सोमवार, 6 जून 2016

मक्का में शैतान की मूर्ति !!

कुछ समय  पहले एक    मुस्लिम  युवा   ने सवाल   किया  था  ,कि आप  लोग धातु  , मिटटी  और पत्थरों  की  मूर्तियों   की  पूजा  क्यों  करते हो ? क्या  आपके  भगवान  इनके  भीतर  घुसे हुए हैं ? भला   यह  बेजान    मूर्तियां  भी कुछ  महसूस  कर  सकती   हैं  ?    जो  आपकी  दुआएं  सुन  लेंगी ?

हम इस  लेख   के  माध्यम   से  उन हजरत   से  पूछना  चाहते  हैं   कि  मुसलमान  हज  के  दौरान शैतान  को मारने  के  लिए "जमरात " नामक खम्भे  पर  पत्थर  क्यों  मारते हैं ? क्या  शैतान  उनमे  घुसा हुआ  है  , ?और  अगर शैतान  उनमे  हैं  ,तो  इतने  बरसों  तक  पत्थर  मारने  पर  भी  शैतान  अब तक  क्यों   नहीं  मरा ? जबकि पत्थर   मरने   वाले  हजारों  हाजी  मर  गए , क्या अल्लाह   की  तरह  शैतान   भी अमर है ?

1- शैतान  का  परिचय 

इस्लाम से  काफी  समय  पहले  से ही अरब  के  लोग शैतान   को  अल्लाह  का प्रतिद्वंदी  शक्तिशाली   मानते   थे  , इस्लामी   मान्यता  के  अनुसार  शैतान    भी  अल्लाह   की   तरह  अमर  है   , लेकिन शैतान   का  जन्म  लगभग   साठ  हजार   पहले   हुआ   था   , शैतान    को  कुरान   में "इबलीस -  ابليس "  भी   कहा  गया   है  , परन्तु   उसका  असली   नाम  "अजाजील -   عزازيل  "   है   , जो तौरेत यानि  बाइबिल के शब्द "अजाज एल - עֲזָאזֵל "से  लिया  गया   है . हिन्दी    में  इसका  अर्थ   ईश्वर  की  फटकार   है (Damnation of God )

वास्तव    में   इब्लीस  एक  जिन्न  है  ,जिसे अल्लाह   ने "मुअल्लिमुल मलकूत - معلم الملكوت "   यानी फ़रिश्तों का  सरदार  बना  दिया  था .इब्लीस  के  पिता  का नाम खबीस है ,जिसका  चेहरा सिंह  की  तरह   है  , और  वैसा   ही  स्वभाव   है .इब्लीस  की   माँ  का  नाम " निलबीस  " है  , जिसका  चेहरा शेरनी  की  तरह   है   , यह  उग्र     स्वभाव  की  है .  इब्लीस  की  पत्नी   का   नाम "तरतबा "  है,इब्लीस  के  पांच   लडके  हैं    ,  उनके   नाम  और  काम   इस  प्रकार   हैं  ,                  

1.ताबर-लोगों के मन में विकार, भ्रम, जटिलता और मन की व्याकुलता उत्पन्न  करता   है

2.आवर- दुष्कर्मों  की  प्रेरणा   देता   है

3.मसौत-झूठ    बोलने  और  धोखा  देने   की  प्रेरणा   देता   है

4.वासिम -परिवार  और  रिश्तेदारों  में झगडे  और  समाज   में  दंगे करवाता   है

5. जकनबार -बाजारों   में  विवाद और अफवाहें  फैला   कर लोगों  में लड़ाई   करवाता  है

2-शैतान  का सिंहासन  समुद्र  में  है 

जो   मुर्ख   लोग  शैतान   को  पत्थर   मारने के  लिए  मक्का   जाते  हैं   ,  उन्हें  पता  होना  चाहिए  कि शैतान समुद्र में  रहता  है   , जैसा  कि इस हदीस  में  कहा  गया   है  ,

"जबीर  बिन  अब्दुल्लाह  ने  कहा   कि रसूल   ने बताया   है कि "शैतान   का  सिंहासन समुद्र  में  है ( The throne of Iblis is upon the ocean  ). अरबी   में "इन्न अर्शुल इबलीस अला बहर- إِنَّ عَرْشَ إِبْلِيسَ عَلَى الْبَحْرِ  "


सही  मुस्लिम - किताब 39  हदीस 6754

3-शैतान  को पत्थर मारने का रिवाज 
नौवीं  शताब्दी   में पैदा हुए   इतिहासकार     "अल   अजरकी   -  الأزرقي "ने  अपनी  किताब    "अखबार मक्का -  اخبار مكة "   में  मक्का  का  इतिहास लिखा  है .   इसमे  मक्का में  इस्लाम  से  पहले  के रिवाज , दन्तकथाएं   और   मान्यताओं   का   विस्तृत विवरण  दिया गया  है ,    इसके  साथ  मुहम्मद  साहब   की  मृत्यु  तक  यानी  सन 603  ई ० तक  मक्का  में  होने वाली  घटनाओं   का  विवरण  भी दिया  है .  अजरकी  ने  मक्का में  हाजियों  द्वारा ईंट  पत्थर   से निर्मित स्तम्भ(Pillar)  को  पत्थर  मारने की  परम्परा  का  भी  उल्लेख   किया  है  , लोग उसे  शैतान  मानते  हैं , यह  रिवाज   हजारों  साल  पुराना  है  , पीढ़ी  दर पीढ़ी   लोग इसी रिवाज  को मानते आये  हैं , यद्यपि  कुरान   में  शैतान   को  पत्थर  मारने  का  आदेश  कहीं  नहीं     दिया  है  , कारण पूछने  पर  लोग  कहते  हैं  ,
"और जब  यह  कोई  अनैतिक   काम  करते  हैं   ,तो  कहते   हैं की हमने  यह अपने  पूर्वजों  को  ऐसा  करते  हुए पाया  है  , हमें तो  अल्लाह  ने  यही  हुक्म   दिया  है "
सूरा -अल  आराफ 7:28 

   शैतान   को  पत्थर मारने  की  परंपरा  के  पीछे   मक्का  के  लोगों  में  एक  कहानी   प्रचलित   है  ,जिसे अजरकी  ने  लिखा है   , इसके अनुसार
 जब  इब्राहिम  मीना  नामकी  जगह  छोड़  कर अकबा गए  तो  उनको गंदे  पत्थरों  के ढेर के पीछे  छुपा   हुआ  शैतान   दिखा  , तभी  जिब्राइल  ने  उन से कहा  इस शैतान  को  पत्थर   मार  कर  भगा  दो  .इस  से शैतान  भाग   गया  लेकिन  फिर  वहीँ  छुप   गया  , इब्राहिम   ने  फिर  पत्थर  मारे  , ऐसा दो   बार  हुआ  . तब  जिब्राईल   ने  इब्राहिम  से कहा  शैतान   को  सात  पत्थर   मारो  , तभी  यह  भागेगा  , इब्राहिम   ने ऐसा  ही  किया  , और शैतान   दूर  कहीं चला  गया . तभी   से  यह   रिवाज    शुरू   हो गया

4-शैतान   का  कद  बढ़  गया 
यदि   हम  कहें कि जैसे  जैसे  मुसलमानों   में  शैतानी प्रवृत्ति    बढ़ने  लगी   वैसे ही   शैतान  के   स्तम्भ    का  कद  भी   बढ़   गया   है ,तो  इस  बात  में कोई  झूठ   नहीं    है   , क्योंकि   सऊदी  सरकार  ने  सन 2004  में शैतान   के  छोटे  स्तम्भ    को  तोड़   कर  नया  और  बड़ा  स्तम्भ  बनवा  दिया  है .यह  26  मीटर  यानी  85  फुट   लंबा  है   ,  इसके  आगे  एक  पुल  भी    बनवा  दिया  गया  है  ,  ताकि   लोग  इस  पर  चढ़   कर  शैतान  के  स्तम्भ   पर  पत्थर   मार  सकें , इस  स्तम्भ  को  अरबी  में "अल   जमरात  الجمرات‎ - "  कहा  जाता   है 

1.पुराने  स्तम्भ   की  फोटो 

http://www.cuttingthroughthematrix.com/images/StoningofSatan.jpe

2.नये स्तम्भ   की  फोटो 

http://www.islamicinvitationturkey.com/wp-content/uploads/2012/10/esmaeeli20121026173802210.jpg

5-शैतान  को  पत्थर   मारने  की विधि 

शैतान  को  पत्थर   मारने   को  अरबी   में "रमी  अल  जमरात  -  رمي الجمرات‎   " कहा  जाता   है   , इसके  लिए  नियम इस  प्रकार   हैं ,1.जिल  हज  की  10 तारीख को  हाजी  मुजदलीफा    से  निकलें  और  मीना  के  रास्ते  से  पत्थर  जमा  करें  ,2 .पत्थर   न  तो  बहुत  बड़े  हों  और न छोटे  हों .3.सुन्नत  के अनुसार  सात (7 ) पत्थर   जमा   कर के  रख  लें .4.मीना  आने  पर सूर्योदय   से  पहले पत्थर  नहीं  मारें .5.हाजी जमरात   पर  सात  पत्थर  मारें  ,  लोग  शैतान  पर धिक्कार  करने के लिये अपने  जूते  , सैंडिल   और अन्य  गंदी  चीजें     भी    फेक   कर  मार  देते  हैं

6-शैतान  को  पत्थर कब  मारें ?

इसके बारे   में  यह  हदीस बताती   है   ,

वाबरा  ने  इब्न  उमर से पूछ  कि  हम शैतान  पर  पत्थर   कब  मार  सकते  हैं ? उमर  ने   कहा जब  तुम्हारे  दल  का   मुखिया (इमाम )  आदेश  करे यानी  पत्थर  मारे  तभी   शैतान  पर  पत्थर  मारना .

Narrated Wabrah,I asked Ibn 'Umar: When should I throw pebbles at the jamrah? He replied: When your imam (leader at Hajj) throws pebbles

"، عَنْ وَبَرَةَ، قَالَ سَأَلْتُ ابْنَ عُمَرَ مَتَى أَرْمِي الْجِمَارَ قَالَ إِذَا رَمَى إِمَامُكَ فَارْمِ ‏.‏ فَأَعَدْتُ عَلَيْهِ الْمَسْأَلَةَ فَقَالَ كُنَّا نَتَحَيَّنُ زَوَالَ الشَّمْسِ فَإِذَا زَالَتِ الشَّمْسُ رَمَيْنَا ‏.‏ "

Sunan Abi Dawud - Book 10, Hadith 1967

7-पत्थर  मारने वालों  की  मौत 
शैतान  के स्तम्भ   पर  पत्थर   मारने  के लिए   हाजियों   में  धक्कामुक्की   और   भगदड़    हो   जाती  है   ,  और शैतान   पर   पत्थर  मारने   वाले  खुद   मर   जाते   है  ,  जैसा   इसी  साल   में  हुआ  है   ,  मुहम्मद  साहब  के  सामने   भी  ऐसा  हुआ  था  ,  जिसका  विवरण   इस  हदीस   में   है  ,

अब्दुल्लाह   इब्न  बुरैदा   ने  अपने  पिता  से  सुना  कि  एक  औरत  शैतान   को पत्थर   मारते   समय  दूसरी   औरत  से गुथ  गयी   ,  जिस   से  उसके  पेट  का  गर्भ  गिर  गया.  तब रसूल   ने  उस  बच्चे   के लिए  दिय्या (   ) मुआवजे  के  रूप में  पचास  भेड़ें   उस  औरत   को  दीं ,और   लोगों  को  पत्थर  मारना   बंद  करने  को   कहा

a woman threw some pebbles and stuck another woman, and she miscarried. The Messenger of Allah stipulated (a Diyah of ) fifty sheep for her child. And on that day, he forbade throwing pebbles.

، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ بُرَيْدَةَ، عَنْ أَبِيهِ، أَنَّ امْرَأَةً، خَذَفَتِ امْرَأَةً فَأَسْقَطَتْ فَجَعَلَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي وَلَدِهَا خَمْسِينَ شَاةً وَنَهَى يَوْمَئِذٍ عَنِ الْخَذْفِ ‏.‏ أَرْسَلَهُ أَبُو نُعَيْمٍ ‏.‏ "
"

 Sunan an-Nasa'i - Vol. 5, Book 45, Hadith 4817

8-कोसने  से शैतान शक्तिशाली  हो जाता है 
 
इस्लाम  से  पहले  से भी अरब   लोगों  में रिवाज  था  कि जब  कोई  काम  बिगड़ जाता  था , या  किसी  तरह   की  अड़चन  पैदा हो   जाती  थी  , तो  वह शैतान  को  कोसने  लगते   थे  , और कह  देते  थे  कि शैतान    मर  जाये , या शैतान  पर   लानत   हो  . अरबों   की  यह  परंपरा  मुहम्मद साहब  के  समय  से भी  थी ,  और आज   भी  जारी   है   , लोग ज़रा सी  बात  पर  भी  शैतान  को  जिम्मेदार   बता   कर  उसकी  मौत की  बद दुआ  देने  लगते  थे  ,  जैसा  इस  हदीस  में  कहा  गया  है   ,

अबु  तमीमा  अल  हुज़ैमा  ने  कहा  की  एक   बार  मैं रसूल के पीछे उनके  गधे   पर  बैठ   कर जा रहा   था  , तभी   वह  गधा  रास्ते   में  अड़  गया  , यह देख  कर  मैं  बोल  पड़ा  कि "शैतान  का नाश  हो  ( Let Satan perish) ,अरबी  में "युहलिक अश्शैतान -  يهلك الشيطان"यह  सुन कर  रसूल   ने  कहा ऐसा  नहीं  कहो   इस  से शैतान  और बड़ा   हो   जायेगा  ,  बल्कि   कहो   बिस्मिल्लाह   इस  से  शैतान  एक   मच्छर  से भी  छोटा    हो  जायेगा

मुसनद  इमाम  अहमद ( مسند أحمد )  Vol. 5 p. 59 
 

यही   बात  इस  हदीस  में  इस प्रकार   कही   गयी   है  , तुम  यह  नहीं  कहो  कि शैतान  का नाश  हो,और   न  यह  कहो  लि इन्नल इबलीस लईन -  لأنَّ إبْليسَ اللّعِينَ " यानी   शैतान  के  लिए  लानत  हो  , ऐसा  कहने  से शैतान  की  शक्ति  बढ़  जाती  है .  इसलिए  तुम  कहो   अल्लाह  के  नाम  से  ‘( In the name of Allah ) .    इस  से   वह  अपमानित  महसूस करेगा  
 
सुन्नन   अबी  दाऊद  - किताब  अल  अदब  42  हदीस 4982

 इन हदीसों  से  सिद्ध   होता  है कि मुसलमान  शैतान लानत   भेज  भेज  कर  उसकी  शक्तियों  में वृद्धि कर रहे   है  ,यही  कारण  है  कि  इस्लामी देशों  में शैतान   का  राज  है  , कहीं  शान्ति  नहीं  है .इन  सभी  प्रमाणों  से  सिद्ध   होता   है कि इस्लाम  की   मान्यताएं   , रिवाज   और  परंपरा     तर्कहीन   और  अंधविश्वास   पर  आधारित    हैं   . जब   मुसलमान  एक  स्तम्भ   में  शैतान  का निवास  मानते   हैं   . जो  एक  प्रकार   की   मूर्ति  पूजा  ही  है   , तो  उनको  हिन्दुओं   की  मूर्ति  पूजा   पर कटाक्ष  करने    का  कोई  अधिकार  नहीं  . मुस्लमान   ऐसा  इसलिए करते हैं   , क्योंकि उनके  सभी   नबी  और  रसूल  शैतान   के प्रभाव   से  ग्रस्त   थे   ,जैसा  कि खुद   कुरान   में  लिखा  है ,

"हे  मुहम्मद  तुम से  पहले जो   भी   नबी  और  रसूल   हमने  भेजे शैतान    ने उनकी   कामना   में असत्य  मिला  दिया  था  , "सूरा  अल हज 22:52 


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रविवार, 5 जून 2016

मेराज का असली राज़ !

मेराज अरबी भाषा का शब्द है , वैसे तो इसका अर्थ "Ascension " या आरोहण होता है .लेकिन इस्लामी विद्वान् इसका तात्पर्य "स्वर्गारोहण "करते हैं .इनकी मान्यता है कि मुहम्मद एकही रात में मक्का से यरूशलेम तक की यात्रा कर आये थे और वहां स्थित अक्सा नाम की मस्जिद में नमाज नमाज भी पढ़ कर आये थे,जो एक महान,चमत्कार था .लेकिन सब जानते हैं कि केवल मान्यता के आधार पर ऐतिहासिक सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता है .मुहम्मद की इस तथाकथित "मेराज " का असली राज (रहस्य ) क्या है ,यह आपके सामने प्रस्तुत किया जा रहा है .
यह कहावत प्रसिद्ध है कि"झूठ के पैर नहीं होते "इसका तात्पर्य है कि यदि कोई व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए या दूसरों को प्रभावी करने के लिए झूठ बोलता है ,अथवा गप्प मरता है ,तो उसका ऐसा झूठ अधिक समय तक नहीं चलता है .और एक न एक दिन उसके झूठ का भंडा फूट ही जाता है .
मुहम्मद एक गरीब बद्दू परिवार में पैदा हुआ था ,और उसके समय के यहूदी और ईसाई काफी धनवान थे .और मुहम्मद उनकी संपत्ति हथियाना चाहता था .इसलिए सन 610 में मुहम्मद ने खुद को अल्लाह का रसूल घोषित कर दिया ,ताकि वह यहूदी और ईसाई नबियों के बराबरी करके लोगों को अपना अनुयायी बना सके .लेकिन जब लोगों को मुहम्मद की बे सर पैर की बातों पर विश्वास नहीं हुआ तो ,ने एक चल चली .तब तक मुहम्मद की नुबुवत को 12 साल हो चुके थे .मक्का के लोग मुहम्मद को पागल और जादूगर समझते थे ,इसलिए मुहम्मद ने लोगों का मुंह बंद करने के 27 तारीख रजब (इस्लाम का सातवाँ महीना ) सन 621 ई० को एक बात फैला दी ,कि उसने एक दिन में मक्का से यरूशलेम तक की यात्रा कर डाली है .जिसकी दूरी आज के हिसाब से लगभग 755 मील या 1251 कि.मी होती है .मुहम्मद की इस यात्रा को "मेराज معراج" कहा जाता है .मुहम्मद ने लोगों से कहा कि उसने यरूशलेम स्थित यहूदियों और ईसाइयों के पवित्र मंदिर में नमाज भी पढ़ी ,जिसका नाम यह है .

Temple in Jerusalem or Holy Temple (Hebrew:" בֵּית־הַמִּקְדָּשׁ, Beit HaMikdash ;बैत हमिकदश "
Al-Aqsa Mosque (Arabic:المسجد الاقصى al-Masjid al-Aqsa, मस्जिदुल अक्सा

फिर मुहम्मद ने लोगों का विश्वास जीतने के लिए यरूशलेम की तथाकथित मस्जिद और यात्रा का पूरा विवरण लोगों के सामने प्रस्तुत कर दिया .मुहम्मद के इस झूठ को बेनकाब करने के लिए पहले हम इस यात्रा के बारे में कुरान और हदीस से सबूत देखेंगे फिर इतिहास से प्रमाण लेकर सत्यता की परख करते हैं .और निर्णय पाठक स्वयं करेंगे .
1 -मुहम्मद की यरूशलेम यात्रा 

मुहम्मद की मक्का के काबा से यरूशलेम स्थित अक्सा की मस्जिद तक की यात्रा के बारे में कुरान यह कहता है ,
"महिमावान है वह अल्लाह जो अपने रसूल मुहम्मद को "मस्जिदे हराम (काबाكعبه )से(मस्जिदे अक्सा "(यरूशलेम )की मस्जिद तक ले गया .जिस को वहां के वातावरण को बरकत मिली .ताकि हम यहाँ के लोगों को वहां की निशानियाँ दिखाएँ " सूरा -बनी इस्रायेल 17 :1 
2 -मुहम्मद की सवारी क्या थी 

इतनी लम्बी यात्रा को एक दिन रात पूरा करने के लिए मुहम्मद ने जिस वहां का प्रयोग किया था ,उसका नाम "बुर्राकبُرّاق "था .इसके बारे में हदीस में इस प्रकार लिखा है .
"अनस बिन मलिक ने कहा कि रसूल ने कहा था मुझे बैतुल मुक़द्दस की यात्रा के बुर्राक नाम का जानवर दिया गया था ,जो खच्चर (Mule) से छोटी और गधी से कुछ बड़ी थी .और जब मैं बुर्राक पर बैठा तो वह मस्जिद की सीढियां चढ़ गया ,फिर मैंने "masjidمسجد " के अन्दर दो रकात नमाज पढ़ी .और जब मैं मस्जिद से बाहर जाने लगा तो जिब्राइल ने मेरे सामने दो कटोरे रख दिए ,एक में शराब थी और दुसरे में दूध था ,मैंने दूध ले लिया .फिर जिब्रील मुझे बुर्राक पर बिठाकर मक्का छोड़ गया ,फिर दौनों जन्नत लौट गए "सही मुस्लिम -किताब 1 हदीस 309 

3-लोगों की शंका और संदेह 

लोगों को मुहम्मद की इस असंभव बात पर विश्वास नहीं हुआ ,और वह मुहम्मद को घेर कर सवाल करने लगे ,तब मुहम्मद ने कहा ,
"जबीर बिन अब्दुल्लाह ने कहा ,कि रसूल ने कहा जब कुरैश के लोगों ने मेरी यरूशलेम कि यात्रा के बारे में संदेह जाहिर किया ,तो मैं काबा के पास एक पत्थर पर खड़ा हो गया .और वहां से कुरैश के लोगों को बैतुल मुक़द्दस का आँखों देखा विवरण सुनाने लगा ,जो मैंने वहां देखा था "
बुखारी -जिल्द 4 किताब 6 हदीस 233 
"इब्ने अब्बास ने कहा जब रसूल से कुरैश के लोगों ने सवाल किया तो रसूल उन सारी जगहों का वर्णन सुनाने लगे जो उन्होंने यरूशलेम स्थित बैतुल मुक़द्दस की यात्रा के समय रास्ते में देखी थीं .फिर रसूल ने सबूत के किये कुरान की सूरा इस्रायेल 17 :60 सुनादी .जिसमे अल्लाह ने उस जक्कूम के पेड़ पर लानत की थी ,जो रसूल को यरूशलेम के रास्ते में मिला था "
बुखारी -जिल्द 5 किताब 58 हदीस 228 

इस हदीस में कुरान की जिस आयत को सबूत के तौर पर पेश किया गया है ,वह यह है
"हे मुहम्मद जब लोगों ने तुम्हें घेर रखा हो ,तो तुम सबूके लिए उन दृश्यों को याद करो ,जो हमने तुम्हें बताये हैं ,और जिनको हमने लोगों की आजमाइश के लिए बना दिया था .तुम तो उस पेड़ को याद करो जिस पर कुरान में लानत की गयी है .हम इसी निशानी से लोगों को डराते है"
सूरा -बनी इस्रायेल 17 :60 
 (इस पेड़ को अरबी में "जक्कूम زقّوم" कहा जाता और हिदी मे"थूहर ,या थूबड़ Cactus कहते हैं अंगरेजी Botany  में इसका नाम "Euphrobia abyssinica " है .यह पेड़ अरब , इस्रायेल और अफरीका में सब जगह मिलता है .मुहम्मद ने कुरान में इसी पेड़ को सबूत के रूप में पेश किया है सूरा -17 :60 )
( नोट -इसी को कहते हैं कि"कुएं का गवाह मेंढक" )

4 -मुहम्मद का सामान्यज्ञान 
लगता है कि मुहम्मद में बुद्धि(GK) नाम की कोई चीज नहीं थी ,क्योंकि जब उस से बैतुल मुक़द्दस के बारे में जानकारी पूछी गयी तो वह बोला ,
"अबू जर ने कहा कि मैंने रसूल से पूछा कि पृथ्वी पर सबसे पहले अल्लाह की कौन सी मस्जिद बनी थी ,रसूल ने कहा "मस्जिदे हराम "यानि मक्का का "काबा "फिर हमने पूछा की दूसरी मस्जिद कौन सी है ,तो रसूल ने कहा "मस्जिदुल अक्सा "यानि यरूशलेम की मस्जिद ,फिर हमने पूछा की इन दौनों मस्जिदों के निर्माण के बीच में कितने सालों का अंतर है ,तो रसूल ने कहा इनके बीच में चालीस सालों का अंतर है "
बुखारी - जिल्द 4 किताब 55 हदीस 585 

अब तक मुहम्मद की यरूशलेम की यात्रा (मेराज Night Journey ) के बारे में कुरान और हदीसों से लिए गए सबूतों का हवाला दिया गया है .अब दुसरे भाग में इतिहास के प्रमाणों के आधार पर मुहम्मद और अल्लाह के दावों की कसौटी करते हैं ,कि इस दावे में कितनी सच्चाई और कितना झूठ
 है .जिसको भी शंका हो वह विकी पीडिया या दूसरी साईट से जाँच कर सकता है .पाठक कृपया इस लेख को गौर से पढ़ें फिर निष्पक्ष होकर फैसला करें
5 -बैतुल मुक़द्दस का संक्षिप्त इतिहास 

अबतक दी गयी कुरान की आयतों और हदीसों में मुहम्मद द्वारा यरूशलेम की यात्रा में जिस मस्जिद में नमाज पढ़ने का वर्णन किया गया है ,वह वास्तव में यहूदियों का मंदिर ( Temple ) था .जिसे हिब्रू भाषा में " मिकदिशמקדשׁ "कहा जाता है .इसका अर्थ "परम पवित्र स्थान यानी "Sancto Santorum" कहते हैं .इसका उल्लेख बाइबिल में मिलता है ( बाइबिल मत्ती -24 :1 -2 ) इस मंदिर को इस्लाम से पूर्व दो बार तोडा गया था ,और इस्लाम के बाद तीसरी बार बनाया गया था .इतिहास में इसे पहला ,दूसरा ,और तीसरा मंदिर के नाम से पुकारते हैं .इसका विवरण इस प्रकार है -
1 - पहले मंदिर का निर्माण और विध्वंस 

पहले मंदिर का निर्माण इस्रायेल के राजा दाऊद(David-דוד- ) के पुत्र राजा सुलेमान (Solomon-שלמן ) ने सन 975 ई ० पू में करवाया था .सुलेमान का जन्म सन 1011 ई पू और म्रत्यु सन 931 ई .पू में हुई थी सुलेमान ने अपने राज की चौथी साल में यह भव्य मंदिर बनवाया था ,और इसके निर्माण के लिए सोना ,चन्दन ,और हाथीदांत भारत से मंगवाए थे ( बाइबिल 1 राजा अध्याय 5 से 7 तक I-kings10:22 )
सुलेमान के इस मंदिर को सन 587 BCE में बेबीलोन के राजा "नबूकदनजर (Nebuchadnezzar ) ने ध्वस्त कर दिया था .और यहूदियों को गुलाम बना कर बेबीलोन ले गया था .जाते जाते नबूकदनजर मंदिर के स्थान पर अपने एक देवता की मूर्ति लगवा गया था .और सारा यरूशलेम बर्बाद कर गया था .
(बाइबिल -यिर्मयाह 2 :24 से 20 )
इसके बाद जब सन 538 ई .पू में जब ईरान के सम्राट खुसरू ( cyrus ) ने बेबीलोन को पराजित कर दिया तो उसने यहूदियों को आजाद कर दिया और अपने देश में जाने की अनुमति दे दी थी .लेकिन करीब 419 साल तक यरूशलेम में कोई मंदिर नहीं बन सका .
2 दूसरे मदिर का निर्माण और विध्वंस 
वर्षों के बाद जब सन 19 ई .पू में जब इस्रायेल में हेरोद (Herod ) नामका राजा हुआ तो उसने फिर से मंदिर का निर्माण करवाया ,जो हेरोद के मंदिर के नामसे विख्यात था ,यही मंदिर ईसा मसीह के ज़माने भी मौजूद था .लेकिन जब यहूदियों ने ईसा मसीह को सताया ,तो उन्होंने इस मंदिर के नष्ट होने की भविष्यवाणी कर दी थी ,जो बाइबिल में इस तरह मिलती है, -
."फिर जब यीशु मंदिर से निकलते हुए रास्ते में जा रहे थे तो उनके शिष्यों ने उनको मंदिर की ईमारत की भव्यता दिखाया ,तब यीशु ने कहा कि,मैं तुमसे सच कहता हूँ ,कि एक दिन इस मंदिर के पत्थर पर पत्थर नहीं बचेगा ,और सारा मंदिर ढहाया जायेगा "
बाइबिल नया नियम -मत्ती -24 :1 -2 ,मरकुस -13 :1 -2 ,और लूका -19 :41 से 45 ,और लूका -21 :20 -45 
ईसा मसीह के समय यरूशलेम पर रोमन लोगों का राज्य था ,और यहूदी उसे पसंद नहीं करते थे .इसलिए सन 66 ईसवी में यहूदियों ने विद्रोह कर दिया .और विद्रोह को कुचलने के लिए रोम के सम्राट " (Titus Flavius Caeser Vespasianus Augustus- तीतुस फ्लेविअस ,कैसर ,वेस्पनुअस अगस्तुस ) ने सन 70 में यरूशलेम पर हमला कर दिया .और लाखों लोग को क़त्ल कर दिया .फिर तीतुस ने हेरोद के मंदिर में आग लगवा कर मंदिर की जगह को समतल करावा दिया .और मंदिर कोई भी निशानी बाकि नहीं रहने दी .इस तरह ईसा मसीह की भविष्यवाणी सच हो गयी .


कुरान में भी इस घटना के बारे में उल्लेख मिलता है ,जो इस प्रकार है ,


"फिर हमने तुम्हारे विरुद्ध शत्रुओं को खड़ा कर दिया ,ताकि वह तुम्हारा चेहरा बिगाड़ दें ,और बैतुल मुक़द्दस के अन्दर घुस जाएँ ,जैसे वह पहली बार घुसे थे ,और उनको जोभी चीज हाथ में आई थी उस पर कब्ज़ा किया था .और मस्जिद को तबाह करके रख दिया था
सूरा -बनी इस्रायेल 17 :17 
इस प्रकार इतिहास ,बाइबिल और कुरान से साबित होता है कि सन 70 से मुसलमानों के राज्य तक यरूशलेम में कोई मंदिर या मस्जिद नहीं थे ,बल्कि उस जगह समतल मैदान था .मस्जिद का फिर से निर्माण खलीफाओं ने करवाया था ,जिसका विवरण इस तरह है ,
6 -मंदिर की जगह मस्जिद का निर्माण 

जब सन 638 उमर बिन खत्ताब खलीफा था ,तो उसने यरूशलेम की जियारत की थी .और वहां नमाज पढ़ने के लिए मदिर के मलबे को साफ करवाया था .और उसके सनिकों ने खलीफा के साथ मैदान में नमाज पढ़ी थी .बाद में जब उमैया खानदान में "अमीर अब्दुल मालिक बिन मरवानعبد الملك بن مروان"सन 646 ईस्वी में सुन्नियों का पांचवां खलीफा यरूशलेम आया तो उसने पुराने मंदिर की जगह एक मस्जिद बनवा दी ,जो एक ऊंची सी जगह पर है ,इसी को आज" मस्जिदुल अक्सा " Dom of Rock भी कहा जाता है .क्योंकि इसके ऊपर एक गुम्बद है .अब्दुल मालिक ने इस मस्जिद के निर्माण के किये "बैतुल माल" से पैसा लिया था ,और गुम्बद के ऊपर सोना लगवाने के लिए सोने के सिक्के गलवा दिए थे .आज भी यह मस्जिद इस्रायेल अरब के विवाद का कारण बनी हुई है .और दौनों इस पर अपना दावा कर रहे हैं
7 -खलीफा ने मस्जिद क्यों बनवाई 
अब्दुल मलिक का विचार था कि अगर वह यरूशलेम में उस जगह पर मस्जिद बनवा देगा ,तो वह यहूदियों और ईसाइयों हमेशा दबा कर रख सकेगा .क्योंकि दौनों ही इस जगह को पवित्र मानते है .लेकिन जब कुछ मुसलमानों ने इसे बेकार का खर्चा बता कर आपत्ति प्रकट की ,तो मलिक ने विरोधियों को शांत करने के लिए यह हदीस सुना दी ,
"अनस बिन मलिक ने कहा कि ,रसूल ने कहा ,यदि कोई घर में ही नमाज पढ़ेगा ,तो उसे एक नमाज का पुण्य मिलेगा ,और अगर वह अपने कबीले के लोगों के साथ नमाज पढ़ेगा तो ,उसे 20 नमाजों का पुण्य मिलेगा .और जुमे में जमात के साथ नमाज पढ़ने से 50 नमाजों का पुण्य मिलेगा .लेकिन यदि जोभी व्यक्ति यरूशलेम की "बैतुल मुक़द्दस " में नमाज पढ़ेगा तो उसे 50 हजार नमाजों का पुण्य मिलेगा "
इब्ने माजा-तिरमिजी -हदीस 247 ,और मलिक मुवत्ता-जिल्द 5 हदीस 17 
इस तरह से अब्दुल मलिक यरूशलेम में मुसलमानों की जनसंख्या बढ़वाना चाहता था ,की मुसलमान पुण्य प्राप्ति के लिए यरूशलेम में रहने लगें .
लेकिन सन 1862 मुसलमान यरूशलेम की मस्जिद में नमाज नहीं पढ़ सके थे .क्योंकि उसपर ईसाइयों का कब्ज़ा हो गया था .बाद में तुर्की के खलीफा "अब्दुल हमीदعبد الحميد "( 1878 -1909 )ने इंगलैंड के "प्रिंस ऑफ़ वेल्स Prince of Wels ) जो बाद में King Edward V II बना ,उस से अनुमति लेकर मस्जिद की मरम्मत करवाई और मुसलमानों को एक मेहराब के नीचे नमाज पढ़ने की आज्ञा प्राप्त कर ली थी .जो अभी तक चल रही है .
8-विचारणीय प्रश्न 
अब इन सभी तथ्यों और सबूतों को देखने का बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक हैं ,क़ि जब सन 70 से कर यानि हेरोद के मंदिर के ध्वस्त होने से .सन 691 तक यानी अब्दुल मालिक द्वारा मस्जिद बन जाने तक ,यरूशलेम में कोई मंदिर या मस्जिद का कोई नामोनिशान ही नहीं था ,केवल समतल मैदान था ,तो मुहम्मद ने सन 621 में यरूशलेम की अपनी तथाकथित यात्रा में किस मस्जिद में नमाज पढ़ी थी ?और लोगों को कौन सी मस्जिद का आँखों देखा वर्णन किया था ?क्या कुरान की वह आयतें 691 बाद लिखी गयी हैं ,जिन में मुहम्मद की यरूशलेम की मस्जिद में नमाज पढ़ने का जिक्र है .हम कैसे माने कि कुरान में हेराफेरी नहीं हुई ?क्या कोई अपनी मान्यता के आधार पर ऐतिहासिक सत्य को झुठला सकता है ?
आप लोग कृपया लेख दुबारा पढ़िए और फिर फैसला करिए .और बताइए कि ,यदि हम कुरान और हदीसों की पहले वाली बातों को सत्य मान लें ,तो हमें दूसरी हदीसों और इस्लामी इतिहास को झूठा साबित करना होगा .!
बताइये आप कौनसी बात पर विश्वास करेंगे ?


(200/3)


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