखी  पुस्तकों  का   आधार    लेकर यूनानी     चकित्सा  की  बुनियाद  रखी , आयर्वेद  को  वेद  का  अंग   माना  जाता   है  ,


3- उर्दू में देवनागरी   अक्षर 

संस्कृत  और  हिन्दी   की  लिपि   देवनागरी  है   . इसमे  हरेक  ध्वनि  के लिए पृथक  अक्षर    है   ,  इस्लाम  की  धार्मिक  भाषा  अरबी  है    जिसमे  ऐसा नहीं  है    जब   मुसलमान  भारत   आये  तो उन्होंने   यहाँ   उर्दू  को   अपनी  भाषा  बना  लिया  और  यहां प्रचलित    शब्दों   को  लिखनेके लिए   अरबी  भाषा में  कुछ  अतिरिक्त   अक्षर जोड़   दिए    जैसे ,ट , ड ,ड़ ( ٹ ,ڈ ,ڑ )मुसलमानों   ने  यह  ध्वनि   या  अक्षर  भारत   से  लिए   है   ,  इनका  अल्लाह  भी  यह  अक्षर  नहीं   बोल   सकता


4-खगोल   विज्ञानं 

खगोल   विज्ञानं ( Astronomy"  )  को  अरबी   में "इल्मुल फलक  -   علم الفلك "और " ईल्मुल नजम -علم النجوم  "  कहा  जाता  है  , यह   भी  वैदिक  संस्कृति  की पैदाइश   है ,सैकड़ों   साल  पहले  भारत  के  खगोल   शास्त्री   ने " सिद्धांत  "  नामक  ग्रन्थ  की  रचना  की  थी   , जिसका सन 770  में  खलीफा  मंसूर   के   एक  दरबारी   ने   संस्कृत   से  अरबी  में  अनुवाद  किया  ,  और   इसका  नाम " जीज महलुल फिल  सिंद हिन्द दरजह दरजह  -  زيج محلول في السندهند لدرجة درجة "इस ग्रन्थ  में दी  गयी विभिन्न  टेबुलों  की  मदद   से  ग्रहों  की सही  स्थिति  ,  उनका  अंश   और  कोण  का सही   पता  चल  जाता  है    ,  मुसलमान  इस्लामी  जंतरी ( पंचाग  "  बनाने  में   इसका  सहारा लेते  हैं   ,

5-वैदिक गणना  पद्धति 

इस विधि  को(Hindu–Arabic numeral system)भी   कहा  जाता   है   क्योंकि   यह विधि   अरब  लोगों  ने   भारत  से सीखी  थी   , फिर  अरब  से यूरोप  के लोगों  ने सीखी  थी

इस्लाम से  पहले  और  इस्लाम के जन्म  तक  अरब लोगों   को गिनती  नहीं  आती  थी   ,  वह  अरबी   के    एक एक अक्षर के लिए एक  संख्या   मानते  थे  ,  जैसे अलिफ  को  1  और  बे को  दो  ,  लेकिन   इस्लाम  के  हजारों  साल   पहले   भारतीय विद्वानों   के  इकाई  से लेकर  महा शंख   तक  की  गणना  कर ली थी   . गिनती  की  इस  विधि  को  सन  825  में अरब   गणितज्ञ "अब्दुल्लाह मुहम्मद  बिन मूसा अल  ख्वारज़मी - عبد الله محمد بن موسى الخوارزمی‎ "ने  अरब  में  प्रचलित  किया  ,  बाद में  सन  830  में  " अबू  यूसुफ  याकूब बिन  इसहाक अल  सबाह अल  किन्दी - أبو يوسف يعقوب بن إسحاق الصبّاح الكندي‎ "ने  भारत   की  इस  गणना  विधि   को  इस्लामी  देशों  में  फैला  दिया   ,  जिसे  सभी   ने  अपना   लिया  . यह  भी   वैदिक  संस्कृति  की  देन है   , इस विधि  को " निज़ाम अल अदद अल  हिंदी अल  अरबी  -   نظام العد الهندي العربي  " कहा   जाता     है

6-Iजन्नत में  भारतीय  मसाले 
वैदिक  संस्कृति  काफी  प्राचीन   और  व्यापक   है  ,इसमे  धर्म   ,  भाषा  , शिष्टाचार  ,  परम्परा  के अतिरिक्त  भोजन  भी  सम्मिलित   है   ,    भारत के लोग  भोजन   के अनेकों  प्रकार  के  मसालों और  औषधीय पदार्थों    का  प्रयोग   करते   हैं    ,  लेकिन   बहुत  काम लोग  जानते  होंगे  कुछ  ऐसे   भारतीय  मसाले हैं   , जिनका   प्रयोग   मुसलमानों   का  अल्लाह   जन्नत में  शराब   बनाने  में   इस्तेमाल  करेगा  ,  और जन्नत में  वही  शराब   पिलायी  जायेगी .ऐसी   तीन  चीजों   का  उल्लेख   कुरान  में    है


1-जिन्जिबील -अदरक 
संस्कृत   में  अदरक  को  'श्रंगवेर ' भी  कहा  गया  है . और  यही शब्द ग्रीक भाषा में ' जिन्जीबरिस zingيberis (ζιγγίβερις).हो गया .फिर अंगरेजी  में "जिंजर Ginger "    होगया .और  इसी  को  अरबी में  "  जिन्जिबील  زنجبيل  "    कहा  गया  है ,वनस्पति  शाश्त्र  में  इसका नाम  " Zingiber officinale,  " है .मूलतः  यह शब्द  तमिल भाषा  के शब्द  "  इंजी இஞ்சி    " और " वेर வேர் "   से  मिल  कर बना  है .जिसका  अर्थ  सींग  वाली  जड़  होता है .और  अदरक  को सुखाकर  ही  "सौंठ "   बनायीं  जाती  है .जिसका  प्रयोग अल्लाह  जन्नत  में  शराब  में  मिलाने  के लिए  करता  है .   इसलिए  कुरान  में  कहा  है ,

"और वहां   उनको ऐसे  मद्य  का  पान  कराया  जायेगा   जो जंजबील  मिला  कर तय्यार  किया गया  हो " सूरा -अद दहर 76:17

"وَيُسْقَوْنَ فِيهَا كَأْسًا كَانَ مِزَاجُهَا زَنْجَبِيلًا"76:17

And in that [paradise] they will be given to drink of a cup flavoured with ginger, (76:17)

नोट -कुरान  के  हिंदी अनुवाद  में  इस आयत का  खुलासा    करते हुए  बताया है ,जन्नत में  शीतलता  होगी . और जन्जिबील   का तासीर  और गुण गर्म  होता है और वह  स्वादिष्ट  भी होता है ,और उसके  मिलाने से  मद्य   आनंद  दायक   हो जाता है '
 (हिंदी  कुरान .मकताबा   अल हसनात ,पेज 1110 टिप्पणी 11)

2-काफूर - कपूर 

संस्कृत  में   इसे  " कर्पूर "कहा  जाता  है . और  भारत की सभी भाषाओँ  के साथ  फारसी , उर्दू  में यही नाम   है .  अंगरेजी   में "Camphor '   है .और वनस्पति शाश्त्र में  इसका नाम " सिनामोमस कैफ़ोरा (Cinnamomum camphora, हैयह एक वृक्ष से प्राप्त किया जाता है .भारत में यह देहरादून, सहारनपुर, नीलगिरि तथा मैसूर आदि में पैदा किया जाता है.लगभग 50 वर्ष पुराने वृक्षों के काष्ठ आसवन (distillation) से कपूर प्राप्त किया जाता है.भारत में   कपूर  का उपयोग  दवाइयों  , सुगंधी  और  धार्मिक  कामों   के  लिए  किया  जाता है . लेकिन अल्लाह   जन्नत में  कपूर का प्रयोग   शराब  में   मिलाने के लिए  करता  है ,  कुरान में  कहा है ,

"और  वह  ऐसे  मद्य  का  पान  करेंगे जो कपूर  मिला कर  तय्यार किया  होगा "सूरा -अद दहर 76:5

"إِنَّ الْأَبْرَارَ يَشْرَبُونَ مِنْ كَأْسٍ كَانَ مِزَاجُهَا كَافُورًا "76:5

(they shall drink  of   cup whereof mixture    of   Kafur )

नोट -इस आयत   की व्याख्या में  कहा है ,वह  कपूर अत्यंत  आनंदप्रद ,  स्वादिष्ट ,शीतल , और सुगन्धित  होगा और जोजन्नत का आनंद लेने वाले   होंगे  उन्हीं  को मिलेगा
(कुरान  हिंदी  पेज  1109 टिप्पणी  3)
3-मुस्क - कस्तूरी 

यद्यपि  कुरान  में  कस्तूरी  शब्द  नहीं  आया  है ,कस्तूरी  मृगों  से  जो सुगन्धित  पदार्थ  मिलता  है ,यूनान तक  निर्यात होता था .और ग्रीक  भाषा  कस्तूरी  को " Musk " कहा जाता है ,कस्तूरी  मृग  को  "Musk Deer "  कहते हैं  , और अरबी  में "  المسك الغزلان    " कहते है  . वैज्ञानिक भाषा  में     इसका नाम   " Moschus  Moschidae  "है . ग्रीक  भाषामे  कस्तूरी मृग  के लिए प्रयुक्त  इसी मुस्क   शब्द  को  कुरान   में  लिया  गया है ,
कस्तूरी  मृग    लुप्तप्राय  प्राणी है  ,जो  हिमालय क्षेत्र  में मिलता  है .उसकी  ग्रंथियों से  जो  स्राव  निकालता है  उसी को कस्तूरी   कहते हैं  .जो दवाई , और  सुगंधी  में काम  आती  है . लेकिन अल्लाह   इसे भी  शराब   उद्योग में   इस्तेमाल  कर लिया  ,  कुरान  में लिखा है ,
"उन्हें खालिस शराब पिलायी जायेगी ,जो मुहरबंद होगी .और मुहर उसकी मुश्क की होगी " सूरा -अल ततफ़ीफ़ 83:25-26
"يُسْقَوْنَ مِنْ رَحِيقٍ مَخْتُومٍ "83:25

"خِتَامُهُ مِسْكٌ وَفِي ذَٰلِكَ فَلْيَتَنَافَسِ الْمُتَنَافِسُونَ " 83:26

They will be given a drink of pure wine whereon the seal , (25)pouring forth with a fragrance of musk.  (26)

नोट - इन आयतों में हिंदी कुरान में कहा है कि मनुष्य को उसी शराब की इच्छा करना चाहिए जो अल्लाह ने बनायी गयी है (.पेज 1139 टिप्पणी 11)

निष्कर्ष -कुरान से प्रमाणित इस सभी पुख्ता सबूतों से सिद्ध होता है कि अगर मुसलमान जन्नत भी चले गए तो वहां भी अल्लाह को भारत के इन तीनों मसालों की जरुरत पड़ेगी .जो उसे भारत से ही मंगवाना पड़ेंगी . क्योंकि यह वस्तुएं अरब में पैदा नहीं होती .और यदि अल्लाह ऐसा नहीं करेगा तो कुरान दिया गया उसका वादा झूठ साबित हो जायेगा .
इसलिए हमारा उन सभी भारत विरोधी जिहादियों से इतना ही कहना ही कि जब जन्नत में भी अल्लाह को भारतीय मसालों की जरुरत पड़ेगी तो स्वर्ग जैसे इस भारत को बर्बाद क्यों करना चाहते हो ?क्योंकि हमारे लिए तो हमारी जन्मभूमि ही जन्नत से भी महान है !
नोट-लेख  संख्या   -200 /87 दिनांक  29 /1 /2013   फे  बुक  31 /03 /2013


अब  मुस्लिम पर्सनल बोर्ड  के मुल्ले बताएं  की वह  वैदिक  कल्चर  की  पैदायश  इन   चीजों  को   छोड़ने  की  हिम्मत  करेंगे   ,  और  अल्लाह से दुआ करेंगे  कि  हमें  जन्नत  नहीं   चाहिए क्योंकि  वहां  भारतीय  चीजों  से बनी  शराब     मिलेगी   . 




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