सोमवार, 9 दिसंबर 2019

मुसलमानों ने काबा को पेशाबघर बना दिया था !

हमारा उद्देश्य  किसी  की आस्था पर प्रहार करना नहीं  ,लेकिन हमें विश्वास  है कि यह शीर्षक  पढ़ते ही ओवैसी  जैसी सोच रखने वाले जरूर  बौखला  जायेंगे , क्योंकि  इस लेख  में दिए गए तथ्य  सौ प्रतिशत   सत्य  हैं  ,इसलिए आप इस लेख को ध्यान से पूरा पढ़िए  .
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कुछ  समय  पहले जब एक   टी  वी   चैनल पर  राममंदिर के बारे में बहस हो रही तो  , मौलाना अब्दुल रहमान आबिदी  ने कहा था कि अल्लाह  ने ही राम को पैदा  किया  था ,क्योंकि  अल्लाह सबसे बड़ा और सर्वशक्तिमान     है  , लेकिन   सब  जानते  हैं  कि मुसलमानों   की तरह मुहम्मद साहब  ने अपने  कल्पित  अल्लाह   को सबसे बड़ा  साबित  करने के लिए  सभी  धर्म  स्थलों  को ध्वस्त  कर  दिया  और करोड़ों  निर्दोष  लोगों   की हत्या  की  है  , यद्यपि इस्लाम  के अनुसार  अल्लाह  को निराकार  माना  जाता  है , परन्तु  काबा  को उसका घर  या निवास  भी माना  जाता  है .इसलिए   जरुरी  हो गया   था कि लोगों  के सामने अल्लाह  की असली   औकात  बता  दी जाये  कि अल्लाह  सर्वशक्तिमान  है या   कायर  और भगोड़ा  है  ?  इस बात को  साबित करने  के लिए    मक्का के इतिहास  की दो घटनाये  दे रहे  हैं  ,एक इस्लाम से पहले की है  , और दूसरी  तब की है जब पुरे अरब में इस्लाम  फ़ैल  चूका  था  ,


1-- काबा एक देवालय   था  
 इस्लाम  से पहले  अरब के लोग कई देवताओं  और देवियों   की उपासना करते  थे   चूँकि मक्का यमन  और सीरिया   बीच व्यापर  मार्ग   पर स्थित  था  और  इसी मार्ग  से  काफिले  गुजरते    थे   इसलिए मुहम्मद  के पुरखे  व्यापारियों   से मंदिर यानि   काबा  के लिए  दान   लिया  करते  थे मुहम्मद  के दादा  काबा  के  मुख्य पुजारी   थे  , अरब में कई कबीले  थे हरेक का अपना  अपना  देवता  या देवी  थे जिन्हे   एक साथ  काबा   में रखा  गया  था कुछ  के नाम   इस प्रकार हैं

नस्र ,वद्द ,यऊस ,यऊक ,सुआक और हुब्ल  और  कुछ देवियां  भी थीं  , जैसे   लात , मनात ,मनाफ़   और उज्जा इत्यादि    , मुहम्मद  का कबीला कुरैश    था  इनका  देवता  इलाह था   जिसका चिन्ह  चन्द्रमा  था  , बाद  में जब मुहम्मद ने इस्लाम चलाया  तो इसी  इलाह  को अल्लाह बना   दिया  यानि  आज  का  अल्लाह  उस समय  इलाह     था 

2-अल्लाह  पर  पहला  हमला 

जिस साल मुहम्मद  का जन्म  हुआ  था   यानी  सन 570 ईसवी   में  इथोपिया के  राजा  "अबरह अशरम -   أبرهة الأشرم‎  "  ने मक्का   पर   आक्रमण    कर  दिया  था   , इस्लामी इतिहासकारों  के अनुसार राजा  अपने  साथ  हाथिओं  की  सेना   लाया  था  , और  काबा   को  गिरा  कर  उसको  नष्ट  कर  दिया   था   , इसलिए  इस्लामी  इतिहास  में इस घटना  को "आमुल फील -   عام الفيل‎   "  (  Year of the Elephant  )  कहा  जाता  है  , अबरह अक्सुम  साम्राज्य  का राजा था जिसे आज यमन  कहा  जाता  है ,अबरह काबा  को नष्ट और  बर्बाद करके  यमन  लौट  गया  था  ,  चूँकि  उसी साल मुहम्मद  पैदा  हुआ था इसलिए  मुहामद के दादा मुहम्मद को  अशुभ मानते  थे    और बाद में जब मुहमद  ने  इस्लाम  चलाया तो  मुहम्मद का एक चाचा मुस्लमान  नहीं बना   , ऊपर से  जब मुहम्मद माँ के पेट  में थे उनका बाप भी मर  गया  , लेकिन  जब मुहमद ने  इस्लाम  बनाया तो अपने कल्पित  अल्लाह को बड़ा साबित करने के लिए एक कहानी  बना दी  और उसे कुरान में शामिल  कर  दिया 
 यह घटना  कुरान की सूरा फील 105 में   भी  दी  गयी  है  , कुरान कहा  गया है  कि
अल्लाह  ने   इस राजा  की  हाथी   सेना  को नष्ट  करने  के लिए  आसमान  से  "अबाबील -   أبابيل‎ " नामकी   चिड़ियों   के झुण्ड   भेज   दिये   थे  , जिन्होंने  अपनी चौंच  से आग की तरह गर्म  पत्थर की वर्षा  कर  उस हाथी  सेना  कर  मार  कर नष्ट   कर  दिया  था .लेकिन यह बात केवल   दन्त कथा  है राजा मक्का को  बर्बाद  करके खुद लौट  गया  था  और अपनी मौत मारा  था

 3-अल्लाह  पर दूसरा  हमला


मुहम्मद   साहब  ने  जितने  मुसलमान बनाये   वह लूट  के माल के लालच में , पकड़ी गयी औरतों  के लिए  , या जन्नत की  हूरों  के  लोभ में बने   थे    लेकिन  जब  मुहम्मद  का देहांत हो गया   तो इन  मुसलमानों   में कई  फिरके बन  गए    और एक दूसरे के दुश्मन   हो   गए  ,

ऐसे  ही फिरके  का नाम "इस्लामिया  -  الإسماعيلية‎   " है ,यह शिया  मुस्लिम  हैं  जो सात इमामों  को मानते  है ,यह लोग पूर्वी अरब  के " किरामत  -  قرامطة‎  " प्रान्त में फैले  हुए थे   , जिसे आज" बहरीन   - ٱلْبَحْرَيْن‎)  "  भी कहा  जाता  है ,यह सन 930 ई ० की  बात   है  ,इस्माइलियों  के लीडर  "अबू ताहिर सुलेमान   अल जन्नाबी -   ابو طاهر سلیمان الجنّابي‎   " ने 700 घुड़सवारों  की सेना लेकर  मक्का के  बैतूल   हराम  यानि  काबा  पर  हमला  कर  दिया   और  काबा के आसपास  जितने  भी  हाजी  ,नमाजी  मिले  सबको  क़त्ल  कर  दिया  ,  और  उनकी लाशों  से जमजम    का कुंड भर  दिया ,और फिर पुरे  मक्का शहर में कत्लेआम    मचा कर    हजारों  को मौत के घाट उतार दिया ,
,फिर इसके  बाद  जो लोग बचे   उनके  सामने यह कविता सुनाई  ,

" أنا بالله، وبالله أنا يخلق الخلق، وأفنيهم أنا

"युख्लिक़ अल खल्क व्  अफ ति हुम् अना -अना बिल्लाह व् बिल्लाह   अना "

मैं  ही अल्लाह हूँ ,मुझ में  ही  अल्लाह   है जो सृजन  करता  है  और विनाश  भी  करता  है  "


 "I am by God, and by God I am ... he creates creation, and I destroy them".


फिर  मौजूद लोगों  से  पूछातुम्हारा महान  अल्लाह  कहाँ  है  ?और चिड़ियों   (अबाबील  )   से  और  आग  की वर्षा करके काबा  को बचाने वाला  अल्लाह कहाँ  है  ?


"اين هو الهك أنا إلهك العظيم. أين طيور الله (طير العبابيل) التي تحمي الكعبة؟ اين حجارة النار    

  "ऐन हुव इलाहुक ?अना  इलाहुक अल  अजीम  ऐन तूयूर अल्लाह अल्लती तहमी अल काबा ?ऐन हिजरातून अन्नार ?

Where is your God? I am your great God. Where are the birds of God (Tayr al ababeel) that protect the kaaba? where are the stones of fire


और  जब किसी ने कोई जवाब नहीं  दिया तो जन्नाबी  ने काबा  का  पर्दा उतार कर उसमे आग  लगा  दी  ,

(इस से साबित हो  गया की कुरान की सूरा   फील   105 में दी गयी  कहानी  झूठी   है    जो मुहम्मद  के दिमाग की उपज  थी )

  फिर अपने लोगों को काबा के अंदर पेशाब  करने  को कहा , और मुसलमान जिस  हज्रे अस्वद   (काला पत्थर  " को चूमते थे उसे उखड़वा  कर यमन   भिजवा  दिया  ,जन्नाबी  का  शासन  मक्का  में  21 साल  रहा  इस दौरान  उसके  लोग  रोज  काबा में  नियमित रूप  से पेशाब   करते   रहे    इसलिए न तो कोई हज   कर सका  और न  काबा में अजान और नमाज   हो  सकी,  और  कला  पत्थर  भी चालीस  साल बाद  मिला  था  .


इन तथ्यों   से  दो बातें    स्पष्ट रूप से सिद्ध   होती  हैं   ,

1- अल्लाह  न इस्लाम  से पहले  सर्वशक्तिमान    था  , और न इस्लाम के  बाद  ,  अल्लाह मुहमद   द्वारा  कल्पित  चरित्र     है  , जो खुद भी नहीं  बचा  सका  , वह मुसलमानों  को कैसे बचा सकेगा ? इसलिए अल्लाह के साथ  "अकबर   " (यानी महान )लगाना  मूर्खता   के सिवा कुछ  नहीं  है 

2-कुरान   कोई आसमानी  किताब नहीं  बल्कि  मुहम्मद  की रचना  है ,  क्योंकि  मुहम्मद  झूठी   कहानियों   को  कुरान  में शामिल करके लोगों  अपने द्वारा कल्पित   अल्लाह  से लोगों को डरा  डरा कर मुस्लमान बनाया  करते  थे  , 
लेकिन  यह एक निर्विवाद  सत्य  है  कि कोई कितना    ही पाखंड   करे  एक न  एक दिन  उसका  भंडा जरूर  फूट  जाता  है 

(423  )


शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

आप मुहम्मद को क्या कहेंगे ?

लोग मुहम्मद के बारे में कुछ भी कहते हों ,लेकिन एक बात निर्विवाद है कि मुहम्मद जैसा व्यक्ति दुनिया में कोई नहीं हुआ .उसने लोगों कि अज्ञानता ,अंधविश्वास का पूरा पूरा फायदा उठाया था .और लोगों को मुसलमान बनाने के लिए हरेक हथकंडे अपनाये थे .इसमे डराना ,लालच देना सब शामिल हैं .इस्लाम से पाहिले अरब में यहूदियों और ईसाईयों ने अनेकों काल्पनिक बातें फैला रखी थीं ,जैसे शैतान ,फ़रिश्ते ,जन्नत ,दोजख आदि.इन्हींके आधार पर वह धर्म चल रहे थे .मुहम्मद ने इनमे जिन्न ,हूरें ,गिलमा और जोड़ दिए ,जिस से लोगों को ललचाया जाये .इसके आलावा मुहम्मद ने जन्नत और जहन्नम के बीच में एक और स्थान की कल्पना कर डाली .मरने के बाद आत्मा कब्र के अन्दर इसी जगह में तब तक रहेगी जब तक उसका मुर्दा शरीर फिर से जिन्दा नहीं किया जायेगा .फिर अंतिम फैसला हो जाने पर जीव नर्क या स्वर्ग में जायेगा .इस जगह को मुहम्मद ने "बरज़खبرزخ "का नाम दिया . कुरान में लिखा है -
1 -बरज़ख क्या है ? 
"मरने के बाद एक जगह बरज़ख है ,जीवित करके उठाने के दिन तक "सूरा -अल मोमिनीन 23 :100
"स्वर्ग और नर्क के बीच बरज़ख है ,लोग जिसे पार नहीं कर सकते " सूरा -रहमान 55 :20
मुहम्मद पाखंडी तो था ही ,वह कई दावे भी करता था ,जैसे चाँद के तुकडे करना आदि .इसी तरह मुहम्मद ने दावा किया कि वह अपने लोगों को बरज़ख की तकलीफों से बचा सकता है .
मुहमद का बाप अब्दुल्ला बचपन में मर गया था .और बाद में माँ अमीना भी मर गयी .मुहम्मद को उसके चाचा अबूतालिब ने पाला था .जब वह मर गया तो तो मुहम्मद को उसकी चाची "फातिमा बिन्त असदفاطمه بنت اسد "ने अपने पास रख लिया .मुहमद के चारे भाई का नाम अलीعلي था .
सन 626 को मुहम्मद की चाची फातिमा की अचानक मौत हो गयी .जब लोग उसकी लाश को दफना चुके तो मुहम्मद ने अपनी जवान चाची को बरज़ख के बोझ से बचने के लिए जो महान कार्य किया था वह कोई सोच भी नहीं सकता .
इसे हिंदी में "शव सम्भोग 'अंगरेजी में "Necrophilia " और अरबी में "वती उल मौती وطيءالموتي"कहा जाता है .मुहमद ने अपनी चाची की लाश के साथ सम्भोग किया था ,ताकि वह जन्नत में जाये .इसके सबूत में हिंदी ,अंगरेजी और अरबी प्रमाण दिए जा रहे हैं -
2 -शव सम्भोग (Necrophilia )क्या है ?
शव सम्भोग या Necrophilia एक प्रकार की मानसिक विकृति है ,इसे आम तौर से Sex with dead body भी कहा जाता है. इसका किसी नस्ल और संस्कृति से कोई सम्बन्ध नहीं हैं .ऐसे विकृत लोग सब जगह हो सकते हैं.लेकिन मुझे विश्वास है की मुसलमान कुछ अलग प्रकार के विकृत मानसिकता के रोगी है.धन्य है ऐसे इस्लाम को ,जिसने इस विकृति को पागलपन की सीमा से भी पर कर दिया है .क्या कोई यह दावा कर सकता है की मुस्लिम देशों में ऐसा नहीं होता है .
इसी विषय पर शोध करने पर एक रोचक हदीस मिली है ,जिसे सबको बताया जा रहा है यह हदीस "कन्जुल उम्माल "नामकी किताब से ली गयी है जिसका अर्थ श्रमिकों का खजाना है .इसके एक अध्याय "The issue of womenقضية امراة "में अली इब्न हुस्साम अल दीन ,जिसे लोग अल मुत्तकी अल हिंदी भी कहते है ,अपने हदीसों के संकलन "अल जामी अल सगीरالجامع الصغير "में जिसे जलालुद्दीन शुयूती ने जमा किया यह हदीस दर्ज की है -
Necrophilia: This is a mental disease and it has nothing to do with race or culture. There are sick people everywhere and I am sure Muslims who are sick in many other ways thanks to their sick religion are no better when it comes to this insanity. Do you have any proof that necrophilia does not happen in Islamic countries? 

Talking about Necrophilia there is a curious hadith that I would like to share. 

This is from a book called "Kanz Al Umal" (The Treasure of the Workers), in the chapter of "The issues of women", authored by Ali Ibn Husam Aldin, commonly known as Al-Mutaki Al-Hindi. He based his book on the hadiths and sayings listed in "Al-Jami Al-Saghir," written by Jalal ul-Din Al-Suyuti. 

3--शव सम्भोग का हदीस से प्रमाण 
इब्ने अब्बास ने कहा कि रसूल ने कहा "मैंने (यानी रसूल ने ) उसके (फातिमा बिन्त असद )के सारे कपडे उतार दिए ताकि वह जन्नत के कपडे पहिन सके .और फिर मैं उसके कफ़न (कब्र )में उसके साथ लेट गया ,जिस से उसे कब्र के संताप का बोझ हल्का हो सके .मेरी नजर में वह अबूतालिब के बाद अल्लाह कि सर्वोत्तम स्रष्टि थी ".यह बात रसूल अली कि माँ फातिमा को इंगित करके कह रहे थे .
-जामीअल सगीर -वाक्य संख्या - 34424

Narrated by Ibn Abbas:

‘I (Muhammad) put on her my shirt that she may wear the clothes of heaven, and I SLEPT with her in her coffin (grave) that I may lessen the pressure of the grave. She was the best of Allah’s creatures to me after Abu Talib’… The prophet was referring to Fatima , the mother of Ali. (Sentence number 34424
(
4 -मुहम्मद ने लाश के साथ सम्भोग किया !

अरबी में नीचे दी गयी हदीस में सोने (Slept )शब्द के लिए अरबी में (Idtajat इदतजात )शब्द का प्रयोग किया गया है.दिमित्रिअस ने इसे स्पष्ट करके बताया कि अरबी में यह शब्द औरत के साथ लेटना ,और सम्भोग के लिए लेटने के लिए प्रयुक्त होता है .जिस समय मुहमद ने यह हदीस कही थी ,वह जानता था कि फातिमा से साथ सोने से फातिमा को उसकी पत्नी ,यानि मुसलमानों कि माँ का दर्जा मिल जाएगा .और मुहम्मद फातिमाको कब्र के दुखों को हल्का करना चाहता था.मुसलमानों कि मान्यता है कि .क़यामत के दिन तक उनको कब्र में कष्ट उठाने होंगे .इसीलिए मुहम्मद ने फातिमा की लाश से सम्भोग किया क्योंकि मुसलमानों की माँ को कब्र में कष्ट नहीं हो सकता .

Demetrius Explains : "The Arabic word used here for slept is "Id'tajat," and literally means "lay down" with her. It is often used to mean, "Lay down to have sex." Muhammad is understood as saying that because he slept with her she has become like a wife to him so she will be considered like a "mother of the believers." This will supposedly prevent her from being tormented in the grave, since Muslims believe that as people wait for the Judgment Day they will be tormented in the grave. "Reduce the pressure" here means that the torment won't be as much because she is now a "mother of the believers" after Muhammad slept with her and "consummated" the union. " 

(नोट-अरबी में पूरी हदीस देखिये )


بسم الله الرحمن الرحيم
الحمد لله الكبير المتعال والصلاة والسلام على سيدنا محمد المتبع في الأقوال والأفعال والأحوال وعلى سائر الأنبياء وآله وصحبه التابعين له في كل حال‏.‏
‏(‏أما بعد‏)‏ فيقول أحقر عباد الله علي بن حسام الدين الشهير عند الناس بالمتقي‏:‏ لما رأيت كتابي الجامع الصغير وزوائده تأليفي شيخ الإسلام جلال الدين السيوطي عامله الله بلطفه ملخصا من قسم الأقوال من جامعه الكبير وهو مرتب على الحروف جمعت بينهما مبوبا ذلك على الأبواب الفقهية مسميا الجمع المذكور ‏(‏منهج العمال في سنن الأقوال‏)‏ ثم عن لي أن أبوب مابقي من قسم الأقوال فنجز بحمد الله وسميته ‏(‏الإكمال لمنهج العمال‏)‏‏.‏ ثم مزجت بين هذين التأليفين كتابا بعد كتاب وبابا بعد باب وفصلا بعد فصل مميزا أحاديث الإكمال من منهج العمال‏.‏ ومقصودي من هذا التمييز أن المؤلف رحمه الله ذكر أن الأحاديث التي في الجامع الصغير وزوائده أصح وأخصر وأبعد من التكرار كما يعلم من ديباجة الجامع الصغير‏.‏ فصارا كتابا سميته ‏(‏غاية العمال‏)‏ في سنن الأقوال‏.‏ ثم عن لي أن أبوب قسم الأفعال أيضا فبوبته على المنهاج المذكور وجمعت بين أحاديث الأقوال والأفعال‏.‏ وأذكر أولا أحاديث منهج العمال ثم أذكر أحاديث الإكمال ثم أحاديث قسم الأفعال كتابا بعد كتاب فصار ذلك كتابا واحدا مميزا فيه ماسبق بحيث أن من أراد تحصيل قسم الأقوال أو الأفعال منفردا أو تحصيلهما مجتمعين أمكنه ذلك وسميته ‏(‏كنز العمال في سنن الأقوال والأفعال‏)‏‏.‏ فمن ظفر بهذا التأليف فقد ظفر بجمع الجوامع مبوبا مع أحاديث كثيرة ليست في جمع الجوامع لأن المؤلف رحمه الله زاد في الجامع الصغير وذيله أحاديث لم تكن في جمع الجوامع‏.‏
وها أنا أذكر ديباجة المؤلف رحمه الله من الجامع الصغير وذيله ‏(‏ن - زوائده‏)‏ ومن الجامع الكبير حتى لا أكون تاركا ولا مغيرا ألفاظه إن شاء الله تعالى‏.‏ ‏(‏ن - الا بعض رموز وألفاظ يسيرة تركها الشيخ رحمه الله تعالى فيهما اقتصارا فتركت ذلك للضرورة فليعلم‏.‏‏)‏

خطبة الجامع الصغير

5 -मुहम्मद के कुकर्मों के और सबूत
यह बात तो सिद्ध हो गयी ,कि मुहम्मद ने अपनी चाची फातिमा बिन्त असद की लाश के साथ सम्भोग किया था .लेकिन मुहम्मद जानवरों के साथ भी कुकर्म करता था जो लोग मुस्लिम ब्लोगरों ,मुल्लाओं की मक्कारी भरी बातों में आकर मुहम्मद को आदर्श व्यक्ति ,समझाने की भूल कर रहे हैं ,उन्हें सचेत हो जाना चाहिए .इसी( महान?) व्यक्ति के कारण सारी दुनिया त्रस्त है .जो व्यक्ति अपनी वासना की पूर्ति के लिए बच्चियों ,दासियों ,कैद की गयी औरतों के साथ सम्भोग (बलात्कार )करता हो वह अल्लाह की और मुसलमानों की नजर में भले कुछ भी हो ,लेकिन जो व्यक्ति अपनी चाची की लाश के साथ ही सम्भोग करता हो ,उसके लिए दुनियां किसी भी शब्दकोश में कोई शब्द नहीं मिल सकेगा .
यदि हमारे पाठक मुसलमानों ले लिए इस उतम व्यक्ति "मुहम्मद "के लिए कोई उपयुक्त शब्द बताएँगे ,तो मुहम्मद के लिए वही शब्द इस्तेमाल करूंगा .
मुझे पूरा विश्वास है कि आपको मुहम्मद के बारे में सही जानकारी मिल गयी है ,और आपका भ्रम दूर हो गया होगा .क्योंकि  आज  भी मुसलमान  रसूल की सुन्नत  का पालन  करके  लड़कियों  की हत्या  करके उसकी लाश  से बलात्त्कर  करते  हैं 

अब  हम  तो मुहम्मद साहब को  सम्मानपूर्वक     " शवसंभोगी   रसूल  " कहेंगे  , बताइये आप क्या कहेंगे   ?


(181/180)-Dt.19/04/2011 

सोमवार, 2 दिसंबर 2019

मुहम्मद ने कुरान कब और क्यों बनाई थी ?

मुस्लिम  विद्वानों   और इतिहासकारों   ने यह दावा  कर रखा  है कि कुरान  का पहला हिस्सा जिब्राईल  नामका फरिश्ता आसमान  से     रमजान महीने   की तारीख  27  को सन 610 में   लेकर  आया  था  ,उस समय  रात  थी , जिसे  आज मुस्लिम  लैलतुल  ,कद्र  कहते हैं ,उस  समय मुहम्मद  की  आयु  40 साल  थी ,
लेकिन  यह  बात  सरासर  बेबुनियाद  और झूठ   है  ,क्योंकि   मुस्लिम  विद्वान् कुरान   के आवरण   की जो तारीख   सन  610 बताते हैं  ,उस से काफी पहले   सन 586 ही   मुहम्मद के ताऊ  जुबैर इब्न  अब्दुल मत्तलिब   ने  एक  कविता  मक्का के लोगों  को सुनाई  थी  ,जो कुरान को अल्लाह की किताब  होने की पोल  खोलने   वाली है   ,
 यह   बात  न  तो  हम अपनी  तरफ  से  कह  रहे हैं  ,  और न  किसी हिन्दू   संगठन  की  तरफ   से  कह  रहे  हैं , लोगों  को यह  बात  जानकर   सहसा विश्वास  नहीं  होगा  की  ,  यह  बात   खुद मुहम्मद   के ताऊ "  अल जुबैर -    " ने  उस  समय   कह  दी थी  ,  जब   मुहम्मद  ने कुरान   बनाना   चालु  कर  दिया   था   ,, और अपनी   उलटी  सुल्टी , बेतुकी   बातों   को अल्लाह   का  कलाम बता  कर   मक्का  के लोगों   को जिहादी  बना  रहे  थे   ,
-इस संवेदनशील  विषय   की  सत्यता  को  समझाने  के लिए  आपको    यह  बताना  जरुरी     था कि हमें  यह  जानकारी  कहाँ  से  और  कैसे  मिली  ?
1- जानकारी   का सुराग  कैसे मिला  ?
कुछ   दिन  पहले  मुझे     एक उर्दू किताब     मिली  जो  निजामी प्रेस  लखनऊ  से छपी  थी  इसका नाम   "ग़दीर  से करबला  -غدیر سے کربلا تک
 "   था  ,  इसके लेखक  का  नाम   हसन  नवाब  रिजवी   है  ,  इस किताब  के पेज नंबर 49 पर   मुहम्मद के  ताऊ  "जबीर अब्दुल मत्तलिब  का  एक  अरबी    शेर     दिया   गया   है   ,

لعبت هاشم بالملک فلا
خبر جاء و لا وحی نزل‏
(लबअत हाशिम बिलमुल्क  फला ,खबर जाअ व्  ला  वही  नजल )
अर्थात -  हाशिम   की  औलाद(MUhammad)  ने दुनिया  के साथ  खेल  किया  , नतो आसमान  से कोई खबर  आयी  और  न  कोई वही  ( revelation )   ,यानी कुरान   आयी.
  ,हमने इस पूरी कविता के बारे में   दो  दिन  तक   अंगरेजी  और उर्दू  में  सर्च  किया लेकिन   कुछ  पता नहीं   चला   ,    तीसरे दिन  जब  हमने  फारसी में  सर्च    किया  तो  ईरानी  साईट में   अरबी की   वह पूरी  कविता मिल  गयी   ,  साथ में उसका फारसी  अनुवाद  भी मिल  गया  , यह  कविता मुहम्मद  सबसे बड़े  चाचा   यानि  ताऊ जुबैर  बिन   अब्दुल  मुत्तालिब   जिसे अव्वाम  भी  कहा  जाता   है  ,  उस  समय   लिखी  थी  जब   मुहम्मद   लोगों   से  यह    कहा  करता  था   कि  अल्लाह   के  फ़रिश्ते   मेरे  पास  खबर     लाया    करते   हैं  ,  और  मैं  जो  भी  कहता  हूँ   वह  अल्लाह  का  कलाम   है  , 
2-मुहम्मद  का  संयुक्त  परिवार 
लेकिन   मुहम्मद   के   ताऊ  ,  चचेरे  भाई   सभी  मुहम्मद  को पाखंडी  और  सत्तालोभी      मानते  थे  ,  दादा  (grand father )  का नाम " अब्दुल मुत्तलिब    बिन   हिशाम   -  شيبة ابن هاشم عبد المطّلب " था। इसकी   छह   पत्नियां   थी  ,जिन   से  अब्दुल मुत्तलिब     के    10 संतानें  हुई  ,(  कुछ  लोग  12 संतानें   भी  कहते   हैं   ,)इनका  विवरण   यह    है 
1" अल जबीर - الزبير بن عبد المطلب‎ "यह  परिवार  का सबसे  बड़ा बेटा  था  इसलिए  मुत्तलिब   ने इसे  घर  का मुखिया    बना  दिया   ,  यह  अपने  ऊँटों   से  व्यापारियों  का  सामान लाने   और  भेजने  का काम   करता   था  ,  इसके  अतिरक्त   अरबी में कविता  भी  करता   था  ,  लोग इसे अबू  ताहिर  भी  कहते   थे  , इसी  नाम  से  यह  शायरी भी  करता  था ,और  जब मुहम्मद  के पिता गुजर  गए तो  सबसे  पहले इसी ने  मुहम्मद को  पाला  था  ,  और जब  मुहम्मद      14 साल  का  हो  गया तो  सन 584 में  यही  मुहम्मद   को  सीरिया   घुमाने ले  गया   ,  वहां   राजा   की  शान शौकत  देख  कर  मुहम्मद  के  दिल  में  दुनियां  पर  राज करने  इच्छा   पैदा हो  गयी   ,  चूँकि    अपना  राज  कायम  करने  के लिए   सेना  जरुरी    होती   है   ,  और  सैनिकों  को  वेतन  देने  की मुहम्मद  की  औकात  नहीं   थी  ,  इसके लिए मुहम्मद  ने जिहाद  का तरीका  खोज  निकाला ,
2-अबू  तालिब  -बचपन   में इसका नाम     "अब्द मनाफ़ -عبد مناف "  था  , इसका बेटा  अली  था  ,( मुहम्मद ने  इसी से अपनी पुती  फातिमा  से  शादी  कर    दी  थी  )यद्यपि   अबू  तालिब   ने मुहम्मद को  पाला  ,  फिर भी  अबुतालिब   कभी मुस्लमान   नहीं   बना  , जुबैर की तरह   अबूतालिब   भी  इस्लाम  को  पाखण्ड और  कुरान  को मुहम्मद  की  रचना     मानता   था
3-अब्द इलाह   यह  मुहम्मद   के पिता  थे ,इसकी पत्नी  का नाम   आमिना  था, जब  अब्दुल्लाह  और आमिना  की  शादी  हुई   तो  अब्दुल मुत्तलिब  ने  एकहि  दिन   एकसाथ   एक  लाइन में सौ  ऊँटों  को  क़ुरबानी  की   थी  ,  उस  से कहा  गया था कि इस से अल्लाह      आमिना   से  अच्छे गुणों    वाला बच्चा   देगा ,  और  बच्चे के बाप को लम्बी आयु   देगा  ,  लेकिन   इसका बिलकुल उल्टा  हुआ  , मुहम्मद के  जम्म  से पहले अब्दुल्लाह   मर   गया  , और  आमिना    का जो बच्चा  मुहम्मद  हुआ  उसके  हाथ पैर ऊँट के खुर   जैसे   थे  , लोग  समझते  थे  इस बच्चे  में दुष्ट   शक्तियों   का वास  है , इसी  लिए मुहम्मद  के सभी  चाचा   उस  से दूर   रहते  थे  ,  कोई  भी मुस्लमान   नहीं   बना
4-उम्मे हकीम अल  बैदा --तीसरे  खलीफा उस्मान बिन  अफ्फान की नानी
5-बर्रा  - अबू सलमा की माता
6-अरवा -यह बचपन में मर गयी
7-अतीका -उमय्या अल मुगीरा की पत्नी
8-उम्मा -जैनब  बिन्त जहश और अब्दुल्लाह इब्न जहश  की माता
9-अब्दुल उज्जा -उर्फ़  अबू  लहब  , मुहम्मद  का चाचा  , कुरान में इसका उल्लेख है 
10-हमजा - अली का भाई - उहद  के युद्ध में अबू सुफ़यान  की औरत हिंदा ने इसका कलेजा  चबा लिया  था 
3-जुबैर  ने  यह कविता क्यों  लिखी 
जुबैर    परिवार  का मुखिया  होने के साथ   शायर भी  था  , मक्का  के लोग उसकी कविताओं  को  यद् रखते   थे  ,  लेकिन  लोगों  को मुहम्मद  की  आदतें   और  कामों   से नफ़रत    थी  , 13 साल होते ही  मुहम्मद    ने अपनी  गैंग बना    ली   , जिस से वह  काफिले  लूटा करते थे  ,  मुहम्मद ने यह  बात फैला राखी  थी  कि ऐसा करने के लिए  उसे  आसमान   से हुक्म  मिलता   है  ,पहली  बड़ी  लूट  मुहम्मद   ने सन 583 में  मकका  के कबीले हवाजिन   को लूटा ,इस  लूट को "हरब  अल फ़िज़ार -  ﺣﺮﺏ الفجار‎ "  कहा   जाता    है  , इसमें मुहम्मद  को  काफी  माल मिला  , इसके बाद   मुहमम्मद ने  लगातार     चार  लूट की  वारदातें    की ,  जिस  से मक्का  के लोग मुहम्मद के दुश्मन    हो  गए  ,   लोगन   का मुंह  बंद  करने के लिए मुहम्मद   ने चाल  चली   ,  वह  अपने  हरेक  कुकर्मों  को जायज  सिद्ध   करने के लिए  एक पुस्तक  बनाया  करता   थे , जिसका  नाम   मुहम्मद   ने  " अल किताब -  الكِتاب  "  रख  लिया   था .महम्मद ने बाद  में इसका नाम  कुरान   रख  दिया    और , जब  लोगों   ने आरोप  लगाया कि यह  किताब  तुमने   ही  बनाइ  है  , तो मुहमम्मद  ने अनपढ़  होने  का  नाटक   किया  , जबकि  इसका छोटा  भाई  अली लिखना पढ़ना   सीख   गया  .  और  जब  मुहम्मद    ने कहा  यह   किताब  मेरी  रचना नहीं   ,  अल्लाह फ़रिश्ते   के माध्यम   से भेजता  रहता  ,  और  जब  जुबैर  को  लगा  कि सत्ता   के लोभ    में मुहममद दुनिया   को  धोखा  दे  रहा  है  तो उसने सोचा कि मुहमद  के कारन    पूरा कबीला  ,  अरब  लोगों   का नाश हो जायेगा  उसने  यह  कविता  लिखी   थी , और जैसे जैसे मुहम्मदी   जिहाद  फैलता  गया  , जुबैर की कविता भी लोगों  को याद  होती  गयी  ,जिहाद के बहाने मुहम्मद  ने जिन लोगों  को मरवाया था  वह बदला  लेने का मौका  देखने  लगे  , 
4-यह  कविता  कब  सार्वजनिक    हुई 
यद्यपि   जुबैर ने यह कविता  कुरान के  अवतरण  से काफी पहले ही लिखी थी  ,लेकिन  इसे "यजीद बिन मुआविया - : يزيد بن معاوية بن أبي سفيان‎ " ने   अपने दरबार में लोगों  के सामने  उस  समय पढ़ा  था  जब  उसके सामने   इमाम हुसैन   का कटा  हुआ   सर लाया  गया   था  , यह  घटना 10  अक्टूबर  सन 680 , यानी  10 मुहर्रम   हिजरी 61 की बात  है  ,दरबार  में यजीद हुसैन के कटे सर  को छड़ी  से  मारते हुए कहने  लगा  और भरे दरबार  में  लोगों  के समांने    मुहम्मद के ताऊ    ( grand uncle )जुबैर की  यह कविता सुनाने  लगा 
(Most of the narrations had confirmed that Yazeed Bin Muawiya had recited the poetry of Al-Zubary during his public assembly, Al-Zubary is a poet from Quraish at the time of Jahiliyyah (pre-Islamic stage) who was very tough on Muslims)

 कविता -

أتمنى لو أن قادتي القدامى في بدر يمكن أن يشهدو
"मैं  चाहता हूँ कि बद्र के  युद्ध में भाग लेने वाले पुराने लोग गवाह   रहें  "
I wish my old chiefs at Badr could witness

الخازرج خوفا من تأثير الاندفاع
"जो खजराज की भीड़ से डरे   और दबे  रहते  हैं  "
Al-Khazraj’s fearing of the impact of rush

كانوا سيهتفون ويصرخون بسعادة 
" यह लोग खुश   होकर  चिल्ला कर बोल उठेंगे   "
They would have cheered and shouted happily,

ثم قالوا لي ، يا حسن يا سعيد
"और    कहेंगे    हे यजीद  तूने    अच्छा काम  किया  है   "
Then they would have said, good job O Yazeed
ان كُن مَن خندف اِذا كُنت الانتقام
"मैं   खनदफ के युद्ध में  बदला  नहीं   ले   पाया  था  "
I shall not be from the Khandaf if I do not avenge,

من عائلة أحمد لما فعله
"मुहम्मद के लोगों   से  , जो मुहम्मद  ने हमारे साथ  किया  "
From the family of Ahmad for what he had done

لعبت هاشم با مُلك فما
"हाशिम  की संतान   ( मुहम्मद ) ने   देश  को बर्बाद  कर  दिया  "
Hashim had manipulated the Reign

لاخبرجاء ولا وحي نزل
" न  कोई   खबर  लेने  वाला    (फरिश्ता  " था  , और न  आसमान  से कोई किताब उतरी   है  "
So, neither news arrived nor revelations happened"


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इन  पुख्ता सबूतों   से     यह बातें  सिद्ध होती   हैं  ,
1 -मुस्लमान  विद्वान झूट  कहते हैं  कि कुरान   "कलाम उल्लाह  - " यानी अल्लाह  की वाणी  है  ,   जो अरबी नौवें  महीने  रमजान में  आसमान   से जिब्राईल  नाम  का फरिश्ता  मुहम्मद  के  पास  लाया   था  , और मुस्लिम  विद्वान्  कुरान  के अवतरण अर्थात  नुजूल ( Revelation )  की  जो 23 तारीख दिसंबर  सन 609 बताते   हैं   वह  भी  सरासर  झूठ  है  ,
2-जबकि  सच्चाई   तो  यह  है कि मुस्लिम  विद्वान्  कुरान  के उतरने की  जो तारीख   (23Dec 609    ) बताते  हैं  उस से  काफी  पहले से  ही  लगभग  सन 585 -586 से  ही   मुहम्मद  जो भी बेतुकी  बातें  बोलता  था उसे( वही - "यानी  अल्लाह के वचन  बता दिया करता था  ,  और अपने  हरेक  कुकर्मों  को  को न  कोई  आयत बना  कर जायज ठहरा  देता  है  ,  इस  काम   में   उसका  चचेरा भाई  और  दामाद  अली  भी  साथ  देते  थे  , मुहम्मद  की इस  धूर्तता  को बेनकाब  करने के लिए  ही   अबू  जुबैर  के  कविता  लिखी  थी  , लेकिन  जब  सन 610 में  अबू  जुबैर  की मौत  हुई  तो  मुहम्मद  ने अपनी किताब  को  अल्लाह  की किताब  के नाम   से प्रकट  कर  दिया  .इसी लिए  कुरान  की सूरा बकरा 2 :1 में कुरान को "जालिक़ अल किताब - ذَٰلِكَ الْكِتَابُ    "कहा गया  है  , जिसका अर्थ  "वह  किताब-That Book  "   होता  है  ,मतलब यह कुरान   नकली   है। 
(406  )

शनिवार, 30 नवंबर 2019

बलात्कार :जिहाद का हथियार




नोट -हम  सभी पाठकों   ,मित्रों    और हिन्दू  संगठनों  के सभी   सदस्यों  से कहना चाहते हैं कि क्या    अपने  इस बात पर गौर किया कि देश में बलात्कारों  की संख्या   क्यों  बढ़  रही  है ? और जितने बलात्कारी पकडे   जा रहे हैं   उनमे      90 प्रतिशत  मुस्लिम  क्यों   होते  है  ? 
 इसके  बारे में हमने आठ  साल  पहले  ही एक  लेख  पोस्ट  किया था  , लेकिन  न  तो  किसी  ने उस पर ध्यान  दिया  और न गंभीरता  से  लिया  , हम  चाहते  थे की हमारे ऐसे लेखों  की किताब  बन  जाती  तो   हिन्दू युवक ,युवतियां  कभी इस्लामी  जाल  में नहीं  फसते ,लेकिन  किसी  ने कोई सहयोग किया ,ऐसा लगाने  लगा  कि हमने  इस्लाम की जिहादी  नीति  ,  विचारों  और योजनाओं   का भंडाफोड़ करने में लगाए  11 साल बेकार  बर्बाद कर   दिए  ,  इसलिए  हम  यह   पुराना लेख पोस्ट  कर  रहे हैं   जो 6 जनवरी    2011 को बनाया  था  , और  आज  भी उपयोगी है   .

जिहाद दुनिया का सबसे घृणित कार्य और सबसे निंदनीय विचार है .लेकिन इस्लाम में इसे परम पुण्य का काम बताया गया है .जिहाद इस्लाम का अनिवार्य अंग है .मुहम्मद जिहाद से दुनिया को इस्लाम के झंडे के नीचे लाना चाहता था .मुहलामानों ने जिहाद के नाम पर देश के देश बर्बाद कर दिए .हमेशा जिहादियों के निशाने पर औरतें ही रही हैं .क्योंकि औरतें अल्लाह नी नजर में भोग की वस्तु हैं .और बलात्कार जिहाद का प्रमुख हथियार है .मुसलमानों ने औरतों से बलात्कार करके ही अपनी संख्या बढाई थी .मुहम्मद भी बलात्कारी था .मुसलमान यही परम्परा आज भी निभा रहे है .यह रसूल की सुन्नत है ,कुरान के अनुसार मुसलमानों को वही काम करना चाहिए जो मुहम्मद ने किये थे .कुरान में लिख है-

"जो रसूल की रीति चली आ रही है और तुम उस रीति(सुन्नत )में कोई परवर्तन नहीं पाओगे "
सूरा -अल फतह 48 :23 

"यह अल्लाह की रीति है यह तुम्हारे गुजर जाने के बाद भी चलती रहेगी .तुम इसमे कोई बदलाव नहीं पाओगे .सूरा -अहजाब 33 :62 

"तुम यह नहीं पाओगे कि कभी अल्लाह की रीति को बदल दिया हो ,या टाल दिया गया हो .सूरा -फातिर 33 :62 

यही कारण है कि मुसलमान अपनी दुष्टता नही छोड़ना चाहते .जिसे लोग पाप और अपराध मानते हैं ,मुसलमान उसे रसूल की सुन्नत औ अपना धर्म मानते है .और उनको हर तरह के कुकर्म करने पर शर्म की जगह गर्व होता है .बलात्कार भी एक ऐसा काम है .जो जिहादी करते है - 

1 -बलात्कार जिहादी का अधिकार है 

"उकावा ने कहा की रसूल ने कहा कि जिहाद में पकड़ी गई औरतों से बलात्कार करना जिहादिओं का अधिकार है .

बुखारी -जिल्द 1 किताब 5 हदीस 282 

"रसूल ने कहा कि अगर मुसलमान किसी गैर मुस्लिम औरत के साथ बलात्कार करते हैं ,तो इसमे उनका कोई गुनाह नहीं है .यह तो अल्लाह ने उनको अधिकार दिया है ,औ बलात्कार के समय औरत को मार मी सकते हैं" 

बुखारी -जिल्द 7 किताब 62 हदीस 132 

बुखारी -जिल्द 1 किताब 52 हदीस 220 


2 -जिहाद में बलात्कार जरूरी है 

सईदुल खुदरी ने कहा कि ,रसूल ने कहा कि सामूहिक बलात्कार करने से लोगों में इस्लाम की धाक बैठ जाती है .इसलिए जिहाद में बलात्कार करना बहुत जरूरी है .बुखारी जिल्द 6 किताब 60 हदीस 139 

3 -बलात्कार से इस्लाम मजबूत होता है 

"इब्ने औंन ने कहा कि,रसूल ने कहा कि किसी मुसलमान को परेशां करना गुनाह है ,और गैर मुस्लिमों को क़त्ल करना और उनकी औरतों के साथ बलात्कार करना इस्लाम को आगे बढ़ाना है
.बुखारी -जिल्द 8 किताब 73 हदीस 70 

"रसूल ने कहा कि मैंने दहशत और बलात्कार से लोगों को डराया ,और इस्लाम को मजबूत किया .
बुखारी -जिल्द 4 किताब 85 हदीस 220 

"रसूल ने कहा कि ,अगर काफ़िर इस्लाम कबूल नहीं करते ,तो उनको क़त्ल करो ,लूटो ,और उनकी औरतों से बलात्कार करो .और इस तरह इस्लाम को आगे बढ़ाओ और इस्लाम को मजबूत करो.
बुखारी -जिल्द 4 किताब 54 हदीस 464 

4 -माल के बदले बलात्कार 

"रसूल ने कहा कि जो भी माले गनीमत मिले ,उस पर तुम्हारा अधिकार होगा .चाहे वह खाने का सामान हो या कुछ और .अगर कुछ नहीं मिले तो दुश्मनों कीऔरतों से बलात्कार करो ,औए दुश्मन को परास्त करो .
बुखारी -जिल्द 7 किताब 65 हदीस 286 .

(नोट -इसी हदीस के अनुसार बंगलादेश के युद्ध में पाकिस्तानी सेना ने बलात्कार किया था )

5 -बलात्कार का आदेश ' 

"सैदुल खुदरी ने कहा कि रसूल ने अपने लोगों (जिहादियों )से कहा ,जाओ मुशरिकों पर हमला करो .और उनकी जितनी औरतें मिलें पकड़ लो ,और उनसे बलात्कार करो .इस से मुशरिकों के हौसले पस्त हो जायेंगे .
बुखारी -जिल्द 3 किताब 34 हदीस 432 

6 -माँ बेटी से एक साथ बलात्कार 

"आयशा ने कहा कि .रसूल अपने लोगों के साथ मिलकर पकड़ी गई औरतों से सामूहिक बलात्कार करते थे .और उन औरतीं के साथ क्रूरता का व्यवहार करते थे 
.बुहारी -जिल्द 7 किताब 62 हदीस 67 

"सैदुल खुदरी ने कहा कि रसूल ने 61 औरतों से बलात्कार किया था .जिसमे सभी शामिल थे .औरतों में कई ऎसी थीं जो माँ और बेटी थीं हमने माँ के सामने बेटी से औए बेटी के सामने माँ से बलात्कार किया
.मुस्लिम -किताब 8 हदीस 3371

और बुखारी -जिल्द 4 किताब 52 हदीस 288 

7 -बलात्कार में जल्दी नहीं करो 

"अ ने कहा कि रसूल ने कहा कि ,पकड़ी गयी औरतो से बलात्कार में जल्दी नहीं करो .और बलात्कार ने जितना लगे पूरा समय लगाओ "

बुखारी -जिल्द 2 किताब 23 हदीस 446 . 

अब जो लोग मुसलमानों और मुहम्मद को चरित्रवान और सज्जन बताने का दवा करते हैं ,वे एक बार फिर से विचार करे, इस्लाम में अच्छाई खोजना मल-मूत्र में सुगंध खोजने कि तरह है .आप एक बार मुस्लिम ब्लोगरो द्वारा इस्लाम और मुहम्मद के बारे में लिखी हुई झूठी बातों को पढ़िए फिर दिए तथ्यों पर विचार करके फैसला कीजिये ,अगर लोग   हमारे लेख पर गौर करते तो  ऐसी नौबत नहीं   आती लोग इस्लाम को पढ़ते  हैं  हमने  अनुभव किया  है 

(181/161) 

शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

बलात्कारी रसूल :इस्लामी बलात्कार विधि


( आजकल  पूरे भारत में अचानक बलात्कार की घटनाओं की संख्या   बढ़  रही है  , और जितने भी  बलात्कार  के अपराधी  पकड़े जाते  हैं    अधिकांश मुस्लिम    पाए  गए  है  ,  क्योंकि    देश में अस्थिरता  और   असुरक्षता    की भावना   पैदा करने के लिए  योजनाबद्ध   बलात्कार  किये  जा  रहे है  ,  मुस्लिम इसे  अपराध  नहीं  रसूल  की सुन्नत     मानते   है  ,  लोगों  को यह बताने के लिए  हम   यह  9 नवम्बर   2011 का पुराना लेख  पोस्ट  कर  रहे  हैं  )


सम्पूर्ण इस्लाम केवल इन पांच शब्दों में समाहित है .अय्याशी ,आतंक ,बलात्कार ,लूट और ह्त्या.केवल इन्हीं शब्दों से आप इस्लाम को आसानी से समझ सकते हैं मुसलमान सही कहते हैं कि मुहम्मद जैसा (xxx )कोई न तो हुआ है और न होगा .मुहम्मद इन शब्दों का साक्षात स्वरूप है .अपनी ग्यारह पत्निया और कई रखेलों के अलावा कई दासियों से भी उसकी वासना शांत नहीं होती थी .और मरते दम तक बनी रही ,इसके लिए वह अक्सर "गज़वा"यानी लूट पर निकल जाता है .और लोगों से कहता था कि मुझे अभी अभी अल्लाह का आदेश मिला है .लोग धन और औरतों के लालच में इस गज़वा में शामिल हो जाते थे .मुहम्मद ने ऐसे कई गज़वा यानी लूट अभियान किये थे .हम एक का विवरण दे रहे हैं -

1 -मुहम्मद को औरतें क्यों चाहिए थीं 

"अबू हुरैरा से रिवायत है ,रसूल ने कहा औरतें चार कारणों से पकड़ी जाती हैं ,उनका धन (कीमत )उनका खानदान (प्रतिष्ठा बढ़ने हेतू )उनकी सुन्दरता (अय्याशी के लिए )और उनका धर्म .
बुखारी -जिल्द 7 किताब 62 हदीस 27 

मुहम्मद जब भी लूट पर जाता था ,तो उसका लक्ष्य धन के साथ औरतें भी थीं इसके लिए वह निर्दोषों की ह्त्या तक करवा देता था .

2 -बनू कुरैज़ा हत्याकांड 

सन 628 में मुहम्मद अपने हजारों लोगों के साथ मदीना से 90 मील दूर बनू कुरेजा नामके एक यहूदी कबीले पर लूट के लिए गया .कबीले के सरदार "किनाना इब्न अल रबी इब्न अबू अल हयाक"की शादी एक दिन पाहिले ही हुई थी .उसकी 20 साल की सुन्दर पत्नी "जुबैरिया बिन्त हारिस इब्न अल मुस्तालिक "से हुई थी जो सन 608 में मदीना में पैदा हुई थी .कनाना धर्मगुरु और कबीले का सरदार था .

3 -मुहम्मद ने अचानक हमला करवाया .

"इब्ने ओन ने कहा कि ,रसूल ने बनू कुरेजा पर बिना कारण अचानक हमला करवाया .उस समय कबीले के लोग जानवरों को पानी पिला रहे थे .बच्चे खेल रहे थे ,औरते कम में लगी थी .नबी के हुक्म से हम लोग मर्दों ,बच्चों को क़त्ल करने लगे .और औरतों को पकड़ने लगे .बिलाल और इब्ने उमर जुबैरिया को नबी के हवाले कर दिया .नबी को वह पसंद आगयी .बुखारी -जिल्द 3 किताब 46 हदीस 417 

4 -लूट में मुहम्मद भी शामिल था 

"ओन ने कहा कि इस लूट में अधिकाँश लोग मारे गए जिनमे बड़े बच्चे भी थे औरते जब भाग रही थीं नबी ने जुबैरिया को पकड लिया ,और नबी ने अब्दुला बिन उमर को और औरतें पकड़ने को कहा .
मुस्लिम -किताब 19 हदीस 4292 

5 - किनाना पर अत्याचार .

"नबी ने जुबैर बिन अल अव्वाम को हुक्म दिया कि किनाना के सीने पर आग जला दो .जब किनाना अधमरा हो गया तो रसूल ने "महमूद बिन मुसलामाह "से किनाना का सर कटवा दिया 
(Life of muhammad -0xford -page 515 

6 -मुहम्मद की जुबैरिया से शर्त 

"जुबैरिया काफी सुन्दर थी .जब जुबैरिया ने अपना परिचय दिया तो मुहम्मद ने जुबैया से सौ लोगों की जान के बदले उसी समय सम्भोग करवाने की नीचतापूर्ण शर्त रख दी .विवश होकर जुबैरिया मान गयी .
अबू दौउद -किताब 29 हदीस 3290 

7 -जुबैरिया मुहम्मद को टालती रही .

मुहम्मद जुबैरिया से उसी समय सम्भोग करना चाहता ,लेकिन जुबैरिया बहाने करती रही कि उसका उपवास है .

"जुबैरिया ने मुहम्मद से बहाने के लिए उपवास शुरू कर दिया ,लेकिन नबी ने उसका उपवास जबरन तुड़वा दिया .और जुबैरिया को शादी के बहाने उसी समय सम्भोग के लिए विवश कर दिया .
बुखारी -जिल्द 3 किताब 31 हदीस 207 

8 -साफिया के साथ बलात्कार .

उसी लूट में "साफिया बिन्त हुहीय "नामकी एक और लड़की भी मुहम्मद के हाथ आयी .वह किनाना की Chief Mistress थी साफिया सन 610 में पैदा हुई थी .जब मुहम्मद लूट के बाद अपने लुटेरों और पकड़ी गयी औरतों को लेकर वापस मदीने जा रहा था .वह रास्ते में "सिद्द अश्शाबा "नामकी जगह पर ठहर गया .उसने अपने गुलाम "बिलाल "से कहा कि बनू कुरेजा की किसी सुन्दर औरत को लाओ .बिलाल ने साफिया को पेश कर दिया 
.बुखारी -जिल्द 2 किताब 14 हदीस 68 
और लाइफ ऑफ़ मुहम्मद ऑक्सफोर्ड .पेज 391 ,392 

9 -रास्ते में ही बलात्कार 

मुहम्मद ने मदीना पहुँचाने तक सब्र नहीं किया .और तुरंत बलात्कार कर डाला .इसकी कई हदीसें है ,कुछ दे रहे हैं .

"मुहम्मद ने बिलाल से एक चमड़े का गद्दा बिछाने को कहा ,जिसमे खजूर के पत्ते कूट कर भरे थे .रसूल ने साफिया को उसी पर गिरा कर सबके सामने सम्भोग किया .
मुस्लिम -किताब 8 हदीस 3329 

बुखारी -जिल्द 1 किताब 8 हदीस 367 
बुखारी -जिल्द 3 किताब 34 हदीस 437 
बुखारी -जिल्द 5 किताब 59 हदीस 512 

10 -मुहम्मद की इस्लामी बलात्कार की विधि 

चूकी मुहम्मद पकड़ी गयी जादा औरतों से बलात्कार करके उन्हें या तो अपने लोगों में बाँट देता था या बेच देता था .वह औरतों को गर्भवती नहीं होने देता था .गर्भवती औरतों की कीमत कम हो जाती थी .इसके लिए मुहम्मद सम्भोग में "अज़ल "करता था .इसमे सम्भोग के बाद स्खलन से पूर्व अपना वीर्य जमीन पर गिरा दिया जाता है .
पुरी विधि यह है -

Al-'Azl, (العزل) also known as coitus interruptus, is the practice of having sexual intercourse with a woman but withdrawing the penis before ejaculation. Apparently al-'Azl with female captives and slaves was a pretty important topic for Muhammad and his companions as is evidenced by the abundance of Hadith material on the  subject

11- -अज़ल के समय कुरआन नाजिल होती थी 

"जबीर ने कहा कि ,जब भी रसूल अज़ल करते थे कुरआन की आयत नाजिल होती थी .
बुखारी -जिल्द 7 किताब 62 हदीस 136 


"रसूल दासियों के साथ अज़ल करते थे ..बुखारी -जिल्द 7 किताब 62 हदीस 135 


"अबू सईद ने कहा कि नबी ने कहा कि गुलाम औरतों से अज़ल जायज है .अल्लाह ने औरतों को इसी लिए बनाया है

अबू दौउद -जिल्द 11 किताब 21 हदीस 66 

12 -औरतें खेती है ,पानी डालो या सूखा छोड़ दो 

"जिद बिन साबित से रिवायत है ,रसूल ने कहा दासियाँ खेती है .तुम चाहो पानी डालो या नही ."
मुवात्ता -जिल्द 29 किताब 32 हदीस 99 

13 -बलात्कार जायज है 

"तुम्हें पकड़ी गई औरतों से पूछने की जरूरत नही है कि वह सम्भोग के लिए राजी हैं या नहीं .तुम जबरदस्ती सम्भोग कर सकते हो ..उनकी इच्छा का कोई महत्त्व नहीं है .
मुवात्ता -जिल्द 29 किताब 32 हदीस 100 

अन्य हदीसें भी देख लीजिये -

मुस्लिम -किताब 8 हदीस 3394. ,3373 ,3374 

मुवात्ता -जिल्द 29 किताब 32 हदीस 96 ,97 मुवता -जिल्द 8 किताब 23 हदीस 25 

अब इतने प्रमाण होने पर भी लोग मुहम्मद को आदर्श पुरुष साबित करना चाहते हैं और दूसरों को नीचा साबित करना चाहते है .मुहम्मद पर तो "दरूद "तारीफ़ की जगह "मरदूद "करना चाहिए .

मेरा मुस्लिम महिला ब्लोगरों से निवेदन है कि यह लेख जरुर पढ़ें .और प्यारे रसूल के बारे में महिलाओं को बता कर सवाब कमायें .

(181/151) Dt-09/01/2010


बुधवार, 27 नवंबर 2019

अल्लाह की पत्नी भी है !

इस लेख  का  शीर्षक  पढ़ कर  पाठक  जरूर  चौंक  जायेगे   , और कुछ लोग  इसे  झूठ  , और कोरी गप्प    भी  मान लेंगे , लेकिन  यह बात  बिलकुल  सत्य  और  प्रामाणिक  है   , लेकिन   इस  सत्य   को समझने के लिए  हमें   पता  होना  चाहिए कि  कुरान   से पहले भी अल्लाह  की  तीन  और किताबें   थीं  ,  जिनके नाम  तौरेत  ,  जबूर  और  इंजील   हैं   , इस्लामी   मान्यता  के अनुसार  अल्लाह  ने  जैसे मुहम्मद  साहब  पर  कुरान   नाजिल  की थी  ,उसी तरह  मूसा को  तौरेत  , दाऊद  को  जबूर  और  ईसा को  इंजील नाजिल  की थी  . यहूदी  सिर्फ  तौरेत  और  जबूर  को  और ईसाई  इन तीनों  पर  ईमान  रखते हैं  ,क्योंकि   खुद  कुरान     ने  कहा है  ,

1-कुरान और तौरेत  का  अल्लाह  एक  है 

"कहो  हम  ईमान  लाये  उस  चीज  पर  जो ,जो हम पर भी  उतारी   गयी  है  , और तुम पर भी उतारी  गयी  है  , और हमारा  इलाह और तुम्हारा इलाह   एक ही है  . हम  उसी  के  मुस्लिम  हैं  " सूरा  -अल  अनकबूत 29:46 


""We believe in that which has been revealed to us and revealed to you. And our God and your God is one; and we are Muslims [in submission] to Him."Sura -al ankabut  29;46



    "وَإِلَـٰهُنَا وَإِلَـٰهُكُمْ وَاحِدٌ وَنَحْنُ لَهُ مُسْلِمُونَ  "

इलाहुना  व् इलाहकुम   वाहिद  , व्  नहनु  लहु  मुस्लिमून "

यही  नहीं  कुरान  के अलावा  अल्लाह  की  किताबों   में  तौरेत इसलिए  महत्वपूर्ण  है क्योंकि   कुरान  में तौरेत  शब्द  18  बार  और उसके  रसूल  मूसा का नाम  136  बार  आया   है   , यही नहीं  मुहम्मद  साहब  भी    तौरेत  और उसके  लाने वाले  मूसा  पर ईमान  रखते  थे  ,  जैसा की  इस हदीस में   कहा है  ,

"अब्दुल्लाह  इब्न  उमर  ने कहा   कि  एक बार  यहूदियों   ने  रसूल   को  अपने  मदरसे में   बुलाया  और ,अबुल  कासिम   नामक  व्यक्ति  का फैसला  करने को कहा  ,  जिसने  एक  औरत   के साथ  व्यभिचार   किया  था  . लोगों   ने  रसूल  को  बैठने के लिए  एक गद्दी  दी  , लेकिन  रसूल  ने उस  पर तौरेत  रख   दी  . और  कहा  मैं तुझ  पर और  उस पर  ईमान रखता हूँ   और  जिस पर तू  नाजिल   की गयी  है  , फिर रसूल ने कहा तुम लोग वाही करो  जो  तौरेत में लिखाहै  . यानी   व्यभिचारि  को  पत्थर  मार   कर मौत  की  सजा , 

(महम्मद  साहब   ने अरबी  में  कहा-

 "आमन्तु बिक  व् मन अंजलक -  ‏ آمَنْتُ بِكِ وَبِمَنْ أَنْزَلَكِ ‏"‏ ‏.‏     " I believed in thee and in Him Who revealed thee.

सुन्नन  अबी  दाऊद -किताब  39  हदीस  4434 

इन  कुरान  और  हदीस  के हवालों  से  सिद्ध  होता है  कि  यहूदियों  और मुसलमानों  का अल्लाह एक  ही  है और  तौरेत  भी कुरान की तरह  प्रामाणिक    है  . 
चूँकि  लेख  अल्लाह  और  उसकी  पत्नी  के बारे में है इसलिए हमें यहूदी  धर्म से  काफी पहले के धर्म  और  उनकी  संस्कृति  के बारे में  जानना    भी जरूरी  है  .

2-मीडियन  धर्म  क्या   था  ?
इतिहास के अनुसार  ईसा  पूर्व 2200 -1700  के  बीच पूर्वोत्तर  अरब  प्रायद्वीप  में  मीडियन धर्म  प्रचलित था  ,जिसे  अरबी में " मदयन -مدين‎    "   और  ग्रीक भाषा में  मीडियन - Μαδιάμ)"  कहा  जाता  था .इस  धर्म   का   प्रसार  अकाबा की  खाड़ी  से लाल  सागरकी   सीमा   तक  था  . मीडियन  लोग " बाअल  , और  बोएर   देवता  के  साथ  स्वर्ग  की  देवी अश्तरोथ ( Ashteroth  )  देवी  की  पूजा  करते  थे  , यह भी कहा जाता है कि  मदयं के जंगल में ही  मूसा   को एक  जलती  हुई  झड़ी  के पीछे  यहोवा  ने  दर्शन   दिए  थे  , इस के बाद  मदयन  के  लोग  भी  यहोवा  की  पूजा  करने  लगे  , और  यहोवा यहूदियों  के ईश्वर की तरह  यरूशलेम  में   पूजने  लगा  , 
 
3-अल्लाह को  कैसे  बनाया  गया  ?
जिस अल्लाह के  नाम पर  मुसलमान  सारी  दुनिया में    जिहादी  आतंक  फैला कर  रोज  हजारों  निर्दोष  लोगों  की हत्या  करते  रहते हैं  , उसी  अल्लाह के बारे में  एक   उर्दू  के  शायर में   यह  लिखा   है  ,

"शुक्र  कर खुदाया  , मैंने  तुझे  बनाया  , तुझे  कौन  पूछता  था  मेरी  बंदगी  से  पहले "

शायर की  यह   बात शतप्रतिशत  सत्य  है  क़्योकि इस्लाम  से पहले  अरब  में  कोई अल्लाह  का नाम  भी नहीं   जनता था    . यहांतक जिन  तौरेत  ,जबूर  और इंजील   को मुसलमान  अल्लाह  की   कुरान से पहले  की किताबें  कहते हैं  , उन में भी  अल्लाह  शब्द    नहीं   मिलता   है  ,
तौरेत  यानि   बाइबिल   के  पुराने  नियम   में ईश्वर  (God ) के  लिए हिब्रू  में " य  ह वे ह -  Hebrew: יהוה‎ "शब्द  आया   है    ,जो  एक उपाधि ( epithet  )  है  . तौरेत में  इस  शब्द का  प्रयोग तब से होने लगा जब  यहूदियों   ने  यहोवा  को इस्राएल और  जूडिया    का राष्ट्रीय  ईश्वर बना  दिया  था  , इस से पहले  इस भूभाग में फोनेशियन  और कनानी संस्कृति  थी   ,जिनके  सबसे बड़े  देवता का   नाम  हिब्रू में  "एल -  אל‎ " था  . जिसे  अरबी   में "इल -إل‎  "या  इलाह  إله-"  भी   कहा जाता था   , और अक्कादियन लोग  उसे "इलु - Ilu   "कहते थे . इन सभी  शब्दों   का  अर्थ  "देवता  -god "   होता   है  . इस  "एल " देवता को मानव  जाति  ,और सृष्टि  को पैदा  करने वाला   और "अशेरा -" देवी का पति माना जाता था
.
 (El or Il was a god also known as the Father of humanity and all creatures, and the husband of the goddess Asherah (בעלה של אלת האשרה) .सीरिया   के  वर्त्तमान" रास अस शमरा -رأس شمرا‎,  "  नामकी   जगह   करीब 2200  साल  ईसा पूर्व  एक मिटटी  की तख्ती  मिली  थी , जिसने  इलाह  देवता और उसकी पत्नी  अशेरा    के बारे में  लिखा     था  , 

पूरी  कुरान   में  269  बार  इलाह -  إله-"    " शब्द   का  प्रयोग   किया  गया   है   ,  और  इस्लाम  के बाद  उसी  इलाह  शब्द  के  पहले अरबी  का डेफ़िनिट आर्टिकल "अल -  ال"  लगा  कर अल्लाह ( ال+اله  ) शब्द  गढ़  लिया  गया   है  , जो आज मुसलमानों  का अल्लाह   बना हुआ है .  इसी  इलाह   यानी  अल्लाह की  पत्नी  का नाम  अशेरा  है   .

4-अशेरा   का  परिचय 

  अक्कादिअन   लेखों  में  अशेरा    को अशेरथ  (Athirath )  भी   कहा   गया  है   ,  इसे मातृृत्व और  उत्पादक    की  देवी   भी  माना जाता  था   , यह सबसे बड़े देवता "एल "  की  पत्नी  थी   .  इब्राहिम   से  पहले  यह  देवी मदयन  से  इजराइल  में   आगयी  थी।  इस्राइली इसे    भूमि केदेवी   भी   मानते थे।  इजराइल  के लोगों  ने  इसका  हिब्रू  नाम "अशेरह - אֲשֵׁרָה‎),  " कर  दिया  . और यरूशलेम  स्थित  यहोवा  के मंदिर में इसकी  मूर्ति  भी  स्थापित कर  दी  गयी थी  .अरब  के  लोग  इसे " अशरह -عشيره   "  कहते   थे  , और हजारों  साल  तक यहोवा   के  साथ   इसकी  पूजा  होती    रही   थी   .

5-अशेरा अल्लाह  की  पत्नी 

अशेरा   यहोवा  उर्फ़   इलाह  यानी  अल्लाह   की  पत्नी   है  यह बात  तौरेत  की  इन  आयतों  से साबित होती   है   ,  जो इस प्रकार है 
   

"HWH came from sinai ,and shone forth from his own seir ,He showed himself from mount Paran ,yes he came among the  myriads of Qudhsu  at his right  hand , his own  Ashera indeed , he who loves clan and all his  holy ones  on his left "

"यहोवा  सिनाई  से  आया  , और सेईर से  पारान  पर्वत  से  हजारों  के बीच में खुद  को  प्रकाशित किया  , दायीं  तरफ कुदशु (Qudshu:( Naked Goddess of Heaven and Earth') और उसकी  "अशेरा ", और  जिनको वह  प्रेम  करता  है  वह   लोग   बायीं  तरफ   थे "

 
तौरेत  - व्यवस्था   विवरण 33 :2 -3 (Deuteronomy 33.2-3,)

नोट - ध्यान  करने  योग्य  की   बात है कि  तौरेत  में  हिब्रू (Hebrew )  भाषा  में  साफ़ लिखा  है  "यहोवा  व् अशेरती -  יהוה ואשרתו " यानी  यहोवा  और उसकी  " अशेरा " अंगरेजी में  "  Yahweh and his Asherah "यहाँ  पर    मुहावरे की  भाषा  का  प्रयोग  किया  गया  है  , यहोवा  और  उसकी  अशेरा का   तात्पर्य  यहोवा  और उसकी पत्नी  अशेरा   है    , जैसे  राम  और उसकी  सीता  का  तात्पर्य  राम और उसकी  पत्नी  सीता  होता   है . 
6-तौरेत में अशेरा   का उल्लेख 

अशेरा का  उल्लेख  तौरेत  (Bible)की  इन  आयतों   में  मिलता   है
"उसने बाल  देवता  की  वेदी  के साथ  अशेरा  को भी  तोड़  दिया  " Judges 6:25).

" और  उसने अशेरा  की  जो  मूर्ति  खुदवाई उसे यहोवा के भवन में  स्थापित किया "(2 Kings 21:7

" और  जितने  पात्र अशेरा  के लिए बने हैं  उन्हें यहोवा के मंदिर से निकालकर लाओ "2 Kings 23:4)


"स्त्रियां  अशेरा  के लिए  परदे बना करती  थीं  "2 Kings 23:7).

"सामरिया  में  आहब ने अशेरा  की  मूर्ति   लगायी  "1 Kings 16:33).


Ashera  Photo (imp)

https://i.pinimg.com/originals/89/a8/6c/89a86c105c58f69d1b2e7478930b5f0c.jpg



(240)Dt-27/11/2019


मंगलवार, 26 नवंबर 2019

कुरान में शैतान की आयतें !

अक्सर  आपने जाकिर नायक जैसे अन्य मुस्लिम विद्वानों   के मुंह से सुना होगा कि यह अपने भाषणों में दावा करते रहते हैं कि कुरान  अल्लाह की आसमानी किताब है  ,और इसमें कोई  हेराफेरी   नहीं हुई और न हो सकती है जबकि  अन्य धर्म के ग्रथों में काफी  परिवर्तन हुआ है , लेकिन  यह मुस्लिम विद्वान्  मुस्लिमों    से यह  बात छुपा  देते  हैं  कि अल्लाह  के शत्रु  शैतान  ने कुरान  में अपनी  एक  आयत   जोड़  दी  थी  , और मुहम्मद  ने उसे  सबके सामने   बोल  दिया  था , शैतान  की  यह  आयत  बरसों   तक  कुरान  में   थी  ,
इस्लामी  मान्यता है कि  मनुष्यों के  मार्गदर्शन  के लिए  अल्लाह ने  मुख्य चार किताबें अपने रसूलों  पर नाजिल की थीं , जिनके नाम  तौरैत ,जबूर ,इंजील और कुरान  है .मुसलमान यह भी मानते  हैं ,कि जैसे मुहम्मद साहब अंतिम  रसूल हैं ,वैसे ही कुरान  अल्लाह की अंतिम  किताब  है .  और प्रमाणिक  है ,क्यों अन्य  तीनों  किताबों में लोगों ने शैतान  के प्रभाव में  आकर  घट -बढ़  क्र दी थी  . परन्तु कुरान  का  एक एक शब्द  अल्लाह ने  जैसा  नाजिल  किया है ,ज्यों  का त्यों  वर्त्तमान  कुरान में  मौजूद  है .
  यह तो मुसलमानों  की मान्यता  या ईमान  है .परन्तु  मुसलमानों की इस मान्यता को गलत साबित करने के लिए ,खुद  इस्लामी इतिहास  की किताबों , कुरान  की तफ़सीरों और  हदीसों  में  कई  पुख्ता सबूत  उपलब्ध    है . जैसे  यदि कोई कहे कि   कुरान  में  कुछ ऐसी आयतें  भी  ,जो शैतान  ने  मुहम्मद  साहब  के मुंह  से  कहलवायीं  थी . और  कुरान  में  मौजूद  हैं . केवल एक आयत  ऐसी  थी जो मुहम्मद की मौत के कुछ  समय  बाद  निकाल  दी गयी  थी .तब तक मुस्लिम  कुरानमें शैतान  की यह आयात  नमाज में पढ़ते  थे
इस  बात  को और स्पष्ट  करने के लिए हमें मक्का के उस घटनाक्रम  को देखना  होगा जब  मुहम्मद साहब ने मक्का में इस्लाम  का प्रचार  प्रारम्भ  कर दिया था . और खुद उनके कबीले  कुरैश  के लोग  उनका घोर  विरोध  कर रहे थे .और  विरोध  को शांत  करने के लिए   मुहम्मद  ने जो तरकीब  निकाली  थी , यही  लेख  का मुख्य विषय  है , जिसे  बिन्दुबार  स्पष्ट  किया  जा रहा है .
1-कुरैश का आरोप 
कुरैश  के लोग मुहम्मद साहब का विरोध इसलिए करते थे की वह कुरैश  के देवताओं  की निंदा   करते थे ,और पूर्वजों के धर्म की जगह    एक नया धर्म चलाना  चाहते ,और कुरान को अल्लाह की किताब  बताते थे.
यह  लोग कहते हैं कि इसने ( मुहम्मद ) ने कुरआन को खुद  गढ़  लिया  है "
सूरा -हूद 11 :13 
2-रसूल  का दावा 
जब भी लोग आरोप  लगते थे कि मुहम्मद ही  कुरान बनाते थे ,या किसी और से बनवाते थे ,तो मुहम्मद साहब यह दावा करते थे
"यदि जिन्न और  इन्सान इकट्ठे  होजाएं ,और चाहें  कि  कुरान  जैसी  किताब  बना लें ,तो वह कुरान  जैसी एक आयत  भी नहीं  बना  सकेंगे "
सूरा -बनी इस्रायेल 17 :88 
3-शैतान का भय दिखाना 
मुहम्मद साहब  हमेशा लोगों  को शैतान  का डर  दिखाते रहते थे . और आज भी मुसलमान   कुरान पढ़ते समय  अल्लाह के नाम से पहले शैतान   का  नाम  लेते हैं .भले  उस पर धिक्कार करते हों .कुरान में कहा  है ,
"और तुम  जब  भी कुरान  पढ़ने  लगो तो धिक्कारे  हुए शैतान  से बचने के लिए अल्लाह की पनाह  मांग  लिया  करो "
فَإِذَا قَرَأْتَ الْقُرْآنَ فَاسْتَعِذْ بِاللّهِ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ
सूरा -अन नहल 16 :98 
4-कुरैश   को  कैसे मनाया 
मुहम्मद साहब के कबीले  का  नाम  कुरैश  था . यह  लोग ही मक्का  स्थित काबा  के पुजारी  होते थे . जब  मुहम्मद साहब  खुले  आम    कुरैश  के देवी देवताओं  की  निंदा  करने लगे और इस्लाम  का प्रचार  करने  लगे ,तो कुरश केलोग उनके घोर  विरोधी   हो गए .और इस्लाम समर्थक  सभी  लोगों   का वहिष्कार   कर दिया .और जब कुरैश  ने अत्याचार की हद  कर दी , मुहमद साहब के साथी   जान बचने के लिए  परिवार सहित " इथोपिया - الحبشة -Abyssinia- " भाग  गए .  यह घटना हिजरी सन  से पूर्व  इस्लाम के सातवें  महिने  रजब सन  
614 -615 ईस्वी  की है .और  जब  मुहम्मद  साहब के  83  खास  लोग   भाग गए तो . मुहम्मद  साहब ने कुरैश  को मनाने के लिए  तरकीब  निकाली .और  जब वह काबा   में गये  ,तो मौजूद कुरैश के लोगों  के सामने  जोर से  सूरा  " नज्म  "  सुनाई .और जब उन्होंने  सूरा  नज्म-53   की   आयत  19  से 21  सुनाई  तो  कुरश के लोग खुश  हो गए . और बोले आखिर  मुहम्मद को  हमारे  देवताओं  की  महानता  का  बोध  हो गया . तब  मुहम्मद  साहब के साथ  उपस्थित सभी  लोगों ने मिलकर  काबा में  नमाज पढ़ी .इस घटना  का उल्लेख हदीसों और  तफ़सीरों  की  किताबों  में  है .इसी तरह  इस्लाम  के इतिहास की किताबों  में लिखा  है ,जब  मुहम्मद साहब ने  कुरैश  की देवियाँ   लात ,उज्जा ,और मनात  का उल्लेख  कुरान  में  किया तो वह संतुष्ट हो गए , और उन्होंने मुसलमानों पर जो  पाबंदी  लगा रखी थी ,उसे हटा  लिए . जैसे ही   खबर इथोपिया तक पहुंची  , जो मुहम्मद साहब के  जितने साथी भाग  गए थे सब  मक्का  वापिस  आगये .  इस तरह  मुहम्मद साहब की योजना  सफल  हो गयी .इस तरह  शैतान से प्रेरित  आयतें  कुरान  की सूरा नज्म  में  शामिल कर  ली गयी ,ताकि कुरैश  के लोग  कुरान और इस्लाम का विरोध  बंद  करदें  . लेकिन " गरानीक  "  वाली आयत  बाद में हटा दी  गयी , क्योंकि  उसका कुरैश  के देवताओं  से  कोई सम्बन्ध नहीं था .
,यह बात  इन किताबों  में मौजूद  है ..
 (Ibn Ishaq, p. 166)और (Ibn Sa'd, vol. 1, p. 237) 

5-सूरा  नज्म  में क्या है ,
मुहम्मद साहब एक चतुर चालाक व्यक्ति थे , इसलिए कुरैश  के लोगों   को खुश  करने के लि जब कुरान  की सूर नज्म की यह  आयतें सुनाने लगे तो तो बीच में शैतान  ने उनके मुंह  से  यह आयतें बुलवा दीं .सूर नज्म की यह आयतें  यह हैं , 
"
أَفَرَأَيْتُمُ اللَّاتَ وَالْعُزَّى
وَمَنَاةَ الثَّالِثَةَ الْأُخْرَى
أَلَكُمُ الذَّكَرُ وَلَهُ الْأُنثَى
"क्या तुमने  देखा ,लात और  उज्जा और तीसरी एक और है मनात  ,तुम्हारे लिए  बेटे और उसके लिए बेटियाँ
"सूरा -नज्म 53 -:19-21
تِلْكَ إِذًا قِسْمَةٌ ضِيزَى. سورة النجم - سورة ‏٥٣: ١٩-٢٢‏
  इन  आयातों  के आतिरिक्त  शैतान  ने मुहम्मद  साहब  के मुंह  से  एक और आयत बुलवाई  थी , जिसका उल्लेख जिन   इस्लामी विद्वानों ने  सूरा  नज्म की तफ़सीर में किया  है ,उनके नाम  इस प्रकार हैं ,
6-फतह अल बारी 
इब्ने हाजर  ने  सूरा  नज्म  की तफ़सीर  में  अपनी किताब फतह अल बारी में  कहा है कि  जब रसूल कुरैश  लोगों की सभा में  गए  तो जब  वह  सूरा  नज्म  पढ़ी  और जब  इस आयत पर पर पंहुचे  "क्या तुमने लात ,उज्जा  और मनात  पर  गौर किया "."तभी सैतान ने रसूल  की जीभ  को मोड़ दिया (प्रभावित ) कर दिया .जिसके कारण रसूल ने बिना जाने  यह आयत भी जोड़ दी "और ऊंचे आकाश में उड़ने वाले गरानीक ( सारस )को "वल गरानीक  अल ऊला   -و الغرانيق الاولي "रसूल  ने यह  आयत  इसलिए जोड़ दी थी .क्योंकि शैतान  ने उनकी  जीभ से यह शब्द बुलवाये   थे .

 The Prophet (s) had, during an assembly of the [men of] Quraysh, after reciting the [following verses from] sūrat al-Najm, Have you considered Lāt and ‘Uzzā? And Manāt, the third one? [53:19-20] added, as a result of Satan casting them onto his tongue without his [the Prophet’s] being aware of it, [the following words]:(
 ‘those are the high-flying crane (al-gharānīq al-‘ulā)

 that Satan had cast onto his tongue 


{ وَمَآ أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ مِن رَّسُولٍ وَلاَ نَبِيٍّ إِلاَّ إِذَا تَمَنَّىٰ أَلْقَى ٱلشَّيْطَانُ فِيۤ أُمْنِيَّتِهِ فَيَنسَخُ ٱللَّهُ مَا يُلْقِي ٱلشَّيْطَانُ ثُمَّ يُحْكِمُ ٱللَّهُ آيَاتِهِ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ }

Ibn Hajar in Fath al-Bari, 1959 ed. vol. 8:[p. 439]

7-तफ़सीर जालैन 
इमाम जलालुद्दीन  महल्ली  ( हि 864 . ई ० 1459 ) ने  कुरान  की तफ़सीर  लिखी है ,जिसका नाम " तफ़सीर जालैन -  تفسير الجلالين       " है .इस तफ़सीर  में कुरान  की सूरा नज्म 53 की आयत  19 से 21  तक की व्याख्या में  लिखा है ,शैतान  ने  रसूल  की जीभ पर असर कर  दिया था ,और जिसके कारण रसूल कुरैश  के देवताओं  का बखान  करने लगे थे . और यह आयत अपने मुंह से कही थी .
That He may make what Satan has casted for his tongue uttered mention of their gods 
.
{ لِّيَجْعَلَ مَا يُلْقِي ٱلشَّيْطَانُ فِتْنَةً لِّلَّذِينَ فِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ وَٱلْقَاسِيَةِ قُلُوبُهُمْ وَإِنَّ ٱلظَّالِمِينَ لَفِي شِقَاقٍ بَعِيدٍ }
That He may make what Satan has cast a trial, a test, for those in whose hearts is a sickness, dissension and hypocrisy, and those whose hearts are hardened, namely, the idolaters, [hardened] against acceptance of the truth. For truly the evildoers, the disbelievers, are [steeped] in extreme defiance, [in] a protracted feud with the Prophet (s) and the believers, for his tongue uttered mention of their gods in a way that pleased them, and yet this was later nullified.
* تفسير Tafsir al-Jalalayn مصنف و لم يتم تدقيقه بعد

इस घटना  का प्रमाण सही बुखारी की  इन हदीसों में मिलता है ,
8-पहली हदीस 
"अब्दुल्लाह  बिन मसूद  ने कहा कि जब रसूल  ने मक्का  में  सूरा  नज्म  की यह आयतें  पढ़ी ,तो वहां मौजूद   कुरैश के  सभी   लोगों ने रसूल के साथ  नमाज पढ़ी ,तब रसूल  ने कहा अब मुझे संतोष  हुआ है "
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ بَشَّارٍ، قَالَ حَدَّثَنَا غُنْدَرٌ، قَالَ حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ، قَالَ سَمِعْتُ الأَسْوَدَ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ ـ رضى الله عنه ـ قَالَ قَرَأَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم النَّجْمَ بِمَكَّةَ فَسَجَدَ فِيهَا، وَسَجَدَ مَنْ مَعَهُ، غَيْرَ شَيْخٍ أَخَذَ كَفًّا مِنْ حَصًى أَوْ تُرَابٍ فَرَفَعَهُ إِلَى جَبْهَتِهِ وَقَالَ يَكْفِينِي هَذَا‏.‏ فَرَأَيْتُهُ بَعْدَ ذَلِكَ قُتِلَ كَافِرًا‏.‏
बुखारी -जिल्द 2  किताब 19 हदीस 173
9-दूसरी  हदीस 
"इब्ने अब्बास  ने कहा कि जा रसूल  ने सूर नज्म  की यह  आयतें  पढ़ी ,तो कुरैश  के लोग खुश हो गए .फिर इसके बाद  रसूल के साथ   मुशरिकों , जिन्नों  और  इंसानों  ने नमाज पढ़ी .
 حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، قَالَ حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَارِثِ، قَالَ حَدَّثَنَا أَيُّوبُ، عَنْ عِكْرِمَةَ، عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ ـ رضى الله عنهما أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم سَجَدَ بِالنَّجْمِ وَسَجَدَ مَعَهُ الْمُسْلِمُونَ وَالْمُشْرِكُونَ وَالْجِنُّ وَالإِنْسُ‏.‏ وَرَوَاهُ ابْنُ طَهْمَانَ عَنْ أَيُّوبَ‏.‏
बुखारी - जिल्द 2 किताब 19 हदीस 177
10-गरानिक  क्या है 
कुरान  की सभी तफसीरों  में  यह शब्द केवल एक बार ही  मिलता . जिसे इब्ने इशाक  ने दिया है " गरानिक-غرنيق " एक  पक्षी   बताया   गया है आकाश में  काफी ऊंचाई पर  उडता  है .इसका समानार्थी शब्द अंगरेजी में  नहीं  मिलता . लोग  इस पक्षी के लिए  "crane" , "eagle"प्रयोग  करते  हैं .यह  बाज "   "की तरह एक पक्षी  है . अरबी में इसका एकवचन " गिरनिक - غرنيق" और बहु बचन "गिरानीक  - غرانيق "  होता  है .और मुहम्मद  साहब ने शैतान   द्वारा प्रेरित आयात में  इसी  का  उल्लेख  किया  है . (Ibn Ishaq, pp. 165-166)
11-मुहम्मद पर शैतान का प्रभाव 
खुद कुरान  इस बात को मानती  है  कि अल्लाह के रसूलों को शैतान प्रभावित  करता है , और उन से  कुछ  भी करा  सकता  है ,कुरान की इस आयत से यह सिद्ध  होता है ,
" हे मुहम्मद तुम से पहले  जितने रसूल और नबी हमने भेजे थे  . शैतान ने उनकी बातों में सत्य के साथ असत्य  मिला  दिया  था .और शैतान   यही करता  है "
सूरा -अल हज्ज 22 :52 
12-आयत  क्यों हटाई 
जब  लोग मुहम्मद  साहब की  "गरानीक " वाली बेतुकी ,निरर्थक और असम्बद्ध  आयात का  मजाक उड़ाने लगे  तो   मुहम्मद  साहब ने   कुरान इस आयत  को हटा  दिया , और   कारण  पूछने पर  यह आयत  सुना  दी ,
"हम  जब  कोई आयत निरस्त  करते  हैं  ,या  भुलवा  देते हैं  ,तो दूसरी आयत  ले आते हैं " सूरा -बकरा 2 :106 
13-हटाई  गयी आयत 
दिए गए प्रमाणों के अनुसार शैतान  ने मुहम्मद साहब  के मुंह से  चार आयतें  बुलवाई  थी ,जिन में से तीन  कुरान की सूरा   नज्म सूरा संख्या 53 की आयत संख्या  19  से  21  हैं .और जो इनके बाद  की आयत थी वह इस प्रकार है ,
"वल गरानीक  अल ऊला   -و الغرانيق الاولي "अर्थात " और वह आकाश की ऊंचाई पर गरनीक -  ‘those are the high-flying gharniq "

इन सभी सबूतों से यही निष्कर्ष निकलता है ,कि जिस कुरान  में शैतान  की आयतें  मौजूद  हों ,उस पर विश्वास  करना   बेकार है . जैसे सौ  किलो दूध में  अगर एक ग्राम  जहर भी  मिलादिया जाये तो लोग उस दूध  को नहीं  पियेंगे . हमें अधिक कहने  की जरुरत नहीं , समझदार लोग  इतने  से ही समझ  लेंगे .

(200/121)Dt-26/11/2019 (01/09/2013

शुक्रवार, 15 नवंबर 2019

सुप्रीम कोर्ट के न्याय से ओवैसियों में हाय हाय ! !

हम  सभी राम भक्त   माननीय  ऊच्चतम   न्यायालय का  हृदय से आभार मानते  हैं कि उसने निर्धारित समय सीमा  में   491 साल पुराने राम मंदिर प्रकरण  का सदा  के लिए निपटारा कर  दिया  , इतिहास  में पहली  बार  अदालत  ने  किसी मामले का फैसला  नहीं बल्कि न्याय  किया  है  ,इस न्याय  में कुछ   ऐसी महत्वपूर्ण हुई  हैं   ,जो पहले  किसी  अदालत  या  मामले  में नहीं   हुई  भविष्य में  नजीर  मानी  जाएँगी  , जैसे  ,
1-अदालत  ने भगवान  राम   को कल्पित  चरित्र  नही  बल्कि राम  के बाल  रूप  राम लला  के नाम  से एक पक्षकार  यानी  जीवित व्यक्ति   मना   है  ,और उनको अबतक विवाद  ग्रस्त  रही भूमि  का  असली स्वामी  मानकर भूमि  का अधिपत्य  उनको  सौंप  दिया 
2-अदालत  ने हिन्दू  और मुस्लिम  दौनों  पक्षकारो  की  आस्थाओं   को  अमान्य   कर   दिया  ,हिन्दुओं   की  दलील  थी कि हमारी आस्था   है कि भगवान  राम   का  जन्म उसी जगह हुआ  था   आज  जहाँ  बाबरी  ढांचा  है  ,  और मुस्लिमों  की  दलील थी  कि हमारी शरीयत पर  आस्था  है  ,  और मस्जिद अल्लाह  का घर  होती  है  ,  जिसे हटाया   नहीं  जा  सकता  ,  अदालत  ने दोनो  की  बात  नहीं  मानी     
2-अदालत  ने  आस्था  को दरकिनार  करते हुए  पुरातत्व  विभाग  द्वारा  अयोध्या  की खुदाई  को रिपोर्ट  को  प्रमाण  माना  , और कहा   की  विज्ञानं  की   अन्य  शाखाओं  की  तरह  "आर्कियोलॉजी  (Archeology   ) भी  एक विज्ञानं  है  ,और इसकी रिपोर्ट   बताती है की बाबर   से भी काफी पहले इस जगह  हिन्दू मंदिर  था  जिसे तोड़ कर  मस्जिद  बनायीं   गयी  थी  ,  इसलिए  जिस जगह  का   असली स्वामी   राम लला   है  , 
 और  मुस्लिमों  से कहा मस्जिद अल्लाह  घर  नहीं  है उसे दूसरी  जगह  हटाया  जा  सकता   है . लेकिन   ओवैसी और उसके   चमचों को  अदालत यह न्याय पसंद  नहीं  आया   , और जब  अदालत ने मुसलमानों  को   पांच  एकड़  देकर दूसरी जगह  मस्जिद  बनाने  का  निर्णय  दिया तो ओवैसी  और बौखला गया  , और बोला हमें     खैरात में  जमीन   नहीं  चाहिए  ,  हम  खुद्दार  लोग  हैं   , अपने पैसों   से जमीन  खरीद  कर  मस्जिद  बना  सकते  है  , 
हम  ओवैसी  से पूछना  चाहते  है  की  अगर उसमे सचमुच  खुद्दारी  है  ,तो वह एक भी ऐसी मस्जिद बताये  जो उसके लुटेरे पुरखों  ने जमीन  खरीद  कर बनवायी   हो  , सिर्फ  भारत नहीं  पूरी  दुनियां  में मुसलमानों  ने जीतनी  भी  मस्जिदें  बनवायी  है  ,सभी  दूसरे  धर्म   के लोगों  उपासना स्थल  तोड़  कर बनायीं है  ,  या  दूसरों  के  धर्म  स्थानों  पर  कब्ज़ा  कर  के बनायीं  हैं   ,यहां  तक मुहमद  काबा  की मूर्तियों  तोड़  कर वहां  अपना  अल्लाह  घुसा    दिया  , और  उसी  के पास  शैतान     को  बसा  दिया  ,यानि अल्लाह को  शैतान का पड़ौसी  बना   दिया   
3-राममंदिर  न्यास का गठन 
हमें इस कटु सत्य को स्वीकार करना  होगा  की सभी मंदिरों  के पुजारी  ,महंत  ,पण्डे   किसी  दरगाह के खादिमों की तरह  स्वार्थी  और लालची  होते  हैं  ,  इन  पाखंडियों   ने पैसों  के लालच  में राहुल गाँधी  जैसे हिन्दू द्रोही  को मंदिर में प्रवेश     करा दिया  ,लेकिन यदि कोई   निम्न जाती का  व्यक्ति किसी मंदिर के गर्भ गृह   तक  जाने  की  इच्छा  करे  तो यही महंत  उसे बहार  से  ही भगा   देते  ,  इसी लिए जैसे ही राम मदिर  के निर्माण  का रास्ता  साफ  हो गया यह  ढोंगी  संत  ,महंत मेकअप  करके   राम  मदिर  न्यास  ( Trust  )   में घुसने  की तरकीबें  निकालने  लगे  ताकि  अपना मोटा  पेट  भरते  रहें  , इसी लालच  के  लिए यह  हिन्दू दल    आपस में ही लड़ने  लगे    कमलेश  तिवारी  की हत्या  का  यही आपसी झगड़ा  है  ,यह तुलसीदास  के चेले    अभी  से ईंटों  के नाम  से लोगों   से धन  जुटाने के  लग  गए   जबकि तिरुपत   बालाजी ट्रस्ट में राम मंदिर निर्माण के लिए  1 अरब 
 यानि  सौ  करोड़  रूपया    दे दिया  है  , इसलिए  हमारा सुझाव है कि  इन कीर्तन कारी  गवैये  लोगों को न्यास में  नहीं  रखा जाये   नहीं तो यह लोग को  कथा कीर्तन   सुना  सुना कर हिन्दू   पुरषों   को भांड  और स्त्रियों  को नर्तकी  बना  कर रख  देंगे     इसके  अतिरिक्त  कुछ सुझाव  इस प्रकार  हैं
1- , एक व्यक्ति वाल्मीकि    समाज  से हो  क्योंक  अगर वाल्मीकि नहीं होते तो राम  के बारे में  किसी को कूछ पता  नहीं  होता ,  तुलसी दस   ने तो  राम को कल्पित   साबित  करने में कोई कसर नहीं  छोड़ी   ,  क्योंकि  जब काशी के लोगों  ने तुलसी दास को  रहने के  लिए जगह नहीं  दी  थी  , तो तुलसी दास के घनिष्ट मित्र    अब्दुल  रहीम  खान  खाना   ने  तुलसी  दास  को  एक मस्जिद  में रहने   की जगह  दी  थी  , उसी मस्जिद  में बैठ  कर तुलसी  दास  ने  राम  चरित  मानस  नाम  की किताब  रची  ,  जिसके कारन   हिन्दू अपने सभी ग्रन्थ   भूल  गए  ,  यह मुसलमानों  की सांगत  का  असर  है ,
कुछ   सेकुलर  यह भी  मांग करने लगे कि परातत्ववेत्ता  के के  मुहम्मद  को न्यास का   सदस्य बनाया जाये क्योंकि उन्ही के  प्रयासों से  सुप्रीम कोर्ट ने माना  की राम  का जन्म उसी जगह हुआ  जहा पहले  बाबरी ढाँचा  था  , हमारा  सुझाव है कि इनको ट्रस्टी न  बना कर  सम्मानित  कर  दिया  जाये 
इसके  अतिरिक्त   ,   न्यास  में  ऐक केवट  ,  ऐक भील   , और  एक  वनवासी  को  जरूर  रखा  जाये  , क्योंकि इनका उल्लेख    राम  के इतिहास में  है  ,  साथ  में  एक  जैन   को भी रखा  जाये  क्योंकि   भगवान महावीर  भी  इक्ष्वाकु  वंश  में हुए  थे जो  राम  के पूर्वज  थे  ,  और एक सिख  को भी  लिया  जाए क्योंकि   गुरुगोविंद  सिंह  भी   राम  के वंशज   है  और निहंग   सिक्खों  ने राम  मंदिर  के लिए  युद्ध   किया  था ,
अगर ऐसा किया गया तो उन   आंबेडकरवादियों   का मुंह बंद हो जायेगा जो कहते हैं कि हिंदू  धर्म  सिर्फ   सवर्ण लोगों  के  लिए है ,  इसमें  दलित  और पिछड़े लोगों   के लिए कोई  स्थान   नहीं   है  , इस  से कान्ग्रेसिओं     का मुंह  भी काला हो  जायेगा हो  हमें    सम्प्रदायवादी     कहते  हैं  ,
लेकिन भूल  करके भी  किसी सेकुलर  या  कांग्रेसी को     ट्रस्टी  नहीं  बनाया  जाये  चाहे वह सुप्रीम कोर्ट का रिटायर्ड  जज ही क्यों न   हो 
  
  ऐसा  करने  से पूरे  हिन्दुओं  को ऐसा  लगेगा  जैसे  सचमुच    रामराज्य   आगया   है ,
(422 )

मंगलवार, 12 नवंबर 2019

मुसलमानों के अधिकार का औचित्य !

विश्व के हरेक व्यक्ति को उसके मौलिक अधिकार मिलना चाहिए . सभी इस बात पर सहमत होंगे . परन्तु इस बात से भी सभी लोग सहमत होंगे अधिकारों का जन्म कर्तव्य से होता है . सिर्फ जनसख्या कम होने के आधार पर ही अधिकारों की मांग करना तर्कसंगत नहीं है . सब जानते कि मुसलमानों ने सैकड़ों साल तक इस देश को लूट लूट कर कंगाल कर दिया . लोगों की भलाई की जगह मकबरे , कबरिस्तान , मजार और मस्जिदें ही बनायी है . और जब हिदू देश की आजादी के लिए शहीद हो रहे थे ,तो इन्हीं मुसलमानों ने देश के टुकडे करवा दिए . फिर भी अल्पसंख्यक होने का बहाना लेकर अधिकारों की मांग कर रहे हैं . आप एक भी ऐसा मुस्लिम देश बता दीजिये जहाँ अल्पसंख्यक होने के आधार पर गैर मुस्लिमों को वह अधिकार मिलते हों ,जो मुसलमान यहाँ मांग रहे हैं . मुसलमान हमेशा दूसरों के अधिकार छीनते आये हैं और आपसी मित्रता ,सद्भाव , भाईचारे की आड़ में पीठ में छुरा भोंकते आये हैं यह इस्लाम के इतिहास से प्रमाणित होता है , मुसलमान अपनी कपट नीति नहीं छोड़ सकते , कैसे कुत्ते की पूंछ सीधी नहीं हो सकती ,
1-मुसलमानों की कपट नीति 
अरब के लोग पैदायशी लुटेरे , और सतालोभी होते हैं .मुहम्मद की मौत के बाद ही उसके रिश्तेदार खलीफा बन कर तलवार के जोर पर इस्लाम फैलाने लगे . और जिहाद के बहाने लूटमार करने लगे , यह सातवीं शताब्दी की बात है , उस समय मुसलमानों का दूसरा खलीफा "उमर इब्ने खत्ताब " दमिश्क पर हमला करके उस पर कब्ज़ा कर चुका था . उम्र का जन्म सन 586और 590 ईस्वी के बीच हुआ था और मौत 7नवम्बर 644 ईस्वी में हुई थी . चूंकि यरूशलेम दमिश्क के पास था ,और वहां बहुसंख्यक ईसाई थे . यरूशलेम स्थानीय शासन "पेट्रीआर्क सोफ़्रोनिअसSophronius  " (Σωφρόνιος ) के हाथों में था . ईसाई उसे संत (Saint ) भी मानते थे .यरूशलेम यहूदियों ,ईसाइयों और मुसलमानों के लिए पवित्र शहर था . और उमर बिना खूनखराबा के यरूशलेम को हथियाना चाहता था . इसलिए उसने एक चाल चली . और यरूशलेम के पेट्रआर्क सन्देश भेजा कि इस्लाम तो शांति का धर्म है . यदि आप के लोग समर्पण कर देगे तो हम भरोसा देते है कि आपकी और आपके लोगों के अधिकारों की रक्षा करेंगे .और इसके साथ ही उमर एक संधिपरत्र का मसौदा ( Draft ) यरूशलेम भिजवा दिया . जिस पर यरूशलेम के पेर्ट्रीआर्क ने सही कर दिए . और उमर पर भरोसा करके यरूशलेम उमर के हवाले कर दिया .
2-उमर का सन्धिपत्र 
इस्लामी इतिहास में इस संधिपत्र को " उमर का संधिपत्र ( Pact of Umar ) या " अहद अल उमरिया  العهدة العمرية‎ " कहा जाता है .इसका काल लगभग सन 637 बताया जाता है . उमर ने यह संधिपत्र "अबूबक्र मुहम्मद इब्न अल वलीद तरतूशأبو بكر محمد بن الوليد الطرطوش  " से बनवाया था .जिसने इस संधिपत्र का उल्लेख अपनी प्रसिद्ध किताब " सिराज अल मुल्क  سراج الملوك" केपेज संख्या 229 और 230 पर दिया है .इस संधिपत्र का पूरा प्रारूप " एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी University of Edinburgh  " ने सन 1979 में पकाशित किया है .इस संधिपत्र की शर्तों को पढ़ने के बाद पता चलेगा कि मित्रता के बहाने मुसलमान कैसा धोखा देते हैं . और अल्पसंख्यकों को अधिकार देने के बहाने उनके अधिकार छीन लेते है . यद्यपि उमर ने इस्लाम को शांति का धर्म बता कर लोगों गुमराह करने के लिए इस संधिपत्र बड़ा ही लुभावना शीर्षक दिया था 
3-इस्लामी शासन में गैर मुस्लिमों का अधिकार !
यद्यपि उमर का संधिपत्र सातवीं सदी में लिखा गया था लेकिन सभी मुस्लिम देश इसे अपना आदर्श मानते है . और हरेक मुस्लिम देश के कानून में उमर के संधिपत्र की कुछ न कुछ धाराएँ जरुर मौजूद है ,उमर के संधिपत्र का हिंदी अनुवाद यहाँ दिया जा रहा है ,
1-हम अपने शहर में और उसके आसपास कोई नया चर्च ,मठ , उपासना स्थल , या सन्यासियों के रहने के लिए कमरे नहीं बनवायेंगे . और उनकी मरम्मत भी नहीं करवाएंगे . चाहे दिन हो या रात
2-हम अपने घर मुस्लिम यात्रियों के लिए हमेशा खुले रखेंगे , और उनके लिए खाने पीने का इंतजाम करेंगे
3-यदि कोई हमारा व्यक्ति मुसलमानों से बचने के लिए चर्च में शरण मांगेगा ,तो हम उसे शरण नहीं देंगे
4-हम अपने बच्चों को बाईबिल नहीं पढ़ाएंगे
5-हम सार्वजनिक रूप से अपने धर्म का प्रचार नहीं करेंगे , और न किसी का धर्म परिवर्तन करेंगे .
6-हम हरेक मुसलमान के प्रति आदर प्रकट करेंगे , और उसे देखते ही आसन से उठ कर खड़े हो जायेंगे . और जब तक वह अनुमति नहीं देता आसन पर नहीं बैठेंगे .
7-हम मुसलमानों से मिलते जुलते कपडे ,पगड़ी और जूते नहीं पहिनेंगे
8-हम किसी मुसलमान के बोलने ,और लहजे की नक़ल नहीं करेंगे और न मुसलमानों जैसे उपनाम (Surname ) रखेंगे
9-हम घोड़ों पर जीन लगाकर नहीं बैठेंगे , किसी प्रकार का हथियार नहीं रखेंगे , और न तलवार पर धार लगायेंगे
10-हम अपनी मुहरों और सीलों ( Stamp ) पर अरबी के आलावा की भाषा का प्रयोग नहीं करेंगे
11-हम अपने घरों में सिरका (vinegar ) नहीं बनायेंगे
12-हम अपने सिरों के आगे के बाल कटवाते रहेंगे
13-हम अपने रिवाज के मुताबिक कपडे पहिनेंगे ,लेकिन कमर पर "जुन्नार" ( एक प्रकार का मोटा धागा ) नहीं बांधेंगे
14-हम मुस्लिम मुहल्लों से होकर अपने जुलूस नहीं निकालेंगे , और न अपनी किताबें , और क्रूस प्रदर्शित करेंगे , और अपनी प्रार्थनाएं भी धीमी आवाज में पढेंगे
15-यदि कोई हमारा सम्बन्धी मर जाये तो हम जोर जोर से नहीं रोयेंगे , और उसके जनाजे को ऐसी गलियों से नहीं निकालेंगे जहाँ मुसलमान रहते हों . और न मुस्लिम मुहल्लों के पास अपने मुर्दे दफनायेंगे
16 -यदि कोई मुसलमान हमारे किसी पुरुष या स्त्री को गुलाम बनाना चाहे ,तो हम उसका विरोध नहीं करेंगे 
17-हम अपने घर मुसलमानों से बड़े और ऊँचे नहीं बनायेंगे
" जुबैरिया बिन कदमा अत तमीमी ने कहा जब यह मसौदा तैयार हो गया तो उमर से पूछा गया , हे ईमान वालों के सरदार , क्या इस मसौदे से आप को संतोष हुआ , तो उमर बोले इसमें यह बातें भी जोड़ दो ,हम मुसलमानों द्वारा पकडे गए कैदियों की बनायीं गयी चीजें नहीं बेचेंगे . और हमारे ऊपर रसूल के द्वारा बनाया गया जजिया का नियम लागू होगा " 
बुखारी -जिल्द 4 किताब 53 हदीस 388

4-पाकिस्तान में हिन्दुओं के अधिकार 
पाकिस्तान की मांग उन्हीं मुसलमानों ने की थी जो अविभाजित भारत के उसी भाग में रहते थे जो अज का वर्त्तमान भारत है .पाकिस्तान बनाते ही जिन्ना ने कहा था आज से पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों द्वार सील हो गया है "the fate of minorities in this country was sealed forever "
पाकिस्तान में इसी लिए अकसर आये दिन हिन्दू लड़कियों पर बलात्कार होता है , मंदिर तोड़े जाते हैं , बल पूर्वक धर्म परिवर्तन कराया जाता है .और हमारी हिजड़ा सेकुलर सरकार हिना रब्बानी के साथ मुहब्बत के तराने गाती रहती है . दिखने के लिए पाकिस्तान के संविधान की धारा 20 में अल्पसंख्यकों के अधिकारों का दावा किया गया है . लेकिन मुसलमान संविधान की जगह उमर की संधि पर अमल करते हैं .
हम लोगों से पूछते हैं , सरकार मुसलमानों को अधिकार किस खजाने से देगी ? क्या सोनिया इटली से खजाना लाएगी ?सीधी सी बात है कि मुसलमानों को अधिकार हिन्दुओं से छीन कर दिया जायेगा .
और अब समय आ गया है कि हिन्दू अपना अधिकार इन लुटेरों को देने की बजाये इन छीन लें . तभी देश की गरीबी दूर हो जाएगी औए आतंकवाद भी समाप्त हो जायेगा . क्योंकि हमारे ही पैसों से हमारा ही नाश हो रहा है .
हिन्दुओ अपनी अस्मिता बचाओ , अपने अधिकार छीन लो , अभी उठो !

(200/80)