सोमवार, 7 दिसंबर 2015

मुसलमान किसके वफादार ?

इस समत विश्व में लगभग 200 देश हैं ,जिनमे अपना अपना संविधान और अपने नियम कानून लागू है .और अलग शासन प्रणाली है .और कुछ इस्लामी देश हैं ,लेकिन कुछ ऐसे गैर मुस्लिम देश भी हैं जहाँ मुसलमानों की अच्छी खासी जनसंख्या मौजूद है .हरेक देश चाहता है कि उस देश के निवासी संविधान और देश के कानून के प्रति निष्ठावान وفي  (Loyal )और  वफादार बनें ,ताकि सबको न्याय मिल सके .और देश में शांति व्यवस्था बनी रहे .
लेकिन देखा गया है कि ,मुसलमान जिस भी गैर मुस्लिम देश में रहते हैं ,उसके संविधान और कानून कि अनदेखी करते रहते है .और किसी न किसी बहाने उस देश की सरकारों ने लिए समस्याएं पैदा करते रहते है .चाहे उनको कितनी भी सुविधाएँ क्यों न दी जाएँ .
इसका कारण यह है कि मुसलमान मानव निर्मित किसी भी कानून या नियम को अपूर्ण और अनुपयुक्त मानते है .मुसलमानों के अनुसार केवल इस्लाम ही एकमात्र पूर्ण कानून या दीन الدِّين  (Law )है .जो अल्लाह ने बनाया है .देखिये कुरान क्या कहता है -
1 -इस्लाम सम्पूर्ण कानून है 
"आज के दिन हमने उम्हारे लिए दीन ( Law ) को परिपूर्ण कर दिया है और केवल इस्लाम को ही तुम्हारे लिए धर्म नियुक्त कर दिया है "
सूरा -मायादा -5 :3
2 -किसी को अपना हितैषी नहीं मानों 
"हे लोगो अल्लाह के अलावा किसी को अपना मित्र या संरक्षक नहीं मानों "सूरा-अल कहफ़ 18 :26
"जो अल्लाह के अलावा किसी को भी अपना मित्र या संरक्षक बनाएगा उसे कोई सहायता नहीं करो "सूरा -अन निसा 4 :123
3 -दुनिया के स्वामी मुसलमान है 
"हे मुहम्मद तुम्हारे आगे और पीछे और उसके बीच में जितनी भी भूमि है ,वह तुम्हारी है .केवल तुम्हीं उसके एकमात्र स्वामी हो "
सूरा -मरियम 19 :64
4 -सिर्फ शरियत का कानून मानों 
"हे ईमान वालो ,तुम केवल रसूल के बताये आदेशों (शरियत ) को मानों ,और यदि किसी भी प्रकार का विवाद हो तो ,रसूल के बताये गए आदेशों के अनुसार ही फैसला करो "सूरा -अन निसा 4 :59
"तुम्हारे बीच में किसी बात का फैसला केवल अल्लाह के नियमों के अनुसार ही हो सकता है .याद रखो इस तरह से इमान वालों के मुकाबले में काफिरों को कोई रास्ता नहीं मिल सकेगा "सूरा -अन निसा 4 :141
5 -ताकत के बल पर दूसरों को निकालो 
"और जो सबसे अधिक बलशाली हो ,वह अपने से कमजोरों को अपने क्षेत्र से निकाल दे ,क्योंकि आसमानों और जमीन के सभी संसाधन और उन पर प्रभुत्व अल्लाह ने अपने रसूल और मुसलमानों के लिए दिए है "सूरा -मुनाफिकून 63 :7 और 8
6 -जनमत की परवाह नहीं करो 
"चाहे लोगों का कुछ भी मत (इच्छा ) हो उम उसका पालन नहीं करो .जो उसका पालन करे तो जानलो कि इस गुनाह (इच्छा पालन )के अल्लाह उसको किसी संकट में डालना चाहता है ."सूरा मायदा 5 :49
7 -भाईचारा नहीं रखो 
" ईमान वालो ,को चाहिए कि ,वह किसी गैर ईमान वाले को अपना मित्र नहीं बनायें ,और उनसे दूरी बना कर बचते रहें .जैसा कि तुमको उन से बचने का हक़ दिया गया है ,फिर भी जो उनसे भाईचारा बनाएगा तो ,समझ लो उसे अल्लाह से कोई नाता नहीं है "सूरा -आले इमरान 3 :28
8 -झगडा करो .अशांति फैलाओ 
"जो लोग सच्चे धर्म (इस्लाम ) को अपना दीन (धर्म )नहीं मानते है ,और अपने ही धर्म को मानते है ,तुम उन से लड़ते रहो .और इतना लड़ो कि वह अप्रतिष्ठित हो कर जजिया देने पर विवश हो जाएँ "सूरा अत तौबा 9 :29
9 -मुहमद की हड़प नीति 
"अबू हुरैरा ने कहा कि रसूल ने कहा कि ,जब तुम किसी काफ़िर ,मुशरिक या ईसाई से व्यवहार करो तो उन से इन तीन प्रकार से बर्ताव करो ,यदि वह ख़ुशी से कुछ दे दें तो स्वीकार कर लो ,फिर उनको इस्लाम काबुल करने की शर्त रखो ,यदि वह यह शर्त नहीं मानें तो उनसे जजिया की मांग करो .फिर यदि वह जजिया नहीं देते ,तो उनकी लोगों को बंधक बना लो ,और फिरौती ले लो .यदि फिर भी इस्लाम नहीं करते तो उनसे युद्ध करो "सही मुस्लिम -किताब 19 हदीस 4294
10 -सम्पूर्ण पृथ्वी मुसलमानों की बपौती है 
"अबू हुरैरा ने कहा कि एक बार हम रसूल के साथ मस्जिद में बैठे थे ,तभी रसूल न कहा चलो हम यहूदियों के गाँव "बैतूल मिदरास"चलें ,वहां जाकर रसूल ने यहूदियों से कहा कि यदि तुम लोग इसी वक्त इस्लाम कबूल कर लोगे तो तो तुम सुरक्षित बच जाओगे .क्या तुम्हें यह पता नहीं है कि ,पृथ्वी पर जितनी भी भूमि है ,वह रसूल और मुसलमानों की है .इसलिए तुम्हारे पास जितनी भी सम्पति और जमीं है सब रसूल के हवाले कर दो .और हम तुम्हें केवल इतनी अनुमति है कि हैं कि तुम अपनी सम्पति बेचकर जा सकते हो "बुखारी -जिल्द 4 किताब 53 हदीस 392 .
यह बात तो साबित हो चुकी है कि मुसलमान किसी भी देश के कानून और संविधान पर निष्ठां नहीं रखते .और भी गैर मुस्लिम देश में रहते हैं उस देश को खोखला करते रहते है .और नयी नयी मांगे करते रहते है .फिर भी उनकी मांगें सपाप्त नहीं होंगी .जैसे अगर पूरा कश्मीर भी मुसलमानों को मिल जाये तब भी वह भारत का और हिस्सा मांगेंगे .
असल में मुसलमान देशों की भौगोलिक ,और राजनीतिक सीमाओं को नहीं मानते है इस्लामी कूटनीतिज्ञों और चालाक मुल्लों ने विश्व को कुरान और हदीसों के अधार इन भागों में बाँट रखा है .जिन्हेंدار  दार या House कहा जाता है .इन्हीं  6 वर्गों ध्यान में रख कर ही मुस्लिम देश अन्य देशो के साथ कोई सम्बन्ध या समझौता
 (Treaty )करते हैं .इस्लाम के अनुसार विश्व को इन वर्गों में विभाजित किया गया है -
1 -दारुल इस्लाम : دارالاسلام  House of Peace इसको दारुल तौहीद دارُالتوحيد  भी कहा जाता है .यस उस भूभाग को कहा जाता है ,जहाँपर इस्लामी हुकूमत होती हो .और जहाँपर मुसलमान निडर होकर अपनी गतिविधियाँ चला सकें .दारुल इस्लाम मुसलमानों गढ़ होता है .अबू हनीफा ने यह नाम कुरान की इन आयतों से लिया था ."अल्लाह तुम्हें सलामती के घर (दारुल इस्लाम ) की ओर बुलाता रहता है ,ताकि तुम सीधे रास्ते पर चलो "
सूरा -यूसुफ 10 :25
(इसी आयत की तफ़सीर में लिखा है "जहाँ पर मुसलमानों की हर प्रकार की सुरक्षा हो ,और जहाँ से वह जिहाद करें तो उनपर कोई आपत्ति नहीं आये "इसी तरह लिखा है "और अल्लाह मुसलमानों के लिए ऐसा सलामती का घर (दारुल इस्लाम ) चाहता है जहाँ पर उनके मित्र और संरक्षक मौजूद हों "सूरा-अल अनआम 6 :128 .इसी दारुल इस्लाम का सपना दिखा कर जिन्ना ने मुसलमानों को पाकिस्तान बनवाने के लिए प्रेरित किया था .
क्योंकि जिन्ना की नजर में भारत ناپاك  नापाक (अपवित्र ) देश था ,और जिन्ना पाक پاك  (पवित्र )देश پاكِستان   बनाना चाहता था .
2 -दारुल हरब : دارالحرب House of War .युद्ध का घर ,यह उस भूभाग को कहा जाता है जहाँ गैर मुस्लिमों की संख्या अधित हो .या गैर मुस्लिम सरकारे हों ,या जहाँ पर प्रजातंत्र (Democracy ) चलती हो .या जिनका मुस्लिम देशों से विवाद हो .और यदि दारुल हरब के लोग दारुल इस्लाम में जाएँ तो उनको निम्न दर्जे का व्यक्ति या जिम्मी Zimmi मानकार जजिया लिया जाये .या कोई अधिकार नहीं दिया जाये
3 -दारुल अमन : دارالامن House of Safty .बचाव का घर यह उस भूभाग को कहा जाता है ,जहाँ अधिकांश गैर मुस्लिम रहते हों ,लेकिन मुसलमानों को भी कोई न कोई अधिकार दिया गया हो .या जहाँपर इस्लाम को खतरा होने का भय नहीं लगे .इस्लाम इस वर्गीकरण के अनुसार भारत भी एक "दारुल अमन "है .क्योंकि यहाँ मुसलमानों को हिन्दुओं से अधिक अधिकार प्राप्त हैं .
4 -दारुल हुंदा :دارالهنُنده  House of Calm .विराम का घर ,यह उस क्षेत्र को या उस देश को कहा जाता है ,जिसका किसी मुस्लिम देश से युद्ध या झगडा होता रहता हो .लेकिन किसी कारण से लड़ाई बंद हो गयी हो .और भविष्य में या तो समझौते की गुंजायश हो ,या फिर युद्ध की संभावना हो .और यह एक प्रकार की waite and watch की स्तिथि होती है
5 -दारुल अहद :دارُالعهد  House of Truce .युद्ध विराम का घर ,इसे दारुल सुलहدارالسُلح   या House of Treaty भी कहा जाता है ,यह उन देशो को कहा जाता है ,जिन्होंने मुस्लिम देशो से किसी प्रकार की कोई संधि या समझौता कर लिया हो .औए जिसे दोनो देशों के आलावा दुसरे मुस्लिम देशो ने स्वीकार कर लिया हो .
6 -दारुल दावा : دارُالدعوة House of Invitation .आह्वान का घर ,यह उन देशों या उन क्षेत्रों या उन इलाकों को कहा जाता है जहाँ गई मुस्लिम हों और जिनको मुसलमान बनाने के लिए कोशिश करना जरुरी हो .यहाँ के लोग इस्लाम के बारे में अधिक नहीं जानते हो .(ऐसे भूभाग को दारुल जहलियाدارالجاهلِية  या House of ingorant खा जाता है )और फिर किसी भी उपाय से उस भूभाग को दारुल इस्लाम में लेन की योजनायें बने जाती है या फिर उस क्षेत्र को कहा जाता है जहाँ के मुसलमान कट्टर नहीं होते हैं और उनको कट्टर बनाने की जरूरत हो ,ताकि उनको जिहादी कामों में लगाया जा सके .और इस काम के लिए उस क्षेत्रों में जमातें भेजी जाती है

इस लेख से हमें यह समझ लेना चाहिए कि मुसलमानों ने विश्व के देशो या किसी देश के भूभाग या किसी क्षेत्र को जो अलग अलग दार या Houses में बाँट कर विभाजित किया है .वह राजनीतिक ,या भौगोलिक सीमाओं के आधार पर नहीं है .इस्लामी परिभाषा में "दार "कोई देश ,प्रान्त ,जिला या उसका कोई हिस्सा भी हो सकता है .और इन्हीं दार के house के हालात देख कर मुसलमान अपनी रणनीतियाँ तय करते है जैसे कहीं शांत हो जाते हैं और कही आतंकवाद को तेज कर देते हैं .मुसलमानों का एकमात्र उद्देश्य और लक्ष्य इन सब "दार "को दारुल इस्लाम के दायरे में लाने का है .ताकि दुनिया में " विश्व में इस्लाम राज्य Pan Islamic State "की स्थापना हो सके .
मुसलमानों की तरह Catholic Church ने भी देशों को बाँट रखा है .
आज इस बात की अत्यंत जरुरत है कि हम मुसलमानों कि कुटिल नीतियों और नापाक मंसूबों विफल करने का यत्न करते रहें ,और देश को
दारुल इस्लाम बनाने से रकने के लिए पूरी ताकत लगा दें .और इस पवित्र कार्य में लोगों को उत्साहित करें और हरेक साधनों का उपयोग करें .तभी देश और धर्म बच सकेगा .
(87/27)

www.TheReligionofPeace - Islam Loyalty to Non-Muslim Governments.htm

1 टिप्पणी:

  1. aur poori duniya ko musalmaan banaane ke liye jhagda, maramari, rape, loot, aagzani, dusro ki badnaami, vinaassh, dhokhaadhadi, dusro ke kaamkaaj-business ko khatm karna hat tarah se, aur aise karke ya toh dusro ko saaf karke ya majboor karna... yeh sab "allah ki raah mein liye gayer punya-kaarya hain, jis ke liye jannat aur usmein anek schemes" hain.
    Aur jannat mein jaa ke har musalmaan ko 70 logon ko swarg mein bulaane ka quota mila hota hai .... yaani haq. So sabmiya log ek dusre ko madad karte hain tabligh yanidusro ko musalmaan banaane mein. Taaki khud madad karne se bhi jannat ke haqdaar baney... aur agar pahla musalmaan jannat mein jaaye toh baaki madad karne vaalo ko bhi jannt mein bulaaye... uske quota se.
    Yeh musalmaan jab bhi kahte hain ki yeh nationalist hain... ya raasjtravaadi hain... toh unka matlab .. "pakistan nationalism" hota hai... jo banaane ka yahaan sapna dekh rahe hote hain... aur uspe kaam kar rahe hote hain.

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