गुरुवार, 28 मार्च 2019

ईमान वालों की हिन्दू माता ?

 नोट -यह लेख  उन लोगों  के मुंह पर जूता   है ,जो दावा  करते हैं कि जब मुस्लिम विजेता  भारत  में आये तो उन्होंने भारत  के लोगों  को हिन्दू   नाम  दिया  था  , इस्लाम  से पहले हिन्दू  शब्द  नहीं   था ,

इस्लाम   से  पहले  के  अरब  के  हिंदुओं  , उनके  रीतिरिवाज    और  धार्मिक परंपरा  के बारे में लोग  बहुत  कम  जानते  हैं .इसके मुख्य  दो  कारण  है , एक तो  मुस्लमान   ने  सभी इस्लाम  से पहले  का साहित्य  नष्ट  कर  दिया .  क्योंकि  उनकी  नजर में यह अज्ञान  और  कुफ्र  की प्रेरणा  देता  है . दूसरा  कारण  है  कि  जो  कुछ  थोडा सा साहित्य  बचा  है  वह अरबी  में  है , जिसे मुस्लमान  छुपा  लेते  है , या  किसी  ने उसका अन्य  भाषा  में अनुवाद  करने  का  प्रयास  नहीं किया .
 लेकिनं  हदीसों  में  कुछ  ऐसे  प्रमाण  मिलते  हैं  जो  भारत  और अरब  के  सम्बन्ध  के  बारे में   जानकारी  देते  हैं  जिन से भी   यह भी   पता  चलता  है  कि  मुहम्मद  साहब के  समय भी  अरब मे   काफी  संख्या  में  हिन्दू  रहते थे  जिसको  हिदू  होने  पर गर्व   था . लेकिन  बहुत  कम  लोगों  को पता  होगा  कि   मुहम्मद  साहब की एक ऐसी  पत्नी  भी  थी   जो  न  सिर्फ  नाम  से हिन्दू  थी  बल्कि जिसकी  माता हिन्दू  वंश  में जन्म  होने  से   खुद  को हिन्दू होने  पर  गर्व  करती ,और जिसने    मुहम्मद  और इस्लाम  का युद्ध  में मुकाबला   भी किया  था ,
 इस संक्षिप्त  से  लेख  में  इसी विषय  में  जानकारी  देने   का प्रयास  किया  गया  है
1-अरब  में  शतरंज 
कहा जाता है कि  आज से  लगभग 1500  साल  पहले  भारत में शतरंज  के  खेल  का  अविष्कार     हुआ था  चूंकि  इस  खेल  में  चार  प्रकार  के  मोहरों   का प्रयोग   किया   जाता  था  ,संस्कृत  में  इसे "चतुरंग " कहा   जाता  था . धीमे धीमे  यह खेल   इतना   लोकप्रिय   हो  गया  कि  भारत  से  ईरान  होते  हुए  अरब  तक पहुँच   गया .अरबी भाषा  में  "च "  के लिए "श " और "ग " के लिए  "ज "  अक्षर   बोला  और  लिखा  जाता  है . इसलिए " चतुरंग " शब्द  अरबी  में "शतरंज -   الشَّطْرَنْجِ  "    हो  गया .चूँकि   यह   खेल सिर्फ  दो व्यक्ति   घर  में  ही  खेल सकते हैं  . इसलिए    मुहम्मद  साहब  के सहाबी   रात  दिन शतरंज  खेलते  रहते  थे . यह देख  कर  मुहम्मद  साहब  ने   लोगों  को यह  खेल  नहीं  खेलने   का  निर्देश   दिया  था , जैसा   इस  हदीस  में बताया  है ,

"यह्या  ने  कहा  कि जब  अब्दुल्लाह इब्न  उमर  ने  देखा  कि  उसके परिवार  के  लोग  रात दिन  शतरंज  की  गोटियों ( Dice )   से  खेलते  रहते  हैं  . तो उसने  नाराज  होकर उन  गोटियों   को  नष्ट  कर  दिया . और  कहा इस  खेल  में  कोई  लाभ  नहीं  है .बल्कि  समय   की  बर्बादी  होती   है "
وَحَدَّثَنِي عَنْ مَالِكٍ، عَنْ نَافِعٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ، أَنَّهُ كَانَ إِذَا وَجَدَ أَحَدًا مِنْ أَهْلِهِ يَلْعَبُ بِالنَّرْدِ ضَرَبَهُ وَكَسَرَهَا ‏.‏ قَالَ يَحْيَى وَسَمِعْتُ مَالِكًا يَقُولُ لاَ خَيْرَ فِي الشَّطْرَنْجِ ‏.‏ وَكَرِهَهَا وَسَمِعْتُهُ يَكْرَهُ اللَّعِبَ بِهَا وَبِغَيْرِهَا مِنَ الْبَاطِلِ وَيَتْلُو هَذِهِ الآيَةَ ‏{‏فَمَاذَا بَعْدَ الْحَقِّ إِلاَّ الضَّلاَلُ ‏}‏‏.‏

मलिक मुवत्ता - किताब  52  हदीस 7 (Arabic reference : Book 52, Hadith 1758)

2-रसूल भारतीय  दवा  देते थे 

मुहम्मद  साहब    समय    भी  भारत से अरब  में मसाले , सुगन्धित  पदार्थ   और  दवाइयां  भेजी   जाती  थी , जिनके औषधीय  गुणों  के  बारे में  महम्मद  साहब  अच्छी  तरह  से जानते  थे   जब  भी  कोई  रोगी  उनके  पास  जाता  था  , वह भारतीय  दवाओं  से   इलाज  करते  थे , और    रोगी  ठीक   हो  जाता  था ,    यह बात  इन  हदीसों  से     साबित  होती  है ,

"    उम्मे कैस  बिन्त   मिहसान   ने  कहा  कि मैंने  रसूल  से  कहा  कि  मेरे  लडके  के गले  में सूजन  है  जिस से  उसके  गले  में दर्द   हो रहा  है . और उसके  फेफड़े   में सूजन   है . रसूल  ने कहा   तुम " ऊदल  हिन्दी -الْعُودِ الْهِنْدِيِّ "  लेकर लड़के  के  मुंह  के अंदर लगा  दो . और  यह दवा उसको  सूंघाते  रहो  . इस से  बीमारी  ठीक  हो  जायेगी . रसूल ने  कहा ऊदल  हिन्दी  सात प्रकार  की  बीमारियां   ठीक  कर  देती  है "

"   سَمِعْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ ‏ "‏ عَلَيْكُمْ بِهَذَا الْعُودِ الْهِنْدِيِّ، فَإِنَّ فِيهِ سَبْعَةَ أَشْفِيَةٍ‏  "

बुखारी - जिल्द 7 किताब 71 हदीस 596

दूसरी  हदीस  अंगरेजी  में दी  जा रही  है  , ताकि  जो  लोग हिंदी अनुवाद को सही  नहीं   मानते  वह  भी स्वीकार  करें  कि  मुहम्मद साहब  भारतीय  दवाओं  से  इलाज  करते  थे .

Narrated Um Qais:
I went to Allah's Messenger  along with a a son of mine whose palate and tonsils I had pressed with my finger as a treatment for a (throat and tonsil) disease. The Prophet  said, "Why do you pain your children by pressing their throats! Use Ud Al-Hindi-  الْعُودِ الْهِنْدِيِّ" (certain Indian incense) for it cures seven diseases, one of which is pleurisy. It is used as a snuff for treating throat and tonsil disease and it is inserted into one side of the mouth of one suffering from pleurisy."

‏ عَلَى مَا تَدْغَرْنَ أَوْلاَدَكُنَّ بِهَذَا الْعِلاَقِ عَلَيْكُنَّ بِهَذَا الْعُودِ الْهِنْدِيِّ، فَإِنَّ فِيهِ سَبْعَةَ أَشْفِيَةٍ، مِنْهَا ذَاتُ الْجَنْبِ يُسْعَطُ مِنَ الْعُذْرَةِ، وَيُلَدُّ مِنْ ذَاتِ الْجَنْبِ ‏"‏‏ "

बुखारी - जिल्द 7 किताब 71 हदीस 611

3-काबा  में   नागा साधू 
इस बात के ऐसे  अनेकों   प्रमाण  मौजूद  हैं  कि  इस्लाम  से  पहले अरब  में  मूर्तिपूजा प्रचलित  थी . और  मक्का में   भी  ऐसे   हिंदुओं   की  बड़ी  संख्या   मौजूद  थी  जो भगवान  शिव   के उपासक   थे .  जिसे  आज  काबा   कहा  जाता था  वह मक्का  स्थित " मक्केश्वर   नाथ "   का  मंदिर  था . वहाँ  जो  एक काला  पत्थर   है   ,उसे  अरबी  में " हजरुल अस्वद - الحجر الأسود‎  "   कहा जाता  है , वास्तव  में इसका  नाम "  हजरुल अश्वेत "   अर्थात " काला  पत्थर (BlackStone ) है  , जो एक  शिव   लिंग  है .   मुहम्मद  साहब  के  समय तक भी  वहाँ  के  शिव  भक्त  निर्वस्त्र   होकर   शिव  की   परिक्रमा   किया  करते  थे  .  भारत में  ऐसे  साधुओं   को  नागा  साधू   कहा  जाता   है .लेकिन   इस्लाम  के   कुछ  वर्ष  बाद  ही  मुहम्मद  साहब  ने एक आदेश  के द्वारा उन  नागा  साधुओ   को  काबा  के अंदर  जाने  और    शिव  लिंग  की  परिक्रमा   करने  पर रोक   लगवा  दी  थी  . जो इन  हदीसो  से   प्रमाणित  होती  हैं .

"अबू  हुरैरा  ने कहा  कि  गए  साल  के बाद  जब रसूल  ने अबूबकर   को   नेता  बनाया तो ,उसने  मुझ  से  कहा , जाओ  सभी  कबीले  के समूहों  में  मुनादी   कर  दो , अब  इस साल  हज में किसी  काफिर और  नाग  साधू  को हज  करने और "तवाफ़ "  यानी परिक्रमा   करने  की  अनुमति   नहीं  होगी .

"    لاَ يَحُجَّ بَعْدَ الْعَامِ مُشْرِكٌ، وَلاَ يَطُوفَ بِالْبَيْتِ عُرْيَانٌ‏.‏ قَالَ حُمَيْدُ بْنُ عَبْدِ الرَّحْمَنِ ثُمَّ أَرْدَفَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَلِيًّا، فَأَمَرَهُ أَنْ يُؤَذِّنَ بِبَرَاءَةَ قَالَ أَبُو هُرَيْرَةَ فَأَذَّنَ مَعَنَا عَلِيٌّ فِي أَهْلِ مِنًى يَوْمَ النَّحْرِ لاَ يَحُجُّ بَعْدَ الْعَامِ مُشْرِكٌ، وَلاَ يَطُوفُ بِالْبَيْتِ عُرْيَانٌ‏.‏  "

सही बुखारी -जिल्द 2  किताब 26  हदीस 689

सही बुखारी -जिल्द 1  किताब  8 हदीस 365


इन हदीसों  से स्पष्ट  हो  जाता है कि  इस्लाम  से  पूर्व  अरब में हिन्दू शैव   नागा  साधू   भी  थे  ,जो  निर्वस्त्र   होकर काबा  के मक्केश्वर शिवलिंग   की  परिक्रमा  किया  करते  थे .
4-अरबी  हिन्दू   महिला     हिन्दा 
पांचवीं   सदी  तक अरब में  हिन्दू  धर्म और संकृति   का  इतना प्रभाव  था  कि लोग  अपनी  पुत्रियों   का नाम " हिन्दा -هند" रख  देते  थे . हिन्दा  अर्थ  "भारती "  होता  है . उदाहरण  के लिए अरब  के पश्चिम  भाग  के  उमय्या  खानदान   के  सरदार "अबू सुफ़यान  बिन  हरब - " की पत्नी  का नाम " हिन्दा  बिन्त उतबा -هند بنت عتبة"   था .यह मुसलमानों  के   पांचवे  खलीफा    मुआविया   की   माता थी .और हिन्दू  होने   के  कारण इसने  मुहम्मद  साहब  के  चलाये  गए  नए  धर्म  इस्लाम   का  काफी   विरोध   किया था . और  उहुद  के युद्ध  में   हिन्दा  ने   वीर  रस  की  कवितायेँ  सूना  कर  हिन्दू  युवकों  में मुहम्मद  के  विरुद्ध  युद्ध  करने के  लिए जोश   भरने   का   काम   किया  था .यही  नहीं   इतने  युद्ध में चंडिका    माता  कि  तरह  अली  के  बड़े भाई  ' हमजा '  का  सीना  चीर   कर  कलेजा  बाहर   निकाल   दिया  था .इसने  युद्ध भूमि  में  जो जोशीली   कवितायेँ   सुनाई थी , उन  में से  एक  यहाँ  दी  जा  रही 
5-हिन्दा की  कविता  में  हिन्दुओ  का   उल्लेख 
इस्लाम   से पहले  अरब  के लोग अपने ऊंटों   से व्यापार   करते  थे .चूँकि  मदीना  यमन  -सीरिया  व्यापार  मुख्य  मार्ग  में  पड़ता  था  .  लेकिन  जब   मुहम्मद  साहब  के   जिहादी    मदीना  के लोगों   के  काफिले   लूटने   लगे  तो  मक्का  और  मदीना   के   लोगों  में युद्ध  होने  लगे . ऐसे  ही  युद्ध  में  सन  622  में    ने   हिन्दा के  भाई   और  चाचा   की   हत्या  कर  दी   . हिन्दा  ने  विलाप  करते   हुए अपने  पति  अबू  सुफ़यान   से  मक्का वालों   से  अपने  पिता भाई  और चाचा  की ह्त्या   का  बदला    लेने  का वचन   लिया  .इसी   करण  दिनांक 19 मार्च   सन  625 ईस्वी  में जो  युद्ध  हुआ  था  उसे "गजवये उहद -  غزوة أحد‎ "   कहा  जाता  है .इस युद्ध  में   हिन्दा  ने  भी  भाग  लिया  था और मैदान  में आकर  अपनी  कविताओं  से  हिन्दुओं   में   जोश भरने  का काम  किया   था .उस  मूल  अरबी   कविता  और  उसका  हिन्दी    का  अनुवाद यहाँ  पर  दिया   जा रहा  है .युद्ध में  हिन्दा  ने अपने  पति और उसके सेनापति  को  सम्बोधित  करके   कहा ,

زواجها من أبي سفيان[عدل]
ذكروا أن هند بنت عتبة بن ربيعة قالت لأبيها: يا أبت، إنك زوجتني من هذا الرجل ولم تؤامرني في نفسي، فعرض لي معه ما عرض فلا تزوجني من أحد حتى تعرض علي أمره، وتبين لي خصاله. فخطبها سهيل بن عمرو وأبو سفيان بن حرب، فدخل عليها أبوها وهو يقول:

"
أتاك سهيل وابن حرب وفيهما رضاً لك يا هند الهنود ومقنع
وما منهما إلا يعاش بفضله وما منهما إلا يضر وينفع
وما منهما إلا كريم مرزأ وما منهما إلا أغر سميدع
فدونك فاختاري فأنت بصيرةٌ بل ولا تخدعي إن المخادع يخدع  "
"हे  महान  हिन्दू  और  हे हिंदुओं  के सिरमौर ,सुहैल बिन  हरब ,मुझे  संतोष हुआ  क़ि तुमने  हिंदुओं  की  पीड़ा  को समझा   है .सचमुच  तुम दूरदर्शी   हो .और  तुम  उन्हीं  लोगों  को  हानि  पहुंचाने वाले  हो , जो केवल  अपना लाभ  चाहते  हैं ,और जो    धोखे बाज   और  लुटेरे  हैं . मेरी  इच्छा  है कि  इस युद्ध  में  आप   सफल  हो और  लोग  ह्रदय से आपकी तारीफ  करते  रहेंगे  "

उल्लेखनीय  बात  है  कि  इस  कविता  में  अरबी  में " या  हिन्द अल हिनूद -  يا هند الهنود -"  शब्द     साफ  साफ   दिया गया है , जिसका हिंदी में  अर्थ  " हिन्दू  और हिन्दू  धर्म  वालो  "  होता  है

( नोट - हिन्द  बिन्त  उतबा   की  अरबी  कविता " अरबी  विकी पीडिया में  मोजूद  है  लेकिन  अंगरेजी   में  नही  है .इस कविता  का  शब्दशः  अर्थ करना  कठिन  था   इसलिए इसका  सरल  हिंदी अनुवाद  दिया  गया  है ,और  अरबी  विकीपीडिया   की  लिंक  भी  दी  जारही   है  ,जिसमे  अरबी  में उपशीर्षक-5 "जौजुहा मिन  अबी सुफ़यान - زواجها من أبي سفيان "   से यह कविता  मौजूद  है .जो   चाहे  देख  सकता  है . )

http://ar.wikipedia.org/wiki/%D9%87%D9%86%D8%AF_%D8%A8%D9%86%D8%AA_%D8%B9%D8%AA%D8%A8%D8%A9

http://ar.wikipedia.org/wiki/هند_بنت_عتبة

6-रसूल   की  हिन्दू  पत्नि 

यदि आप  इस्लाम का इतिहास देखें  तो  पता  चलेगा  कि  मुहम्मद  साहब ने अरब  में  इस्लाम  फैलाने के  लिए हर तरह  के हथकन्डे   अपनाये  थे . जैसे एक तरफ उनके  लोग  जिहाद  करके  लूट मार और अत्याचार  से  लोगों  को  जबरन  मुसलमान   बनाते  रहते  थे ,तो दूसरी  तरफ मुहम्मद  साहब  अरब  के प्रभावशाली   लोगों  को अपनी  लड़कियां  देकर उनको अपने पक्ष  में  कर  लेते  थे .  यही  नहीं   वह  अरब के सरदारों  को पद  का  लालच  देकर   उनकी  लड़कियों   से  शादियां   भी  कर लेते  थे . चाहे  वह व्यक्ति  उनका शत्रु  क्यों     नहीं  हो . इसी नीति  को अपना  कर  मुहम्मद  साहब  ने  कई  शादियां  कर  डाली  थीं , उनकी  सातवीं  पत्नी  का  नाम " रमला "  था जो  उनके कट्टर शत्रु अबी सुफ़यान   की बेटी  थी .इसका  पूरा  नाम  " रमला बिन्त अबी सुफ़यान- رملة بنت أبي سفيان "   था .और  जिसकी  माँ   का नाम   हिन्दा  था  . जिसके बारे में  इसी  लेख  में विस्तार  से   बताया  है  . चूँकि  रमला    की माँ   और  बाप  हिन्दू  थे ,इसलिए  हम  रमला   को  भी पैदायशी   हिन्दू   कह  सकते  हैं .शादी  के  समय  उसकी  आयु 30  साल  थी .मुहम्मद साहब और रमला  की शादी  अबीसीनिया  में 7  हिजरी   यानी सन 628  ईस्वी  में  हुई थी .आश्चर्य  की  बात  है कि इस  शादी  का  ख़ुत्बा  किसी  मुस्लिम  मुल्ले  ने नही इथोपिया  के ईसाई  राजा  नज्जाशी   ने  पढ़ा  था . जिसे  नेगुस (Negus )   कहा  जाता  है ,शादी  के बाद मुहम्मद साहब  ने रमला  का  अरबी  नाम " उम्मे  हबीबा  - أم حبيبة "  रख  दिया . चूँकि भारत  में  की तरह अरब  के  हिन्दू  भी प्रतिष्ठित   लोगों  की  पत्नी  को  माता   की  तरह  सम्मान  देते  थे  इसलिए  मुहम्मद  साहब ने भी  अपने  सहाबियों   को आदेश  दिया  कि  आज  से  वह मेरी  पत्नी  को " उम्मुल  मोमनीन " यानी  इमान  वालों  की  माता   बोला  करे   . और  यह  बात  कुरान   की  सूरा -अहजाब 33: 6  में  इस  प्रकार   दी  गयी  ही -"व् अज्वाजहु  उम्मिहातिकुम " कुरान -सूरा 33:6 (  وَأَزْوَاجُهُ أُمَّهَاتُهُمْ ).रमला  की  म्रत्यु   हिजरी सन 45  यानि सन 665  ईस्वी  में  हुई थी .मौत के बाद  उसे  जन्नतुल  बाकी  में  दफना  दिया  गया  जहाँ  मुहम्मद  साहब  की  अन्य  पत्नियां   दफ़न  हैं .इसके  जीवन  कल में  ही  उसका  भाई  मुआविया  खलीफा  बन  गया  था .

मुहम्मद साहब   की  यही  नीति अकबर  ने  अपनायी  थी .  राजपूतों  को शांत  करने  , और निष्कंटक  राज  करने के लिए  अकबर  ने  जोधाबाई  से  शादी  कर  ली थी .

हम  मुसलमानों  से  पूछना चाहते  हैं   जिनको अपने  देश  को  माता  कहने पर आपत्ति  होती  है .क्या  ऐसे लोग रसूल  की  उस पत्नी  को भी  माता  कहने से  इंकार  कर देंगे जो हिन्दू  वंश  में पैदा हुई  थी, और जिसकी  माँ  मरते  समय तक एक  हिन्दू बनी   रही .याद  रखिये धर्म  बदलने  से किसी के पूर्वज   नहीं  बदल  सकते !

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सोमवार, 4 मार्च 2019

अल्लाहु अकबर यानी हर हर महादेव !

लोग इस लेख का शीर्षक पढ़ कर मजाक समझेंगे ,लेकिन हम पूरी जिम्मेदारी से सभी हिन्दू विद्वानों और मुस्लिम मौलवियों के सामने दावा करते हैं की सभी मुस्लिम हर अजान ,नमाज में और हरेक नारा बोलने से महादेव यानी शिव को याद करते हैं ,
हिन्दू धर्म में भगवांन शिव को सभी देवों से बड़ा माना जाता है , संस्कृत में बड़ा का अर्थ महा होता है , और देव का अर्थ उपास्य भी होता है , हर हर महादेव हिंदुओं का नारा है , युद्ध के समय भी हिन्दू राजा , और सैनिक हर हर महादेव का नारा लगाते आये हैं

संस्कृत का " हर " शब्द ' हरे " शब्द का संक्षिप है , जब किसी को आदर पूर्वक संबोधित किया जाता है ,तो उसके नाम से पहले " हरे " शब्द लगा दिया जाता है ,जैसे " हरे राम , हरे कृष्ण , या हरे भगवांन इत्यादि ,

1-मुसलमान महादेव को कैसे जपते हैं
यदि किसी मुसलमान को महादेव का जाप करने या नाम लेने को कहा जाए तो वह साफ़ इंकार कर देगा ,लेकिन उसे पता होना चाहिए की हर मुस्लिम परोक्ष रूप में रोज महादेव का नाम लेता है ,इस्लाम से पूर्व अरब में अल्लाह " الله-" शब्द नहीं था , अरब में जितने भी कबीले थे सबके अपने अपने देवता थे , अरबी में देवता (god ) को " इलाह -اله " कहा जाता था , मुहमम्द साहब के काबिले कुरैश का जो देवता था वह चन्द्रमा में रहता था और उसका प्रतिक चिन्ह भी अर्ध चंद्र (Crecent ) था , जो आज भी कई मुस्लिम देशों के झंडे में मिलता है

पहले तो मुहम्मद साहब लोगों से यह कहते थे ,

" وَإِلَٰهُنَا وَإِلَٰهُكُمْ وَاحِدٌ "Sura -Ankabut-29:46

(इलाहुना व् इलाहुकुम वाहिद )

अर्थ - हमारा देवता और तुम्हारा देवता एक ही है
our god and your god is one and the same,


लेकिन कुछ समय बाद उनका विचार बदल गया , वह अपने देवता "इलाह اله " को ही सबसे बड़ा देवता बताने लगे , इसके लिए उनहोंने देवता के लिए प्रयुक्त " इलाह -اله " शब्द के पहले अरबी का definite article " अल -ال " लगा कर "अल्लाह الله - शब्द बना लिया इसलिए " अल्लाहु अकबर -الله اكبر " का अर्थ हर हर महा देव है क्योंकि , अरबी शब्द "अल -ال " का आशय "हर " इलाह -اله "का अर्थ देवता और "अकबर اكبر -" का अर्थ महा यानी सबसे बड़ा है , वास्तव में अरबी व्याकरण के अनुसार अल्लाहु अकबर नहीं इलाह अकबर -اله اكبر " होना चाहिए , जिसका अर्थ महा देव "greater god " है , .

सभी मुल्ले मौलवी और पंडित इस बात पर गौर करें , और अपने विचार जरूर प्रकट करें

 ,शिव रात्रि   (04/03/2019

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