शनिवार, 31 अगस्त 2019

इस्लाम सिर्फ अरबों के लिए है -सबके लिए नहीं !!

कुरान  इस्लाम का प्रमाणिक  और आधार  धर्मग्रन्थ   है  ,  जो अरबी  भाषा  में  है  , जिस से अधिकांश  मुस्लिम अनभिज्ञ  हैं  , इसलिए मुसलमानों को कुरान का  सही अर्थ और आशय समझने के लिए मुल्ले  मौलवियों का  सहारा  लेना  पड़ता  है  . यही  कारण  है कि सामान्य मुस्लिमों  की कुरान केबारे में अज्ञानता का  फायदा  उठा  कर  मौलवी  कुरान  में  जो  भी  बात बता  देते  है मुस्लिम  उसे सही  समझ  लेते  हैं  ,ऊपर से यह मौलवी कुरान को समझने   की  जगह उस पर ईमान रखने  पर  जोर  देते  है  . मौलवियों  ने  कुरान के  बहाने  लोगों में  कुछ  ऐसी  भ्रांतियां  फैला  रखी  हैं  , जो  कुरान के बिलकुल  विपरीत  हैं  ,जैसे ,

1 .कुरान सम्पूर्ण   मानव  जाति  के  लिए  है 
2. मुहम्मद  साहब गैर अरब  लोगों  के  भी रसूल   हैं   . 
3-सभी  के लिए  रसूल  और  कुरान  पर ईमान  लाना  जरूरी  है 
4-यही नहीं  मौलवी  परोक्ष   रूप में   गैर   मुस्लिमों   को यह  डर  भी  दिखाते हैं  कि  .जो भी  रसूल और  कुरान  पर ईमान  नहीं  रखेंगे  अल्लाह  उनको  विनष्ट  कर  देगा  .
 लेकिन  मुल्लों  के यह  चारों दावे  झूठे , निराधार कल्पित  और   कुरान  के बिलकुल  विपरीत  हैं  , और  इस  लेख  में क्रमशः  इन्हीं  दावों  का  भंडाफोड़  किया   जा रहा  है  , परन्तु  इसके  पहले  हमें  इस्लाम  में रसूलों के  बारे   मान्यता   और   कुछ बातें   जानना  जरुरी  है  , जैसे  क्या रसूल  किसी खास देश  और   जाती के  लिए  होता  है   . या सारी दुनिया  के लिए ? रसूल  का  कार्यक्षेत्र   कितना  बड़ा  होता  है   .इत्यादि ,

1-हरेक समुदाय और भाषाभाषी  के  लिए रसूल

कुरान  के अनुसार  हरेक समुदाय    के लिए  उसी  समुदाय  का एक रसूल  भेजा   जाता  है ,जो उस समुदाय  की भाषा  जानता  हो  ,और लोगों से उन्हीं  कि भाषा में  वार्ता कर सकता जो अल्लाह द्वारा  दीगयी किताब  की  भाषा  हो  . कुरान  की इन आयतों से यही सिद्ध होता  है  . "हमने  जो  भी रसूल भेजा  तो उस  देश  में उसी  देश की भाषा  के साथ भेजा ताकि  वह आयतें  खोल खोल कर  समझा सके "
 सूरा -इब्राहिम 14 :4 

"हरेक  समुदाय  के  लिए रसूल  होता  है  , ताकि  जब  रसूल आये तो वह उन लोगों का न्यायपूर्वक  फैसला   कर  दे , और किसीपर जुल्म  नहीं हो "
 सूरा -युनुस 10 :47 

  “And We did not send any messenger except [speaking] in the language of his people to state clearly for them"10:47

इसकी  अगली  आयात में   यह  भी  बता दिया गया कि यदि   किसी  समुदाय के लिए  ऐसा  रसूल  भेज  दिया   गया  जिसकी  भाषा  विदेशी हो , तो वह  रसूल न्याय  नहीं  कर सकेगा  .


"यदि  हम इसे आजमी ( गैर अरबी भाषा )   कुरान  रखते  तो यह  लोग  कहते कि  इसकी आयतें क्यों  खोल खोल  कर  नहीं     बतायी  गयीं  ,यह क्या  बात कि  एक आजमी ( कुरान  ) और एक अरबी ( मुहम्मद ) "
 सूरा -हा  मीम सजदा 41 :44 

 “And if We had made it a non-Arabic Qur’an, they would have said, “Why are its verses not explained in detail [in our language]? Is it a foreign "recitation] and an Arab [messenger"

"जब  हम  हर  गिरोह में  खुद उन्हीं  में से एक  गवाह ( रसूल ) उन्हीं  के सामने खड़ा  कर देंगे और  गवाह के रूप लायेंगे , और इसी तरह  हमने एक किताब उतरी है जो हर  चीज  खोल  कर बयान करने  वाली  है
" सूरा - अन नहल 16 :89 

 इसलिए  अगर अल्लाह  को  भारत में  इस्लाम  फैलाना  होता तो  वह  भारत में  भी  किसी  ऐसे रसूल  को भेजता  जो भारत की  किसी भाषा  को  जानता हो !

2-मुहम्मद केवल अरबों  के रसूल  थे 

मुसलमान कितने भी  दावे  करें  कि  मुहम्मद साहब  दुनिया  के सभी  लोगों  के  लिए  रसूल  थे ,  लेकिन कुरान  में  खुद  मुहम्मद  साहब  ने  साफ कह दिया  है कि सिर्फ  अरबो  के रसूल   थे  ,
" हे  मुहम्मद  तुम अपने लोगों  से  कह दो  कि मैं तुम सब  के  लिए अल्लाह का  रसूल  हूँ  "
 सूरा -अल आराफ़  7 :158 

."तुम्हारे  लिए तो तुम्हीं  में से एक रसूल  आया   है , और तुम्हारा  कष्टों  में रहना उसके लिए असह्य  है "
 सूरा -अत तौबा  9 :128 

." इसी के अनुसार  हमने तुम  में से ही एक रसूल भेजा  है  ,जो  तुम्हें हमारी  आयतें  सुनाता  है और तुम्हें  शुद्धता और  विकास  प्रदान  करता  है  "
सूरा -अल बकरा  2 :151 

Just as We have sent among you a messenger from yourselvesreciting to you Our verses and purifying you "2:151

."अल्लाह ने यह  बहुत बड़ा  अहसान  किया  कि उन के लिए उन्हीं  में से एक रसूल उठाया  जो उनको उसकी आयतें  सुनाता  है  "
सूरा - आले इमरान 3 :164 

"Certainly did Allah confer [great] favor upon the believers when He sent among them a Messenger from themselves, reciting to them His verses"3:164

कुरान  की इन आयतों को पढ  कर इस बात में  किसी प्रकार  की  शंका  नहीं  रहती कि मुहम्मद  साहब  केवल  अरब  लोगों   के लिए  रसूल  बना कर  भेजे  थे , सारी  दुनिया  के  लिए  नहीं 


3-मुहम्मद  का क्षेत्र  मक्का  तक  सीमित था 

कुरान के अनुसार  हरेक  जाती के  लिए  जो रसूल  भेजा जाता  है उसका कार्य क्षेत्र उसी भूभाग  तक  ही  सीमित होता  है ,जैसे मूसा   की किताब  सिर्फ  यहूदियों    के लिए थी  . और उनका क्षेत्र  मिस्र और इसराइल  के आसपास  का था , यह  इन आयतों  से स्पष्ट  होता  है  .

"तुम इन यहूदियों  से पूछो कि उनके लिए वह  किताब  किसने उतारी  थी  ,जो मूसा  लेकर आया था प्रकाश और मार्ग दर्शन  के लिये तुम  जिसे  अलग अलग  पन्नों  के  रूप  में रखते  हो "
सूरा -अनआम 3 :92 


."इसी तरह  यह (कुरान )  भी एक  बरकत  वाली  किताब  है  , जो इस लिए उतारी गयी  है  ,ताकि तुम इस केंद्रीय  बस्ती (मक्का ) और उसके आस  पास  रहने वाले  लोगों   को सचेत करते  रहो "
 सूरा -अन आम  6 :93 

 नोट -इस आयत में मक्का  को "उम्मुल कुरा -  أُمَّ الْقُرَى"कहा  गया  है ,इसका अर्थ " बस्तियों  की  माता (the Mother of towns  )   होता  है  . इस्लाम  से पहले से  लोग मक्का  को इस  नाम  से भी  जानते थे , क्योंकि  मक्का के  आसपास   नयी नयी  बस्तियां  बसने  लगी  थी  .   फिर आयात में  मक्का  के बाद '  हौलहा - حَوْلَهَا"   शब्द  भी  दिया है ,इसका अर्थ " आसपास (those around it )  होता  है  . और इस पूरी आयात का अंगरेजी में यह अर्थ  होता  है ,

“And this is a Book which We have sent down, blessed and confirming what was before it, that you may warn the Mother of Cities and those around itQ.6:93 

फिर मुसलमान  किस आधार  पर यह दावा  करते  हैं  कि कुरान और रसूल   समग्र  मानव  जाती  के  लिए  है ,जबकि  मुहम्मद  साहब  की रसूलियत  केवल  मक्का और उसके आसपास  की बस्तियों  तक  ही सीमित   थी  . और विकिपीडिआ  के अनुसार  अकेले  मक्का का क्षेत्रफल  वर्ग 1,200 km² कि मी और मक्का के पूरे भूभाग ( Region)  का कुल क्षेत्रफल   वर्ग 153,128 km²  कि मी  है  .  इसका मतलब कि मुहम्मद मक्का के  केवल इतने ही क्षेत्र  के लिए रसूल  थे  .  पूरी  दुनिया  के  नहीं  . (Mohammed’s mission covers the Mecca region)


4 -कुरान सिर्फ अरब  लोगों  के लिए  है 

अरब का इतिहास  पढने  से  पता  चलता है कि  अरब  में  कभी  कोई  नबी या रसूल  नही  आया   , सभी इसराइल  में ही पैदा  हुए  थे  . और अरब के लोग उनकी  भाषा  नहीं  समझ  पाते थे  . अरब  के  लोग चाहते थे  कि अरब  में भी  कोई ऐसा  रसूल  हो  ,जो उनकी  भाषा  में समझा  सके  , इसीलिए  कुरान में  कहा है  कि ,

."हमने  इसे अरबी  कुरान  के रूप  में उतारा  ताकि तुम  समझ सको और फिर तुम्हारे द्वारा  तुम्हारे और लोग  भी समझ सकें  "
सूरा -यूसुफ 12 :2 

" निश्चय ही  हमने इसे अरबी  कुरान  बनाया ताकि तुम  समझ  सको "
सूरा - अज जुखुरुफ 43 :3 


" यह कुरान साफ अरबी  भाषा  में  है , और यदि हम इसे अरब के अलावा  किसी अन्य जाति के व्यक्ति  पर उतारते तो  लोग इसे  नहीं  मानते "

सूरा -अश शुअरा 26 :195 और 198 -199 

कुरान को अरबी भाषा  में उतारने  का  यही  कारण  है कुरान सभी गैर अरबी  भाषी  लोगों  के लिए नहीं सिर्फ  अरब  लोगों के  लिए  है  .
 नोट- इस समय विश्व में अरबी  जिन देशों में बोली और समझी  जाती  है  ,उनके  नाम  हैं 
,
"United Arab Emirates, Afghanistan, Algeria, Bahrain, Chad, Comoros, Djibouti, Egypt, Eritrea, Israel, Iraq, Jordan, Kuwait, Lebanon, Libya, Morocco, Mauritania, Oman, Qatar, Saudi Arabia, Sudan, Syria, Tunisia, Western Sahara,and  Yemen.

इसका तात्पर्य है कि कुरान इन्हीं  देशों  के  लोगों के  लिये  है  . हमें  कुरान  से कुछ  लेना  देना  नहीं  है .चूँकि  भारत  के लिए  कोई ऐसा  रसूल  नहीं  आया  जो भारत की एक भी  भाषा  बोल  या जानता  हो ,इसलिए  भारतीयों  को  कुरान  की जरुरत  नहीं है ,उनके लिए उन्हीं  के धर्मग्रन्थ काफी  हैं  . 


5-जहाँ रसूल नहीं  वहाँ सजा भी नहीं 

और जो मुल्ले  मौलवी  और  इस्लाम  के प्रचारक  गैर मुस्लिमो विशेषकर हिंदुओं  को यह  कह कर डराते  रहतेहै कि जो भी समुदाय रसूल और कुरान पर  ईमान  नही लाएगा  , अल्लाह  उनको  बर्बाद  या नष्ट  कर देगा   . हम इस्लाम  के ऐसे एजेंटों  से अनुरोध करते  हैं कि वे कुरान की इस आयत  को ध्यान  से पढ़ें ,

-" तेरा रब    बस्तियों  को  तब तक  विनष्ट  करने  वाला नहीं  है  ,जब तक उनके यहाँ  एक  रसूल  नहीं  भेज ले  , जो उनको  हमारी  आयतें  न सुना  चुके  . और तब तक हम  बस्तियां  नष्ट  करने  वाले  नहीं  हैं "
सूरा - कसस 28 :59 

"And never would your Lord have destroyed the cities until He had sent to their  a messenger reciting to them Our verses. And We would not destroy the cities
 "28:59

इस आयत से स्पष्ट  हो  जाता है कि  गैर मुस्लिमों  और  हिंदुओं  को इस्लाम के एजेंटों और  प्रचारकों   की ऐसी किसी  भी बंदरघुड़की  और धमकी  से  डरने की को  जरूरत  नहीं   है , क्योंकि  खुद अल्लाह  ने यह नियम  बना  रखा  है  " जहाँ रसूल नहीं वहाँ  सजा भी नहीं "(No Prophets, No Punishments policy).इसलिए हिन्दू  निर्भय  होकर अपने  धर्म   का  पालन करते  रहें  इस्लाम  के चक्कर  में नहीं   फसें  .


6-सबको  कर्मानुसार  फल  मिलेगा 

अक्सर देखा  गया है  कि इस्लाम  से अनभिज्ञ  भोले भाले हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कराने  लिए इस्लाम के चालक दलाल यह  बात  भी कहते हैं  कि  रसूल और कुरान  पर ईमान  लाने  यानि  मुसलमान  बन जाने  पर जन्नत  मिल  जायेगी  ,और रसूल  उनको दोजख ( नर्क ) जाने से  बचा लेगा   . यह  भी सरासर  झूठ  है , क्योंकि  खुद कुरान  में   कहा  है कि ,

" जो कोई सीधे रस्ते  पर चला  तो , वह अपने लिए  ही चला  , और जो कोई भटक  गया तो उसके भटकने का बवाल उसी  पर पड़ेगा  . और किसी का बोझ उठाने के लिए कोई बोझ  उठाने वाला   नहीं  है "
सुरा - बनी इसराइल 17 :15 

“Whoever is guided is only guided for [the benefit of] his soul. And whoever errs only errs against it. And no bearer of burdens will bear the burden of another. "17:15

इस आयत से साफ  पता होता  है  हरेक  व्यक्ति  के  भले -बुरे कर्मो का फल उसी  को भुगतना  पड़ेगा  , कोई रसूल  उसको नहीं  बचा  सकेगा  , यही  बात  गीता  में  भी कही  गयी है "अवश्यमेव भोगतव्यम् कृतः  कर्म शुभाशुभम "अर्थात सभी  भले बुरे कर्मों  का  फल अवश्य  मिलता  है , जो कर्म  करने वाले को खुद भुगतना  पड़ेगा

7-मुहम्मद दया करने को भेजे गए ?

कुरान से अनिभज्ञ अधिकांश  मुसलमान  इस भ्रम  में  पड़े  हैं कि मुहम्मद साहब यानि  रसूल  का काम इस्लाम फैलाना  और  लोगों को  मुसलमान  बनाना था  . यह   भी झूठ  है क्योंकि उस समय  के अरब क्रूर और अत्याचारी थे  , इसलिए  मुहम्मद  साहबको लोगों  पर दया  करने  की  शिक्षा  देने के लिए  भेजा  गया था  ताकि  लोग शांति से रह सकें  ,यही  इस आयात में  कहा  है  ,


"हे  मुहम्मद  हमने  तुम्हें संसार  के  लिए  दयालु   बना  कर भेजा  है "

 सूरा -अल अम्बिआ 21 :107 

8-निष्कर्ष -इसलिए हमारा उन  लोगों  से  अनुरोध  है जो इस्लाम  को सार्वभौमिक  धर्म  मान  लेते हैं   और उसकी बराबरी हिन्दू वैदिक धर्म  से करते है  या इस्लाम  के प्रति झुकाव  रखते है  , वह समझ लें  कि  इस्लाम सिर्फ अरबों के लिए था , जो  मुहम्मद साहब के बाद अरबी  साम्राज्यवाद  का  रूप धारण  कर चूका  है , इसलिए  इस्लाम  से दूर रहना   ही  उचित  है  , हमें  तो गीता के इस वचन   का  पालन  करना  चाहिए ,
"स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः "गीता -3:35 
.क्योंकि अगर  सचमुच ही  मुहम्मद  दयालु  होते तो उनके अनुयायी  आतंक  क्यों फैलाते  रहते ? वास्तव में यह आयत  मुहम्मद साहब  को लोगों  पर दया  करने के लिए कही गयी   है !

इन  प्रमाणों  से सिद्ध होता है कि अल्लाह ,रसूल  ,कुरान और  इस्लाम केवल अरबी भाषी लोगों के लिए  है  ,इस पाखण्ड का गैर  अरबी लोगों  खासकर भारतीयों   से कोई सम्बन्ध  नहीं   है  , इसलिए इस अरबी गन्दगी को भारत से साफ कर देना चाहिए  , क्योंकि हमारी मातृभाषा अरबी  नहीं  , हमारे लिए यह बातें  कचरे  की तरह  है 

(200/167)


गुरुवार, 29 अगस्त 2019

निकाह यानी योनि का सौदा !!

असदुद्दीन ओवैसी  के बारे में सभी   जानते हैं  यह धूर्त व्यक्ति कट्टर  जिहादी और हिन्दू द्वेषी है  ,यह हिन्दुओं को नीचे दिखने के लिए कोई मौका  नहीं  छोडता ,आपको याद होगा कि जब संसद  में तीन तलाक  के बारे में बहस हो रही थी ,तो ओवैसी ने कहा था ,कि भले ही हिन्दुओं में विवाह जन्म जन्म  का बंधन और पवित्र  संस्कार  होगा  ,लेकिन  इस्लाम  में शादी   एक  अनुबंध (Agreement  )  है ,और उसे कभी  भी तोडा  जा  सकता है ,लेकिन  ओवैसी  ने बड़ी मक्कारी  से असली   बात  को छुपा  लिया  था  , जिसका इस लेख में भंडा फोड़ा  जा रहा  है ,कि इस्लाम  में शादी  यानि निकाह  का मतलब   क्या  है ?
दुनियां  में इस्लाम  एकमात्र  ऐसा मजहब है  जिसने  औरतों  को   सबसे अधिक  महत्त्व  दिया  है  , और  यदि    कोई कहे कि औरतों  के बिना  इस्लाम  जिन्दा नहीं    रह  सकता तो     ऐसा कहना   गलत  नहीं होगा  , क्योंकि मुस्लमान नमाजें   इसीलिए पढ़ते हैं   कि अल्लाह खुश होकर   जन्नत में उनको  औरतें  ( हूरें )  देगा  ,इसीतरह  मुस्लमान   जिहाद  इसलिए करते हैं  कि  जिहाद में उनको  गैर मुस्लिमों   की  औरतें   मिल  सकें    और  वह अय्याशी  करते रहें  ,
मुस्लमान   औरतों  के इतने    शौकीन  होते हैं     कि शादी भी    औरत  को  पत्नी  का दर्जा देने की बजाये   निकाह के समय   औरत की  योनि  खरीद  लेते हैं   ,  जिस  तरह   से कोई वेश्या    रूपये लेकर   अपना जिस्म  ग्राहक  को सौंप देती है  ,  उसी  तरह   निकाह  के  समय मुस्लिम  औरत   मर्द  से कुछ धन   लेकर अपनी  योनि   मर्द को   अय्याशी के लिए   सौंप  देती  है   , इस्लामी परिभाषा में  योनि  खरीदने के लिए  स्त्री को जो धन  दिया  जाता  है  उसे  "मेहर -  مهر‎;    "  कहा   जाता  है , हालांकि  यह शब्द कुरान  में नहीं  है   , mehar  यह तुर्की शब्द   है    इसका अर्थः "bride price" होता  है 

1-मेहर का असली अर्थ 
 निकाह  के वक्त    वधु  को  महर  देना  अनिवार्य  होता है ,, मुल्ले बड़ी  चालाकी    से  महर  का अर्थ  उपहार    (Gift   ) कर  देते   हैं  . लेकिन  कुरान  में  औरत  को दिए जाने वाले   धन    को  अरबी में "उजर -   اُجر  " कहा  गया  है   , जिसका बहुवचन    "उजूर  - أُجُورَ " होता  है  ,इसका अर्थ compensation, wages,price  ,इसका मतलब क्षतिपूर्ति  ,  मजदूरी    और कीमत   हैं  ,

2--अल्लाह पत्नी को  सेक्स  मजदूर  मानता  है 
मुस्लिम  देशों  में वेश्यावृत्ति गुनाह नहीं  माना  जाता  है  , यह व्यवसाय   है  ,  वेश्याएं   सम्भोग करवाने के लिए मर्दों   से  जो   पैसा मांगती  हैं   ,उसे  अपनी  मेहनत   या मजदूरी   बताती    है  , अल्लाह ने  यही नियम    उन  सभी  औरतों  पर लागू कर  दिया  जो निकाह के समय मेहर के  रूप में रूपये   लेती है  , कुरान की यह  आयत देखिये
"और  जिन  औरतों  के साथ  तुम जीवन  का मजा  उठाओ , उन्हें  उसके  बदले में निश्चित  मजदूरी   अदा  करो  "


".So for that pleasure which you have enjoyed from them, give them  compensation.

فَآتُوهُنَّ أُجُورَهُنَّ 

 सूरा -निसा  4:24 

.
नॉट-अरबी में  है  " फातू  हुन्न उजूर  हुन्न   - فَآتُوهُنَّ أُجُورَهُنَّ " उनको  उनकी मजदूरी चूका  दो (  give them  compensation )
,इस आयत की तफ़सीर   जलालैन में  इस प्रकार से व्याख्या   दी  गयी  है  ,

"जैसे तुमने औरतों  के साथ मजे किये  और उनसे   सम्भोग  किया   ,  वैसे ही इसके लिए उनकी  मजदूरी  चुका   दो

 Such wives as you enjoy thereby, and have had sexual intercourse with, give them their wages,

Tafsir Al-Jalalayn-Verse 4.24

इस तरह  से अल्लाह ने   पत्नी को दिए जाने वाले मेहर को औरत के साथ  सम्भोग करने की  मजदूरी   बता  दिया 
3-महर योनि  की कीमत 

लेकिन    रसूल   अल्लाह  से भी अधिक   ज्ञानी थे   उन्होंने   मेहर को  औरत  की  योनि  की कीमत    बता  डाली  , इसके बारे में  दो हदीसें    दी  जा  रही  हैं 
(नोट - अरबी  में योनि (vagina ) को   "फुर्ज - فُرج
  "   कहा  जाता   है  , और  "उसकी योनि (her vagina " को अरबी में " फुर्जहा - فُرجها  "   कहा  जाता  है  .
2-हदीस से पुष्टि 

"बशरा  नाम के एक अंसार  ने रसूल  से  कहा  कि  मैंने एक  कुंवारी  लड़की  से  निकाह किया था  , और  जब कुछ समय बाद  घर  गया तो  देखा  की   मेरी  पत्नी  ने  पुत्र  को   जन्म  दिया  है  ,रसूल  ने कहा कि  तुमने  उस स्त्री की योनि  की मजदूरी ( महर ) चुका  दिया  , और  उसकी योनि  तुम्हारे लिए वैध   है .


"فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم ‏"‏ لَهَا الصَّدَاقُ بِمَا اسْتَحْلَلْتَ مِنْ فَرْجِهَا "

"कालन्नबी सलल्ललाहु  अलैहि  व्  सल्लम लहा अस्सदाक बिमा असतहलत मिन फुर्जहा "


 A man from the Ansar called Basrah said: I married a virgin woman in her veil. When I entered upon her, I found her pregnant.The Prophet said,

'She will get the dower, for you made her vagina lawful for you.' 


Reference : Sunan Abi Dawud 2131
In-book reference : Book 12, Hadith 86
English translation : Book 11, Hadith 2126


 इस हदीस में "अस्सदाक-  الصَّدَاقُ  " का अर्थ   मजदूरी   (wage )  और  " फुर्जहा-فَرْجِهَا " का अर्थ   उसकी योनि  (her vagina " है  .


मेहर का  सही अर्थ   योनि की कीमत है  जो निकाह के समय  पुरुष  अपनी पत्नी को  चूका देता है  ,  इस  तरह से  पुरुष  पत्नी की योनि का मालिक  (ग्राहक ) बन   जाता है  ,  वह जब  चाहे जब  भी जीतनी बार  और जब  तक  सहवास कर सकता है  ,  यही कारण   है कि मुस्लिम   मर्द    जब  चाहे बिना कारन  या ज़रा ज़रा  सी  बात पर अपनी  औरत को  तीन तलाक  दे देते हैं  ,  और जब  अदालत  इस प्रथा को अपराध   बताती है  और  तलाक  शुदा पत्नी को  उसके निर्वाह  के लिए खर्चा देने की   बात  करती है तो मुल्ले मौलवी   विरोध करने  लगते हैं   , और शरीयत  की  दुहाई  देने लगते  हैं  , एक प्रकार से उनकी बात सही है   क्योंकि इस्लाम में निकाह  संस्कार नहीं  बल्कि  एक  लिखित एग्रीमेन्ट  होता  है  , जिसमे  औरत   मेहर   रूपी  एडवांस  धन  लेकर    मर्द  को अपनी योनि बेच   देती   है  , जैसे   कोई व्यक्ति  रुपये लेकर  अपनी जमीन  या मकान किसी को बेच   देता है   तो वह   संपत्ति  खरीदने वाले  की हो जाती है  ,   वह  खरीद  दार उसका जो चाहे  करे  ,   छोड़ दे ,दान  कर  दे  ,  किसी को भेंट कर दे  या  नष्ट  करदे  ,उसकी मर्जी  !

अल्लाह   ने औरतों   को बिकाऊ  माल या  अपनी  योनि बेचने  वाली  सेक्स  वर्कर   बना  दिया  ,  इस  हालत  से बचने का  एक  ही रास्ता  है  कि मुस्लिम   लड़कियां   किसी  हिन्दू  से  शादी  कर  लें    ,और  धर्मपत्नी  बन   कर    सुख  से   जीवन   गुजारें 

Video by B .N. Sharma

Muslim women   also can have many Husbands

https://www.youtube.com/watch?v=t72nhiPPXBw&t=144s


(402)

रविवार, 25 अगस्त 2019

कुरान में अल्लाह का जानवर !

मुहम्मद साहब विश्व में इस्लाम के बहाने अरबी साम्राज्य स्थापित करना चाहते .और किसी न किसी तरकीब से लोगों को मुसलमान बनाना चाहते थे .वह चाहती थे कि उनके जीवन में ही सारी दुनिया मुसलमान बन जाये .इसलिए उन्होंने लोगों को समझाने , सुधारने ,और उपदेश देने की जगह धमकाने और डराने का तरीका पसंद किया था. आज भी मुसलमान यही कर रहे हैं .
1-मुहम्मद साहब क्यों डराते थे 
इसका कारण यह है कि न तो मुहम्मद साहब एक प्रभावशाली वक्ता और उपदेशक थे .और न वह लोगों को समझाने में समय बर्बाद करना चाहते थे .और उस समय उनके सभी साथी जाहिल और थे .क्योंकि उस समय मक्का के लोग काफिलों के साथ अपने ऊंटों से एक शहर से दुसरे शहर तक सामान पंहुचाया करते थे.और वहां से सुनी हुई जिन्नों , परियों , भूतों और अजीब अजीब बातों कि कहानिया घर आकर सुनाया करते थे .और अरब के मुर्ख उन कहानियों को सच मान लेते थे .मुहम्मद साहब ने सोचा कि अगर मक्का के लोगों को अल्लाह के नाम से तरह तरह के कल्पित स्थानों जैसे जहन्नम और किसी भयानक प्राणी से डराया जाये तो वह मुसलमान बन जायेंगे . क्योंकि मक्का के लोग कुरान की बेतुकी , ऊलजलूल बातों का मजाक उड़ाते थे .
2-डराने का उपाय 
जब मुहम्मद साहब को पता चला कि लोग उनकी कल्पित जहन्नम की सजाओं ,वहां होने वाले कष्टों की बातों पर विश्वास नहीं कर रहे हैं . और कुरान को मुहम्मद की रचना बता रहे हैं . तो मुहम्मद साहब ने एक चाल चली . और सोचा कि लोगों को किसी ऐसे भयानक जानवर से डराया जाये जिसे न तो किसी ने देखा हो .और न उसके बारे में सुना हो .फिर उस जानवर ( Beast ) कि बात को अल्लाह का वचन बताकर कुरान में लिखा दिया .

अल्लाह उनके लिए जमीन से एक ऐसा जानवर निकलेगा ,जो उनको सबक सिखाएगा , जो लोग हमारी आयतों पर विश्वास नहीं करते " 
सूरा-अन नम्ल 27 :82 


"وَإِذَا وَقَعَ الْقَوْلُ عَلَيْهِمْ أَخْرَجْنَا لَهُمْ دَابَّةً مِنَ الْأَرْضِ تُكَلِّمُهُمْ أَنَّ النَّاسَ كَانُوا بِآيَاتِنَا لَا يُوقِنُونَ  "


We shall bring forth unto them out of the earth a creature which will tell them that mankind
had no real faith in Our messages. 27:82

अबू हुरैरा ने कहा कि रसूल ने कहा है . कि अगर लोग अबभी ईमान नहीं लायेंगे तो . जल्द ही अल्लाह जमीन के अन्दर से एक ऐसा भयानक जानवर निकल देगा . जिसे पहले किसी ने नहीं देखा होगा .वह बहार निकलते ही काफिरों का बड़े पैमाने पर संहार करेगा "

सही मुस्लिम- किताब 41 हदीस 7040 और 7023 

3-अल्लाह का जानवर कैसा होगा 
यद्यपि कुरान में अल्लाह के द्वारा जमीन से निकलने वाले कल्पित जानवर का कोई नाम नहीं दिया है . और उसे अरबी में " दाब्बह  -دَابَّةً  " कहा है . लेकिन हदीसों में उस जानवर के बारे में जो विवरण दिए गए हैं , वह इस प्रकार हैं ,
1 .उसकी ऊंचाई लगभग सौ हाथ से अधिक होगी . 2 .सर बैल के जैसा होगा 3 .आँखें सूअर जैसी होंगी 4 .कान हाथी जैसे होंगे . 5 . सर पर दो बड़े सींग होंगे 6 .शुतुर मुर्ग जैसी गर्दन होगी 7 .सीना शेर जैसा होगा 8 . खाल का रंग चीते जैसा होगा 9 .ऊंट जैसे लम्बे पैर होंगे 10 .वह हाथों में मूसा का कपड़ा बांधेगा और सुलेमान की अंगूठी पहने हुए होगा .
फिर वह सारी पृथ्वी का चक्कर लगाएगा और जो लोग इस्लाम कबूल नहीं करंगे उनका भेजा निकाल देगा "
अबू हुरैरा ने कहा कि रसूल ने उस जानवर की यह निशानियाँ बताई है "

इब्न माजा-हदीस 4066 

अगर कोई कुरान के इस कल्पित जानवर के बारे में सोचेंगे कि शायद ही कोई ऐसा जानवर होगा जिनके विभिन्न अंगों को मिलाकर कुरान का जानवर बना दिया है . इसे और स्पष्ट करने के लिए एक विडिओ दिया जा रहा है ,


What do Muslims believe? #18: Earth Beast

http://www.youtube.com/watch?v=PAAOoZeM9-g

इस विडिओ में कम्प्यूटर से इस हदीस में दिए गए सभी जानवरों के अंगों को मिलाकर कुरान में दिए गए अल्लाह के जानवर को बनाने का प्रयास किया है . ताकि लोग अल्लाह की अक्ल और मुहम्मद द्वारा लोगों को डराने की तरकीब का नमूना देख सकें .

4-चमत्कारी जानवर 
जब मुहम्मद साहब को लगा कि शायद इतना बड़ा सफ़ेद झूठ कहने पर झूठ में कुछ कमी रह गयी है , तो उन्होंने उस जानवर की शक्ति के बारे में एक महाझूठ सुना डाला . ताकि अरब के मूर्ख अंध विश्वासी पूरी तरह से डर कर इस्लाम के जाल में फंस जाएँ . हदीस में कहा ,

अबू हुरैरा ने कहा कि रसूल ने बताया है . जब वह जानवर जमीन ने निकलेगा तो सूरज जिस जगह से निकलता है , उस जगह डूबने लगेगा "

"ا طُلُوعُ الشَّمْسِ مِنْ مَغْرِبِهَا وَالدَّجَّالُ وَدَابَّةُ الأَرْضِ ‏"‏ ‏  "


सही मुस्लिम - किताब अल इमान किताब 1 हदीस 0296 

इस लेख को पूरी तरह से पढ़ने के बाद हमें यह सोचना पड़ेगा कि हम क्या करें ,अल्लाह कि बुद्धि पर रोयें , या मुहम्मद की मुर्खता भरी चतुराई पर हंसें .या मुसलमानों के ऐसे इमान पर अफसोस करें उनको गुमराह कर रहा है .जिसके कारण वह सत्य को स्वीकार नहीं करते और जो भी उनके ऐसे झूटों का भंडा फोड़ता है उसे गालियाँ देते हैं हम तो इसी निष्कर्ष पर पहुंचे है कि,
" जोभी कुरान और हदीसों पर विश्वास करता है , उसके इन्हीं जानवरों का अंश होगा "

Islam's Beast of the Earth

https://irrationalislam.files.wordpress.com/2011/06/the-beast.jpg

(200/62)



शनिवार, 24 अगस्त 2019

वैदिक धर्म की प्रमाणिकता !

इस तथ्य  को  विश्व के सभी इतिहासकार , धार्मिक विद्वान् ,और वैज्ञानिक स्वीकार कर चुके हैं  ,वैदिक धर्म सबसे  प्रचीन  धर्म  है , और  वेद  ही धर्म  का मूल  हैं .केवल वेदों  के  सिद्धांत ही विज्ञानं  की कसौटी पर खरे पाए गएँ  हैं . क्योंकि वेद  को लेन वाला  कोई   फ़रिश्ता  नहीं था  ,और  न  वेद  सातवें आसमान  से  जमीन  पर  उतारे  गए थे .इनके सिद्धांत  सार्वभौमिक  और  अटल  हैं . जो एकेश्वरवाद (Monotheism )   पर आधारित  हैं .
लेकिन बड़े  दुःख  की बात है कि आजकल  के हिन्दू   वेद के इस सिद्धांत को छोड़कर  एक  ईश्वर  की जगह , भुत प्रेत , साईँ  , फ़क़ीर  ,यहाँ  तक  कब्रों  तक  की पूजा  करने  लगे  हैं .और यही कारण  है  कि  मुसलमान  हिन्दुओं  को मुशरिक , और काफ़िर  कहते हैं . जबकि  एकेश्वरवाद  एक वैदिक  सिद्धांत  है , जो भारत से निकल  कर .ईरान  से होते हुए  पुरे मध्य  एशिया  तक  फ़ैल  गया  था .जिसे  इस्लाम ने भी  स्वीकार  कर लिया  .बाद में सिख  धर्म  ने भी  एकेश्वरवाद  की पुष्टि  कर दी .
प्रमाण  के  लिए उपनिषद् , कुरान  और श्रीगुरु  ग्रन्थ  साहब    के ऐसे  अंश  दिए  जा रहे हैं  ,जिनमे    कुछ  शब्दों  के अंतर  जरुर हैं  ,लेकिन  सबका आशय  और भाव  एक  ही है .

1-वैदिक धर्म 
"दिव्यो ह्य मूर्तः पूरुषः सबाह्यान्तारो ह्यजः ,
अप्रमाणो ह्यमनाः  शुभ्रो ह्यक्षरात परतः परः .
मुण्डकोपनिषद -मुण्डक 2 मन्त्र 2 
        अर्थ -" निश्चय ही  वह इश्वर आकर रहित और अन्दर बाहर  व्याप्त है ,वह जन्म के विकार से रहित उसके न्   तो   प्राण  हैं ,न इन्द्रियां  है  .न मन है  .वह इनके विना  ही सब कुछ  करने में समर्थ  हैं .वह अक्षर यानि अविनाशी हैं .और जीवात्मा से अत्यंत श्रेष्ठ है
इसी  प्रकार एक और जगह कहा गया है ,
" न तस्य कश्चित् पतिरस्ति  लोके ,
न चेशिता नैव च  तस्य लिङ्गम ,
स कारणम करणाधिपाधिपो ,
न चास्य   कश्चित्जनिता न चाधिपः 
श्वेताश्वतर  उपनिषद -अध्याय 6  मन्त्र 9 
अर्थ -"सम्पूर्ण  लोक में उसका कोई स्वामी  नहीं है ,और न कोई उसपर शासन  करने वाला  है .और न कोई उसका  लिंग ( gendar )  है. वही कारण और सभी कारणों  का अधिपति  है .और न  किसी ने उसे जन्म दिया है और न कोई उसका  पालक ही है "
उपनिषद्  की   यही बात  कुरान में ज्यों की त्यों नक़ल कर दी गयी है ,भाषा अलग  जरूर  है ,

2-इस्लाम

قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ ١ اللَّهُ الصَّمَدُ ٢ لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ ٣ وَلَمْ يَكُنْ لَهُ كُفُوًا أَحَدٌ ٤ "

سورة الإخلاص   -112:
"कुल हुवल्लाहू अहद .अल्लाहुससमद .लम यलिद  व् लम यूलद .व् लम यकुन कुफ़ुवन  अहद "
सूरा  इखलास -112
अर्थ -कह दो कि अल्लाह एक है ,अल्लाह निराधार और सर्वाधार है ,उसकी कोई औलाद नहीं है और न वह किसी की औलाद है .और कोई ऐसा नहीं  जो उसके  बराबर हो .

3-सिख धर्म 
" ਸਤਿ ਨਾਮੁ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਨਿਰਭਉ ਨਿਰਵੈਰੁ ਅਕਾਲ ਮੂਰਤਿ ਅਜੂਨੀ ਸੈਭੰ ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥ ਜਪੁ ॥ ਆਦਿ ਸਚੁ ਜੁਗਾਦਿ ਸਚੁ ॥ਹੈ ਭੀ ਸਚੁ ਨਾਨਕ ਹੋਸੀ ਭੀ ਸਚੁ ॥੧

 सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥ जपु ॥ आदि सचु जुगादि सचु ॥ है भी सचु नानक होसी भी सचु ॥॥ १॥

श्रीगुरुग्रंथ  साहब - मूलमन्त्र
अर्थ -इश्वर  है ,उसका  नाम ओंकार  और सत्य है .वह जगतका कर्ता  है . निर्भय है . वर हर प्रकार के वैर से  रहित काल  से परे है ,वह अजन्मा और स्वयंभू है .गुरु  के प्रसाद  से उसी के नाम  का जाप करो .वह ईश्वर  प्रारंभ  में भी सत्य  है और युगों  तक सत्य ही  रहेगा "
 वेद  और  कुरान  के उद्धरण  साथ में देने से  हमारा उदेश्य  इस्लाम  को वैध  सिद्ध  करना  नहीं है और उसका महिमामंडन  करना भी  नहीं  है , क्योंकि  यह ज्ञान भारत से ही अरब  गया  था .और दूसरों  से धन चुराने  वाले को धनवान  नहीं कहा जा सकता .जहाँ तक  श्रीगुरु  ग्रन्थ साहब की बात  है ,तो उसमे ऐसी हजारों  बातें मौजूद है ,जो वेदों  शिक्षा  से मेल खाती हैं .
हमारा  वास्तविक उदेश्य तो   उन हिन्दुओं    को धर्म   के बारे में सही  बात बताना है ,जो पाखंड  को ही धर्म  समझ रहे हैं . और धर्म  की जड़  काट  कर  पत्तों  की सिंचाई  कर रहे हैं .और  ईश्वर की उपासना  की जगह अनेकों देवी देवता , भुत प्रेत   यानि पीर औलिया  और कब्रों  पर भी सर  झुकाते  है , इनके लिए गीता  में कहा गया है ,
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये जयन्ते तामसा जनाः॥17/4

अर्थात-  सात्विक  लोग तो सिर्फ ईश्वर की उपासना  करते हैं  . और राजसी लोग  यक्ष ,रक्ष ( semi gods )  की पूजा करते हैं , जो सिर्फ कल्पित व्यक्ति यानि अर्ध मानव  है और सबसे निकृष्ट  वह तामसी लोग हैं वह  भूत यानि  मुर्दों  की कब्रों ,इत्यादि की पूजा  करते  है ,इत्यादि में निर्मल बाबा , साईँ  बाबा  , राधे  माँ   जैसे ढोंगी  है 
यही नहीं अज्ञानी लोग मुसलमानों की नक़ल  करके  भूखे रहने  को ही तप समझते  है , जबकि एसा  किसी ग्रन्थ  में नहीं  लिखा . लोग दिन भर तो भूखे रहते हैं . और शाम  को चौगुना  खाते  है ,इसे तप  नहीं कहते .जैसा  गीता  में कहा  है ,

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।
दम्भाहङ्‍कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥17/5

अर्थात-  शास्त्र विरुद्ध  होने पर भी  किसी की देखादेखी  जो लोग घोर तप्  करते  हैं ,वह पाखंडी ,अहंकारी और दिखावे  की कामना  से यह किया  करते हैं , यह तप नहीं  है .क्योंकि योग सूत्र  में कहा है ,"सुखे  दुखे  समौ भूत्वा  समत्वं  योग उच्यते "   यही  गीता   में कहा है ,

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥3/28

अर्थात-  सुख और दुःख , हार  और जीत , लाभ और हानि  की परवाह  किये बिना  ही धर्म की रक्षा के  लिए हम युद्ध  करेंगे  तो हमें  कोई पाप  नहीं  लगेगा .यानी पाप  तो तब  लगेगा  जब  हम   मूक दर्शक  बने तमाशा  यानि टी वी  देखते  रहेंगे ,या सोचते  रहेंगे कि यदि हम सत्य और धर्म का साथ देंगे तो हमें सम्प्रदायवादी   कहेंगे .
भर्तरि शतक  में एक श्लोक  है ,

"निन्दन्तु  नीति निपुणा , यदि  वा स्तुवन्ति , 
लक्ष्मी  समाविशतु   गच्छतु वा यथेष्टम 
अद्यैव  मरणमस्तु युगान्तरे   वा  
न्यायात पथः प्रविचलन्ति पदम् न  धीराः .

अर्थात - चाहे बातों  में निपुण  लोग हमारी निंदा करें  या हमारी तारीफ़ करें ,चाहे हमारे पास धन  का भंडार  हो जाये या हम  कंगाल  हो  जाएँ ,और चाहे हम आज  ही मर जाएँ , या युगों  तक जीवित रहें . लेकिन  सत्य के मार्ग  से कभी विचलित   नहीं  हो सकते .
और यदि मानते  हैं  कि  वैदिक धर्म  प्रमाणिक  है तो उसको बचाने , और धर्म के बहाने होने वाले  आतंक  का विरोध  करिए 
हमें उपलब्ध सभी साधनों  का उपयोग  करके  देश द्रोहियों  और धर्म  के शत्रुओं  का मुकाबला करना होगा .यही धर्म  है 
 "विनाशाय च दुष्क्रताम "

(200/123)

गुरुवार, 22 अगस्त 2019

भगवद्गीता को राष्ट्रिय ग्रन्थ घोषित करो !

बड़े दुःख   के साथ   कहना  पड़ता है कि हिन्दुओं    को  सेकुलरिज्म   के रोग   ने इस तरह   से   ग्रस्त   कर लिया है कि  भगवद्गीता   को   एक   हिन्दू  धर्मग्रन्थ  मानने की  भूल  करने   लगे  हैं  और  उसकी  तुलना  अन्य  धर्म ग्रंथों  से करने लगे   हैं  , जबकि वास्तविकता तो  यह है कि प्रतिपादित सभी  सिद्धांत ,  नियम   और उपदेश   किसी विशेष  देश  , जाति य समूह  के लिए  नहीं   मानव  मात्र के लिए  हैं   . गीता  मनुष्यों  में  नहीं  बल्कि  सभी    प्राणियों  में  ईश्वर   का  अंश  है   , ऐसी  शिक्षा  देती   है  , गीता  के उपदेशो   का   ठीक  से पालन  करने वाला  कभी  हिंसक   और  अपराधी   नहीं   बन सकता    है   . और  सपने में भी किसी  का अहित  नहीं  सोच  सकता  , चूँकि   सभी हिन्दू  गीता पर  श्रद्धा  रखते हैं  ,इस   लिए हिन्दुओं   ने  न तो  किसी  देश  पर आक्रमण  करके  उस  पर कब्ज़ा   करने का प्रयत्न  किया  ,  और न  ही किसी प्रकार की जिहाद करके  लोगों  को जबरन हिन्दू   बनाया  है  , जैसा  कुरान  पढ़   कर  मुसलमान  कर   रहे हैं   . गीता में  बताया गया  धर्म  पूर्णतः   वैज्ञानिक  ,  तर्क  सम्मत  और  सार्वभौमिक  है   . ऐसे धर्म   का  पालन   कराने  के गीता  किसी  कल्पित  जन्नत का  प्रलोभन   और   किसी  जहनम   का  भय नहीं   दिखाती  . और इसी  बात को स्पष्ट  करने  के   लिए  सुप्रीम  कोर्ट  के  फर्स्ट  क्लास   जज   माननीय    श्री  ए आर     दवे   ने  सार्वजनिक रूप  से जो कहा है   , उसका  एक एक  अक्षर हीरों  से  जड़ने   के  योग्य    है   , पूरी  खबर टाइम्स  ऑफ़  इण्डिया  में दिनांक  2  अगस्त  2014   शनिवार    को  प्रकाशित    हुई   है   जो इस  प्रकार  है   . 
"सुप्रीम कोर्ट के जज ए आर दवे का कहना है की अगर मैं तानाशाह होता तो क्‍लास वन से बच्चों को गीता और महाभारत पढ़वाता, दवे ने यह भी कहा कि भारतीय लोगों को अपनी पुरानी परंपराओं की ओर लौटना चाहिए और बच्‍चों को शुरुआती उम्र में ही महाभारत और भगवद्गीता पढ़ाई जानी चाहिए, वह 'भूमंडलीकरण के दौर में समसामायिक मुद्दे और मानवाधिकारों के समक्ष चुनौतियां' विषय पर लोगों को संबोधित कर रहे थे। दवे ने कहा, 'जो लोग बहुत सेक्‍युलर हैं या तथाकथित तौर पर सेक्‍युलर हैं, वह इस बात से सहमत नहीं होंगे, लेकिन अगर मैं भारत का तानाशाह होता तो तो मैं गीता और महाभारत क्‍लास वन की पढ़ाई में शामिल करवाता।
सुप्रीम कोर्ट जज ए आर दवे का मानना है कि यह वह उपाय है, जिससे आप सीख सकते हैं कि जिंदगी कैसे जी जाए, मुझे नहीं पता कि लोग मुझे सेक्‍युलर कहते हैं या नहीं, लेकिन अगर कोई चीज कहीं अच्‍छी है तो हमें उसे लेने से गुरेज नहीं करना चाहिए, दवे ने कहा, गुरु-शिष्‍य परंपरा खत्‍म हो चली है, अगर यह परंपरा बनी रहती तो हमें हिंसा या आतंकवाद जैसी समस्‍याओं का सामना नहीं करना पड़ता। हम दुनिया भर में आतंकवाद के मामले देख रहे हैं। इनमें से अधिकतर देश लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था वाले हैं। अगर लोकतंत्र में सभी लोग अच्‍छे हों, तो वे जाहिर तौर पर किसी अच्‍छे को ही चुनेंगे। फिर वो शख्‍स किसी को नुकसान पहुंचाने के बारे में नहीं सोचेगा।   "
न्यायाधीश  दवे  का  पूरा  वक्तव्य  इस  विडिओ   में सूना   जा सकता   है ,

Justice A.R Dave Statement

https://www.youtube.com/watch?v=WShBq_9w77Y



1-भगवद्गीता उपनिषदों का सार है  
  वास्तव में  धर्म   का  मूल  तो  वेद  ही हैं   , और  उपनिषदों  में वेदों  विभिन्न   विषयों  को  सरल भाषा में  समझाया  गया है  , सब   जानते हैं कि  भगवान  कृष्ण  ने  उज्जैन   जाकर  सांदीपनि आचार्य से  वेदों  और  उपनिषदों   का  अध्यन  किया  था  , और  उन्होंने  जो कुछ भी  सीख था   उसे  अर्जुन  को  सनाया था  . जिसे  महर्षि  व्यास  ने  महाभारत  जैसे  महान  ग्रन्थ   में सम्मिलित   कर दिया  , इसके  बारे में  गीता  माहात्म्य  में  कहा  गया  है   ,
""सर्वोपनिषदो  गावः  दोग्धा   गोपाल  नन्दनः  , पार्थो  वत्स  सुधीरभोक्ताः  , गीता दुग्धामृतम  महत  "
अर्थात  -सभी  उपनिषद्   गायें  हैं  , और  उनका  दूध   दोहने  वाले  (  ग्वाला  )  कृष्ण  है  , और  उस  गाय  का दूध  पीने  वाला  बछड़ा   अर्जुन   है   , और उपनिषद्  रूपी    गायों   अमृत   के  सामान  दूध   " गीता "   है    .
यही   कारण  है ,कि भगवद्गीता  को  उपनिषदों   के  सामान  प्रामाणिक  और  पवित्र  धर्म  ग्रन्थ   माना  गया   है   ,

2-भगवद्गीता  के भाष्य 
यद्यपि  गीता में प्रयुक्त  संस्कृत   बहुत क्लिष्ट  नहीं  है  , और न उसके विषय दुर्बोध   है  .  हरेक  व्यक्ति  थोड़े से प्रयास   से अर्थ  समझ  सकता   है  , फिर भी अनेकों  आचार्यों  और  विद्वानों  ने   गीता  के  भाष्य (  )   लिखे  हैं  , ऐसे प्रमुख  आचार्यों   और उनके  द्वारा  किये गए गीता  के  भाष्यों  के नाम  इस  प्रकार हैं  ,
1-आदि शंकराचार्य -अद्वैत  भाष्य
2-रामानुजाचार्य -विशिष्ट  अद्वैत  भाष्य
3-मध्वाचार्य  -द्वैत  भाष्य
4-वल्लभाचार्य -तत्व दीपिका
5-यामुनाचार्य  - अर्थ संग्रह देशिका
6-नीलकंठ -  भावदीपिका
7-पुरुषोत्तमाचार्य -अमृत  तरंगिणी
8-जय तीर्थ -प्रमेय  दीपिका
9-वेंकट नाथ  - बृक मंदागिरी
10-लोकमान्य तिलक - गीता रहस्य
11-मो. क.गांधी  - अनासक्ति योग

3-गीता का  उर्दू काव्यानुवाद 
वैसे तो  विश्व  की लगभग  सभी भाषाओं   में  गीता  के अनुवाद हो  गए  हैं  , तभी  मेरे मन में  गीता   का  उर्दू  में  कविता के रूप  में  अनुवाद  करने का  विचार  आया  ,  लेकिन  उसमे उर्दू  लिपि   की  जगह  देवनागिरी     लिपि    ही  रखी  ताकि हिन्दू  और मुस्लिम   गीता   के बारे में   जान सकें  .दो  वर्ष  की  मेहनत  के  बाद  मैंने  गीता   का उर्दू पद्यानुवाद  27  मई  2001  को  पूरा  कर दिया   ,  इसमे कुल 700 श्लोक   हैं ,और  कुल पंक्तियाँ  2800  हैं  . और कुल पृष्ठ 233  हैं  , जिसमे  प्रत्येक  पृष्ठ  में 12  पंक्तियाँ   है  .  मैंने  गीता के इस  उर्दू  काव्यानुवाद  का नाम  "गीता  सरल  "रखा   है .गीता  सरल  पढने के लिए इस  लिंक  को  खोलिए ,

निवेदक --पं. बृज  नंदन  शर्मा  -Ph-0755-4078540   Mob - 9171335143

http://geeta-urdu.blogspot.in/

4-गीता  कानून  से  हिन्दू धर्मग्रन्थ  है 

गीता की  पवित्रता  और महानता  अंगरेज  अदालतें   भी  मानती  थीं  , इसलिये  उन्होंने अदालत में  शपथ पूर्वक बयान देते समय  हरेक  हिन्दू  वादी -प्रतिवादी को  गीता  पर  हाथ  रख  कर कसम  खाने   का  कानून  बना  दिया  था  ,जो  आज भी  चल  रहा  है  , यही नहीं  वर्तमान  सुप्रीम  कोर्ट  ने  भी 2 जुलाई 1995 को   एक  फैसला  दिया   था

"court think that it is Vedanta, and Vedanta alone that can become the universal religion of man, and no other is fitted for the role
.
N. VENKATACHALA and S. SAGHIR AHMAD  
 . 
 the Supreme Court of India.New Delhi.July 2, 1995

इसलिए  सभी  हिन्दुओं  को चाहिए कि धर्म  के नाम पर  फैले हुए पाखण्ड  को त्याग  दें   , किसी भी  औलिआ बाबाओं  के चक्कर में न फसें  , और अपने घरों में  भगवद्गीता   लेकर  खुद  पढ़ें  और  अपने  बच्चों  को अर्थ  सहित  समझाएं   , इस से आपका पूरा परिवार संस्कारी  बनेगा  , और समाज भी  अपराध  मुक्त होगा   .  और  जितने भी  हिन्दू  संगठन   है वह  भगवद्गीता   को  राष्ट्रीयग्रन्थ   घोषित  करने   का प्रयास  करें  ,   सिर्फ एक  गीता ही  देश   की हालत सुधार  सकती   है   ,  क्योंकि  यह भगवान कृष्ण  का उपदेश  है  , जैसा की कहा है  ,


'गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यै शास्त्र विस्तरैः, या स्वयं पद्मनाभस्य  मुखपद्मविनिः सृतम्  "

अर्थ - गीता  को सुगीता  करिये  ,यानी उसका  पालन  करिये  ,  अन्य  शास्त्रों   के विस्तार  को नहीं  देखिये  ,  गीत तो स्वयंही    भगवन  के मुख की वाणी  है

(200)

मंगलवार, 20 अगस्त 2019

आपको मालूम है कि जन्नत की हकीकत क्या है ?

विश्व के लगभग सभी धर्मों में स्वर्ग और नर्कके बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है.इन में सभी धर्मों की बातों में काफी समानता पायी जाती है.
लेकिन स्वर्ग या जन्नत के बारे में जो बातें लिखी गयी हैं वह सिर्फ पुरुषों को रिझाने वाली बातें लिखी गयी हैं.जैसे मरने के बाद जन्नत में खूबसूरत जवान हूरें मिलेंगी ,जो कभी बूढ़ी नहीं होंगी .उनकी उम्र हमेशा 14-15 साल की रहेगी.जन्नत वाले किसी भी हूर से शारीरिक सम्बन्ध बना सकेंगे.कुरआन में एक और ख़ास बात बतायी गयी है कि जन्नत में हूरों के अलावा सुन्दर लडके भी होंगे ,जिन्हें गिलमा कहा गया है .
शायद ऐसा इसलिए कहा गया होगा कि अरब और ईरान में समलैंगिक सेक्स आम बात है. आज भी पाकिस्तान में पुरुष वेश्यावृत्ति होती है .
इसलिए अक्सर जन्नत के मजे लूटने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं.लोगों ने जन्नत के लालच में दुनिया को जहन्नुम बना रखा है .इस जन्नत के लालच और जहन्नुम का दर दिखा कर सभी धर्म गुरुओं की दुकानें चल रही हैं .भोले भाले लोग जन्नत के लालच में मरान्ने मारने को तैयार हो जाते हैं ,यहाँ तक खुद आत्मघाती बम भी बन जाते हैं.
पाहिले शुरुआती दौर में तो मुसलमान हमलावर लोगों को तलवार के जोर पर मुसलमान बनाते थे.लेकिन जब खुद मुसलाम्मानों में आपस में युद्ध होने लगे तो मुसलामानों के एक गिरोह इस्माइली लोगों ने नया रास्ता अख्तियार किया .जिस से बिना खून खराबा के आसानी से आसपास के लोगोंको मुसलमान बनाता जा सके.
नाजिरी इस्मायीलिओं के मुजाहिद और धर्म गुरु "हसन बिन सब्बाह "सन-1090--1124 ने जब मिस्र में अपनी धार्मिक शिक्षा पुरीकर चकी तो वह सन 1081 में इरान के इस्फ़हान शहर चला गया .और इरान के कजवीन प्रान्त में प्रचार करने लगा.वहां एक किला था जिसे अलामुंत( الموت‎‎ ) कहा जाता है.यह किला तेहरान से 100 कि मी दूर,केस्पियन सागर के पास है 
 .उस समय किले का मालिक सुलतान मालिक शाह था.उन दिनों चारों तरफ युद्ध होते रहते थे.कभी सल्जूकी कभी फातमी आपस में लड़ते थे.इसलिए सुलतान ने किले की रक्षा के लिए अलवी खानदान के एक व्यक्ती कमरुद्दीन खुराशाह को नियुक्त कर दिया था.उनदिन किला खाली पडा था..हसन बिन सब्बाह ने किला तीन हजार दीनार में खरीद लिया.
हसन को वह किला उपयोगी लगा ,क्यों कि किला सीरिया और तेहरान के मार्ग पर था .जिसपर काफिलों से व्यापार होता था.
किला एक सपाट फिसलन वाली पहाडी पर है .किले की ऊंचाई 840 मीटर है .लेकिन वहां पानी के सोते हैं.किले की लम्बाई  400मीटर और चौडाई 30 मीटर है..इसके बाब हसन ने अपने लोगों और कुछ गाँव के लोगों के साथ मिलकर काफिले वालों से टेक्स लेना शुरू कर दिया. इससे हसन को काफी दौलत मिली.उसके बाद हसन ने किले में तहखाने और सुरंगें भी बनवा लीं.जब किला हराभरा हो गया तो ,हसन ने किले में एक नकली जन्नत भी बनाली.जैसा कुरआन में कहा गया है,हसन आसपास के गाँव से अपने आदमियों द्वारा सुन्दर ,और कुंवारी जवान लडकियां उठावा लेताथा. और लड़किओं को अपनी जन्नत के तहखानों में कैद कर लेता था.हसन ने इस नकली जन्नत में एक नहर भी बनवाई थी ,जिसमे हमेशा शराब बहती रहती थी.किले वह सब सामान थे जो कुरआनमें जन्नत के बारे में लिखे हैं.,
1-जन्नत का नजारा 


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फिर जब हसन के लोग आसपास के गाँव में धर्म प्रचार करने जाते तो लोगों को विश्वास में लेकर उन्हें हशीस पिलाकर बेहोश कर देते थे.और जब लोग बेहोश हो जाते तो उनको उठाकर किले में ले जाते थे .उनसे कहते कि अल्लाह तुम से खुश है ,अब तुम जन्नत में रहो.लोग कुछ दिनों तक यह नादान लोग खूब अय्याशी करते और समझते थे कि वे जन्नत में हैं.फिर कुछ दिनों मौजा मस्ती करवाने के बाद लोगों दोबारा हशीश पिलाकर वापिस गाँव छोड़ दिया जाता .एक बार जन्नत का चस्का लग जाने के बाद लोग फिर से जन्नत की इच्छा करने लगते तो ,उनसे कहा जाता कि अगर फिर से जन्नत में जाना चाहते हो तो हमारा हुक्म मानो .लोग कुछ भी करने को तैयार हो जाते थे.ऐसे लोगों को हसिसीन( Assisins) कहा जाता है .मार्को पोलो ने इसका अपने विवरणों में उल्लेख किया है आज भी लोग जन्नत के लालच में निर्दोषों की हत्याएं कर रहे हैं.

यह जन्नत बहुत समय तक बनी रही.जब हलाकू खान ने 15 दिसंबर 1256 को इस किले पर हमला किया तो किले के सूबे दार ने बिना युद्ध के किला हलाकू के हवाले कर दिया.जब हलाकू किले के अन्दर गया तो देखा वहां सिर्फ अधनंगी औरतें ही थी.हलाकू ने उन लडाकिन से पूछा तुम कौन हो ,तो वह वह बोलीं "अना मलाकुन"यानी हम हूरें हैं.
यह किला आज भी सीरिया और ईरान की सीमा के पास है .सन 2004 के भूकंप में किले को थोडासा नुकसान हो गया .लेकिन आज बी लोग इस किले को देखने जाते हैं .और जन्नत की हकीकत समाज जाते हैं कि जैसे यह जन्नत झूठी है वैसे ही कुरआन में बतायी गयी जन्नत भी झूठ होगी
2-जन्नत के खंडहर 

http://i-cias.com/e.o/slides/assassins03.jpg

यह लेख पाकिस्तान से प्रकाशित पुस्तक "इस्माईली मुशाहीर "के आधार पर लिखा गया  है  -
प्रकाशक अब्बासी लीथो आर्ट .लयाकत रोड -कराची

नोट -यह उर्दू पुस्तक हमने कराची में खरीदी  थी  जब 27 मई   1983 को हम पाकिस्तान  गए  थे ,वहीँ  हमने जिन्ना का मकबरा  भी  देखा  था ,संगमरमर के मकबरे  पर  एक जगह लिखा है  ,

 "बंदगी पर नहीं  मौक़ूफ़  मेरा लुत्फ़ो करम ,मैंने जिस फर्द को चाहा उसे सुल्तान  किया  "

अर्थात - अल्लाह  कहता है  , मेरी कृपा  इबादत पर आधारित नहीं  , मैं  जिसको चाहूँ  सुल्तान बना  सकता हूँ  ,  जिन्ना  न तो बराबर नमाज पढता था और न  रोजे रखता  था  फिर भी वह पाकिस्तान  का पिता  यानी  बाबाये पाकिस्तान  बन  गया ,

बी एन शर्मा
 -भोपाल 19 मई 2010
(181/90)

ऐसा धर्म जिसमे ईश्वर का नाम लेना महापाप है !

इस समय विश्व में कई धर्म प्रचलित हैं.सब अपने धर्म को महान ,और अपने ईश्वर को सबसे बड़ा बताते हैं.आज तक कुछ धर्म के लोगों ने अपने ईश्वर के नाम पर जो जो अत्याचार ,खूनखराबा और अपराध किये हैं ,उस से सारी मानव जाति त्रस्तहै.इसमे इस्लाम का पहिला नंबर है.मुसलमान अल्लाह के नाम पर आज भी आतंकवाद ,सामूहिक हत्याए अल्लाह के नाम पर करते हैं.चाहे किसी निर्दोष का गला काटना हो ,या किसी औरत को कोड़े मारना हों.या किसी औरतको पत्थर मार कर मरना हो .मुसलमान अल्लाहो अकबर चिल्लाते हैं. ,चोरी ,जेबकतरी या किसी को लूटते समय बिस्मिल्ला जरूर बोलते हैं.अगर किसी मासूम गरीब लड़की को कोठे पर बिठाते हैं ,तो ग्राहक से कहते हैं ,नया माल है,बिस्मिल्ला करो
वैसे तो इस्लाम में शराब हराम बताते हैं ,लेकिन छुप कर शराब पीकर यह कहते है

 -"हाथ में जाम लिया और कहा बिस्मिल्ला ,यह न समझे कोई रिन्दों को खुदा याद नहीं."

लोग जब चाहे जहां चाहे ईश्वर का नाम चिल्लाते रहते हैं और ईश्वर का नाम लिख देते हैं .यहाँ तक वेश्याओं के घर में भी 786 लिखा होता है .

लेकिन यहूदी धर्म में उनके खुदा का नाम लेना या लिखना पाप है यदि कोई ईश्वर का नाम ले लेता है तो उसे प्रायश्चित के लिए उपवास करना होता है यदि कोई यहूदी धर्मगुरु ऐसा करे तो उसे चालीस दिनों का रोजा करना होता है इसका कारन यह है .
यहूदियों के धर्मग्रन्थ का नाम तौरेत और पैगम्बर का नाम मूसा है ,जिसे अंगरेजी में मोजेज(Moses) भी कहा जाता है कहा जाता है की खुदा ने मूसा को दस हुक्म दिए थे उसमे एक हुक्म यह भी था ,

"तू अपने खुदा का नाम व्यर्थ में नहीं लेना ,जो उसका नाम व्यर्थ लेगा खुदा उसे दोषी ठहराएगा "
हिब्रू में -"ला तिश्शा यथ शेम "

तौरेत -ख़ुरूज अध्याय 20 आयत 7

हिब्रू भाषा में ईश्वर के नाम में चार अक्षर हैं -योध -हे-वाव -हे ( יהוח ).इन अक्षरों को मिस्टिकल टेट्रा ग्रामmystical tetragramm) ,कहा हाता है .यहूदी इन चारों अक्षरों को मिल कर पढ़ने से डरते हैं .या लिखते हैं .जब भी तौरेत में यह अक्षर आते हैं तो यहूदी उसकी जगह अदोनाय या एलोहेनु बोलते हैं यानी मेरा स्वामी या मेरा प्रभु .सिर्फ साल में एकबार यहूदिओं  के  ईश्वर का नाम बोला जाता है .जिस समय यहूदिओं का त्यौहार शिमकत तोराह होता है.अर्थात तोराह दर्शन .वैसे  भी  अपने  से   बड़ों   का   नाम    लेना   , या  नाम  से  पुकारना  असभ्यता  और   पाप   है ,फिर  ईश्वर  तो  सबसे  बड़ा   है, बड़े  दुःख की बात है कि जो लोग खुद का आस्तिक और ईश्वर का भक्त बताते हैं वह भी अक्सर ज़रा ज़रा  सी बात पर ईश्वर   और भगवान की  झूठी कसमें   खाते रहते ,और जब खुद के द्वारा किये गए बुरे  कर्मों का  फल मिलता है  तो कहते हैं  यह ईश्वर की इच्छा  है ,

पाहिले भी लोगों ने ईश्वर के नाम पर अनाचार किये थे.और पाप किये थे .शायद इसीलिए जैन और बौद्ध धर्मों में ईश्वर का कोई स्थान नहीं है

यह ईश्वर के नाम पर किये जाने वाले इंसान विरोधी कृत्य बंद होना चाहिए

बी एन शर्मा -भोपाल 
(181/101)6 मई 2010

सोमवार, 19 अगस्त 2019

महर्षि दयानंद और रानी लक्ष्मीबाई

पाश्चात्य   मानसिकता  से ग्रस्त  इतिहासकारों   ने  सन 1857  के   प्रथम स्वतन्त्रता  संग्राम   को  "ग़दर "   का  नाम   दिया   है  , और महर्षि  दयानंद   को किसी ने उन्हें समाज सुधारक कहकर, तो किसी ने उन्हें विद्वान्‌ संन्यासी मात्र कहकर अपने दायित्व से पल्ला झाड़ा है। परन्तु यह बात निर्विवाद रूप से सत्य है कि यदि ऋषि दयानन्द न होते, तो देश को स्वतन्त्रता मिलना इतना आसान न होता .क्योंकि      महर्षि  दयानन्द   के  समय  लगभग   पूरे   भारत  पर  अंगरेजों    का  शासन  था  , कुछ   भागों   में  छोटी   छोटी  कई  रियासतें   भी  थी  ,लेकिन      वहां  से  राजा   अक्सर  एक दूसरे   से  लड़ते  रहते   , देश    में    बार  बार  अकाल  पड़  जाता   था   ,  चालाक  अंगरेज अपनी  " फूट  डालो  और  राज  करो "   की नीति   से  देश को  खंडित  कर  रहे  थे  , देश   में  अनेकों   मत , संप्रदाय   , पैदा  हो  गए 
  थे  , इसलिए   महर्षि  दयानंद  ने  हिन्दुओं   में  एकजुटता   स्थापित करने  के  लिए " वेदों की ओर चलो  "  यह  नारा   दिया  था  , क्योंकि   वेदों पर  सभी हिन्दू   आस्था  रखते  हैं ,इसलिए  देश  में   पुनः  वैदिक   धर्म   की  स्थापना और उस समय धर्म   के  नाम  पर  प्रचलित  अंधविश्वास  , पाखंड  , कुरीतियां   , और  मान्यताओं  का  खंडन    करने  के  लिए  महर्षि   दयानंद   ने   लगभग  पुरे   भारत    का  प्रवास   किया    ,  और   अनेकों  धर्म   के  धुरंधर विद्वानों   से  शास्त्रार्थ   किया  और  और   उन्हें  परास्त  करके उनके   सामने सिद्ध   कर   दिया  की वेदों  में प्रतिपादित  धर्म  ही वास्तविक   और   सार्वभौमक    धर्म   है  ,महर्षि  दयानंद  केवल  धर्मसुधारक   और  धर्मप्रचारक   नहीं  थे बल्कि  उनको  देश  और  देसवासियों  के प्रति अटूट  प्रेम  था   ,  उन्होंने संकल्प लिया कि इस देश के नागरिकों को अपने वर्तमान का ज्ञान हो, अपने गौरवशाली अतीत की अनुभूति हो और उनमें भ्रष्टाचार, अज्ञान, अभाव, अन्याय तथा आन्तरिक कलह के गर्त से निकलकर राष्ट्र को स्वतन्त्र कराने के लिए तड़प हो, ऐसे राष्ट्र का निर्माण होना चाहिए।

1-स्वतंत्रता  का  प्रथम  उद्घोष 
अपने    भारतभ्रमण   के दौरान देशवासियों   की  दुर्दशा  देख  कर  महर्षि  इस    निष्कर्ष  पर    पहुंचे  कि पराधीन    अवस्था  में  धर्म  और  देश  की रक्षा  करना  कठिन  होगा  , अंगेजों  की  हुकूमत  होने पर  भी  महर्षि    ने  निडर  होकर उस   समय   जो  कहा  था   , वह  आज   भी  सत्यार्थप्रकाश   में  मौजूद   है  ,  उन्होंने  कहा था ,
"चाहे कोई कितना ही करे, किन्तु जो स्वदेशी राज्य होता है, वह सर्वोपरि उत्तम होता है। किन्तु विदेशियों का राज्य कितना ही मतमतान्तर के आग्रह से शून्य, न्याययुक्त तथा माता-पिता के समान दया तथा कृपायुक्त ही क्यों न हो, कदापि श्रेयस्कर नहीं हो सकता''

महर्षि  दयानंद   ने  यह    बात   संवत 1913  यानी  सन 1855 हरिद्वार    में  उस    समय   कही   थी    जब   वह नीलपर्वत   के  चंडी  मंदिर   के  एक कमरे में   रुके   हुए   थे  , उन   को  सूचित   किया   गया  कि  कुछ  लोग  आपसे   मिलने  और मार्ग दर्शन  हेतु   आना   चाहते   हैं    ,  वास्तव   में  लोग  क्रांतिकारी  थे   , उनके  नाम  थे
.
1.धोंडूपंत - नाना   साहब  पेशवा   ( बालाजी  राव   के   दत्तक  पुत्र )
.2. बाला साहब .
3.अजीमुल्लाह  खान .
4.ताँतिया  टोपे .
5.जगदीश पर  के राजा   कुंवर  सिंह .

इन   लोगों   ने महर्षि   के  साथ   देश  को   अंगरेजों   से  आजाद  करने   के बारे में   मंत्रणा  की   और   उनको  मार्ग   दर्शन   करने  का  अनुरोध  किया  ,निर्देशन   लेकर  यह  अपने अपने क्षेत्र     में   जाकर  क्रांति  की  तैयारी   में   लग  गए   , इनके  बारे  में    सभी   जानते   हैं
 ,
2-महर्षि  और   लक्ष्मीबाई  की मुलाकात 

सन्‌ 1855 ई. में स्वामी जी फर्रूखाबाद पहुंचे। वहॉं से कानपुर गये और लगभग पॉंच महीनों तक कानपुर और इलाहाबाद के बीच लोगों को जाग्रत करने का कार्य करते रहे। यहॉं से वे मिर्जापुर गए और लगभग एक माह तक आशील जी के मन्दिर में रहे। वहॉं से काशी जाकर में कुछ समय तक रहे.स्वामीजी के काशी प्रवास के दौरान झांसी की रानी लक्ष्मीबाई उनके मिलने गई .रानी    ने   महर्षि    से  कहा  कि " मैं  एक   निस्संतान  विधवा  हूँ   , अंग्रजों  ने  घोषित  कर  दिया  है  कि  वह   मेरे  राज्य   पर  कब्ज़ा  करने   की  तैयारी   कर  रहे   हैं   ,और  इसके  झाँसी  पर  हमला  करने   वाले  हैं.  अतः  आप   मुझे  आशीर्वाद  दीजिये  कि मैं  देश   की  रक्षा  हेतु  जब  तक  शरीर में  प्राण  हों फिरंगियों  से  युद्ध   करते  हुए शहीद   हो  जाऊँ .महर्षि   ने  रानी   से  कहा   ," यह   भौतिक  शरीर  सदा  रहने वाला    नहीं   है   ,  वे  लोग  धन्य  हैं   जो ऐसे  पवित्र   कार्य  के लिए अपना  शरीर न्योछावर   कर  देते   हैं  , ऐसे   लोग  मरते   नहीं   बल्कि  अमर  हो  जाते  हैं  , लोग  उनको     सदा  आदर  से   स्मरण   करते  रहेंगे , तुम  निर्भय  होकर तलवार  उठाओ विदेशियों  का साहस से  मुकाबला  करो "
अंगरेजों  द्वारा  ली  गयी  फोटो 

http://www.copsey-family.org/~allenc/lakshmibai/rani.jpeg

उस   समय  तक  झाँसी   पर  अंगरेजों  ने  कब्जा   नहीं किया  था  , और  झाँसी   के  किले  पर रानी   का  झंडा  फहरा   रहा था.
झाँसी   के  ध्वज    का  चित्र 

http://www.rbvex.it/asiagif/jhansi.gif

 3-अंगरेजों   की  हड़प नीति 
(Doctrine of lapse)

अंगरेज भारत में  व्यापार  करने के  बहाने  अये थे  ,लेकिन    उनका उद्देश्य  पूरे  भारत  में ब्रिटिश  राज्य  की  स्थापना   करना  था  , इसके लिए  वह  जिस  भी  राजा   से व्यापार  करने  के लिए अनुमति  देने का  अनुबंध  करते   थे   ,उसमे   कुछ  शर्तें   भी  रख  देते   थे  , जैसे अंगरेज  अपनी  सुरक्षा के  लिए  सैनिकों  की  टुकड़ी रख  सकेंगे   , जिसका  खर्च   वह राज्य  देगा  , बदले   में अंगरेज  सेना  उस राज्य   की  रक्षा  करेगी  . और  दूसरी  शर्त  थी  कि  यदि  कोई  राजा   निस्संतान   मर    जायेगा   ,  तो अंगरेजी    सरकार  को  उस  राज्य    को   ब्रटिश  साम्राज्य   में  शामिल  करने   का  अधिकार  होगा .
4-झांसी  का  विलय 
(Annexation of Jhansi)

सन 1842  को  लक्ष्मी  बाई  का  विवाह  झाँसी   के  राजा   गंगाधर  राव  नेवालकर  से  हुआ   था   , लेकिन    वह  अक्सर  बीमार  रहते  थे   ,  सन 1852  में  उनका  स्वास्थ्य    बहुत   बिगड़   गया   ,  लोगों  के  आग्रह  से  उन्होंने  दामोदर  राव  नामके  एक   बालक   को अपना  दत्तक  पुत्र  और भावी  राजा  घोषित  कर  दिया  , लेकिन   दुर्भाग्य  से  21  नवम्बर  1853  को  गंगाधर  का  देहांत   हो  गया  , तब  अंगरेजों  ने  झाँसी  राज्य    पर  कब्ज़ा  करने  के लिए  एक  चाल  चली   .  उन्होंने  27  फरवरी  1854  को   रानी    को   एक  पत्र  भेजा  .जो  अंगरेजी   भाषा   में  था , (पूरा  पत्र इस  लिंक   में   है ).डलहौजी   के  इस  पत्र  को   बुंदेली  भाषा   में  खरीता   कहा  गया    है  . 

http://www.copsey-family.org/~allenc/lakshmibai/feb-27-1854.html

5-खरीता  से मेरे  परदादा का सम्बन्ध
मेरे  परदादा   का  नाम  पंडित  सरयूप्रसाद    था   , इनका   जन्म  तहसील   ललितपुर   के   कुम्हेड़ी ग्राम   में  सन 1823  में   हुआ  था   .  वह   पुरोहित  का  कार्य  और  बच्चों   को  पढाने  का   काम   करते   थे  , एक   बार  तालबेहट  के  राजा   ने  कई  पंडितों      को   बुलाकर   यज्ञ  करवाया  ,   उनमे     मेरे  परदादा  भी  थे   , उन  दिनों  अंगरेज  झाँसी  में    अंगरेजी     छावनी का  विस्तार  कर  रहे  थे   ,  और नए   सैनिकों   की   भर्ती   कर रहे  थे   ,    जिन   में  हिन्दू   और  मुस्लिम  भी  थे   , अंगरेज सैनिकों  के  धार्मिक  कार्यों   के  लिए   पंडितों  और    मौलवियों   को  भी  रखते  थे   ,  तालबेहट  के  राजा   ने  मेरे  परदादा  का  नाम  अंगरेज अफसर  को  सुझा  दिया   ,  और  मेरे   परदादा    झाँसी  में  आ  गए   ,  छावनी  में  उनकी   मित्रता  हण्टिंग फोर्ड    नामके  ईसाई  पादरी  से  हुई   ,   जिसको   वह   अक्सर " हंडी फोड  " भी   कह  देते थे ,और जिस  से  उन्होंने    अंगरेजी  सीखी   , 

और   जब  डलहौजी   का  दूत झांसी    को  अंगरेजी  राज  में  शामिल   हो  जाने   का  आदेश झाँसी   की  रानी   के  सामने  पढ़  कर  सुना  चूका  तो ,रानी    बोली तुमने  जो भी  बोला   इसे सारांश  में      बताओ   मुझे  अंगरेजी   नहीं  आती  ,

तब    मेरे  परदादा   सरयू  प्रसाद  ने  जोर  से   रानी  से  कहा,
 ( जो  बुंदेली भाषा  में  है )

"  डलहौजी   ने  अपनो निरनय लिख दओ मिसल अठ पेजी में  ,

झाँसी   को सब  राजपाट      सामिल हो    गओ    अंगरेजी   में "

भले   ही   लोग   इस   बात   पर    विश्वास   नहीं  करें   लेकिन    यह   बात   बिलकुल  सत्य   है   , और   चार   पीढ़ी  से   मौखिक   रूप  से    विरासत   के  रूप   में  याद    रखी  जाती   है   , 
मेरी  दादी   मुझे   बताया  करती  थी  कि  बब्बा    यानी  उनके  ससुर   कहा करते  थे , वॉयस राय के दूत की   बात    सुनते   ही  रानी  जोश  में  आकर गद्दी   से   उठी  और उछल  कर    अंगरेज  दूत  की   छाती पर  एक   लात  मार कर  गरजी  " मी  ,माझी  झांशी देणार  नाहीं "अर्थात मैं अपनी  झाँसी   नहीं  दूंगी   ,
रानी   की  यह बात   जैसे    ही   अंगरेज   अफसरों  को   पता चली  उन्होंने झाँसी पर  हमला   कर  दिया और  किले   को घेर    लिया  ,और युद्ध शुरू   हो  गया  , आखिर  में  रानी   ने   महर्षि  दयानंद    से   जो  आशीर्वाद  माँगा  था  उसे  पूरा  करके  दिखा दिया   , 
जिन महर्षि दयानन्द सरस्वती ने रानी को  स्वराष्ट्र के प्रति कर्त्तव्योन्मुख किया है, और    जिस  रानी  लक्ष्मी  बाई    ने  महर्षि    शिक्षा   का  पालन  किया .क्या उसके प्रति हमारा कोई दायित्व और कर्त्तव्य नहीं है?

अनुरोध - यह पांच  साल पहले  लिखा गया प्रामाणिक लेख है  इसलिए अपने सभी पाठकों  और विशेषकर महर्षि दयानन्द अपना आदर्श मैंने वालों  सेअनुरोध  करते  हैं  कि यह लेख सबको  भेजने का  कर्तव्य निभाएं

बी.   एन. शर्मा 


(295) 07/10/2015

रविवार, 18 अगस्त 2019

भगवान राम की बहिन की उपेक्षा क्यों ?

यह  हिन्दू  समाज   की  अज्ञानता     नहीं   तो  और  क्या  है ,कि  जिस राम  के नाम  से   हिन्दू धर्म   टिका   हुआ है   ,  लगभग  90  प्रतिशत   हिन्दू  भगवान  राम  की   बड़ी  सगी  बहिन   शांता  और  उनके  पति श्रृंगीऋषि  के बारे में   नहीं   जानते  ,   और   यह   उन  हिन्दू  आचार्यों   का   शांता  के प्रति आदर  भाव  नहीं    है   जो  ऐरे गैरे      देवी   देवताओं   की  जगह  जगह   मूर्तियां  और   मंदिर   बनवा   देते हैं   ,  लेकिन  राम की बहिन  शांता   का  भारत में    मात्र   एक   ही  मंदिर   बनवा  पाये   , हिन्दुओं  में  राम  की  बहिन  शांता    के बारे में अनभिज्ञता  का  असली  कारण  मुग़ल  बादशाह   अकबर  के  समय  तुलसी  दास  द्वारा  रामचरित   मानस   है  , जिसे  कथावाचक गा  गा  कर  लोगों   को  सुनाते रहते हैं    , और  लोग  उसी को   राम का इतिहास   समझ लेते हैं  ,  लोग   महर्षि  वाल्मीकि  द्वारा  लिखित "रामायण "  इसलिए नहीं  पढ़ते  क्योंकि   वह  संस्कृत में   है  , और  उसको  सुनाने    में   पंडितों  को  कमाई  नहीं  होती  .  जबकि   वाल्मीकि  रामायण   प्रामाणिक   इतिहास  है

1 - वाल्मीकि  रामायण   प्रामाणिक  क्यों है 
वाल्मीकि   रामायण  को   प्रामाणिक  . विश्वनीय  और  राम सम्बंधित  ऐतिहासिक  धार्मिक ग्रन्थ  इसलिए  माना   जाता   है  , क्योंकि  वाल्मीकि  राम  के  समकालीन  थे  , और  उन्हीं के  आश्रम  में  ही  राम  के पुत्र लव  और कुश   का  जन्म   हुआ था  ,और  राम  के बारे में जो भी  जानकारी  उनको मिलती  थी  यह  रामायण  में  लिख  लेते  थे  ,  रामायण  इसलिए  भी  प्रामाणिक   है   की   वाल्मीकि  रामायण  के  उत्तर काण्ड  के  सर्ग 94  श्लोक  1  से 32  के  अनुसार  राम के  दौनों  पुत्र  लव  और कुश  ने   राम  के  दरबार  में  जाकर  सबके  सामने  रामायण   सुनाई  थी  ,  जिसे राम  के  सहित  सभी  ने  सुना था


2-राम  की  बहिन  होने  का  प्रमाण  

जो  लोग  राम  की बहिन  होने  पर  शंका   करते  हैं   , वह  वाल्मीकि  रामायण   के   बालकांड  इन   श्लोकों   को   ध्यान  से पढ़ें  , इनका हिंदी  और  अंगरेजी  अर्थ    दिया गया  है


इक्ष्वाकूणाम् कुले जातो भविष्यति सुधार्मिकः |
नाम्ना दशरथो राजा श्रीमान् सत्य प्रतिश्रवः || काण्ड 1 सर्ग 11 श्लोक 2

अर्थ - ऋषि   सनत  कुमार    कहते  हैं  कि  इक्ष्वाकु   कुल   में  उत्पन्न दशरथ   नाम  के   धार्मिक  और  वचन  के पक्के  राजा  थे  ,

"A king named Dasharatha will be born into Ikshwaku dynasty who will be very virtuous, resplendent and truthful one to his vow." [Said Sanat Kumara, the Sage.] [1-11-2]

अङ्ग राजेन सख्यम् च तस्य राज्ञो भविष्यति |
कन्या च अस्य महाभागा शांता नाम भविष्यति || काण्ड 1 सर्ग 11 श्लोक 3

अर्थ - उनकी  शांता   नामकी  पुत्री     पैदा हुई   जिसे  उन्होंने अपने मित्र   अंग  देश   के  राजा  रोमपाद  को   गोद   दे दिया  , और  अपने  मंत्री  सुमंत  के कहने पर उसकी शादी श्रृंगी ऋषि   से  तय   कर दी  थी   ,


Shanta is  the daughter of Dasharatha and given to Romapada in adoption, and Rishyasringa marries her alone. This is what Sumantra says to Dasharatha at 1-9-19.

अनपत्योऽस्मि धर्मात्मन् शांता भर्ता मम क्रतुम् |
आहरेत त्वया आज्ञप्तः संतानार्थम् कुलस्य च || काण्ड 1 सर्ग 11 श्लोक 5


Then king Dasharatha says to king of Anga "oh, righteous one, I am childless and hence I intend to perform a Vedic ritual. Let the husband of your daughter Shanta, Sage Rishyasringa, preside over that Vedic ritual at you behest, for the sake of progeny in my dynasty. [1-11-5]

अर्थ -तब   राजा   ने   अंग  के  राजा  से  कहा कि मैं   पुत्रहीन  हूँ  , आप शांता और उसके  पति  श्रंगी ऋषि   को  बुलवाइए मैं  उनसे पुत्र  प्राप्ति  के लिए  वैदिक  अनुष्ठान    कराना  चाहता  हूँ  ,

श्रुत्वा राज्ञोऽथ तत् वाक्यम् मनसा स विचिंत्य च |
प्रदास्यते पुत्रवन्तम् शांता भर्तारम् आत्मवान् || काण्ड 1 सर्ग 11 श्लोक 6

"On hearing those words of king Dasharatha that benevolent soul Romapada, the king of Anga, considers heartily and agrees to send the one who endows progeny by rituals, namely Sage Rishyasringa his son-in-law. [1-11-6]

अर्थ -दशरथ की  यह   बात  सुन   कर अंग  के राजा  रोमपाद  ने  हृदय  से   इस बात को   स्वीकार   किया ,और  किसी   दूत  से  श्रृंगीऋषि को  पुत्रेष्टि  यज्ञ  करने  के लिए  बुलाया

आनाय्य च महीपाल ऋश्यशृङ्गं सुसत्कृतम्।
प्रयच्छ कन्यां शान्तां वै विधिना सुसमाहित: काण्ड 1सर्ग 9 श्लोक 12

अर्थ -श्रंगी ऋषि  के  आने  पर  राजा   ने उनका  यथायोग्य   सत्कार  किया और   पुत्री शांता  से  कुशलक्षेम  पूछ  कर   रीति  के अनुसार  सम्मान किया

अन्त:पुरं प्रविश्यास्मै कन्यां दत्त्वा यथाविधि।
शान्तां शान्तेन मनसा राजा हर्षमवाप स:।।काण्ड 1 सर्ग10  श्लोक 31

अर्थ -( यज्ञ   समाप्ति  के  बाद ) राजा  ने शांता   को     अंतः पर  में  बुलाया  और और   रीति  के  अनुसार  उपहार     दिए  ,   जिस से  शांता  का मन    हर्षित  हो   गया .

 वाल्मीकि रामायण  के  यह  प्रमाण   उन  लोगों   की  शंका   मिटाने  के लिए  पर्याप्त  हैं  ,  जो  लोग मान  बैठे  है  ,कि  राम  की  कोई   भी बहिन   नहीं  है , वाल्मीकि  रामायण  के  अतिरिक्त   अन्य धार्मिक   और  ऐतिहासिक   ग्रंथों   में  राम  की बहिन   शांता  के बारे में  जो  भी  लिखा  है उसे  एकत्र  करके  एक  लेख   के  रूप   में  "Devlok, Sunday Midday, April 07, 2013  "ने  प्रकाशित   किया  था  ,  उसका  सारांश   यह   है  ,

3- कथा  भगवान राम की बहन "शांता" की

श्रीराम के माता-पिता, भाइयों के बारे में तो प्रायः सभी जानते हैं लेकिन बहुत कम लोगों को यह मालूम है कि राम की एक बहन भी थीं जिनका नाम शांता था। वे आयु में चारों भाइयों से काफी बड़ी थीं। उनकी माता कौशल्या थीं। राजा दशरथ और कौशल्या की पुत्री थी शांता . एक बार अंगदेश के राजा रोमपद और उनकी रानी वर्षिणी अयोध्या आए। उनके कोई संतान नहीं थी। बातचीत के दौरान राजा दशरथ को जब यह बात मालूम हुई तो उन्होंने कहा, मैं मेरी बेटी शांता आपको संतान के रूप में दूंगारोमपद और वर्षिणी बहुत खुश हुए। उन्हें शांता के रूप में संतान मिल गई। उन्होंने बहुत स्नेह से उसका पालन-पोषण किया और माता-पिता के सभी कर्तव्य निभाए।उनका विवाह कालांतर में शृंग ऋषि से हुआ था। कश्यप ऋषि  पौत्र थे शृंग ऋषि .
4-शृंग ऋषि का आश्रम
बाद में ऋष्यशृंग ने ही दशरथ की पुत्र कामना के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाया था। जिस स्थान पर उन्होंने यह यज्ञ करवाये थे वह अयोध्या से लगभग 39 कि.मी. पूर्व में था और वहाँ आज भी उनका आश्रम है और उनकी तथा उनकी पत्नी की समाधियाँ हैं।
हिमाचल प्रदेश में है शृंग ऋषि और देवी शांता का मंदिर ,हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में शृंग ऋषि का मंदिर भी है। कुल्लू शहर से इसकी दूरी करीब 50 किमी है। इस मंदिर में शृंग ऋषि के साथ देवी शांता की प्रतिमा विराजमान है। यहां दोनों की पूजा होती है और दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।
शृंग ऋषि का मंदिर 

http://4.bp.blogspot.com/-7TQKsHyk1rE/VQQQpvV3drI/AAAAAAAAQO0/NLzJEJ6B99U/s1600/25070656.jpg

5- अयोध्या  में राममंदिर  तभी बन पायेगा 

भारत   के  सभी   हिन्दू  संगठन  अयोध्या   में  राम  जन्म  भूमि  पर  एक  भव्य  मंदिर  बनवाने  के लिए   बरसों   से  प्रयास  करते  आये  हैं  ,लेकिन  किसी न किसी   कारण   से  पूरी   सफलता  नहीं   मिल   सकी  ,  मेरा   निजी   मत  है  कि  अयोध्या  में  जिस   जगह  राम  मंदिर  बनवाने की  योजना  है   यदि , वहीँ    राम  की   बहिन  शांता   की  मूर्ति   भी  स्थापित   कर  दी  जाये  तो   राम मंदिर   की सभी   अड़चनें      एक हफ्ते  में  दूर  हो जाएंगी  ,  क्योंकि   जो   राम   का  जन्म  स्थान  है  , वाही   राम  की  बड़ी  बहिन   शांता   का भी   है   ,  जिसके  आशीर्वाद  से राम का जन्म  हुआ  था  ,  और
हिन्दू जब  तक राम की  बहिन की उपेक्षा  करते  रहेंगे  अयोध्या  में  राम  मंदिर   नहीं  बन  सकेगा 

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मुहम्मद का अवतारी षडयंत्र !!

यह एक सर्वमान्य सत्य है कि कोई व्यक्ति कुछ समय के लिए सभी लोगों को धोखे में रख सकता , और बहुत से लोगों थोड़े समय तक , लेकिन सभी लोगों को सदा के लिए मूर्ख नहीं बना सकता .और यदि कोई ऐसा करने का प्रयास करता है , तो उसका भंडा जल्द ही फूट जाता है .आज पाखंडी बाबा , ढोंगी ज्योतिषी तांत्रिक ,अय्याश लालची औलिया फकीर , भोले लोगों को डरा कर या उनकी मुरादें पूरी करने के बहाने अपना घर भर रहे हैं .और अपने चेलों की संख्या बढ़ा है .उनके चेले तरह तरह की झूठी कहानियां सुना कर लोगों को ऐसे मक्कारों के ऐसे जाल में फंसा देते है जिस से निकलना असंभव होता है .क्योंकि यह बाबा, अवतार आदि लोगों की बुद्धि पर ताला लगा देते हैं
यह बाबागीरी , और फर्जी अवतार की पाखंड लीला सबसे पहले मुहम्मद साहब ने शुरू की थी .क्योंकि मुहमद साहब एक गरीब ऊंट चराने वाले , और किराये पर ऊंट देने वाले व्यक्ति थे . और हमेशा उनकी नजर तत्कालीन ईसाई देशों की सम्पति पर लगी रहती थी .इस बात को साबित करने के लिए हमें मुहम्मद साहब के उन रहस्यों का पर्दाफाश करना जरुरी है , जो मुसलमान छुपा लेते हैं ,
1 -मुहम्मद का असली नाम कासिम था 
 मुहम्मद  का पूरा  नाम   "अबुल कासिम मुहम्मद बिन अब्द इलाह बिन अब्दुल मुत्तलिब बिन  हिशाम बिन अब्दे मनाफ़ - ابوالقاسم محمد بن عبد الله  بن عبد المطلب بن هاشم بن عبد منافب" था , इस नाम का पूरा इतिहास इस प्रकार  है ,
 मुहम्मद साहब के खानदानी देवता का नाम " इलाह " था , जो चन्द्र लोक का स्वामी माना जाता था . इसी लिए मुहम्मद के पिता का नाम " अब्दे इलाह " रखा गया था . अर्थात " चन्द्र दास" ( slave of Moon god ) मुहम्मद का जन्म का नाम "कसिम- قثم - ," या'" कुसिम -قثم " था ,
जो कि उनके चाचा ने रखा था . अरबी इसका अर्थ "बर्बाद (Damaged ), जहरीला (Poisioned ),गन्दा ( Filthy )तिरस्कृत ( Reject )मुहम्मद के चाचा अबू तालिब ने ऐसा नाम इसलिए रखा था , क्योंकि मुहम्मद अपने पिता कि मौत के तीन साल बाद पैदा हुआ था .जब मुहमद के चाचा अब्दुल मुत्तलिब का लड़का कासिम 9 साल की आयु में मर गया , और अब्दुल मुत्तलिब बीमार रहने लगे , उसके तीन साल बाद मुहम्मद का जन्म हुआ था . और उसी के नाम पर मुहमद का नाम रखा गया
.
Muhammad's birth name was Qathem  - قُثَمُ " ,After the death of Qathem Ibn Abd-Al-Mu'taleb (Muhammad's Uncle) at the age of nine, three years Muhammad was born, his father Abd-Al-Mu'taleb felt so bad, so when the prophet was born, he named him Qathem

"لما مات قثم بن عبد المطلب قبل مولد رسول الله صلى الله عليه وسلم بثلاث سنين وهو ابن تسع سنين وجد عليه وجدا شديدا، فلما ولد رسول الله صلى الله عليه وسلم سماه قثم حتى أخبرته أمه آمنة أنها أمرت في منامها أن تسميه محمدا، فسماه محمدا


Book of Al Sirah Al-Halabia (Another name of the book,


 Insan Al-Ueoun Fe Serat Al-Ma'mun),-- V1 page 128 

मुहम्मद बचपन में खुद को ,, कसिम और कासिम कहते थे .

Muhammad calling himself Qotham or Qutham, Qathem in

(Beharul Anwar-   بحار الأنوار‎ - Vol.16 p.130) also called Bihar al-Anwar 

Prophet Muhammad's real name was Qathem.(विडियो देखिये )

http://www.youtube.com/watch?v=gCxHVXMh1cQ


2-कासिम से मुहम्मद बन गए 
चूँकि कासिफ नाम का अर्थ निंदनीय होता है , इसलिए करीब 30 की आयु में "कासिफ " में अपना नाम " मुहम्मद " रख लिया . जिसका मतलब प्रशंसित ( Praised ) होताहै , और कासिफ से बिलकुल विपरीत अर्थ रखता है .और कुरान में " मुहम्मद " का नाम सिर्फ   जगह मिलता है , जो इस प्रकार है

1."وَمَا مُحَمَّدٌ إِلَّا رَسُولٌ قَدْ خَلَتْ مِن قَبْلِهِ الرُّسُلُ أَفَإِن مَّاتَ أَوْ قُتِلَ انقَلَبْتُمْ عَلَىٰ أَعْقَابِكُمْ وَمَن يَنقَلِبْ عَلَىٰ عَقِبَيْهِ فَلَن يَضُرَّ اللَّـهَ شَيْئًا وَسَيَجْزِي اللَّـهُ الشَّاكِرِينَ ﴿آل عمران "
" मुहम्मद तो अल्लाह के रसूल हैं , और उन से पहले भी रसूल गुजर चुके हैं "
सूरा -आले इमरान 3 :144 

2.". مَّا كَانَ مُحَمَّدٌ أَبَا أَحَدٍ مِّن رِّجَالِكُمْ وَلَـٰكِن رَّسُولَ اللَّـهِ وَخَاتَمَ النَّبِيِّينَ وَكَانَ اللَّـهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمًا ﴿الأحزاب "
और मुहम्मद तुम में से किसी के पिता नहीं हैं , वह रसूल और नबियों के समापक हैं "
सूरा -अहजाब 33 :40 
3."وَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَآمَنُوا بِمَا نُزِّلَ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَهُوَ الْحَقُّ مِن رَّبِّهِمْ كَفَّرَ عَنْهُمْ سَيِّئَاتِهِمْ وَأَصْلَحَ بَالَهُمْ ﴿محمد "
"और जो कुछ भी मुहम्मद के ऊपर उतरा गया है , वह सर्वथा सत्य है '
 सूरा - मुहम्मद 47 :2
4."مُّحَمَّدٌ رَّسُولُ اللَّـهِ وَالَّذِينَ مَعَهُ أَشِدَّاءُ عَلَى الْكُفَّارِ رُحَمَاءُ بَيْنَهُمْ  "
" मुहम्मद अल्लाह के ऐसे रसूल हैं जो , काफिरों के प्रति क्रूर और अपने लोगों के प्रति दयालु हैं "
सूरा - अल फतह 48 :29 

इस तरह से कासिम ने अपना नाम मुहम्मद रख कर खुद को रसूल घोषित कर दिया , और अरब के जाहिल , लोगों ने जिहाद के लूट के माल के लालच में मुहमद को रसूल मान लिया .
3-पोप को धमकाया 
मुहम्मद के समय सभी धनवान ईसाई देश रोम स्थित पोप के अधीन थे , लोग पोप को पृथ्वी पर ईसा मसीह का प्रतिनिधि मानते थे .मुहम्मद के समय सभी धनवान ईसाई देश रोम स्थित पोप के अधीन थे , लोग पोप को पृथ्वी पर ईसा मसीह का प्रतिनिधि मानते थे .इस लिए लगभग सन 622 मुहम्मद ने ईसाइयों के धर्मगुरु पोप (Benedict XVI; Pope of the Roman Catholic Church)को अपने लोगों के हाथों एक पत्र भेजा , जिसमे लिखा था ,
"من محمد بن عبد الله إلى هرقل عظيم الروم: سلام على من اتبع الهدى، أما بعد فإنى أدعوك بدعوة الإسلام . أسلم تسلم ويؤتك الله أجرك مرتين ، فإن توليت فإن عليك إثم الأريسيِّين. {قل يا أهل الكتاب تعالوا إلى كلمة سواء بيننا وبينكم ألا نعبد إلا الله ،ولا نشرك به شيئا،ولا يتخذ بعضنا بعضا آربابا من دون الله فإن تولوا فقولوا اشهدوا بأنا مسلمون 

""सलाम है उन लोगों पर जो मेरे अल्लाह पर पर ईमान रखते हैं , मैं भी ईसा , मरियम ,और उन सभी किताबों पर ईमान रखता हूँ , जो अल्लाह ने मूसा , इब्राहीम , याकूब ,और ईसा को प्रदान की हैं .मैं उनमे कोई अंतर नहीं करता , और अल्लाह ने मुझे तुम लोगों का मार्ग दर्शन करने के लिए रसूल बनाकर भेजा है और तुम्हारी इसी बात में भलाई है , कि मुझे रसूल स्वीकार करके मुसलमान बन जाओ .क्योंकि अल्लाह ने मेरा नाम " अहमद " इसी लिए रखा है .इसी के साथ मुहम्मद ने एक पत्र रोम के सम्राट " कैसर ( Ceasar ) को भी भेजा था .लेकिन जब पोप के सामने ,और कैसर के दरबार में मुहम्मद के पत्र पढ़ कर सुनाये गए तो ईसाई गुस्से से आगबगूला हो गए .उन लोगों ने मुहम्मद का पत्र लाने वालों की पीट पीट कर वहीँ पर हत्या कर दी .मुहम्मद साहब योजना असफल हो गयी .
4-मुहम्मद से अहमद बन गए 
जब मुहम्मद पोप और कैसर को मुसलमान बनाने में असफल हो गए , तो उन्होंने दूसरी चाल चली . मुहम्मद अनपढ़ नहीं बल्कि काफी चालाक व्यक्ति थे . उनको ईसाई धर्म की किताब " इंजील " ( New Testament ) का पूरा ज्ञान था , जिसमे ईसा मसीह ने ,अपने शिष्यों को पवित्रात्मा देने का भरोसा दिया गया है ,ग्रीक भाषा में इसे " पारा क्लीट"( paraklēto (παράκλητον) कहा गया है और दूसरा सहायक भी कहा गया है .इस ग्रीक शब्द के अंगरेजी में counsellor', comforter',helper' or ‘advocate'. होते हैं मुहम्मद ने बड़ी चालाकी से इस शब्द का अर्थ अरबी में " अहमद " कर दिया , और कुरान में लिख दिया

"وَإِذْ قَالَ عِيسَى ابْنُ مَرْيَمَ يَا بَنِي إِسْرَائِيلَ إِنِّي رَسُولُ اللَّـهِ إِلَيْكُم مُّصَدِّقًا لِّمَا بَيْنَ يَدَيَّ مِنَ التَّوْرَاةِ وَمُبَشِّرًا بِرَسُولٍ يَأْتِي مِن بَعْدِي اسْمُهُ أَحْمَدُ   "
" ईसा ने कहा हे इस्राएल के लोगो , मैं अल्लाह का रसूल हूँ , जो पिछली किताब तौरेत की पुष्टि करता हूँ . और एक शुभ सूचना देता हूँ कि मेरे बाद जो सहायक आएगा उसका नाम " अहमद " होगा "
सूरा -अस सफ्फ 61 :6 

5-बाइबिल में अहमद बताना 
जिस तरह आजकल के मक्कार मुल्ले हिन्दू ग्रंथों का अनर्थ करके मुहम्मद को अंतिम अवतार , कल्कि अवतार बता कर हिन्दुओं को मुस्लमान बनाने का षडयंत्र करते रहते हैं , वैसे ही मुहम्मद साहब ने बाइबिल के नए नियम की पुस्तक यूहन्ना के अध्याय 14 : 15 , 25 और अध्याय 15 :26 का सहारा लेकर मुहम्मद उर्फ़ अहमद को मुहम्मद का दूसरा अवतार बनाना चाहा था , लेकिन पोल खुल गयी .देखिये बाइबिल क्या कहती है ,

" ईसा ने कहा तुम मेरे आदेशों का पालन करो . मैं अपने पिता से निवेदन करूंगा कि वह तुम्हारे लिए एक सहायक भेज दें .जो सदा तुम्हारे साथ रहेगा .जो एक आत्मा है ,जिसे संसार पकड़ नहीं सकता .क्योंकि वह उसे देख नहीं सकता .लेकिन वह तुम्हारे अन्दर और तुम्हीं के बीच में रहेगा "
बाइबिल नया नियम - यूहन्ना . अध्याय 14 आयत 15 से 18 

दूसरी जगह कहा है " परन्तु जब वह सहायक , जिसे मैं अपने पिता के यहाँ से तुम्हारे पास भेजूंगा , वह सत्य का आत्मा है .जो पिता से आता है "
यूहन्ना .अध्याय 15 आयत 26 

6-अहमद पाराक्लीट नहीं है 
यदि हम बाइबिल की आयतों को ध्यान से पढ़ें तो पता चलेगा ईसा मसीह ने जिस सहायक की बात की है , उसमे अहमद उर्फ़ मुहम्मद के एक भी लक्षण नहीं मिलते हैं . जैसे ,
1. उसे पिता ने नहीं भेजा 2 . वह आत्मा है , अहमद आत्मा नहीं है . 3 . सहायक अमर है . अहमद मरने वाला है . 4 . सहायक दिल में रहेगा . अहमद संसार में रहता है .5 .सहायक अद्रश्य है , अहमद को देख सकते हैं .और सबसे बड़ी बात यह है कि मुहम्मद किसी के दूसरी बार जन्म लेने या आने को नहीं मानते थे . यानि किसी के अवतार होने को कुफ्र बताते थे .इसीलिए ईसाइयों ने मुहम्मद को बाइबिल के अहमद यानि पाराक्लीट मानने से साफ इंकार कर दिया .और पाखंडी साबित कर दिया .
7-मुहम्मद पर पोप का निर्णय 
अंगरेजी अख़बार The Guardian दिनांक 11 अक्टूबर 2007 को पोप Benedict X V I ने एक सभा बुलाई . और मुहमद के पत्र को निकलवाया . उस समय पोप के सभी आर्क बिशप और 138 मुस्लिम विद्वान् भी थे .और सभी लोगों ने मुहम्मद के पत्र पर चर्चा की . और मुहम्मद के अल्लाह के रसूल होने के दावे की जाँच करने के बाद यह निर्णय दिया .

"Our current hypothesis about Mahomet, that he was a scheming Imposter, a Falsehood incarnate, that his religion is a mere mass of quackery and fatuity, begins really to be now untenable to anyone. The lies, which well-meaning zeal has heaped round this man, are disgraceful to ourselves only.'

." हमारे आकलन के अनुसार मुहम्मद एक ठग , झूटा अवतार , और षडयंत्रकारी था .जो अपने दैहिक सुखों के लिए लोगों को अपनी बेतुकी बातों में फंसा कर गुमराह करता रहता था वह किसी बात पर नहीं टिकता था , और उसने कल्पित बातों का ढेर कर रखा था .जिस से उसकी नीयत और सच्चाई पर शंका होती है .खुद मुहम्मद का , और उसका समाज में सम्मान करना बड़े शर्म की बात है  "
जिस तरह पोप बेनेडिक्ट ने मुहम्मद साहब दे धमकी भरे पत्र , के साथ कुरान की उन आयातों , जिनमे मुहम्मद साहब को अवतार बताने का दावा किया था और बाइबिल को मुस्लिम विद्वानों के सामने पढ़ा , और मुहम्मद साहब को पाखंडी अवतार या रसूल घोषित कर दिया ,उस से हिन्दू आचार्यों को शिक्षा लेना चाहिए .फिर भी हम मुहमद साहब को अवतार नहीं मान सकते , कोई कितने भी दावे करे , हम पर कोई असर नहीं होगा .

" ठुकरा के आगे बढ़ गयी , अपनी निगाहे नाज - जलवे हजारों बार वोह दिखला के रह गए "

(200/40)