सोमवार, 9 दिसंबर 2019

मुसलमानों ने काबा को पेशाबघर बना दिया था !

हमारा उद्देश्य  किसी  की आस्था पर प्रहार करना नहीं  ,लेकिन हमें विश्वास  है कि यह शीर्षक  पढ़ते ही ओवैसी  जैसी सोच रखने वाले जरूर  बौखला  जायेंगे , क्योंकि  इस लेख  में दिए गए तथ्य  सौ प्रतिशत   सत्य  हैं  ,इसलिए आप इस लेख को ध्यान से पूरा पढ़िए  .
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कुछ  समय  पहले जब एक   टी  वी   चैनल पर  राममंदिर के बारे में बहस हो रही तो  , मौलाना अब्दुल रहमान आबिदी  ने कहा था कि अल्लाह  ने ही राम को पैदा  किया  था ,क्योंकि  अल्लाह सबसे बड़ा और सर्वशक्तिमान     है  , लेकिन   सब  जानते  हैं  कि मुसलमानों   की तरह मुहम्मद साहब  ने अपने  कल्पित  अल्लाह   को सबसे बड़ा  साबित  करने के लिए  सभी  धर्म  स्थलों  को ध्वस्त  कर  दिया  और करोड़ों  निर्दोष  लोगों   की हत्या  की  है  , यद्यपि इस्लाम  के अनुसार  अल्लाह  को निराकार  माना  जाता  है , परन्तु  काबा  को उसका घर  या निवास  भी माना  जाता  है .इसलिए   जरुरी  हो गया   था कि लोगों  के सामने अल्लाह  की असली   औकात  बता  दी जाये  कि अल्लाह  सर्वशक्तिमान  है या   कायर  और भगोड़ा  है  ?  इस बात को  साबित करने  के लिए    मक्का के इतिहास  की दो घटनाये  दे रहे  हैं  ,एक इस्लाम से पहले की है  , और दूसरी  तब की है जब पुरे अरब में इस्लाम  फ़ैल  चूका  था  ,


1-- काबा एक देवालय   था  
 इस्लाम  से पहले  अरब के लोग कई देवताओं  और देवियों   की उपासना करते  थे   चूँकि मक्का यमन  और सीरिया   बीच व्यापर  मार्ग   पर स्थित  था  और  इसी मार्ग  से  काफिले  गुजरते    थे   इसलिए मुहम्मद  के पुरखे  व्यापारियों   से मंदिर यानि   काबा  के लिए  दान   लिया  करते  थे मुहम्मद  के दादा  काबा  के  मुख्य पुजारी   थे  , अरब में कई कबीले  थे हरेक का अपना  अपना  देवता  या देवी  थे जिन्हे   एक साथ  काबा   में रखा  गया  था कुछ  के नाम   इस प्रकार हैं

नस्र ,वद्द ,यऊस ,यऊक ,सुआक और हुब्ल  और  कुछ देवियां  भी थीं  , जैसे   लात , मनात ,मनाफ़   और उज्जा इत्यादि    , मुहम्मद  का कबीला कुरैश    था  इनका  देवता  इलाह था   जिसका चिन्ह  चन्द्रमा  था  , बाद  में जब मुहम्मद ने इस्लाम चलाया  तो इसी  इलाह  को अल्लाह बना   दिया  यानि  आज  का  अल्लाह  उस समय  इलाह     था 

2-अल्लाह  पर  पहला  हमला 

जिस साल मुहम्मद  का जन्म  हुआ  था   यानी  सन 570 ईसवी   में  इथोपिया के  राजा  "अबरह अशरम -   أبرهة الأشرم‎  "  ने मक्का   पर   आक्रमण    कर  दिया  था   , इस्लामी इतिहासकारों  के अनुसार राजा  अपने  साथ  हाथिओं  की  सेना   लाया  था  , और  काबा   को  गिरा  कर  उसको  नष्ट  कर  दिया   था   , इसलिए  इस्लामी  इतिहास  में इस घटना  को "आमुल फील -   عام الفيل‎   "  (  Year of the Elephant  )  कहा  जाता  है  , अबरह अक्सुम  साम्राज्य  का राजा था जिसे आज यमन  कहा  जाता  है ,अबरह काबा  को नष्ट और  बर्बाद करके  यमन  लौट  गया  था  ,  चूँकि  उसी साल मुहम्मद  पैदा  हुआ था इसलिए  मुहामद के दादा मुहम्मद को  अशुभ मानते  थे    और बाद में जब मुहमद  ने  इस्लाम  चलाया तो  मुहम्मद का एक चाचा मुस्लमान  नहीं बना   , ऊपर से  जब मुहम्मद माँ के पेट  में थे उनका बाप भी मर  गया  , लेकिन  जब मुहमद ने  इस्लाम  बनाया तो अपने कल्पित  अल्लाह को बड़ा साबित करने के लिए एक कहानी  बना दी  और उसे कुरान में शामिल  कर  दिया 
 यह घटना  कुरान की सूरा फील 105 में   भी  दी  गयी  है  , कुरान कहा  गया है  कि
अल्लाह  ने   इस राजा  की  हाथी   सेना  को नष्ट  करने  के लिए  आसमान  से  "अबाबील -   أبابيل‎ " नामकी   चिड़ियों   के झुण्ड   भेज   दिये   थे  , जिन्होंने  अपनी चौंच  से आग की तरह गर्म  पत्थर की वर्षा  कर  उस हाथी  सेना  कर  मार  कर नष्ट   कर  दिया  था .लेकिन यह बात केवल   दन्त कथा  है राजा मक्का को  बर्बाद  करके खुद लौट  गया  था  और अपनी मौत मारा  था

 3-अल्लाह  पर दूसरा  हमला


मुहम्मद   साहब  ने  जितने  मुसलमान बनाये   वह लूट  के माल के लालच में , पकड़ी गयी औरतों  के लिए  , या जन्नत की  हूरों  के  लोभ में बने   थे    लेकिन  जब  मुहम्मद  का देहांत हो गया   तो इन  मुसलमानों   में कई  फिरके बन  गए    और एक दूसरे के दुश्मन   हो   गए  ,

ऐसे  ही फिरके  का नाम "इस्लामिया  -  الإسماعيلية‎   " है ,यह शिया  मुस्लिम  हैं  जो सात इमामों  को मानते  है ,यह लोग पूर्वी अरब  के " किरामत  -  قرامطة‎  " प्रान्त में फैले  हुए थे   , जिसे आज" बहरीन   - ٱلْبَحْرَيْن‎)  "  भी कहा  जाता  है ,यह सन 930 ई ० की  बात   है  ,इस्माइलियों  के लीडर  "अबू ताहिर सुलेमान   अल जन्नाबी -   ابو طاهر سلیمان الجنّابي‎   " ने 700 घुड़सवारों  की सेना लेकर  मक्का के  बैतूल   हराम  यानि  काबा  पर  हमला  कर  दिया   और  काबा के आसपास  जितने  भी  हाजी  ,नमाजी  मिले  सबको  क़त्ल  कर  दिया  ,  और  उनकी लाशों  से जमजम    का कुंड भर  दिया ,और फिर पुरे  मक्का शहर में कत्लेआम    मचा कर    हजारों  को मौत के घाट उतार दिया ,
,फिर इसके  बाद  जो लोग बचे   उनके  सामने यह कविता सुनाई  ,

" أنا بالله، وبالله أنا يخلق الخلق، وأفنيهم أنا

"युख्लिक़ अल खल्क व्  अफ ति हुम् अना -अना बिल्लाह व् बिल्लाह   अना "

मैं  ही अल्लाह हूँ ,मुझ में  ही  अल्लाह   है जो सृजन  करता  है  और विनाश  भी  करता  है  "


 "I am by God, and by God I am ... he creates creation, and I destroy them".


फिर  मौजूद लोगों  से  पूछातुम्हारा महान  अल्लाह  कहाँ  है  ?और चिड़ियों   (अबाबील  )   से  और  आग  की वर्षा करके काबा  को बचाने वाला  अल्लाह कहाँ  है  ?


"اين هو الهك أنا إلهك العظيم. أين طيور الله (طير العبابيل) التي تحمي الكعبة؟ اين حجارة النار    

  "ऐन हुव इलाहुक ?अना  इलाहुक अल  अजीम  ऐन तूयूर अल्लाह अल्लती तहमी अल काबा ?ऐन हिजरातून अन्नार ?

Where is your God? I am your great God. Where are the birds of God (Tayr al ababeel) that protect the kaaba? where are the stones of fire


और  जब किसी ने कोई जवाब नहीं  दिया तो जन्नाबी  ने काबा  का  पर्दा उतार कर उसमे आग  लगा  दी  ,

(इस से साबित हो  गया की कुरान की सूरा   फील   105 में दी गयी  कहानी  झूठी   है    जो मुहम्मद  के दिमाग की उपज  थी )

  फिर अपने लोगों को काबा के अंदर पेशाब  करने  को कहा , और मुसलमान जिस  हज्रे अस्वद   (काला पत्थर  " को चूमते थे उसे उखड़वा  कर यमन   भिजवा  दिया  ,जन्नाबी  का  शासन  मक्का  में  21 साल  रहा  इस दौरान  उसके  लोग  रोज  काबा में  नियमित रूप  से पेशाब   करते   रहे    इसलिए न तो कोई हज   कर सका  और न  काबा में अजान और नमाज   हो  सकी,  और  कला  पत्थर  भी चालीस  साल बाद  मिला  था  .


इन तथ्यों   से  दो बातें    स्पष्ट रूप से सिद्ध   होती  हैं   ,

1- अल्लाह  न इस्लाम  से पहले  सर्वशक्तिमान    था  , और न इस्लाम के  बाद  ,  अल्लाह मुहमद   द्वारा  कल्पित  चरित्र     है  , जो खुद भी नहीं  बचा  सका  , वह मुसलमानों  को कैसे बचा सकेगा ? इसलिए अल्लाह के साथ  "अकबर   " (यानी महान )लगाना  मूर्खता   के सिवा कुछ  नहीं  है 

2-कुरान   कोई आसमानी  किताब नहीं  बल्कि  मुहम्मद  की रचना  है ,  क्योंकि  मुहम्मद  झूठी   कहानियों   को  कुरान  में शामिल करके लोगों  अपने द्वारा कल्पित   अल्लाह  से लोगों को डरा  डरा कर मुस्लमान बनाया  करते  थे  , 
लेकिन  यह एक निर्विवाद  सत्य  है  कि कोई कितना    ही पाखंड   करे  एक न  एक दिन  उसका  भंडा जरूर  फूट  जाता  है 

(423  )


शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

आप मुहम्मद को क्या कहेंगे ?

लोग मुहम्मद के बारे में कुछ भी कहते हों ,लेकिन एक बात निर्विवाद है कि मुहम्मद जैसा व्यक्ति दुनिया में कोई नहीं हुआ .उसने लोगों कि अज्ञानता ,अंधविश्वास का पूरा पूरा फायदा उठाया था .और लोगों को मुसलमान बनाने के लिए हरेक हथकंडे अपनाये थे .इसमे डराना ,लालच देना सब शामिल हैं .इस्लाम से पाहिले अरब में यहूदियों और ईसाईयों ने अनेकों काल्पनिक बातें फैला रखी थीं ,जैसे शैतान ,फ़रिश्ते ,जन्नत ,दोजख आदि.इन्हींके आधार पर वह धर्म चल रहे थे .मुहम्मद ने इनमे जिन्न ,हूरें ,गिलमा और जोड़ दिए ,जिस से लोगों को ललचाया जाये .इसके आलावा मुहम्मद ने जन्नत और जहन्नम के बीच में एक और स्थान की कल्पना कर डाली .मरने के बाद आत्मा कब्र के अन्दर इसी जगह में तब तक रहेगी जब तक उसका मुर्दा शरीर फिर से जिन्दा नहीं किया जायेगा .फिर अंतिम फैसला हो जाने पर जीव नर्क या स्वर्ग में जायेगा .इस जगह को मुहम्मद ने "बरज़खبرزخ "का नाम दिया . कुरान में लिखा है -
1 -बरज़ख क्या है ? 
"मरने के बाद एक जगह बरज़ख है ,जीवित करके उठाने के दिन तक "सूरा -अल मोमिनीन 23 :100
"स्वर्ग और नर्क के बीच बरज़ख है ,लोग जिसे पार नहीं कर सकते " सूरा -रहमान 55 :20
मुहम्मद पाखंडी तो था ही ,वह कई दावे भी करता था ,जैसे चाँद के तुकडे करना आदि .इसी तरह मुहम्मद ने दावा किया कि वह अपने लोगों को बरज़ख की तकलीफों से बचा सकता है .
मुहमद का बाप अब्दुल्ला बचपन में मर गया था .और बाद में माँ अमीना भी मर गयी .मुहम्मद को उसके चाचा अबूतालिब ने पाला था .जब वह मर गया तो तो मुहम्मद को उसकी चाची "फातिमा बिन्त असदفاطمه بنت اسد "ने अपने पास रख लिया .मुहमद के चारे भाई का नाम अलीعلي था .
सन 626 को मुहम्मद की चाची फातिमा की अचानक मौत हो गयी .जब लोग उसकी लाश को दफना चुके तो मुहम्मद ने अपनी जवान चाची को बरज़ख के बोझ से बचने के लिए जो महान कार्य किया था वह कोई सोच भी नहीं सकता .
इसे हिंदी में "शव सम्भोग 'अंगरेजी में "Necrophilia " और अरबी में "वती उल मौती وطيءالموتي"कहा जाता है .मुहमद ने अपनी चाची की लाश के साथ सम्भोग किया था ,ताकि वह जन्नत में जाये .इसके सबूत में हिंदी ,अंगरेजी और अरबी प्रमाण दिए जा रहे हैं -
2 -शव सम्भोग (Necrophilia )क्या है ?
शव सम्भोग या Necrophilia एक प्रकार की मानसिक विकृति है ,इसे आम तौर से Sex with dead body भी कहा जाता है. इसका किसी नस्ल और संस्कृति से कोई सम्बन्ध नहीं हैं .ऐसे विकृत लोग सब जगह हो सकते हैं.लेकिन मुझे विश्वास है की मुसलमान कुछ अलग प्रकार के विकृत मानसिकता के रोगी है.धन्य है ऐसे इस्लाम को ,जिसने इस विकृति को पागलपन की सीमा से भी पर कर दिया है .क्या कोई यह दावा कर सकता है की मुस्लिम देशों में ऐसा नहीं होता है .
इसी विषय पर शोध करने पर एक रोचक हदीस मिली है ,जिसे सबको बताया जा रहा है यह हदीस "कन्जुल उम्माल "नामकी किताब से ली गयी है जिसका अर्थ श्रमिकों का खजाना है .इसके एक अध्याय "The issue of womenقضية امراة "में अली इब्न हुस्साम अल दीन ,जिसे लोग अल मुत्तकी अल हिंदी भी कहते है ,अपने हदीसों के संकलन "अल जामी अल सगीरالجامع الصغير "में जिसे जलालुद्दीन शुयूती ने जमा किया यह हदीस दर्ज की है -
Necrophilia: This is a mental disease and it has nothing to do with race or culture. There are sick people everywhere and I am sure Muslims who are sick in many other ways thanks to their sick religion are no better when it comes to this insanity. Do you have any proof that necrophilia does not happen in Islamic countries? 

Talking about Necrophilia there is a curious hadith that I would like to share. 

This is from a book called "Kanz Al Umal" (The Treasure of the Workers), in the chapter of "The issues of women", authored by Ali Ibn Husam Aldin, commonly known as Al-Mutaki Al-Hindi. He based his book on the hadiths and sayings listed in "Al-Jami Al-Saghir," written by Jalal ul-Din Al-Suyuti. 

3--शव सम्भोग का हदीस से प्रमाण 
इब्ने अब्बास ने कहा कि रसूल ने कहा "मैंने (यानी रसूल ने ) उसके (फातिमा बिन्त असद )के सारे कपडे उतार दिए ताकि वह जन्नत के कपडे पहिन सके .और फिर मैं उसके कफ़न (कब्र )में उसके साथ लेट गया ,जिस से उसे कब्र के संताप का बोझ हल्का हो सके .मेरी नजर में वह अबूतालिब के बाद अल्लाह कि सर्वोत्तम स्रष्टि थी ".यह बात रसूल अली कि माँ फातिमा को इंगित करके कह रहे थे .
-जामीअल सगीर -वाक्य संख्या - 34424

Narrated by Ibn Abbas:

‘I (Muhammad) put on her my shirt that she may wear the clothes of heaven, and I SLEPT with her in her coffin (grave) that I may lessen the pressure of the grave. She was the best of Allah’s creatures to me after Abu Talib’… The prophet was referring to Fatima , the mother of Ali. (Sentence number 34424
(
4 -मुहम्मद ने लाश के साथ सम्भोग किया !

अरबी में नीचे दी गयी हदीस में सोने (Slept )शब्द के लिए अरबी में (Idtajat इदतजात )शब्द का प्रयोग किया गया है.दिमित्रिअस ने इसे स्पष्ट करके बताया कि अरबी में यह शब्द औरत के साथ लेटना ,और सम्भोग के लिए लेटने के लिए प्रयुक्त होता है .जिस समय मुहमद ने यह हदीस कही थी ,वह जानता था कि फातिमा से साथ सोने से फातिमा को उसकी पत्नी ,यानि मुसलमानों कि माँ का दर्जा मिल जाएगा .और मुहम्मद फातिमाको कब्र के दुखों को हल्का करना चाहता था.मुसलमानों कि मान्यता है कि .क़यामत के दिन तक उनको कब्र में कष्ट उठाने होंगे .इसीलिए मुहम्मद ने फातिमा की लाश से सम्भोग किया क्योंकि मुसलमानों की माँ को कब्र में कष्ट नहीं हो सकता .

Demetrius Explains : "The Arabic word used here for slept is "Id'tajat," and literally means "lay down" with her. It is often used to mean, "Lay down to have sex." Muhammad is understood as saying that because he slept with her she has become like a wife to him so she will be considered like a "mother of the believers." This will supposedly prevent her from being tormented in the grave, since Muslims believe that as people wait for the Judgment Day they will be tormented in the grave. "Reduce the pressure" here means that the torment won't be as much because she is now a "mother of the believers" after Muhammad slept with her and "consummated" the union. " 

(नोट-अरबी में पूरी हदीस देखिये )


بسم الله الرحمن الرحيم
الحمد لله الكبير المتعال والصلاة والسلام على سيدنا محمد المتبع في الأقوال والأفعال والأحوال وعلى سائر الأنبياء وآله وصحبه التابعين له في كل حال‏.‏
‏(‏أما بعد‏)‏ فيقول أحقر عباد الله علي بن حسام الدين الشهير عند الناس بالمتقي‏:‏ لما رأيت كتابي الجامع الصغير وزوائده تأليفي شيخ الإسلام جلال الدين السيوطي عامله الله بلطفه ملخصا من قسم الأقوال من جامعه الكبير وهو مرتب على الحروف جمعت بينهما مبوبا ذلك على الأبواب الفقهية مسميا الجمع المذكور ‏(‏منهج العمال في سنن الأقوال‏)‏ ثم عن لي أن أبوب مابقي من قسم الأقوال فنجز بحمد الله وسميته ‏(‏الإكمال لمنهج العمال‏)‏‏.‏ ثم مزجت بين هذين التأليفين كتابا بعد كتاب وبابا بعد باب وفصلا بعد فصل مميزا أحاديث الإكمال من منهج العمال‏.‏ ومقصودي من هذا التمييز أن المؤلف رحمه الله ذكر أن الأحاديث التي في الجامع الصغير وزوائده أصح وأخصر وأبعد من التكرار كما يعلم من ديباجة الجامع الصغير‏.‏ فصارا كتابا سميته ‏(‏غاية العمال‏)‏ في سنن الأقوال‏.‏ ثم عن لي أن أبوب قسم الأفعال أيضا فبوبته على المنهاج المذكور وجمعت بين أحاديث الأقوال والأفعال‏.‏ وأذكر أولا أحاديث منهج العمال ثم أذكر أحاديث الإكمال ثم أحاديث قسم الأفعال كتابا بعد كتاب فصار ذلك كتابا واحدا مميزا فيه ماسبق بحيث أن من أراد تحصيل قسم الأقوال أو الأفعال منفردا أو تحصيلهما مجتمعين أمكنه ذلك وسميته ‏(‏كنز العمال في سنن الأقوال والأفعال‏)‏‏.‏ فمن ظفر بهذا التأليف فقد ظفر بجمع الجوامع مبوبا مع أحاديث كثيرة ليست في جمع الجوامع لأن المؤلف رحمه الله زاد في الجامع الصغير وذيله أحاديث لم تكن في جمع الجوامع‏.‏
وها أنا أذكر ديباجة المؤلف رحمه الله من الجامع الصغير وذيله ‏(‏ن - زوائده‏)‏ ومن الجامع الكبير حتى لا أكون تاركا ولا مغيرا ألفاظه إن شاء الله تعالى‏.‏ ‏(‏ن - الا بعض رموز وألفاظ يسيرة تركها الشيخ رحمه الله تعالى فيهما اقتصارا فتركت ذلك للضرورة فليعلم‏.‏‏)‏

خطبة الجامع الصغير

5 -मुहम्मद के कुकर्मों के और सबूत
यह बात तो सिद्ध हो गयी ,कि मुहम्मद ने अपनी चाची फातिमा बिन्त असद की लाश के साथ सम्भोग किया था .लेकिन मुहम्मद जानवरों के साथ भी कुकर्म करता था जो लोग मुस्लिम ब्लोगरों ,मुल्लाओं की मक्कारी भरी बातों में आकर मुहम्मद को आदर्श व्यक्ति ,समझाने की भूल कर रहे हैं ,उन्हें सचेत हो जाना चाहिए .इसी( महान?) व्यक्ति के कारण सारी दुनिया त्रस्त है .जो व्यक्ति अपनी वासना की पूर्ति के लिए बच्चियों ,दासियों ,कैद की गयी औरतों के साथ सम्भोग (बलात्कार )करता हो वह अल्लाह की और मुसलमानों की नजर में भले कुछ भी हो ,लेकिन जो व्यक्ति अपनी चाची की लाश के साथ ही सम्भोग करता हो ,उसके लिए दुनियां किसी भी शब्दकोश में कोई शब्द नहीं मिल सकेगा .
यदि हमारे पाठक मुसलमानों ले लिए इस उतम व्यक्ति "मुहम्मद "के लिए कोई उपयुक्त शब्द बताएँगे ,तो मुहम्मद के लिए वही शब्द इस्तेमाल करूंगा .
मुझे पूरा विश्वास है कि आपको मुहम्मद के बारे में सही जानकारी मिल गयी है ,और आपका भ्रम दूर हो गया होगा .क्योंकि  आज  भी मुसलमान  रसूल की सुन्नत  का पालन  करके  लड़कियों  की हत्या  करके उसकी लाश  से बलात्त्कर  करते  हैं 

अब  हम  तो मुहम्मद साहब को  सम्मानपूर्वक     " शवसंभोगी   रसूल  " कहेंगे  , बताइये आप क्या कहेंगे   ?


(181/180)-Dt.19/04/2011 

सोमवार, 2 दिसंबर 2019

मुहम्मद ने कुरान कब और क्यों बनाई थी ?

मुस्लिम  विद्वानों   और इतिहासकारों   ने यह दावा  कर रखा  है कि कुरान  का पहला हिस्सा जिब्राईल  नामका फरिश्ता आसमान  से     रमजान महीने   की तारीख  27  को सन 610 में   लेकर  आया  था  ,उस समय  रात  थी , जिसे  आज मुस्लिम  लैलतुल  ,कद्र  कहते हैं ,उस  समय मुहम्मद  की  आयु  40 साल  थी ,
लेकिन  यह  बात  सरासर  बेबुनियाद  और झूठ   है  ,क्योंकि   मुस्लिम  विद्वान् कुरान   के आवरण   की जो तारीख   सन  610 बताते हैं  ,उस से काफी पहले   सन 586 ही   मुहम्मद के ताऊ  जुबैर इब्न  अब्दुल मत्तलिब   ने  एक  कविता  मक्का के लोगों  को सुनाई  थी  ,जो कुरान को अल्लाह की किताब  होने की पोल  खोलने   वाली है   ,
 यह   बात  न  तो  हम अपनी  तरफ  से  कह  रहे हैं  ,  और न  किसी हिन्दू   संगठन  की  तरफ   से  कह  रहे  हैं , लोगों  को यह  बात  जानकर   सहसा विश्वास  नहीं  होगा  की  ,  यह  बात   खुद मुहम्मद   के ताऊ "  अल जुबैर -    " ने  उस  समय   कह  दी थी  ,  जब   मुहम्मद  ने कुरान   बनाना   चालु  कर  दिया   था   ,, और अपनी   उलटी  सुल्टी , बेतुकी   बातों   को अल्लाह   का  कलाम बता  कर   मक्का  के लोगों   को जिहादी  बना  रहे  थे   ,
-इस संवेदनशील  विषय   की  सत्यता  को  समझाने  के लिए  आपको    यह  बताना  जरुरी     था कि हमें  यह  जानकारी  कहाँ  से  और  कैसे  मिली  ?
1- जानकारी   का सुराग  कैसे मिला  ?
कुछ   दिन  पहले  मुझे     एक उर्दू किताब     मिली  जो  निजामी प्रेस  लखनऊ  से छपी  थी  इसका नाम   "ग़दीर  से करबला  -غدیر سے کربلا تک
 "   था  ,  इसके लेखक  का  नाम   हसन  नवाब  रिजवी   है  ,  इस किताब  के पेज नंबर 49 पर   मुहम्मद के  ताऊ  "जबीर अब्दुल मत्तलिब  का  एक  अरबी    शेर     दिया   गया   है   ,

لعبت هاشم بالملک فلا
خبر جاء و لا وحی نزل‏
(लबअत हाशिम बिलमुल्क  फला ,खबर जाअ व्  ला  वही  नजल )
अर्थात -  हाशिम   की  औलाद(MUhammad)  ने दुनिया  के साथ  खेल  किया  , नतो आसमान  से कोई खबर  आयी  और  न  कोई वही  ( revelation )   ,यानी कुरान   आयी.
  ,हमने इस पूरी कविता के बारे में   दो  दिन  तक   अंगरेजी  और उर्दू  में  सर्च  किया लेकिन   कुछ  पता नहीं   चला   ,    तीसरे दिन  जब  हमने  फारसी में  सर्च    किया  तो  ईरानी  साईट में   अरबी की   वह पूरी  कविता मिल  गयी   ,  साथ में उसका फारसी  अनुवाद  भी मिल  गया  , यह  कविता मुहम्मद  सबसे बड़े  चाचा   यानि  ताऊ जुबैर  बिन   अब्दुल  मुत्तालिब   जिसे अव्वाम  भी  कहा  जाता   है  ,  उस  समय   लिखी  थी  जब   मुहम्मद   लोगों   से  यह    कहा  करता  था   कि  अल्लाह   के  फ़रिश्ते   मेरे  पास  खबर     लाया    करते   हैं  ,  और  मैं  जो  भी  कहता  हूँ   वह  अल्लाह  का  कलाम   है  , 
2-मुहम्मद  का  संयुक्त  परिवार 
लेकिन   मुहम्मद   के   ताऊ  ,  चचेरे  भाई   सभी  मुहम्मद  को पाखंडी  और  सत्तालोभी      मानते  थे  ,  दादा  (grand father )  का नाम " अब्दुल मुत्तलिब    बिन   हिशाम   -  شيبة ابن هاشم عبد المطّلب " था। इसकी   छह   पत्नियां   थी  ,जिन   से  अब्दुल मुत्तलिब     के    10 संतानें  हुई  ,(  कुछ  लोग  12 संतानें   भी  कहते   हैं   ,)इनका  विवरण   यह    है 
1" अल जबीर - الزبير بن عبد المطلب‎ "यह  परिवार  का सबसे  बड़ा बेटा  था  इसलिए  मुत्तलिब   ने इसे  घर  का मुखिया    बना  दिया   ,  यह  अपने  ऊँटों   से  व्यापारियों  का  सामान लाने   और  भेजने  का काम   करता   था  ,  इसके  अतिरक्त   अरबी में कविता  भी  करता   था  ,  लोग इसे अबू  ताहिर  भी  कहते   थे  , इसी  नाम  से  यह  शायरी भी  करता  था ,और  जब मुहम्मद  के पिता गुजर  गए तो  सबसे  पहले इसी ने  मुहम्मद को  पाला  था  ,  और जब  मुहम्मद      14 साल  का  हो  गया तो  सन 584 में  यही  मुहम्मद   को  सीरिया   घुमाने ले  गया   ,  वहां   राजा   की  शान शौकत  देख  कर  मुहम्मद  के  दिल  में  दुनियां  पर  राज करने  इच्छा   पैदा हो  गयी   ,  चूँकि    अपना  राज  कायम  करने  के लिए   सेना  जरुरी    होती   है   ,  और  सैनिकों  को  वेतन  देने  की मुहम्मद  की  औकात  नहीं   थी  ,  इसके लिए मुहम्मद  ने जिहाद  का तरीका  खोज  निकाला ,
2-अबू  तालिब  -बचपन   में इसका नाम     "अब्द मनाफ़ -عبد مناف "  था  , इसका बेटा  अली  था  ,( मुहम्मद ने  इसी से अपनी पुती  फातिमा  से  शादी  कर    दी  थी  )यद्यपि   अबू  तालिब   ने मुहम्मद को  पाला  ,  फिर भी  अबुतालिब   कभी मुस्लमान   नहीं   बना  , जुबैर की तरह   अबूतालिब   भी  इस्लाम  को  पाखण्ड और  कुरान  को मुहम्मद  की  रचना     मानता   था
3-अब्द इलाह   यह  मुहम्मद   के पिता  थे ,इसकी पत्नी  का नाम   आमिना  था, जब  अब्दुल्लाह  और आमिना  की  शादी  हुई   तो  अब्दुल मुत्तलिब  ने  एकहि  दिन   एकसाथ   एक  लाइन में सौ  ऊँटों  को  क़ुरबानी  की   थी  ,  उस  से कहा  गया था कि इस से अल्लाह      आमिना   से  अच्छे गुणों    वाला बच्चा   देगा ,  और  बच्चे के बाप को लम्बी आयु   देगा  ,  लेकिन   इसका बिलकुल उल्टा  हुआ  , मुहम्मद के  जम्म  से पहले अब्दुल्लाह   मर   गया  , और  आमिना    का जो बच्चा  मुहम्मद  हुआ  उसके  हाथ पैर ऊँट के खुर   जैसे   थे  , लोग  समझते  थे  इस बच्चे  में दुष्ट   शक्तियों   का वास  है , इसी  लिए मुहम्मद  के सभी  चाचा   उस  से दूर   रहते  थे  ,  कोई  भी मुस्लमान   नहीं   बना
4-उम्मे हकीम अल  बैदा --तीसरे  खलीफा उस्मान बिन  अफ्फान की नानी
5-बर्रा  - अबू सलमा की माता
6-अरवा -यह बचपन में मर गयी
7-अतीका -उमय्या अल मुगीरा की पत्नी
8-उम्मा -जैनब  बिन्त जहश और अब्दुल्लाह इब्न जहश  की माता
9-अब्दुल उज्जा -उर्फ़  अबू  लहब  , मुहम्मद  का चाचा  , कुरान में इसका उल्लेख है 
10-हमजा - अली का भाई - उहद  के युद्ध में अबू सुफ़यान  की औरत हिंदा ने इसका कलेजा  चबा लिया  था 
3-जुबैर  ने  यह कविता क्यों  लिखी 
जुबैर    परिवार  का मुखिया  होने के साथ   शायर भी  था  , मक्का  के लोग उसकी कविताओं  को  यद् रखते   थे  ,  लेकिन  लोगों  को मुहम्मद  की  आदतें   और  कामों   से नफ़रत    थी  , 13 साल होते ही  मुहम्मद    ने अपनी  गैंग बना    ली   , जिस से वह  काफिले  लूटा करते थे  ,  मुहम्मद ने यह  बात फैला राखी  थी  कि ऐसा करने के लिए  उसे  आसमान   से हुक्म  मिलता   है  ,पहली  बड़ी  लूट  मुहम्मद   ने सन 583 में  मकका  के कबीले हवाजिन   को लूटा ,इस  लूट को "हरब  अल फ़िज़ार -  ﺣﺮﺏ الفجار‎ "  कहा   जाता    है  , इसमें मुहम्मद  को  काफी  माल मिला  , इसके बाद   मुहमम्मद ने  लगातार     चार  लूट की  वारदातें    की ,  जिस  से मक्का  के लोग मुहम्मद के दुश्मन    हो  गए  ,   लोगन   का मुंह  बंद  करने के लिए मुहम्मद   ने चाल  चली   ,  वह  अपने  हरेक  कुकर्मों  को जायज  सिद्ध   करने के लिए  एक पुस्तक  बनाया  करता   थे , जिसका  नाम   मुहम्मद   ने  " अल किताब -  الكِتاب  "  रख  लिया   था .महम्मद ने बाद  में इसका नाम  कुरान   रख  दिया    और , जब  लोगों   ने आरोप  लगाया कि यह  किताब  तुमने   ही  बनाइ  है  , तो मुहमम्मद  ने अनपढ़  होने  का  नाटक   किया  , जबकि  इसका छोटा  भाई  अली लिखना पढ़ना   सीख   गया  .  और  जब  मुहम्मद    ने कहा  यह   किताब  मेरी  रचना नहीं   ,  अल्लाह फ़रिश्ते   के माध्यम   से भेजता  रहता  ,  और  जब  जुबैर  को  लगा  कि सत्ता   के लोभ    में मुहममद दुनिया   को  धोखा  दे  रहा  है  तो उसने सोचा कि मुहमद  के कारन    पूरा कबीला  ,  अरब  लोगों   का नाश हो जायेगा  उसने  यह  कविता  लिखी   थी , और जैसे जैसे मुहम्मदी   जिहाद  फैलता  गया  , जुबैर की कविता भी लोगों  को याद  होती  गयी  ,जिहाद के बहाने मुहम्मद  ने जिन लोगों  को मरवाया था  वह बदला  लेने का मौका  देखने  लगे  , 
4-यह  कविता  कब  सार्वजनिक    हुई 
यद्यपि   जुबैर ने यह कविता  कुरान के  अवतरण  से काफी पहले ही लिखी थी  ,लेकिन  इसे "यजीद बिन मुआविया - : يزيد بن معاوية بن أبي سفيان‎ " ने   अपने दरबार में लोगों  के सामने  उस  समय पढ़ा  था  जब  उसके सामने   इमाम हुसैन   का कटा  हुआ   सर लाया  गया   था  , यह  घटना 10  अक्टूबर  सन 680 , यानी  10 मुहर्रम   हिजरी 61 की बात  है  ,दरबार  में यजीद हुसैन के कटे सर  को छड़ी  से  मारते हुए कहने  लगा  और भरे दरबार  में  लोगों  के समांने    मुहम्मद के ताऊ    ( grand uncle )जुबैर की  यह कविता सुनाने  लगा 
(Most of the narrations had confirmed that Yazeed Bin Muawiya had recited the poetry of Al-Zubary during his public assembly, Al-Zubary is a poet from Quraish at the time of Jahiliyyah (pre-Islamic stage) who was very tough on Muslims)

 कविता -

أتمنى لو أن قادتي القدامى في بدر يمكن أن يشهدو
"मैं  चाहता हूँ कि बद्र के  युद्ध में भाग लेने वाले पुराने लोग गवाह   रहें  "
I wish my old chiefs at Badr could witness

الخازرج خوفا من تأثير الاندفاع
"जो खजराज की भीड़ से डरे   और दबे  रहते  हैं  "
Al-Khazraj’s fearing of the impact of rush

كانوا سيهتفون ويصرخون بسعادة 
" यह लोग खुश   होकर  चिल्ला कर बोल उठेंगे   "
They would have cheered and shouted happily,

ثم قالوا لي ، يا حسن يا سعيد
"और    कहेंगे    हे यजीद  तूने    अच्छा काम  किया  है   "
Then they would have said, good job O Yazeed
ان كُن مَن خندف اِذا كُنت الانتقام
"मैं   खनदफ के युद्ध में  बदला  नहीं   ले   पाया  था  "
I shall not be from the Khandaf if I do not avenge,

من عائلة أحمد لما فعله
"मुहम्मद के लोगों   से  , जो मुहम्मद  ने हमारे साथ  किया  "
From the family of Ahmad for what he had done

لعبت هاشم با مُلك فما
"हाशिम  की संतान   ( मुहम्मद ) ने   देश  को बर्बाद  कर  दिया  "
Hashim had manipulated the Reign

لاخبرجاء ولا وحي نزل
" न  कोई   खबर  लेने  वाला    (फरिश्ता  " था  , और न  आसमान  से कोई किताब उतरी   है  "
So, neither news arrived nor revelations happened"


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इन  पुख्ता सबूतों   से     यह बातें  सिद्ध होती   हैं  ,
1 -मुस्लमान  विद्वान झूट  कहते हैं  कि कुरान   "कलाम उल्लाह  - " यानी अल्लाह  की वाणी  है  ,   जो अरबी नौवें  महीने  रमजान में  आसमान   से जिब्राईल  नाम  का फरिश्ता  मुहम्मद  के  पास  लाया   था  , और मुस्लिम  विद्वान्  कुरान  के अवतरण अर्थात  नुजूल ( Revelation )  की  जो 23 तारीख दिसंबर  सन 609 बताते   हैं   वह  भी  सरासर  झूठ  है  ,
2-जबकि  सच्चाई   तो  यह  है कि मुस्लिम  विद्वान्  कुरान  के उतरने की  जो तारीख   (23Dec 609    ) बताते  हैं  उस से  काफी  पहले से  ही  लगभग  सन 585 -586 से  ही   मुहम्मद  जो भी बेतुकी  बातें  बोलता  था उसे( वही - "यानी  अल्लाह के वचन  बता दिया करता था  ,  और अपने  हरेक  कुकर्मों  को  को न  कोई  आयत बना  कर जायज ठहरा  देता  है  ,  इस  काम   में   उसका  चचेरा भाई  और  दामाद  अली  भी  साथ  देते  थे  , मुहम्मद  की इस  धूर्तता  को बेनकाब  करने के लिए  ही   अबू  जुबैर  के  कविता  लिखी  थी  , लेकिन  जब  सन 610 में  अबू  जुबैर  की मौत  हुई  तो  मुहम्मद  ने अपनी किताब  को  अल्लाह  की किताब  के नाम   से प्रकट  कर  दिया  .इसी लिए  कुरान  की सूरा बकरा 2 :1 में कुरान को "जालिक़ अल किताब - ذَٰلِكَ الْكِتَابُ    "कहा गया  है  , जिसका अर्थ  "वह  किताब-That Book  "   होता  है  ,मतलब यह कुरान   नकली   है। 
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