सोमवार, 20 जुलाई 2015

सात्विक आहार अपनाओ मांसाहार त्यागो !!

बड़े ही  दुःख  की  बात है  कि धार्मिक   ज्ञान   के  अभाव  , और पाश्चात्य संस्कृति  के  प्रभाव   में  आकर  आजकल  के   हिन्दू    युवा वर्ग  में माँसाहारी  भोजन  करने    का  फैशन   हो  गया   है   ,  कुछ  लोग  तो  अण्डों   को  वेजिटेरियन  मानने  लगे   हैं  ,  कुछ  लोग  तो  केवल शौक   के लिए  चिकन , मछली  और  मीट  खाने   लगे   हैं   ,  इसका  दुष्परिणाम  यह  हुआ   कि ऐसे लोग   किसी न किसी   रोग  से ग्रस्त   पाये गए   हैं  ,  आज  ऐसे लोगों  को उचित  मार्गदर्शन   की  जरुरत    है ,

हिन्दू धर्मशास्त्रों मे एकमत से सभी जीवों को ईश्वर का अंश माना है व अहिंसा, दया, प्रेम, क्षमा आदि गुणों को अत्यंत महत्व दिया , मांसाहार को बिल्कुल त्याज्य, दोषपूर्ण, आयु क्षीण करने वाला व पाप योनियों में ले जाने वाला कहा है । महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म पितामह ने मांस खाने वाले, मांस का व्यापार करने वाले व मांस के लिये जीव हत्या करने वाले तीनों को दोषी बताया है । उन्होने कहा हैं कि जो दूसरे के मांस से अपना मांस बढ़ाना चाहता है वह जहा कहीं भी जन्म लेता है चैन से नहीं रह पाता । जो अन्य प्राणियों का मांस खाते है वे दूसरे जन्म में उन्हीं प्राणियों द्वारा भक्षण किये जाते है । जिस प्राणी का वध किया जाता है वह यही कहता है
"मांस भक्षयते यस्माद भक्षयिष्ये तमप्यहमू "अर्थात् आज वह मुझे खाता है तो कभी मैं उसे खाऊँगा ।

श्रीमद् भगवत गीता में भोजन की तीन श्रेणियाँ बताई गई है ।
 (1) सात्त्विक भोजन -जैसे फल, सब्जी, अनाज, दालें, मेवे, दूध, मक्सन इत्यादि जो अग्यु, बुद्धि बल बढ़ाते है व सुख, शांति, दयाभाव, अहिंसा भाव व एकरसता प्रदान करते है व हर प्रकार की अशुद्धियों से शरीर, दिल व मस्तिष्क को बचाते हैं
(2) राजसिक भोजन - अति गर्म, तीखे, कड़वे, खट्टे, मिर्च मसाले आदि जलन उत्पन्न करने वाले, रूखे पदार्थ शामिल है । इस प्रकार का भोजन उत्तेजक होता है व दु :ख, रोग व चिन्ता देने वाला है ।
(3) तामसिक भोजन -जैसे बासी, रसहीन, अर्ध पके,दुर्गन्ध  वाले, सड़े अपवित्र नशीले पदार्थ मांस इत्यादि जो इन्सान को कुसंस्कारों की ओर ले जाने वाले बुद्धि भ्रष्ट करने वाले, रोगों व आलस्य इत्यादि दुर्गुण देने वाले होते हैं ।


वैदिक मत प्रारम्भ से ही अहिंसक और शाकाहारी रहा है, यह देखिए-

य आमं मांसमदन्ति पौरूषेयं च ये क्रवि: !
गर्भान खादन्ति केशवास्तानितो नाशयामसि !! (अथर्ववेद- 8:6:23)

-जो कच्चा माँस खाते हैं, जो मनुष्यों द्वारा पकाया हुआ माँस खाते हैं, जो गर्भ रूप अंडों का सेवन करते हैं, उन के इस दुष्ट व्यसन का नाश करो !

अघ्न्या यजमानस्य पशून्पाहि (यजुर्वेद-1:1)

-हे मनुष्यों ! पशु अघ्न्य हैं – कभी न मारने योग्य, पशुओं की रक्षा करो |

अहिंसा परमो धर्मः सर्वप्राणभृतां वरः। (आदिपर्व- 11:13)

-किसी भी प्राणी को न मारना ही परमधर्म है ।

सुरां मत्स्यान्मधु मांसमासवकृसरौदनम् ।
धूर्तैः प्रवर्तितं ह्येतन्नैतद् वेदेषु कल्पितम् ॥ (शान्तिपर्व- 265:9)

-सुरा, मछली, मद्य, मांस, आसव, कृसरा आदि भोजन, धूर्त प्रवर्तित है जिन्होनें ऐसे अखाद्य को वेदों में कल्पित कर दिया है।

अनुमंता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी ।
संस्कर्त्ता चोपहर्त्ता च खादकश्चेति घातका: ॥ (मनुस्मृति- 5:51)

प्राणी के   मांस    के  लिए वध की  अनुमति  देने  वाला , सहमति  देनेवाला  , मारने  वाला   ,  मांस  का  क्रय  विक्रय  करने  वाला ,पकाने   वाला ,परोसने  वाला   और  खाने  वाला   सभी  घातकी     अर्थात  हत्यारे  हैं

2-सिख  धर्म  में  मांसाहार  का निषेध 

"कबीर  भांग  मछली  सूरा पान  जो जो  प्राणी   खाहिं 

तीरथ  नेम  ब्रत  सब जे  कीते  सभी  रसातल   जाहिं "-– श्री  गुरुग्रन्थ  साहब Ang  137


"जीव    वधहु को  धरम  कर थापहु अधरम कहहु  कत  भाई 
आपन  को मुनिवर  कह थापहु  काको  कहहु  कसाई "-  श्री  गुरुग्रन्थ  साहब  Ang 1103)


वेद  कतेब  कहो   मत झूठे   ,झूठा  जो  न  विचारे - जो   सब  में एक   खुदा   कहु  तो  क्यों  मुरगी  मारे " -श्री  गुरुग्रन्थ  साहब Ang 1350)


शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने गहरी खोज के बाद जो गुरु साहब के निशान तथा हुकम नामें पुस्तक के रूप में छपवाये है उनमें से एक हुक्मनामा यह है ।

पृष्ठ 103-हुक्म नामा  न. 113
हुक्मनामा बाबा बन्दा बहादुर जी,मोहर फारसी

देगो तेगो फतहि नुसरत बेदरिंग
याफत अज नाम गुरु गोविन्द सिंह
 १ ओंकार    फते दरसनु

सिरी सचे साहिब जी दा हुक्म है सरबत खालसा जउनपुर का गुरु रखेगा.. .खालसे दी रहत रहणा भंग तमाकू हफीम पोस्त दारु कोई नाहि खाणा मांस मछली पिआज ना ही खाणा चोरी जारी नारही करणी ।

अर्थात्( मांस, मछली, पिआज, नशीले पदार्थ, शराब इत्यादि क़ीमनाही की गई है । सभी सिख गुरुद्वारों में लंगर में अनिवार्यत : शाकाहार ही बनता है ।


3-ईसाई धर्म  में  मांस  मदिरा  का  निषेध 
ईसाई धर्म    के  धर्मग्रन्थ   बाइबिल   के नए  नियम ( New testament)  में साफ़  शब्दों   में   मांस   खाने  और   शराब  पीने  की  मनाई    की गयी है , क्योंकि  इनके  सेवन करने  वाला  खुद  तो ठोकर  खाता   है    .  और  दूसरों   को भी   सही  धर्म  से  भटका  देता है
It is better not to eat meat or drink wine or to do anything else that will cause your brother or sister to fall.Romans14:21

भला तो यह है, कि तू न मांस खाए, और न दाख रस पीए, न और कुछ ऐसा करे, जिस से तेरा भाई ठोकर खाए

4-बौद्धधर्म में जीवहत्या का निषेध 

किसी   भी  प्राणी   को  मारे  बिना मांस   की  प्राप्ति  नहीं   हो  सकती   , इसलिए   भगवान  बुद्ध    ने हर प्रकार के  जीवों  की  हत्या करने को   पाप  बताया    है    ,  और  कहा   है  ऐसा   करने वाले   कभी     सुख  शांति  प्राप्त   नहीं   करेंगे ,

धम्मपद धम्मपद की गाथा दण्ड्वग्गो’ मे भगवान बुद्ध कहते है :

सब्बे तसन्ति दण्डस्स, सब्बेसं जीवितं पियं।
अत्तानं उपमं कत्वा, न हनेय्य न घातये॥-130
सभी दंड से डरते हैं । सभी को मृत्यु से डर लगता है । अत: सभी को अपने जैसा समझ कर न तो किसी की हत्या करे या हत्या करने के लिये प्रेरित करे ।

सुखकामानि भूतानि, यो दण्डेन विहिंसति।
अत्तनो सुखमेसानो, पेच्‍च सो न लभते सुखं॥-131
जो सुख चाहने वाले प्राणियों को अपने सुख की चाह से , दंड से विहिंसित करता है ( कष्ट पहुँचाता है ) वह मर कर सुख नही पाता है ।

बौद्ध   धर्म   के  " पंचशील ( यानी   पांच  प्रतिज्ञा  )    में   पहली  प्रतिज्ञा   है    ,

" पाणाति  पाता वेरमणी सिक्खा  पदम  समादियामि  "

अर्थात    मैं   किसी  भी  प्राणी  को  नहीं  मारने  की  प्रतिज्ञा   करता  हूँ

5-जैन धर्म   में   प्राणी   हत्या   का   निषेध

जैन   धर्म    में तो    छोटे   बड़े   सभी  प्रकार के   जीवों   को   मारने  की  घोर  वर्जना  की गई    है  
भगवान  महावीर   ने   कहा   है    ,

"सव्वे  जीवा  इच्छन्ति  जीवियुं न मररिस्सयुं -तम्हा   पाणि बहम   घोरं  निग्गन्ठा पब्बजन्ति  च "समण  सुत्त   गाथा   -3 

 अर्थात  -सभी  जीव  जीना  चाहते   है   ,  मारना   कोई     नहीं   चाहता   ,  इसलिए  निर्ग्रन्थ ( जैन )  प्राणी  वध   की   घोर  वर्जना  करते   हैं

6-सूफी  मत   में  अहिंसा  का  आदेश 

यद्यपि अधिकांश   मुस्लिम  मांसाहारी   होते   हैं   , परन्तु इस्लाम  के  सूफी  संत  मौलाना  रूमी   ने  अपनी   मसनवी   में मुसलमानों को  अहिंसा  का  उपदेश   दिया   है  ,    वह  कहते हैं  ,
"मी  आजार मूरी  कि  दाना  कुशस्त  ,  कि  जां  दारद   औ  जां  शीरीं  खुशस्त "
अर्थात  - तुम  चींटी   को  भी  नहीं   मारो ,जो दाना   खाती   है   , क्योंकि  उसमे  भी  जान   है  ,  और  हरेक को  अपनी  जान  प्यारी   होती   है .

इन  सभी   धर्मों  के  ग्रंथों  के वचनों   से  निर्विवाद  रूप   से  यही    बात  सिद्ध   होती   है कि  सदा  स्वस्थ   , निरोगी  और  दीर्घायु   बने   रहने के लिए  हमें    सात्विक   भोजन  अपनाने  की   और  मांसाहार  को  त्यागने  की जरुरत   है   ,  क्योंकि    मांसाहार  के लिए  मूक   निर्दोष  जीवों    की  हत्या  होती   है  ,जो   महापाप   है   ,  दूसरे   मांसाहार   से अनेकों   प्रकार के   रोग   हो   जाते   हैं   , जैसा कि  आजकल   हो रहे   हैं ,

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http://shrut-sugya.blogspot.in/p/jivdaya-vegetarianism.html


Why is there a controversy in the Panth over eating meat?


http://www.sikhanswers.com/rehat-maryada-code-of-conduct/meat-controversy-in-the-panth/



1 टिप्पणी:

  1. बिल्कुल सत्य जानकारी और यही अध्यात्म और धर्म है।
    बहुत बहुत धन्यवाद जानकारी देने के लिए

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