बुधवार, 31 जुलाई 2019

गंगाजमुनी तहजीब ?

भारत सदा से एक शांतिप्रिय देश रहा है .यहाँ जितने भी धर्म और सम्प्रदाय पैदा हुए ,उन सबके मानने वाले मिलजुल कर रहते ए हैं ,और सब एक दूसरे के विचारों का आदर करते आये है .क्योंकि भारत के सभी धर्मों में ,प्रेम ,करुणा,मैत्री ,परस्पर सद्भावना और अहिंसा को धर्म का प्रमुख अंग कहा गया है .भारत की इसी विशेषता को भारतीय संस्कृति कहा जाता है .इसको कोई दूसरा नाम देने की जरुरत नहीं है .क्योंकि यह संस्कृति ही भारत की पहिचान है .
लेकिन जैसे ही भारत में मुस्लिम हमलावर आये तो उन्होंने लूट के साथ भारत की संस्कृति को नष्ट करने की और हिन्दुओं को मुसलमान बनाने के हर तरह के प्रयत्न किये ,जो आज भी चल रहे हैं .मुसलमानों ने कभी हिन्दुओं को अपने बराबर नहीं समझा और उनको सदा काफ़िर कहकर अपमानित किया .लेकिन आज यही मुसलमान सेकुलरों के साथ मिलकर फिर हिन्दुओं को गुमराह कर रहे हैं .इन मक्कारों ने मुसलमानों के गुनाहों पर पर्दा डालने ,और वोटों की खातिर "गंगाजमुनी तहजीब "के नाम से एक ऎसी कल्पित संस्कृति को जन्म दे दिया है .जिसका कभी कोई वजूद ही नहीं था .लेकिन भोले भाले हिन्दू इसे हिन्दू -मुस्लिम एकता का प्रतिक मान रहे हैं .कोई नहीं जनता कि यह गंगाजमुनी तहजीब कहाँ से आयी ,देश में किस क्षेत्र में पायी जाती है ,या इसका क्या स्वरूप है .मुसलमान इसे मुगलकाल की पैदायश कहते हैं .लेकिन मुगलों का हिन्दुओं के प्रति कैसा व्यावहार था ,इसके नमूने देखिये -
1 -मुगलों का हिन्दुओं के प्रति व्यवहार 
बाबर से लेकर औरंगजेब तक सभी मुग़ल शासक हिन्दू विरोधी थे .और हिन्दुओं के प्रति उग्र ,असहिष्णु थे .सभी ने हिन्दुओं पर अत्याचार किये .
शिवाजी के कवि भूषण ने अपने ग्रन्थ "शिवा बावनी "में लिखा है -

"देवल गिराउते फिराउते निशान अली ,राम नाम छूटो बात रही रब की . 
बब्बर अकब्बर हुमायूं हद्द बांध गए ,एक नाहिं मानों कुरआन वेद ढब की 
चारों बरन धरम छोड़ कलमा नमाज पढ़ें ,शिवाजी न होते तो सुनत होती सब की ."

कवि भूषण -शिवा बावनी.

2 -महाराजा छत्रसाल के विचार 
बुंदलखंड में छत्रसाल ने मुगलों को कई बार हराया था .शिवाजी उनको अपना पुत्र मानते थे .छत्रसाल ने मुसलमानों के बारे में जो कहा है वह ,उनके एक कवि "गोरेलाल "ने सन 1707 में "छत्र प्रकाश "लिखा है -

हिन्दू तुरक धरम दो गाए ,तिन सें बैर सदा चलि आये 
जानों सुर असुरन को जैसो ,केहरि करिन बखान्यो तैसो 
जब तें साह तखत पर बैठे ,तब तें हिन्दुन सों उर ऐठे 
मंहगे कर तीरथन लगवाये ,देव दिवाले निदर ढहाए 
घर घर बाँध जन्जिया लीनी ,अपने मन भये सो कीनी " 

कवि गोरेलाल -छत्र प्रकाश .प्रष्ट 78

3 -शिवाजी का छत्रसाल को उपदेश 
जब शिवाजी को लगा की मुग़ल हिन्दू धर्म और संस्कृति को मिटाने पर उतारू हैं ,और जब छत्रसाल शिवाजी से मिलने गये थे तो शिवाजी ने यह उपदेश दिया था .और छत्रसाल को मुसलमानों से सावधान रहने को कहा था -
"तुरकन की परतीत न मानौ ,तुम केहरि  तुरकन  गज जानौ 
दौरि दौरि तुरकन को मारौ,दबट दिली के दल संहारौ 
तुरकन में न विवेक बिलोक्यो ,जहाँ पाओ तुम उनको रोक्यो ."
छत्र प्रकाश -प्रथम अध्याय 
(भारत का इतिहास -डा ० ईश्वरी प्रसाद .पेज 542 )

4 -मुसलमान कैसी एकता चाहते हैं 
मुसममान सभी संस्कृतियों को नष्ट करके सिर्फ इस्लाम को बाकी रहना चाहते हैं .औरवह इसी को एकता का आधार मानते हैं .इकबाल ने यही विचार इस तरह प्रकट किये है -
"हम मुवाहिद हैं ,हमारा कैस है तर्के रसूम , 
मिल्लतें जब मिट गयीं अज जाए ईमां हो गयीं " 
(अर्थात -हम ऐसी एकता चाहते हैं ,जब सारी संस्कृतियाँ मिट जाएँ ,और इस्लाम का हिस्सा बन जाएँ )
इकबाल चाहता था कि तलवार के जोर पर हरेक संस्कृति को मिटा दिया जाये ,और इस्लाम को फैलाया जाये .वह लिखता है -
"नक्श तौहीद का हर दिल में बिठाया हमने ,जेरे खंजर भी यह पैगाम सुनाया हमने , 
तोड़े मखलूक खुदावंदों के पैकर हमने ,काट कर रखदिये कुफ्फार के लश्कर हमने " 
हम अब कैसे मानें कि ,मुसलमान शांति और समन्वय के पक्षधर हैं.
5 -मुसलमान युद्ध चाहते हैं 
मुसलमान इकबाल को अपना आदर्श मानते हैं .लेकिन इकबाल हमेशा मुसलमानों शांति कि जगह लड़ाई करने पर उकसाता था .उसने कभी आपसी भाई चारे की बात नहीं कही .इकबाल कहता है -
"तुझ को मालूम है ,लेता था कोई नाम तेरा ,कुव्वते बाजुए मुस्लिम ने किया नाम तेरा , 
फिर तेरे नाम से तलवार उठाई किसने ,बात जो बिगड़ी हुई थी ,बनाई किसने "
 शिकवा
(अर्थात -दुनिया में कोई अल्लाह को नहीं जनता था ,लेकिन मुसलमानों ने अपने हाथों की ताकत से ,और तलवार के जोर से अल्लाह को प्रसिद्द कर दिया .और बिगड़ी हुई बात को बना दिया )

6 -देशभक्त और ब्राहमण होना कुफ्र है 
इकबाल देश को मूर्ति (बुत )देशभक्तों की बिरहमन (ब्राहमण ) कहता है ,और मुसलमानों से इनसे दूर रहने को कहता है -
"मिस्ले अंजुम उफ़के कौम पै रोशन भी हुए ,
बुते हिन्दी की मुहब्बत में बिरहमन भी हुए "
(अर्थात -इकबाल मुसलमानों से कहता है कि तुम्हारा स्थान तो अकास के तारों कि तरह ऊँचा है ,लेकिन तुम हिंद के बुत (देश )के प्रेम में इतने गिर गए कि एक ब्राहमण कि तरह उसकी पूजा करने लगे )
- 7-इस्लाम का बेडा गंगा में डूबा 
इकबाल आरोप लगता है कि जैसे ही इस्लाम का संपर्क गंगा से हुआ ,इसलाम की प्रगति रुक गयी ,यानी हिन्दुओं का साथ लेने सी इस्लाम डूब जायेगा .-
वो बहरे हिजाजी का बेबाक बेडा ,न असवद में झिझका न कुलजम में अटका 
किये पय सपर जिसने सातों समंदर ,वो डूबा दिहाने में गंगा के आकर "

8 -सर्व धर्म समभाव पागलपन है 
अकबर इलाहाबादी ने सभी धर्मों का आदर करने को व्यंग्य से पागलपन तक कह दिया है -
"आता है वज्द मुझको हर दीन की अदा पर 
मस्जिद में नाचता हूँ नाकूस की सिदा पर "
(अर्थात -मुझे हर धर्म की अदा पर मस्ती चढ़ जाती है ,जब भी मंदिर में शंख बजता है ,मैं मस्जिद में नाचने लगता हूँ )
9 -मुसलमानों का उद्देश्य 
"चीनो अरब हमारा ,हिन्दोस्तां हमारा ,मुस्लिम हैं हमवतन हैं सारा जहां हमारा 
तेगों के साए में हम पल कर जवां हुए हैं ,खंजर हिलाल का है कौमी निशां हमारा "
इकबाल -तराना 

10 -पाकिस्तान क्यों बना 
मुसलमान हिन्दुओं से नफ़रत रखते थे ,और उनके साथ नहीं रहना चाहते थे .मुहमद अली जिन्ना ने अपने एक भाषण में कहा था कि-
"कुफ्र और इस्लाम के बीच में कोई समझौता नहीं हो सकता .उसी तरह हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच दोस्ती और भाईचारे की कोई गुंजायश नहीं है .क्योंकि हमारी और हिन्दुओं की जुबाने अलग ,रिवायत अलग ,खानपान अलग ,अकायद अलग ,तहजीब अलग ,मजहब अलग हैं यहाँ तक हमारा खुदा भी अलग है .इसलिए हम मुसलमानों के लिए अलग मुल्क चाहते हैं " 
नवाए आजादी -पेज 207 
11 -सर्वधर्म समभाव कुरान के विरुद्ध है 

कुरआन धार्मिक एकता और गंगाजमुनी विचारों के विरुद्ध है .और मुस्लिमों और गैर मुस्लिमों के मेलजोल के खिलाफ है .कुरान कहता है -
"(हे मुहम्मद ) कहदो हे काफ़िरो मैं उसकी इबादत नहीं करता ,तुम जिसकी इबादत करते हो .और न तुम उसकी इबादत करते हो ,जिसकी मैं इबादत करता हूँ .और न मैं उसकी इबादत करूँगा ,जिसकी इबादत तुम करते आये हो .और न तुम उसकी इबादत करोगे ,जिसकी इबादत मैं करता हूँ .तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म ,हमारे लिए हमारा धर्म " 
सूरा अल काफिरून 109 :1 से 6 तक 
12 -तहजीब या तखरीब 
एक मुस्लिम पत्रकार अलीम बज्मी ने गंगाजमुनी तहजीब की मिसाल देते हुए भोपाल के नवाब हमीदुल्लाह के ज़माने की होली का वर्णन इस प्रकार किया है .और इसे एक आदर्श तहजीब और हिन्दू मुस्लिम एकता का उदहारण बताया है ,अलीम लिखता है कि -
"होली के समय मस्जिदों के आसपास की सभी दुकाने बंद करा दी जाती थीं .कोई हिन्दू किसी मुसलमान को रंग लगाने कि हिमत नहीं कर सकता था .इसे बदतमीजी माना जाता था .नमाजियों को देखकर हुरियारों को रास्ता बदलना पड़ता था .नमाज के पाहिले ही रंग का खेल बंद करा दिया जाता था .अगर हिन्दू ख़ुशी के मौके पर किसी मुसलमान को मिठाई देते थे ,तो उसे कपडे में लपेट कर दिया जाता था .मुसलमान मिठाई को हाथों से नहीं छूते थे "
दैनिक भास्कर दिनांक 18 मार्च 2011 
क्या यही हिन्दू मुस्लिम एकता कि मिसाल है .इसे तहजीब (संस्कृति )नहीं तखरीब (تخريبबर्बादी )कहना उचित होगा .
मुसलमान मक्कारी से गंगा को हिन्दू का और जमुना को मुसलमानों का प्रतीक बताकर लोगों को धोखा दे रहे है .यह कहते हैं जैसे गंगा और जमुना मिलकर एक हो जाते हैं उसी तरह हिन्दू मुस्लिमएक होकर गंगाजमुनी तहजीब का निर्माण करते हैं .लेकिन जो लोग गंगाजमुनी तहजीब को हिन्दू मुस्लिम एकता का प्रतीक समझते हैं ,वह इतनी सी बात भी नहीं जानते कि गंगा और जमुना दोनो ही हिन्दुओं की पवित्र नदियाँ हैं .गंगाजमुनी तहजीब में मुसलमान कहाँ शामिल हैं
मुसलमान मक्का के जलकुंड के पानी "زمزمजमजम "को पवित्र मानते हैं .यदि वह सचमुच हिन्दू मुस्लिम एकता दिखाना चाहते हैं तो ,उन्हें चाहिए कि "गंगाजमुनी "शब्द की जगह "गंगा जमजमी"शब्द का प्रयोग करें .तभी हम मानेंगे कि मुसलमान सचमुच हिन्दू मुस्लिम एकता चाहते हैं
वास्तव में हमें "गंगाजमुनी तहजीब "नहीं "गंगा जमुना तखरीब "कहना चाहिए !
B.N.Sharma


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मंगलवार, 30 जुलाई 2019

रसूल लीला :इस्लामी कामसूत्र !!

( सूचना -हमारा उद्देश्य किसी की भावनाओं  को आहत करना नहीं  है ,इस लेख में दिए गए तथ्य प्रामाणिक हदीस की किताबों  से लिए गए  हैं )
यह बात तो सर्वविदित है किजिहादियों को क्रूर होने के साथ साथ अय्याश होना भी जरुरी है .अगर इस दुनिया में अय्याशी नहीं करेंगे तो ,मर कर जन्नत में अय्याशी कैसे करेंगे .यही इस्लाम का आधार और मुसलमानों का एकमात्र लक्ष्य है .
यद्यपि मुहम्मद ने सेक्स के बारे में कोई अलग से किताब नहीं लिखी है ,परन्तु उसने जो भी आय्याशियाँ कि हैं ,वे सब हदीसों में मौजूद हैं .उन से छांट कर यह इस्लामी कामसूत्र الكِتاب الجِنس الاسلاميه प्रस्तुत किया जा रहा है .इसमे प्रारम्भ से अंत तक इस्लामी सेक्स की जानकारी है .यह ज्ञान मुस्लिम महिलाओं के लिए अवश्य उपयोगी होगा . "  فقط للنساء المسلمات "केवल मुस्लिम महिलाओं के लिए !
 
1 -सेक्स की तय्यारी कैसे करें 
"औरतें अपने जिहादी पतियों के घर में आने से पहिले अपने निचे के बाल(Pubic Hair )साफ़ करके रखें "
.बुखारी -जिल्द 7 किताब 62 हदीस 173 
"मुस्लिम औरतें अपनी योनी और बगल के बाल साफ करके तय्यार रहें "
बुखारी -जिल्द 7 किताब 72 हदीस 177 
2 -सेक्स के लिए सदा तय्यार रहें 
"यदि कोई औरत घर के काम में व्यस्त हो ,और उसका जिहादी पति उसे सेक्स के लिए बुलाये तो ,औरत को चाहिए कि सब काम छोड़कर तुरंत ही वहीँ पर सम्भोग करवा ले "
मुस्लिम -किताब 8 हदीस 3240 
"सम्भोग करना जरुरी है ,चाहे तुम्हारी पत्नी राजी हो या नहीं ."
मुस्लिम -किताब 3 हदीस 677 और 680 
3 -पत्नी  के स्तन चूसना (breast sucking)

"अबू मूसा बिन अशरी ने कहा कि मैं अपनी पत्नी की छातियाँ दबाकर उसका दूध पीता हूँ .मुझे लगा कि यह हराम है .फिर अब्दुल्लाह बिन मसूद ने रसूल से पूछा तो रसूल ने कहा कि यह काम जायज है "
मुवत्ता-किताब 30 हदीस 214 
"याहया बिन मालिक ने कहा कि मैं अपनी पत्नी के स्तनों से दूध पीता हूँ ,क्या यह हराम है .तब अबू मूसने कहा कि इसे रसूल ने जायज कहा है .और मैं दो सालों से यही कर रहा हूँ "
मलिक मुवत्ता -किताब 30 हदीस 215 

4 -कुंवारी लड़कियाँ सेक्स के लिए उत्तम हैं 
"अल्लाह की नजर में कुंवारी और अक्षत योनी लड़कियाँ उत्तम होती है "
बुखारी -जिल्द 7 किताब 62 हदीस 16 
"कुँवारी लड़कियाँ सेक्स के लिए श्रेष्ठ होती हैं "बुखारी -जिल्द 38 हदीस 504 . 
"रसूल ने कहा कि ,कुंवारी कन्या के साथ सम्भोग करने में अधिक आनंद आता है "
मुस्लिम -किताब 8 हदीस 3459 . 

5 -औरत की माहवारी में सम्भोग की विधि 
"आयशा नेकहा कि ,रसूल उस समय भी सम्भोग करते थे जब मैं माहवारी में होती थी "
बुखारी -जिल्द 3 किताब 33 हदीस 247 
"रसूल ने कहा कि ,तुम औरतों से मासिक समय भी सम्भोग कर सकते हो "
अबू दाऊद-किताब 1 हदीस 270 
"मासिक के समय किसी भी औरत के साथ सम्भोग करना हलाल है "
अबूदाऊद -किताब 1 हदीस 212 
"अगर कोई गलती से पत्नी के आलावा किसी ऐसी स्त्री से सम्भोग करे ,जो मासिक से हो ,तो उसे प्रायश्चित के लिए आधा दीनार खैरात कर देना चाहिए"
 "अबू दाऊद -किताब 11 हदीस 2164 
"और अगर अपनी पत्नी से उसकी मासिक के समय सम्भोग करे तो ,सदके के तौर पर एक दीनार दे देना चाहिए "
.अबू दाऊद -किताब 1 हदीस 264 और 302 
"यदि स्त्री की योनी से मासिक स्राव अधिक बह रहा हो तो ,पहिले योनी से स्राव को साफ कर लें ,फिर तेल लगा कर सम्भोग करें .यही तरिका रसूल ने बताया है.
 "सही मुस्लिम -किताब 3 हदीस 647 .
"आयशा ने कहा कि,जब भी मैं मासिक में होती थी रसूल मेरी योनी से स्राव साफ करके सम्भोग किया करते थे "
मुस्लिम -किताब 3 हदीस 658 

6 -सम्भोग के बाद गुस्ल जरूरी नहीं 
"आयशा ने कहा कि रसूल सम्भोग के बाद बिना गुस्ल किये ही मेरे साथ उसी हालत में सो जाते थे" .
अबू दाऊद-किताब 1 हदीस 42 
"आयशा ने बताया कि ,जब रसूल और मैं सम्भोग के बाद गंदे हो जाते थे ,तो रसूल बिना    पानी छुए ही मेरे पास सो जाते थे ..और उठकर नमाज के लिए चले जाते थे "
.अबू दाऊद -किताब 1 हदीस 42 
"आयशा ने कहा कि ,जब सम्भोग के बाद रसूल   गंदे हो जाते थे ,तो उसी हालत में सो जाते थे ,फिर बाद में उठ जाने पर बाजार या नमाज के लिए चले जाते थे .उनके पापड़ों पर वीर्य के दाग साफ दिखाई देते थे ,"
अबू दाऊद -किताब 1 हदीस 228 
"आयशा ने कहा कि ,जब सम्भोग के बाद रसूल के कपड़ों पर वीर्य सुख जाता था .और दाग पड़ जाता था तो मैं अपने नाखूनों से वीर्य के दागों को खुरच देती थी .रसूल वही कपडे पहिन कर नमाज के लिए चले जाते थे "अबू दाऊद -किताब 11 हदीस 2161 

7 -वीर्य का स्वाद और रंग 
"अनस बिन मलिक कहा कि रसूल ने उम्म सलेम को बताया कि पुषों के वीर्य का रंग सफ़ेद होता है और गाढ़ा होता है .और बेस्वाद होता है .लेकिन स्त्री का वीर्य पतला ,पीला और तल्ख़ होता है
"अबू दाऊद -किताब 3 हदीस 608 
"उम्म सलेम ने कहा कि ,रसूल ने कहा कि स्त्रियों कि योनी से हमेशा एक स्राव निकलता रहता है .जिसका रंग पीला होता है .रसूल ने फिर कहा कि मुझे यह बात कहने कोई शर्म नहीं है कि , योनी के स्राव का स्वाद तल्ख़ और तीखा होता है "अबू दाऊद -किताब 3 हदीस 610 .

8 -माँ बेटी से एक साथ सम्भोग 
"याह्या बिन मलिक की रवायत है कि उबैदुल्ला इब्न उतवा इब्न मसूद ने कहा कि उमर बिन खत्ताब ने जिहाद में एक माँ और बेटी को पकड़ लिया .और रसूल से पूछा क्या हम इन से एक एक करके सम्भोग करें या अलग अलग ,रसूल ने कहा की तुम दौनों से एक ही समय सम्भोग कर सकते हो .इसकी अनुमति है .लेकिन मैं इसे नापसंद करता हूँ
"मलिक मुवत्ता-किताब 28 हदीस 1433
9 -वेश्या गमन 
"रसूल ने कहा कि जिहाद के समय मुसलमान एक रात केलिए भी शादी कर सकते हैं
"मुस्लिम -किताब 8 हदीस 3253 

10 -कुतिया आसन(Doggy style ) 
"जाबिर बिन अब्दुल्लाह ने रसूल से कहा कि एक यहूदी अपनी पत्नी की योनी में पीछे से लिंग प्रवेश करता है .क्या बुरी बात है .रसूल ने कहा की इसमे कोई हर्ज नहीं है ."
मुस्लिम -किताब 8 हदीस 3364 
"अबू जुहरी ने कहा की रसूल ने कहा कि,तुम चाहे औरतों से आगे से सम्भोग करो चाहे पीछे से ,परन्तु लिंग योनी के अन्दर ही प्रवेश होना चाहिए .नहीं तो संतान भेंगी होती है "
मुस्लिम -किताब 8 हदीस 3365 

11 -जंघा मैथुन (Thighing ) 
"आयशा ने कहा कि ,जिस समय मैं माहवारी में होती थी तबी रसूल आ गए और मुझ से अपनी जांघें खोलने को कहा ,फिर नबी ने अपने गाल मेरी जांघों पर रखे .मैंने उनके सर को जांघों में कस लिया .इस से रसूल को गर्मी मिली और वह उसी हालत में सोते रहे .शायद रसूल को सर्दी लग गयी थी "अबू दाऊद-किताब 1 हदीस 270

12 -औरतें केवल भोग की वस्तु हैं 
"औरतें केवल भोगने और मौजमस्ती और आमोद प्रमोद के लिए ही बनी हैं "
अबू दाऊद -किताब 11 हदीस 2078 
"यदि औरत की सम्भोग की इच्छा भी नहीं हो तब भी पति उस से जबरदस्ती सभोग करने का हकदार है .रसूल ने कहा कि अल्लाह ने औरतों पर मर्दों को फजीलत दे रखी है "
अबू दाऊद - किताब 11 हदीस 2044 .
"यदि स्त्री सम्भोग से इंकार करे तो पति उसे पीट कर जबरन सम्भोग कर सकता है
"मिश्कात -किताब 6 हदीस 671 
"अगर पत्नी गर्भवती भी हो ,तो पति उस से उस हालत में सम्भोग कर सकता है ,चाहे उसकी पत्नी सम्भोग करवाने के लिए कितना भी विरोध करे .पति उस से सम्भोग जरुर करे "
अबू दाऊद -किताब 11 हदीस 2153 और 2166 .

13 -मुख मैथुन (Oral Sex ) 
"आयशा ने कहा कि,रसूल जब रोजे कि हालत में होते थे ,तब भी वह अपना मुंह मेरे मुंह से लगा कर मेरी जीभ को अपने मुंह में लेकर चूसते थे .और मेरा सारा थूक उनके मुंह में चला जाता था "
अबू दाऊद-किताब 13 हदीस 2380 
"आयशा ने कहा कि रसूल कहते थे कि ,हरेक हालत में आनंद लेना चाहिए .चाहे रोजे के दिन हों "
अबू दाऊद किताब 12 हदीस 302 .
"आयशा ने कहा कि रसूल कहते थे कि पुरुष और स्त्री के अंगों में एक प्रकार की शहद होती है ,जब तक स्त्री पुरुष का ,शहद नहीं चखती है ,वह हलाल नहीं मानी जा सकती है .और यही बात पुरुषों पर लागू होती है "
सही मुस्लिम -किताब 8 हदीस 3354 . 
यह इस्लामी कामसूत्र पढनेके बाद आप अच्छी तरह से समझ गए होंगे कि मुस्लिम ब्लोगर बात बात पर हरेक मुद्दे को सेक्स की ओर क्यों मोड़ देते हैं .और अश्लील शब्दों का क्यों प्रयोग करते हैं .इसमे इनका उतना कसूर नहीं है ,जितना इस कामसूत्र के रचयिता मुहम्मद का हैं .जैसा मुसलमानों के दिमागों में भरा हुआ है ,वैसा ही यह लोग बोलते हैं .
इसमे दी गयी कई मूल हदीसें काफी बड़ी और कहानियों की तरह थीं .जगह की कमी के कारण उन्हें सारांश के रूप में दिया गया है .पूरी हदीसें दी गई साइटों में उपलब्ध है . ذالك الكتاب الجِنس هديً لِلمُسلمين
यह "किताबुल जिन्स" रसूल के वचन हैं ,और मुसलमानों को राह दिखाते हैं .

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सोमवार, 29 जुलाई 2019

बिस्मिल्लाह की आयत कुरआन में दोहराने वाले काफिर हैं !

"कुरआन अलाह की किताब है ,अकाट्य है,यह जब से नाजिल हुई इसमे कई बदलाव नहीं हुआ,इसमे कुछ भी घटाना या बढ़ाना नामुमकिन है ,नुजूल से लेकर आजतक कुरआन वही है जो नबी के वक्त थी "मुसलमान यही दावा करते हैं .

इस्लाम एकमात्र ऐसा धर्म है जिसमे प्रश्न करने,या तर्क करने की अनुमति नहीं है.इसलिए मुसलमान कट्टर,असहिष्णु ,और उग्र होते हैं .मुसलमान जैसे ही कुरआन खोलता है अक्ल के दरवाज़े बंद कर देता है .मुसलमान परम्परावादी हैं
.इनकी एक परम्परा हर जगह बिस्मिलाह लिखने और बोलने की है .यह पूरी आयत इस तरह है ,
"बिस्मिल्लाहिर्रहमानिराहीम "सूरा नम्ल-27 :30 . 

इसका अर्थ है अल्लाह के नाम से जो दयालु और कृपालु है .

1-अल्लाह स्वभाव से ईर्ष्यालु और निर्दयी है 

इस्लाम से पाहिले अरब में यहूदी धर्म का प्रभाव था . लोग दयालु और कृपालु खुदा को नहीं जानते थे.तौरेत में खुदा के बारे में यह लिखा है -

"मैं तेरा खुदा यहोवा हूँ ,मैं जलन रखने वाला खुदा हूँ ,जो मुझ से बैर करेगा मैं उससे ,उसके बेटों ,पोतों ,परपोतों और पितरों को दंड दूँगा "

बाइबिल --निर्गमन -अध्याय 20 :आयत 5 .

2-सन 628 तक अल्लाह  रहमान और रहीम  नहीं  था 

यही विचार अरबों के भी थे .इसी कारण से जब सन 628 में कुरेश और मुहम्मद के बीच एक लिखित संधि हुई थी तो उसमे "बिस्मिलाह "आयत की जगह "बिस्मिक अल्लाहुम्म "यानी अल्लाह के नाम से .क्योंकि उस समय रहमान और रहीम शब्द का कोई वजूद नहीं था .यह बाद में आया है .उस संधि पत्र हज़रत अली ने लिखा था .कुरैश की तरफ से "सुहैल बिन अमरू "और मुसलमानों की तरफ से मुहम्मद ने हस्ताक्षर किये थे .इस संधिपत्र को "बयतुल रिजवान "कहा जाता है .यह संधि दस साल के लिए थी.इसके बारे में कुरआन में सूरा फतह में 48 :आयत 1 से 29 तक पूरा विवरण दिया गया है.उसी दौरान कुरआन की सूरा तौबाह 9 नाजिल हुई .यह कुरआन की एकमात्र सूरा है जिसमे "बिस्मिल्लाह "की आयत नहीं दी गयी है .

3-रहमान और रहीम की कल्पना बाइबिल से 

रहमान और रहीम की कल्पना बाइबिल से ली गयी है .यरूशलेम के राजा सुलेमान ने अपने राजतिलक के समय पडौस के राज्य नूबिया की रानी बलकीस को निमंत्रण पत्र भिजवाया था .नूबिया को "शेबा "भी कहा जाता है .जब सुलेमान का पत्र रानी के दरबार में पहुंचा तो दराबारिओं ने रानी से पूछा कि यह पत्र किसकी तरफ से आया है .रानी ने कहा कि "यह पत्र ऐसे राजा की तरफ से आया है जिसका ईश्वर "अत्यंत दयालु और मेहरबान है "

.देखिये बाईबिल -1 राजा अध्याय 10 आयत 1 से 10 तक

.यही बात कुरआन की सूरा नम्ल 27 :30 में दी गयी है 

4-कुरान में सिर्फ एक बार बिस्मिल्लाह शब्द  है 
कुरआन में सिर्फ इसी सूरा में बिस्मिल्लाह की पूरी आयत दी गयी है .और
सूरा हूद 11 :41 में केवल बिस्मिलाह शब्द दिया गया है 

5-कुरान  की पहली 4 सूरा में  अल्लाह शब्द नहीं 
सब जानते हैं कि कुरआन 23 सालों में थोड़ा थोड़ा नाजिल हुआ था.वर्त्तमान कुरआन में सूरतों की तरतीब नजूल के हिसाब से नही है .हम सूरतों के नाजिल होने का क्रम कुछ सूरतें दे रहे हैं .पूरी लिस्ट किसी भी साईट से मिल सकती है .नुजूल के हिसाब से पहली पांच सूरतें इस प्रकार हैं .इनके सामने इनका कुरआन में वर्तमान क्रम दे रहे हैं
1- अलक (96) ,2- कलम (68) ,3- मुज्जम्मिल (73) , 4- मुदस्सिर (74),5- फातिहा 1 .(5)

6-कुरान में 112 आयतें  बाद में जोड़ी गयीं 

अर्थात कुरआन कि जो पहिली सूरत फातिहा है उसका नुजूल का क्रम पांचवा है . कुरआन   में कुल 114 सूरते है .जो भी सूरत नाजिल  हुई थी किसी में भी बिस्मिलाह की आयत नहीं थी .कुरआन का पहिला शब्द इकरा था सूरा 96 .कुल 114 सूरतों में सूरा तौबह में बिस्मिल्लाह की आयत नहीं है और सूरे नम्ल के अन्दर पूरी आयत है .यानी बाद में कुरआन की हरेक सूरत के पाहिले बिस्मिल्लाह की आयात लिख दी गई .इस तरह कुरआन में वास्तव में जितनी आयतें थीं उनमे 112 आयतें अधिक जोड़ दी गयीं .यानी कुरआन में तहरीफ़ हुई है.इसका कोई प्रमाण मुसलमानों के पास नहीं हैं कि अल्लाह ने हरेक सूरत के पाहिले बार बार बिस्मिल्लाह की आयत नाजिल की थी .या ऐसा कोई हुक्म दिया था कि हरेक सूरत के पाहिले बिस्मिलाह की आयत लिखी जाये .

इस के बारे में मुस्लिम विद्वानों और इमामों ने यह विचार प्रकट किये है -

"हर सूरत में बिस्मिलाह कुरआन का हिस्सा नहीं है
'इमाम हनीफा ,इमाम मालिक -कन्जुल उमाल खंड 7 पेज 437 .

इमाम मालिक और औजाई कहते है कि बिस्मिल्लाह कुरआन का हिसा नहीं है .सिर्फ जो सूरा नम्ल में है .इसलिए रमजान के महीने को छोड़कर बिस्मिल्लाह न तो जोर से पढ़ें और न मन में पढ़ें .तफ़सीर कशफ़ खंड 1

इमाम शुयूती मानते हैं कि जो कुरआन में कुछ भी बढ़ाएगा वह काफिर है,
तफ़सीर अल सगीर खंड 2 पेज 32 

इस तरह तफसीर कबीर में अनुसार वर्त्तमान सारे सुन्नी मुसलमान काफिर हैं क्योंकि इन लोगों ने उस समय कुरआन में 112 आयतें बढ़ा दीं

हम प्रमाण के लिए इस्लाम के धर्म गुरुओं और इमामों के इस विषय पर दिए गए फैसले प्रस्तुत कर रहे हैं -

The Hanafi and Maliki belief that “Bismillah al-Rehman al-Rahim” is not a part of the Quran 

Tafseer Khazin, Volume 1 page 12, Muqqadmah 


“Imam Abu Hanifa, Imam Malik and Imam Auzai attested that neither is “Bismillah” a part of surah Fatihah, nor of any other surah of the Quran”

If according to Imam Abu Hanifa “Bismillah al-Rehman al-Rahim” (In the name of Allah, the Beneficent, the Merciful) is not a part of any Quranic Surah
 then the Sunni ulema have committed an addition to the Quran when writing “Bismillah” at 114 places. If making an addition or deletion from the Quran is kufr then either Abu Hanifa is kafir or the present day Sunnis are kafir. The Nawasib of Sipah e Sahaba need to declare Abu Hanifa and abandon his taqleed forthwith.

We read in Tafseer Kabeer:

وأما أبو حنيفة رحمه الله تعالى فإنه قال : بسم الله ليس بآية منها

While Abu Hanifa may Allah's mercy be upon him said: 'Bismillah is not a verse of it

Other that the month of Ramadhan, “Bismillah” shouldn’t be recited in any prayer neither on ones heart nor loudly

Imam Fakhruddin Razi writes in Tafseer Kabeer, Volume 1 page 151:

وقال مالك والأوزاعي رضي الله تعالى عنهما : إنه ليس من القرآن إلا في سورة النمل ، ولا يقرأ لا سراً ، ولا جهراً إلا في قيام شهر رمضان


“Imam Malik and Auzai may Allah be pleased with both of them said: 'It (Bismillah) isn’t a part of the Quran except Surah Naml

 and that other than in Ramadhan, it should not be recited, neither in ones heart nor aloud”

Imam Abu Hanifa, Imam Malik and Imam Auzai attested that neither is “Bismillah” a part of surah Fatihah, nor of any other surah of the Quran”

If according to Imam Abu Hanifa “Bismillah al-Rehman al-Rahim” (In the name of Allah, the Beneficent, the Merciful) is not a part of any Quranic Surah
 then the Sunni ulema have committed an addition to the Quran when writing “Bismillah” at 112 places. If making an addition or deletion from the Quran is kufr then either Abu Hanifa is kafir or the present day Sunnis are kafir. The Nawasib of Sipah e Sahaba need to declare Abu Hanifa and abandon his taqleed forthwith.

We read in Tafseer Kabeer:


وأما أبو حنيفة رحمه الله تعالى فإنه قال : بسم الله ليس بآية منها


While Abu Hanifa may Allah's mercy be upon him said: 'Bismillah is not a verse of it'

The Ulema of Ahle Sunnah believed that the sole reason that “Bismillah” was written in the Quran was to make a distance between the texts and to earn a blessing


We read in Tafseer Kashaf:


इस से साफ़ साबित हो गया है कि मुसलमान जो चेलेंज करते हैं कुरआन में न तो कुछ घटाया गया है न बढाया गया है .वह वह दावा झूठ है .और 112  बढ़ाना क्या तहरीफ़ नहींतो क्या है ?हमारी उन  सभी मुस्लिमों  और  इस्लाम के ठेकेदारों  से चुनौती  है ,जो दावे करते रहते हैं कि कुरान में बदलाव या नहीं  हो सकता है  ,  और न कुछ  उस से कुछ   घटाया  और बढ़ाया   नहीं   जा सकता है , ऐसे लोग हमारे सबूतों  को गलत  साबित कर के दिखाएँ  ,  और बताएं कुरान  में 112 आयतें  जोड़ने वालों को हम  काफिर  क्यों  नहीं   मानें  ?



(181/119)


रविवार, 28 जुलाई 2019

सूरे फातिहा में रद्दोबदल हुआ है !!

1-भूमिका 
यह लेख   25 जुलाई  2010 को उस समय तैयार किया गया था  ,जब  फेसबुक  का  नाम  भी नहीं  था  , और उन दिनों लखनऊ  में मुस्लिम ब्लोगर्स एसोसिएशन  नाम  का एक गिरोह था जोअपने ब्लॉगों  के   हिन्दुओं  जैसे नाम रख  कर  हिंदुओं  को गुमराह कर   रहा थे    इनकेकुछ  नाम   ऐसे थे  जैसे प्रेम सन्देश  ,मधुर वाणी ,  इस्लाम  धर्म  , सनातन  इस्लाम  इत्यादि  ,  इनका सरगना  "उमर कैरानवी  , जीशान  जैदी  आदि  थे   इनका  मुंह  बंद    करना  जरूरी   था   इसलिए   हमने अकेले  ही  सामना    शुरू   कर   दिया  ,  इन  लोगों   ने दवा  किया  था कि न   तो कुरान  में कोई परिवर्तन  हुआ  है  और  न   कोई  कर  सका   है इसलिए  हमने  यह  लेख  पोस्ट  िया  था  चूँकि   सुरा  फातिहा  सबसे  मुख्य  है  , इसलिए हमने उसी  को निशाना  बनाया  था ,चूँकि  समय बहुत  काम  था इसलिए  हमने  एक उर्दू   की इस्लामी  साईट  का  साबुत  लिया  था  ,  क्योंकि यह गिरोह   उर्दू  जानते थे  हमने उर्दू को हिंदी लिपि में  कर  दिया  था ताकि  सब   समझ सकें 

कैरानावी मुस्लिम ब्लोगर गैंग का सरगना है.इसका काम हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन करवाना है.इसने एक बहुरूपिये की तरह कई नामों से फर्जी ब्लॉग बना रखे है ,जैसे इम्पेक्ट .सत्यागौतम और नवलकिशोर आदि .इसे अचानक एक ऎसी बीमारी लग्गयी कि यह खुद को इस्लाम का झंडा बरदार समझाने लगा है .और समझता है बाक़ी के सारे लोग मूर्ख हैं ,और वही इस्लाम का एकमात्र विद्वान् है.इसलिए कैरानावी इब्लीस की तरह किसी भी ब्लॉग में प्रकट हो जाता है ,और अपने गिनेचुने मुद्दों क लेकर किसी को भी चेलेंज करता रहता है .इसके पीछे इसके आका हैं ,जो देश के बाहर से इसको निर्देश देते रहते हैं .एक दो दिनों से मैं देख रहा हूँ कि कैरानावी चेलेंज के साथ साथ गालियाँ भी देने लगा है.इसलिए मैंने निर्णय लिया कि अगर इस पाखंडी को मुंहतोड़ जवाब नहीं दिया गया तो यह उर भी उद्दंड हो जाएगा ,औरयह समझाने लगेगा कि कोई इसका जवाब देने वाला नहीं है.और यह जो बकवास करता है वह सच है .लेकिन मैं ऐसा नहीं होने दूँगा .

कल इसने फिर वही चेलेंज दिया कि कुरआन में कोई रद्दोबदल नहीं .

मैंआप लोगों के सामने शिया लोगों की अधिकृत वेबसाईट से हवाला दे रहा हूँ कि केवल कुरआन में नही ,बल्कि कुरआन कि सबसे प्रमुख सूरा फातेहा में तहरीफ़ की गयी है .अरबी में तहरीफ़ का अर्थ रद्दोबदल होना है.इस साईट के "कुरआन "शीर्षक में "तहरीफ़ और तरतीब "के अंतर्गत कुरआन में की गयी "तहरीफ़ "के बारे में विस्तार से लिखा गया है.लेख काफी लंबा होने के कारण मैं केवल ख़ास ख़ास नुक्ते दे रहा हूँ .भाषा की लिपि हिन्दी है जिसमे उर्दू शब्द भी हैं.जिसे आप सब लोग आसानी से समझ लेंगें .जिसे शक हो वह खुद इस साईट को खोल कर देख ले .

http://www.quran.al-shia.org/urd/others/tehreef-wa-tarteebe-quran.htm


1-मअना ए तहरीफ़ :-
यानी किसी कल्मे को उस की हालत पर बाक़ी रख़ कर उस के मअना में तब्दीली पैदा कर देना

दूसरा सब से बड़ा अहम सबूत यह है कि अगर आयाते क़ुरआनी में मअना की तब्दीली न तो आज के मानने वालों में इतने फ़िर्क़े न होते। उम्मते इस्लामिया में 73 फ़िर्क़ों का वुजूद और सब का क़ुरआने मजीद से इस्तिदलाल इस बात का ज़िन्दा सुबूत है कि सारी उम्मत ने ख़ुदाई मअना पर ऐतेमाद (भरोसा) नहीं किया है।

2-तहरीफ़े हरकात :-
यानी ज़ेर व ज़बर वग़ैरह का फ़र्क़ इस तहरीफ़ के बारे में गुफ़्तुगू करने की ज़रूरत नहीं है इस लिये कि आज भी एक एक लफ़्ज़ में मुतअद्दिद क़राअतें पाई जाती हैं जिन में हरकात के ऐतेबार से इख़्तिलाफ़ है और यह तय है कि यह सारी क़राअतें नाज़िल नहीं हुई थीं बल्कि यह क़ारियों के ज़ाती ज़ौक़ का नतीजा थीं। तहरीफ़े हरकात का एक बड़ा सबब मुख़्तलिफ़ अक़वाम व क़बाइल की तिलावत में मुज़मर था हर क़बीले का एक लहजा था और हर क़ौम का एक उसूल क़राअत था। इसी लहजे की तब्दीली और उसूलों के तग़य्युर ने कलेमात में हरकाती इख़्तिलाफ़ पैदा कर दिया। लेकिन यह क़ुरआन का एक तक़द्दुस से कि इतने इख़्तिलाफ़ के बावजूद किसी क़बीले ने भी किसी लफ़्ज़ को बदलने की कोशिश नहीं की, बल्कि सिर्फ़ अपने लहजे से तसर्रुफ़ करते रहे जिस में वह किसी हद तक मअज़ूर भी थे।

3-सूरा फातिहा में हेराफेरी  यानि तहरीफ़े कलेमात
 :-यानी एक लफ़्ज़ की जगह दूसरे लफ़्ज़ का आ जाना। इस तहरीफ़ के बारे में उलामा ए इस्लाम में इख़्तिलाफ़ है, बअज़ हज़रात का ख़याल है कि क़ुरआने करीम में इस क़िस्म की तहरीफ़ हुई है
मसलन सूरए हम्द में (वलज़्ज़ालीन  - ولاالضالین ) की जगह (ग़ैरज़्ज़ालीन غیرالضالین  -) था जिसे सहूलत की नज़र से बदल लिया गया है

हुज्जाज बिन यूसुफ़ ने अब्दुल मलिक से यह ख़्वाहिश की कि (उलाइका मअल लज़ीना अनअमल्लाहो अलैहिम मिन्न नबीयीना वस्सिद्दिक़ीना वशशोहदा ए वस्सालेहीना-  اولئک مع الذین انعم اللہ عليہم من النبین والصدیقین والشہداء والصالحین )कि आयत ने शोहदा के साथ ख़ुलाफ़ा का इज़ाफ़ा भी कर लिया जाए ताकि इन का शुमार भी साहिबाने नेअमत में हो सके
यह ख़्वाहिश की थी कि (इन्नल्लाहस्तफ़ा आदमा व नूहन व आला इब्राहीमा व आला अम्राना अलल आलामीन  - ان اللہ اصطفى آدم ونوحاوآل ابراہیم وآل عمران على العالمین ”में आले इमरान के साथ आले मर्वान -آل مروان  " का भी इज़ाफ़ा कर दिया जाए.
 (रौज़ातुस्सफ़ा)।(روضة الصفا

ज़ाहिर है कि जो हुकूमत नस्ल और सल्तनत परस्ती उम्मत इक़तिदार की ख़्वाहिश पर हुकूमत के बाप दादा का ज़िक्र बर्दाश्त नहीं कर सकती वह यह क्यूँ कर बर्दाश्त करेगी कि “व ग़ैरज़्ज़ालीन-وغیرالضالین  ” की जगह“व लज़्ज़ालीन- لاالضالین“” आ जाये। या “होवर्राज़िक़”هوالرازق - ” की जगह “होवर्रज़्ज़ाक़-  هوالرزاق” आ जाये। या “फ़मज़ऊ इला ज़िक्रिल्लाह-فامضواالى ذکراللہ   ”के बदले “फ़समऊ इला ज़िक्रिल्लाह- فاسمعواالى ذکراللہ” रख़ दिया जाए वग़ैरह वगैरह

4- तहरीफ़े नक़्स:- यानी अल्फ़ाज़ व आयात की कमी दर हक़ीक़त तहरीफ़ के बारे में यही मसअला हर दौर में महल्ले नज़अ व इख़्तिलाफ़ रहा है, उलामा ए इस्लाम की एक जमाअत इस बात की क़ायल रही है कि क़ुरआने मजीद के आयात में कुछ नक़्स ज़रूर पैदा हुआ

5- तहरीफ़े ज़ियाद्ती:- यानी अल्फ़ाज़ व कलेमात का इज़ाफ़ा। 
ऐसा अक़ीदा रखना किसी भी मुसलमान के लिये ज़ेब नहीं देता है।

6- तहरीफ़े तरतीबी:-
यानी आयात और सूरों की तरतीब का बदल जाना तहरीफ़ की यह क़िस्म भी अगरचे उलामा ए इस्लाम ने महल्ले इख़्तिलाफ़ रही है क़ुरआने करीम की तरतीब ही तहरीफ़ शुदा है यानी तरतीबे पैग़म्बर के ख़िलाफ़ नहीं है बल्कि मंश ए पैग़म्बर के खिलाफ़ है और इस बात के साबित करने के लिये दो बातों का इसबात करना पड़ेगा पहली बात यह है कि क़ुरआने करीम हयाते पैग़म्बर में मुरत्तब शक्ल में नहीं था बल्कि बाद के अदवार में मुरत्तब हुआ
और दूसरी बात यह है कि मंश ए रिसालत यही था कि किताबे ख़ुदा को उस की तनज़ील के मुताबिक़ मुरत्तब किया जाए और उम्मत ने उस के बरख़िलाफ़ अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ मुरत्तब कर डाला।
इस तरह से इन तथ्यों से साबित होता है कि कुरआन में रद्दोबदल मुसलमानों ने मुहम्मद कीमौत के बाद किया था .इस बातपर करोड़ों लोग यकीन करते हैं.भले कैरानावी का गिरोह कुछ भी चेलेंज करता रहे .ये लोगों को धोखा नहीं दे सकते.हमें झूठा   साबित करने के इच्छुक  पहले  शिया लोगों   को झूठा साबित  करें  ,
 क्योंक  सच्चाई    सामने आही जाएगी

सूचना
यह लेख इस्लामी इतिहास  की किताब '"रौज़तुस्सफ़ा फिल सीरतुल अम्बिया वल मुलूक वल  खुलफ़ा -   روضة الصفا في سیرة الانبياء والملوك والخلفاء, "नाम की किताब  से ली  गयी है  ,लेखक का नाम "मीर खु वंद -   میرخواند‎   "  है ,इसका काल 836 ईस्वी  है .इस किताब में  7 अध्याय हैं जिनमे नबियों, खलीफाओं  और मुस्लिम  शासको   का इतिहास है  , साथ में  इसमें कुरान  के संकलन और उसमे  की  गयी  हेराफेरी का  इतिहास  भी  है
         

मैं अगली पोस्ट में साबित कर दूँगा कि
"बिस्मिल्लाह "की आयत कुरआन का हिस्सा नहीं है !

No181/118 -25/07/2010

शुक्रवार, 26 जुलाई 2019

786 -हरे कृष्णा का सूचक है !

मुसलमान हर जगह यह संख्या लिख देते हैं .और इसे पवित्र और शुभ अंक मानते है ,उनका मानना है कि यह संख्या कुरआन की प्रमुख आयत "बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम "का संख्यात्मक रूप है ,लेकिन    यह    नहीं जानते  कि किस  गणना   के  आधार   पर  786   संख्या प्राप्त   हुई  है  ?क्योंकि अरबी भाषा के 29 अक्षरों के लिए एक एक अंक होता है .चौथी सदी के एक यहूदी "मुरामिर इब्ने मुर्रा "यह विधी बनाई थी .बाद में अरबों ने भी इसे अपना लिया .क्योंकि उस समय दशमलव प्रणाली अरबों को ज्ञात नहीं थी .अरब अक्षरों को अंकों की जगह प्रयोग करते थे . .यद् रहे अरबी भाषा में मात्राएँ नहीं होती हैं .
विकिपीडिया   में अरबी  अक्षरों   के  संख्यात्मक  मूल्यों     की   तालिका  दी   गयी    है   ,जो  इस  प्रकार  है   ,

Letter values - ā/' ا 1 y/ī ي 10 q ق 100 


b ب 2 k ك 20 r ر  200 


j ج 3 l ل 30 sh ش 300 


d د 4 m م 40 t ت 400 


h ه 5 n ن 50 th ث 500 


w/ū و 6 s س 60 kh خ 600


z ز 7 ` ع 70 dh ذ 700 


H ح 8 f ف 80 D ض 800 


T ط 9 S ص 90 Z ظ 900 


gh غ 1000 


2-मुसलमानों  के हिसाब में गलती

क्योंकि   मुसलमान   इस आयत "بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيم   "में   प्रयुक्त    सभी  अरबी  अक्षरों    के अंकीय    मूल्यों   (Numerical Value of  each  arabic Letter)      का   योग   786  गिन  लेते   हैं    ,  और   इस   संख्या   786 को  पवित्र   मान   कर   हर जगह   लिख   देते  हैं . 
  

लेकिन इस गणित में मुसलमान भूल कर गए .उनहोंने "रहमान "शब्द के अलिफ़ का एक अंक छोड़ दिया जिस से शब्द "र ह म न "बन गया है .अगर अलिफ़ का एक अंक जोड़ दें तो संख्या 787 हो जायेगी .


यह एक निरर्थक शब्द है .यह सिर्फ  " र -ह -म -न  ( ر  ح  م  ن )  है अगर इसमे अलिफ़ लगाएं तभी रहमान( رحمان  ) शब्द बन सकता है .परन्तु कुल संख्या 786 की जगह 787 हो जायेगी .क्योंकि ,अरबी   में  आयत  " बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम - بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيم     " लिखने  में  अरबी   के   कुल  19   अक्षरों   का  प्रयोग   हुआ है  , और   हरेक  अक्षर    का  संख्यात्मक मूल्य(Gematrical Value  )  इस  चार्ट  में  दिया  गया   है यह  समझने  के लिए .आप पूरा चार्ट देखिये -


1-बे   -ب  =2


2- सीन    -س  =60


3-मीम  -م  =40


4 -   अलिफ  -ا  =1


5 -  लाम     -ل  =30


6   -लाम- -ل  =30


7- हे  -ه   =5


8 -  अलिफ -ا  =1


9 -  लाम-ل  =30



10 -  रे   -ر  =200


11- हे   -ح   =8



12-  मीम  -م  =40

(यहाँ  अलिफ   लगाना  चाहिए   यानी  1 संख्या   बढ़ेगी )


13-नून -ن  =50


14 -अलिफ -ا   =1


15- लाम -ل  =30


16   - रे -ر   =200


17- हे -ح  =8


18-  ये  -ي  =10


19- मीम -م  =40


Total =786?

इसलिए मुसलमानों  को  चाहिए  कि मीम   के  आगे  अलिफ   और   लगाएं    जिस  से  रहमान   शब्द  बनेगा   , परन्तु  अलिफ   का एक  अंक   जुड़  जाने से   आयत   के    अक्षरों  मानक   मूल्य  787    हो   जायेगा 
    
3-786 का सही अर्थ 

मुसलमान  ईमान   के नाम  पर इतने  अंधश्रद्धालु  हो   गये  कि  गलत  गणना  पर  भी  आज  तक   भी  बिना  हिसाब  किये  786  को हर   जगह लिखते  रहते  है   ,   उन्हें   पता  होना चाहये  कि .अब इसी चार्ट के अनुसार "हरे कृष्णा-  هري   كرشنا " शब्द के अक्षर जोड़ रहे है .पाहिले अरबी अक्षर के नाम ,फिर उसका अंगरेजी ,और फिर अक्षर का अंक या उसकी numerical value दे रहे हैं

हे H =5 +रे R =200 +ऐ E =10 +काफ K =20 +रे R =200 +शीन SH =300 +नून N =50 +अलिफ़ A =1 total 786

786=ه  ـر  ـ  ي   ـ  ك  ـ   ر  ـ ش  ـ   ن  ـ  ا   ـ



इस प्रकार से मुसलमान 786 के नाम पर भगवान कृष्ण की उपासना कर रहे हैं ,


सही बात है जादा चालाक हमेशा धोखा खाते है .लोग मुझे मुसलमान बनाने चले थे मैं सब मुसलमानों को हिन्दू बना दिया .अब हिन्दू भी 786 सही अर्थ समझ जायेंगे 

.हम तो यही मानेगे कि मुसलमान 786 के बहाने कृष्ण की इबादत कर रहे है .

नोट -आज  25 जुलाई   सवेरे  हमारे   प्रबुद्ध  और समर्थक श्री विट्ठल  व्यास  जी ने  फोन   से पूछा    है कि देखा गया है मुसलमान   जगह  जगह  , खासकर वाहनों  पर  786 लिख देते  हैं    , इसलिए इसके बारे  में जानकारी  दीजिये  ,  व्यास  जी दुबई में भी रह चुके हैं  , इसलिए  उनके निर्देश  का पालन  करते ुये  मैं  यह  लेख  फिर  से ोस्ट  कर  रहाहूं   , यह  लेख  28 /09 /2010 को   तैयार  किया  गया  था , उस समय फेसबुक  नहीं  थी ,  मेरा निवेदन  है  सभी  लोग  इस लेख  को ध्यान   से पढ़ें और  शेयर  करें  !


नोट  - मेरी   खुली    चुनौती    है   कि इस   लेख    को   गलत  साबित   करके  दिखाए  !



जय श्री कृष्ण


(186/135)

गुरुवार, 25 जुलाई 2019

मुसलमानों का पक्का ईमान ?

मुसलमान लगों के सामने अक्सर यह कहते हैं कि ,हम अपने ईमान के पक्के हैं ,हमारा इमान पुख्ता है ,हम ईमान से समझौता नहीं कर सकते .तो लोग इसे भूल से इसे मुसलमानों की ईमानदारी( Honesty )समझ लेते हैं .वैसे इमान का अर्थ विश्वास (faith ,Belief ,Creed )भी होते हैं लेकिन बहुत कम लोग मुसलमानों के इमान का सही मतलब नहीं जानते हैं ,और धोखा खा जाते हैं .
यहाँ पर आपको प्रमाण सहित मुसलमानों के ईमान का सही नमूना दिया जा रहा है .औरइसका कारण बताया जा रहा है कि मुसलमान क्यों कहते है ,कि हमारा ईमान पक्का है .थोड़े से नमूने देखिये -

1-ईमान में यकीन (belief in Iman)

अपने बाप की ह्त्या करके माँ से सम्भोग करने से ईमान में कमी नहीं होगी 
 having sex with one's mother and murdering one's father does not lessens one's faith
वकी ने कहा है ,एक बार सुफ़यान अल सवरी,शुरयाक अल हसन बिन सालेह ,इब्ने अबी लैला ने इमाम अबू हनीफा को बुलाया .और उनके आने पर सवाल किया यदि कोई व्यक्ति अपने बाप को क़त्ल करके अपनी माँ से सम्भोग करे ,और बाप की खोपड़ी में शराब भर कर पिए ,तो आप ऐसे व्यक्ति को क्या कहेंगे .इमाम ने कहा -वह मोमिन है (यानी ईमान वाला है )
(यही कारण है कि हरेक कुकर्म करने बाद भी मुसलमान खुद को ईमान वाला कहते हैं और कहते हैं हम ईमान के पक्के हैं )
We read in Tarikh Baghdad, Volume 13 page 378:

حدثنا وكيع قال اجتمع سفيان الثوري وشريك والحسن بن صالح وبن أبي ليلى فبعثوا إلى أبي حنيفة قال فأتاهم فقالوا له ما تقول في رجل قتل أباه ونكح أمه وشرب الخمر في رأس أبيه فقال مؤمن
(अरबी में लिखा है   " रजल कतल अबाहु व् नकह उम्महु व शरब अल खमर फी रास अबीहि )


Wakee narrated that Sufyan al-Thawri, Shurayk, al-Hassan bin Saleh, Ibn Abi Layla gathered and invited and invited Abu Hanfia. When Abu Hanifa arrived, they asked: ‘What is your opinion about a man who killed his father, had sexual intercourse with his mother and drank alcohol in his father's skull?’ He replied: ‘He is Momin’.

2-मुसलमान जूतों की इबादत कर सकते हैं 
(Muslims can worship a shoe)

तारीखे बगदादी में याहया बिन सईद ने लिखा है कि ,इमाम अबू हनीफा ने कहा है ,गर कोई मुसलमान की नजदीकी हासिल करने लिए अपने जूतों की पूजा करे तो इसमे कोई गुनाह नहीं है (यानी इमान पक्का रहेगा )
( फिर मुसलमान मूर्ति पूजा के कारण हिन्दुओं को काफ़िर क्यों कहते हैं ,मूर्तिपूजा जूता पूजा से अच्छी है )
We read in Tarikh Baghdad, Volume 15 page 509:

حدثنا يحيى بن حمزة وسعيد يسمع ، أن أبا حنيفة قال : لو أن رجلا عبد هذه النعل يتقرب بها إلى الله ، لم أر بذلك بأسا

Yahya bin Saeed said: 'Abu Hanifa said that if anyone worships this shoe in order to get close to Allah (swt), it is not a sin'

3- अबूबकर और इब्लीस (शैतान )ईमान में बराबर हैं 
(Abu Bakar and Iblis were equal in faith)
 तारीखे बगदादी में इमाम अबू हनीफा ने लिखा है कि मुहम्मद के ससुर और पहले खलीफा अबूबकर सिद्दीकी का इमान इब्लीस (शैतान )के बराबर था 
(जब मुसलमानों का पहला खलीफा ही इमान के मामले में शैतान के बराबर था तो दुसरे मुसलमानों का इमान कैसा होगा )

We read in Tarikh Baghdad, Volume 13 page 376:

سمعت أبا حنيفة يقول أيمان أبي بكر الصديق وإيمان إبليس واحد
(अरबी में है  " ईमान  अभी बकर असिद्दीक वल इब्लीस  वाहिद "


“Imam Abu Hanifa said that Abu Bakr al-Sidiq and Iblis were equal in Iman".

4-सहाबी रसूल की पत्नी पर नजर रखते थे 
अल दुर्र अल मंसूर में लिखा है कि मुहम्मद का एक सहाबी "तल्हा" (साथी )मुहमद की पत्नी पर नजर रखता था .और मुहम्मद की मौत के बाद उस से शादी का इरादा रखता था .
Sahabi Talha was eying the wife of the Holy Prophet with the intention of marrying her after His death
कतदा ने कहा है कि सहाबी तल्हा बिन उबैदुल्लाह कहते थे कि अगर रसूल मर जाये तो मैं उसकी पत्नी आयशा से शादी कर लूंगा (इसके बाद ही कुरान में यह आयत लिखी गयी थी ,कि रसूल परेशान करना ठीक नहीं है )
( जो मुसलमान अपने रसूल की मौत के बाद उसकी पत्नी से शादी का इरादा रखतेहों वह उस रसूल पर इमान कैसे रखते होंगे )

We read in Al-Dur al-Manthur, Volume 6 page 644:

وأخرج عبد الرزاق وعبد بن حميد وابن المنذر عن قتادة رضي الله عنه قال : قال طلحة بن عبيد الله : لو قبض النبي صلى الله عليه و سلم تزوجت عائشة رضي الله عنها فنزلت وما كان لكم أن تؤذوا رسول الله
Qutada may Allah be pleased with said: 'Talha bin Ubaidullah said: 'If the prophet (pbuh) passes away, I will marry Ayesha'. 
Thus the verse '{ and it does not behove you that you should give trouble to the Messenger of Allah,}' was revealed'.

5-मुआविया अपनी माँ के जननांग की तारीफ़ से से खुश हो गया 

(Muawiyah tolerated a person praising his mother’s genitalia)

शेख मुहम्मद बिन कासिम बिन याकूब ने लिखा है ,कि पांचवे खलीफा मुआविया अपने शांत स्वभाव के लिए प्रसिद्ध है .कोई उसे गुस्सा नहीं दिला सकता था .यही बात देखने के लिए एक व्यक्ति मुआविया के पास गया और बोला ,मैं तुम्हारी माँ से शादी करना चाहता हूँ ,क्योंकि उसकी योनी बड़ी ,और मजेदार है .मुआविया बोला इसीलिए तो मेरा बाप मेरी माँ की योनी को चाहता है ,फिर मुआविया ने खजांची से कहा इस आदमी को एक हजार सिक्के देदो ,जिस से यह अपने लिए गुलाम लड़की खरीद सके .
( मुसलमान कहते हैं की हम अल्लाह के आलावा किसी की भी तारीफ नहीं सुन सकते ,चाहे वह देश ही हो ,यह हमारा इमान हमारा ईमान है .लेकिन खलीफा अपनी माँ की योनी की तारीफ सुन कर इनाम दे रहा है ,क्या इसी को ईमान कहते हैं )

Sheikh Muhammad bin Qasim bin Yaqub (d. 940 H) records in his book Rawudh al-Akhbar al-Muntakhab min Rabee al-Abrar, pages 220-221: 

"وكان معاوية بن أبي سفيان (رضي) الشهيرة لمزاجه بارد ولا يمكن لأحد أن يجعله غاضبا وهكذا ، شخص واحد ادعى أنه سيجعله غاضبة ذهب اليه (معاوية) ، وقال :' أود أن أطلب منكم أن يتزوج أمك لي لأنها كبيرة المهبل تذوق الحلو ". فأجاب معاوية بن أبي سفيان،' وهذا هو السبب والدي يحبها. معاوية بن أبي سفيان ثم أمر له امينا للصندوق لاعطائه 1000 النقود بحيث انه قد يشتري لنفسه فتاة الرقيق

"Muawiyah (ra) was famous for his cool temperament and no one could make him angry. Thus, one person claimed that he would make him angry. He went to him (Muawiyah) and said: ‘I would like to ask you to marry your mother to me because she had a large sweet tasting vagina.’ Muawiyah replied, 'That is why my father loved her'. Muawiyah then ordered his treasurer to give him 1000 coins so that he might buy a slave girl for himself”

. Rawudh al-Akhbar al-Muntakhab min Rabee al-Abrar, pages 220-221

6-सहाबी अमरू बिन आस ने जान बचाने के किये अपने चूतड पेश कर दिए 
एक बार अली ने अमरू बिन आस पर हमला किया और उस पर भाला फेका ,जो नीचे गिर गया .अमरु जमीन पर गिर गया और अली के सामने अपने चूतड (anus )कर दिया .अली वापस लौट गए .लोग बोले यह अमरू बिन आस है .अली ने कहा जब इसने अपने चूतड(anus ) मुझे दिखाया तो मुझे रहम आ गया .जब अमरू बिन आस मुआविया के पास गया तो मुआविया ने कहा तुम अल्लाह के साथ अपने चूतड (anus )की भी तारीफ़ करो ,जिसके कारण जान बच गयी .
( लोगों ने अपने धर्म ईमान के किये सब कुछ त्याग कर दिया ,लेकिन मुसलमान सिर्फ अपनी anus के सहारे जान बचा लेते है .और इसके लिए अल्लाह के साथ anus की तारीफ तरते हैं , इसीको ईमान कहते हैं .
Sahabi Amro bin al-Aas offered his buttocks to his enemy in order to save his life

سقط عمرو يوم واحد هاجم علي عمرو بن العاص، وقال انه رمى الرمح وعمرو سقط على الأرض ، على الأرض ، وأنه يتعرض له ثم الأرداف. [قال شخص] ثم تحولت بعيدا علي وجهه : "كان هذا عمرو بن العاص". ردت علي : "لقد أراني شرجه، وهذا جعلني رحيم له. وقال معاوية بن عمرو العاص عندما عاد : "يجب بحمد الله والشرج الخاص'

One day Ali attacked Amro bin al-Aas, he threw a spear and Amro fell to the ground, Amro fell to the ground and he then exposed his buttocks. Ali then turned away his face, [people said]: 'This was Amro bin Aas'. Ali replied: 'He showed me his anus and this made me merciful to him'. When Amro ibn Aas returned, Mu'awiya said: 'You should praise Allah and your anus'

We read in Al-Bidayah wa al-Nihayah, Volume 7 page 293:

इतना पढ़ने बाद आपको पता चल गया होगा कि जब आतंकवादी इतने गुनाह करते हैं ,तो मुल्ले मौलवी ,या मुसलमान उसका विरोध क्यों नहीं करते .क्योंकि बड़े से बड़ा पाप करने पर भी मुसलमानों का इमान ज्यों का त्यों बना रहता है .उनको अपने किये पर कोई पश्चाताप क्यों नहीं होता .
अब आगे से मुसलमानों के इमान पर भरोसा कभी न करें !
प्रबुद्ध  पाठकों  से निवेदन  है कि इस लेख  को ध्यान  से पढ़ें   नहीं तो मेरी मेहनत व्यर्थ   हो जाएगी 

(87/57)

मंगलवार, 23 जुलाई 2019

जन्नत के नाम से मुस्लिमों से धोखा ?

मुसलमानों    का   विश्वास है कि कोई    काफिर  ,मुशरिक   या गैर मुस्लिम   जन्नत में नहीं     जाएगा  , अल्लाह  सिर्फ ईमान वालों   को ही  जन्नत में दाखिल   करेगा  ,  कुरान और  हदीसों में जन्नत  के बारे में ऐसी ऐसी  बातें   भरी हुई हैं   जिनको पढ़कर  या मुल्लों द्वारा  बताई  गयी बातों  को सुन  कर   हरेक मुस्लिम    के दिल में जन्नत  में जाने  की तमन्ना   करता  रहता   है  , ऊपर  से  मुसलिम  प्रचारकों  ने मुसलमानों  को  जन्नत  में जाने  का  जो  सबसे  आसान  रास्ता  बताया  है  वह  है   " जिहाद  " इसके  अनुसार   जो मुजाहिद   जितने  अधिक  काफिरों   को  मारेगा  या उनको मारते  हुए  शहीद हो जाएगा  , जन्नत  में उसका मरतबा   उतना  ही बड़ा  होगा  ,मुस्लिम   प्रचारक  मुसलमानों को  बताते  रहते हैं कि जन्नत में तुमको    हूरों  के  साथ    असीमित   अय्याशी   करने   का  अवसर  मिलेगा  ,  दुनिया में  जितना भी    जिहादी  आतंक  और   निर्दोषों  की हत्याएं हो रही हैं  उनके पीछे   जन्नत   का  लालच  ही   है , यहाँ तक मुस्लिम  औरतें  भी जन्नत में जाने  के सपने   देखने  लगी   है 
लेकिन   अगर मुस्लिम   ध्यान   से  जन्नत  संबधी     हदीसें   पढ़  ले  तो   तो  उनका जन्नत  का सपना  चकनाचूर    हो   जाएगा  ,  क्योंकि  जन्नत  के नाम पर  उनको  धोका   दिया  गया   है  , इस  छोटे  से लेख  में  हम     ऐसे तीन  धोखे   दे  रहे  हैं 
1-पहला  धोखा   
औरतें    जन्नत में नहीं   जाएगी  ,  यह बात  हमने अपने लेख में प्रमाण  सहित      देदी    है  , इसका मतलब    लगभग   मुस्लिमों     की  आधी  आबादी    जन्नत में  नहीं   जायेगी   ,  क्योंकि  मुस्लिमों   की  कुल  आबादी  में  लगभग  आधी  औरतें   हैं  , अब   बचे  मुस्लिम  मर्द  .
2-दूसरा  धोखा
हदीसों   के अनुसार  जन्नत  में केवल    सत्तर हजार   (70000  )    लोगों   के लिए  जगह है  ,  अर्थात   मुसलमानों  की  आधी  आबादी  में सिर्फ   सत्तर  हजार  लोग  ही  जन्नत  में घुस  आएंगे  ,  हो  सकता  है  अबतक  जन्नत    का हॉउसफुल हो   गया   हो   , यह  बात  भी हमने  लेख  में  प्रमाणों  सहित  पहले   दे   दी  है 
3-तीसरा  धोखा  
मान लीजिये   कुछ मुसलमान  चालाकी  से   या  जन्नत के  अधिकारीयों    को रिश्वत देकर  सत्तर  लोगों   की भीड़  मेंचुपचाप से  जानत में   घुस भी जायेंगे    तो   भी  उनको  जन्नत   में  नहीं   जाने  दिया  जायेगा     ,  क्योंकि   रसूल   ने  साफ  साफ  कह  दिया  है  कि " जन्नत  में  केवल बिना  खतना  वाले  लोग ही   जायेगे   ! (बिना खतना  वाला   यानी -  uncircumcised)
इसके  प्रमाण  के लिए   दो  हदीसें   दी   जा  रही   हैं
1-पहली हदीस  
इब्ने अब्बास ने कहा कि रसूल ने बताया   जब  तुम  अल्लाह से मिलने जन्नत  जाओगे तो नंगे पैर पैदल  चल  कर  जाना  पड़ेगा  और वही  लोग  जा  सकेंगे  जो बिना  खतना वाले  होंगे  ,
Narrated Ibn `Abbas:

The Prophet (ﷺ) said, "You will meet Allah barefooted, naked, walking on feet, and uncircumcised."

"سَمِعْتُ ابْنَ عَبَّاسٍ، سَمِعْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ ‏ "‏ إِنَّكُمْ مُلاَقُو اللَّهِ حُفَاةً عُرَاةً مُشَاةً غُرْلاً ‏"‏‏.‏ قَالَ سُفْيَانُ هَذَا مِمَّا نَعُدُّ أَنَّ ابْنَ عَبَّاسٍ سَمِعَهُ مِنَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم‏.‏

Reference : Sahih al-Bukhari 6524
In-book reference : Book 81, Hadith 113
USC-MSA web (English) reference : Vol. 8, Book 76, Hadith 53
2-दूसरी  हदीस 
इब्ने अब्बास ने कहा  जब रसूल  लोगों  खुत्बा  दे  रहे तो मैंने  सुना की रसूल ने कहा   "जब तुम  अल्लाह से मिलने  जन्नत  जाओगे तो   तुम्हे नंगे पैर चल कर  और  नंगे होकर  जाना   पड़ेगा   और  बिना खतना वाला   भी   होना चाहिए  "
Ibn Abbas reported that he heard Allah's Messenger (ﷺ) deliver an address and he was saying that they would meet Allah barefooted, naked and uncircumcised.

عَبَّاسٍ، سَمِعَ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم يَخْطُبُ وَهُوَ يَقُولُ ‏ "‏ إِنَّكُمْ مُلاَقُو اللَّهِ مُشَاةً حُفَاةً عُرَاةً غُرْلاً ‏"‏ ‏.‏ وَلَمْ يَذْكُرْ زُهَيْرٌ فِي حَدِيثِهِ يَخْطُبُ
Reference : Sahih Muslim 2860 a
In-book reference : Book 53, Hadith 69
USC-MSA web (English) reference : Book 40, Hadith 6846
नोट - इन  दौनों  हदीसों  में   बिना  खतना  वाले (   uncircumcised     )   को  अरबी में "गरला - غُرْلاً ‏  "    कहा  गया   है  . अरबी  डिक्शनरी में  इस  शब्द का  अर्थ  " गैर मख़्तून   -غير مختون"     है   ,   फारसी में  इसका  अर्थ  " खतना  न शुदः - ختنه نشده
  "  है  , अर्थात  ऐसा व्यक्ति  जिसकी  खतना नहीं  की गयी हो ,
और  बड़े विरोधाभास की बात  तो  यह  है  कि एक भी   ऐसी हदीस नहीं  है कि जिसमे लिखा हो   अल्लाह   उन  सभी मुस्लिमों   के लिंग की  चमड़ी   फिर  से  ऊगा   देगा    जिनकी  चमड़ी   खतना    करके  काट कर  फेक दी    हो  ,इस  हदीस  के अनुसार जन्नत में जाने के  योग्य     शायद  ही  कोई   मुस्लिम   होगा   जिसका  खतना  नहीं  किया   हो   .
मतलब  जन्नत  में  गलती  से  एक  दो  लोग  ही  जा  सकेंगे  . !
सिर्फ  इतने के लिए  जिहाद  करना  मूर्खता नहीं     तो और क्या   है 
 यह  सरासर   धोखा   नहीं  तो  और  क्या   है   ?तभी  तो मिर्जा  ग़ालिब  ने   सही  कहा  था 
" हमको  मालूम   है जन्नत  की  हकीकत  क्या  है   , 
 दिल  को  बहलाने  का  ग़ालिब   ये  ख़याल  अच्छा  है  "
हमारे   पाठक      इस  विषय  पर  अपने विचार जरूर   प्रकट   करें   ,  
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शनिवार, 20 जुलाई 2019

इस्लाम में औरतें नबी क्यों नहीं बन सकती हैं ?


सिर्फ इस्लाम  ही  एक  ऐसा मजहब  है   ,जिसमे  आज तक  कोई   स्त्री  नबी   नहीं   बन  सकी , और  न  कोई    स्त्री   पीर  या औलिया  बन  सकी , यहां तक  कोई स्त्री  मौलवी    और मुफ़्ती बन   सकी है  ,आज इस लेख   में  इसका  कारण दिया   जा  रहा  है 
इस बात से  कोई भी इंकार नहीं  कर सकता कि इस्लाम की अधिकांश  मान्यताएं   यहूदी और  ईसाई   धर्म  से  ली  गयी   हैं ,इन  सबका विश्वास  है  कि अल्लाह   अपने  विशेष   लोगों   के माध्यम  से   लोगों  को अपना   सन्देश  देता  रहता  ,    ऐसे   लोगों   को    'नबी - نبي    "    कहा   जाता   हैं  , चूँकि   इस  शब्द  का   हिंदी  में कोई   पर्यायवाची   शब्द   नहीं   है   ,  लेकिन   अंगरेजी  में इसे   prophet कहा  जाता   है  , और हिब्रू  और  अरबी  में     "नबी    נבי  -       "  कहा   जाता  है  हदीस  के  अनुसार  अल्लाह  ने अबतक  एक  लाख  चौबीस   हजार  नबी  भेजे   ,लेकिन   उन  में   एक   भी   महिला  नहीं   थी ,जबकि  इस्लाम   से  पहले     अल्लाह   महिला  नबियों   को  भेजता  रहता   था  ,  इनको  .-हिब्रू में ( נביאה)अरबी में ( نبية)कहा  जाता  है ( prophetesses)

 1-तौरेत  में   नबियाः के  नाम  
मुस्लमान   तौरेत   यानी   बाइबिल के पुराने नियम ( Old Testament ) को अल्लाह की किताब    मानते  हैं  ,इसमें 5 महिला  नबियाः  के नाम इस  प्रकार  हैं
1-Miriam (Exodus 15:20-21) -मरियम (हारून की बहिन )
2-Deborah (Judges 4:4) -देबोरा -लप्पीदोत की स्त्री
3-Huldah (2 Kings 22:14) -हुलदा-शल्लूम की पत्नी
4-Noadiah (Nehemiah 6:14) -नोअद्याह
5-Isaiah’s wife (Isaiah 8:3) -यशायाह की पत्नी

तौरेत में दी गयी इन महिला नबीया के आलावा यहूदी धर्मग्रंथ तलमूद में इन महिला नबीया के नाम मिलते हैं
1 .सारह ,हन्नाह ( नबी समूएल की पत्नी )
 2 .अबीगेल ( नबी दाऊद की पत्नी )
3 .एस्तेर(पुस्तक एस्तेर )इनको भी नबीया माना गया है .
The Jewish Talmud counts some additional women as prophets including Sarah, Hannah (mother of Samuel), Abigail (wife of David) and Esther. However, these are not called prophets or prophetesses in the Bible.
3-इंजील में नबियाः के नाम  
कुरान  की तरह इंजील  भी  अल्लाह  की कताब     है   इसे  बाइबिल का नया नियम  (New Testament    ) कहा   जाता   है  इसमें भी महिला  नबियाह   के  नाम  हैं  ,
1-अन्ना -फ़नूएल की बेटी -Anna (Luke 2:36)
2-राजा फिलिप की चारों पुत्रियाँ -Philip’s four daughters (Acts 21:8-9) -
3-इसा मसीह की माता मरियम और यूहन्ना बपतिस्ती की माता एलियाबेथ भी नबूवत करती थीं
( both Mary mother of Jesus (Luke 2:46-55) and Elizabeth mother of John Baptist (Luke 2:41-45) both made prophecies.)
तौरेत   और इंजील   के   इन प्रमाणों   से  सिद्ध  होता  है  कि इस्लाम  से  पहले यहूदी  और ईसाई   धर्म में  औरतें   नबी    हुआ  करती  थीं   , और उनको   वही  सम्मान  दिया   जाता    था  जो पुरुष   नबी  को  दिया   जाता  था  , लेकिन  जैसे  ही  इस्लाम मजहब बना  अल्लाह  ने   औरतों  को नबी बनाना  बंद  कर   दिया  , गौर  करने  की  बात  है  कि खुद   कुरान  में  लिखा  है  कि यहूदियों  ,ईसाइयों  और  मसलमानों    का  अल्लाह   एक  ही   है , तो  फिर  अल्लाह  ने  किसी  औरत  को नबी  क्यों  नहीं  बनाया   ,? इसके  दो  कारण हैं  ,पहला  दिखाने  का  कारन  है  , दूसरा  असली  कारन  है  
3-दिखावटी  काऱण 
अक्सर मुस्लिम     विद्वान्   तर्क  देते हैं  की  मासिक  धर्म के  कारण औरतें    अपवित्र  होती  रहती  हैं   और उनके  पुरुषों  के मुकाबले  आधी बुद्धि  होती  है  इसलिए  अल्लाह  के  किसी  स्त्री   को नबी नहीं  बनाया  ,  लेकिन इस कुतर्क  के कई जवाब  दिए  जा  सकते  हैं 
4-असली   काऱण 
वासतव  में मुहमद  साहब सबसे बड़े  महत्वाकांक्षी     व्यक्ति  थे  ,  पहले  तो उन्होंने  बिना  किसी  योग्यता  के  खुद  को  अल्लाह   का  रसूल घोषित  करके  खुद  को अल्लाह  के बराबर  बना   लिया  , और लोगों   से कहा  तुम अल्लाह  के साथ  रसूल  का हुक्म भी  मनो ,  मुहमद  चाहते थे  कि उनके  बाद  उनकी  औलादें  भी      क़यामत  तक   हुकूमत  करती   रहें  ,  इसके  लिए उन्होंने  चालीस  औरतें  रख   ली   थी  , इनमे  9 साल  की बच्ची  से  लेकर  58 साल  की  बुढ़िया  ,  विधवाएं   , पकड़ी  हुई  औरतें   खरीदी  हुई और भेंट  में दी  गयी  सभी प्रकार  की  औरतें   थी  , जिन  से  पारी  पारी  से  ( turn by turn   )  सहवास  करते  रहते  थे ,लेकिन  इतनी  घिसाई  के बाद  भी  खदीजा   के आलावा    मुहम्मद  की किसी  भी  औरत के कोई  संतान  नहीं हुई   ( यद्  रखिये मुहम्मद   ने  जब  खदीजा से  शादी  की  थी  वह दो बार विधवा  हो चुकी  थी  ,  )महहमद  को  हबश   के बादशाह ने एक गुलाम औरत   भेंट की थी   , जिस से सिर्फ लड़का  हुआ था  मुसलमान  उसे मुहम्मद  की संतान  बताते  हैं  जबकि वह  एक  दासी  थी  अरब में जब  दासी पुराणी  हो जाती  थी तो या तो किसी को भेंट कर  देते थे या बेच   देते थे  ,  इसलिए वह लड़का मुहम्मद  से पैदा  था इसके  शक  है  , अरब में संतान  पैदा  करने  की जिम्मेदार  औरत  को माना   जाता  था  ,  और जब  मुहम्मद की किसी पत्नी की संतान  नहीं  हुई  तो  , मुहम्मद   ने  मुसलमानों  को एक  दुआ पढ़ते  रहने  को कहा  जिसे  " दुरूद इब्राहिम  " कहा  जाता  है  इसमें  इसमें मुहम्मद  की  संतानों  की  वृद्धि और सुख की कामना  है  लेकिन  इस पर  भी जब  संतान  नहीं  हुई तो  चिढ  कर मुहम्मद  ने  औरतों  को जहन्नम  के लायक     बता   दिया  ,वासतव में  मुहम्मद औरतों के कोई संतान नहीं होने की जिम्मेदार   औरतें नहीं  ,खुद मुहम्मद थे  क्यों   हो सकता है उनके वीर्य में  शुक्राणु बिलकुल  भी  नहीं   हों  .
  इसी   लिए इस्लाम  में  कोई   "रसूलः  رسولةٌ-"  महिला रसूल तो  क्या  कोई  'पिरानी " महिला पीर , और "  मौलवीयः - مولويه " महिला   मौलानी    नहीं   है , 
 हमारे   विचार  से इसके आलावा और  कोई  दूसरा   कारन नहीं   हो  सकता    ,  आप  लोग  अपनी  राय  जरूर  दीजिये 
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गुरुवार, 18 जुलाई 2019

भगवान बुद्ध भी अल्लाह के रसूल थे !!

मुसलमान मानते  हैं   कि अल्लाह   हरेक     समुदाय  और   क्षेत्र  में  अपने  रसूल     और नबी  भेजता  रहता   है   ,जो  लोगों  को उन्हीं   की भाषा में धर्म  का ज्ञान   देता  था .
  जिसे  कि कुरान में   कहा  गया   है 
"हमने  हर उम्मत में   कोई न   कोई रसूल भेजा "
وَلَقَدْ بَعَثْنَا فِي كُلِّ أُمَّةٍ رَسُولًا  "
 indeed, within every community have We raised up an apostle
 सूरा -नहल  16:36 
कुरान में केवल  25 नबियों    के नाम  दिए  गए  हैं  ,

1-रसूलों या नबियों  की  संख्या  
मुसलमान  आदम  को पहला और मुहम्मद को  अल्लाह  का अंतिम    रसूल  या नबी मानते  हैं   ,इस काल खंड में अनेकों   नबी पैदा  हुए  जिन में से  लगभग   025 नबियों   के नाम  कुरान  में मिलते   हैं   ,  लेकिन कुल नबियों  की सही  संख्या  इमाम  अहमद  में अपनी  किताब "मुसनद  अहमद   "  में   इस हदीस  में    दी   है   ,  हदीस  इस प्रकार   है  ,
अबू   जार    ने रसूल  से पूछा   " या  रसूल कितने  रसूल   हो  चुके   हैं  " रसूल ने बताया  ऐक सौ चौबीस   हजार   (124000   )   और  उनमे   15 रसूलों   के   झुण्ड   थे  "

 Abu Dharr (ra) had with the Prophet (saws).
I said "O Messenger of Allah, how many Prophets were there?" He replied "One hundred twenty four thousand, from which three hundred fifteen were jamma ghafeera."


"قُلْتُ يَا رَسُولَ اللَّهِ كَمْ وَفَّى عِدَّةُ الْأَنْبِيَاءِ قَالَ مِائَةُ أَلْفٍ وَأَرْبَعَةٌ وَعِشْرُونَ أَلْفًا الرُّسُلُ مِنْ ذَلِكَ ثَلَاثُ مِائَةٍ وَخَمْسَةَ عَشَرَ جَمًّا غَفِيرًا‏.‏   "
 21257No: مسند أحمد 

इस से साफ  पता  चलता है कि मुसलमान  सभी  नबियों  के बारे  में न  तो  जानते  और न   जान   सकते हैं   लेकिन कुछ   नबियों  के  नाम    कुरान   में    स्पष्ट     हैं  और कुछके  बारे में केवल    संकेत   के रूप में उल्लेख      है  , 
यदि   हम  कहें   की  भगवान  बुद्ध   भी  अल्लाह  के   नबी यानि   रसूल  थे  तो  मुसलमान      तुरंत विरोध   करने   लगेंगे   ,   और  कहेंगे   बुध    का  नाम    कुरान   और  हदीस  में नहीं    है  ,  लेकिन   सच  बात  तो  यह  है कि कुरान  में  दो  जगह    बुध  का  नाम  संकेतों   में  दिया  गया  है   ,  इसका  मुख्य   कारन     अरबी  भाषा  की   अक्षमता    है  ,   भगवन    बुद्ध   का  जन्म     लगभग    486 ईसा   पूर्व   कपिलवास्तु  नामक नगर  में  हुआ   था  ,  बचपन  में  उनका  नाम  सिद्धार्थ    था  ,  और  ज्ञान   प्राप्त   करने  के  बाद   उनको    बुद्ध      कहा   जाने  लगा   ,  उनको   बोधिसत्व   भी   कहा   जाता    है ,धीमे धीमे    बुद्ध   की ख्याति     तिब्बत  से होकर   अफगानिस्तान  ,   और रेशम  मार्ग   ( the Silk Road     )  पर  आने  वाले   सभी   देशों  में  फ़ैल   गयी     यहाँ  तक   अरब   के व्यापारी   भी     भगवान  बुद्ध  के   बारे   जानने   लगे  थे  ,   चूँकि  अरबी  में  बोधिसत्व       या  कपिल  वास्तु    कहना  उनके लिए  मुश्लिल     था   इसलिए  वह  बुद्ध  को   "जुल कफिल -  ذُو ٱلْكِفْل"कहने  लगे   इसका  अर्थ   है   " कपिल    वस्तु    वाला   "   किसी   दूसरी  भाषा   के कठिन  शब्दों  को  अपनी   भाषा  में आसान  बना  लेना  भाषा  विज्ञानं   का  नियम    है   ,  जैसे   अंगरेजों  ने "मुख्योपाध्याय    का   मुखर्जी  , वंदो पाध्याय  का  बनर्जी  और  चट्टो पध्याय का  चटर्जी इत्यादि ,यही  नहीं    यहूदियों   और  अरबों   में  लोगों   को उनके  शहरों  के  नाम  से भी    जाना   जाता   था    जैसे  " येशु   नासरी   " यानि  नाजरथ   का  वासी   या   ख्वाजा  अजमेरी  ,   हफीज   जालंधरी     इत्यादि 
  2 -कुरान   में  बुध   का उल्लेख 
पूरी  कुरान   में सिर्फ  दो  बार  भगवान   बुध   को   " जुल कफिल -ذُو ٱلْكِفْل "  नाम    से   उल्लेखित   किया गया   है   " चूँकि अरबी में    "  प   "   के लिए   कोई    अक्षर     नहीं  इसलिए   " कपिल " के  लिए  " कफिल लिखा   और बोला    जाता    है , इसके  लिए कुरान   से  दो साबुत   दिए जा  रहे  हैं 

1-पहला  सबूत 


"और इस्माइल और इदरीस और   जुलकफिल   पर  भी  हमारी कृपा  रही , यह सब   सब्र करने वाले  थे , और इन्हें हमने  अपनी दयालुता में दाखिल किया  बेशक यह  लोग भले  लोगों  में  थे  " सूरा  अम्बिया   21:85 


"وَإِسْمَاعِيلَ وَإِدْرِيسَ وَذَا الْكِفْلِ كُلٌّ مِنَ الصَّابِرِينَ  "


And (remember) Isma'il, Idris, and Zul-kifl, all (men) of constancy and patience.
We admitted them to Our mercy: for they were of the righteous ones.

sura  alAmbiya 21:85-


2-दूसरा  सबूत 


"और इस्माइल और  अलीसा और ज़ुलकफिल    को  याद करो  यह सब नेक लोगों  में  हैं  " सूरा  साद 38:48


"وَاذْكُرْ إِسْمَاعِيلَ وَالْيَسَعَ وَذَا الْكِفْلِ وَكُلٌّ مِنَ الْأَخْيَارِ  "

And commemorate Isma'il, Elisha and Zul-Kifl: Each of them was of the Company of the Good.

 Qur'an, sura sad  38 :48

3-कुरान  में बुद्ध   की  शिक्षा  का  प्रभाव  
चूँकि  भगवान   बुद्ध   ने वेदों  का  अध्यन  किया  था  ,इसलिए  उनकी  शिक्षा  के मूल   सिद्धांत   सार्वभौमिक  . और     सर्वग्राही थे  , जिसका परिणाम  यह हुआ कि  बुद्ध   के  निर्वाण के बाद    उनकी  शिक्षा  अफगानिस्तान  से होकर  इराक और    तुर्की तक पहुंच गयी  ,  और जब इस्लाम   पैदा  हुआ तो  कुरान  में भी बुद्ध  की   शिक्षा  का  स्पष्ट   प्रमाण  मिलता   है 

भगवान  बुद्ध    की   शिक्षा  में  " पञ्च शील    "   सबसे  महत्त्व पूर्ण   है      , यह पांच  प्रतिज्ञाएं   है    जिनका   पालन  हरेक   बौद्ध  के लिए  अनिवार्य    है    ,  और  इन्ही    को कुरान में   शामिल   कर   लिया   गया   है  ,इसके  लिए   पहले मूल पाली , हिंदी  अर्थ  और    कुरान की अरबी आयात के  हिंदी  अंगरेजी  अनुवाद    दे  रहे हैं 

 पञ्च शील    

1-पाणाति पाता वेरमणि सिक्खा पदम् समादियामि 

अर्थ  - मैं  किसी भी प्राणी  को नहीं  मरने की प्रतिज्ञा  करता हूँ 
किसी  भी  प्राणी  की  जान  मत  लो  ,अल्लाह ने  जान   को पवित्र  बनाया  है "

" وَلَا تَقْتُلُوا النَّفْسَ الَّتِي حَرَّمَ اللَّهُ إِلَّا بِالْحَقِّ ذَٰلِكُمْ وَصَّاكُمْ بِهِ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ  "

सूरा -अनआम 6:151 

and do not take any  being's life , which God has declared to be sacred  "
 
नोट- कुरान  की इस आयत  में हरेक जीवधारी  के  लिए अरबी  में " अल नफ्स - النَّفْسَ " शब्द  का प्रयोग  किया  है , जिसका अर्थ " प्राण (life)"   होता  है .

2--आदिन्न  दाना  वेरमणि सिक्खापदम्  समादियामी    

अर्थ  -  मैं  किसी के दिए बिना उसकी वास्तु  नहीं लेने की प्रतिज्ञा  करता  हूँ 
"وَلَا تَأْكُلُوا أَمْوَالَكُمْ بَيْنَكُمْ بِالْبَاطِلِ "
अवैध  रूप से किसी  का  मॉल नहीं   हड़पो
and  DEVOUR NOT one another's possessions wrongfully, सूरा   बकरा 2:188

3-कामेसु मिक्खाचारा वेरमणि सिक्खा पदम् समादियामि 

मैं  मिथ्याचार  ( व्यभिचार  ) से दूर रहने की प्रतिज्ञा   करता  हूँ 

"وَلَا تَقْرَبُوا الزِّنَا إِنَّهُ كَانَ فَاحِشَةً وَسَاءَ سَبِيلًا  "
And do not commit adultery – for, behold, it is an abomination and an evil way. (17:32
व्यभिचार   और अश्लील कर्मों   से  दूर  रहो "  सूरा -बनी इस्राइल 17:32

4-मुसावादा  वेरमणि सिक्खापदम्  समादियामी 

अर्थ  - मैं  झूठ नहीं  बोलने की प्रतिज्ञा  करता हूँ
"और  झूठी  बातों  से बचो   "सूरा -हज्ज -22:30 

"وَاجْتَنِبُوا قَوْلَ الزُّورِ  "
nd shun every word that is untrue,

5-सूरा मज्झा मेर्या पमादट्ठानं वेरमणि सिक्खापदम समादियामि 

अर्थ  - मैं शराब  और  प्रमादिक  खेल जुआ  से   दूर रहने की प्रतिज्ञा करता हूँ

"وَالْأَزْلَامُ رِجْسٌ مِنْ عَمَلِ الشَّيْطَانِ فَاجْتَنِبُوهُ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ"
 have attained to faith! Intoxicants, and games of chance" सूरा -मायदा 5:90

इन  प्रमाणों   से सिद्ध होता है कि भगवान्   बुध  भी   एक रसूल   यानी धर्म  का सही  ज्ञान  देने वाले    थे  ,  और उनकी  शिक्षा   को कुरान में    शामिल  कर  लिया  गया  , इसलिए मुसलमानों  को चाहिए कि वह  कुरान में दी  गयी  भगवन  बुद्ध की शिक्षा   का  पालन  करें 

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सोमवार, 15 जुलाई 2019

पुनर्जन्म की इस्लामी व्याख्या !

विश्व के सभी धर्मों के मानने वाले इस निर्विवाद सत्य को स्वीकार करते हैं , कि कोई भी व्यक्ति अमर नहीं हो सकता .और उसे एक न एक दिन मौत जरुर आयेगी .लेकिन उसकी आत्मा, रूह , Soul कभी नहीं मरती है .और मनुष्य अपने जीवनकाल में जो भी भले बुरे कर्म करता है .उसका फल अगर उस व्यक्ति को इसी जन्म में नहीं मिलता है , तो मौत के बाद उसकी आत्मा को अगले जन्म में भुगतना पड़ता है .भारतीय धर्मों में इस नियम को "पुनर्जन्म " का सिद्धांत कहा जाता है .यद्यपि कुरान , हदीस और मसनवी में पुनर्जन्म के बारे में उल्लेख मिलता है .लेकिन मुस्लिम विद्वान् इसे घुमा फिरा कर ,और कुतर्क पूर्ण व्याख्याएं करके स्वीकार करते हैं . क्योंकि सभी जानते हैं ,कि मुसलमानों की नीति हिन्दुओं से उलटे चलने की होती है . यदि हिन्दू दिन कहेगा तो ,मुसलमान रात कहेंगे .
यद्यपि आत्मा की अमरता ,और उसके दोबारा जन्म होने को एक वैज्ञानिक सत्य मान लिया गया है .फिर भी मुसलमान पुनर्जन्म को क्यों नहीं मानते ,इसका कारण ,या किस रूप में मानते हैं ,इसलिए आत्मा के दोबारा शरीर धारण करने ( पुनर्जन्म ) के बारे में इस्लामी मान्यताओं का परमानों के सहित विवेचन किया जा रहा है .ताकि लोगों को पता चले की मुसलमानों की मान्यताओं ,और कुरान ,हदीस और मसनवी की बातों में कितना अंतर है .
1-मुसलमानों का ज्ञान अधूरा है 
इतिहास गवाह है कि मुसलमान (अरबी )जन्मजात लुटेरे , अत्याचारी , और स्वभाव से अपराधी रहे हैं ,उन्हें जिहाद छोड़ कर आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए समय ही नहीं मिलता है .इसीलिए अल्लाह ने उनको आत्मा के बारे में थोडा ही ज्ञान ( एक वाक्य ) दिया है
"कह दो कि रूह तो अल्लाह का हुक्म है ,और बस तुम्हें इसका थोडा सा ज्ञान ही दिया गया है "
सूरा -बनी इस्राएल 17 :85 
2-मृत्यु और कर्मफल अटल हैं
कुरान की इस बात से सभी सहमत होंगे कि हरेक व्यक्ति को एक दिन मरना ही पड़ेगा , लेकिन दूसरी गौर करने वाली बात यह है कि मनुष्य द्वारा किये गए ,छोटे छोटे भले बुरे सभी कर्मों की परीक्षा कि जाएगी .और उसका बदला दिया जायेगा .अर्थात अधिक होने पर , भले कर्मों से बुरे , या बुरे कर्मों से भले कर्म न तो घटाए जायेंगे ,और न कम किये जायेंगे .
"तुम जहाँ भी रहोगे मृत्यु तुम्हें आकर ही रहेगी , चाहे तुम किसी मजबूत बुर्ज के भीतर रहो
"सूरा -निसा 4 :78 
"हरेक जीव को म्रत्यु का स्वाद चखना ,होगा .और उसके कामों का पूरा बदला दिया जायेगा "
सूरा-आले इमरान 3 :185
"हरेक जीव को मौत का स्वाद चखना है ,और हम अच्छी बुरी सभी हालत में सबकी परीक्षा करते हैं "
सूरा-अल अम्बिया 21 :35 
"और जो कोई जर्रे के बराबर भी भलाई करेगा ,वह उसे देख लेगा .और जो जरे बराबर भी बुराई करेगा वह उसे भी देख लेगा "
सूरा -जिल्जाल 99 :7 और 8 
3-पुनर्जन्म के विविध नाम 
इस बात को सभी धर्म के लोग स्वीकार करते हैं कि मनुष्य द्वारा किसे गए सभी भले बुरे कर्मों का फल उसे जरुर दिया जायेगा .और अधिक होने पर भले कर्मों से बुरे , या बुरे कर्मों से भले कर्म न तो घटाए जायेंगे और न कम किये जायेंगे .लेकिन यदि इसी जन्म में कर्मों का फल नहीं दिया जा सका तो , मृत्यु के बाद उस व्यक्ति की आत्मा को उसका बदला दिया जायेगा .चूंकि आत्मा का कोई शरीर नहीं होता है , इसलिए उसे कर्मों का बदला देने के लिए दोबारा शरीर दिया जायेगा .भारत में इसी को पुनर्जन्म कहा जाता है .अरबी भाषा में पुनर्जन्म के लिए कोई एक उपयुक्त शब्द नहीं है .इसलिए कुरान में जगह जगह , विभिन्न शब्द ,प्रयुक्त किये गए हैं .लेकिन सभी शब्दों का वही अर्थ और आशय पुनर्जन्म ही है .इनमे से कुछ शब्द यहाँ दिए जा रहे हैं .
 1-इहया -إحياءइसका अर्थ पुनर्जन्म ही होता है .अरबी शब्दकोश में इसका अर्थ "विलादातुल जदीद-ولادة جديدة "यानि फिर से जन्म लेना या फिर से पैदा होना होता है .कुरान में यह शब्द पांच बार आया है .(2:154, 7:169, 16:21, 35:22 ,77:26 )अंगरेजी में इसका अर्थ Reborn या Rebirth होता है .
2-युईदहु -يُعيدُهُ  यह शब्द कुरान में 1573बार आया है , इसका अर्थ लौटाना( return ) करना या वापिस करना है .कुरान में जिसी भी प्रसंग में आत्मा को शरीर में लौटाने जमीन पर वापिस भेजने की बात कही गयी है .इसी शब्द का प्रयोग किया गया है .हिन्दी में इसे पुनर्जीवन कह सकते हैं ..यह शब्द अरबी के " ऊदाह -عودة " शब्द से बना है
3-युब्दियु -يُبدئُ "यह शब्द कुरान में 388 बार आया है .इसका अर्थ पुनः प्रारम्भ (Reoriginate ) है कुरान के जिस प्रसंग में आत्मा को किसी शरीर में दोबारा भेजने की बात कही गयी है ,इस शब्द का इस्तेमाल हुआ है
4-बईद-يعيد. "यह शब्द कुरान में 233 बार आया है .इसका भी अर्थ वापिस लौटाना (Back ) करना है जब भी आत्मा के किसी शरीर में वापिस लौटाने का प्रसंग आया है ,यही शब्द प्रयोग किया गया है .
इसके अलावा जहाँ भी कुरान में अल्लाह के द्वारा सृष्टि बनाकर मनुष्यों के शरीरों में आत्मा डालने की बात कही हैं , इन्हीं में से किसी शब्द का प्रयोग हुआ है .चाहे मृतक शरीर में आत्मा डालना हो , या नया शरीर बना कर उसे सजीव करने की बात हो ,इसी को पुनरुत्थान , पुनर्जीवन , या पुनर्जन्म कह सकते हैं
4-कुरान में पुनर्जन्म के प्रमाण 
कुरान में आत्मा के फिर से जन्म लेने और प्रथ्वी पर लौट आने के लिए कई शब्द प्रयोग किये गए हैं ,जैसे कि-
A-पुनरागमन ( नुईद )
"इसी धरती पर हमने तुम्हें पैदा किया है ,और इसी पर हम तुम्हें लौटायेंगे .और इसी पर दोबारा निकालेंगे "
सूरा -ताहा 20 :55 
(इस आयत में अरबी शब्द" नुईदنُعي-د "प्रयुक्त किया गया है जिसका मतलब Bring forth है )
"अल्लाह ने तुम्हें इस धरती पर विशेष रूप से विकसित किया है ,और तुम्हें इसी भूमि पर लौटा देगा ,और विशेष रूप से निकलेगा "
सूरा -नूह 71 :17 और 18
(नोट -इस आयत में अरबी शब्द 'नुईद نُعيد" मौजूद है ,लेकिन हिंदी अनुवाद में पुनरागमन की जगह "निकलेगा "शब्द दिया है )
B-दोबारा पैदा होना 
"और वे बोले हे हमारे रब , तू हमें दोबार मौत दे चूका है ,और तूने मुझे दोबार पैदा कर कर दिया है .हमने अपने गुनाह कबूल कर लिए हैं .अब इस ( जन्म मृत्यु )से निकालने का कोई रास्ता है "सूरा अल मोमिन 40 :11
" قَالُوا رَبَّنَا أَمَتَّنَا اثْنَتَيْنِ وَأَحْيَيْتَنَا اثْنَتَيْنِ "40:11
लोगों के इस सवाल का जवाब कुरान की इस आयत में यह मिलता है "
"ऐसी चीज के लिए तो कर्म करने वालों को कर्म करते रहना चाहिए "सूरा -अस साफ्फात 37 :61
C-पुनर्जीवित होना 
"क्या तुमने नहीं देखा कि जो लोग मौत के डर से घरों से निकल गए थे , अल्लाह ने उनसे कहा ,जाओ मर जाओ .फिर बाद में अल्लाह ने उन्हें फिर से जीवित कर दिया "सूरा -बकरा 2 :243
( नोट -इस आयत में अरबी में "अहया हुम ثُم احياهُم" शब्द आया है .इसका अर्थ "brought them back to life " या "पुनर्जीवित "करना है )
D-पुनरागमन 
"इन मे से जब किसी कि मौत आजायेगी तो वह कहेगा ,,रब मुझे संसार में लौटा दो "ताकि मैं जिस संसार को छोड़ आया हूँ उसमे अच्छे काम करूँ .यह तो एक सचाई है कि उनके पीछे बरजख ( पर्दा ) है .उनके फिर से जीवित करके उठाये जाने वाले दिन तक .
सूरा अल मोमिनून 23 :99 -100 
(नोट -इन आयत में अरबी में लौटने के लिए "अर्जिऊन ارجعون" send back और "युब्सिऊन يُبثعون" raised या उठाना शब्द है . इसका तात्पर्य पुनर्जन्म नहीं है .परन्तु बताया है कि निर्धारित समय यानि बरजख का पर्दा हट जाने के बाद पुनर्जीवन मिल सकता है .)भारतीय मान्यता के अनुसार जब किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है , तो एक निश्चित समय के बाद आत्मा का पुनर्जन्म हो जाता है .इस समय को "संचित काल " कहते हैं .और कुरान में इसी को "बरजख " कहा गया है .एक चर्चा के दौरान जकारिया नायक ने यह बात मानी है .देखें .विडियो
Staying in Heaven or Hell Forever : Dr Zakir Naik
http://www.youtube.com/watch?v=L5HNJKrZbZs
E-जीवन की पुनरावृत्ति 
"जब तुम निर्जीव थे तो उसने तुम्हें जीवित किया . फिर वाही तुम्हें मारता है.फिर वही तुम्हें फिर से जीवित करता है और फिर उसी की तरफ लौटाए जाओगे "
सूरा -बकरा 2 :28
"अल्लाह का वादा सच्चा है ,वही पहली बार पैदा करता और वही दोबारा पैदा करेगा "
सूरा-यूनुस 10 :4 
(नोट -इस आयत में भी " सुम्म उयीदहू ثُمّ يُعيدهُ"शब्द है .जिसका अर्थ दुबारा जन्म देना है give  rebirth )
"क्या इन लोगों ने नहीं देखा कि अल्लाह पहली बार जन्म कैसे देता है ,और फिर उसकी पुनरावृत्ति कैसे करता है .निश्चय ही ऐसी पुनरावृत्ति अल्लाह के लिए आसान है "सूरा -अनकबूत 29 :19 
(नोट -इस आयत में भी " सुम्म उयीदहूثُمّ يُعيدهُ "शब्द है .जिसका अर्थ दुबारा जन्म देना है )
"निश्चय ही वह अल्लाह उसकी जान लौटने की शक्ति रखता है "सूरा -अत तारिक 86 :8 
(lo He verily is able to  return  hin  into  life again )
"जिस तरह उसने पहली बार पैदा किया था ,उसी तरह तुम फिर से पैदा होगे "
सूरा -अल आराफ 7 :29 
(नोट -यहाँ अरबी शब्द "तूऊ दूनتعودون  " आया है जिसका अर्थ भी Reborn या पुनर्जन्म होता है )
5-मानवेतर योनियों में जन्म 
भारतीय धर्मों में माना जाता है कि बुरे और पाप कर्मों के फल भोगने के लिए आत्मा को मनुष्य के आलावा दूसरी ऎसी योनियों में भी जन्म मिल सकता है .जिसका रूप और आकार सबसे अलग और अजीब हो .या शरीर में कोई खोट हो .जैसा कि इन आयतों में कहा है ,
"हमने तुम्हारे बीच में मृत्यु का नियम बना दिया है ,और  हमारे  लिए यह असंभव नहीं ,कि हम तुम्हारे शरीर आकार बदल दें .और ऐसे रूप में उठाकर खड़ा कर दें ,जिसे तुम जानते भी नहीं हो "
सूरा -अल वाकिया :56 :60 और 61 
"हमीं ने इनको पैदा किया ,और इनके जोड़ बंद ( अवयव )मजबूत किये .और हम जब चाहें यह जैसे हैं ,उसे बिलकुल बदल दें
"सूरा - अद दहर 76 :28 
6-जन्म मृत्यु का चक्र 
आत्मा को सभी धर्मों ने अमर माना गया है ,और आत्मा को अपने कर्मों का फल भोगने के लिए बार बार जन्म लेना पड़ता है ,यही कुरान का आशय भी है .जैसा इस आयात से स्पष्ट होता है ,
"जिस तरह उसने पहली बार पैदा किया था ,उसी तरह तुम फिर से पैदा होगे "
सूरा -अल आराफ 7 :29 
(नोट -यहाँ अरबी शब्द "तूऊ दूनتعودون  " आया है जिसका अर्थ भी Reborn या पुनर्जन्म होता है )
7-रसूल पुनर्जन्म मानते थे 
जिस तरह भगवान कृष्ण ने अर्जुन को आत्मा की अमरता ,और युद्ध में शहीद हो जाने पर नया जन्म मिल जाने का विश्वास दिलाया था ,उसी तरह रसूल ने भी कहा था कि यदि में शहीद हो गया तो अल्लाह मुझे भी फिर से जन्म देगा ,और जीतनी बार भी मैं मरूँगा ,हर बार पैदा हो जाऊंगा .यही बात इस हदीस से सिद्ध होती है ,
"अनस बिन मालिक ने कहा कि रसूल ने कहा ,कि कोई व्यक्ति मरने बाद इस दुनियां में तब तक वापिस नहीं आ सकता है ,जब तक वह अल्लाह की राह में मरने वाले शहीदों में वरिष्ठता प्राप्त नहीं करता " बुखारी -जिल्द 4 किताब 52 हदीस 53 
" रसूल ने कहा कि इमांन वालों का मेरा साथ छोड़ना ठीक नहीं होगा ,क्योंकि मैं अपनी सेना के साथ अल्लाह कि राह में शहीद होना चाहता हूँ .और अगर में शहीद हो गया तो अल्लाह मुझे दोबारा जीवन दे देगा . और अगर फिर शहीद हो गया तो अल्लाह मुझे फिर जीवन प्रदान कर देगा ."बुखारी -जिल्द 4 किताब 52 हदीस 54
8-ईसाइयों का भूतवाद
मुहम्मद साहिब के समय लोगो पर ईसाई धर्म का प्रभाव था ,ईसाई भूत प्रेतों कर विश्वास करते थे.और मानते थे एक व्यक्ति में हजारों दुष्ट आत्माएं घुस कर रह सकती है , जैसा की बाइबिल में लिखा है
"जब कोई अशुद्ध आत्मा किसी के शरीर से निकलती है ,तो वह चक्कर लगाती रहती है .और अपने साथ सात दुष्ट आत्माओं को लेकर किसी के शरीर में निवास करने लगतीहै
" बाइबिल नया नियम -मत्ती 12 :42 से 45 
"जब यीशु गरेसिया प्रान्त गए तो ,वहां एक ऐसा व्यक्ति मिला जो दुष्ट आत्माओं के वश में था .यीशु के पूछने पर उसने अपना नाम सेना (Legion ) बताया(रोमन सेना में 6000 सैनिकों की एक लीजन legion होती थी ).उसने यीशु से कहा पहाड़ी पर सूअर चर रहे हैं ,आप हमें इनमे भेज दो .ताकि हम इनके शरीर में घुस जाएँ .उसमे करीब दो हजार आत्माएं उस व्यक्ति के शरीर में थीं " बाईबिल नया नियम -मरकुस 5 : 1 से 14 
वास्तव में इस्लाम ने इन्हीं विचारों का विरोध किया है,किसी जीवित व्यक्ति की आत्मा द्वारा उस व्यक्ति के शरीर से बाहर निकल कर पवास करना या किसी दुसरे जीवित व्यक्ति के शरीर में निवास करने को "आत्मा स्थानान्तरण Transmigration of souls  " कहा जाता है . और ऐसा मानना इस्लाम में कुफ्र है .क्योंकि यह एक प्रकार का अवतारवाद है , जिसका खुद वेदों में खंडन किया गया है .
"इब्न हज्म (Arabic: أبو محمد علي بن احمد بن سعيد بن حزم‎)ने अपनी किताब "अल मोहल्ला में कहा कि जो भी व्यक्ति दावा करता है कि आत्मा एक शरीर से दुसरे में स्थान परिवर्तन करती ,तो वह इमान वाला नहीं है "
 "وقال اياد: "من كان يؤمن القاضي في التهجير من النفوس هو كافر"

Qadi 'Iyad said: 'Whoever believes in the transmigration of the souls is a disbeliever"

al-Muhalla al-Dirdeer al-Maliki

9-पुनर्जन्म के समर्थक मौलाना रूम 
मौलाना जलालुद्दीन रूमी ( सन 1207 -1273 ) बल्ख नाम के शहर में पैदा हुए थे .और एक महान सूफी संत और इस्लामी विद्वान् थे , इन्होने जो किताब लिखी है ,उसका नाम " मसनवी मौलाना रूम ' कहा जाता .मसनवी को फारसी का कुरान भी कहा जाता है , इसके बारे में लोग कहते हैं "ईं कुराने पाक हस्त दर जुबाने फारसी "रूमी भारतीय अध्यात्म से काफी प्रभावित थे .और आत्मा की अनित्यता और उसके बार बार जन्म होने पर विश्वास रखते थे .यह मसनवी के इन शरों से सिद्ध होता है ,

"تو از آں روز کہ در ہست آمدی 
   तू अजां रोजे कि दर हस्त आमदी 
آتش  آب  و خاک و  بادِ بدی
आतिश आब ओ ख़ाक ओ बादे बदी
ایں  بقاہا  از فناہا  دیدءی
ईं बकाहा अज फनाहा दीदई 
بر فناءِجسم چون چستیدءی
बर फनाये जिस्म चुन चस्पीदई 
ہم چون سبزه بارہا روءیدان
हम चूँ सब्जहा बारहा    रोईदअम 
ہفت صد ہفتاد قالب دیدام
हफ्त सद हफ्ताद कालिब दीदअम 
"आज जो तेरा अस्तित्व है ,वह अग्नि , जल, पृथ्वी और वायु से निर्मित है .तुझे यह शरीर किसी शरीर के मिटने के बाद ही मिला है . इसलिए इस शरीर के नष्ट होने से क्यों डरता है .मैं तो एक पोधे की तरह इतनी बार पैदा हुआ हूँ कि मैंने सात सौ सत्तर जन्म ले लिए हैं ."
मसनवी रूम -भाग 4 पेज 214 
 10-इस्लाम से सावधान 
इतना समझने के बाद आसानी से यही निष्कर्ष निकालता है , कि इस्लाम धर्म नहीं बल्कि परस्पर विरोधी विचारों का भण्डार है , क्योंकि एकतरफ अल्लाह ,कुरआन , रसूल ,और रूमी जैसे सूफी ,पुनर्जन्म को .सही मानते हैं .तो दूसरी तरफ विदेशों के हाथो बिके हुए मुस्लिम ब्लोगर ,लोगों से यह कह रहे हैं कि अगर तुम सिर्फ खतना करो , कलाम पढो तो अनंत कल तक जन्नत में हूरों के साथ अय्याशी करने को मिलेगा .कोई इन मक्कार मुस्लिम ब्लोगरों से पूछे कि ,जन्नत तो क़यामत के बाद ही मिलेगी .और इसमे अभी करोड़ों साल हैं , तब तक इनका अल्लाह क्या कर रहा है .जन्नत की जवान हूरें बिना मर्दों के अपनी वासना कैसे मिटा रही हैं ? और जब असंख्य मुसलमान उन हूरों से साथ सहवास करेगे तो उनका क्या हाल होगा ?( अभी पता चला है कि अरब की सरकार ने हूरों के लिए Vibrator भिजवाये हैं ) ताकि जब तक मुसलमान जन्नत नहीं आते तुम इसी से काम चलाओ
यह जन्नत , हूरें , सब केवल कल्पित हैं , सभी मुस्लिम ब्लोगर जो कह रहे हैं ,इस्लाम स्वीकार करने वालों को जानत मिलेगी , सब झूठे ,मक्कार और विदेशी शक्तियों के दलाल हैं .इनके साथ जो मुस्लिम लड़कियाँ हैं ,वह भी हिन्दुओं पर डोरे डाल रहीं हैं .
बस एक ही बात अटल सत्य है कि भले कर्मों का हमेशा अच्छा ही फल मिलता है .
 अतः अल्ला का पल्ला छोडो !

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शनिवार, 13 जुलाई 2019

नास्तिक कैसे होते हैं ?

सामान्यतः जो व्यक्ति ईश्वर , परलोक ,और कर्म फल के नियम पर विश्वास नहीं करता उसे नास्तिक कहा जाता .चूँकि बौद्ध और जैन ईश्वर को नहीं मानते इसलिए अज्ञानवश हिन्दू उनको नास्तिक कह देते हैं .यद्यपि बौद्ध और जैन कर्म के सिद्धांत को मानते हैं .और पाप पुण्य पर विश्वास करते हैं .लेकिन जो लोग निरंकुश होकर सिर्फ भौतिकतावाद और अपना सुख और स्वार्थ साधने में लगे रहते हैं , वास्तव में वही नास्तिक होते हैं .ऐसे लोगों मान्यता एक प्रसिद्द कहावत से समझी जा सकती है ,
" लूटो खाओ मस्ती में , आग लगे बस्ती में "
ऐसे लोग सभी मर्यादाएं , परंपरा ,नियम और लोक लज्जा की परवाह नहीं करते .भले देश और समाज बर्बाद हो जाये .भगवान बुद्ध और महावीर के समय ऐसे ही विचार रखने वाला एक व्यक्ति चार्वाक था , जिसके लाखों अनुयायी हो गए थे , उसके विचारों को ही चार्वाक दर्शन कहा जाता है .
1-चार्वाक दर्शन
चार्वाक दर्शन एक भौतिकवादी नास्तिक दर्शन है। यह मात्र प्रत्यक्ष प्रमाण को मानता है तथा पारलौकिक सत्ताओं को यह सिद्धांत स्वीकार नहीं करता है। यह दर्शन वेदबाह्य भी कहा जाता है।
वेदवाह्य दर्शन छ: हैं- 

 चार्वाक, माध्यमिक, योगाचार, सौत्रान्तिक, वैभाषिक, और आर्हत। इन सभी में वेद से असम्मत सिद्धान्तों का प्रतिपादन है।
चार्वाक प्राचीन भारत के एक अनीश्वरवादी और नास्तिक तार्किक थे। ये नास्तिक मत के प्रवर्तक वृहस्पति के शिष्य माने जाते हैं। बृहस्पति और चार्वाक कब हुए इसका कुछ भी पता नहीं है। बृहस्पति को चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र ग्रन्थ में अर्थशास्त्र में भी उल्लेख किया है ."सर्वदर्शनसंग्रह "में चार्वाक का मत दिया हुआ मिलता है  पद्मपुराण में लिखा है कि असुरों को बहकाने के लिये बृहस्पति ने वेदविरुद्ध मत प्रकट किया था
2-भोगवाद ही नास्तिकता है 
भोगवाद ,चरम स्वार्थपरायण मानसिकता और अय्याशी ही नास्तिक होने की निशानी है , चाहे ऐसे व्यक्ति किसी भी धर्म से सम्बंधित हों .चार्वाक की उस समय कही गयी बातें आजकल के लोगों पर सटीक बैठती हैं ,चार्वाक ने कहा था ,
न स्वर्गो नापवर्गो वा नैवात्मा पार्लौकिकः 
नैव वर्नाश्रमादीनाम क्रियश्चफल्देयिका .
अर्थ -न कोई स्वर्ग है ,न उस् जैसा लोक है .और न आत्मा ही पारलौकिक वस्तु है .और अपने किये गए सभी भले बुरे कर्मों का भी कोई फल नहीं मिलता अर्थात सभी बेकार हो जाते हैं .
यावत् जीवेत सुखं जीवेत ऋणं कृत्वा घृतं पीबेत 
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः .
अर्थात-जब तक जियो मौज से जियो और कर्ज लेकर घी पियो मतलब मौज मस्ती करो
कैसी चिंता, शरीर के भस्म हो जाने के बाद फिर वह वापस थोड़े ही आती है।
"पीत्वा पीत्वा पुनः पीत्वा यावतपतति भूतले , पुनरुथ्याय वै पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते .
अर्थ -पियो ,पियो खूब शराब पियो ,यहाँ तक कि लुढ़क कर जमीन पर गिर जाओ . और होश में आकर फिर से पियों .क्योंकि फिरसे जन्म नही होने वाला .
वेद शाश्त्र पुराणानि सामान्य गाणिका इव, मातृयोनि परित्यज विहरेत सर्व योनिषु .
अर्थ -वेद , और सभी शास्त्र और पुराण तो वेश्या की तरह हैं .तुम सिर्फ अपनी माँ को छोड़कर सभी के साथ सहवास कर सकते हो .
3-यूनानी नास्तिक 
भारत की तरह यूनान (Greece ) भी एक प्राचीन देश है ,और वहां की संस्कृति भी काफी समृद्ध थी .वहां भी नास्तिक लोगों का एक बहुत बड़ा समुदाय था .जिसे एपिक्युरियनिस्म (Epicureanism)कहा जाता है .जिसे ईसा पूर्व 307 में एपिक्युरस (Epicurus)नामके एक व्यक्ति ने स्थापित किया था .ग्रीक भाषा में ऐसे विचार को "एटारेक्सिया (Ataraxia Aταραξία )भी कहा जाता है .इसका अर्थ उन्माद , मस्ती ,मुक्त होता है .इस दर्शन (Philosophy ) का उद्देश्य मनुष्य को हर प्रकार के नियमों , मर्यादाओं .और सामाजिक . कानूनी बंधनों से मुक्त कराना था .ऐसे लोग उन सभी रिश्ते की महिलाओं से सहवास करते थे . जिनसे शारीरिक सम्बन्ध बनाना पाप और अपराध समझा जाता था .
ऐसे लोग जीवन को क्षणभंगुर मानते थे .और मानते थे कि जब तक दम में दम है हर प्रकार का सुख भोगते रहो .क्योंकि फिर मौका नहीं मिलेगा .जब इन लोगों को स्वादिष्ट भोजन मिल जाता था तो यह लोग इतना खा लेते थे कि इनके पेट में साँस लेने की जगह भी नहीं रहती थी . तब यह लोग उलटी करके पेट खाली कर लेते थे .स्वाद लेने के लिए फिर से खाने लगते थे .
4-असली नास्तिक सेकुलर
सेकुलर प्राणियों की एक ऐसी प्रजाति है ,अनेकों प्राणियों गुण पाए जाते हैं .गिरगिट की तरह रंग बदलना , लोमड़ी की तरह मक्कारी ,कुत्तों की तरह अपने ही लोगों पर भोंकना ,अजगर की तरह दूसरों का माल हड़प कर लेना .और सांप की तरह धोके से डस लेना .इसलिए ऐसे प्राणी को मनुष्य समझना बड़ी भारी भूल होगी . ऐसे लोग पाखंड और ढोंग के साक्षात अवतार होते हैं .दिखावे के लिए ऐसे लोग सभी धर्मों को मानने का नाटक करते हैं, लेकिन वास्तव में इनको धर्म या ईश्वर से कोई मतलब नहीं होता . अपने स्वार्थ के लिए यह लोग ईश्वर को भी बेच सकते हैं .ना यह किसी को अपना सगा मानते है .और न कोई बुद्धिमान इनको अपना सगा मानने की भूल करे .
वास्तव में आजकल के सेकुलर ही नास्तिक हैं .बौद्ध और जैन नहीं .मुलायम सिंह , लालू प्रसाद ,दिग्विजय सिंह ,और अधिकांश कांगरेसी सेकुलर- नास्तिक है .

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