सोमवार, 19 अगस्त 2019

महर्षि दयानंद और रानी लक्ष्मीबाई

पाश्चात्य   मानसिकता  से ग्रस्त  इतिहासकारों   ने  सन 1857  के   प्रथम स्वतन्त्रता  संग्राम   को  "ग़दर "   का  नाम   दिया   है  , और महर्षि  दयानंद   को किसी ने उन्हें समाज सुधारक कहकर, तो किसी ने उन्हें विद्वान्‌ संन्यासी मात्र कहकर अपने दायित्व से पल्ला झाड़ा है। परन्तु यह बात निर्विवाद रूप से सत्य है कि यदि ऋषि दयानन्द न होते, तो देश को स्वतन्त्रता मिलना इतना आसान न होता .क्योंकि      महर्षि  दयानन्द   के  समय  लगभग   पूरे   भारत  पर  अंगरेजों    का  शासन  था  , कुछ   भागों   में  छोटी   छोटी  कई  रियासतें   भी  थी  ,लेकिन      वहां  से  राजा   अक्सर  एक दूसरे   से  लड़ते  रहते   , देश    में    बार  बार  अकाल  पड़  जाता   था   ,  चालाक  अंगरेज अपनी  " फूट  डालो  और  राज  करो "   की नीति   से  देश को  खंडित  कर  रहे  थे  , देश   में  अनेकों   मत , संप्रदाय   , पैदा  हो  गए 
  थे  , इसलिए   महर्षि  दयानंद  ने  हिन्दुओं   में  एकजुटता   स्थापित करने  के  लिए " वेदों की ओर चलो  "  यह  नारा   दिया  था  , क्योंकि   वेदों पर  सभी हिन्दू   आस्था  रखते  हैं ,इसलिए  देश  में   पुनः  वैदिक   धर्म   की  स्थापना और उस समय धर्म   के  नाम  पर  प्रचलित  अंधविश्वास  , पाखंड  , कुरीतियां   , और  मान्यताओं  का  खंडन    करने  के  लिए  महर्षि   दयानंद   ने   लगभग  पुरे   भारत    का  प्रवास   किया    ,  और   अनेकों  धर्म   के  धुरंधर विद्वानों   से  शास्त्रार्थ   किया  और  और   उन्हें  परास्त  करके उनके   सामने सिद्ध   कर   दिया  की वेदों  में प्रतिपादित  धर्म  ही वास्तविक   और   सार्वभौमक    धर्म   है  ,महर्षि  दयानंद  केवल  धर्मसुधारक   और  धर्मप्रचारक   नहीं  थे बल्कि  उनको  देश  और  देसवासियों  के प्रति अटूट  प्रेम  था   ,  उन्होंने संकल्प लिया कि इस देश के नागरिकों को अपने वर्तमान का ज्ञान हो, अपने गौरवशाली अतीत की अनुभूति हो और उनमें भ्रष्टाचार, अज्ञान, अभाव, अन्याय तथा आन्तरिक कलह के गर्त से निकलकर राष्ट्र को स्वतन्त्र कराने के लिए तड़प हो, ऐसे राष्ट्र का निर्माण होना चाहिए।

1-स्वतंत्रता  का  प्रथम  उद्घोष 
अपने    भारतभ्रमण   के दौरान देशवासियों   की  दुर्दशा  देख  कर  महर्षि  इस    निष्कर्ष  पर    पहुंचे  कि पराधीन    अवस्था  में  धर्म  और  देश  की रक्षा  करना  कठिन  होगा  , अंगेजों  की  हुकूमत  होने पर  भी  महर्षि    ने  निडर  होकर उस   समय   जो  कहा  था   , वह  आज   भी  सत्यार्थप्रकाश   में  मौजूद   है  ,  उन्होंने  कहा था ,
"चाहे कोई कितना ही करे, किन्तु जो स्वदेशी राज्य होता है, वह सर्वोपरि उत्तम होता है। किन्तु विदेशियों का राज्य कितना ही मतमतान्तर के आग्रह से शून्य, न्याययुक्त तथा माता-पिता के समान दया तथा कृपायुक्त ही क्यों न हो, कदापि श्रेयस्कर नहीं हो सकता''

महर्षि  दयानंद   ने  यह    बात   संवत 1913  यानी  सन 1855 हरिद्वार    में  उस    समय   कही   थी    जब   वह नीलपर्वत   के  चंडी  मंदिर   के  एक कमरे में   रुके   हुए   थे  , उन   को  सूचित   किया   गया  कि  कुछ  लोग  आपसे   मिलने  और मार्ग दर्शन  हेतु   आना   चाहते   हैं    ,  वास्तव   में  लोग  क्रांतिकारी  थे   , उनके  नाम  थे
.
1.धोंडूपंत - नाना   साहब  पेशवा   ( बालाजी  राव   के   दत्तक  पुत्र )
.2. बाला साहब .
3.अजीमुल्लाह  खान .
4.ताँतिया  टोपे .
5.जगदीश पर  के राजा   कुंवर  सिंह .

इन   लोगों   ने महर्षि   के  साथ   देश  को   अंगरेजों   से  आजाद  करने   के बारे में   मंत्रणा  की   और   उनको  मार्ग   दर्शन   करने  का  अनुरोध  किया  ,निर्देशन   लेकर  यह  अपने अपने क्षेत्र     में   जाकर  क्रांति  की  तैयारी   में   लग  गए   , इनके  बारे  में    सभी   जानते   हैं
 ,
2-महर्षि  और   लक्ष्मीबाई  की मुलाकात 

सन्‌ 1855 ई. में स्वामी जी फर्रूखाबाद पहुंचे। वहॉं से कानपुर गये और लगभग पॉंच महीनों तक कानपुर और इलाहाबाद के बीच लोगों को जाग्रत करने का कार्य करते रहे। यहॉं से वे मिर्जापुर गए और लगभग एक माह तक आशील जी के मन्दिर में रहे। वहॉं से काशी जाकर में कुछ समय तक रहे.स्वामीजी के काशी प्रवास के दौरान झांसी की रानी लक्ष्मीबाई उनके मिलने गई .रानी    ने   महर्षि    से  कहा  कि " मैं  एक   निस्संतान  विधवा  हूँ   , अंग्रजों  ने  घोषित  कर  दिया  है  कि  वह   मेरे  राज्य   पर  कब्ज़ा  करने   की  तैयारी   कर  रहे   हैं   ,और  इसके  झाँसी  पर  हमला  करने   वाले  हैं.  अतः  आप   मुझे  आशीर्वाद  दीजिये  कि मैं  देश   की  रक्षा  हेतु  जब  तक  शरीर में  प्राण  हों फिरंगियों  से  युद्ध   करते  हुए शहीद   हो  जाऊँ .महर्षि   ने  रानी   से  कहा   ," यह   भौतिक  शरीर  सदा  रहने वाला    नहीं   है   ,  वे  लोग  धन्य  हैं   जो ऐसे  पवित्र   कार्य  के लिए अपना  शरीर न्योछावर   कर  देते   हैं  , ऐसे   लोग  मरते   नहीं   बल्कि  अमर  हो  जाते  हैं  , लोग  उनको     सदा  आदर  से   स्मरण   करते  रहेंगे , तुम  निर्भय  होकर तलवार  उठाओ विदेशियों  का साहस से  मुकाबला  करो "
अंगरेजों  द्वारा  ली  गयी  फोटो 

http://www.copsey-family.org/~allenc/lakshmibai/rani.jpeg

उस   समय  तक  झाँसी   पर  अंगरेजों  ने  कब्जा   नहीं किया  था  , और  झाँसी   के  किले  पर रानी   का  झंडा  फहरा   रहा था.
झाँसी   के  ध्वज    का  चित्र 

http://www.rbvex.it/asiagif/jhansi.gif

 3-अंगरेजों   की  हड़प नीति 
(Doctrine of lapse)

अंगरेज भारत में  व्यापार  करने के  बहाने  अये थे  ,लेकिन    उनका उद्देश्य  पूरे  भारत  में ब्रिटिश  राज्य  की  स्थापना   करना  था  , इसके लिए  वह  जिस  भी  राजा   से व्यापार  करने  के लिए अनुमति  देने का  अनुबंध  करते   थे   ,उसमे   कुछ  शर्तें   भी  रख  देते   थे  , जैसे अंगरेज  अपनी  सुरक्षा के  लिए  सैनिकों  की  टुकड़ी रख  सकेंगे   , जिसका  खर्च   वह राज्य  देगा  , बदले   में अंगरेज  सेना  उस राज्य   की  रक्षा  करेगी  . और  दूसरी  शर्त  थी  कि  यदि  कोई  राजा   निस्संतान   मर    जायेगा   ,  तो अंगरेजी    सरकार  को  उस  राज्य    को   ब्रटिश  साम्राज्य   में  शामिल  करने   का  अधिकार  होगा .
4-झांसी  का  विलय 
(Annexation of Jhansi)

सन 1842  को  लक्ष्मी  बाई  का  विवाह  झाँसी   के  राजा   गंगाधर  राव  नेवालकर  से  हुआ   था   , लेकिन    वह  अक्सर  बीमार  रहते  थे   ,  सन 1852  में  उनका  स्वास्थ्य    बहुत   बिगड़   गया   ,  लोगों  के  आग्रह  से  उन्होंने  दामोदर  राव  नामके  एक   बालक   को अपना  दत्तक  पुत्र  और भावी  राजा  घोषित  कर  दिया  , लेकिन   दुर्भाग्य  से  21  नवम्बर  1853  को  गंगाधर  का  देहांत   हो  गया  , तब  अंगरेजों  ने  झाँसी  राज्य    पर  कब्ज़ा  करने  के लिए  एक  चाल  चली   .  उन्होंने  27  फरवरी  1854  को   रानी    को   एक  पत्र  भेजा  .जो  अंगरेजी   भाषा   में  था , (पूरा  पत्र इस  लिंक   में   है ).डलहौजी   के  इस  पत्र  को   बुंदेली  भाषा   में  खरीता   कहा  गया    है  . 

http://www.copsey-family.org/~allenc/lakshmibai/feb-27-1854.html

5-खरीता  से मेरे  परदादा का सम्बन्ध
मेरे  परदादा   का  नाम  पंडित  सरयूप्रसाद    था   , इनका   जन्म  तहसील   ललितपुर   के   कुम्हेड़ी ग्राम   में  सन 1823  में   हुआ  था   .  वह   पुरोहित  का  कार्य  और  बच्चों   को  पढाने  का   काम   करते   थे  , एक   बार  तालबेहट  के  राजा   ने  कई  पंडितों      को   बुलाकर   यज्ञ  करवाया  ,   उनमे     मेरे  परदादा  भी  थे   , उन  दिनों  अंगरेज  झाँसी  में    अंगरेजी     छावनी का  विस्तार  कर  रहे  थे   ,  और नए   सैनिकों   की   भर्ती   कर रहे  थे   ,    जिन   में  हिन्दू   और  मुस्लिम  भी  थे   , अंगरेज सैनिकों  के  धार्मिक  कार्यों   के  लिए   पंडितों  और    मौलवियों   को  भी  रखते  थे   ,  तालबेहट  के  राजा   ने  मेरे  परदादा  का  नाम  अंगरेज अफसर  को  सुझा  दिया   ,  और  मेरे   परदादा    झाँसी  में  आ  गए   ,  छावनी  में  उनकी   मित्रता  हण्टिंग फोर्ड    नामके  ईसाई  पादरी  से  हुई   ,   जिसको   वह   अक्सर " हंडी फोड  " भी   कह  देते थे ,और जिस  से  उन्होंने    अंगरेजी  सीखी   , 

और   जब  डलहौजी   का  दूत झांसी    को  अंगरेजी  राज  में  शामिल   हो  जाने   का  आदेश झाँसी   की  रानी   के  सामने  पढ़  कर  सुना  चूका  तो ,रानी    बोली तुमने  जो भी  बोला   इसे सारांश  में      बताओ   मुझे  अंगरेजी   नहीं  आती  ,

तब    मेरे  परदादा   सरयू  प्रसाद  ने  जोर  से   रानी  से  कहा,
 ( जो  बुंदेली भाषा  में  है )

"  डलहौजी   ने  अपनो निरनय लिख दओ मिसल अठ पेजी में  ,

झाँसी   को सब  राजपाट      सामिल हो    गओ    अंगरेजी   में "

भले   ही   लोग   इस   बात   पर    विश्वास   नहीं  करें   लेकिन    यह   बात   बिलकुल  सत्य   है   , और   चार   पीढ़ी  से   मौखिक   रूप  से    विरासत   के  रूप   में  याद    रखी  जाती   है   , 
मेरी  दादी   मुझे   बताया  करती  थी  कि  बब्बा    यानी  उनके  ससुर   कहा करते  थे , वॉयस राय के दूत की   बात    सुनते   ही  रानी  जोश  में  आकर गद्दी   से   उठी  और उछल  कर    अंगरेज  दूत  की   छाती पर  एक   लात  मार कर  गरजी  " मी  ,माझी  झांशी देणार  नाहीं "अर्थात मैं अपनी  झाँसी   नहीं  दूंगी   ,
रानी   की  यह बात   जैसे    ही   अंगरेज   अफसरों  को   पता चली  उन्होंने झाँसी पर  हमला   कर  दिया और  किले   को घेर    लिया  ,और युद्ध शुरू   हो  गया  , आखिर  में  रानी   ने   महर्षि  दयानंद    से   जो  आशीर्वाद  माँगा  था  उसे  पूरा  करके  दिखा दिया   , 
जिन महर्षि दयानन्द सरस्वती ने रानी को  स्वराष्ट्र के प्रति कर्त्तव्योन्मुख किया है, और    जिस  रानी  लक्ष्मी  बाई    ने  महर्षि    शिक्षा   का  पालन  किया .क्या उसके प्रति हमारा कोई दायित्व और कर्त्तव्य नहीं है?

अनुरोध - यह पांच  साल पहले  लिखा गया प्रामाणिक लेख है  इसलिए अपने सभी पाठकों  और विशेषकर महर्षि दयानन्द अपना आदर्श मैंने वालों  सेअनुरोध  करते  हैं  कि यह लेख सबको  भेजने का  कर्तव्य निभाएं

बी.   एन. शर्मा 


(295) 07/10/2015

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