शनिवार, 11 अगस्त 2018

इस्लाम का आधार झूठी गवाही !!

यह एक प्रसिद्ध  कहावत  है कि  प्रत्यक्ष  को किसी प्रमाण  की जरुरत  नहीं  होती है .यानि सर्वमान्य सत्य  को साबित करने के लिए किसी गवाही  और साक्षी  की आवश्यकता  नहीं  होती . किसी भी अदालत  में गवाही की जरुरत तभी होती है ,जब तथ्य  यातो अपुष्ट होते  हैं ,या उनके सत्य होने में कोई शंका होती . लेकिन   किसी भी व्यक्ति  की गवाही उसी दशा में सही मानी जाती है ,जब गवाह मानसिक  रूप से स्वस्थ  हो और उसे की तरह  का भय  अथवा  लालच  नही दिया गया  हो .वर्ना  अदालत ऐसे  व्यक्ति की गवाही झूठी   और फर्जी   मान  लेती  है.
यह  बात  इस्लामी  मान्यता  अर्थात मुसलमानों  के ईमान  पर पूरी तरह  से लागु  होती  है .क्योंकि  मुहम्मद साहब  के समय  से आज तक  दुनिया भर की  मस्जिदों  में रोज  पांच  बार  अजान  देते समय  एक गवाही  दी  जाती  है .और चिल्ला चिल्ला कर कहा   जाता है "कि  मैं  गवाही देता हूँ , मुहम्मद  अल्लाह के रसूल हैं "इस   से सवाल उठता है कि मुसलमानों   को ऐसी  गवाही देने की  जरुरत  क्यों पड़ी ? यहूदी और ईसाई  ऐसी गवाही  क्यों  नहीं देते ?जबकि  यह  आदम  से ईसा तक  सभी नबियों  को अल्लाह के नबी  मानते  है .मुसलमानों  को मुहम्मद  साहेब  के अल्लाह  के रसूल   साबित  करने के लिए  रोज  गवाही देने  की क्या  आवश्यकता  है .
इस प्रश्न  का उत्तर  हमे खुद कुरान  और हदीसों  से  मिल  जाता  है ,जो यहाँ  दिया जा रहा  है

1-पुराने नबियों  के कलमें 

मुसलमान   हजज  , और उमरा  करते  समय एक    दुआ  की किताब  भी पढ़ते  है ,जिसे "दुआए गंजुल अर्श -دعاےء گنج العرش " कहा  जाता  है .इसमे आदम  से  मुहम्मद  साहब  तक सभी  नबियों  के कलमे  दिए  गए  हैं .ऐसा  माना  जाता है कि मुहम्मद साहब को यह कलमें  जिब्रील  फ़रिश्ते  ने बताये थे .इन में से मुख्य  6 कलमे दिए  जा रहे हैं .ध्यान  देने की बात यह  है कि इन  सभी नबियों  के कलमों के लिए  गवाही  देना अनिवार्य  नहीं बताया  गया  है .क्योंकि यहूदी ,ईसाई और  मुहम्मद साहब  के समय के अरब  भी  इन नबियों  के बारे में अच्छी  तरह  से  जानते थे . और उन पर विश्वास  करते  थे . उनको   इन नबियों  के अल्लाह के नबी होने पर कोई शक नहीं था . और इस सत्य को  साबित करने के लिए किसी तरह की गवाही देने की जरुरत नही पड़ी  .


1.ला इलाहा  इल्लल्लाहु -आदम सफी उल्लाह

2-.ला इलाहा  इल्लल्लाहु -नूह नजी उल्लाह

3-.ला इलाहा  इल्लल्लाहु -इब्राहीम खलीलुल्लाह -इब्राहीम अल्लाह के मित्र हैं

4."   ला  इलाहा  इल्लल्लाहु   इस्माइल जबीहुल्लाह -इस्माइल अल्लाह की बलि  हैं

5."  ला  इलाहा  इल्लल्लाहु   -  मूसा  कलीमुल्लाह-मूसा  अल्लाह  का वचन  है

6."  ला  इलाहा  इल्लल्लाहु -  दाउद खलीफतुल्लाह - दाउद अल्लाह  के खलीफा  हैं

7." ला  इलाहा  इल्लल्लाहु      - ईसा  रूहुल्लाह-ईसा  अल्लाह की आत्मा है

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2-अजान का  मजाक  
लेकिन  जब  मुहम्मद  साहब  ने खुद  को अल्लाह  का रसूल घोषित  कर दिया और लोगों  को नमाज  के लिए बुलाने लगे  तो लोग उनके बुलावे  का मजाक  उड़ाने  लगे .जैसा कि खुद  कुरान  में कहा गया  है ,
"जब तुम  लोगों  को नमाज  के लिए पुकारते हो ,तो लोग उसे हंसी  खेल की बात  बताते  हैं "सूरा -मायदा 5:58

3-गवाही  के शब्द जोड़े गए
जब  मुहम्मद  साहब को पता चला  कि  लोग  उनको अल्लाह का रसूल  या नबी  कभी नहीं  मानेंगे , क्योंकि उनके पास इसका कोई पुख्ता  सबुत नहीं था ,तो उन्होंने  बाद  में  अजान  में यह शब्द  भी जोड़ दिए .

"أشهد أن لا اله إلا الله  "

"अश्हदु  अन  ला  इलाहा  इल्लल्लाहु "

I bear witness that there is none worthy of worship but Allah

"أشهد أن محمدا رسول الله

"अश्हदु  अन  मुहम्मदन रसूलुल्लाह "

I bear witness that Muhammad is the Messenger of Allah.

बाद में यही शब्द कुछ  बदल कर  "कल्माये शहादत " में भी  जोड़ दिए .  और इसे ईमान   का हिस्सा बना कर   इसका पढ़ना  अनिवार्य बना  दिया .और इसे नहीं पढ़ने  वाले को काफ़िर  कह  दिया .

4-अर्थात  गवाही 
अरबी शब्द" अजान -  أَذَان‎        "  का अर्थ  बुलावा  या आह्वान  होता है , जो अरबी के मूल शब्द "उज्न - أَذَن " से निकला  है .जिसका अर्थ "कान -"Ear   होता है . अजान  में मुअज्जिन  यानि अजान  देने वाला  मस्जिद  की मीनार पर चढ़  कर जोर से या लाऊडस्पीकर  से " कल्माये  शहादत -  كلمة الشهادة" के शब्द  भी बोलता  है .अजान  के इन शब्दों  में यह गवाही  ( to witness -to)testify  देना अनिवार्य  है ,कि मुहम्मद  अल्लाह  के रसूल हैं .ऐसी गवाही देना  ईमान  का (Creed - )माना  जाता  है .अजान  में  यह गवाही के शब्द खुद मुहम्मद साहब  ने जुड़वा  दिए  थे .तब से आज तक  मुसलमान  रोज  पांच   बार  यही गवाही  दे रहे  हैं .

5-गवाही देने  का आदेश
अब्दुल   रहमान  ने कहा  कि  रसूल ने कहा    है ,मुअज्जिन    अपनी आवाज  ऊंची करके  गवाही  के  शब्द बोले , ताकि   आसपास के  मनुष्य और जिन्न तुम्हारी  गवाही  सुन सकें ,बुखारी जिल्द 1 किताब 11 हदीस583 

अब्दुल रहमान  ने कहा कि  अजान  देते समय तुम  गवाही  के यह शब्द  भी  जोर से बोलो कि मुहम्मद   अल्लाह  के रसूल  है "
बुखारी -जिल्द4  किताब 54 हदीस 517

6-गवाही  के किये हथकंडे 
जिस तरह  आज  भी अपने पक्ष  में गवाही देने  के लिए गवाहों  को धमकी और लालच  दिया  जाता  है ,मुहम्मद साहब  ने वही हथकंडे  अपनाये  थे ,  जैसा  कुरान  की इन आयातों  में कहा गया है ,

"जो लोग रसूल पर ईमान  नहीं  लाते ,तो  जान लो ऐसे काफिरों के लिए दहकती  हुई आग तय्यार रखी  है "सूरा -फतह 48:13
"हे लोगो  जो रसूल रब की ओर  से तुम्हारे पास आया  है ,तो तुम्हारी इसी में भलाई है कि  तुम उस पर ईमान  लाओ "सूरा -निसा 4:170
"जो रसूल का विरोध करके किसी दूसरे का रास्ता अपनाएगा ,और ईमान  नहीं  लायेगा तो उसे जहन्नम  की आग में झोंक दिया जायेगा ,जो बुरा ठिकाना है "
सूरा -निसा 4:115
"हे लोगो तुम ईमान क्यों नहीं लाते ,जब रसूल तुम  से गवाही देने और वचन  देने  के लिए बुलाता  है "सूरा -अल हदीद 57:8
"जो लोग रसूल पर ईमान  लाकर गवाही देंगे ,तो रसूल अपनी कृपा से दोगुना लाभ देगा "सूरा -अल हदीद 57:28
7-अजान   से क्या होता है ?
मुहम्मद  साहब  के पक्ष  में लोग गवाही क्यों नहीं देते थे ,और उनको रसूल मानने  से इंकार करके उन पर  ईमान  क्यों  नहीं  लाते   थे यह  मुहम्मद साहब  के ज्ञान  से पता चलता  है ,जो इस हदीस   में  दिया गया है ,
अबू  हुरैरा  ने  कहा कि  रसूल  ने बताया ,जैसे ही  अजान  के शब्द  जोर से बोले जाते हैं ,तो उनको सुनते ही शैतान जोर से पादता  हुआ  उलटे पैर सरपट भागने  लगता  है "  बुखारी  -जिल्द 4  किताब 11 हदीस 582
8-सूफी संत सरमद का इंकार
सूफी संत का पूरा नाम "मुहम्मद  सईद "सरमद काशानी -سرمد کاشانی‎  " था .जो अजर बैजान  में सन 1590 में पैदा  हुए थे .वहां  से भारत  में दिल्ली  में बस  गए .सरमद  शाहजहाँ  के  बड़े पुत्र "दारा शिकोह  " के मित्र थे .दारा शिकोह  ने  हिन्दू धर्म ग्रंथों  का अध्यन  किया था ,और उपनिषदों  का फारसी  में अनुवाद  किया  था .दारा  की संगत से सरमद  भी  हिन्दू धर्म  से प्रभावित  थे .दारा शिकोह  के इसी  हिन्दू धर्म  प्रति लगाव  से चिढ  कर   औरंगजेब  ने 30 अगस्त 1659 को   दारा  की हत्या  करवा   दी थी .
सूफी  सरमद नंगे  रहते थे  और   दिल्ली  की  जामा   मस्जिद के  रस्ते में बैठे  रहते  थे .कहा   जाता  है  ,कि एक  बार औरंगजेब  नमाज   पढ़ने  मस्जिद  जा रहा  था , तो उसने नंगे सरमद   से  कहा  जब  तेरे पास कपडे  रखे हैं ,तो  तू अपना बदन  क्यों  नहीं  ढांक  लेता ?सरमद ने औरंगजेब  से  कहा ,बता मैं  पहले  तेरे गुनाहों  को छुपाऊँ   ,या अपना  जिस्म  ढान्कूँ ?
फिर औरन्जेब  ने  पूंछा  कि अजान  हो  रही  है ,तू नमाज  के लिए मस्जिद क्यों  नहीं  जाता , तब  सरमद  ने  फारसी  में यह  जवाब  दिया

"सूए  मस्जिद  की रवम ,इम्मा  मुसल्मा  नीस्तम 
बुत परस्तम  कफिरम अज  अहले ईमाँ  नीस्तम .

अर्थात -मैं  मस्जिद  की तरफ क्यों  जाऊं  ,अब  मैं मुसलमान   नहीं रहा .मैं तो एक मूर्तिपूजक .और काफ़िर  बन  गया हूँ ,और   ईमान  वाला  नहीं  हूँ .

कफिरम इश्कत  मुसलमानी  मिरा  दरकार  नीस्त ,
हर रगे  मन  तार गश्ते  हाजते   जुन्नार  नीस्त .

मैं  तो  ईश्वर  के प्रेम  में काफ़िर ( हिन्दू ) बन गया .मुझे मुसलमानी  की जरुरत नहीं है . मेरे  शरीर   की एक एक रग  धागे  की तरह  है , मुझे  जनेऊ  की  जरुरत  भी नहीं  है .

फिर जब  औरंगजेब  ने सरमद  कल्माये शहादत  बोलने  को कहा ,तो सरमद  ने कलमा  का पहला  भाग तो बोल  दिया ,लेकिन  दूसरे  भाग ( मुहम्मद  रसूलल्लाह )  बोलने  से इंकार  कर दिया .और  कहा  कि  मैं  झूठी गवाही नहीं  दे सकता .नाराज  होकर औरगाजेब  ने सरमद   को क़त्ल करा  दिया . आज भी दिल्ली  की जामा  मस्जिद  के सामने सूफी सरमद   का मजार  है .

*5) [172] The first part of the Kalima, which is in Arabic, can be translated thus : "There is no God but God" (La Ala Allalah) and the second part, "And Mohaaunad is his prophet" (Mohammad rasool Allah). It was quite natural that Sarmad refused to utter the second part of the Kalima,

यही  कारण  था कि  सूफी संत सरमद  ने कलमा का दूसरा भाग  बोलने से इंकार किया था . जिसमे कहा है " मैं गवाही देता हूँ कि  मुहम्मद अल्लाह  के रसूल हैं .इसके  लिए सरमद  ने  औरंगजेब  को कुरान  की यह आयत  भी  सुना  दी थी .

"और अल्लाह के वास्तविक बन्दे तो वही हैं ,जो झूठी गवाही नहीं देते "
सूरा -फुरकान 25:72

अब इस लेख को पढ़कर  पाठक स्वयं फैसला  करें  कि इस्लाम  का आधार   झूठी गवाही  है ,कि  नहीं .?और रोज दिन में पांच  बार चिल्ला कर  झूठी  गवाही देने से मुहम्मद  साहब  को रसूल  कैसे  माना  जा सकता  है ?और झूठी गवाही देने वालों पर विश्वास  कैसे किया  जा सकता  है ?

(200/111)





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