मंगलवार, 10 नवंबर 2015

मुसलमान काफिर की स्तुति करते हैं !!

इस्लाम   ने सम्पूर्ण   मानव  जाति को  मोमिन और काफिर ऐसे  दो वर्गों   में  बाँट रखा  है  , मोमिन  को  मुस्लमान या ईमान  वाले  भी  कहा  गया है, और  खुद   को  मोमिन साबित  करने  के  लिए कलमा  पढ़ना अनिवार्य   है  , इसलिए  जो  भी व्यक्ति  कलमा  नहीं  पढता  वह इस्लाम  की  दृष्टि  में  काफ़िर   माना  जाता   है  , इस्लाम  में  काफिरों  को  कलमा  पढ़ा  कर  मुस्लिम   बनाना धार्मिक   कर्तव्य समझा  जाता   है  , कुरान  के अनुसार  काफिर अल्लाह  की  कृपा  से  वंचित रहेंगे  , और क़यामत   के  दिन उनको  जहन्नम   की  आग में  झोंक  दिया    जायेगा  . इसलिए  कुरान में  काफिरों   के लिए  दुआ   करने  की  मनाही  है .लेकिन  आपको   यह  बात  जानकर  घोर  आश्चर्य होगा  कि मुसलमान एक  ऐसे  व्यक्ति के  लिए  दुआ     करते  हैं , जिसने   रसूल   के  सामने ही  कलमा  पढ़ने  से  इंकार  कर  दिया   था  , और कह  दिया  के  मैं अपने  पूर्वज  के धर्म  पर  कायम  हूँ  ,यह पता  होने  पर  भी मुस्लमान उस  काफिर के लिए वैसे ही शब्दों में सलाम  भेजते  हैं   , जैसे रसूल   को  भेजते हैं . यह व्यक्ति   और  कोई   नहीं  बल्कि    रसूल  के  सगे  चाचा (Uncle )  अबू  तालिब   थे .

1-अबू  तालिब   का  परिचय 

अबु  तालिब  रसूल  के  चाचा थे , रसूल   के पिता  अब्दुल्लाह  सगे  भाई  थे   , इनके  पिता   यानि  रसूल  के  दादा ( )   का नाम "अब्दुल मुत्तलिब - عبد المطلب  " था , अबु तालिब   का  जन्म  सन 549  ई ०  में  और  देहांत सन  619  में  हुआ  था , इनके  पिता अब्दुल  मुत्तलिब  कुरैश  के  सरदार  थे  , इन्हीं  ने मक्का के जमजम  नामके जल कुण्ड  की खुदाई  की  थी  , इसलिए  रसूल  के  कबीले  कुरैश   के  लोग  उनका  बहुत  सम्मान  करते  थे  , इनके  देहांत   के  बाद कुरैश   की सरदारी  और  काबा की  देखभाल  अबु  तालिब  को मिली थी  , क्योंकि  जब छोटे   थे  तभी उनके पिता अब्दुलाह  गुजर  गए  थे , इसलिए बालक  मुहम्मद  पालन  पोषण अबू  तालिब  ने  ही  किया  था  , अबू  तालिब  ने ही  काबा   की  मरम्मत  और  विस्तार   कराया  था  , अबु  तालिब  काबा  के संरक्षक   भी  थे , अबु  तालिब अपने  भतीजे  मुहम्मद  को   बहुत   चाहतेथे  , यहाँ तब    मुहमद  साहब  ने काबा   की  सभी मूर्तियां तुड़वा डालीं तब भी  अबु तालिब खामोश  रहे , और  जब  मुहमद  साहब   ने  इस्लाम  के  नाम  पर  नया धर्म चलाया  तो अरब  के लोग  मुसलमान  बन  गए  , लेकिन अबूतालिब  पर इसलाम   का  कोई  असर  नहीं  पड़ा , वह  मरते  समय  तक  अपने  पिता  अब्दुल  मुत्तलिब  के  धर्म  पर  ही  डटे रहे  अर्थात  काफिर  ही बनेरहे ,
मुहम्मद  साहब ने   बहुत   प्रयास  किया  कि दूसरों   की  तरह  उनके  चाचा  अबू  तालिब   भी  मुसलमान   बन  जाएँ लेकिन वह अपने  प्रयास में  असफल  हो  गए   , आखिर  कह  दिया  कि ,

2-मुस्लिम बनाना अल्लाह का  काम है 


"हे  नबी  तुम जिसे  चाहो मार्ग ( इस्लाम )  पर  नहीं   ला  सकते  ,परन्तु अल्लाह  जिसे  चाहता  है  मार्ग   पर  ले आता   है  "
सुरा -अल  कसस 28:56 

"(O Prophet!) Verily, you guide not whom you like, but Allah guides whom He will."(28.56) 

हदीस  के  अनुसार यह आयात  कुरान में विशेष  रूप  से  अबू तालिब  के बारे में   कही  गयी    है   ,


And then Allah revealed especially about Abu Talib:--'Verily! You (O, Muhammad) guide not whom you like, but Allah guides whom He will.' (28.56)
"

 وَأَنْزَلَ اللَّهُ فِي أَبِي طَالِبٍ، فَقَالَ لِرَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏{‏إِنَّكَ لاَ تَهْدِي مَنْ أَحْبَبْتَ وَلَكِنَّ اللَّهَ يَهْدِي مَنْ يَشَاءُ‏}‏   "

सही बुखारी  - जिल्द 6 किताब 60 हदीस 295

काश   वह जिहादी  कुरान  की  इस आयात  और  हदीस   को  ध्यान  से  पढ़ें  जो  आतंक  से  लोगों  को  मुस्लमान बनाने  में  लगे   है  , वास्तव में ऐसे  लोग दूसरों  को  मुस्लमान  बनाने की  बजाय  अल्लाह के  काम   में हस्तक्षेप करने  से  खुद  काफिर  बन रहे  हैं

3-अबू तालिब  का कलमा से इंकार 


जब  अबू तालिब मृत्यु   शय्या  पर पड़े  थे ,रसूल  उनके  पास  गए , पास  में  ही अबू जहल  भी  था  , रसूल  ने  कहा " हे चाचा बोलिए "ला इलाह इल्ल्लल्लाह "  ( "अय उम कुल ला इलाह  इल्ल्लल्लाह -   أَىْ عَمِّ، قُلْ لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ‏   "  ) रसूल दिखाना   चाहते  थे  कि अल्लाह  के  सामने उनकी  सिफारिश   करूँगा, तभी  अबू  जहल  और उमर बिन  उमय्या  ने  पूछा "हे  अबू  तालिब  क्या  तुम अब्दुल  मुत्तलिब ( अपने पिता )   का  धर्म   छोड़ रहे  हो ? उन्होंने    कई   बार ऐसा  पूछा  , आखिर  अबू  तालिब  ने कहा  मैं अब्दुल  मुत्तलिब  के  धर्म पर  कायम  हूँ .("अला मिल्लते अब्दुल   मुत्तलिब - عَلَى مِلَّةِ عَبْدِ الْمُطَّلِبِ‏ ")



[When Abu Talib was on his deathbed, the Holy Prophet   went to him while Abu Jahl was sitting beside him. The Holy Prophet (saww) said to him:

“O Uncle! Say LAA ILAAHA ILLALLAH – an expression with which I will defend your case before Allah ”. Abu Jahl and Abdullah bin Umayyah said, “O Abu Talib! Will you leave the religion of Abdul-Muttalib?” They kept saying this till Abu Talib’s last statement was, “I am on the religion of Abdul-Muttalib”



"‏"‏ أَىْ عَمِّ، قُلْ لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ‏.‏


".‏ فَقَالَ أَبُو جَهْلٍ وَعَبْدُ اللَّهِ بْنُ أَبِي أُمَيَّةَ يَا أَبَا طَالِبٍ، تَرْغَبُ عَنْ مِلَّةِ عَبْدِ الْمُطَّلِبِ فَلَمْ يَزَالاَ يُكَلِّمَانِهِ حَتَّى قَالَ آخِرَ شَىْءٍ كَلَّمَهُمْ بِهِ عَلَى مِلَّةِ عَبْدِ الْمُطَّلِبِ‏ "

सही बुखारी  -जिल्द  5  किताब58 हदीस 223


इस हदीस  से सिद्ध  होता है  कि रसूल     चाचा  अबु तालिब  ने रसूल  के सामने  ही  कलमा बोलने यानी  मुस्लिम  होने  से  साफ़  इंकार कर  दिया  था ,और मरते दम  तक काफिर बने  रहे .

4-काफिर  जहन्नम आग  में नीचे होंगे 

जब रसूल   के  कहने  पर भी  अबूतालिब   ने  न  तो  कलमा  पढ़ा  और न  अपना  धर्म छोड़ा   तो इसके   बारे में  हदीस   बताती  है  ,

"अब्बास  बिन अब्दुल   मुत्तलिब  ने रसूल  से  कहा  तुम  अपने चाचा के  लिए  कुछ   नहीं   कर  रहे  ,जबकि  उन्होंने तुम्हें   बचाया   है   ,लेकिन तुम  उलटे उन से नाराज     हो  गए  ,तब   रसूल   ने   कहा  वह  जहन्नम आग में    निचले   भाग  में  हैं "

 Narrated Al-Abbas bin 'Abdul Muttalib:
That he said to the Prophet "You have not been of any avail to your uncle (Abu Talib) (though) by Allah, he used to protect you and used to become angry on your behalf." The Prophet said, "He is in a shallow fire, and had It not been for me, he would have been in the bottom of the (Hell) Fire." (

‏ هُوَ فِي ضَحْضَاحٍ مِنْ نَارٍ، وَلَوْلاَ أَنَا لَكَانَ فِي الدَّرَكِ الأَسْفَلِ مِنَ النَّارِ ‏"‏‏.‏  "


सही बुखारी  - जिल्द 5 किताब 58  हदीस 222

5-काफिरों  के  लिए  दुआ   नहीं  करो 

मुहम्मद  साहब  अपने  चाचा   के कलमा   न  पढने  से इतने  रुष्ट   हो  गए  कि  कुरान  में  सभी  काफिरों और मुश्रिकों  के  बारे  यह  आयत  उतार डाली  .

"रसूल और  मुसलमानों  के लिए यह उचित नहीं  कि वे  मुश्रिकों  के लिए  क्षमा  के  लिए   दुआ  करें  , चाहे  वह  उनके  रिश्तेदार  ही  क्यों  न हों  "

"مَا كَانَ لِلنَّبِيِّ وَالَّذِينَ آمَنُوا أَنْ يَسْتَغْفِرُوا لِلْمُشْرِكِينَ وَلَوْ كَانُوا أُولِي قُرْبَىٰ  "


"It is not fitting for the Prophet and the believers to ask Allah's Forgiveness for the pagans, even if they were their near relatives,"9:113
 सूरा -अत तौबा 9:113 

कुरान  और  हदीस के इन आदेशों  के वावजूद  मुसलमान  अबू  तालिब को  सलाम  भेज  कर  उनकी स्तुति  करते  हैं  , जिस  तरह  रसूल को सलाम  भेजते  हैं  , अबू  तालिब   को सलाम  भेजने  के  लिए अरबी  में  काफी बड़ी स्तुति  है जिसके पहले कुछ अंश  दिए जा रहे हैं ,


6-अबू  तालिब  की स्तुति 

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا سَيِّدَ الْبَطْحَآءِ وَابْنَ رَئِيْسِهَا
अस्सलामु  अलैक या  सय्यदुल  बतहाअ व्  इब्ने  रईसुहा 
अर्थ -सलाम  हो आप  पर  हे  ,मक्का के  नेता  और उसके मुखिया  के पुत्र

 اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا وَارِثَ الْكَعْبَةِ بَعْدَ تَاْسِيْسِهَا
अस्सलामु  अलैक या  वारिसुल  काबा बअद तासीसुहा 
अर्थ -सलाम  हो आप  पर  हे  ,काबा के  वारिस और  उसकी  बुनियाद रखने  वाले

 اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا كَافِلَ رَسُوْلِ اللهِ
अस्सलामु  अलैक या काफ़िल  रसूल्लल्लाह 
अर्थ-  सलाम  हो आप  पर  हे  ,रसूल   की  रक्षा  करने वाले

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا حَافِظَ دِيْنِ اللهِ

अस्सलामु  अलैक या  हाफ़िज़  दीनुल्लाह
अर्थ - सलाम  हो आप  पर  हे  ,अल्लाह   के धर्म  की  रक्षा करने वाले

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا عَمَّ الْمُصْطَفٰى
अस्सलामु  अलैक या अम्मुल  मुस्तफा
अर्थ-  सलाम  हो आप  पर  हे  ,मुस्तफा ( मुहम्मद )  के  चाचा


हो  सकता  है कि मुसलमानों   का  एक वर्ग  अबू  तालिब   को  काफ़िर    बताये  और  दूसरा   वर्ग  उनको  पक्का  मुस्लमान   बताये  ,  लेकिन   हमे इस  विवाद  में  नहीं  पड़ना   है  ,हमारी  दृष्टि  में तो अबू  तालिब  एक सत्यप्रिय    और  साहसी  महान   व्यक्ति  थे  , जिन्होंने    मुहम्मद  साहब  के  सामने ही   कलमा  पढ़ने  से  इंकार  कर  दिया  , और  साबित   कर  दिया  कि  इस्लाम   कोई धर्म   नहीं   है   , और  जन्नत  ,जहन्नम  कोरी  कल्पना  हैं ,हम  तो   बस  यही   कह  सकते  हैं   कि
 

''अबू तालिब  नमस्तुभ्यं इस्लाम प्रपंच  विनाशकः , साहसी सत्यवक्ता  च रसूल मुख चपेटकः "


हे अबू  तालिब  आपको  नमस्कार  ,  आपने  इस्लाम  के  पाखण्ड    का   नाश  कर  दिया ,  और  निडरता  से (कलमा  से इंकार करके ) सत्यवक्ता होकर  रसूल  के   मुंह चपेट  सी   लगा  दी.

(301)

http://www.duas.org/abutalibas.htm

3 टिप्‍पणियां:

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  2. पैगम्बर मोहमद(paigambar mohammad )का पेट या इतर का कारखाना
    मित्रो खुदा गवाह है की प्रथ्वी पर मोहम्मद से बड़ा रसूल कोई नहीं है ,सजके जाऊं मै अल्लाह के इसे रसूल पर ,जिसने धरती पर लोगों को जीना सिखाया। जीना ही नहीं सिखाया बल्कि इस्लाम के अनुयाइयों को एसा बेशकीमती तोफा भी दिया जिससे आज तक मोमिनो (पैगम्बर के अरबी अनुयाइयों ) के बदन से महक फूटती रहती है।
    एक हदीस के अनुसार पैगम्बर जब खेतों में मल त्याग करने जाते थे, तो वे जिस डले से अपना पिछवाडा साफ़ करते थे,तो उनके अनुयाई उस डले के लिए आपस में झगड़ते थे.क्योकि उस हदीस के अनुसार उस डले से इतर की खुशबु आती थी.(तल्विसुल शाह जिल्द शाह सफा ८ )
    जब डले में इतनी खुशबु आती होगी तो मल (पैगम्बर की टट्टी) तो पूरा का पूरा इतर का डब्बा होता होगा । पैगम्बर के अनुयाई डले के ऊपर ही झगड़ते थे किसी ने भी खेत में पड़े मल की तरफ ध्यान नहीं दिया। अफ़सोस की बात है ।
    अगर पैगम्बर की पूरी जिन्दगी में करी गयी टट्टी को उनके अनुयाई एकत्र कर लेते तो उससे आज मुसलमानों का इतर का खर्चा कितनी हद तक बच जाता । मुसलमानों की आर्थिक स्थिति (मुस्लिम नेता बहुत शोर मचाते है की मुसलमानों की आर्थिक स्थिति बहुत ख़राब है ) भी कुछ हद तक सुधरी होती। क्यों की मुसलमान इतर व खुशबु की चीजे बहुत प्रयोग में लाते हैं।कितना पैसा बचता।
    भारतीय मुसलमानों के पूर्वजों (हिन्दू)की किस्मत ख़राब थी कि वे मोहम्मद की टट्टी पूछा डला सूंघने से रह गए।और न ही उनके किसी संत,महात्मा व ऋषि की टट्टी से इतर की महक आती थी ।
    काश पैगम्बर जैसा कोई दोबारा से हिंदुस्तान में पैदा हो,जिससे उनकी टट्टी पूछा डला,हम हिन्दुस्तानियों के हिस्से में आये।ताकि हम हिन्दुस्तानी भी अरब के श्रेष्ठ लोगो की बराबरी पर आ सके।
    (धन्य हो प्यारा पैगम्बर)

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  3. ha ha satay likha mohmmad badbudar insan ho sakta ahin accha nahi ...rasul allah k pet se paida huye honge sayad ..

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