गुरुवार, 22 अक्तूबर 2015

वैदिक धर्म मानने वाले रसूल के वंशज !

इस बात  से कोई  भी व्यक्ति इंकार नहीं   कर सकता कि सत्य को   सदा के लिए दबाना ,या मिटाना  असम्भव   है .और एक न एक दिन  सत्य   खुद  लोगों के सामने  प्रकट  हो जाता है , जिसे  लोगोंको स्वीकार  पड़ना  है .यह  बात  इस्लाम  के ऊपर  भी  लागु  होती  है . मुसलमान मुहम्मद  साहब को अल्लाह का रसूल  और  इस्लाम  का प्रवर्तक  मानते हैं .क्योंकि  23  साल  की    आयु में  सन 592 ईस्वी   में   मुहम्मद  पर  कुरान  की पहली आयत  नाजिल  हुई थी , उसी  दिन  से इस्लाम    का जन्म हुआ  , और  इसी  इस्लाम को  मनवाने के लिए मुहम्मद साहब  और उनके बाद   उनके  अनुयायी  जिहादियों  ने करोड़ों  निर्दोष  लोगों  को  मौत के घाट   उतार दिया . और  कई  देश   वीरान  कर  दिए .
यद्यपि  मुहम्मद साहब को अल्लाह का  सबसे  प्यारा  रसूल  कहा  जाता है ,लेकिन   कई  कई पत्नियां  होने पर भी  मुहम्मद साहब   के कोई  पुत्र    नहीं  हुआ . एक लड़का एक  दासी  मरिया  से हुआ था वह  भी अल्पायु  में  मर गया था .वास्तव  में  मुहम्मद साहब  वंश  उनकी  पुत्री फातिमा  से  चला    है ,जिसकी शादी  हजरत  अली  से हुई थी . इस  तरह  अली  और फातिमा   से मुहम्मद  साहब की वंशावली   वर्त्तमान  काल तक  चल  रही  है ,
अब  यदि  कोई   कहे कि उन्हीं  रसूल  के वंशज  बिना किसी  दवाब के   वेदों  पर आस्था  रखते हैं ,गायत्री  मन्त्र  पढ़ते हैं  .और  वैदिक  धर्म   ग्रन्थ   छह  दर्शनों  पर विश्वास  रखते हैं  , यही नहीं  भगवान  बुद्ध  को  भी अवतार  मानते हैं  . तो  क्या  आप  विश्वास   करेंगे ?  लेकिन  यह  शतप्रतिशत   सत्य  है , इसलिए  इस  लेख  को ध्यान  से पढ़िए ,
1- निजारी इस्माइली
यह तो  सभी  जानते हैं कि   मुसलमान  सुन्नी  और शिया दो  मुख्य  फिरकों  में  बटे  हुए  हैं , और शिया  अली  को अपना प्रथम  इमाम  मानते है .अली और फातिमा के छोटे  पुत्र  इमाम  हुसैन  को  परिवार  सहित  करबला  में  शहीद   करा  दिया गया था . केवन उनका एक बीमार पुत्र   बचा   रहा  , जिसका नाम  " जाफर  सादिक " था , जिसे  शिया  अपना  चौथा  इमाम  मानते हैं .कालान्तर में  उन्हीं  अनुयाइयों  ने   अलग   संप्रदाय  बना  लिया   जिसका  नाम  "अन  निजारियून -  النزاريون‎  "  है .जिनको  " इस्माइलिया - اسماعیلیه‎  "  भी  कहा  जाता  है .जो  "शाह करीम  अल  हुसैनी चौथे   - "  को अपना  इमाम  और धार्मिक  गुरु  मानते है ,   शाह  करीम   का जन्म  अली  और फातिमा    की  49  वीं   पीढी  में  हुआ   है .इनकी यह  वंशावली  तब से  आज  तक   अटूट  रूप से चली  आ  रही  है .इस्माइलिया   दुनिया के  25 में फैले हुए  हैं , और  इनकी संख्या करीब  डेढ़  करोड़  ( 15 million  )  है .इनकी मान्यता है कि   अल्लाह  बिना  इमाम  को दुनियां  को नहीं   रखता ,यानि हर  काल  में  एक इमाम  मौजूद  रहता है , जो लोगों का मार्गदर्शन   करता  रहता  है .इन  लोगों  की मान्यताएं  सुन्नी  और  शियायों  से बिलकुल   अलग  हैं .
2--किसी  भी दिशा में  नमाज 
निजारी इस्माइली  इबादत  के लिए   मस्जिद  की जगह  जमातखाने  में  में  जाते हैं ,इनके वर्त्तमान   इमाम  आगाखान करीम  शाह  अल  हुसैनी  और उनके भाई अयमान  मुहम्मद   ने अरबों  रुपये खर्च करके  विश्व  के कई  शहरों  में भव्य और सर्वसुविधा युक्त आधुनिक   जमातखाने  बनवा  दिए  है .जिनमे लोग इबादत  करते  हैं . लेकिन  निजारी   दूसरे  मुसलमानों  की तरह  मक्का के  काबा की  तरफ  मुंह  करके इबादत  नहीं  करते  , बल्कि   दीवार के सहारे  खड़े होकर  किसी तरफ  मुंह  करके   प्रार्थना  करते हैं .इनका  कहना है कि  अल्लाह   तो  सर्वव्यापी   है , जैसा  खुद  कुरान में  कहा   गया है ,
" पूरब  और पश्चिम  अल्लाह के ही हैं ,तो तुम जिस  तरफ ही रुख  करोगे ,उसी  तरफ   ही अल्लाह का रुख  होगा . निश्चय ही अल्लाह   बड़े  विस्तार  वाला  और  सब  कुछ  जानने  वाला  है " सूरा - बकरा  2 :115
इसलिए  पश्चिम   में स्थित  मक्का  के काबा की तरफ मुंह  करके  नमाज  पढ़ने की कोई जरुरत नहीं  है .
3-अली  अल्लाह  का अवतार
निजारी  इस्माइली मानते   हैं  कि  अल्लाह  इमाम  के रूप में अवतार (incaarnation )     लेता  है . और अली अल्लाह के अवतार थे . निजारी  यह  भी आरोप  लगाते हैं ,कि   कुरान  में  इस बात का  उल्लेख   था ,लेकिन सुन्नियों ने उन आयतों  गायब कर दिया था ,जिनमे  अली  को अल्लाह का अवतार  बताया गया था .  आज  भी निजारी अली  को अल्लाह का अवतार  मानते  है  और उसकी प्रार्थना  करते हैं , ऐसी  एक  सिन्धी - गुजराती  मिश्रित  भाषा   की प्रार्थना  का नमूना   देखिये .
" हक़ तू ,पाक तू बादशाह मेहरबान   भी ,या अली तू  ही  तू .1
रब तू ,रहमान  तू ,या  अली अव्वल आखिर  काजी , या अली तू  ही तू .2
ते उपाया  निपाया  सिरजनहार  या अली तू  ही तू .3
जल  मूल  मंडलाधार  ना  या अली  हुकुम  तेरा या अली तू  ही तू .4
तेरी दोस्ती  में बोलिया  पीर शम्श  बंदा  तेरा या अली तू  ही तू .5
(पीर शम्श  कलंदर  दरवेश )
4-इस्माइली  कलमा 
निजारी  इस्माइली  सपष्ट  रूप से मुहम्मद  साहब  के चचेरे  भाई अली  को ही अल्लाह  का अवतार  मानते हैं  .  और इनका  कलमा   इस प्रकार  है ,
"अली अमीरुल  मोमनीन , अलीयुल्लाह "
"عليٌّ امير المومنين عليُ الله  "
अर्थात - ईमान वालों  के  नायक  अली   अल्लाह  .और  हर दुआ  के बाद  यह  कहते  हैं
"अलीयुल्लाह -  عليُ الله   "   यानि अली   अल्लाह  है .(The Ali, the God)
http://www.mostmerciful.com/dua-one.htm
5-इस्माइली  दुआ 
"ला फतह इल्ला  अली व् ल सैफ अल जुल्फिकार "
"لا فتح الّا علي و  سيف الذوالفقار  "
"तवस्सिलू  इन्दल  मसाईब बिल  मौला अल  करीम हैदिरिल  मौजूद शाह  करीम  अल हुसैनी "
" توصّلو عند المصايب بالمولا كم حيدر الموجود شاه كريم الحسينِ     "
अर्थ -अली  जैसा कोई  नायक नहीं  , और जुल्फिकार जैसी  कोई तलवार नहीं , इसलिए  मुसीबत के समय  मौजूदा  इमाम  शाह  करीम  अल हुसैनी   से मदद  मांगो .इसके अलावा  एक दुसरे का  अभिवादन  करते समय  कहते हैं ,
"شاه جو ديدار "(शाह  जो दीदार )अर्थात  शाह के दर्शन , तात्पर्य आपको इमाम  के दर्शन   हों
6-रसूल  के वंशज पीर  सय्यद  सदरुद्दीन 
इसी  तरह   इमाम जाफर  सादिक  की 21  पीढ़ी  में यानि रसूल  के वंश  में   सय्यद  सदरुद्दीन   का  जन्म  हुआ  जो ईरान से  हिजरत   करके  भारत  के गुजरात  प्रान्त  में आकर बस गए  ,उस समय   इमाम कासिम  शाह (  bet. 1310 C.E. and 1370 C.E.)   )  की इमामत  थी . बाद में इमाम  इस्लाम  शाह ( 30th Imam  ) ने   सदरुद्दीन   को   " पीर  " की पदवी  देकर सम्मान  प्रदान  किया .सदरुद्दीन    वैदिक  धर्म  से  इतने प्रभावित  हुए कि उन्होंने  जितने भी ग्रंथ  लिखे  हैं  , सभी  वैदिक  धर्म  पर आस्था प्रकट  की है .इनमे से कुछ के नाम  इस प्रकार  हैं .
7-इस्माइली  ज्ञान 
इस्माइली धार्मिक  पुस्तकों  को " ज्ञान "   ( उर्दू - گنان  )  गुजराती में " गिनान-ગિનાન  " कहा  जाता  है .ज्ञान  का अर्थ Knoledge है  .इनकी संख्या 250  से अधिक  बतायी  जाती  है .इन में अल्लाह और हजरत  अली  की स्तुति ,चरित्र शिक्षा ,रीति  रिवाज  सम्बन्धी  किताबें  , और  नबियों  की कथाएं वर्णित हैं .आश्चर्य  की  बात है कि  इस्माइली  अथर्ववेद   को भी अपनी ज्ञान  की किताबों  में शामिल  करते हैं .
8-रचनाएँ ग्रन्थ 
इमाम जाफर सादिक  की 20 वीं  पीढ़ी  में पैदा हुए " पीर शिहाबुद्दीन   "  ने ज्ञान  की  इन  किताबों   का उल्लेख  किया  है ,
1.बोध निरंजन -इसमे अल्लाह  के  वास्तविक  स्वरूप  और उसे   प्राप्त  करने की  विधि बतायी  गयी है.
2.  आराध -इसमे अल्लाह और अली की स्तुति  दी गयी है .
3. विनोद -इसमे अली  की महानता  और सृष्टि   की रचना  के बारे में  बताया  है
4. गायंत्री -यह   हिन्दुओं   का गायत्री  मन्त्र  ही  है ,
5. अथरवेद -अर्थात  अथर्ववेद   जो चौथा  वेद   है .  इस्माइली  इसे  भी अल्लाह की  किताब मानते  हैं  
  6.  सुरत  समाचार -इसमे   उदाहरण  देकर  बाले और  बुरे     लोगों  की तुलना  करके  बताया है कि  भले लोग बहुत कम  होते हैं  ,  लेकिन   हमें उनका ही साथ देना चाहिए .    
   6.गिरभावली -इसमे   शंकर पार्वती   की  वार्तालाप   के रूप में  संसार की रचना के  बारे में  बताया गया है.
7.बुद्ध  अवतार-इसमे विष्णु  के  नौवें  अवतार  भगवान  बुद्ध   का  वर्णन  है .
8. दस अवतार -इसमे विष्णु  के   दस  अवतारों  के  बाद  हजरत  अली  के अवतार  होने  का  प्रमाण
9.बावन घटी -इसमे  52  दोहों  में  फरिश्तों  और अल्लाह   के   बीच  सवाल  जवाब  के रूप में  मनुष्यों    में अंतर के बारे में  बताया है .
10. खट  निर्णय -सृष्टि  और  सतपंथ   के   6  महा पुरुषों     की जानकारी .
11.खट दरसन -वैदिक  धर्म  के छह  दर्शन  ग्रन्थ ,  जिन्हें  सभी  हिन्दू  मानते हैं  .
12. बावन बोध -इसमे  52  चेतावनियाँ   और  100  प्रकार  की रस्मों  के बारे में बताया है .
13. स्लोको ( श्लोक )- नीति  और  सदाचार के  बारे में छोटी  छोटी   कवितायेँ
14.दुआ- कुरान की  आयतों   के साथ  अल्लाह और  इमामों  की स्तुति ,के  छंद और  सभी इमामों  और पीरों  का  स्मरण
10-सत  पंथ 
फारसी  किताब " तवारीख  ए पीर "  के अनुसार  इस्लाम  क उदय के सात सौ साल  बाद  मुहम्मद  साहब  के वंशज  और इमाम  जाफर  सादिक   की  20  वीं  पीढ़ी  में जन्मे "सय्यद शिहाबुद्दीन  -"  ( سيّد شهاب الدين  ) भारत में  आये  थे . और गुजरात में  बस गए  थे .यह  पीर "सदरुद्दीन  हुसैनी " के  पिता  थे .इन्होने  भारत में  रह  कर  वैदिक हिन्दू धर्म  का गहन  अध्यन  किया . और  जब  उन्हें   वेदी धर्म   की सत्यता   का  प्रमाण  मिल  गया  तो  , उन्होंने  इस्माइली  फिरके में " सतपंथ "  नामका  अलग  संप्रदाय   बना दिया .इन्हीं   के  पुत्र  " पीर  सदरुद्दीन ( 1290-1367 )  " थे . जो इमाम जाफर  सादिक   की 21  वीं   पीढ़ी में पैदा  हुए . इन्होने पूरे पंजाब  , सिंध   और गुजरात  में सतपंथ   का  प्रसार किया .जिसका  अर्थ  Path  of Truth  होता  है .सतपन्थियों   के  अनुयाइयों  को  " मुरीद " यानि शिष्य  कहा  जाता  है . सत्पंथी    मानते हैं कि  इमाम    एक  बर्तन  की  तरह  होता  है ,जिसमे अल्लाह का नूर  भरा  होता है .और  इमाम को उसके शब्द  यानि फरमान   से पहचाना  जा  सकता  है .इमाम  के   दो  स्वरूप  होते  हैं  , बातिनी  यानी  परोक्ष (esoteric )   और   जाहिरी    यानी  अपरोक्ष (exoteric  ).सतपंथी इमाम  के प्रत्यक्ष  दर्शन   को " नूरानी  दीदार-vision of light  "  कहते  हैं .
11-सत्यप्रकाश 
निजारी  इस्माइली   पीर   ने " सत्यप्रकाश  (The True Light) )" नामकी  एक  पुस्तक  गुजराती  भाषा में   लिखी  थी , जिसका दूसरा  संसकरण  भी  प्रकाशित  हो गया  है . इसमे   निजारी  पंथ  के बारे में  पूरी  जानकारी  दी गयी  है . आप  इस लिंक से किताब  डाउन  लोड  कर सकते  हैं ,
ખુબ સંતોષની અનુભૂતિ સાથે મને કહેતાં અત્યંત ખુશી થાય છે કે અત્યંત લોકપ્રિય ગણાતી “સત્ય પ્રકાશ” નામની પુસ્તકની બીજી આવૃત્તિ બહાર પાડવામાં આવેલ છે.
गुजराती  में इसके विज्ञापन का अर्थ ,खूब संतोष  की अनुभूति  के साथ ,अत्यंत  ख़ुशी की  बात है कि अत्यंत  लोकप्रिय  गिनी   जाने वाली "सत्यप्रकाश  "  नामक  पुस्तक  की  दूसरी  आवृति   प्रकाशित  हो गयी  है ,
http://www.realpatidar.com/a/series40
इस  लेख  में दिए  अकाट्य  प्रमाणों  के आधार पर  ,हम  उन जिहादी   मानसिकता   वाले  मुसलमानों   से  पूछना  चाहते हैं  ,जो वैदिक  हिन्दू  धर्म  मानने  वालों  को  काफ़िर और  मुशरिक   कहते  हैं . ऐसे लोग  बताएं कि  जब  मुहम्मद  साहब के वंशज   वेद  को प्रमाण  मानते हैं , और गायत्री  मन्त्र  को पवित्र  मान कर  जप  करते हैं  , और  अल्लाह  का अवतार   भी  मानते हैं  , तो  क्या मुसलमान    उनको  काफ़िर  और  मुशरिक  कहने की हिम्मत  करेंगे ? और   फिर भी   कोई  मुसलमान  ऐसा  करेगा  तो उसकी   सभी  नमाजें   बेकार  हो जाएँगी . क्योंकि  मुसलमान  नमाज  में   दरुदे  इब्राहीम  भी पढ़ते  हैं , जिसमे   मुहम्मद  साहब  के  वंशजों यानि " आले मुहम्मद "  के लिए बरकत की दुआ और अल्लाह  की दोस्ती प्राप्त  करने की दुआ  की जाती है .अर्थात जो भी  रसूल  की " आल " यानि  वंशजों  की  बुराई  करेगा  जहन्नम  में  जायेगा .इसलिए सभी मुसलमान  सावधान  रहे .
हम तो  मुहम्मद  साहब के ऐसे  महान  वंशजों   को   सादर    प्रणाम   करते  हैं
   जो  पाठक  वैदिक  हिन्दू  धर्म  के  किसी भी  संगठन  के सदस्य  हों  या    कोई  वेबसाईट  चलाते  हों  वह इस  लेख को  हर जगह  पहुंचा  दें .ताकि  .  कट्टर  मुल्लों   का  हमेशा के लिए  मुंह  बंद   हो  जाये .

http://ismaili.net/heritage/node/30522

10 टिप्‍पणियां:

  1. मुजे तो इसमें गड़बड़ लगती है l यह सब हिन्दुओं के मन में ...मुहम्मद को पयगम्बर के रूप में स्वीकार कराने की बातें-षड़यंत्र हैं... जो कभी भी हिन्दू या दुनिया में कोई भी स्वीकार नहीं करेगा l इसाई लोग भी ऐसा ही धोखा करत्ते हैं... वो लोग इसाइयत का विरोध होने पर.. येहुदिज्म की किताबें और बातें ले कर प्रचार करते हैं.. येहुदिज्म का ... जो बाद में इसाइयत की पटरी पर मोड़ के.. हिन्दुओ को मूर्ख बनाया जाता है l यह मई ने प्रत्यक्ष देखा है l आप भी यह इस्माइली-निजारी इत्यादि की बातें करके हिंदुओ को मूर्ख बना के इस्लाम इस तरह से धोखे से क़ुबूल करवाना चाहते है? यह सब भान्डाफोडू ब्लॉग क्या इसीलिए चला रक्खा है.. दो-तीन सालों से? यह सब करने के लिए? पहले इस्लाम को गालियाँ दे के बाद में धीरे से ... इस्लाम ही स्वीकार कराने की साज़िश--षड़यंत्र दिखाई देता है, मुजको तो l मई तो यही बात सब हिन्दुओ में फेला दूंगा की यह भान्डाफोडू ब्लॉग से सावधान रहे ... l हम कोई भी इस्लामी बकवास को सुनने के लिए तैयार नहीं है l
    जब मुहम्मद ही जूठा था.. पूरा इस्लाम ही जूठा है... तो यह सब बाद की बातों का क्या मतलब? यह बाद वाले--निज़ारी-इस्माइली-इत्यादि वाले लोग, मुहम्मद को तो पयगम्बर मानते ही हैं और उसको छोड़ेंगे नहीं l
    यानी स्पष्ट है की आप इसके रास्ते हिन्दुओं के मन में ...मुहम्मद को सच्चा और पयगम्बर ठहरवाने की भयंकर नीच चाल खेल रहे हैं क्या? तो सुन लो की यह आप की योजना त्रिकाल में सफल नहीं होगी ... चाहे त्रिलोक भस्म कर देने पड़े हिन्दुओं ने l तो आप यह ज़हरी-भेदी-छद्म-छल-षड़यंत्र त्वरित ही बंध करो l और ऐसे सपने देखना छोड़ दो l
    यहाँ यह "सत्यप्रकाश" का नाम क्यूँ लिलिया? मूल--ओरिजिनल सत्य्याप्रकाश तोह महर्षि दयानद सरस्वतीजी का है (आर्य समाज के) l उसकी जगह यह सब जाली ग्रन्थ कहाँ-कहाँ से बना लिए आपने और आपके मुल्ले अपनेवालो ने... भडाफोडूजी? यह सब षड़यंत्र है l यहाँ ऐसी जूठी बकवास सुन के मान लेने वाले--उतने भोले-भाले मूर्ख लोग अब हिन्दुस्थान में कोई नहीं है l
    हाँ, मैं जानता हु की आप कौन हैं.. लेकिन इसका भंडाफोड़ मैं बाद में करूँगा l

    उत्तर देंहटाएं
  2. Lekin aur bhi ek baat joothi hai yeh bhandafodu ki. Vo yeh ki yeh ismaili logon ko hindusthan ke vansh se alag karna chaahte hain. Aise toh sab firke vaale khud ko arbi bataane ke liye yehi chaal chalenge. Yani yeh vo sufi jaisa fareb-dhokhe ka rasta hai, jismein achhi baatein kahke hinduo ko islami banaya jaaye aur saath hi musalmaano ko videshi nasl-vansh ke bataane ki koshish bhi ho.
    Is se unke to fir alag desh ki bhi maang jaayaz ho jaaye. Yeh chal nahin sakta. Chaahe kitne bhi rahein yahaan, lekin aise islaam aur muhammad-kuraan-hadees-allah-ko maan ne vaalo ke liye pakistan de diya hai. Ab yahaan sabhi prakaar ke islaamio ka kuchh bhi nahin hai.
    Gar yehi achhi baato ka packaging karke islam manvaanaa hai to saaf-saaf kyu nahin kehte? Yeh ismaili ya nizari ya falaane-dhimaake ke naam pe sufi-type fareb-chhal nahin chalega. Kyu nahin yeh ismaili etc. ko hindu kyu nahin banaa lete yeh bhandafodu vale? In sab ko hindu banaa lo. Jaise arbi log hindusthan ke hindu logo ko musalman banaa sakte hain, vaise hindu bharat vaale log bhi arbi musalmaano ko hindu banaa sakte hain na? Toh daawat hai sab ye ismaili logon ko, ki yehi karna hai to vaapas apne original arbi-hindu dharm mein vaapas lautein. Shaayad isiliye aap hindusthan mein aa gaye hain, vahaan arabia se, ki yahaan se hindu banke vaapas arabia jaa ke vahaan sab ko vaapas hindu banaa lo. Bolo.
    Ek idea aapki aur duniya ki zindagi badal sakta hai.

    उत्तर देंहटाएं
  3. मुहम्मद को बाप बोलने वाले लोग हिन्दुस्थान और हिंदुत्व के प्रति प्रेम और वफादारी कैसे कर सकते हैं? असंभव l यह लोग मुहम्मद को बाप और इस्लाम तो मानते ही हैं l उसमें थोड़े हिन्दू पुस्तकों से शेर-ओ-अशार-बातें घुसेड़ने से क्या फर्क पड़ता है? ऐसी कोपी-उठाईगिरी तो मुहम्मद ने भी करी है, सब जगहों से कुछ न कुछ ले के एक फर्जी कुरआन बना डाली है l तोह वो भी इस्मैली जैसे ही हुए न? ये सब हिंदुत्व के तो शत्रु हैं l बात वाही है... अंदाज़ नया है l

    उत्तर देंहटाएं
  4. बात वही है, इस्लाम की... सिर्फ तरीका नया है l

    उत्तर देंहटाएं
  5. टिपण्णी का भाग १:
    बहुत अच्छा लेख है l आगाखानियों को धन्यवाद और शुभेच्छाएं l आगाखानियों ने आज दुनिया में शान्ति-व्यवस्था-प्रगतिवादी और टोलरंस की मिसाल खड़ी कर दी है l यह व्यापारी क्षेत्र में हैं ज़्यादातर l इनकी तरफ से कोई भी लफड़े-फसादात और कत्तारियों में शामिल होने की बात नहीं मिल्ति l इनको हम,आरा और दुनिया का पूरा सपोर्ट मिलना चाहिए l उनका स्वागत है l निजारिया धर्म है l इस्लाम अधर्म है l
    अल्लाह रूप-सूरत धारण कर सकता है, निज़रियों की इस बात से तो इस्लाम से छुटकारा मिल जाता है l इस से काफिर, उनके प्रति नफरत, जीहाद, तकिया, दर-उल-इस्लाम इत्यादि बातें आधी ख़त्म हो जानी चाहिए l बहुत ही बढिया l
    आपने पहले बताया की फातिमा की शादी अली से हुई l बाद में कहा की मुहम्मद के चचेरे भाई थे अली ... यह कुछ समज में नहीं आया l सत्यप्रकाश-नमाज़-अवतार-गायत्री इत्यादि की बात अच्छी है l सब बातें बढिया है l वाह-वाह !
    लेकिन कुछ बातों में स्पष्टता करें ... आधिकारिक मंतव्य घोषित करें तो बेहतर होगा l वो इस प्रकार हैं:
    १. अल्लाह रूप ले सदाकत हैl ठीक है l लेकिन मूर्तियों के बारे में इनका क्या कहना है? भले ही वो मूर्तियों को ना मानें, लेकिन बाकी हिन्दू मानें तो? इसमें निजारियों के मतानुसार काफिर, जिहाद, तकिया -दारुल इस्लाम इत्यादि का क्या? यह स्पष्ट करें l
    २. अल्लाह रूप ले सकता है l लेकिन जो सुन्नी लोग बोलते हैं की अल्लाह के ९९ ही नाम हैं और बाकी सब हराम हैं... यानी बाकी दुनिया भर के लोग इश्वर को जो विभिन्न नामो से पुकारते ह्ये... तो निजारिये लोग कौनसे नामो से इश्वर का संबोधन करते हैं? और भले ही ये आगाखानी लोग दुनिया के नामो से न ही पुकारें.. लेकिन दुनियाभर के इश्वर के इन नामो के बारे में उनका क्या आधिकारिक मंतव्य है? वही... काफ़िर-जिहाद इत्यादि बातें?
    ३. भारत में इनकी संख्या कितनी है? इसमें अरब से आये कितने और यहाँ इस्मैली बनाए हुए कितने?
    ४. तब्लीग ( अन्यों-हिन्दुओं इत्यादि को उनके निजारिये संप्रदाय में धर्म-परिवर्तन कराने के बारे में आज तक उनका क्या रिपोर्ट है? और आगे क्या रहेगा? इस बारे में इनका क्या आधिकारिक मंतव्य है? हिन्दुओं --हिन्दुस्थान में तो अनेकानेक मत-सम्प्रदाय-पंथों में ... किसी में भी तबलीग जैसा कुछ भी है ही नहीं क्योंकि हमारे यहाँ तो धर्म ही ध्येय और हेतु है l निज़ारियों का हेतु धर्म है या तबलीग है?
    ५. मुहम्मद इनके पुरखे हैं, यह बात पर तो कोई सवाल नहीं हो सकता l वो भले हो.. लेकिन उनको पयगम्बर मानने का क्या तुक है? यानी... कुल-खानदान का धर्म से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं होता l जैसे हिरण्याक्ष राक्षस का बीटा प्रह्लाद इश्वर-धर्मभक्त था l और राम के वंशज महाभारत में दुर्योधन के पक्ष में लडे थे l तो निजारियों ने अधर्म प्रवर्तक-या-वृद्धिकारक मुहम्मद जैसे चरित्र को धर्म-पयगम्बर मानने का सवाल कहाँ आता है? कुल-वंश एक बात है और पयगम्बर दूसरी बात है l और इस पर निजारियों-इस्मैलियों का आधिकारिक रवैया क्या रहेगा? यानि वही... जिहाद-काफिर-इत्यादि? जिहाद न हो तो भी दूसरों को नकारना इत्यादि?

    उत्तर देंहटाएं
  6. टिपण्णी का भाग २: ६. और मुहम्मद है तो कुरआन-हदीस भी आ गयीं l लेकिन जब मुहम्मद का काफिर-आधारित मज़हब ही न रहा.. तो पूरी कुरआन और "इस्लाम" नाम बे-मतलब हो जाता है l जब कोई न कोई इमाम हमेशा रहेंगे तो कुरआन-मुहम्मद और उनकी हदीसों का क्या मतलब? यहाँ चाहे पूरी तरह लागू न हो.. लेकिन यह बात याद रहे की.. मुहम्मद ने उनके आगे वाले सब पय्गम्बरों की किताबों और सिस्टम्ज़-मजहबों को ... बिना कोई सबूत ही ...रद्द घोषित कर दिया था l वो... रद्द कहा, इस बहाने पर की बाद के लोगों ने उन सब किताबों-मज़हबी सिस्म्ज़ में घालमेल करके सब बिगाड़ दिया था l ..और कुरआन का तो इतिहास ज़ाहिर है की.. मुहम्मद साहब के ८० साल बाद उसका फाइनल संपादित रूप हुआ ..तब तक उसका कोई ठिकाना ही नहीं था .. यानी उसमें भी बहुत लोगों ने घालमेल किया था l साह्बाओं-- फतही दौर के कारण "दार-उल-इस्लाम और सब बुरा भी अच्छा" के सपनों को ही सच मान लेनेवाले जिहादी इत्यादि लोगों द्वारा घालमेल इत्यादि का बड़ा इतिहास है l मुहम्मद साहब ने क्या कहा वो तो राम जाने और मुहम्मद साहब जाने l और दुसरो ने ८० साल तक उसमें घालमेल-काट-छांट किया.. इत्यादि का इतिहास तो रिकोर्डेड है ही l और कुरआन-हदीसें पढ़ते ही ..भी ये स्पष्ट हो जाता है l और ये इस्माइली भी कहते तो हैं ही .. की सुन्नियों ने अली के नाम को कुरआन में से उड़ा दिया है l तो फिर कुरआन-हदीसों का सवाल ही कहाँ रहता है?
    आप कहते हैं की इस्मैलियो की अलग किताब है l तो सिअसी एक किताब खड़ी कर लें ये लोग l तो.. सवाल यह है की मुहम्मद के पयगम्बर होने, कुरआन और हदीसों का "धर्मग्रन्थ" होना, इनके बारे में आगाखानियों का अधिकारिक मंतव्य है?
    ८. हिन्दू-मुसलमान झगडा ... या पाकिस्तान-हिन्दुस्ठान युद्ध हो जाए, तो ये आगाखानी लोग किसका पक्ष लेंगे? हालांकि इनकी संख्या भी इतन्नी नहीं है की कुछ कर सकें.. लेकिन वह दूसरी बात है l इनका अधिकारिक स्टेंड क्या रहेगा?
    ९. सारी दुनिया "इस्लाम" शब्द और उस से सम्बंधित कोई भी बात-शब्द से भड़कती है.. दूर भागती है l तो इस्लाम शब्द को ही छोड़ के कोई.. चाहे अरबी ही हो ... शब्द रख ले सकते हैं. "निजारिये" शब्द का अर्थ क्या? हिंदुत्व में तो गुणवाचक या मतवाचक (जैसे अद्वैत--द्वैत-शून्यवाद इत्यादि) शब्द ही होते हैं सभी सम्प्रदाय-पंथों के l तो निजारियों के पंथ का नाम किसी व्यक्तिवाचक न हो तो बेहतर l वर्ना व्यक्तिवाचाक् "मुहम्मादानिस्म" जैसा हाल होगा l
    ठीक है की यह निजारियों-इस्लामिलियों की यह अंदरूनी बात है.. हम कौन होते हैं कुछ बोलने वाले?.. लेकिन यह परिस्थिति और इतिहास को देखते हुए तो "इस्लाम" नाम ही अयोग्य है l
    १०. यह जो मुहम्मद-पयगम्बर, इस्लाम नाम, कुरआन हदीसों.. को मानने की बात है... वह कोई धार्मिक कारणों से है या ऐतिहासिक कारणों से? धार्मिक कारण तो कोई बनता नहीं l ऐतिहासिक कारणों में हो सकता है की इस्लामियो-मुस्लिमों की बढती शक्ति-सत्ता-दमन से बचने के लिए ये लोग भाग निकले हों... और फिर भी यह सब नाम-कुरआन इत्यादि बातें रखे रहने के लिए मजबूर हुए हो...ताकि किसी तरह से .. बादशाहों.. तानाशाहों को खुश रख के खुद को टिकाये रक्खें l ऐसा है तो अब तो कोई औरंगजेब आनेवाला नहीं है l अब तोह वह सब... मुहम्मद का पयगम्बर होना, कुरआन-हदीस और इस्लाम नाम को छोड़ सकते हैं l इसके बारते में इन लोगों का क्या आधिकारिक रवैया है?
    ११. यदि ऐतिहासिक कारण हैं तो फिर इन लोगों के लिए भी दुनिया वालो ने एक मुल्क बना देना चाहिए .. ठीक जैसे इज्रराएल बना दिया येहुडियो के लिए l इनका मुल्क कहीं अरबस्तान में या आसपास हो l उसमें तेल के कुएं हो तो और भी बढीया l वर्ना ये लोग डेढ़ करोड़ हैं.. जो अमीरात की तरह अपने मुल्क को आबाद बना लेंगे l ऐसे लोगों की बड़ी मुसीबत येही होती है की इनका कोई अपनी सत्ता वाला घर-मुल्क नहीं होता... यह इनके लिए सबसे बड़ी बात है l (इनके साथ अन्य भी छोटी छोटी कौमें जैसे इराक के yazidi log..भि रह सकते हैं.. और बाकी दुनिया इनको सुरक्षा डे.. अरबियो से .. हालाँकि यह शेखचिल्ली की बातें है ये मैं जानता हु...)
    तो कुछ स्पष्ट्र हो तो बेहतर l यह मैं लिख रहा हु.. आगाखानियों के सपोर्ट में.... l इस से पहले वाली मेरी कल की टिपण्णी प्राथमिक प्रतिक्रिया थी.. जो इस्लाम के नाम से ही भड़कने की होती है.. यानि दुखती नस पर किसी ने हाथ रख दिया हो .. वैसी थी.. l थोड़ी देर के बाद ... अब असली मामले को समज के और धर्मियो को धर्मियो ने सपोर्ट करना ही चाहिए यह जानके यह दुबारा लिख रहा हु l जय श्री राम l आगाखानियो को सलाम l

    उत्तर देंहटाएं
  7. देखें: यू ट्यूब पे : Pat Condell on Islam ...

    उत्तर देंहटाएं
  8. ऊपर मैंने ..भाग २, मुद्दा ६ के अंत की लाइनों में अभी कहा ..की ये लोग "सियसी" किताब खड़ी कर लें.. यह टाइपिंग की गलती है l ... जबकि मेरा मतलब था: "सम्प्रदाय" की नयी किताब ....l

    उत्तर देंहटाएं
  9. Dukaan ka name-plate ya board badalne se kya hota hai? Aagaakhaani "satpanth" ke naam se kuraan, muhammad aur islaami raaj ko hi aage badhaa rahe hain. Yeh muhammad ko ishwar declare karvaane ki baat hai. Muhammad hi allah hai yeh toh kuran se dekh sakte hain, pachaaso baar.
    Aur Imaam paygambar nahin hain? Imaam ishwart ka roop hai, toh Shankaraacharyaji, anya dharmik mahapurush aaj tak ke sab, ishwar ke roop huey aur aaj bhi hain na? Zinda? Aur publik bhi toh ishwar ka roop hai na? Fir muhammad aur imaamo ko maan-ne ki zarurat kya? Yaani ghuma-fira ke vaapas vahin ke vahin. Islaam-muhammad-kaafir-nafrat-jihaad-vinaash etc. Chaar kos chale aur miyaan tther ke tther.
    Aur allah ki soorat bhi kuraan mein hai hi. Apne samose mein thoda masala-mutter dusro se extra le ke usko apne naam pe chalaanaa,
    aur jihaad jaayaz hi thahrana, yeh dhokha hai. gaayatri, shankar aur buddh ko leke kya? baat toh muhammad hi aakhiri paygambar ki pakde rahenge na ye log? "Imaam" aur "paygambar" shabd ka bhram jaal hai, ji. Imaam paygambar nahin na? Yani muhammad aakhiri? yani ghuma fira ke baat toh vahi hui: Islaam last and final, aur muhammad bhi. Yaani baaki sab ko hazam karke, inka naam mitaake, raaj-naam toh islam aur muhammad ka hi karna.
    Aur allah ki soorat ke baare mein aagaakhaani log/mazhab islaam se bilkul bhi alag nahin hain. Dono mein allah ki soorat hai.

    Aagaakhaanio ne kuran-muhammad ko maan-ne ke koi dhaarmik ya aitihaasik kaaran nahin hain. Unka kaaran adharm hi hai, kyuki muhammad aur kuraan aa gaye toh kaafir, nafrat-jihad etc. toh aa hi gaya.
    Aagaakhaanio kj baaki normal jeevan ki taareef kartew hain hum. Lekin kya ye log kaabaa mein shiv mandir athva arabia mein har ghaaon mein hindu mandir banvaane denge? vahaan jaake logon ko hindu banaane ke baare mein ye log kya kehte hain? aur bhi bahut sawaal hain. Inkli saamaanya sajjantaa ek tarf hai aur inka mat-mazhab alag baat hai.
    Muhammad ko toh allah ki soorat yani roop maan-naa toph duniya ke liye impossible hai. Ye sab musalmaan ya arbi log bhale maante rahein, kuchh bhi. Baat yeh hai ki aaj vo bandh media ka zamana nahiun raha jismein sab media kisi na kisi ke maaliki ke thhe. Ab internet hai jiska koi bhi maalik aur kabzedaar nahin. Isliye sab log jinki baat puraane media vaale rokte thhe, vo sab log internet pe toot pade hain.Ismein toh muhammad aur islaam ke har ek minute ka hisab khullam khulla rakh diya hai logo ne. Aise 300 karod kaaafir hain is subject ko roz paddhte hain ... aur baaki 250 karod kaafir bhi jald sab kuchh jaan lenge. Ab isko koi bhi nahin rok sakta. Ab muhammad ko paygambar manvaanaa impossible hai. Islam ka Jay-Shree Raam ho jaane vala hai, ab.
    Agar islaam chhodna hai toh nayaa naam aur sab le lo. Purana sab chhod do. Kaunsa islam, muhammad, kuraan allah, arabia etc?

    उत्तर देंहटाएं
  10. https://play.google.com/store/apps/details?id=com.touchscreen.bollywoodquiz

    Checkout this free Bollywood puzzle game.

    उत्तर देंहटाएं