रविवार, 31 मई 2020

सूरे फातिहा में रद्दोबदल हुआ है !!

1-भूमिका -कैरानवी को मुंहतोड़ जवाब !

यह लेख   25 जुलाई  2010 को उस समय तैयार किया गया था  ,जब  फेसबुक  का  नाम  भी नहीं  था  , और उन दिनों लखनऊ  में मुस्लिम ब्लोगर्स एसोसिएशन  नाम  का एक गिरोह था जोअपने ब्लॉगों  के   हिन्दुओं  जैसे नाम रख  कर  हिंदुओं  को गुमराह कर   रहा थे    इनकेकुछ  नाम   ऐसे थे  जैसे प्रेम सन्देश  ,मधुर वाणी ,  इस्लाम  धर्म  , सनातन  इस्लाम  इत्यादि  ,  इनका सरगना  "उमर कैरानवी  , जीशान  जैदी  आदि  थे   इनका  मुंह  बंद    करना  जरूरी   था   इसलिए   हमने अकेले  ही  सामना    शुरू   कर   दिया  ,  इन  लोगों   ने दवा  किया  था कि न   तो कुरान  में कोई परिवर्तन  हुआ  है  और  न   कोई  कर  सका   है इसलिए  हमने  यह  लेख  पोस्ट  िया  था  चूँकि   सुरा  फातिहा  सबसे  मुख्य  है  , इसलिए हमने उसी  को निशाना  बनाया  था ,चूँकि  समय बहुत  काम  था इसलिए  हमने  एक उर्दू   की इस्लामी  साईट  का  साबुत  लिया  था  ,  क्योंकि यह गिरोह   उर्दू  जानते थे  हमने उर्दू को हिंदी लिपि में  कर  दिया  था ताकि  सब   समझ सकें  

कैरानावी मुस्लिम ब्लोगर गैंग का सरगना है.इसका काम हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन करवाना है.इसने एक बहुरूपिये की तरह कई नामों से फर्जी ब्लॉग बना रखे है ,जैसे इम्पेक्ट .सत्यागौतम और नवलकिशोर आदि .इसे अचानक एक ऎसी बीमारी लग्गयी कि यह खुद को इस्लाम का झंडा बरदार समझाने लगा है .और समझता है बाक़ी के सारे लोग मूर्ख हैं ,और वही इस्लाम का एकमात्र विद्वान् है.इसलिए कैरानावी इब्लीस की तरह किसी भी ब्लॉग में प्रकट हो जाता है ,और अपने गिनेचुने मुद्दों क लेकर किसी को भी चेलेंज करता रहता है .इसके पीछे इसके आका हैं ,जो देश के बाहर से इसको निर्देश देते रहते हैं .एक दो दिनों से मैं देख रहा हूँ कि कैरानावी चेलेंज के साथ साथ गालियाँ भी देने लगा है.इसलिए मैंने निर्णय लिया कि अगर इस पाखंडी को मुंहतोड़ जवाब नहीं दिया गया तो यह उर भी उद्दंड हो जाएगा ,औरयह समझाने लगेगा कि कोई इसका जवाब देने वाला नहीं है.और यह जो बकवास करता है वह सच है .लेकिन मैं ऐसा नहीं होने दूँगा .

कल इसने फिर वही चेलेंज दिया कि कुरआन में कोई रद्दोबदल नहीं .

मैं आप लोगों के सामने शिया लोगों की अधिकृत वेबसाईट से हवाला दे रहा हूँ कि केवल कुरआन में नही ,बल्कि कुरआन कि सबसे प्रमुख सूरा फातेहा में तहरीफ़ की गयी है .अरबी में तहरीफ़ का अर्थ रद्दोबदल होना है.इस साईट के "कुरआन "शीर्षक में "तहरीफ़ और तरतीब "के अंतर्गत कुरआन में की गयी "तहरीफ़ "के बारे में विस्तार से लिखा गया है.लेख काफी लंबा होने के कारण मैं केवल ख़ास ख़ास नुक्ते दे रहा हूँ .भाषा की लिपि हिन्दी है जिसमे उर्दू शब्द भी हैं.जिसे आप सब लोग आसानी से समझ लेंगें
.


1-मअना ए तहरीफ़ :- यानी किसी कल्मे को उस की हालत पर बाक़ी रख़ कर उस के मअना में तब्दीली पैदा कर देना

दूसरा सब से बड़ा अहम सबूत यह है कि अगर आयाते क़ुरआनी में मअना की तब्दीली न तो आज के मानने वालों में इतने फ़िर्क़े न होते। उम्मते इस्लामिया में 73 फ़िर्क़ों का वुजूद और सब का क़ुरआने मजीद से इस्तिदलाल इस बात का ज़िन्दा सुबूत है कि सारी उम्मत ने ख़ुदाई मअना पर ऐतेमाद (भरोसा) नहीं किया है।

2-तहरीफ़े हरकात :- यानी ज़ेर व ज़बर वग़ैरह का फ़र्क़ इस तहरीफ़ के बारे में गुफ़्तुगू करने की ज़रूरत नहीं है इस लिये कि आज भी एक एक लफ़्ज़ में मुतअद्दिद क़राअतें पाई जाती हैं जिन में हरकात के ऐतेबार से इख़्तिलाफ़ है और यह तय है कि यह सारी क़राअतें नाज़िल नहीं हुई थीं बल्कि यह क़ारियों के ज़ाती ज़ौक़ का नतीजा थीं। तहरीफ़े हरकात का एक बड़ा सबब मुख़्तलिफ़ अक़वाम व क़बाइल की तिलावत में मुज़मर था हर क़बीले का एक लहजा था और हर क़ौम का एक उसूल क़राअत था। इसी लहजे की तब्दीली और उसूलों के तग़य्युर ने कलेमात में हरकाती इख़्तिलाफ़ पैदा कर दिया। लेकिन यह क़ुरआन का एक तक़द्दुस से कि इतने इख़्तिलाफ़ के बावजूद किसी क़बीले ने भी किसी लफ़्ज़ को बदलने की कोशिश नहीं की, बल्कि सिर्फ़ अपने लहजे से तसर्रुफ़ करते रहे जिस में वह किसी हद तक मअज़ूर भी थे।

3-सूरा फातिहा में हेराफेरी  यानि तहरीफ़े कलेमात
 :-यानी एक लफ़्ज़ की जगह दूसरे लफ़्ज़ का आ जाना। इस तहरीफ़ के बारे में उलामा ए इस्लाम में इख़्तिलाफ़ है, बअज़ हज़रात का ख़याल है कि क़ुरआने करीम में इस क़िस्म की तहरीफ़ हुई है
मसलन सूरए हम्द में (वलज़्ज़ालीन  - ولاالضالین ) की जगह (ग़ैरज़्ज़ालीन غیرالضالین  -) था जिसे सहूलत की नज़र से बदल लिया गया है

हुज्जाज बिन यूसुफ़ ने अब्दुल मलिक से यह ख़्वाहिश की कि (उलाइका मअल लज़ीना अनअमल्लाहो अलैहिम मिन्न नबीयीना वस्सिद्दिक़ीना वशशोहदा ए वस्सालेहीना اولئک مع الذین انعم اللہ عليہم من النبین والصدیقین والشہداء والصالحین )कि आयत ने शोहदा के साथ ख़ुलाफ़ा का इज़ाफ़ा भी कर लिया जाए ताकि इन का शुमार भी साहिबाने नेअमत में हो सके
यह ख़्वाहिश की थी कि (इन्नल्लाहस्तफ़ा आदमा व नूहन व आला इब्राहीमा व आला अम्राना अलल आलामीन  - ان اللہ اصطفى آدم ونوحاوآل ابراہیم وآل عمران على العالمین ”में आले इमरान के साथ आले मर्वान -آل مروان  " का भी इज़ाफ़ा कर दिया जाए.
 (रौज़ातुस्सफ़ा)।(روضة الصفا
ज़ाहिर है कि जो हुकूमत नस्ल और सल्तनत परस्ती उम्मत इक़तिदार की ख़्वाहिश पर हुकूमत के बाप दादा का ज़िक्र बर्दाश्त नहीं कर सकती वह यह क्यूँ कर बर्दाश्त करेगी कि “व ग़ैरज़्ज़ालीन-وغیرالضالین  ” की जगह“व लज़्ज़ालीन- لاالضالین“” आ जाये। या “होवर्राज़िक़”هوالرازق -की जगह “होवर्रज़्ज़ाक़-  هوالرزاق आ जाये। या “फ़मज़ऊ इला ज़िक्रिल्लाह-فامضواالى ذکراللہ   ”के बदले “फ़समऊ इला ज़िक्रिल्लाह- فاسمعواالى ذکراللہ रख़ दिया जाए वग़ैरह वगैरह

4- तहरीफ़े नक़्स:- यानी अल्फ़ाज़ व आयात की कमी दर हक़ीक़त तहरीफ़ के बारे में यही मसअला हर दौर में महल्ले नज़अ व इख़्तिलाफ़ रहा है, उलामा ए इस्लाम की एक जमाअत इस बात की क़ायल रही है कि क़ुरआने मजीद के आयात में कुछ नक़्स ज़रूर पैदा हुआ

5- तहरीफ़े ज़ियाद्ती:- यानी अल्फ़ाज़ व कलेमात का इज़ाफ़ा।
ऐसा अक़ीदा रखना किसी भी मुसलमान के लिये ज़ेब नहीं देता है।

6- तहरीफ़े तरतीबी:-यानी आयात और सूरों की तरतीब का बदल जाना तहरीफ़ की यह क़िस्म भी अगरचे उलामा ए इस्लाम ने महल्ले इख़्तिलाफ़ रही है क़ुरआने करीम की तरतीब ही तहरीफ़ शुदा है यानी तरतीबे पैग़म्बर के ख़िलाफ़ नहीं है बल्कि मंश ए पैग़म्बर के खिलाफ़ है और इस बात के साबित करने के लिये दो बातों का इसबात करना पड़ेगा पहली बात यह है कि क़ुरआने करीम हयाते पैग़म्बर में मुरत्तब शक्ल में नहीं था बल्कि बाद के अदवार में मुरत्तब हुआ
और दूसरी बात यह है कि मंश ए रिसालत यही था कि किताबे ख़ुदा को उस की तनज़ील के मुताबिक़ मुरत्तब किया जाए और उम्मत ने उस के बरख़िलाफ़ अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ मुरत्तब कर डाला।
इस तरह से इन तथ्यों से साबित होता है कि कुरआन में रद्दोबदल मुसलमानों ने मुहम्मद कीमौत के बाद किया था .इस बातपर करोड़ों लोग यकीन करते हैं.भले कैरानावी का गिरोह कुछ भी चेलेंज करता रहे .ये लोगों को धोखा नहीं दे सकते.हमें झूठा   साबित करने के इच्छुक  पहले  शिया लोगों   को झूठा साबित  करें  ,
 क्योंक  सच्चाई    सामने आही जाएगी

सूचना 
यह लेख इस्लामी इतिहास  की किताब '"रौज़तुस्सफ़ा फिल सीरतुल अम्बिया वल मुलूक वल  खुलफ़ा -   روضة الصفا في سیرة الانبياء والملوك والخلفاء, "नाम की किताब  से ली  गयी है  ,लेखक का नाम "मीर खु वंद -   میرخواند‎   "  है ,इसका काल 836 ईस्वी  है .इस किताब में  7 अध्याय हैं जिनमे नबियों, खलीफाओं  और मुस्लिम  शासको   का इतिहास है  , साथ में  इसमें कुरान  के संकलन और उसमे  की  गयी  हेराफेरी का  इतिहास  भी  है
         
 मैं अगली पोस्ट में साबित कर दूँगा कि
"बिस्मिल्लाह "की आयत कुरआन का हिस्सा नहीं है !

No181/118 -25/07/2010

(181/118 )

शनिवार, 30 मई 2020

सूरा फातिहा दोबारा नाजिल नहीं हुयी इसे सुधारा गया था !


(नोट -हमारा  मकसद  किसी की भावना  को ठेस  पंहुचना  नहीं बल्कि उस  सचाई को   जाहिर करना   है ,जिसे  इरादतन छुपाया   गया  है  )
इस्लामी मान्यता  के अनुसार कुरान किसी  व्यक्ति की रचना  नहीं  है  ,बल्कि अल्लाह  ने आसमान  से नाजिल   की है  चूँकि यह अल्लाह  का कलाम है इसमें किसी तरह  का परिवर्तन  या  संशोधन   न  तो हुआ  है  और न  हो सकता  है  , यहाँ तक कुरान का  एक नुक्ता  या जबर  जेर  भी  नहीं  बदला  सकता  है   मौजूदा कुरान  में कुल  114 सूरा (अध्याय )  है  , जिनमे  सबसे  सूरा   फातिहा  है , लेकिन  सभी मुस्लिम  इस  बात पर  सहमत  हैं  कि "तरतीब नुजूल -  ترتيبِ نُزوك " (Rrvelation order) के अनुसार सूरा फातिहा  का क्रम पांचवा   था   जिसे पहला  कर  दिया  गया  ,इसके पीछे  तर्क  दिया  जाता है सूरा  फातिहा  इतनी महत्वपूर्ण  है  की इसे "उम्मुल कुरान  -اُمّ القُران " यानि कुरान की माता  का  नाम  दिया  गया  है , और हरेक  नमाज में सूरा फातिहा पढ़ना  अनिवार्य कर  दिया गया  है
1- सूरा  फातिहा  दो बार नाजिल हुई   है !
मुस्लिम  विद्वान्  इस    बात  को जानते हैं की  सूरा  फातिहा कुरान की ऐसी सूरा है  जो दो बार नाजिल हुई  है  , पहली  बार मक्का   में  ,और  जब   सन 628 को  मक्का  के लोगों  ने मुहमद  को परिवार  सहित मदीना  " यसरिब  -يصرب " खदेड़  दिया  था  , तो उसके कुछ महीनों  बाद  सूरा  फातिहा दोबारा  मदीना  में  नाजिल  हुई  थी ,इस बात को सभी मुसलिम  मानते  हैं .
2-विचारणीय   प्रश्न  
इस सत्य को जानकर  कोई भी  व्यक्ति  सवाल करेगा कि  जब अल्लाह  ने सूरा फातिहा पहले  ही  मक्का में नाजिल नाजिल कर  दी थी तो  लगभग 12 साल  बाद   सूरा फातिहा मदीना में फिर  से क्यों  नाजिल कर  दी थी  ? क्या पहली  सुरा फातिहा में कोई गलती  या कोई कमी रह  गयी  थी  ? और अगर  मक्का  और मदीना  की सूरा फातिहा  एक जैसी  है    ,तो दोबारा नाजिल  करने का औचित्य   या  कारन  क्या  हैं  ? यही  सवाल  हमने  सन 1967 में  हमने  झाँसी  में उन   मौलवी  जी  से पूछा  था जो हमें  अरबी  पढ़ाया  करते  था , ,यह बात हमें आज इसलिए  याद आगयी क्योंक   एक  हफ्ता पहले  मेरा  एक पुलिस  अफसर  से   परिचय  हुआ  जो उसी थाने में  नियुक्त  थे  जिसमे मेरा मोहल्ला  भी  आता  है  ,   चूँकि  आज तक  कोई इस सवाल  का  संतोष  जनक  उत्तर  नहीं   दे पाया  था  ,  लेकिन  आज  हमने  इतनी  अरबी  सीख ली   है कि हम  लोगों  को बता  सकें  की  कुरान  की सूरा फातिहा  दोबारा  नाजिल  होने  का  क्या रहस्य है ?लेकिन  इस विषय को ठीक से समझने के लिया  आपको मुहमम्मद  समय के   मक्का वासी लोगों  की मान्यताओं  की जानकारी  होना जरुरी   है

3-मक्का  के लोग दो  ही लोक मानते  थे 
मुहम्मद  के  समय  मक्का के लोगों का कोई धर्म नहीं  था  ,लेकिन  मक्का में  यहूदी  और ईसाई   भी  रहते  थे  , जो मानते   थे कि जैसे पृत्वी  लोक  में  मनुष्य  प्राणी नदी पहाड़     पेड़  अदि  हैं वैसे  ही  आसमान पर  भी  पृथ्वी जैसा  एक और लोक  है  ,  ( लोक को  अरबी में  " आलम -  العالم " और  फारसी में  " जहान -جہان  "   कहा  जाता  है  ,  यहूदी  और ईसाई  लोगों  की बात   से  प्रभावित अरब  लोग  भी     दो  आलम  माना  करते  थे  , मुहम्मद ने भी  इस बात  को सच   मन  लिया  ,
4-अल्लाह केवल दो लोकों  का स्वामी  है 
सूरा  फातिहा में कुल सात  आयतें  हैं  ,इस्लामी मान्यता के अनुसार  सूरा फातिहा मक्का में नाजिल हुई  थी  , इसकी पहली   ही आयात में  अल्लाह  को केवल   दो    लोकों  का स्वामी  बताया गया  था  ,  जो  अरबी में इस प्रकार  है   ,
"ربِّ العالميَن  " 1:2.हिंदी में   - रब्बिल आलमैन 
अरबी व्याकरण के अनुसार  "आलमैन -   العالميَن   " द्विवचन  (dual  number "  है ,इसका मतलब  दो  आलम (लोक ) है  , अरबी में संस्कृत की तरह  द्विवचन  होता  है  इसे  तस्निया  कहते  है  , इसके अनेकों उदहारण मिल सकते  हैं  जैसे   " यदैन - يديَن   " दो हाथ , "उजनैन -اُذنيَن "  दो कान , और  "हसनैन -  حسنيَن  " हसन और हुसैन  . इत्यादि,,चूँकि मुहम्मद के समय तक कुरान लिखित रूप में नहीं थी  , और जिन लोगों ने कुरान के जो हिस्से लिख  रखे थे   वह अरबी की कूफ़ी  लिपि में थे  , इस लिपि में हुरूफ़ यानि अक्षर   के साथ मात्राएँ   " हरकात - حركات    "   ( Diacretics  ) नहीं  लगाए जाते हैं  , ,इन्हें सिर्फ बोला जाता  है  , लोग समझ लेते  हैं कि किस शब्द  को कैसे बोलना  है ,
इसी  लिए जब  तक मुहम्मद साहब मक्का में रहे  मक्का  के सभी मुस्लिम  हर  नमाज में  सूरा फातिहा पढ़ते यानि बोलते समय "रब्बिल  आल मैन " कहते  रहे   , क्योंकि वह   यही जानते थे कि अल्लाह  ने सिर्फ  दो  ही जहान बनाये  हैं  जिनका स्वामी एकमात्र  अल्लाह ही  है  , यह  बात कुरान की इन आयतों  से  साबित  है ,
4-मुहम्मद  भी  अल्लाह को दो जहाँ  स्वामी  मानते  थे

  मुहम्मद    की देखादेखी मक्का  के मुसलमान   भी ऐसा  मानने लगे  की  सिर्फ  दो  ही  जहान हैं   ,एक धरती  पर दूसरा  आसमान  में    यह  कुरान  में  है ,
1."जो आकाश और धरती के राज का स्वामी  है "  . सूरा  फुरकान   25 :2 
"الَّذِي لَهُ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ   "25:2
(He to whom the dominion over the heavens and the earth)

2."प्रसंशा   अल्लाह  की जो आकाश  और धरती का रब (स्वामी  ) है  "सूरा  अल जसिया 45 :36
"وَلِلَّهِ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ   "  45:36
(God's is the dominion over the heavens and the earth;)45:36

3."आकाश और धरती  के रब  (स्वामी ) की कसम  :सूरा  ज़ारियात 51:23 
"فَوَرَبِّ السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ  "51:23
(Sustainer of heaven and earth,51:23

कुरान द्वारा  फैलाई  अज्ञानता  के कारण  ,आज भी मुस्लिम  दो ही  लोक मानते  हैं  और मदरसों में यह  दुआ  गाई जाती ही ,
"ऐ दो  जहाँ  के मालिक  सुन  ले मेरी सदा ,
रुसवा न होने पाए  अल्लाह मेरी  दुआ "


5-मुहम्मद ने सूरा  फातिहा क्यों  सुधारी ?
, वास्तव में  सूरा   फातिहा मदीना  में दोबारा   नाजिल  नहीं  हुई जैसा मुस्लिम  विद्वान  दावा   करते  है   असल  में मुहम्मद  ने   सूरा  फातिहा  के  शब्द "'रब्बिल आल मैन  ' में  जरा  सा सुधार कर  दिया  जिस  से  इस शब्द  का  अर्थ  ही बदल   गया  इसे  सिर्फ  वही  समझ  सकते  हैं  जो  अरबी व्याकरण  जानते   हों  , इसके  पीछे   यह  ऐतिहासिक  घटना  हैं ,जब मक्का के लोग मुहम्मद और उनके साथियों  की जिहादी हरकतों से परेशान हो  गए तो उन्होंने मुहमद को मय अपनी पत्नियों   रिश्तेदारों  और साथियों  सहित  सबको मक्का से खदेड़   दिया  , और  अपनी  जान बचने के लिए  मुहम्मद  गुरुवार  23 मई सन 628 को  मक्का से मदीना की तरफ हिजरत कर  गए और सभी लोग शुक्रवार 28 मई  सन  628 को मदीना पहुंच  गए  ,मदीना में  ईरानी  लोग भी रहते थे  , मूलतः  आर्य   ही थे  उनकी मान्यताएं  यहूदी ईसाई और  अरब लोगों  से अलग थी  , मदीना में मुहम्मद का   एक  जरदुश्ती ईरानी  व्यक्ति  से परिचय हुआ  उसका असली नाम "रोज बेह ROZBEH(  )था  , वह पढ़ालिखा  था   , लोग उसे सलमान  फारसी  कहते   थे  , जब वह मुहम्मद का साथी बन गया तो मुहम्मद ने उसका नाम " अबू  अब्दुल्लाह  " रख  दिया    और वह मुस्लिम बन  गया ,और  जब  मुहम्मद अपनी मस्जिद में लोगों  को नमाज पढ़ाते सूरा फातिहा   बोल  रहे थे तो   सलमान फारसी    ध्यान से सुन  रहा था   तो नमाज के  बाद     उसने कहा  की  अगर  यह सूरा   मेरे देश में पढ़ी जाएगी तो  लोग इसका मजाक उड़ाएंगे   ,  क्योंकि दुनियां  जानती है कि सृष्टि  में दो आलम   नहीं     तीन  आलम  हैं   ,  हमारे  यहाँ  खुदा  को   तीनों  लोकों  का खुदा माना  जाता  है   ( हिन्दू  भी त्रिलोकी  नाथ  कहते  हैं  .

6-सूरा फातिहा में यह सुधार  किया गया 
सूरा फातिहा में कुल  सात आयतें  हैं   और जब पहली बार यह सूरा मक्का में  नाजिल हुई थी  ,तो उसमे  पहली  आयात में  अल्लाह को "रब्बिल आल मैन -ربَّ العالميَن   " कहा  गया   था  , अरबी व्याकरण के अनुसार  द्वि वचन  (Dual Number      )  है  .इसका अर्थ  "दो जहानों  का मालिक   ,  लेकिन  जब  सलमान  फारसी  ने बताया  कि जहान (आलम )   दो नहीं  बल्कि तीन यानी  दो से  अधिक  है  , तो मुहम्मद  ने इसे सुधार  कर "रब्बिल आल मीन -    " कर    दिया    ,  यह " आलम -العالم  "शब्द  का बहुवचन  (Plural Number    )  इसका अर्थ  बहुत   से आलम     होता  है , यह सुधार  मदीना  में हुआ  था
 , और मुहम्मद  ने सभी मुस्लिमों  से कहा  कि आज  से  हर नमाज में  जब  भी  सूरा  फातिहा  बोली जाये  तो "रब्बिल आल मैन-ربَّ العالميَن " की जगह "रब्बिल आल मीन- رَبِ العالميِن"बोला  करो  .इस  जरा से सुधार  से   अल्लाह  और बड़ा बना दिया   गया .

7-अल्लाह दो की जगह तीन जहानों   का स्वामी हो गया  ,
 और इसकी पुष्टि  के लिए कुरान  में यह  आयात  उतार  दी  गयी   
""आकाश और  पृथ्वी  का स्वामी और जो  उनके बीच  में  है उसका  भी "38:66

"رَبُّ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا   " 38:66
( Sustainer of the heavens and the earth and all that is between them, )
सूरा  -साद 38:66

8-दौनों में बारीक़  सा अंतर  है 
सामान्य लोगों  को  यह दौनों  शब्द एक  जैसे लगेंगे लेकिन जो  लोग अरबी व्याकरण जानते हैं वह इस अंतर को  समझ  जायेंगे 
'मक्का में   आल मैन शब्द में अरबी अक्षर    " ये -يَ "  के ऊपर   फतह  है    इस  से  "ै "   की  मात्रा  हो जाती है जो  द्विवचन का  द्योतक है .
जबकि मदीना में    अरबी  अक्षर "ये -ي    "  के निचे  (    يِ )  कसरह  है  ,जिस से:  "  मात्रा  होती है  , जो बहुवचन  होने की निशानी  है  
निष्कर्ष -   इन   प्रमाणों  से सिद्ध होता है  कि ,
1.अल्लाह को खगोल विज्ञानं और अंतरिक्ष  में करोड़ों  ग्रहों यानि आलमों का कोई ज्ञान  नहीं  है   वह जमीन  और आसमान के आलावा कुछ नहीं  जानता
2-कुरान   आसमान से भेजी किताब नहीं    इसमें भी   सुधर हो सकता  है 
3-मुस्लिम विद्वानों  का दवा  झूठ है की कुरान में  संशोधन नहीं  हो  सकता 
इसलिए  हम  सभी पाठकों  से निवेदन करते हैं की इस लेख को ध्यान से पढ़ें   लेकिन हमें मालूम है कि कुछ  अतिचतुर लोग इस लेख को गलत  साबित करने की कुचेष्टा  करेंगे  ,  यदि ऐसा हुआ तो हम सिद्ध   कर देंगे कि सूरा  फातिहा कई लोगों  ने मिल कर बनायीं   थी   सोच लीजिये
   "सूरा  फातिहा में रद्दोबदल  हुआ  है "( No 181/118)  date .25/07/2010
(438   )

गुरुवार, 21 मई 2020

रसूल ने अल्लाह की महानता की पोल खोल दी !


  मुझे पूरा  यक़ीन है कि इस लेख का शीर्षक पढ़ते ही मुस्लिम पाठकों के कान खड़े हो जायेंगे  ,क्योंकि मुस्लिमों को बचपन से ही इस  वाक्य यही  अर्थ  बताया  जाता  है कि '" अल्लाह  सबसे बड़ा  है   ( Allah is Greate      ) और  इसी के कारन  मुसलमानों  ने अल्लाहु  अकबर  का नारा  लगा  कर  आज तक करोड़ों   गैर मुस्लिमों  की हत्याएं  की।  करोड़ों  औरतों  को विधवा  कर गया  और इतने बच्चों  की निर्दयता  से मार् दिया  , अनेकों  शहर उजाड़  दिए  , लोगों  के घर और सम्पति बर्बाद  कर  दी  , यही नहीं  अल्लाहु अकबर  बोल  कर  अबतक  अरबों  मूक  जानवरों  की गर्दनों  पर छुरी  चला    दी  , और यही नारा  लगाकर  मुस्लिमों खुद मुहम्मद  रिश्तेदारों  तक  की हत्याएं  कर  डालीं  , जो सब  जानते  हैं ,
हमने यह लेख इसलिए तैयार  कि हिन्दुओं  के साथ  मुस्लिम  भी इस सच्चाई  को जानें  को  उनसे  मुल्लो  ने छुपा  राखी   थी  . कुछ  समय एक मौलवी  ने कहा   की हम लोग भारत माता की  जय  , और वन्दे मातरम नहीं बोल  सकते  क्योंकि  यह संविधान में नहीं लिखा   है  . अगर ऐसा है तो  हम  सभी मुस्लिम  को  खुली  चुनौती  देते  हैं  कि जैसे वह  सिर्फ  संविधान   को  ही मानते   हैं   वैसे की कुरान  अल्लाह  संविधान है  , अगर मुस्लिमों  में हिम्मत  हो  तो  कुरान  की   एक  भी  ऐसी  आयात  दिखाएँ  जिसमे   " अल्लाहु अकबर  -    الله اكبر      "  दिया  गया  हो  ,नहीं  तो  यह शब्द बोलना बंद  करें  , क्योंकि  यह  कुरान के खिलाफ   है  ,वास्तव में  अल्लाह  सबसे  बड़ा नहीं  है जैसा की मुस्लिंम  अज्ञान के कारन   आज  तक मानते  आये हैं   
1-पूरी कुरान में अल्लाहु अकबर  नहीं  है
 जो लोग ऐसा नारा  लगाते हैं उनको पता होना  चाहिए कि कुरान में अल्लाह के साथ  अकबर  शब्द नहीं  है  बल्कि  तीन  जगह    अल्लाह  के  साथ  "कबीर -" शब्द  आया  है  , कुरान की तीन  आयतें  देखिये ,
1.सूरा -निसा  4:34 
" إِنَّ اللَّهَ كَانَ عَلِيًّا كَبِيرًا  "
, God is high, great!

2.सूरा -राद 13:9 
"عَالِمُ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ الْكَبِيرُ الْمُتَعَالِ  "
Great One, the One far above anything that is or could ever exalted

3.सुरा -सबा 34 :23 
"وَهُوَ الْعَلِيُّ الْكَبِيرُ  "
2-आयतों  का   सही  अर्थ 
मुस्लिम विद्वानों  ने  इन तीनों  आयतों  में आये   "कबीर  " शब्द का बड़ी चालाकी से महान Grate कर  दिया और  सिर्फ  अल्लाह  को ही  इबादत  के योग्य   साबित  करने  का  पूरा प्रयास  किया है  , लेकिन अरबी व्याकरण के अनुसार  कबीर का  अर्थ   यह  है
इस तरह  कुरान    इन तीन जगहों  में जहाँ  अल्लाह के लिए "  कबीर -   " शब्द  आया है मुस्लिमों ने बड़ी मक्कारी से इसका अर्थ  Great यानि महान कर  दिया   जबकि  इसका सही अर्थ बड़ा  (आकार में आयु में ) अंगरेजी में   Big और Large है .,यह एक विशेषण   (Adjective )  है .कबीर  से   जैसे विशेषण  हैं    "सग़ीर -     " छोटा  -Small और  "फ़ज़ील -   " अच्छा Good  हैं    ,ऐसे  शब्दों  का प्रयोग  किसी विशेषता बताने के लिए  होता  है और  जब  किसी चीज की तुलना  किसी  एक चीज से या बहुत चीजों  से  करनी होती है   इनका रूप बदल  जाता  है  जैसे ,
जैसे  कबीर  का " अकबर  -اكبر" , सगीर -  " का  "असगर - اسغر "  और  "फजील -  فضيل"  का "अफजल -افضل  "   इत्यादि .
विशेषताओं   के आधार पर   किन्हीं में तुलना करने की विधि को अरबी में "उसूल  तत फजील -  أُسْلُـوبُ التَّفْضِيلِ " कहा  जाता   है The style ofcomparison .
जब  एक  के साथ  एक  की      या एक के साथ  कई की तुलना की  जाती  है इसे "दर जत मुकारना  व्  फायकः -   درجة مقارنة وفائقة  " कहा  जाता  है  (comparative and superlative degree). और जब  दो के बीच में  तुलना की जाती है   अरबी में दौनों के बिच  "मिन -  مِن "   संयोजक  जोड़ा  जाता  है  हिंदी में इसका अर्थ     " से "  है    , और जब   एक के साथ  तुलना की जाती है तो  अरबी    "फि -في   " लगाया  जाता  है  इसका अर्थ     "में "   है  ,
A - दो के बिच तुलना  (Comparative) उदहारण 
فاطِمَةُ أَكْبَرُ سِنًّا مِنْ عائِشَةَ   (फातिमा   अकबर  सना मिन आयशा 
 Fatima is older than Aisha-फातिमा  आयशा  से  उम्र से बड़ी  है 
الفيل اكبر من الفار  (अल फील अकबर   मिनल फार
Elephat biggar than mouse -हाथी चूहा   से बड़ा  है 
B-एक की तुलना अनेक से -superlative
القاهرة أكبر المدن في مصر -अल काहिरा  अकबर  मदन फी  मिस्र
काहिरा मिस्र में बड़ा   शहर  है -Cairo is the biggest of the cities in Egypt.
इस प्रकार  से कुरान  और  अरबी व्याकरण  के अनुसार   अल्लाह  सिर्फ  "बड़ा  "   (Big ,) हो सकता  है  ,  सबसे  महान (greatest )   नहीं   हो सकता  इसलिए  अल्लाह  की इबादत   बेकार  है  .
हमें  पूरा  विश्वास  है कि अपनी  आदत से मजबूर   इन   सबूतों   पर आपत्ति   करेंगे  , उनके  लिए  हमने पहले  ही  एक लेख  पोस्ट  कर दिया  था  जिसला शीर्षक  था  "अल्लाह भी नमाज पढ़ता  है   ! (लेख संख्या  415 )
ऐसे  लोगों  के  लिए उस लेख का अंगरेजी  मुख्य  भाग  दे  रहे  हैं 

 , when Muhammad reached the 7th heaven during the Isra and Mi'raj, he encountered Gabriel, who immediately said “Shh! Wait, for Allah is praying (Sala).” Muhammad asked: “Does Allah pray?” to which Gabriel said, “Yes, he prays.” Muhammad then asked, “What does he pray?” and Gabriel said “Praise! Praise the Lord!”’


 Kitab Al Sunna by Abdullah bin Ahmad, vol.1, p.272


इसलिए अल्लाहु अकबर  कहना  अज्ञान  है और इस्लामी अरबी अल्लाह  की इबादत  ठीक  नहीं  है ,इबादत करना है तो उसकी इबादत करो  जिसके लिए अल्लाह भी  नमाज पढता  है  

(435)

बुधवार, 20 मई 2020

अल्लाह कौन था ?

(यह लेख  हमने 8 दिसंबर 2010 को  तैयार किया था  यानी    लगभग   10 साल  पहले  ,हमने इस लेख में प्रमाणों के साथ साबित कर दिया था कि अल्लाह सर्वशक्तिमान     यानी ईश्वर नहीं  हो सकता  है  , यह मुहम्मद की कल्पना  थी  , जो मुहम्मद की मौत के साथ ही गायब  हो गयी   , आज  मेरी यह बात   सही  साबित  हो  गयी  ,  आज मुस्लमान  काबा  में रहने वाले  अल्लाह  को छोड़ कर भाग  रहे  हैं  ,  अगर सचमुच  अल्लाह होता तो  किसी फरिश्ते
को  भेज   देता  ?मुझे  यह  जानकर ख़ुशी  हुई कि इतने  साल  बाद  किसी ने मेरे लेख  को विडिओ  के रूप  में यू  ट्यूब  में डाल दिया   है  यद्यपि  हम उन महोदय  को नहीं  जानते फिर भी  आभार प्रकट  करते  हैं  ,)


यदि कुरान और हदीसों को ध्यान से पढ़ें ,तो उसमे अल्लाह के द्वारा जितने भी आदेश दिए गए हैं ,सब में केवल जिहाद ,ह्त्या ,लूट ,बलात्कार और अय्याशी से सम्बंधित है .कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति इनकी ईश्वर के आदेश मानने से इंकार कर देगा .अप देखेंगे की अल्लाह हमेशा मुहम्मद का पक्ष लेता है ,मुहम्मद के हरेक कुकर्म को किसी न किसी आयात से जायज बता देता है .मुहम्मद के लिए औरतों का इंतजाम करता है ,मुहम्मद के घरेलु विवाद सुलझाता है ,मुहम्मद के पापों पर पर्दा डालता है ,आदि
यूरोप के विद्वान् इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि वास्तव में अल्लाह एक कल्पित चरित्र है .अल्लाह का कोई अस्तित्व नहीं है .अल्लाह और कोई नहीं मुहम्मद ही था .जो अल्लाह का रूप धरकर पाखण्ड कर रहा था ,और लोगों को मूर्ख बनाकर अपनी मनमर्जी चला रहा था .और अय्याशी कर रहा था .कुरान अल्लाह की किताब नहीं ,बल्कि मुहम्मद ,आयशा ,और वर्क बिन नौफल की बेतुकी बातों का संग्रह है .और हदीसें मुहम्मद के साथियों द्वारा चुगली की गयी बातें हैं
 (इसके बारे में अगले लेख में विस्तार से दिया जायेगा )
यहाँ पर उन्हीं तथ्यों की समीक्षा की जा रही है ,जिस से साबित होता है ,की मुहम्मद अलाह की खाल ओढ़कर अपनी चालें कैसे चलता था .इसके लिए प्रमाणिक हदीसों और कुरान से हवाले लिए गए हैं -

क्या झूठी गवाही देना अपराध नहीं है ?

(हमें पूरा विश्ववास   है कि इस लेख को पढ़ कर कुछ  मुस्लिम पाठक संदेह  करेंगे  , इसलिए हम पहले उनसे यह सवाल  करते  हैं ,कुरान में  25 रसूलों  का  वर्णन है  , मुस्लिम सभी  पर ईमान  रखते  है  , लेकिन क्या कारण  है कि अजान में  सिर्फ मुहम्मद  के रसूल होने की गवाही  दी  जाती ,किसी  और की क्यों  नहीं   ? 
 इसका  असली  कारण यह  है कि मुहम्मद  एकमात्र    ऐसे व्यक्ति  थे जिन्होंने  रसूल  होने का  दवा  तो  किया  था लेकिन जब  सन 628 में  कुरैश  के साथ लिखित संधि  हुई  थी  तो उसमे मुहम्मद  ने  स्वीकार  किया  था कि मैं  अल्लाह  का रसूल नहीं  सामान्य  व्यक्ति  अब्दुल्लाह  का पुत्र  हूँ )


 अक्सर लोग निजी  स्वार्थ  के लिए  या किसी अच्छे व्यक्ति  को बुरा  और किसी बुरे व्यक्ति को अच्छा  साबित करने के लिए  झूठ बोला करते  है  , कुछ भी  हो समाज  झूठ बोलने वालों  पर विश्वास  नहीं  करता  ,क्योंकि झूठ बोलना  एक सामाजिक  दुर्गुण   और  अपराध  है  ,परन्तु  जब कोई  एक  या अनेक व्यक्ति झूठी गवाही  देते  हैं भारतीय  कानून  के मुताबिक  ऐसा  करना  दंडनीय  अपराध  बन  जाता  है
1-झूठी गवाही देना अपराध  है 
"धारा 191 में झूठी गवाही का दोषी पाए जाने पर इसी सिलसिले में आईपीसी की धारा 193 में सज़ा यानी दंड का प्रावधान किया गया है। इसमें मिथ्या साक्ष्य देने वाले को 3 वर्ष से लेकर 7 वर्ष तक की कैद, ज़ुर्माना या दोनों का प्रावधान है। न्यायिक मामले में 7 वर्ष की सज़ा तो अन्य मामले में 3 वर्ष का दंड दिया जा सकता है। हालांकि इसमें बेल भी हो सकती है और यह एक गैर संज्ञेय अपराध है।झूठी गवाही का दायरा काफी व्यापक है। कई बार आपको किसी अपराध के बारे में आँखों देखी घटना का विवरण देना होता है और ऐसे में इस बात की पूरी संभावना होती है कि आप बढ़ा-चढ़ा कर मनगढ़ंत बातें कर सकते हैं
बता दें कि झूठी गवाही का माध्यम चाहे मौखिक रूप में हो या लिखित रूप में दोनों ही धारा 191 के तहत जुर्म है।
सबसे पहले  तो  हम  स्पष्ट  कर देना  कहते  हैं  कि हमें  कानून  का  कोई ज्ञान  नहीं  है इसलिए  हम यह मुद्दा  उन लोगों  पर छोड़ते  हैं  जो कानून  की बारीकियों  को जानते  है  .हम  मुद्दे  को स्पष्ट  करने के लिए  एक उदहारण देते  हैं
2-उदहारण 
एक A नामका व्यक्ति    रोज  पांच बार लोगों  को बुला कर  किसी ऊँची जगह चिल्ला   कर भीड़   इकट्ठी  करता है और   लोगों  के सामने   कहता  है ,कि "मैं  गवाही देता  हूँ  कि " B  " नामका व्यक्ति    राष्ट्रपति  का   दूत   है  , जबकि       A नामके  व्यक्ति  ने    "B " को न तो कभी देखा और  न   उसके पास  यह बात  साबित करने के लिए कोई  दस्तावेज   है  , स्वाभाविक  रूप  से  सभी  कहेंगे  कि पहले  तो    A को गिरफ्तार  करो   और इसकी  गवाही  की जाँच  करो  और गवाही  झूठी होने पर  इसको  उचित दंड  दिया  जाये ,
3-अजान  भी  एक झूटी  गवाही  है 
 लोगों  को  पता होना चाहिए कि अजान में  चिल्लाने वाले वाक्य कुरान   में नहीं   हैं   फिर भी  दिन में पांच बार  "मुअज्जिन -  " कर्कश आवाज में  चिल्लाता  है ,
कान  फोड़ू   आवाज  से  दो  बार    यह  शब्द  बोलता है   ,
(अरबी में      "गवाह " को "शहिद -   شاهد   "  और  गवाही  को "शहादह -  ٱلشَّهَادَة‎,  "  कहा  जाता  है   )
 
أَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا رَسُولُ ٱللَّٰهِ

(अश्हदु अन्न मुहम्मदर्रसूलल्लाह )
अर्थात  -मैं  गवाही  देता  हूँ   कि मुहम्मद  अल्लाह  का रसूल  है   
I bear witness that Muhammad is the messenger of God.


गौर करने  की बात तो यह है कि मुहम्मद को मरे हुए   सैकड़ों  सा
ल हो गए  न तो मुअज्जिन   (गवाह  ) ने मुहमद को देखा  , और न उसके पास मुहमद  के रसूल होने  का कोई  प्रमाण     है    फिर भी जबर दस्ती   गवाही देता  है  माननीय लखनऊ हाईकोर्ट  ने  अजान के बारे में कहा  है
"वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी भी दूसरे व्यक्ति को जबरन सुनाने का अधिकार नहीं देती है।"
, यह लेख  हमें इस लिए लिखना  पड़ा   कि हमें  पता  चला  मुहम्मद  ने   मुहम्मद  ने  सन 628 में हुदैबिया के लिखित    समझौते में स्वीकार  किया  था कि "मैं अल्लाह   का रसूल  नहीं हूँ  " मैं तो अब्दुल्लाह का पुत्र   साधारण  व्यक्ति   हूँ।  
इसके बारे में हमने  विस्तार से अपने लेख संख्या  398 में  पूरी जानकारी   दी  थी  ,लेख  का शीर्षक  था ,

 "जब मुहम्मद ने कबूला  कि  मैं  रसूलल्लाह  नहीं   !

شروط الصّلح

فلما اتفق الطرفان على الصلح دعا رسول الله علي بن أبي طالب فقال له: " اكتب: بسم الله الرحمن الرحيم ".
فقال سهيل: أما الرحمن، فما أدري ما هو؟ ولكن اكتب: باسمك اللهم كما كنت تكتب.
فقال المسلمون: والله لا نكتبها إلا بسم الله الرحمن الرحيم
فقال: " اكتب: باسمك اللهم "
ثم قال: " اكتب: هذا ما قاضى عليه محمد رسول الله "
فقال سهيل: والله لو نعلم أنك رسول الله ما صددناك عن البيت، ولكن اكتب محمد بن عبد الله
فقال: " إني رسول الله، وإن كذبتموني اكتب محمد بن عبد الله ".

ثم تمت كتابة الصحيفة على الشروط التالية:


https://ar.wikipedia.org/wiki/%D8%B5%D9%84%D8%AD_%D8%A7%D9%84%D8%AD%D8%AF%D9%8A%D8%A8%D9%8A%D8%A9

नॉट  -इस लेख में हमने हिंदी अंगरेजी   में साबुत दिया था की मुहम्मद  ने काबुल  किया था कि मैं  अल्लाह का  रसूल नहीं     , फिर भी हम  अरबी साईट की लिंक दे रहे  हैं  ताकि  कोई शंका न  रहे  ,इस संधि  की  फोटो गूगल में सर्च करके मिल जाएगी     असली इस्ताम्बुल के संग्रहालय  में  राखी  है
यह अच्छी  बात है  क़ि मस्जिदों   से लाऊडस्पीकर  से  अजान  देते   को  अदालत  ने इस्लाम  का अनिवार्य  अंग   नहीं  माना  है " इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मस्जिद से अजान मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि लाउडस्पीकर से अजान देना इस्लाम का धार्मिक भाग नहीं है। कोर्ट ने कहा कि जब स्पीकर नहीं था तब भी अजान होती थी। इसलिए यह नहीं कह सकते कि स्पीकर से अजान रोकना अनुच्छेद 25 के धार्मिक स्वतंत्रता के मूल अधिकारों का उल्लंघन है। कोर्ट ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21 स्वस्थ जीवन का अधिकार देती है।सबसे    अधिक  ध्यान  देने की  बात  यह  है कि
वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी भी दूसरे व्यक्ति को जबरन सुनाने का अधिकार नहीं देती है।
2--विचारणीय प्रश्न   
 हम सभी  प्रबुद्ध  पाठकों  के  समक्ष  अजान  से सम्बन्धी कुछ  प्रश्न   दे  रहे  हैं इन पर गौर करें ,
1.कुरान में ऐसी गवाही देने का हुक्म  कहाँ   है  ?
2.तुम्हें गवाही  देने की जरुरत क्यों  पड़ी ?
3-तुमसे गवाही  कौन मांग   रहा  है  ? और बिना मांगे गवाही क्यों  दे रहे   हो  ?
3-मुहम्मद  को गवाही की जरुरत क्यों   पड़ी   ?

इसका  असली  कारन   यह  है कि "अल्लाह  ने  मुहम्मद के साथ  धोखा  किया  था  ,  क्योंकि जब हुदैबिया  की  सुलह में मुद्दों   में मुहम्मद के रसूल होने  की बात  आयी    और मुहम्मद कोई सबूत नहीं  कर पाया  तो लोग मुहम्मद  की हंसी उड़ाने  लगे  , अगर उसी समय अल्लाह  किसी फ़रिश्ते  से मुहम्मद  के रसूल होने  का  सर्टिफिकेट  भेज  देता  तो  मुहम्मद  की इज्जत बच  जाती  , लेकिन सर्वज्ञ  और सर्वशक्तिमान  होने पर भी अल्लाह ने मुहम्मद  की मदद  नहीं  की  , और   ऐन  समय  गायब  हो गया  ,
  मजबूर  होकर मुहम्मद  ने अपने लोगों  को हुक्म  दिया की  आगे से  जब  भी नमाज हो  तो अजान  में  यह  वाक्य जोर जोर  से जरुर  बोला  करो  की  मैं  गवाही  देता हूँ की मुहम्मद  अल्लाह  का  रसूल  है ,
तब  से आजतक मुस्लमान पूरी दुनियां में  यही झूठी गवाही   देते  आ  रहे हैं  , और चूँकि भारत प्रजातंत्र  है  यहाँ   कानून का राज चलता है  शरीयत का नहीं   ,इसलिए हमारी मांग  है कि ऐसे झूठी गवाही  देने वालों पर   कानून के अनुसार उचित  कार्यवाही   की  जाये  , 

हम  इस छोटे  से लेख में माद्यम  से  उन सभी धर्म प्रेमी      (  चाहे  आर्यसमाजी हों  या सनातनी    )  जो कानून के  जानकर  भी हों  निवेदन  करते है  की   जूठी गवाही  देने  वालों के विरुद्ध  याचिका  जरूर   करें  ,   ऐसे लोगों  का  आसान करने के हमने पहले ही  एक लेख पोस्ट कर  दिया  हैNO 398   ,जिसका  शीर्षक    है

" जब मुहम्मद ने कबूला कि मैं रसूलल्लाह नहीं !

https://www.facebook.com/groups/1549256338723600/permalink/2545498892432668/


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मंगलवार, 12 मई 2020

मुहम्मद रसूल या काफ़िर ?

मुसलाम्मान कहते हैं कि अल्लाह ने स्रष्टि से लेकर मुहम्मद के समय तक एक लाख से अधिक नबी और रसूल दुनिया में भेजे हैं .और कई रसूल ऐसे भी थे जिनको अल्लाह ने किताबें भी दी थी .और मुहम्मद अल्लाह का आखिरी रसूल और कुरान अल्लाह की आखिरी किताब है .इसके बाद सिलसिला बंद हो गया .इसका अर्थ है कि कुरआन अटल है .जो कुरान के आसेशों का उल्लंघन करेगा वह काफिर हो जाएगा .और दोजख में जायेगा .हरेक के लिए कुरान का आदेश मानना जरूरी है ,चाहे वह कोई भी हो .कुरआन के आदेश अल्लाह के आदेश हैं .

लेकिन खुद को अल्लाह का आखिरी रसूल बताने वाले मुहम्मद ने अपने जीवन में कुरान में दिए गए अल्लाह के आदेशों का कई बार खुल्लमखुल्ला उल्लंघन किया था .इससे पाहिले किसी नबी या रसूल ने ऐसा करने की हिम्मत नहीं कि थी .

थोड़े से उदाहरण दिए जा रहे है ,लोग फैसला करें कि मुहम्मद को काफिर क्यों नहीं माने ? 

पहिले कुरआन के आदेश दिए गए हैं ,फिर उल्लंघन का हवाला हदीसोंसे दिया गया है सभी हदीसें प्रमाणिक हैं . 

1 -रोजे की हालत में सेक्स किया 

आदेश -"तुम्हारे लिए रोजे की रातों में अपनी स्त्रियों के पास जाना हराम है "
सूरा -बकरा 2 :187 

उल्लंघन -रसूल ने रोजे कि हालत में अपनी पत्नी उम्मे सलाम को चूमा और शारीरिक सम्बन्ध बनाया .उस समय उम्मे सलमा अपनी माहवारी से थी .
बुखारी -जिल्द 1 किताब 6 हदीस 319 

"उम्मे सलाम ने कहा कि ,रसूल रोजे से थे और मेरा महीना चल रहा था .रसूल ने मुझे एक ऊनी लिहाफ में लिटा लिया और फिर मेरे कपडे उतारवा दिए,और अपने कपडे उतार दिए .फिर हमने मिल कर एक मिट्टी के बड़े से बर्तन Jambaa में नहाया .और रसूल मुझे चूमते रहे .

बुखारी -जिल्द 3 किताब 31 हदीस 149 

"आयशा ने कहा कि रसूल रोजे की हालत में भी अपनी औरतों आलिंगन में लेकर उनको चुमते थे .और वे रोजे हालत में मेरी जीभ को अपने मुंह में लेकर चूसते थे.सुन्नन अबू दौउद -किताब 13 हदीस 2380 

2 -शादी में मेहर नहीं दिया 

आदेश -"और तुम अपनी औरतों को शादी के समय उनका मेहर हैसियत के मुताबिक़ दो "सूरा -अन निसा 4 :4 

उल्लंघन -"रसूल ने साफिया बिन्त हुयेय्य नामकी औरत से शादी की ,जिसे खैबर के युद्ध में पकड़ा गया था ,रसूल पाहिले उसके साथ तीन दिनों तक सम्भोग किया था
.बुखारी -जिल्द 5 किताब 59 हदीस 523 

"अनस बिन मालिक ने कहा कि ,खैबर से लौटते समय रसूल ने रस्ते में ही साफिया को अपनी पत्नी घोषित कर दिया था .और उसपर एक चादर डाल दी थी .फिर तीन दिनों तक उसके साथ सम्भोग किया .
बुखारी -जिल्द 5 किताब 59 हदीस 524 

"अनस बिन मालिक ने कहा कि खिबर से लौटते समय रसूल रास्ते में तीन दिन रुके ,और साफिया से मुसलमान बनाने को कहा .फिर लोगों से कहा कि आज से यह ईमान वालों की माँ (उम्मुल मोमिनीन )है .फिर रसूल के गुलाम बिलाल ने खजूर की चटाई बिछाई और रसूल ने साफिया पर चादर डाल कर उस से सबके सामने सम्भोग किया .अबू दाउद-जिल्द 2 किताब 11 हदीस 2118

"अनस ने बिन मालिक ने कहा की ,जब रसूल साफिया के साथ सम्भोग की तय्यारी कर रहे थे तो ,उस्मान ने कहा कि साफिया कुंवारी नहीं है .उसकी शादी हो चुकी है .रिवाज के अनुसार उसकी इद्दत पूरी नहीं हुई है .लेकिन रसूल नहीं माने .
मुस्लिम -किताब 8 हदीस 3326 

3 -विधवा से शादी के समय इद्दत का नियम तोड़ा 

आदेश -"और तलाक पायी गयी औरतें अपनी तीन माहवारी तक अपने को प्रतीक्षा में रखें "सूरा बकरा -2 :228 

आदेश -"विधवा औरतें अपने अप को तीन महीने और दस दिनों तक परत्त्क्षा में रखें ,फिर उसके बाद उनकी सामान्य नियमों के अनुसार शादी की जा सकती है .
सूरा -बकरा 2 :234 

उल्लंघन -अनस बिन मालिक ने कहा कि जब रसूल ने साफिया के पति को क़त्ल करवा दिया तो ,वह विधवा हो गयी थी .साफिया काफी सुन्दर थी .रसूल कि नजर उस पड़ी तो .रसूल ने साफिया को पकड़ कर अपने साथ ऊंट पर बिठा लिया .और जब खैबर से मदीना जाने लगे तो रास्तेमे ऊंट को रोका और लोगों से बोले यह मेरी पत्नी है ."
बुखारी -जिल्द 4 किताब 52 हदीस 143 

4 -अनुमति से अधिक औरतें रखीं 

आदेश -"और इतनी औरतों के बाद अतिरिक्त औरतें रखना तुम्हारे लिए हराम है .और यह जायज नहीं है कि तुम अपनी पत्नियों को बदल कर दूसरी औरतें ले आओ .चाहे उनकी सुन्दरता तुम्हें कितनी भी भाये "
सूरा -अहजाब 33 :52 

उल्लंघन -इतिहास से सिद्ध है कि ,कुरान के इस आदेश पर लात मार कर मुहम्मद ने 43 औरतें राखी थीं .
 (पूरा विवरण विस्तार से अगले लेख में दिया जाएगा ) 

5 -अपने दोस्त की सजा माफ़ कर दी 

आदेश -व्यभिचार करने वाले पुरुष और स्त्री दोनों में से हरेक को सौ कोड़े मारो .और अल्लाह के कानून के मामले में किसी को उन पर तरस नहीं आना चाहिए .
सूरा -अन नूर 24 :2 

उल्लंघन -अनस बिन मालिक ने कहा की मैं रसूल के पास बैठा था .तभी लोग एक आदमी को रसूल के सामने लाये .उस पर व्यभिचार का आरोप था.रसूल उसको जानते थे ,वह रसूल के साथ नमाज पढ़ता था .उसने रसूल से पूछा की आप मुझे क्या सजा देंगे .रसूल ने उस से कहा जाओ मैंने तेरा अपराध माफ़ कर दिया
.बुखारी -जिल्द 8 किताब 82 हदीस 812 

6 -औरतों पर बुरी नजर रखी 

आदेश -हे ईमान वालो अपनी निगाहें नीची रखो ,और पवित्रता की रक्षा करो .और पवत्र बातें करो .
सूरा -नूर 24 :30 

उल्लंघन -मुहम्मद अपनी चचेरी बहिन उम्मे हानी बिन अबू तालिब पर बुरी नजर रखता था .उम्मे हानी की शादी हिबैरा नामके व्यक्ति से हो चुकी थी .जब हिबैरा बाहर होता था ,तो मुहम्मद उम्मे हानी के साथ सोता था .जब यह बात लोगों को पता चली तो हिबैरा पत्नी के साथ नजरान चला गया .इस घटना से नाराज होकर कई लोगों ने इस्लाम छोड़ दिया था .तबरी -जिल्द 8 हदीस 186 

इब्ने इशाक --पेज 184 बुखारी -जिल्द 2 किताब 23 हदीस 442 

"अबू उसैद ने कहा की एक बार रसूल अश शौत नामके बाग़ में गए ,उसकी मालिकिन विधवा थी और सुन्दर थी . उसका नाम जुनैनिया था .रसूल ने उस से शादी का प्रस्ताव रखा ,लेकिन वह नहीं मानी .तब क्रोधित हो कर रसूल ने उसे मारा .गुस्से से जुनैनिया ने कहा 'लानत है तेरे अल्लाह पर और लानत ऐसे रसूल पर "

बुखारी -जिल्द 7 किताब 63 हदीस 182 बुखारी -जिल्द 5 किताब 59 हदीस 524 .बुखारी -जिल्द 9 किताब 87 हदीस 140 

मुस्लिम -किताब 1 हदीस 1671 ,1674 और 1675 और
 तबरी -किताब 8 किताब 59 हदीस 559 

7 -मासिक धर्म की हालत में औरतों से विषयभोग 

आदेश-"वे तुम से मासिक धर्म के बारे में पूछते है ,कह दो यह तो नापाकी है .तो माहवारी के दिनों में औरतों से दूउर रहो .और जब वे शुद्ध हो जाएँ तभी उनके पास जाओ .सूरा -बकरा 2 :222 

उल्लंघन -आयशा ने कहा कि जिस समय मैं माहवारी में होती थी ,और मेरी योनी से स्राव बह रहा होता था ,रसूल उसी हालत में मेरे साथ सम्भोग कर लेते थे ,वे स्राव को पोंछ लेते थे .
बुखारी -जिल्द 1 किताब 6 हदीस 298 

"आयशा ने कहा कि ,एक बार रसूल ने मुझ से मेरा इजार (एक वस्त्र )खोलने को कहा ,उस समय मेरा मासिक स्राव रिस रहा था .रसूल ने मेरे साथ एक बड़े बर्तन में नहाया .और मुझे प्यार (fondle )किया .फिर सम्भोग किया .
अबू दाऊद-किताब 1 हदीस 270 

8 -हज्ज के कपड़ो(इहराम )को पहिन कर शादी की 

आदेश -जिन लोगों ने हज्ज का इरादा कर लिया है (इहराम पहिन लिया )उनको हज्ज के दिनों में विषयभोग की बातें करना जायज नहीं हैं "
सूरा -बकरा 2 :197 

उल्लंघन -इब्ने अबास ने कहा कि रसूल उमरा (हज )के लिए मक्का जा रहे थे ,तभी उनको मैमूना बिन्त से शादी का प्रस्ताव मिला .रसूल ने उसे कबूल कर लिया .और इहराम पहिने हुए ही मैमूना से निकाह कर लिया .
तबरी -जिल्द 8 हदीस 136 . 

मुस्लिम -किताब 1 हदीस 1671 ,1674 और 1675 और
 अबू दाऊद -जिल्द 2 किताब 10 हदीस 1840 


"मैमूना का पति मर गया था .इस शादी के समय रसूल कि आयु 53 साल और मैमूना की आयु 30 साल थी .मुस्लिम -किताब 8 हदीस 3284 

बुखारी - जिल्द 5 किताब 59 हदीस 559 .और 
सुन्नन नसाई -जिल्द 1 हदीस 43 पेज 130 

9 -अपनी पत्नियों को तलाक दी 

आदेश -हे रसूल तुम्हारे लिए यह जायज नहीं है कि तुम अपनी पत्नियों को तलाक देकर दूसरी औरतें ले आओ ,चाहे उनकी सुन्दरता तम्हें कितनी भी भाये "
सूरा -अहजाब 33 :52 

(इसी आयत की तफ़सीर (व्याख्या )में लिखा है "रसूल को अपनी पत्नियों को तलाक देना हराम था पेज 473 ) 

उल्लंघन -इसके बावजूद मुहमद ने इन औरतों को तलाक दी थी -

1 -उम्मे शरीक -इसका नाम गाज़िया बिन जाबिर था .इसका एक लड़का भी था ,यह विधवा थी
,तबरी -जिल्द 9 हदीस 139 

2 -मुलायाका बिन दाऊद -इसने मुहम्मद से कहा था तुम मेरे पिता के हत्यारे हो ,इस लिए मुहम्मद ने तलाक दी .तबरी जिल्द 9 हदीस 165 

3 -अल शनबा बिन्त अम्र -जब्मुहम्मद का पुत्र इब्राहीम मरा तो इसने कहा था कि अगर तुम सचमुच रसूल होते तो ,तुम्हारा बच्चा नहीं मरता .मुहम्मद ने शनबा को मारा और तलाक दे दिया .तबरी -जिल्द 9 हदीस 136 

4 -अल आलिया बिन्त जबियान-यह हमेशा बीमार रहती थी ,इसलिए तलाक दिया .तबरी -जिल्द 9 हदीस 138 

5 -अमरा बिन्त यजीद -इसे कोढ़ हो गया था ,इसलिए तलाक दी
.इब्ने माजा -जिल्द 3 हदीस 2054 और तबरी -जिल्द 9 हदीस 188

6 - कुतैला बिन्त कैस-इसके भाई ने इस्लाम छोड़ दिया .इसलिए तलाक दे दी .
तबरी -जिल्द 9 हदीस 138 और 138 

7 -असमा बिन्त नौमान -इसको भी कोढ़ हो गया था .इसलिए तलाक दिया था
 .तबरी -जिल्द 39 हदीस 187 

बुखारी -जिल्द 7 किताब 63 हदीस 181 .और बुखारी -जिल्द 7 किताब 63 हदीस 180 

10 -मुशरिक के जनाजे में दुआ की 

आदेश -"नबी के लिए और ईमान वालों के लिए यह जायज नहीं है कि ,वे मुशरिकों लिए उनकी मगफिरत (आत्म शांति )के लिए दुआ करें ,और उनके पापों के लिए क्षमा मांगें .चाहे वह उनके रिश्तेदार ही क्यों न हों "
सूरा -अत तौबा 9 :113 

उल्लंघन -जब मुहम्मद के चाचा अबू तालिब का देहांत हुआ तो उम्मे अत्त्तिया ने रसूल से कहा ,जाओ अपने चाचा को दफ़न करो .मुहमद के साथ इब्ने उमरऔर इब्ने अब्बास के साथ और लोग भी थे .रसूल चाचा के जनाजे की नमाज पढ़ी .और उनके लिए दुआ मांगी .रसूल ने कहा की चाचा ने अपने जीवन में सच के सिवा कुछ नहीं कहा .अल्लाह उनको जन्नत में जरुर जगह देगा "
तबरी -जिल्द 6 हदीस 81 
बुखारी -जिल्द 2 किताब 5 हदीस 546 

"इब्ने अम्र ने कहा कि,जब इथोपिया का ईसाई राजा नाज्जाशी ( Negus )मरा तो रसूल ने उसके जनाजे की गायबाना नमाज पढ़ी .और चार तकबीरें पढीं .और उसके लिए दुआ भी की .जनाजे की नमाज में सौ से अधिक लोग थे
 .बुखारी -जिल्द 2 किताब 23 हदीस 337 

"इब्ने जरीर ने कहा की जब अली की माँ और अबू तालिब की पत्नी (मुहम्मद की चची )की मौत हुई तो ,रसूल ने उसके जनाजे की नमाज पढी और उनके लिए दुआ मांगी .रसूल की चची "फातिमा बिन्त अस "मरते दम तक मुसलमान नहीं बनी .और मुशरिक बनी रही " 

बुखारी -जिल्द 1 किताब 9 हदीस 480 

इन प्रमाणों से सिद्ध होता है कि मुहम्मद खुले आम कुरान के विरुद्ध काम करता रहा और खुद को अल्लाह का रसूल बता कर लोगों को मूर्ख बनता रहा था .मुल्ले मौलवी ज़रा ज़रा सी बात पर हर किसी को काफ़िर बता देते है .हमने इतने सबूत दिए हैं .अगर इन मुल्लों और इम्पेक्ट जैसे जिहादी ब्लोगरों में हिम्मत है तो इन सबूतों का खंडन करें ,आप  किसी मुस्लिम विद्वान्  से पूछिए कि फ़रिश्ते अजाजील  यानि इब्लीस ने तो सिर्फ अल्लाह के  एकहि आदेश का उल्लंघन  किया  था  और अल्लाह ने उसे काफिर घोषित कर दिया था , जिसके कारन   आज भी मुसलमान  इब्लीस पर लानत करके  हैं  और उसके नाम पर बने स्तम्भ  पर पत्थर मारते हैं  ,लेकिब  जब  अल्लाह के रसूल  ने 10 बार  अल्लाह के आदेशों  का उल्लंघन  किया तो आप उनको क्या कहेंगे  ?
.कि हम मुहम्मद को काफ़िर क्यों नहीं कहें ?
बाकी फैसला विद्वान् लोग खुद कर देंगे


(181/160)( 04/01/2011)

शुक्रवार, 8 मई 2020

असली काफिर कौन हैं ?

 (  नोट -यह लेख लम्बा होने के कारण दो भागों में पोस्ट होगा यह पहला भाग है   )   
 इस्लाम  का इतिहास   देखने  से पता  चलता  है  कि जब  भी  जहाँ  भी मुस्लिम अधिक होते है  ,या इस्लामी  राज  होता है मुस्लिम उलेमा , काजी  और मुफ़्ती सभी  गैर मुस्लिमो  को काफिर घोषित  करके  या तो उनको मरवा  देते  हैं  या उनपर  अत्याचार  करते रहते  है  ताकि परेशान  होकर वह मुस्लिम बन  जाएँ ,चूँकि इस्लाम की बुनियाद ईमान यानि अन्धविश्वास  पर ही खड़ी  है  , और  जब कोई मुस्लिम शिक्षित  हो जाता है  तो उसको इस्लाम  की हकीकत   समझ में  आ जाती  है और वह हिन्दू धर्म की  अच्छाइयों   पर आकर्षित  होने लगता  है  , इस से मुल्ले मौलवियों  को  अपनी दुकाने बंद  होने  का दर  लगने  लगता है  ,और ऐसे    उदार  मुस्लिमों   पर  अंकुश  लगाने  के लिए उलेमा  और मुफ़्ती  उस व्यक्ति जरा  जरा   सी    पर काफिर  होने  का फ़तवा  लगा  देते  है . मुल्लों  की इस आदत  का मजाक करते हुए  अंतिम मुग़ल बादशाह  जफर  के उस्ताद इब्राहिम " जौक " ने  लिखा  था ,
"जाहिद शराब पीने से काफिर हुआ मैं क्यों  ,
 क्या  ड़ेढ़ चुल्लू पानी  से इस्लाम  बह  गया  "
( इब्राहिम जौक -पैमाने  गजल  अव्वल      पेज   137 "

पिछले  साल  से अबतक इन  मुफ्तियों   ने   जिन लोगों  पर  कुफ्र   का फ़तवा     दिया  उनका विवरण   यह  है
1-आलिया  खान   - यह मेरठ निवासी  हाई स्कुल की क्षात्रा है  इसने दिनांक   4 जनवरी     2018 को एक टीवी कार्यक्रम में  सस्वर  गीता पाठ था जिसके  लिए  25 हजार  रुपया पुरस्कार भी मिला  लेकिन मुल्ले ईर्ष्या  में जल  गए और उसके परिवार  को  काफिर  घोषित  करने का फ़तवा  दे  दिया
2-नुसरत  जहां -  यह  बंगाल   के बसरी घाट से टी एम् सी विधायक   हैं  इन्होने  30 जून  2019 एक दुर्गा पूजा  कार्यक्रम के दौरान  माथे  पर सिंदूर  और गले में मंगल  सूत्र  पहिंन  कर  आरती  में भाग  लिया  था , इस  से चिढ  कर मुल्लों  ने इन  पर  काफिर होने  का फ़तवा  लगा  दिया .
3-इरफान  खान -यह प्रसिद्ध  फिल्म  अभिनेता   थे   ,यह पूर्णतः शाकाहारी  थे   रोज गाय और कुत्तों  को खाना  देते   थे   इन्होने जीवन  भर  किसी  जानवर  की कुरबानी   नहीं   की  , और  जब लंदन  से इलाज   करा  कर मुंबई  आये तो   प्रार्थना के लिए किसी  दरगाह  में न  जाकर  त्रम्बकेश्वर मंदिर   गए   थे  , इनके  दफ़न   के समय कुछ  हिन्दू  और मुस्लिम   थे  जिन्होंने  इनकी    आत्मा  की शांति "मगरफत  के  लिए  दुआ   की  थी  ,  और  जब  मुल्लों  को यह  पता  चला   तो  वह  जल  कर खाक  हो  गए  उनको  डर लगा  कि अगर इसी  तरह  दूसरे  मुस्लिम  करेंगे  तो इस्लाम  ख़त्म   हो  जायेगा ,इसलिए  जो मुस्लिम इमरान खान  दफ़न में गए थे  और उनकी मगफिरत  के जनाजे की नमाज में दुआ की थी  उनके लिए बरेलवी फिरके के मुफ़्ती ने  यह फ़तवा  जारी  किया  है ,
"इरफान खान एक्टर के लिए  दुआ  इ  मगफिरत  करने वालों के लिए  शरअ 
जिनको  इरफान खान एक्टर के कुफ्र का पता नहीं  ,था और अब पता चला तो  वह अब तौबा करें ,तजदीदे ईमान भी एहतियातन  करें ,और जिन  लोगों ने जानबूझते उस काफिर एक्टर इरफान  खान के लिए दुआ  की तो  वह खुद ईमान  से बाहर  हुए ,उनको तौबा करके फिर से ईमान  लाना  होगा ,और निकाह दोबारा   करना  होगा "
Khilafat e Tajushshariah  
Hazarat Allaama V Maulana Mufti ,Muhammad Shahid Barakati Razvi
Maddad lillaah vali Noorani sahib qibla Delhi


ध्यान देने की बात है कि इस फ़तवा में इमरान  खान की जनाजे की नमाज पढ़ने और  उनके दुआ करने वालों को  तजदीदे ईमान (ईमान का नवीनी करण ) और फिर  से निकाह करने को कहा गया है  ,  जो कुरान के खिलाफ  है  ,

1-क्या गैर मुस्लिमो  को काफिर कह  सकते  हैं  ?
अकसर मुस्लिम हिन्दुओं  को इसलिए  काफिर बता देते हैं कि वह अल्लाह ,रसूल, फ़रिश्ते  और अल्लाह की किताबें  नहीं मानते  , जबकि  हिन्दुओं ने न तो फ़रिश्ते   देखे  और न अल्लाह बारे  में कुछ पता  होता  है  ,  और न हिन्दुओं  को इनसे  दुश्मनी  है  , असली काफिर तो वह  हैं  जोजानबूझ  कर अल्लाह  से  दुश्मनी    करता  हो  जैसा  की कुरान  में लिखा  है ,
"जो भी अल्लाह  उसके फरिश्तों  और उसके  रसूलों  और जिबरईल  और  मीकाईल का शत्रु हुआ तो अल्लाह ऐसे  काफिरों  का शत्रु   है  'सूरा   बकरा  2:98  
सोचिये जब हिन्दुओं  ने  इन सब  से कभी     शत्रुता  का काम नहीं किया तो  हिन्दुओं को काफिर कहना कहाँ तक  उचित  है  ?हिन्दू हजारों मील दूर से अल्लाह, फरिश्तों और रसूलों  से शत्रुता कैसे कर  सकते  है  ,  शत्रुता  तो वही कर  सकता  है जो  अल्लाह  के साथ  या उसके शहर  में  रहता   हो  या   अल्लाह की आज्ञा  नहीं   मनाता  हो  .
1-काफिर  शब्द     के अर्थ 
काफिर अरबी की  मूल धातु   (root )(' क फ र ك ف ر  - )  से बना है इसका अर्थ  छुपाना  , ढांकना  है   ,इसी  से" काफिर - "बना  है  , अंग्रजी में इसके कई  अर्थ  हैं  ,जैसे Infidel,rejector ,disbeliever,nonbeliever,लेकिन कुरान  सम्मत  ك ف  رकाफिर का सही अर्थ   "अवज्ञाकारी - Disobeyer   " है  ,  अर्थात जो जानबूझ कर  अल्लाह के आदेश  का उल्लंघन  करने  वाला   हो  ,यह बात कुरान में वर्णित  शैतान  की कहानी से साबित होती   है   ,
2-सृष्टि  का  पहला  काफिर   इबलीस  है 
इस्लामी किताबों के अनुसार  शैतान  का असली नाम  "अजाज़ील - عزازيل   " था , किसी किताबों में इसका नाम  " हरिस  -حارث  " भी बताया गया   है  शैतान  फरिश्तों   का  सरदार  और  अल्लाह  का प्रिय   था , यह  उस  समय की बात  है  जब कोई मनुष्य  नहीं   और न कोई मुस्लिम था और न काफिर  था  , तभी अल्लाह  ने पहले  मनुष्य  आदम को  बना  कर सभी फरिश्तों  को  यह  आदेश   दिया ,
" हमने फरिश्तों  को हुक्म दिया कि आदम  के सामने सजदा  करो ,तो इबलीस के सिवा सभी  सजदे में गिर गए ,इबलीस ( إبليس  )ने अवज्ञा की  और घमंड  किया ,और काफिरों   में पहला    हो  गया  "
 सूरा  बकरा   2:34 

शैतान  और आदम  की यह कहानी पूरी कुरान में     30 से अधिक बार  आयी  है  
सोचने की बात  है कि जब  अल्लाह के साथ  जन्नत में   रहने वाले   और फरिश्तों   का सरदार होते हुए  अल्लाह का सिर्फ एक आदेश नहीं मानने  पर  अजाजिल यानि  शैतान को  काफिरों  में पहला  बना दिया  गया  और   मुसलमान  रोज उस  पर धिक्कार  करते   हैं  , तो  बताइये  जो व्यक्ति  अल्लाह से मिल चूका हो  और जिस  पर  अल्लाह कुरान  के माध्यम  से अपने आदेश  भेजता  रहता  हो  , और वही व्यक्ति  अल्लाह  का एक नहीं     अनेकों  आदेशों  का उल्लंघन  करता  हो   , तो क्या  आप उसे  अल्लाह  का रसूल  मानेंगे  या कुछ  और  ?
पूरी  जानकारी के लिए इस लेख  का दूसरा भाग  अवश्य पढ़िए,
 " मुहम्मद  रसूल   या  काफिर  " ( 181 /160 "

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शुक्रवार, 1 मई 2020

अब हमें क्या करना चाहिए ?

भारत के सभी लोग जानते  हैं कि कुछ  दिन  पहले    महाराष्ट्र  के  पालघर  नामके   एक गाँव  गढ़चिनचले (Gadchinchale   ) में  "कांगीसाईनिस्ट "   ( कांग्रस + ईसाई + कम्युनिस्ट    )  जिहादियों  ने दो हिन्दू   संतों और उनके ड्राइवर की  पुलिस के सामने  हत्या  कर दी  थी  ,  वास्तव  में यह हत्याकांड  हिन्दुओं   को खुली चुनौती   है   कि हिन्दुओ    देख लो तुम हमें  जिस पुलिस का डर दिखाया करते   हो   हम  उसी के सामने   ही  ऐसी  ही  वारदातें   करते  रहेंगे और तुम  सिर्फ देखते  रहोगे  , हमें काफी पहले एक लेख में  विस्तार   से बता  दिया  था  ,अगर इन दुष्टों  पर  अभी प्रभावी  कार्यवाही  नहीं  की  गयी  तो  वह  दिन  दूर  नहीं  है कि जब  संसद  के सामने और सुप्रीम कोर्ट  के अंदर ही ऐसी  घटनाये  हो  जाएँगी 
दो   दिन  पहले  हमारे  मित्रों  ने पूछा   था कि ऐसी  हालत  में हमें  यानि  हिन्दुओं  को क्या करना चाहिए  ,  , हम यह छोटा  से लेख  तब लिखने  पर  मजबूर   हो  गए  जब हमने  एक फर्जी  आर्यसमाजी  का यह  कमेंट देखा  जिसमे उसने  कहा कि यह  लोग इसलिए मारे   गए क्योंकि   यह शंकर  के उपासक   है जो  डरपोक  होते  है  , अगर  आर्यसमाजी  होते तो  दुष्टों  का जवाब  दे  देते    हमने जवाब  दिया  था कि जब   अब्दुल  रशीद  ने  स्वामी  श्रद्धानन्द की हत्या की  थी तो  आर्यसमाजियों  ने मुसलमानों  का क्या उख़ाड़ लिया  था  ? लेकिन हमें  इस बात पर बड़ी  हंसी  आयी  जब कोई  बाबा  इस हत्या कांड  के विरोध  पर आमरण अनशन  पर बैठ  गया , इसे पता नहीं  की देश में भूख  के कारन  रोज  लोग मरते  रहते  हैं  , ऐसे पचास  लोग  भी मर  जायेंगे  तो हिन्दू शत्रुओं  पर कोई  असर  नहीं  होगा  , और अगर   अदालत  में जाओगे  तो पचास  साल  तक  कोई फैसला  नहीं  होगा   , चूँकि   यह  हिन्दुओं  के खिलाफ  एक जिहाद है जो उसी दिन  से सुरु  हो गया था   जिन  दिन मोदी  जी  ने मुस्लिम टोपी  पहनने से इंकार  कर  दिया  था   अभी  तक  इस जिहाद  का सञ्चालन  मुस्लिम   कर  रहे  थे     और कुछ  नहीं  कर  पा रहे  थे  अब इसमें  कांग्रेस   , कम्युनिस्ट भी शामिल  हो  गए   ,  क्योंकि यह  सभी  वर्ण संकर   दोगले  और हिन्दू  विरोधी   है 
हमने   कई  बरस  इस्लाम  का अध्यन   किया  है इसलिए  हमारी राय यही  है कि इस  जिहादी  बीमारी   का सफाया   इस्लामी   तरीके  से  ही  हो  सकता  है,
 शत्रु  का मुकाबला करने के लिए रण भूमि   जरुरी  होती  है   आज की गीता  ने बताया है   "
"पाल घरे महाराष्ट्रे सम वेता धर्म  कंटकः -
एतानि जिहादी   विरुद्ध   किम   अकुर्वत हिन्दवः 
इसलिए   ऐसी   आपराधिक समस्या का   सदा के लिए निर्मूलन करने के लिए  हमें    पालघर  के ग्राम  " गड चिन चले " के बारे  में सही जानकारी होना जरूरी   है  , इस गांव की कुल जनसंख्या केवल   1298  ही  है  , यहाँ की  93 %  धर्म परवर्तित  ईसाई  है  ,  थोड़े से कट्टर मुस्लिम   है , इसकी  सरपंच   "चित्रा चौधरी " हैं  ,जो B.J.Pसे जीती  है   ,आगे  हम  जो भी  लिख्नने    जा रहे हैं  वह   उर्दू   में है  .
1.सभी इन्साफ पसंद लोगों   को चाहिए की  मुख्तलिफ   रास्तों  से    इस गाँव की आबादी  से बीस  गुना  यानि  तकरीबन  चालीस हजार   या उस से ज्यादा  लोग इस गांव में तय शुदा तारीख  पर  हर हालत में पहुँच  जाएँ ,इस  गांव  से गुजरात की सरहद बिलकुल  करीब  है  .
 2.  चूँकि   हमारा मकसद     फसाद  और तशद्दुद  नहीं  ,बल्कि अम्न ओ अमन   कायम करना  है  इसलिए आते हुए लोग अपने साथ  ,चाकू  ,तलवार  ,भाले बन्दुक   , देसी काटते   जैसे   हथियार नहीं  लाएं  , और न रस्ते से डंडे   वगैरह  भी नहीं  जमा करें . 
3. गांव  में घुसते ही जो भी वाशिंदा  दिखाई दे  ,बिना इम्तियाज के मर्द  , औरत  या बच्चा पुर खुलूस  सुलूक करें    ,और बड़ी मुहब्बत से गाँव के लोगों  को उनकी गलती  का एहसास  कराये  , जो उन लोगों  का  साथ देकर और ख़ामोशी से तमाशा  देखने  से किया  है  , और जिसके  लिए  गाँव के  लोग  भी बराबर  के जिम्मेदार   है  .
4.जब गांव के लोग नजर  आयें तो अपने ग़ुस्से काबू   रखें    , और उनके हाथ  पैर तोड़ना और सर फोड़ना  शुरू नहीं  करने लगें  ,  और चूँकि  औरतें  और बच्चे हर इंसान  की कमजोरी  होते हैं  ,  इसलिए गांव की औरतों  और बच्चों को जिस्मानी नुकसान हरगिज नहीं  पहुंचाए  ,  जैसे   हाथ पेअर तोड़ना या बच्चों को उठा  कर फेक  देना  वगैरह  ,
5.हमारा  मकसद  यह होना  चाहिए कि गांव के लोग हमारे इस भाईचारे  , दोस्ती   और सेकुलरिज्म  को  तब तक याद करें  जब  गांव बचा रहे ,या हमारी दोस्ती  के कायल होकर लोग गांव  छोड़  कर भाग  न  जाएँ   .
6.चूँकि  इस गांव  में  ज्यादातर  लोग  बनाये गए गरीब  लोग है इनकी  कच्चे घर और झोपड़ियां   होंगी  , इसलिए उनमे  आग  नहीं लगाए  और  अगर पक्के मकान  हों तो उनके दरवाजे  और खिड़कियों  के शीशे  नहीं  तोड़ें  ,  क्योंकि ऐसा करना  इंसानियत  नहीं  बरबरियत  हैं  .
7.आखरी   बात  गौर करने की हैं   ,कि गांव वालों की कार , स्कूटर  और मोटर   साइकल  नहीं जलाये    नहीं तो यह भाग कर  दूसरे  गांव कैसे जायेंगे   ?  इसी तरह  इन  लोगों  की फसलों   में आग हरगिज  नहीं  लगाएं    ,
निष्कर्ष   - हम तो यह   सलाह   कुरान  के अनुसार  दे रहे हैं   जिसमे लिखा   है 
"अल्लाह की राह में  प्यास थकन या  भूख  कोई भी तकलीफ हो उसे  सहन करें लेकिन ऐसा कदम उठायें   जिस से काफिरों  का क्रोध  भड़के  या जिस से शत्रु  का नुकसान   हो ,ऐसे  हरेक काम  करने पर अल्लाह एक सुकर्म  लिख देता है   "
सूरा  -तौबा   9:120  

हमने  तो  बिलकुल   सदा उर्दू में    ऐसी  घटनाये  सदा के रोकने   का सीधा    तरीका  बता दिया  जिस से पुलिस  अदालत   के चक्कर   नहीं पड़ेंगे   और नतीजा भी तुरंत  और  कायमी  होगाहम तो वही  शांति फैलाने वाला तरीका  बता रहे हैं   जो कुरान में बताया गया है  , और आज तक मुस्लिम बादशाह  और मुस्लिम हिन्दुओं  के साथ प्रयोग करते  आये है , इस तरीके को अपनाते  से भारत तो क्या दुनिया भर में शांति   हो जाएगी 
 लेकिन  हमें   शक  है कि हमारे  दुश्मन      हमारे दिए गए  सातों मुद्दों  का बिलकुल उल्टा   मतलब  समझ  लेंगे   हमारे  विरोधी  बड़े  चतुर   है    इशारा  समझ  लेते  है  
 फिर  भी  राहुल   गाँधी जिंदाबाद
 ( समझ  जाइये  )
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