शनिवार, 21 नवंबर 2015

जेहाद की आय का साधन

इस्लाम के कई देश इस समय आतंकवाद से प्रभावित हैं। यह भी सच है कि इनमें अधिकांशत: इस्लामी जेहाद के नाम पर फैलाया जाने वाला आतंकवाद है। यदि हम एक सच्चे मुसलमान की परिभाषा को समझना चाहें तो हम देखेंगे कि इस्लाम में जहां हत्या, बलात्कार, चोरी, झूठ, निंदा-चुगली आदि को इस्लाम में प्रतिबंधित या इन्हें ग़ैर इस्लामी बताया गया है वहीं शराब नोशी से लेकर शराब के उत्पादन अथवा कारोबार में शामिल होने तथा ऐसी किसी भी नशीली वस्तु के प्रयोग अथवा उसके उत्पादन या कारोबार में संलिप्त होने को भी गैर इस्लामी कृत्य करार दिया गया है। इस्लाम में इस प्रकार की वस्तुओं के सेवन तथा इस धंधे में शामिल होने को गुनाह भी करार दिया गया है। प्रश्न यह है कि क्या जेहाद के नाम पर दुनिया में आतंकवाद फैलाने वाले मुस्लिम परिवारों के आतंकी सदस्य इस वास्तविकता से परिचित हैं या नहीं?और यदि हैं तो वे उसपर कितना अमल करते हैं। वास्तव में इन स्वयंभू इस्लामी लड़ाकों के जेहन में किस कद्र सच्चा इस्लाम बसता है और यह आतंकी इस्लामी शिक्षाओं पर कितना अमल करते हैं तथा कितना समर्पण रखते हैं।
पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में पिछले दिनों एक प्रतिष्ठित मीडिया ग्रुप के एक खोजी पत्रकार द्वारा जेहाद के नाम पर अपना सब कुछ कुर्बान कर देने का जबा रखने वाले एक आतंकवादी से गुप्त रूप से मुलांकात कर उसका साक्षात्कार किया गया। अमजद बट्ट नामक इस तीस वर्षीय पंजाबी युवक के कंधे पर जहां ए के 47 लटकी हुई थी वहीं उसकी कमर में एक रिवाल्वर भी लगी नार आ रही थी। उसने अपना परिचय देते हुए यह बताया कि पहले तो वह स्वयं अफीम, स्मैक, हेरोइन जैसे तमाम नशे का आदी था और बाद में इसी कारोबार में शामिल हो गया। उसने बताया कि नशीले कारोबार में शामिल होने के बाद आम लोग उसे गुंडा कहने लगे। बट्ट ने यह भी स्वीकार किया उसे न तो नमाज अदा करनी आती है न ही कुरान शरींफ पढ़ना। और इसके अतिरिक्त भी किसी अन्य इस्लामी शिक्षा का उसे कोई ज्ञान नहीं है। परंतु इसके बावजूद अमजद बट्ट का हौसला इतना बुलंद है कि वह इस्लाम के नाम पर किसी की जान लेने या अपनी जान देने में कोई परेशानी महसूस नहीं करता। पाकिस्तान का पंजाब प्रांत, पाक अधिकृत कश्मीर तथा पाक-अंफंगान सीमांत क्षेत्र एवं फाटा का इलाक़ा ऐसे लड़ाकुओं से भरा पड़ा है जो इस्लामी शिक्षाओं को जानें या न जानें, और उनपर अमल करें या न क रें परंतु इस्लाम के नाम पर मरना और मारना उन्हें बख़ूबी आता है। आतंकी अमजद बट्ट के अनुसार जब उसने नशीले कारोबार के रास्ते पर चलते हुए अपने आप को जुर्म की काली दुनिया में धकेल दिया उसके बाद उसके संबंध जेहाद के नाम पर आतंक फैलाने वाले आतंकी संगठनों से भी बन गए।
यहां एक बार फिर यह काबिले जिक्र है कि जेहादी आतंकवाद की जड़ें वहीं हैं जिनका जिक्र बार-बार होता आ रहा है और इतिहास में यह घटना एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो चुकी है। अर्थात् सोवियत संघ की घुसपैठ के विरुध्द जब अफगानी लड़ाकुओं ने स्वयं को तैयार किया उस समय इन लड़ाकुओं ने जिन्हें तालिबानी लड़ाकों के नाम से जाना गया,सोवियत संघ के विरुद्ध खुदा की राह मे जेहाद घोषित किया। इस कथित जेहादी युद्ध में जहां अशिक्षित अंफंगानी मुसलमान सोवियत संघ के विरुद्ध एकजुट हुए वहीं इसी दौरान अमेरिका ने भी सोवियत संघ के विरुद्ध तालिबानों को न केवल सशस्त्र सहायता दी तथा अफगानिस्तान में इन लड़ाकुओं के प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करने में भी उनकी पूरी मदद की बल्कि उन्हें नैतिक समर्थन देकर उनकी हौसला अफजाई भी की। इनमें से कई ट्रेनिंग कैंप ध्वस्त तो ारूर हो चुके हैं परंतु इनमें प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके तमाम आतंकी अभी भी मानवता के लिए सिरदर्द बने घूम रहे हैं। अमजद बट्ट ने भी एक ऐसे ही प्रशिक्षण केंद्र से जेहादी पाठ पढ़ा तथा हथियार चलाने की ट्रेनिंगा ली। उसके अनुसार जब वह प्रशिक्षण प्राप्त कर हथियार लेकर अपने गांव लौटा तो कल तक अपराधी व गुंडा नजर आने वाला व्यक्ति अब उसके परिवार, ख़ानदान तथा गांव वालों को ख़ुदा की राह में मर मिटने का हौसला रखने वाला एक समर्पित जेहादी मुसलमान नार आने लगा। उसे देखकर तथा उससे प्रेरित होकर उसी के अपने ख़ानदान के 50 से अधिक युवक एक ही बार में जेहादी मिशन में इसलिए शरीक हो गए कि कहीं अमजद बट्ट अल्लाह की राह में जेहाद करने वालों में आगे न निकल जाए।
आगे चलकर यही लड़ाके किसी न किसी आतंकी संगठन जैसे लश्करे तैयबा,जैशे मोहम्मद, हरकत-उल-अंसार अथवा लश्करे झांगवी जैसे आतंकी संगठनों से रिश्ता स्थापित कर उनके द्वारा निर्धारित लक्ष्यों पर काम करने लग जाते हैं। इन सभी संगठनों का गठन भले ही अलग-अलग उद्देश्यों को लेकर किया गया रहा हो। परंतु यह सभी सामूहिक रूप से मानवता को नुंकसान पहुंचाने वाले ग़ैर इस्लामी काम अंजाम देने में लगे रहते हैं। उदाहरण के तौर पर लश्करे झांगवी का गठन पाकिस्तान में सर्वप्रथम शिया विरोधी आतंकवादी कार्रवाईयां अंजाम देने हेतु किया गया था। इस संगठन पर शिया समुदाय को निशाना बनाकर सैकड़ों आतंकी हमले किए गए। उसमें दर्जनों हमले ऐसे भी शामिल हैं जो इन के द्वारा मस्जिद में नमाज पढ़ते हुए मुसलमानों पर या इमामबाड़ों व मोहर्रम के जुलूस आदि का निशाना बनाकर किए गए। अब यही संगठन अपने आपको इतना सुदृढ़ आतंकी संगठन समझने लगा है कि इसने पाकिस्तान में अपने हितों को नुंकसान पहुंचाने वालों को भी निशाना बनाना शुरु कर दिया है। इसके सदस्य पाकिस्तान में सेना विरोधी आतंकी कार्रवाईयों में भी पकड़े जा चुके हैं।
इसी प्रकार लश्करे तैयबा जिसका गठन कश्मीर को स्वतंत्रता दिलाने के उद्देश्य से किया गया था इसने भी अपने निर्धारित लक्ष्य से अलग काम करने शुरु कर दिए। इस संगठन पर भी जहां भारत में तमाम निहत्थे बेगुनाहों की हत्याएं करवाने का आरोप है वहीं इस संगठन पर पाकिस्तानी सेना के एक सेवानिवृत जनरल की हत्या का भी आरोप है। मानवता के विरुध्द संगठित रूप से अपराधों को अंजाम देने वाले ऐसे संगठन यादातर अपने साथ गरीब व निचले तबंके के अशिक्षित युवाओं को यह कहकर जोड़ पाने में सफल हो जाते हैं कि यहां उन्हें दुनिया की सारी चीजें तो मिलेंगी ही साथ ही उनके लिए अल्लाह जन्नत के रास्ते भी खोल देगा। और इसी लालच में एक अनपढ़, बेराजगार और मोटी अक्ल रखने वाला मुसलमान नवयुवक अपने आपको जेहादी आतंक फैलाने वाले संगठनों से जोड़ देता है। इस समय पाकिस्तान में अधिकांश आतंकी संगठन जो भले ही अलग-अलग उद्देश्यों को लेकर गठित किए गए थे परंतु अब लगभग यह सभी आतंकी ग्रुप अमेरिका, भारत तथा इनके हितों को निशाना बनाने के लिए अपनी कमर कस चुके हैं।
पाकिस्तान की ही तरह अंफंगानिस्तान में भी इस्लामी जेहाद का परचम जिन तथाकथित इस्लामी जेहादियों के हाथों में है उन की भी वास्तविक इस्लामी हंकींकत इस्लामी शिक्षाओं से कोसों दूर है। तालिबानी मुहिम के नाम से प्रसिद्ध इस विचारधारा में संलिप्त लड़ाकुओं की आय का साधन अंफगानिस्तान में होने वाली अंफीम की खेती है। यह भी दुनिया का सबसे ख़तरनाक नशीला व्यापार है। एक अनुमान के अनुसार विश्व के कुल अंफीम उत्पादन का 93 प्रतिशत अफीम उत्पादन केवल अंफंगानिस्तान में होता है। यहां लगभग डेढ़ हाार वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में इसकी घनी पैदावार होती है। सन्2007 के आंकड़े बताते हैं कि उस वर्ष वहां 64 बिलियन डॉलर की आय अफीम के धंधे से हुई थी। इस बड़ी रक़म को जहां लगभग 2 लाख अंफीम उत्पादक परिवारों में बांटा गया वहीं इसे तालिबानों के जिला प्रमुखों, घुसपैठिए लड़ाकों, जेहादी युद्ध सेनापतियों तथा नशाले धंधे के कारोबार में जुटे सरगनाओं के बीच भी बांटा गया। उस समय अंफीम का उत्पादन लगभग 8200 मीट्रिक टन हुआ था। यह उत्पादन पूरे विश्व की अफीम की अनुमानित खपत का 2 गुणा था।
ड्रग कारोबार का यह उद्योग केवल अफ़ीम तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसी अफ़ीम से विशेष प्रक्रिया के पश्चात 12 प्रतिशत मारंफिन प्राप्त होती है तथा हेरोइन जैसे नशीले पदार्थ का भी स्त्रोत यही अफ़ीम है। तालिबानी लड़ाकों की रोजी-रोटी, हथियारों की ख़रीद-फरोख्त तथा उनके परिवारों के पालन पोषण का मुख्य साधन ही अफ़ीम उत्पादन है। एक ओर जहां ईरान जैसे देश में ऐसे कारोबार से जुड़े लोगों को मौत की साज तक दे दी जाती है वहीं अपने को मुसलमान, इस्लामी, जेहादी आदि कहने वाले यह तालिबानी लडाके इसी गैर इस्लामी धंधे की कमाई को ही अपनी आय का मुख्य साधन समझते हैं। यही तालिबानी हैं जोकि औरतों को सार्वजनिक रूप से मारने पीटने तथा अपमानित करने जैसा गैर इस्लामी काम प्राय:अंजाम देते रहते हैं। स्कूल तथा शिक्षा के भी यह प्रबल विरोधी हैं। निहत्थों की जान लेना तो गोया इनकी रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल हो चुका है। ऐसे में क्या यह सवाल उठाना जाया नहीं है कि उपरोक्त सभी गैर इस्लामी कामों को अंजाम देने वालों को यह अधिकार किसने और कैसे दिया कि वे धर्म, इस्लाम और जेहाद जैसे शब्दों को अपने जैसे अधार्मिक प्रवृति वालों के साथ जोड़ सकें। क्या यह इस बात का पुख्ता सुबूत नहीं है कि इस्लाम आज गैर मुस्लिमों के द्वारा नहीं बल्कि स्वयं को जेहादी व तालिबानी कहने वाले ऐसे ही आतंकी मुसलमानों के हाथों बदनाम हो रहा है जिन्हें वास्तव में स्वयं को मुसलमान कहलाने का हंक ही नहीं है परंतु इस्लाम धर्म के दुर्भाग्यवश यही स्वयंभू रूप से इस्लामी जेहादी लड़ाके बन बैठे हैं।

यही है जेहाद की असली हकीकत.

(294)


1 टिप्पणी:

  1. साहब तो फिर मुसलमान इसका विरोध करने की बजाय स्पोर्ट् क्यों करते हैं आंतकवादी पकड़ा जाए तो सबसे पहले मुस्लिम ही उसकी पैरवी करते हैं और देशद्रोही होने पर भी उसके जनाजे को त्योहार में बदल देते हैं असल में इस्लाम आंतकवाद का पर्यायवाची है!

    उत्तर देंहटाएं