रविवार, 28 जुलाई 2019

सूरे फातिहा में रद्दोबदल हुआ है !!

1-भूमिका 
यह लेख   25 जुलाई  2010 को उस समय तैयार किया गया था  ,जब  फेसबुक  का  नाम  भी नहीं  था  , और उन दिनों लखनऊ  में मुस्लिम ब्लोगर्स एसोसिएशन  नाम  का एक गिरोह था जोअपने ब्लॉगों  के   हिन्दुओं  जैसे नाम रख  कर  हिंदुओं  को गुमराह कर   रहा थे    इनकेकुछ  नाम   ऐसे थे  जैसे प्रेम सन्देश  ,मधुर वाणी ,  इस्लाम  धर्म  , सनातन  इस्लाम  इत्यादि  ,  इनका सरगना  "उमर कैरानवी  , जीशान  जैदी  आदि  थे   इनका  मुंह  बंद    करना  जरूरी   था   इसलिए   हमने अकेले  ही  सामना    शुरू   कर   दिया  ,  इन  लोगों   ने दवा  किया  था कि न   तो कुरान  में कोई परिवर्तन  हुआ  है  और  न   कोई  कर  सका   है इसलिए  हमने  यह  लेख  पोस्ट  िया  था  चूँकि   सुरा  फातिहा  सबसे  मुख्य  है  , इसलिए हमने उसी  को निशाना  बनाया  था ,चूँकि  समय बहुत  काम  था इसलिए  हमने  एक उर्दू   की इस्लामी  साईट  का  साबुत  लिया  था  ,  क्योंकि यह गिरोह   उर्दू  जानते थे  हमने उर्दू को हिंदी लिपि में  कर  दिया  था ताकि  सब   समझ सकें 

कैरानावी मुस्लिम ब्लोगर गैंग का सरगना है.इसका काम हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन करवाना है.इसने एक बहुरूपिये की तरह कई नामों से फर्जी ब्लॉग बना रखे है ,जैसे इम्पेक्ट .सत्यागौतम और नवलकिशोर आदि .इसे अचानक एक ऎसी बीमारी लग्गयी कि यह खुद को इस्लाम का झंडा बरदार समझाने लगा है .और समझता है बाक़ी के सारे लोग मूर्ख हैं ,और वही इस्लाम का एकमात्र विद्वान् है.इसलिए कैरानावी इब्लीस की तरह किसी भी ब्लॉग में प्रकट हो जाता है ,और अपने गिनेचुने मुद्दों क लेकर किसी को भी चेलेंज करता रहता है .इसके पीछे इसके आका हैं ,जो देश के बाहर से इसको निर्देश देते रहते हैं .एक दो दिनों से मैं देख रहा हूँ कि कैरानावी चेलेंज के साथ साथ गालियाँ भी देने लगा है.इसलिए मैंने निर्णय लिया कि अगर इस पाखंडी को मुंहतोड़ जवाब नहीं दिया गया तो यह उर भी उद्दंड हो जाएगा ,औरयह समझाने लगेगा कि कोई इसका जवाब देने वाला नहीं है.और यह जो बकवास करता है वह सच है .लेकिन मैं ऐसा नहीं होने दूँगा .

कल इसने फिर वही चेलेंज दिया कि कुरआन में कोई रद्दोबदल नहीं .

मैंआप लोगों के सामने शिया लोगों की अधिकृत वेबसाईट से हवाला दे रहा हूँ कि केवल कुरआन में नही ,बल्कि कुरआन कि सबसे प्रमुख सूरा फातेहा में तहरीफ़ की गयी है .अरबी में तहरीफ़ का अर्थ रद्दोबदल होना है.इस साईट के "कुरआन "शीर्षक में "तहरीफ़ और तरतीब "के अंतर्गत कुरआन में की गयी "तहरीफ़ "के बारे में विस्तार से लिखा गया है.लेख काफी लंबा होने के कारण मैं केवल ख़ास ख़ास नुक्ते दे रहा हूँ .भाषा की लिपि हिन्दी है जिसमे उर्दू शब्द भी हैं.जिसे आप सब लोग आसानी से समझ लेंगें .जिसे शक हो वह खुद इस साईट को खोल कर देख ले .

http://www.quran.al-shia.org/urd/others/tehreef-wa-tarteebe-quran.htm


1-मअना ए तहरीफ़ :-
यानी किसी कल्मे को उस की हालत पर बाक़ी रख़ कर उस के मअना में तब्दीली पैदा कर देना

दूसरा सब से बड़ा अहम सबूत यह है कि अगर आयाते क़ुरआनी में मअना की तब्दीली न तो आज के मानने वालों में इतने फ़िर्क़े न होते। उम्मते इस्लामिया में 73 फ़िर्क़ों का वुजूद और सब का क़ुरआने मजीद से इस्तिदलाल इस बात का ज़िन्दा सुबूत है कि सारी उम्मत ने ख़ुदाई मअना पर ऐतेमाद (भरोसा) नहीं किया है।

2-तहरीफ़े हरकात :-
यानी ज़ेर व ज़बर वग़ैरह का फ़र्क़ इस तहरीफ़ के बारे में गुफ़्तुगू करने की ज़रूरत नहीं है इस लिये कि आज भी एक एक लफ़्ज़ में मुतअद्दिद क़राअतें पाई जाती हैं जिन में हरकात के ऐतेबार से इख़्तिलाफ़ है और यह तय है कि यह सारी क़राअतें नाज़िल नहीं हुई थीं बल्कि यह क़ारियों के ज़ाती ज़ौक़ का नतीजा थीं। तहरीफ़े हरकात का एक बड़ा सबब मुख़्तलिफ़ अक़वाम व क़बाइल की तिलावत में मुज़मर था हर क़बीले का एक लहजा था और हर क़ौम का एक उसूल क़राअत था। इसी लहजे की तब्दीली और उसूलों के तग़य्युर ने कलेमात में हरकाती इख़्तिलाफ़ पैदा कर दिया। लेकिन यह क़ुरआन का एक तक़द्दुस से कि इतने इख़्तिलाफ़ के बावजूद किसी क़बीले ने भी किसी लफ़्ज़ को बदलने की कोशिश नहीं की, बल्कि सिर्फ़ अपने लहजे से तसर्रुफ़ करते रहे जिस में वह किसी हद तक मअज़ूर भी थे।

3-सूरा फातिहा में हेराफेरी  यानि तहरीफ़े कलेमात
 :-यानी एक लफ़्ज़ की जगह दूसरे लफ़्ज़ का आ जाना। इस तहरीफ़ के बारे में उलामा ए इस्लाम में इख़्तिलाफ़ है, बअज़ हज़रात का ख़याल है कि क़ुरआने करीम में इस क़िस्म की तहरीफ़ हुई है
मसलन सूरए हम्द में (वलज़्ज़ालीन  - ولاالضالین ) की जगह (ग़ैरज़्ज़ालीन غیرالضالین  -) था जिसे सहूलत की नज़र से बदल लिया गया है

हुज्जाज बिन यूसुफ़ ने अब्दुल मलिक से यह ख़्वाहिश की कि (उलाइका मअल लज़ीना अनअमल्लाहो अलैहिम मिन्न नबीयीना वस्सिद्दिक़ीना वशशोहदा ए वस्सालेहीना-  اولئک مع الذین انعم اللہ عليہم من النبین والصدیقین والشہداء والصالحین )कि आयत ने शोहदा के साथ ख़ुलाफ़ा का इज़ाफ़ा भी कर लिया जाए ताकि इन का शुमार भी साहिबाने नेअमत में हो सके
यह ख़्वाहिश की थी कि (इन्नल्लाहस्तफ़ा आदमा व नूहन व आला इब्राहीमा व आला अम्राना अलल आलामीन  - ان اللہ اصطفى آدم ونوحاوآل ابراہیم وآل عمران على العالمین ”में आले इमरान के साथ आले मर्वान -آل مروان  " का भी इज़ाफ़ा कर दिया जाए.
 (रौज़ातुस्सफ़ा)।(روضة الصفا

ज़ाहिर है कि जो हुकूमत नस्ल और सल्तनत परस्ती उम्मत इक़तिदार की ख़्वाहिश पर हुकूमत के बाप दादा का ज़िक्र बर्दाश्त नहीं कर सकती वह यह क्यूँ कर बर्दाश्त करेगी कि “व ग़ैरज़्ज़ालीन-وغیرالضالین  ” की जगह“व लज़्ज़ालीन- لاالضالین“” आ जाये। या “होवर्राज़िक़”هوالرازق - ” की जगह “होवर्रज़्ज़ाक़-  هوالرزاق” आ जाये। या “फ़मज़ऊ इला ज़िक्रिल्लाह-فامضواالى ذکراللہ   ”के बदले “फ़समऊ इला ज़िक्रिल्लाह- فاسمعواالى ذکراللہ” रख़ दिया जाए वग़ैरह वगैरह

4- तहरीफ़े नक़्स:- यानी अल्फ़ाज़ व आयात की कमी दर हक़ीक़त तहरीफ़ के बारे में यही मसअला हर दौर में महल्ले नज़अ व इख़्तिलाफ़ रहा है, उलामा ए इस्लाम की एक जमाअत इस बात की क़ायल रही है कि क़ुरआने मजीद के आयात में कुछ नक़्स ज़रूर पैदा हुआ

5- तहरीफ़े ज़ियाद्ती:- यानी अल्फ़ाज़ व कलेमात का इज़ाफ़ा। 
ऐसा अक़ीदा रखना किसी भी मुसलमान के लिये ज़ेब नहीं देता है।

6- तहरीफ़े तरतीबी:-
यानी आयात और सूरों की तरतीब का बदल जाना तहरीफ़ की यह क़िस्म भी अगरचे उलामा ए इस्लाम ने महल्ले इख़्तिलाफ़ रही है क़ुरआने करीम की तरतीब ही तहरीफ़ शुदा है यानी तरतीबे पैग़म्बर के ख़िलाफ़ नहीं है बल्कि मंश ए पैग़म्बर के खिलाफ़ है और इस बात के साबित करने के लिये दो बातों का इसबात करना पड़ेगा पहली बात यह है कि क़ुरआने करीम हयाते पैग़म्बर में मुरत्तब शक्ल में नहीं था बल्कि बाद के अदवार में मुरत्तब हुआ
और दूसरी बात यह है कि मंश ए रिसालत यही था कि किताबे ख़ुदा को उस की तनज़ील के मुताबिक़ मुरत्तब किया जाए और उम्मत ने उस के बरख़िलाफ़ अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ मुरत्तब कर डाला।
इस तरह से इन तथ्यों से साबित होता है कि कुरआन में रद्दोबदल मुसलमानों ने मुहम्मद कीमौत के बाद किया था .इस बातपर करोड़ों लोग यकीन करते हैं.भले कैरानावी का गिरोह कुछ भी चेलेंज करता रहे .ये लोगों को धोखा नहीं दे सकते.हमें झूठा   साबित करने के इच्छुक  पहले  शिया लोगों   को झूठा साबित  करें  ,
 क्योंक  सच्चाई    सामने आही जाएगी

सूचना
यह लेख इस्लामी इतिहास  की किताब '"रौज़तुस्सफ़ा फिल सीरतुल अम्बिया वल मुलूक वल  खुलफ़ा -   روضة الصفا في سیرة الانبياء والملوك والخلفاء, "नाम की किताब  से ली  गयी है  ,लेखक का नाम "मीर खु वंद -   میرخواند‎   "  है ,इसका काल 836 ईस्वी  है .इस किताब में  7 अध्याय हैं जिनमे नबियों, खलीफाओं  और मुस्लिम  शासको   का इतिहास है  , साथ में  इसमें कुरान  के संकलन और उसमे  की  गयी  हेराफेरी का  इतिहास  भी  है
         

मैं अगली पोस्ट में साबित कर दूँगा कि
"बिस्मिल्लाह "की आयत कुरआन का हिस्सा नहीं है !

No181/118 -25/07/2010

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